बुधवार, 14 जनवरी 2015

To LoVe 2015: आतंकवादी नहीं तय करेंगे धर्म की परिभाषा


क्या फ्रांस अपने आज़ाद ख्याल और हर चीज पर सवाल उठाने की कानूनन आज़ादी का खामियाजा भुगत रहा है? क्या एक आतंकी हमले से आज़ाद और विद्रोही तेवरों वाले विचारों को अपने में समाहित करने वाले देश फ्रांस का समाजिक ढांचा बदल जाएगा?(attack video) साल के पहले हफ्ते में ही साप्ताहिक पत्रिका शार्ली एब्देयू पर हुए आतंकी हमले के बाद सारी दुनिया में ये सवाल उठ रहे हैं। (paris attack) फ्रासं यूरोप का ऐसा देश हैं जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कोर्ट भी दखल नहीं देता। सहिष्णुता की ऐसी बेमिसाल परंपरा फ्रांस में है जिसपर कोई  भी समाज गर्व करता है।
   
फ्रांस की साप्ताहिक पत्रिका शार्ली एब्देयू कई साल से चुभने वाले कार्टून छाप रही थी। इस पत्रिका ने पोप को भी नहीं छोड़ा था। इसके बदले में उसने मुकदमा झेला। कोर्ट ने मीडिया की आजादी में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। ये पत्रिका मुसलमानों के साथ ही ईसाइयों और यहूदियों पर भी निशाना साधती रही हैइस्लामी आतंकियों कि ओर से पत्रिका के पत्रकारों को धमकियां मिल रही थी। बावजूद इसके संपादक समेत पत्रिका के पत्रकारों का कहना था कि वो धमकियों ने नहीं डरते, और उनकी कलम नहीं रूकेगी। लोकतंत्र के इन पहरुओं ने समय आने पर दिखा दिया कि दुनिया की कोई ताकत कलम को नहीं रोक सकती। कलम के सिपाही दुनियाभर में हमला झेल रहे हैं..मगर अपने काम में डटे हुए हैं। (Journlist Killed around the world) पर इनके बीच सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी असीमित होनी चाहिए? क्या कहीं कोई महीन रेखा तो नहीं लांघ जाती मीडिया? 
    इसाई बहूल यूरोप इक्कसवीं सदी में विरोधी विचारों को सहने की क्षमता रखता है। समाज औऱ कानून सहअस्तित्व के सिद्धांत को मान्यता देते हैं। भले ही आतंकी हमले के बाद भी फ्रांस में दूसरे धर्म के लोगों की आजादी नहीं छीनी जाएगी।(world leader with paris) हालांकि पेरिस हमले के बाद फ्रांस समेत सारे यूरोप में विदेशियों को बाहर भगाने वालों का समर्थन करने वाली पार्टियों की लोकप्रियता बढ़ने का खतरा है। दुनिया जितनी तेजी से एक दूसरे से जुड़ रही है उसी तरह असहनशीलता और हिंसा में तेजी आ रही है। फ्रांस समेत कई यूरोपिय देशों के लोगो की तरह ही भारत से भी कुछ लोग भागकर इन रक्त पिशाचों की सेवा करने इराक जा पहुंचे हैं। 
    सवाल औऱ भी लगातार उठ रहे हैं। क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी कठमुल्लों के हिसाब से चलेगी? क्या इस्लाम की परिभाषा अब आतंकवादी तय करेंगे? लोग पूछ रहे हैं कि क्या मजहब के नाम पर बच्चों के गोलियों से छलनी शव, सिर कटे धड़, गोलियों की बौछार के बीच निरिह लोगों की कतार, भेड़ बकरियों की तरह बेची जाती औऱ बलात्कार का शिकार होती औऱतें औऱ कम उम्र की बच्चियां ही इस्लाम की परिभाषा हैं? इराक, सीरिया से लेकर अफ्रीका की जमीन पर इस तरह के नजारे आम होते जा रहे हैं। हैरत होती है कि ईसाई, यहूदी औऱ मुस्लिम धर्म की उद्गगम स्थली से इस तरह की खूनी परिभाषा दुनिया पर थोपी जा रही है। इसके खिलाफ आवाज़ अऱब के रेगिस्तान से ही उठानी होगी, क्योंकि यहीं से इंसानियत की खून की होली खेलने वाले लोग पैदा हो रहे हैं।  
    सवाल ये भी क्या यही परिभाषा दुनिया मानने के लिए मजबूर होगी? क्या अब लोकतांत्रिक देश भी खून के बदले खून के जंगली कानून से इसका जवाब दें? वैसे ऐसा होना फिलहाल असंभव है। (world togeather)इस जवाब का सबसे बड़ा अधार ये है कि दुनिया भर में मुस्लमानों के बीच हुए कई सर्वों में अधिकांश ने हिंसा का  कड़ा विरोध  किया है। (Muslims reject suicide bombing) (Muslim Reject Religious Parties and leader) औऱ यही लोग लोकतंत्र की ताकत हैं।  
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