बुधवार, 23 जुलाई 2014

To LoVe 2015: जस्टिस काटजू...बांध ही दी घंटी

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्केंडेय काटजू ने बर्रे के छत्ते को पकड़कर झकझोर दिया है। जो बात सालों से दबी छुपी औऱ निजी बातचीत में कही जाती थी उसपर काटजू की दमदार मुहर लग गई है।(काटजू को केंद्र ) न्यायाधीश काटजू की बात के बाद बवाल तो खड़ा होना ही था, सो हुआ। न्यायापालिका में भ्रष्टाचार पर खुलकर बोलना आसान नहीं है। दरअसल ये दूधारी तलवार है....ऐसी दुधारी तलवार जिसका शिकार सिर्फ लोकतंत्र या फिर औऱ लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले होते हैं। मानहानी के मुकदमे का डर कई लोगो को चुप रहने पर मजबूर कर देता है। इसके ठीक उलट मुसीबत ये है कि अगर अदालत की तौहिन पर सजा का प्रावधान न हो तो अनर्गल आरोप लगाने वालों की बाढ़ आ जाती है। जिससे केवल ईमानदार न्यायाधीशों पर दवाब बनता है।((Justice Katju Blog)
निचली अदालतों में न्याय को खरीदे जाने के आरोप खुलेआम वहां काम करने वाले लगाते हैं। उच्च अदालतों से होते हुए अब उच्चतम न्यायालय तक की प्रतिष्ठा पर सवाल उठने लगे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश का मामला पूराना नहीं पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के कुछ रिटायर न्यायाधीशों पर छेड़छाड़ के आरोप लगने लगे हैं। अब देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश लाहोटिया काटजू के सवाल के घेरे में आ गए हैं।(काटजू के सवाल) (2..जस्टिस काटजू)
मगर यहां उल्टा होता है। लोग पूछ रहे हैं जस्टिस काटजू ने इस बात को बताने में दस साल क्यों लगा दिए। हद है, आखिर किसी ने तो खुलेआम बिल्ली के गले में घंटी बांधी है। दस साल बाद ही सही, कोई तो आगे आया है। हो सकता है कि इस आरोप को लगाने की ये टाइमिंग सोची समझी हो, मगर न्यापालिका में होने वाले सुधारों को लागू करना चाहिए। इस समय आम लोग के लिए न्यायापालिका ही आशा का आखिरी केंद्र है।
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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

To LoVe 2015: पर्यावरण और गंगा-जमुना की तहज़ीब का रोना?...रोहित

बातें हजार...दिखावा दुनिया का...औऱ नतीजा सिफर। कुछ यही हाल हमारे देश के कर्ताधरताओं का है। हमारे नेता और अधिकारी पर्यावरण के बेड़ा गर्क होने, नदियों के प्रदूषित होने और हवा के जहरिले होने का रोना अक्सर रोते हैं। खरबों, पद्म औऱ महापद्म (खरब के बाद रुपयों की गिनती हिंदी में) अब तक हरियाली बढ़ाने और नदियों का प्रदूषण काबू में करने के नाम पर खर्च कर दिए गए हैं। इसके बावजूद पर्यावरण का जहर काबू में नहीं आ रहा। इसके लिए सत्ता चलाने वाली हर पार्टी के साथ ही अधिकांश उदासिन जनता जिम्मेदार है।  
    भारत की सबसे पवित्र नदियों में शामिल गंगा का पानी जीवनदायनी नहीं रह गया है। अभी लोकसभा में एक सवाल पर पर्यारवण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावेडकर ने जो लिखित बयान दिया वो आंखे खोल देने वाला है। चाहे दिल्ली हो या कोई राज्य, हर जगह बेड़ा गर्क हो रहा है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार सबसे ज्यादा महाराष्ट्र की 28 नदियां  प्रदूषित हैं। उसके बाद नंबर आता है गुजरात का, जहां 19 नदियां प्रदूषित है। तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है जहां कि 12 नदियां प्रदूषित हैं। इसी उत्तर प्रदेश के बड़े इलाके से गंगा-यमूना बहती है। जाहिर है जब यहां गंगा-जमुना का बेड़ागर्क हो रहा है, तो गंगा-जमुना तहजीब के दम तोड़ने पर रोना काहे। जब अपनी नदियों का हम ख्याल नहीं रखते, तो इनपर अधारित तहज़ीब क्या खाक बचाएंगे। खैर यूपी के अलावा कनार्टक की 11, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश औऱ तमिलनाडु की 9 नदियां प्रदूषण का बोझ लिए बह रही हैं। यानि सारे देश की नदियों का हाल बेहाल है। 
     रह गई देश की राजधानी दिल्ली..तो इसका हाल जानकर देश के बाकी राज्यों की  बेहाली समझ में आ जाएगी। यानि जब राजधानी का हाल बेहाल है तो देश के बाकी हिस्सों में नदियों की हालत खाक ठीक होगी। देश की राजधानी से मात्र एक ही नदी बहती है यमुना। यमुना का भी महज चंद प्रतिशत हिस्सा दिल्ली से गुजरता है, लेकिन इस पूरी नदी के प्रदूषण को 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा दिल्ली की ही देन है।(courtsey-Indiawaterportal.org - न लगाएं यमुना में डूबकी) इसी यमूना को साफ करने के नाम पर जितने खरब रुपए बहाए गए हैं उतने में जाने कितने नए शहर बस जाते। यहां हरियाली का ये हाल है कि एक रिकॉर्ड के अनुसार महज 7 साल में 15 फीसदी हरियाली सफाचट हो गई है। कई वाटर रिजर्व गायब हो गए हैं। केंद्र के अनुासर महज दिल्ली का नजफगढ़ नाला क्षेत्र, पड़ोसी शहर नोएडा और गाजियाबाद के साथ ही हरियाणा का फरीदाबाद और पानीपत देश के सबसे ज्यादा प्रदूषित क्षेत्रों में हैं। 
   इन नदियों का हाल इसलिए पता है क्योंकि ये नदियां देश के बड़े हिस्सों से होकर  बहती हैं। इसके उलट पहाड़ों औऱ राज्यों में बहने वाली जाने कितनी छोटी नदियों का अस्तित्व विलिन हो चुका है। जिसकी किसी को कोई फ्रिक नहीं है। इन छोटी नदियों का गायब होना सबसे बड़े खतरे की पहली बानगी हैं।
इन छोटी नदियों के गायब होने का मतलब टूटते पहाड़ों औऱ भयंकर अकाल के आगमन की सूचना है। सब जानते हैं कि नदियां अविरल नहीं बहेंगी तो कालांतर में हम भी नहीं बचेंगे। हमारी आने वाली पीढ़ियां हमारे जमा पैसे से सिर्फ जानलेवा बीमारियों का इलाज ही कराती रह जाएंगी। जो गरीब होंगे वो तड़प तड़प कर जिएंगे, आसानी से मरंगे नहीं।। यानि हमारी उदासिनता और लापरवाही हमारे ही बच्चों को खा जाएगी। सावधान रहने की जरुरत आ ज है, क्योंकि कल चिड़िया के खेत चुग जाने पर पछताने से कोई फायदा नहीं होगा। 
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बुधवार, 16 जुलाई 2014

To LoVe 2015: मोदी बताएं : टनल में क्यों फंसी ट्रेन ?

श्री शक्ति एक्सप्रेस के पहले ही सफर में उधरपुर - कटरा रेल लाइन ने संकेत दे दिया है कि वो अभी रेल यात्रा के लिए पूरी तरह फिट नहीं है। श्री शक्ति एक्सप्रेस बीती रात जैसे ही टनल के भीतर घुसी, पटरी पर फिसलन की वजह से ट्रेन आगे नहीं बढ़ सकी और टनल के भीतर ही फंस गई। ट्रेन को टनल से निकालने के लिए इंजन के ड्राईवर ने काफी मशक्कत की, लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाया। आधी रात को इसकी जानकारी जैसे ही उत्तर रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों को हुई, सब के होश उड़ गए। बहरहाल कोशिश शुरू हो गई कि कैसे ट्रेन को टनल से बाहर निकाला जाए। आनन फानन में फैसला किया गया कि एक और इंजन  वहां भेजकर ट्रेन में पीछे से धक्का लगाया जाए, हो सकता है कि दो इंजन के जरिए इस ट्रेन को आगे बढ़ाया जा सके। बहरहाल रेलवे की कोशिश कामयाब रही और ट्रेन को किसी तरह टनल से बाहर कर लिया गया। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि  क्या इस ट्रैक पर आगे ट्रेन का संचालन जारी रखा जाए, या फिर इसे रोका जाए !  बहरहाल रेलवे की किरकिरी न हो, इसलिए मीडिया को जानकारी दी गई कि  इंजन में खराबी की वजह से ट्रेन टनल मे लगभग दो घंटे फंसी रही, जबकि सच ये नहीं है, रेल अफसर अपनी नाकामी छिपा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगी मंत्रियों को कहते रहते हैं कि वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें और महत्वपूर्ण फैसलों में सोशल मीडिया के सकारात्मक राय को उसमें शामिल करें। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी खुद इसे लेकर लापरवाह हैं। वो अभी से अफसरों के हाथ की कठपुतली बनते जा रहे हैं, खासतौर पर अगर रेलमंत्रालय की बात करूं, तो ये बात सौ फीसदी सच साबित होती है। आपको पता होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब ऊधमपुर से कटरा रेल लाइन की शुरुआत करने वाले थे, उसके पहले ही मैने आगाह कर दिया था कि ये रेल लाइन खतरनाक है, इस पर जल्दबाजी में ट्रेन का संचालन नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि इस रेल पटरी के शुरू हो जाने से रोजाना ट्रेनों की आवाजाही भी शुरू हो जाएगी, इसमें हजारों यात्री सफर करेंगे, इसलिए उनकी जान को जोखिम में नहीं डाला जाना चाहिए। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि मोदी ने इन बातों पर किसी तरह का ध्यान नहीं दिया और वाहवाही लूटने के लिए रेल अफसरों के इशारे पर कटरा रेलवे स्टेशन पहुंच गए और ट्रेनों की आवाजाही शुरू करने के लिए हरी झंड़ी दिखा दी।

मैं प्रधानमंत्री को एक बार फिर बताना चाहता हूं कि इस रेल पटरी पर जल्दबाजी  में ट्रेनों की आवाजाही शुरू करना खतरे से खाली नहीं है, ये बात मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट इसे खतरनाक बता  रही है। इसी साल जनवरी में रेल अफसर ने रेल पटरी का सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि कम से कम दो तीन मानसून तक इस पटरी पर ट्रेनों का संचालन बिल्कुल नहीं होना चाहिए। मानसून में इस ट्रैक का पूरी तरह परीक्षण होना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि टनल में अचानक  बड़ी मात्रा में पानी भर जाए, जिससे बीच में ट्रेनों की आवाजाही रोकनी पड़े। इतना  ही नहीं टनल नंबर 20 में तकनीकि खामियों की वजह से सेफ्टी कमिश्नर ने 27 से 29 जनवरी तक निरीक्षण किया, लेकिन एनओसी नहीं दिया।अंदर की खबर है कि काफी दबाव के बाद रफ्तार नियंत्रण कर ट्रेन चलाने की अनुमति दी है। टनल नंबर 18 में काफी दिक्कतहै। बताया गया है कि इस टनल में 100 लीटर पानी प्रति सेकेंड भर जाता है। ये वही टनल है, जिसकी वजह से अभी तक यहां ट्रेनों का संचालन नहीं हो पा रहा था। पानी का रास्ता बदलने के लिए फिलहाल कुछ समय पहले 22 करोड का टेंडर दे दिया गया, काम हुआ या नहीं, कोई बताने को तैयार नहीं। एक विदेशी कंपनी को कंसल्टैंसी के लिए 50 करोड रूपये दिए गए। उसने जो सुझाव दिया वो नहीं माना गया। इस कंसल्टैंसी कंपनी से कहा गया कि वो सेफ्टी सर्टिफिकेट दे, जिसे देने से उसने इनकार कर दिया।

मैं फिर जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि रेलवे के अधिकारी रेलमंत्री और प्रधानमंत्री को पूरी तरह गुमराह कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि रेलमंत्री रेलवे को जानने समझने वालों की एक एक्सपर्ट टीम बनाएं और हर बड़े फैसले को लागू करने के पहले एक्सपर्ट की राय जरूर ले। रेल अफसरों के बड़बोलेपन की वजह से ही रेलमंत्री सदानंद गौड़ा की रेल हादसे के मामले में सार्वजनिक रूप से किरकिरी हो चुकी है, जब गौड़ा ने रेल अधिकारियों के कहने पर मीडिया में बयान दिया कि ट्रेन हादसे की वजह नक्सली हैं, उन्होंने बंद का आह्वान किया था और रेल पटरी के साथ छेड़छाड़ की, इसी वजह से हादसा हुआ। इसके थोड़ी ही देर बाद गृह मंत्रालय ने रेलमंत्री की बात को खारिज कर दिया। बाद में रेलमंत्री ने अपनी बात बदली और कहाकि पूरे मामले की जांच हो रही है, उसके बाद ही दुर्घटना की असल वजह पता चलेगी। लेकिन ये बात पूरी तरह सच है कि अगर रेलमंत्री थोड़ा भी ढीले पड़े तो ये अफसर मनमानी करने से पीछे हटने वाले नहीं है।

यही वजह है कि जिस अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट में रेल पटरी को खतरनाक बताया, उसे तत्काल उत्तर रेलवे से स्थानांतरित कर दिया गया। वजह साफ है कि रेल अधिकारियों का मानना है कि वैष्णों देवी मां के धाम कटरा से अगर मोदी को ट्रेन को हरी झंडी दिखाने  का अवसर मिला तो वो मंत्रालय पर नरम रहेंगे और अफसरों पर उनका भरोसा बढ़ेगा, लेकिन प्रधानमंत्री और रेलमंत्री से सच्चाई को छिपाकर इन अफसरों ने एक ऐसे रेलमार्ग पर आनन फानन में ट्रेनों का संचालन शुरू करा दिया, जो यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से काफी खतरनाक है। ये अफसर नई सरकार को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को धोखा दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी, ट्रेनों  के संचालन की शुरुआत आप कर चुके हैं, अभी भी समय है इस रेल मार्ग की नए सिरे से पूरी जांच पड़ताल आप स्वयं कराएं। ब्राजील से वापस आएं तो 7 आरसीआर जाने के पहले सीधे रेल मंत्रालय पहुंचे और उन सभी अफसरों को सामने बैठाएं, जिन्हें इस रेल मार्ग को जल्दबाजी में शुरू करने की हडबड़ी थी। ये जानना जरूरी है कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि रेल अधिकारियों ने अपने ही महकमें के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट को खारिज कर ट्रेनों का संचालन शुरू कराया और पहले ही दिन श्री शक्ति एक्सप्रेस टनल मे फंस गई। जांच जरूरी है।  




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मंगलवार, 8 जुलाई 2014

To LoVe 2015: रेल बजट में नहीं दिखा 56 इंच का सीना !

भारतीय रेल आत्मनिर्भर होना चाहती है, इसलिए हे विदेशियों आप हमारी मदद करें ! भारतीय रेल अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है, इसलिए हे विदेशियों आप हमें सहारा दें ! आप हमारी मदद करेंगे... तो हम आत्मनिर्भर बनेंगे, आप मदद नहीं करेंगे तो भला हम आत्मनिर्भर कैसे होंगे ? आप  हमें सहारा देंगे तो हम अपने पैरों पर खड़े होंगे... आप सहारा नहीं देंगे तो हम अपने पैरों पर कैसे खड़े होंगे ? सच बताऊ... 56 इंच के सीने का दम भरने वाले नरेन्द्र मोदी से ऐसे रेल बजट की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। ईमानदारी से एक बात बताना चाहता हूं, मुझे इस सरकार के रेल बजट का बेसब्री से इंतजार था, मैं बजट के जरिए मोदी के विजन को जानना और समझना चाहता था, मैं देखना चाहता था कि 56 इंच का सीना रखने वाला नेता कहीं बजट में विदेशियों के आगे गिडगिड़ाता हुआ तो नजर नहीं आ रहा है, पर ऐसा ही हुआ। रेल बजट में देश के स्वाभिमान के साथ समझौता हुआ है, बजट में बातें तो बड़ी - बड़ी की गई हैं, पर इसके लिए पैसा कहां से आएगा, इस पर कोई बात नहीं की गई है। हर मसले का हल पीपीपी मतलब पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप को बताया जा रहा है, आसान भाषा  में बताऊं तो इस बजट में भारतीय रेल पूरी तरह विदेशियों के हाथ की कठपुतली नजर आ रही है।

सिडनी ( आस्ट्रेलिया ) रेडियो ने अपने हिंदी बुलेटिन में रेल बजट पर कार्यक्रम रखा था, जिसमें उन्होंने इस बजट के बारे में मुझसे बातें की। पहला सवाल पूछा गया कि पहले के रेल बजट से ये बजट किस मायने में अलग है ? मैं समझ गया कि विदेशों में भी लोग यही देखना चाहता हैं कि 56 इंच का सीना रखने वाले प्रधानमंत्री का पहला बजट किस दिशा में जा रहा है। सच बता रहा हूं, मैं जब भी विदेशी चैनल या रेडियो या अन्य किसी भी प्रचार माध्यम से जुड़ता हूं तो मेरी पूरी कोशिश होती है कि ऐसी बात ना कहूं जिससे विदेशों में देश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। लेकिन इस सवाल के बाद मैंने दिमाग पर बहुत जोर डाला कि नया कुछ बता दूं..। कसम से, इस बजट में तो एक बात भी नई नहीं है, अलबत्ता मैं ये कहूं कि पुराने रेल मंत्रियों के बजट में मामूली फेरबदल करके इसे पेश किया गया है तो कहना गलत नहीं होगा। चूंकि जनता पुरानी बातों को बहुत जल्दी भूल जाती है, और उसे मामूली बात भी नई नजर आती है। मैं बताना चाहता हूं कि बजट में जिस " बुलेट ट्रेन " की बात को बहुत अहमियत दी गई है। इसकी असल सच्चाई भी जानना आप के  लिए बहुत जरूरी है।

बात उस समय की है, जब रेलवे की हालत बहुत पुख्ता थी, उस समय रेलमंत्री स्व. माधवराव सिंधिया थे, वो बड़ा सोचते थे। सबसे पहले देश में बुलेट ट्रेन का सपना उन्होंने ही देखा था। लेकिन इस मामले में काम ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद देश में एनडीए की सरकार आई, वो पुराने ढर्रे पर चलती रही, लेकिन मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए एक की सरकार में रेलमंत्री रहे लालू यादव ने देश को एक बार फिर बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया। सपना ही नहीं बल्कि उन्होंने ही पहली बार  रेल बजट में बुलेट ट्रेन का ऐलान किया और दिल्ली से पटना के अलावा मुंबई से अहमदाबाद के लिए बुलेट ट्रेन की फिजिविलिटी सर्वै शुरू कराया। बड़ा काम था, इसलिए विदेशी एजेंसियों को सर्वे के लिए हायर किया गया। सर्वे पर करोडों रुपये खर्च किए गए। खैर सच ये है कि रेल मंत्रालय ने बुलेट ट्रेन के लिए कुछ काम जरूर शुरू कर दिया था, पर यूपीए 2 में लालू के पास गिनती के सांसद रह गए, इसलिए रेल महकमा ममता बनर्जी के खाते में चला गया। ममता रेलमंत्री बनीं, पर उनकी निगाह बंगाल की कुर्सी पर थी, इसलिए रेलवे के लिए कुछ बड़ा काम नहीं कर पाईं। बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाया, पर यात्री किराये में बढोत्तरी करने पर उन्हें मंत्री पद से हटा दिया। सच बताऊं त्रिवेदी, मुकुल राय और पवन बंसल के बारे मे चर्चा करना, सही मायने में समय खराब करना है।

बहरहाल मैने आज तक पत्रकारिता में किसी स्तर पर कभी भी समझौता नहीं किया, लिहाजा सिडनी रेडियो पर मैने साफ - साफ पूरी बातें ईमानदारी से कहीं। दूसरा सवाल हाईस्पीड़ ट्रेन के बारे में पूछा गया। मैं हैरान रह गया कि क्या देश कि असल तस्वीर विदेशियों को भी पता है। सही मायने में हाई स्पीड ट्रेन के मामले में मोदी सरकार जनता को बेवकूफ बना रही है। हमारे यहां रेल पटरी की ये हालत अब नहीं रह गई है कि इस पर 100 किलो मीटर प्रतिघंटा से अधिक रफ्तार से कोई ट्रेन चलाई जा सके। मोदी के मंत्री वाहवाही लूटने के लिए ऐसे काम कर रहे हैं, जो महत्वाकांक्षी रेलमंत्री लालू यादव ने भी नहीं किया। उदाहरण के तौर पर दिल्ली से लखनऊ के बीच एक एसी स्पेशल ट्रेन चलती थी, जो सप्ताह मे तीन दिन एसी स्पेशल के नाम से जानी  जाती थी और तीन दिन यही ट्रेन दुरांतो के नाम से चल रही थी। जनता को मूर्ख समझने वाले रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने इस ट्रेन का नाम बदल कर राजधानी एक्सप्रेस कर दिया और लगभग 400 रुपये प्रति टिकट किराया बढ़ा दिया। इस ट्रेन का कोई स्टापेज कम नहीं हुआ, रफ्तार नहीं बढ़ी, यहां तक की जो बोगी पुरानी ट्रेन में चल  रही थी वही गंदगी से भरी बोगी भी इस राजधानी में इस्तेमाल हो रही है। अच्छा  ज्यादा पैसा ले रहे हो तो कम से कम इसे साफ सुथरे प्लेटफार्म से गुजारो, जिससे इस ट्रेन पर सफर करने वालों को वीआईपी होने का आभास हो,  पर ये भी नहीं। दिल्ली से ये ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 9 से छूटती है, जबकि लखनऊ में इसे प्लेटफार्म नंबर दो या पांच पर लिया जाता है। मुझे लगा था कि लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह इस पर आपत्ति करेंगे, लेकिन वो भी  खामोश हैं। यात्रियों की जेब काटी जा रही है, किसी से कोई मतलब नहीं है।

रेलवे की बातें करूं तो मेरी बात कभी खत्म ही नहीं होगी। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप  (पीपीपी) पर नई सरकार को भी बहुत भरोसा है। उसे लगता है कि पीपीपी के तहत तमाम बड़े काम वो करा सकती है। मैं मोदी साहब को बताना चाहता हूं कि पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ने देश के कुछ चुनिंदा रेलवे स्टेशन को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए पीपीपी के तहत इंटरनेशनल टेंडर निकाला था। आपको हैरानी होगी कि किसी भी विदेशी निवेशक  ने इस काम को करने में अपन रुचि  नहीं दिखाई। जानते हैं क्यों ? क्योंकि रेलवे  ने अपनी विश्वसनीयता ही खो दी है। कोई भी विदेशी निवेशक रेलवे में पैसा लगाने से घबराता है। उसे लगता है कि  जिस देश में मामूली किराया बढ़ाने पर रेलमंत्री की छुट्टी हो जाती है, वहां कोई विदेशी निवेशक पैसा लगाने का रिस्क कैसे ले सकता है ? आपको पता है ना कि देश में रेलवे का किसी से कंपटीशन नहीं है, अकेली इतनी बड़ी संस्था है। आप सोचें कि कोई व्यक्ति अकेले किसी रेस में हिस्सा ले, फिर भी वो फर्स्ट ना आकर सेकेंड रहे तो आसानी से उसकी क्षमता को समझा जा सकता है। भारतीय रेल की हालत भी कुछ ऐसी ही है, अकेले दौड़ रही है, फिर भी दूसरे नंबर पर है।

मेरा मानना है कि रेलवे की तरक्की तब तक नहीं हो सकती, जब तक रेलमंत्री इसके  जरिए अपनी और पार्टी की राजनीति का हित देखते रहेंगे! वैसे तो जब दो सप्ताह के बाद संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला हो तो नैतिकता का तकाजा यही था कि रेलयात्री किराए में पिछले रास्ते से बढोत्तरी ना की जाए, रेल बजट में ही इसका प्रावधान किया जाए। पर यहां भी 56 इँच का सीना का दावा करने वाले मोदी जी का सीना 26 इंच का हो गया, क्योंकि उन्हें लगा कि बजट में  किराया बढाया तो देश में बहुत किरकिरी होगी, इसलिए बजट के पहले ही किराया बढ़ा दो.. बजट में फीलगुड लाने के लिए बुलेट ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात कर जनता को बेवकूफ बनाने में आसानी होगी। सच कहूं तो मोदी भी ऐसा करेंगे, मुझे भरोसा नहीं था। अब देखिए ना पुराने रेलमंत्रियों की तरह सदानंद गौडा ने भी पचासों नई ट्रेन का ऐलान कर दिया, ये जाने बगैर कि पुराने रेलमंत्रियों ने जिन ट्रेनों का ऐलान किया है, उसमें से सैकड़ों ट्रेन अभी पटरी पर नहीं आई है। रेलवे  की क्षमता अब ऐसी  नहीं है कि किसी भी रुट पर नई ट्रेन का संचालन हो सके, लेकिन लोगों को खुश करने के लिए तमाम ट्रेनों का ऐलान किया गया, इसमें ज्यादातर ऐसी ट्रेन हैं, जो सप्ताह में एक दिन चलेगी।

पहली बार लगा कि ये रेलमंत्री सेफ्टी और सिक्योरिटी में अंतर नहीं समझते। संसद में ताली बजे, इसलिए महिलाओं की सुरक्षा के लिए चार हजार महिला आरपीएफ कांस्टेबिल की भर्ती की बात तो रेलमंत्री ने की, लेकिन सेफ्टी ( संरक्षा ) से जुडे 1.60 लाख खाली पड़े पदों पर भर्ती कब होगी, इस पर वो खामोश रहे। ढेर सारी नईं ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात भी उन्होंने इस बजट में की, लेकिन ट्रेन में किसी व्यक्ति को कैसे आसानी से टिकट मिल जाएगा, कैसे उसे रिजर्वेशन मिलेगा, इस पर वो खामोश रहे। मोदी और रेलमंत्री लगातार दावा करते हैं रेलवे को राजनीति से अलग रखा  जाएगा  और कोई भी फैसला राजनीति से प्रभावित नहीं होगा। प्रधानमंत्री जी मैं पूछना चाहता हूं कि जब सभी श्रेणी का यात्री किराया 14 प्रतिशत बढ़ाया गया तो इसका विरोध देश भर में हुआ। लेकिन रेलमंत्री ने मुंबई का बढ़ा किराया वापस ले लिया। वजह साफ है कि वहां सात आठ महीने में ही विधानसभा का चुनाव होना है। ऐसे में जब रेलमंत्री कहते हैं  कि रेलवे से राजनीति नहीं होगी तो लगता है कि देशवासियों को मूर्ख और अज्ञानी समझते हैं।

एक सवाल पूछता हूं, बजट में जिस तरह की बातें की जा रही हैं, उससे क्या ये सवाल पैदा नहीं होता कि  संसद में रेल का अलग से बजट रखने का मतलब क्या है ? पहले एक रुपये किराया बढ़ता था तो देश में हाय तौबा मच  जाती थी,  यहां दूसरे रास्ते से सैकडों रुपये किराया बढ़ा दिया जाता है और कोई चूं चां  तक  नहीं करता है। ट्रेन का नाम बदल कर जनता की जेब काट ली जा रही है। अगर यही सब किया जाना है तो मुझे लगता है कि रेल बजट रेलवे के लिए एक सालाना जलसा से ज्यादा कुछ नहीं है।  बहरहाल रेल बजट ने तो लोगों को  निराश किया है, अगर आम बजट में भी लोगों को कोई राहत ना मिली और रेल बजट की तरह  इसमें भी  लफ्फाजी की गई तो मोदी की किरकिरी ही होगी। किरकिरी इस मायने में कि वो संख्या बल के आधार पर संसद में भले ही जीत हासिल कर लें, लेकिन जनता के दिलों से वो पूरी तरह उतर जाएंगे। एक बात कहूं मोदी जी प्लीज मुझे मुंगेरी लाल के हसीन सपने मत दिखाइये, मेरे सपनों पर राजनीति मत कीजिए। तकलीफ होती है। विदेशी चैनल पर मुझे देश की असल तस्वीर रखने में आज बहुत कष्ट हुआ।





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गुरुवार, 3 जुलाई 2014

To LoVe 2015: हाई स्पीड ट्रेन के नाम पर धोखा !

ई सरकार को रेल अधिकारी लगातार मूर्ख बना रहे हैं, इसकी मुख्य वजह कमजोर रेलमंत्री है। संभवत: वो रेल अफसरों की चापलूसी को समझ नहीं पा रहे हैं, इसी वजह से उन्हें अधिकारी गुमराह कर रहे हैं ।

एक ओर रेल अधिकारी प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए यात्रियों की सुरक्षा की अनदेखी कर  कटरा तक ट्रेन चलाने जा रहे हैं, जबकि रेलवे के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने निरीक्षण रिपोर्ट में साफ कहा है कि जल्दबाजी में ट्रेन चलाना खतरनाक होगा, दूसरी ओर " सेमी हाईस्पीड ट्रेन " के नाम पर रेलवे को एक बार फिर करोडों का चूना लगाने की तैयारी है।

याद कीजिए 15 फरवरी 2006 तत्कालीन रेलमंत्री लालू यादव ने दिल्ली से आगरा के बीच 150 किलोमीटर की रफ्तार से शताब्दी ट्रेन चलाने का दावा करते हुए नई दिल्ली स्टेशन से शताब्दी ट्रेन को हरी झंडी भी दिखाई थी।

दरअसल रेल अफसरों ने लालू को समझाया कि दिल्ली भोपाल शताब्दी ट्रेन को आगरा तक 150 किलोमीटर की स्पीड से चलाते हैं। इस काम के लिए उस समय भी रेल की पटरी पर लगभग 20 करोड रुपये से ज्यादा खर्च भी किए गए।

आप जानकर हैरान होंगे रेल मंत्रालय ने उस दौरान भी यही दावा किया था कि दिल्ली से आगरा 195 किलोमीटर की दूरी को सिर्फ 90 मिनट में पूरा किया जा सकेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

रेलवे टाइम टेबिल के हिसाब से ये शताब्दी ट्रेन सुबह 6 बजे नई दिल्ली से रवाना होती है और सुबह 8.06 बजे आगरा पहुंचती है। मतलब साफ है कि कई करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी शताब्दी ट्रेन आज तक 150 किलोमीटर की रफ्तार से नहीं चल सकी।

अब आठ साल बाद फिर रेल अधिकारियों ने " मोटा माल "  बनाने का रास्ता खोज निकाला है। इसी रेल पटरी पर " सेमी हाईस्पीड " ट्रेन चलाने के लिए ट्रायल रन किया जा रहा है, ये ट्रेन 160 किलोमीटर की रफ्तार से चलेगी और 90 मिनट में आगरा पहुंचेगी ।

अब रेल अफसरों से ये पूछने वाला कोई नहीं है कि क्या शताब्दी एक्सप्रेस 150 किलो मीटर की रफ्तार से चल रही है ? अगर चल रही है तो इसे आगरा पहुंचने में 2.06 घंटे क्यों लगते हैं ? नहीं चल रही है तो 2006 में करोड़ों रुपये खर्च हुए, उसका जिम्मेदार कौन है ?

अच्छा एक बात रेल अफसरों से ये भी पूछना चाहता हूं कि जिस ट्रैक पर 150 किलो मीटर की रफ्तार से एक ट्रेन चल रही थी, उस पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से एक और ट्रेन चलाने में आठ साल लग गए ?

मैं जानना चाहता हूं कि 150 की रफ्तार को अपग्रेड कर 160 किलोमीटर करने के लिए क्या क्या काम किया गया ? इस पर कितना पैसा खर्च हुआ ? अब रेल मंत्रालय का कौन सा अफसर गारंटी देगा कि दिल्ली से आगरा के बीच इस खास ट्रेन की स्पीड 160 किलोमीटर रहेगी ही ?

बहरहाल मेरा पुख्ता दावा है कि इस पूरे रेल खंड पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से ट्रेन को चलाना अभी संभव नहीं है। इस रेल खंड में 45 से 50 किलोमीटर ही ऐसी दूरी है जहां 160 की स्पीड  से ट्रेन चल सकती है।

चूंकि रेल के इतिहास में पहली बार इतना अधिक किराया बढ़ाया गया है, इसलिए रेल मंत्रालय " फेस सेविंग " के लिए लुभावनी घोषणाएं करने में लगा है। रेलमंत्री अनुभवहीन है, वो मंत्री की नहीं बोर्ड के चेयरमैन की भाषा बोल रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी,

प्लीज
रेल मंत्रालय से ये जरूर पूछा जाना चाहिए कि लालू यादव ने जिस शताब्दी को 150 किलो मीटर रफ्तार से चलाने के लिए 8 साल पहले हरी झंडी दिखाई थी, उसकी असल रफ्तार क्या है ? रेल मंत्रालय पर अगर सख्ती नहीं की गई तो ये यूं ही सरकार को मूर्ख बनाते रहेंगे।



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