बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

To LoVe 2015: शुभ दीपावली मित्रों

सभी दोस्तों को दीवाली की शुभकामनाएं। रोशनी का त्यौहार दीवाली हर घर में खुशियां लाए यह प्रार्थना है हमारी। मां लक्ष्मी सब पर कृपा करें। रोशनी का ये त्यौहार काफी महत्वपूर्ण होता है हमारे जीवन में। अगर धर्म से इतर होकर देंखे तो सारे भारतवंशियों के लिए दीवाली सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। दीवाली के समय मां लक्ष्मी का आगमन बताता है कि जीवन में सफाई, अनुशासन औऱ कर्म काफी अहम है। जिनमें ये गुण होते हैं उनके यहां मां लक्ष्मी मौजूद रहती हैं। । जहां मां लक्ष्मी की पूर्ण कृपा होती है, वहां धन के साथ-साथ सुख औऱ शांति, प्रेम भी होता है। जहां सिर्फ धन हो, वहां मां लक्ष्मी का अंश हो सकता है, पर पूर्ण मां लक्ष्मी नहीं। मां लक्ष्मी ने उन भगवान विष्णु का  वरण किया है जो धैर्यवान हैं, शक्तिशाली हैं, सहनशील हैं, कर्मयोगी हैं। क्या हममें ऐसा कोई गुण है? थोड़ा बहुत गुण हम सब में होता है, जाहिर है उसी तरह से हमें शांति, सुख और धन की प्राप्ति होती है। 
   दीवाली का त्यौहार मेरे अराध्य भगवान राम की घर वापसी का त्यौहार भी है। ये अलग बात है कि गुणों औऱ सामर्थ्य के इस पुरषोत्तम का कोई भी अंश मुझमें नहीं। जीवन में कितने आदर्श हो सकते हैं, कितने कर्तव्य होते हैं, ये भगवान राम के जीवन से सिखा जा सकता है। हर रिश्ता एक मर्यादा में बंधा हुआ। दुश्मन भी दुनिया का सबसे शक्तिशाली औऱ विद्दानों का विद्वान। भक्त भी तो सर्वगुण संपन्न हनुमान।  
    हमारे पूर्वजों ने हर त्यौहार को हमारे जीवन से जोड़ दिया था। दीवाली का त्यौहार ये बताता है कि संसार माया है, बावजूद इसके इस मायावी संसार में अर्थ की उपयोगिता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने जीवन के चारों आश्रम में गृहस्थ आश्रम को सबसे कठिन आश्रम बताया है। गृहस्थ ही संसार की धूरी को आगे बढ़ाता है। इस धूरी में धन भी अहम है। इसलिए संसार मिथ्या कहने वाले देश में धन को खारिज नहीं किया गया। साथ ही धन का सदूपयोग करने के लिए सूझबूझ और  बुद्भी भी काफी जरुरी होती है। इसलिए मां लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान गणेश औऱ मां सरस्वती की पूजा दीवाली वाले दिन की जाती है। जाहिर है कि धन होना जरुरी है, धन के साथ बुद्धि होना औऱ भी जरुरी है, बुद्धि सही दिशा में लगे इसके लिए शिक्षा भी जरुरी है। यानि तीनों देवता इंसान को आगे बढ़ने की शिक्षा देते हैं। पूजा करना, एक तरह से अनुसरण करना होता है। 
     
    दीवाली का ये त्यौहार मेरे लिए रोशनी का त्यौहार है, उम्मीदों का त्यौहार है। मैं आजकल तमाम परेशानियों में घिरा हुआ हूं। निराशा के घेरे में भी घिरा हुआ हूं। लोगों की छोटी ओछी हरकतें भी झेलनी पड़ रही हैं। इससे काफी कष्ट भी हो रहा है। हालात ऐसे हैं जैसे हंसने पर पहरा लग गया हो। मैं इतना जानता हूं कि रूपी अंधेरे रूपी निराशा में में उम्मीदों की रोशनी का दिया अंधकार को दूर भगा देता है। यही मेरी क्षमता भी रही है। हालात कितने भी प्रतिकूल हों, कहीं न कहीं आशावाद मेरा साथ नहीं छोड़ता। कहने वाले कहते हैं कि आशा ही निराशा का कारण है। बिना आशा के रहना आम इंसान के लिए संभव नहीं है। एक आम इंसान की हार तबतक नहीं होती जबतक वो आशा करना नहीं छोड़ता। और मैं पूरी तरह से खम ठोक कर कहता हूं कि मैं आम इंसान हूं। ऐसा ही बना रहना चाहूंगा। 
     मेरी प्रार्थना अपने दोस्तों के लिए भी है कि उम्मीदों का दिया उनके जीवन में जलता रहे। जब घमंड रावण का नहीं रहा, तब इस नश्वर दुनिया में हमारे आसपास के कंटकों कि बिसात क्या है। आखिर कुछ तो हमारे अराध्य अपना आशिर्वाद हमें देते ही रहेंगे। मां लक्ष्मी भी अभयदान देंगी ही। आखिर उनका त्यौहार है आज। तो जय श्रीराम दोस्तो, आपको दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं। 
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गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

To LoVe 2015: बापू-मोदी-सफाई औऱ हम बेशर्म

   बापू का सपना अपना...मोदी की आवाज हमारी। कहते हैं सदियां गुजर जाती हैं...मगर आदते नहीं...कुछ यही हाल है हमारा। साफ सफाई हमारी सनातन परंपरा का हिस्सा थी। 2400 साल पहले चाणक्य ने लिखा मुझसे सदियों पहले हुए ऋषियों की वाणी दोहराता हूं..जिस देश में स्वच्छ पानी, हवा न हो, वहां से प्रस्थान कर जाएं’’। सदियां गुजर गई...हमारी चिंतन परंपरा चोटी बचाने की चिंता में बदल गई। नतीजा हम धर्म से गए...देश से गए। बरसों के बाद फिर से याद आई...धर्म को याद कराने भक्त कवि चैतन्य महाप्रभू आए....धर्मों के मिलन से संत कबीर सरीखे फकीर आए। तीन सदी बाद सुधार के लिए राजा राममोहन राय औऱ ईश्वरचंद विद्यासागर सरीखे सुधारक आए....और आखिर में आए राजनीतिक चिंतक बापू। बापू भारतीयतता की निरंतरता के प्रतीक हैं। 
    बापू ऐसी विशाल छतरी थे, जिसके तले कई विचार इक्ठठे हुए। नतीजा हमारे देश में बिखरी ताकतें एकजुट हुईं। बापू की धूरी के इर्दगिर्द एक समय नेहरू, पटेल, सुभाष, शास्त्री, राजेंद्र प्रसाद जैसे व्यक्तित्वों का विकास हुआ। बाद में इन्हीं लोगो ने अपनी-अपनी अलग लकीरें खींची। सभी में एक बात समान थी, वो ये कि बापू की छाया में ही इन महान लोगो ने अपनी ताकत को पहचाना। बापू के जन्मदिन के ही दिन पैदा होने वाले लाल बहादूर शास्त्री तो सरलता कि मिसाल थे। बिना लावलश्कर औऱ दिखावे के रहने वाले वो इकलौते प्रधानमंत्री रहे हैं। उनसे ज्यादा मितव्ययी प्रधानमंत्री भी देश ने नहीं देखा है। 
      अब भारत इक्सवीं सदी में पहुंच गया है....पर अबतक समाजिक तौर पर हम सफाई पसंद नहीं बने है। इसका उदारहण दिखा देश की राजधानी दिल्ली के राजपथ पर। आज प्रधानमंत्री सफाई कार्यक्रम के बाद राजपथ से निकले ही थे, कि वहां पहुंची जनता गंदगी फैलाते में लग गई। पिकनिक मनाने के बाद कूड़ा पास पड़े कूड़ेदान में डालने तक की जहमत कोई नहीं उठा रहा था। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में गदंगी फैलाने पर एक साल तक चक्की पिसनी पड़ जाती है। तो ब्रिटेन में ढाई लाख रूपए तक जुर्माना हो जाता है।
   ये ठीक है कि हमारे यहां सार्वजनिक शौचालय की कमी है। मगर पिकनिक बनाने के बाद कूड़ा फेकने के लिए कूड़ेदान का प्रयोग हम क्यों नहीं करते? हम बड़े बेशर्म हैं। उपर से प्रधानमंत्री स्वच्छता की बात करते हैं, तो नाकभौं सिकड़ोते हैं।  
      हर बात पर सरकार को कोसने वाले लोग खुद कितना सफाई पसंद है। ये तो हर बाजार, पार्क में दिख ही जाता है। हां एक अच्छी बात जरुर हुई है अब गांवों में जिन घरों में शौचालय नहीं होते, वहां लड़कियां शादी करने से इनकार करने लगी है। ये एक कड़वा सच है कि देश में बलात्कार का शिकार होने वाली महिलाओं में खुले में शौच जाने को मजबूर औरतों की तादाद काफी है। जाहिर है कि बापू के कई सपने महाशक्ति बनने को आतुर भारत की राह में महत्वपूर्ण पड़ाव है। 
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