गुरुवार, 18 सितंबर 2014

To LoVe 2015: बीजेपी-क्या मोदी बिन सब सून?


मोदी-लोकप्रियता बरकरार, पर सिपहसलारों की कमी
  मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुए सभी विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। 32 विधानसभा उपचुनावों के नतीजों में सिर्फ 13 सीटों पर बीजेपी के खाते में गई हैं। खासतौर पर यूपी में 10 में से बीजेपी सिर्फ 3 सीटें जीत पाई है। हालांकि बीजेपी पश्चिम बंगाल में खाता खोलने में कामयाब हो गई है।  
    इस वबंडर के बीच समाजवादी पार्टी अपना किला बचाने मे कामयाब रही है। मीडिया रिपोर्टो औऱ राज्य में बढ़ते अपराधों के ग्राफ से हलकान मुलायम सिंह यादव औऱ उनके पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है। लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव के परिजनों को छोड़कर पूरी पार्टी का राज्य से सफाया हो गया था। उधर कांग्रेस के चेहरे पर छाई निराशा कुछ हद तक कम हुई है। पार्टी के खाते में गुजरात की तीन सीटों समेत कुल 6 सीटें आई है।
      

मुलायम की बल्ले-बल्ले

समाजवादी पार्टी की सफलता के पीेछे सिर्फ पिता-पुत्र का कमाल ही नहीं है। दरअसल इसबार यूपी में बीएसपी ने चुनाव नहीं लड़ा। जिससे मुस्लिम मतदाताओं के पास विकल्प नहीं था। नतीजा उनके वोटों का बड़ा हिस्सा मुलायम सिंह यादव की झोली में चला गया। दूसरे इन चुनावों में न तो बीजेपी अध्यक्ष और न ही मोदी ने परोक्ष या अपरोक्ष रुप से प्रचार किया। मोदी इस दौरान पूरी तरह से प्रधानमंत्री बने रहे। यानि देश से जुड़े मुद्दे पर केंद्रित रहे।  लोकसभा चुनाव में मोदी ने 237 दिनों में 440 चुनावी रैलियां की थीं यानी एक दिन में दो रैली। इसी मेहनत का नतीजा था कि बीजेपी सत्ता में आई। ऐसे में अभी मोदी एंड कंपनी को चुका हुआ मानना बड़ी बेवकूफी होगी।
मोदी के बरक्स कौन?  

मतदाता मैच्योर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी अतिआत्मविश्वास का शिकार हो गई। मेरे आकलन के हिसाब से विधानसभा चुनाव के नतीजों का संदेश साफ है कि इसाबर मतदाता राष्ट्रीय औऱ स्थानीय समस्याओं को लेकर स्पष्ट था। मतदाता को मोदी में राष्ट्रीय नेता की छवि दिखी इसलिए वो देश की बागडोर मोदी के हाथ में सौंपने को लेकर निश्चित था, औऱ उसने लोकसभा में मोदी वाली बीजेपी को स्पष्ट बहूमत दिया। वहीं राज्य में भी मतदाता ने उस पर भरोसा जताया जिससे उसे उम्मीद कि वो स्थानीय समस्याओं का हल कर सकेगा। उसे यूपी में बीजेपी का कोई धाकड़ नेता नहीं दिखा। जो कि बिल्कुल सच है। पिछले बीस साल से सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले प्रदेश में बीजेपी एक कद्दावर नेता की कमी का नतीजा भूगत रही है। 
'प्रधामंत्री मोदी' व्यस्त हैं

मोदी का फायदा उठाने से चूकी बीजेपी

जाहिर है बीजेपी को मोदी के रुप में राष्ट्रीय नेता मिल गया है। मोदी के प्रचार ने बीजेपी को देश के हर जिले में पहचान भी दे दी है। अब बीजेपी के सामने चुनौती है कि मोदी की लोकप्रियता को भूनाने की सामर्थ्य वाला नेता राज्यों में हो। महाराष्ट्र और हरियाणा मे चुनाव की घोषणा हो चुकी है और प्रधानमंत्री के तौर मोद का महत्वपूर्ण विदेश दौरा है। जिस कारण मोदी इन चुनावों में इतना समय नहीं दे पाएंगे। जबकि आने वाले समय में देश में मजबूती से स्थापित होने के लिए बीजेपी को इस वक्त मोदी की सख्त जरुरत है। बीजेपी को जल्दी से जल्दी हर राज्य में जनता से जुड़े कद्दावर औऱ प्रदेश स्तर पर स्वीकार्य नेता ढूंढकर उन्हें स्थापित करे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की खाली हुई जगह कभी नहीं भर सकेगी।
   

विरोधियों के मजेदार तर्क

 वैसे बीजेपी के विरोधियों औऱ सांप्रदायिक सोच वाले लोगो के विचित्र तर्क भी आने लगे हैं। उनका कहना है कि बंगाल की जिस सीट पर बीजेपी जीती है वहां हिंदू वोटों का ध्रूवीकरण हुआ है। जहां बीजेपी हारी है तो वहां सिर्फ इसलिए कि वहां हिंदू वोटों का ध्रूवीकरण नहीं हो पाया, मसलन यूपी में। एक औऱ बकवास तर्क है कि मोदी की छोड़ी गई वडोदरा लोकसभा सीट पर घटे मतों से मिली जीत मोदी की लोकप्रियता का संकेत हैं। जबकि जाहिर सी बात है कि लोगो को पता था कि बीजेपी ये सीट जीतेगी ही इसलिेए कई वोटर उदासीन हो जाते हैं। बीजेपी ने वडोदरा की सीट को इज्जत का सवाल नहीं बनाया था। वरना मोदी इस सीट पर चुनाव प्रचार जरुर करते। 
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रविवार, 14 सितंबर 2014

To LoVe 2015: हिंदी दिवस : ऊंचे लोग ऊंची पसंद !

जी हां, आज ये कहानी आपको एक बार फिर सुनाने का  मन हो रहा है। जहां भी और जब  हिंदी की बात होती है तो मैं ये किस्सा लोगों को जरूर सुनाता हूं। मतलब ऊंचे लोग ऊंची पसंद। मेरी तरह आपने  भी महसूस किया होगा  कि एयरपोर्ट पर लोग अपने घर या मित्रों से अच्छा खासा हिंदी में या फिर अपनी बोलचाल की भाषा में बात करते दिखाई देते  हैं, लेकिन जैसे ही हवाई जहाज में सवार होते हैं और जहाज जमीन छोड़ता है, इसके यात्री भी जमीन से कट जाते हैं और ऊंची-ऊंची छोड़ने लगते हैं। मुझे आज भी याद है साल भर पहले मैं एयर इंडिया की फ्लाइट में दिल्ली से गुवाहाटी जा रहा था। साथ वाली सीट पर बैठे सज्जन कोट टाई में थे, मैं तो ज्यादातर जींस टी-शर्ट में रही रहता हूं। मैंने उन्हें कुछ देर पहले एयरपोर्ट पर अपने घर वालों से बात करते सुना था, बढिया हिंदी और राजस्थानी भाषा में बात कर रहे थे। लेकिन हवाई जहाज के भीतर कुछ अलग अंदाज में दिखाई दिए। सीट पर बैठते ही एयर होस्टेज को कई बार बुला कर तरह-तरह की डिमांड कर दी उन्होंने। खैर मुझे समझने में  देर नहीं लगी कि ये टिपिकल केस है। बहरहाल थोड़ी देर बाद ही वो मेरी तरफ मुखातिब हो गए ।

सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजी में मेरा नाम पूछा... लेकिन मैने उन्हें नाम नहीं बताया, कहा कि गुवाहाटी जा रहा हूं । उन्होंने  फिर दोहराया मैं तो आपका नाम जानना चाहता था, मैने फिर गुवाहाटी ही बताया। उनका चेहरा सख्त पड़ने लगा,  तो मैने उन्हें बताया कि मैं थोडा कम सुनता हूं और हां अंग्रेजी तो बिल्कुल नहीं जानता। अब उनका चेहरा देखने लायक था । बहरहाल दो बार गुवाहाटी बताने पर उन्हें मेरा नाम जानने में कोई इंट्रेस्ट नहीं रह गया । लेकिन कुछ ही देर बाद उन्होंने कहा कि आप काम क्या करते हैं। मैने कहा दूध बेचता हूं। दूध बेचते हैं ? वो  घबरा से गए, मैने कहा क्यों ? दूध बेचना गलत है क्या ?  नहीं नहीं  गलत नहीं है, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप क्या कह रहे हैं। उन्होंने फिर कहा  मतलब आपकी डेयरी है ? मैने कहा बिल्कुल नहीं  दो भैंस हैं, दोनो से 12 किलो दूध होता है, 2 किलो घर के इस्तेमाल के लिए रखते हैं और बाकी बेच देता हूं।

पूछने लगे गुवाहाटी क्यों जा रहे हैं.. मैने कहा कि एक भैंस और खरीदने का इरादा है, जा रहा हूं माता कामाख्या देवी का आशीर्वाद लेने। मित्रों इसके बाद तो उन सज्जन के यात्रा की ऐसी बाट लगी कि मैं क्या बताऊं। दो घंटे की उडान के दौरान बेचारे अपनी सीट में ऐसा सिमटे रहे कि कहीं वो हमसे छू ना जाएं । उनकी मानसिकता मैं समझ रहा  था । उन्हें लग रहा था कि बताओ वो एक दूध बेचने वाले के साथ सफर कर रहे हैं। इसे  अंग्रेजी भी  नहीं आती है, ठेठ हिंदी वाला गवांर है। हालत ये हो गई मित्रों की पूरी यात्रा में वो अपने दोनों हाथ समेट कर अपने पेट पर ही रखे रहे । मैं बेफिक्र था और  आराम  से सफर का लुत्फ उठा रहा था।

लेकिन मजेदार बात तो यह रही कि शादी के जिस समारोह में मुझे जाना था, वेचारे वे भी वहीं आमंत्रित थे। यूपी कैडर के एक बहुत पुराने आईपीएस वहां तैनात हैं। उनके बेटी की शादी में हम दोनों ही आमंत्रित थे। अब शादी समारोह में मैने भी शूट के अंदर अपने को  दबा रखा था, यहां मुलाकात हुई, तो बेचारे खुद में ना जाने क्यों  शर्मिंदा महसूस कर रहे थे । वैसे उनसे रहा नहीं गया और चलते-चलते उनसे हमारा परिचय भी हुआ और फिर काफी देर बात भी । वो राजस्थान कैडर के आईएएस थे, उन्होंने मुझे अपने प्रदेश में आने का न्यौता भी दिया, हालाकि  मेरी उसके  बाद से फिर बात नहीं हुई।



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शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

टुकड़ों टुकड़ों मे खुद को खोते रहे 
आँखें खुली थीं फिर भी सोते रहे 
किस्सों किस्सों मे तलाशा खुद को
ढूंढ न पाये हम बस रोते रहे रोते रहे 
टुकड़ों टुकड़ों मे खुद को खोते रहे



























































































































































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