शनिवार, 29 नवंबर 2014

To LoVe 2015: छोटी छोटी कहानियां और जिंदगी का सफर

  छोटी छोटी कहानियां कभी-कभी इतना सुखद एहसास देताी हैं, जिन्हें बताना मुश्किल है। बस इसे समझा जा सकता है। खासकर तब, जब आप कई तरह की परेशानी और तनाव से घिरे होते हैं। इनमें कई तनाव इसलिए होते हैं, क्योंकि लोग आपको समझ नहीं पाते, और आप उन्हें समझा नहीं पाते। इन हालातों से निपटने के सबके अपने-अपने तरीके होते हैं। इसके लिए मैं या तो कोई किताब पढ़ने लगता हूं या टहलने निकल जाता हूं। 
    ऐसे ही मानसिक तनाव और ज़िंदगी की गाड़ी को दिशा देने के बीच बड़े दिन बाद छोटी-छोटी कहानियों को पढ़ने का मन कर गया। इस बार कहानी पढ़ने के लिए किसी किताब की जगह इंटरनेट का रूख किया। इंटरनेट का ब्राउजर खुला ही था कि जिंदगी की कहानियां चारों तरफ बिखर गईं। ये वो कहानियां थी, जो दस साल  पहले लिखी गई थीं। इन कहानियों में देश भी है और विदेश भी। साथ ही है भारत और पश्चिम की कशमकश भी। ये वो कशमकश है, जो भी आज कस्बे औऱ छोटे शहर से निकल कर बड़े शहरों के बदले समाज में फंसे लोगे के जेहन में भी फंसी हुई है। पढ़ते-पढ़ते मन भी कहानियों के बदलते किरदारों के साथ जुड़ने लगा।  
   बारिश में भीगे किसी के खोज में लगे किसी मुसाफिर की कहानी, उम्र की सांझ में उलझनों से उलझते लोग, बच्चों के बीच पिसते मां-बाप, सपनों के राजकुमार का इंतजार करती प्रौढ़ स्त्री, अपनी ही शर्तों पर जीवन में अकेले रह जाने वाले अभिशप्त लोग...औऱ ऐसे अनेकों किरदारों से रूबरु होते खुद आप। ये क्षण अजीब से एहसास वाले होते हैं। जिन्हें आप जीते हैं, जब कहानियों के बीच होते हैं।
    इन किरदारों की कहानियां जरुरी नहीं कि आसपास ही हों। कहानी में भटकती भावनाएं, उलझने, सवाल, ये सब कई बार आपके जीवन के ही टुकड़े होते हैं। वो भटकन, वो इंतजार, कलेजे को चीरते सवाल, खुद का मूल्याकंन करते हुए भी नतीजे को खारिज करने की जिद, सबकुछ खुद के ही अलग-अलग रूप होते हैं। कितना सच होता है इन कहानियों में। इन कहानियों में वो कड़वा सच होता है, जिससे कई बार हम जीवन में मुंह चुराते हैं, मगर कहानियों में जी खोलकर मिलते हैं। 
     पढ़ने और घूमने के अपने पहले शौक में मुझसे जीवन दिल खोकर मिलता रहा है, बिना किसी दुराव-छुपाव के। पर क्या शत-प्रतिश्त पूरी ईमानदारी के साथ में उससे मिल पाता हूं? जवाब है बिल्कुल नहीं। कई बार मैं मुंह चुरा लेता हूं अनेक लोगो की तरह। कभी शब्दों में बयां इन सच की पक्की सड़क के किनारे-किनारे चलकर बच निकलने की जुगत निकालता हूं। कई बार इन शानदार सड़कों पर आराम से फूल स्पीड में दौड़ पड़ता हूं खुशी-खुशी। यही ज़िंदगी है और यही कहानी है मेरी, आप की, और उन सब की, जो कई बार चोर नजरों से, तो कभी आंखों में आंख डालकर, प्यार से ज़िंदगी की तरफ देखते हैं। 
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शनिवार, 8 नवंबर 2014

To LoVe 2015: दिग्गज कांग्रेसियों को क्या सांप सूंघ गया है?..... Rohit

     
लगता है कि कांग्रेस को सांप सूंघ गया है। दिग्गज कांग्रेसी लापता हो गए हैं। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही कांग्रेस के बड़े नेता कम ही दिख रहे हैं। अगर इसकी बानगी देखनी हो तो न्यूज चैनलों पर चल रही बहसों को देखिए। जो कांग्रेसी नेता टीवी चैनलों पर दिख रहे हैं, उनमें से आप कितनों को पहचाने हैं? क्या उनकी कोई राष्ट्रीय पहचान है?  चंद नेताओं को छोड़ दें, तो अधिकतर दिग्गज कांग्रेसी गायब हैं।   
    दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के बयान अखबारों मे जरुर छप रहे हैं, मगर उससे ऐसा लगता है कि वो बीजेपी की जगह अपनी ही पार्टी से लड़ रहे हैं। जो बात पार्टी फोरम मे होनी चाहिए, वो मीडिया में उठ रही है। हालांकि लोकतंत्र में ये बातें होती रहती हैं। वैसे कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी फोरम में मौका न मिलने के कारण ये दिग्गज मीडिया का सहारा ले रहे हों?
     जरा कुछ साल पहले का समय याद कीजिए जब बीजेपी में काफी उठापठक चल रही थी। उसवक्त तत्कालिन कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना जरुरी है। आज स्थिती पलही हुई है। बीजेपी कांग्रेस की जगह राष्ट्रीय स्तर पर काबिज होती जा रही है। कांग्रेस मोदी की आक्रमक शैली का जवाब नहीं दे पा रही है। 
   मीडिया में नजर आ रहे कांग्रेस के गैर अनुभवी युवा नेता कार्यकत्ताओं में जोश नहीं जगा पा रहे हैं। जनार्दन द्विवेदी, सत्यव्रत चतुर्वेदी, सीपी जोशी सरीखे नेताओं के फिर से बागडोर संभालनी चाहिए। इन लोगों के अनुभव का फायदा कांग्रेस के युवा नेताओं को पहुंचेगा। बाद में यही युवा नेता को कांग्रेस में जान फूंकेंगे। 
     ऐसा नहीं है कि केवल दिग्गज कांग्रेसी ही लापता से हैं। कांग्रेस की अगली पीढ़ी के फायरब्रांड नेता की पहचान बना चुके नेता भी राष्ट्रीय पटल से गायब से हैं। सचिन पायलट औऱ अजय माकन जैसे नेता भी नदारद दिख रहे हैं। यही हालत कांग्रेस की महिला नेताओं की भी है। रेणुका चौधरी-अंबिका सोनी सरीखी नेताओं का भी कोई अता-पता नहीं है। कांग्रेस को फिर से युवा औऱ महिलाओं में अपनी पैठ बनानी होगी। कांग्रेस में जान फुंकने के लिए युवा नेताओं को बड़े स्तर पर सक्रिय होना चाहिए।
      कांग्रेस किसी विपक्षी एकता की धूरी के तौर पर भी नजर नहीं आ रही। बीजेपी के विरोध के नाम पर स्थानीय पार्टियां जितनी भी एकता दिखा लें, हकीकत यही है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की अगुवाई जरुरी है। खराब हालत के बाद भी कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है। फिलहाल कांग्रेस अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करती नजर नहीं आ रही। अगर पर्दे के पीछे आने वाले समय के लिए कोई रणनीति बन रही हो तो अलग बात है। इस वक्त जनता औऱ कांग्रेसी कार्यकत्ताओं के बीच कांग्रेसी दिग्गजों का गायब रहना चर्चा का विषय बना हुआ है।
       कमजोर विपक्ष सत्ताधारी पार्टी के लिए भी फायदेमंद नहीं होता। मजबूत विपक्ष सरकार को भी सजग रखता है। विपक्ष परिपक्व लोकतंत्र की एक अहम पहचान भी है। कांग्रेस को नहीं भूलना चाहिए कि 2009 में जनता ने राहुल गांधी की युवा छवि औऱ सोनिया और मनमोहन सिंह के अनुभव को देखते हुए कांग्रेस को 200 से ज्यादा लोकसभा सीटें दी थी। अब 2014 में जनता का ये समर्थन बीजेपी औऱ मोदी के पास है। मोदी का जादू लोगो के सिर चढ़कर बोल रहा है। उनके सामने कोई नेता नजर नहीं आ रहा। यानि फिलहाल मोदी बढ़त बनाए हुए हैं, और कांग्रेस दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही। देखना ये है कि कांग्रेस कब तक कोमा वाली स्थिती में रहती है।
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