गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

To LoVe 2015: Merry Christmas..क्यों भूल जाती है सुमुधुर घंटी की आवाज

आज क्रिसमस है .....खूबसूरत सा त्यौहार जहां सांता आता है..बच्चों के लिए उपहार लाता है....खासकर बच्चों को इसका इंतजार ज्यादा रहता है...लगता है काश सच में कोई सांता होता..हर बच्चे के लिए खुशियां लाता....चाहे पेशावर का बच्चा होता....चाहे असम का...चाहे वो बच्चा काले रंग का अमेरिका में होता.....जिंगल बेल की आवाज कान में पड़ती है तो कुछ ऐसा ही सुकुन होता है मुझे जैसे मंदिर कि घंटियों की होती है...लगेगी भी..आखिर बेल भी तो घंटी ही होती है....पर ये घंटी बचपन से बड़े होते होते सुननी क्यों बंद हो जाती है...पता नहीं। हो सकता है ऐसी कोई घंटी उन लोगो ने नहीं सुनी होगी या बड़े होने पर भूल गए होंगे ..जो पेशावर में...असम में बच्चों में मौत बांट रहे थे...तभी तो उनके हाथ नहीं थर्राये हथियार चलाते वक्त..वरना उनके हाथों में बच्चों के लिए उपहार होते...मौत बांटती गोलियां नहीं चलती उनके हाथों से...
होता है ऐसा जब लोग बहूत कुछ भूल जाते हैं...त्यौहार तकलीफ को भूलाकर खुशियां बांटने के लिए होता है..पर शायद कई लोगो को दूसरों को तकलीफ देकर मजा आता है...तभी तो दिल्ली की सड़कों पर आमतौर पर नमाज के बाद....गुरूपूर्व के बाद...होली के दिन....मोटरसाईकिल सवारों का कारंवा निकलता है.....कानून की धज्जियां उड़ाते हुए....ये कारवां ये भूल जाता है कि आसपास की गाड़ियों में उनके मां-बाप सरीखे बुजुर्ग भी होते हैं...खैर ये सोचना तो उनका काम नहीं हैं...ताकत का प्रदर्शन करने का घटिया तरीका यही होता है...त्यौहार बदनाम हो तो हो...मोटरसाईकिलों पर का ऐसा बेगैरत लोगो का कारवां क्रिसमस की रात दिल्ली की सड़कों पर अबतक नहीं देखा है मैने...कारवां होता है..पर आमतौर पर शांत....
     फिलहाल व्हाट्स अप पर काफी बधाई बाटं चुका हूं....ऑफिस में बैठ कर किया भी क्या जा सकता है? आज प्रार्थना का दिन है...तो आज के दिन मैं यही प्रार्थना करता हूं कि हिंदूकुश की पहाड़ियों की तलहटी में...उसके आसपास बसे जाहिल औऱ जंगली लोगो के कबीलों में ये घंटी बचपन से बजे....ताकि कोई बचपन बर्बाद न हो.....ताकि वो बड़े होकर हाथों से मौत बांटता न फिरे....पर क्या ऐसा हो सकता है....क्या सदियों से एक ही रवैया अपनाए कबीले बदल सकते हैं..क्या सांता वहां के बच्चों के पास नहीं पहुंच सकते? क्या वहां परियां बच्चों को कहानियों में नहीं मिल सकती...क्या....क्या...क्या...क्या...आखिर क्यों नहीं..???????????????
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गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

To LoVe 2015: क्यों सरेआम घूमते हैं स्त्री देह के भूखे दरिंदे?

    
एक रेप होता है और लोग धुंआधार भाषणबाजी करने लगते हैं। कहीं नेता तो कहीं विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग। सवाल ये है कि ये आग तभी क्यों लगती है  जब कोई मध्यमवर्गीय या क्रीम जॉब करने वाली वाली लड़की या फिर पॉश इलाके में कोई लड़की रेप का शिकार होती है? या फिर ऐसी ही किसी घटना के आसपास घटने वाली किसी लो प्रोफाइल परिवार की बच्ची के साथ घटित रेप पर ये सारी कवायद क्यों होती है? ये आंदोलन तबतक क्यों नहीं चलता जबतक सरकारी अमला सुरक्षा उपायों को पूरी सख्ती से लागू नहीं करता।
    ये ठीक है कि बलात्कार, हत्या जैसे जघन्य अपराध पूरी तरह रोके नहीं जा सकते, लेकिन ऐसे वारदातों में कमी लाई जा सकती है। मौजूदा कानून इन वारदातों पर लगाम लगाने के लिए काफी है। पर सवाल है कि कानून का पालन करवाने में सरकारी अमला घोर लापरवाही क्यों बरतता है? एक आदतन अपराधी आसानी से ड्राइविंग लाइसेंस औऱ करेक्टर सर्टिफिकेट हासिल कर लेता है, मगर इसका पता तबतक नहीं चलता जबतक वो पुलिस की पकड़ में नहीं आता। 
     आज सॉफ्टवेयर की दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। बावजूद इसके देशभर के अपराधियों का डाटा एक क्लिक पर उपलब्ध नहीं है। हालांकि चाहें तो चंद महीने में देश के अधिकांश थानों को ऑनलाइन किया जा सकता है। अगर ऐसा हो जाए तो कोई अपराधी ड्राईविंग लाइसेंस, राशन कार्ड  या पासपोर्ट नहीं बनवा पाएगा। मगर इसपर पर भाषण झाड़ने के अलावा अबतक खास काम नहीं हो सका है। हां इसपर काम जरूर हुआ है, पर जो भी हुआ है वो काफी देर से।
  कोई वारदात होने पर अक्सर लोग डायलॉग मारते हैं कि अपराधी भीड़ के सामने से अपराध करके निकल गया, पर कोई उसे रोकने आगे नहीं आता। ये डायलॉग मारने वाला कोई शख्स या सरकारी अधिकारी इस सवाल का जवाब नहीं देगा कि आवाज उठाने वाले की सुरक्षा का जिम्मा कौन उठाएगा? अगर विरोध करने वाले आदमी को अपराधी मार देता है, तो उसके परिवार को कौन पालेगा? कहने को गवाह की सुरक्षा का जिम्मा पुलिस औऱ प्रशासन का होता है, पर हकीकत ये है कि कई मामलों में गवाहों की रहस्यमय तरीके से मौत हो चुकी है। दोषी समाज भी है। अक्सर ऐसी मौत होने पर समाज उलटा नसीहत देता है कि दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की जरुरत क्या थी।
    समस्या इतनी ही नहीं है। हमारे देश में हर जगह दलालों का बोलबाला है। चंद रुपए देकर इन दलालों से कोई भी काम करवाया जा सकता है। ये दलाल पैसे लेकर किसी का भी राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि बनवा देते हैं। इन्हीं दलालों की मेहरबानी से लाखों बांग्लादेशी घुसपैठिए इलेक्शन कार्ड, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाकर भारत के नागरिक बन चुके हैं। हद तो ये है कि ऐसे घुसपैठिए और कई बार पकड़े भी जाते हैं, लेकिन ये सभी सेंट्रलाइज डाटा न होने का फायदा उठाकर दोबारा घुसपैठ कर जाते हैं। अगर पता भी चल जाए कि तो भी दोबारा घुसपैठ करने वाले को कोई कड़ी सजा नहीं दी जाती। आखिर अपराध में लिप्त घुसपैठियों को सीधे गोली क्यों नहीं मार दी जाती?
    सारे देश की सड़कों का नक्शा मोबाइल पर उपलब्ध है। बावजूद इसके हर गांव की डिटेल एक क्लिक पर उपलब्ध नहीं है। आखिर नकली इलेक्शन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस बनाने वाले दलालों औऱ सरकारी कर्मचारियों को कड़ी सजा क्यों नहीं होती? लोग दलाल का सहारा इसलिए भी लेते हैं, क्योंकि सरकारी बाबू ईमानदारी और तेजी से कामो का निपटारा नहीं करते।
    जाहिर है सिर्फ जबतक कई चीजों को सुधारा नहीं जाएगा, तबतक अपराधों पर कारगर लगाम नहीं लग पाएगी। रेप पीड़ित को न्याय दिलाने के नाम पर हल्ला मचाने से कुछ खास नहीं होने वाला। ये घटनाएं घटती रहेंगी, शाम होते ही सड़क पर बैखोफ चलना एक लड़की के लिए सपना बना रहेगा..औऱ किसी महिला या लड़की की जगह सड़कों पर स्त्री देह के वहशी शिकारी वहशी बैखोफ घूमते रहेंगे। 
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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

To LoVe 2015: आखिर कैमरे पर पकड़े गए केजरीवाल !

म आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल वैसे तो चप्पल पहनते हैं, दिखावे के लिए एक झरी हुई सी शर्ट पहनते हैं, कैमरे के सामने ट्रेन की सामान्य बोगी में सफर करते हैं, ड्रामेबाजी के लिए बदबूदार मफलर कान पर डाल लेते हैं और ठंड पडे तो कत्थई रंग का गंदा सा स्वेटर पहनते हैं, पर वही केजरीवाल जब हवाई जहाज के बिजनेस क्लास में सफर करते पकड़े जाते हैं तो उनके चंगू-मंगू सफाई देते हैं कि आयोजकों ने टिकट उपलब्ध कराया था, इसलिए वो क्या कर सकते थे ? हाहाहा, क्या केजरीवाल साहब आप  इतने ना समझ है । चलिए मैं बताता हूं क्या कर सकते थे ! बात पुरानी है, लेकिन जिक्र करना जरूरी है। आप पार्टी नेता आशुतोष भी इस बात के गवाह हैं। टीवी न्यूज चैनल IBN 7 में कार्य के दौरान चैनल का अवार्ड फंक्शन होना था । उस दौरान UPA की सरकार में ममता बनर्जी रेलमंत्री थीं। उन्हें आमंत्रित करने मैं उनके पास गया और कार्ड देते हुए आग्रह किया कि आपको इस आयोजन में जरूर आना है। ममता दीदी ने आग्रह को स्वीकार कर लिया और मुझे आश्वस्त किया कि वो जरूर पहुंचेंगी। उन्होंने मेरे सामने ही कार्ड अपने पीए को दिया और कहाकि प्रोग्राम में मुझे जाना है। मैने उस दौरान मैनेजिंग एडिटर रहे आशुतोष जी को बताया कि ममता बनर्जी से बात हो चुकी है और वो पहुंच रही हैं।

लेकिन शाम को जब मैं आफिस में था, अचानक उनका फोन आया और उन्होंने जो मुझसे कहा, कम से कम वो बात केजरीवाल को जानना बहुत जरूरी है। ममता जी ने कहाकि मैं आपके चैनल के आयोजन में आना चाहती हूं, उस दिन में मैं दिल्ली में हूं भी, लेकिन मजबूरी ये है कि " मैं कभी भी किसी पांच सितारा होटल में होने वाले आयोजन में नहीं जाती हूं और आपका आयोजन पांच सितारा होटल में है, इसलिए मुझे माफ कीजिए, मैं इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाऊंगी " पहले तो मुझे बुरा लगा कि वादा करने के बाद अब वो मना कर रही हैं, लेकिन सच कहूं उनका स्पष्ट बात कहना और सिद्धांतवादी होना मुझे अच्छा लगा।

इसलिए केजरीवाल जी ये कहना कि आयोजक ने टिकट उपलब्ध कराया तो ले लिया और बिजनेस क्लास में सफर कर लिया, ये ठीक नहीं है। इसका मतलब कोई बड़ा आदमी आपको कुछ आफर करेगा तो आप मना नहीं करेंगे ! फिर तो देश में आँफर देने वालों की कमी नहीं है। और हां वो बेचारे गरीब चाय वाले को गाली देते रहते हो, उन्हें भी तो अडानी ने चार्टर प्लेन का आफर कर दिया था, वो मना नहीं कर पाए, अब इसमें " चायवाले " की क्या गलती है ? आप उन्हें क्यों गरियाते रहते हो ? केजरीवाल साहब किसी पर उंगली उठाओ या किसी को बेईमान बताओ तो अपने तरफ भी देख लिया करो !

हां एक सवाल भी है : क्या आप पार्टी के चंदे का पैसा पार्टी के किसी नेता के पिता के खाते में ट्रांसफर हुआ है ? अगर हां तो उसका नाम क्या है ? पार्टी का पैसा पिता के खाते में ट्रांसफर करने की वजह क्या है ? क्या इस बात की जानकारी पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को दी गई हैं ? बाकी बातें बाद में ...


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