मंगलवार, 25 मार्च 2014

To LoVe 2015: सादगी भरा सौंदर्य - एक थी 'नंदा'

एक औऱ फिल्मी सितारा अनंत आकाश में चमकने के लिए चला गया। खूबसूरत आंखों वाली नंदा(Nanda) ने दुनिया को अलविदा कह दिया। मुझे नंदा जब भी याद आती थीं..तो सीधा ध्यान आता था गाना..न न करके...प्यार तुम्हीं से कर बैठ. करना था इनकार..पर प्यार तुम्हीं से कर बैठे....। बचपन में खूबसूरत औऱ आधुनिक लड़की के तौर पर हमारे सामने सिर्फ फिल्म स्टार ही हुआ करते थे। दूरदर्शन और ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के दौर के साथ गुजरा था मेरा बचपन....जाहिर है उस समय हर हीरोइन का खूबसूरत लगना लाजिमी ही था। सालो बाद जब रंगीन टीवी आम होने लगा औऱ घऱवालों से छुपकर सिनेमा हॉल के गलियारों में जाना नसीब हुआ, तब रंगीन परदे पर बचपन में देखे हसीन चेहरे औऱ भी हसीन हो उठे।
 शायद मैं तब 15-16 साल का रहा होउंगा, जब सिनेमा के बड़े पर्दे पर फिल्म देखी जब जब फूल खिले....। न न करके, प्यार तुम ही से कर बैठे(Na Na Karke), “परदेसियों से न अंखियां मिलाना”,(pardesio) एक था गुल, एक थी बुलबुल(Ek Tha Gul)_ सारे गाने ऐसे लगते थे जैसे मेरे लिए ही लिखे गए हों। ऱफी की शानदार आवाज, सीधे-साधे खूबसूरत शशिशशी कपूर औऱ आधुनिक और शोख चंचल हसीना नंदा ने दिल को एक मखमली अहसास औऱ मासूम खूबसूरती से भर दिया था। फिल्म में छाई हरियाली औऱ पहाड़ की खूबसूरती सीधे दिल में उतर गई थी। मेरे जीवन में ये असर इतना गहरा रहा है कि आज भी जब कहीं घूमने जाता हूं तो ये मखमली अहसास से भरी खूबसूरती अपने साथ अपने दिल में लिए चलता हूं। वैसे इस फिल्म का गाना ये समा, समा है प्यार का(Ye Shama, Shama hai) नंदा जी का सबसे पंसदीदा गीत था।
      बचपन मासूम औऱ खूबसूरत होता है। बालमन पर जो सुखद और सहज छाप पड़ती है उसका असर ताउम्र रहता है। ऐसे ही बचपन में मेरे दिल में खूबसूरत फिल्मों का मखमली अहसास जो फिल्म  जब-जब फूल खिलेने जगाया, उसके करीब कम ही फिल्में पहुंच पाई हैं। ऐसे ही एक फिल्म थी तीन देवियां....जिसमें कवि देवानंद का दिल अंत में पहुंचा है सादगी भरे सौंदर्य की मल्लिका नंदा के पास। ये कहना गलत न होगा कि सिनेमा के परदे पर नंदा जगत प्रसिद्ध सादगी भरे भारतीय सौंदर्य की एक पहचान थीं।
      मेरे जैसे आपके तमाम फैन आपके शुक्रगुजार रहेंगे सादगी भरे प्यार के सुखद अहसास से हमारा परिचय कराने के लिए। है शांत, सौम्य और सादगी भरे सौंदर्य की मल्लिका नंदा अलविदा...नीली छतरी वाला आपको सुकुन औऱ शांति दे....हमारी ये ही दुआ है।
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सोमवार, 17 मार्च 2014

To LoVe 2015: Happy Holi..हो ली ..अब !


    रंगो का त्यौहार होली लोगो ने जमकर मनाई। मुझे भी इस मौके पर कई लोगो ने बधाई दी, लेकिन हर बार की तरह दिल्ली में कई लोग घरों में ही बंद रहे। घरों में बंद ये रंगों से ऐसे बच रहे थे, जैस उन्हें कोई रंग लगा देगा, तो अनर्थ हो जाएगा। कई तो काले बुच्च हैं..पर कहते हैं गहरे रंग से उन्हें एलर्जी है। अब आर्गेनिक कलर से कैसे एलर्जी होती है ये तो भगवान जाने। हद है यार...कम्बखतों यही तो वो त्यौहार है, काले गोरे होते हैं, औऱ गोरे काले। ये सभी घरों में ऐसे छुपे रहे, जैसे ओसामा बिन लादेन छुपा हुआ था। सुखद ये रहा कि बच्चों कि टोलियां अपना काम कर रही थी। सारे बच्चे गलियों को रंगों से सराबोर करने में जुटे थे। जबकि इनके माता-पिता कि समझ में नहीं आ रहा था कि घर में घुसे रहकर वो एक शानदार परंपरा का कत्ल कर रहे थे। दस साल पहले तक तो मुझे याद है कि मुहल्ले के लोगों का एक झुंड बनता था..जो घर-घर जाकर लोगो को अबीर लगाता था। ऐसे में अगर कोई अकेला भी रहता था, तो भी उसतक त्यौहार की खुशी पहुंच जाती थी। मगर समय के साथ ये रिवाज कम हो रहा है। ये समाजिक त्यौहार भी धीरे-धीरे "मैं-मेरा" का शिकार हो चला है।
   माना दशकों पहले शहर में छोटे होते घरों ने लोगो को अलग-अलग रहने के लिए मजबूर कर दिया था, मगर ये मजबूरी आदत क्यों बन गई है? दोस्तों औऱ परिवार से एक स्थायी सी दूरी वाला रिश्ता क्यों बनाए बैठे हैं? उसपर तुर्रा ये है कि इसे सब सहज मानने लगे हैं। हां, एक अच्छी बात ये रही कि तीन दिन की छुट्टी में कई लोग मथुरा, वृंदावन जाकर होली मना आए। पंरपरा का ये जरुरी औऱ आर्थिक हिस्सा कायम है।
   लोग नए साल की मुबारक सड़क चलते अनजानों को भी देते हैं, लेकिन अपनों और पड़ोसियों से बेरुखी वाला व्यवहार अपनाने लगे हैं। लगता है कि पत्थरों के शहर में रहते-रहते सब पत्थर होते जा रहे हो। समाज प्राकृतिक रंगों की जगह प्लास्टिक रंगों की चमक से चमक रहा है। किसी को इस बात की फिक्र नहीं है। ठीक है कि बाजार ने होली महोत्सव जैसे आयोजन कर रंगो को गायब नहीं होने दिया है...लेकिन दायरे में कैद रंग में आपको कभी अपनेपन का प्यार दिखता है? जिन रंगों में प्यार नहीं होता है, वो रंग चेहरे को सजाते नहीं, बदरंग कर देते हैं।
   ये ठीक है कि वक्त फिर से हमें हमारी धरोहर की तरफ मोड़ देगा। मगर खतरा इस बात का है कि कहीं ऐसा न हो कि जब वक्त हमें उस धरोहर की तरफ मोड़े....हम उसका आनंद उठाने का तरीका भूल चुके हों। इसलिए हाथ पर हाथ रखने से काम नहीं चलने वाला। अपने जीवन औऱ अपने आसपास असली रंगों को जगह दो। प्लास्टिक रंगों से छुटकारा पाकर अपनेपन के रंग से सबको रंग दो। ये करना मुश्किल नहीं है। जितना जल्दी हो सके जाग जाओ..वरना हम अपनी खूबसूरत परंपरा से दूर हो जाएंगे।
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सोमवार, 10 मार्च 2014

To LoVe 2015: फिल्मों में लोरी गीत : (Lori Songs Collection)


विषय आधारित फ़िल्मी गाने - 13
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Largest Collection of Lori Songs

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Please Note -------------------

Titles of all the songs are hyperlinked with YouTube links.
If you want  to see related video song, Just click on them.
We have done this for your /a>
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शुक्रवार, 7 मार्च 2014

To LoVe 2015: अभिनेत्री नलिनी जयवंत : [नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने - 24]


जन्म - 18 फरवरी 1926
मृत्यु - 21 दिसंबर 2010

Songs Sung By Nalini Jaywant

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नलिनी जयवंत प्रसिद्ध अभिनेत्री शोभना समर्थ (अभिनेत्रियों नूतन
और तनुजा की मां) की चचेरी बहन थी। 1941 में फ़िल्म- 'राधिका' से नलिनी
जयवंत ने  अपने कैरियर की शुरुआत शुरू की !


सन 1942 में रिलीज हुई
फिल्म ‘आंख मिचौली’ ने नलिनी /a>
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बुधवार, 5 मार्च 2014

To LoVe 2015: लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे - अनूप जलोटा, सोनू निगम और रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में सुनिये





गीत वही अंदाज/आवाज़ अलग [5]

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'लागा चुनरी में दाग छुड़ाऊं कैसे …' फ़िल्म- 'दिल ही तो है' (1963) का यह सर्वप्रिय गाना आपने मन्ना दा की आवाज़ में बहुत बार सुना होगा ! आज आप इसी सदाबहार गाने को गायक अनूप जलोटा, सोनू निगम और रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में भी सुनिये :






Song : Laaga Chunari Men Daag Chhupaun Kaise 

Movie : Dil Hi To Hai 

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मंगलवार, 4 मार्च 2014

To LoVe 2015: शंकराचार्य पहाड़ी













श्रीनगर में गोपाद्री पहाड़ी पर स्थित मन्दिर का इतिहास लगभग डेढ़ हजार साल पुराना है।
कश्मीर की यात्रा के समय आदि शंकराचार्य ने इस पहाड़ी पर कुछ दिनो तक तपस्या की थी।जिसके कारण यहाँ एक विशाल मंदिर बनाया गया ,जिसे शंकराचार्य मंदिर कहते हैं.हिन्दुओं के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है.
मंदिर के कारण लोगो ने इस पहाड़ी का नाम शंकराचार्य पहाड़ी रख दिया था जो सरकारी दस्तावेजो में भी मौजुद है।

शनिवार, 1 मार्च 2014

To LoVe 2015: Election 2014-कांग्रेस..बीजेपी-प्रचार का रथ रफ्तार में

देर से ही सही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की प्रचार गाड़ी ने भी रफ़्तार पकड़ ली है। मीडिया औऱ रेडियो चैनलों पर रागा प्रयार एक्सप्रेस सरपट दौड़ रही है। हालांकि साइबर की दुनिया खासकर ब्लॉग्स, फेसबुक और टिव्टर पर नमो के दर्शन ज्यादा हो रहे हैं। पुरानी कहावत है कि पहले मारे सो मीर। मिशन 2014 में ये कहावत मोदी एंड पार्टी पर सटीक बैठ रही है।
नरेंद्र मोदी-हो गई है बल्ले बल्ले
महीनों पहले ही चुनावी प्रचार में जुट जाने के कारण मोदी चर्चा के केंद्र में हैं। दस साल तक सकते में रहने के बाद बीजेपी का काडर एकजुट होकर पूरी ताकत से मोदी के साथ चुनावी मैदान में कूद चुका है। अमेरिका भी मोदी तक पहूंच बना रहा है। भारत अमेरिका के लिए बड़ा बाजार है। इस बाजार को चलाने वाली नई ताकतों में अधिकतर का झुकाव मोदी के पक्ष में हैं। जिस कारण अमेरिका को अब मोदी से कोई परहेज नहीं है। अमेरिका कुछ भी दावा करे...सच ये है कि अमेरिका पहले अपना फायदा देखता है।
राहुल गांधी-देर कर दी मेहरबां
बीजेपी के उलट दस साल तक सत्ता में रहने के बाद भी कांग्रेस का काडर अस्त-व्यस्त है। खासकर यूपी औऱ बिहार में।(Rahul & UP) कांग्रेस में दूसरी कतार के राष्ट्रीय छवि और राज्य स्तर के नेताओं का अकाल है। एक मुसीबत खुद राहूल गांधी की खड़ी की हुई है। कई बार ऐसा लगा कि वो खुलकर कमान संभालेंगे, मगर उन्होंने कह दिया कि उनकी पार्टी के लोकसभा सदस्य चाहेंगे, तो वो प्रधानमंत्री बनेंगे। संविधान की लाइन के पीछे ख़ड़े राहूल की बात तो ठीक है, लेकिन वर्तमान हालात के विपरित। बेहतर है कि राहूल गांधी फिलासफर की छवि छोड़ें...क्योंकि जनता उस राजनेता को ढूंढ रही है, जो सीधे-सीधे बात करे। यही नहीं राहुल गांधी जो मांगे आज मान रहे हैं, अगर वो पहले मान लेते, तो उसका फायदा कांग्रेस को ज्यादा होता। अब लोग यही सोच रहे हैं कि चुनाव नजदीक है, इस कारण ये मांगे मानी गई हैं। चाहे रिटायर सैनिकों कि एक रैंक, एक पैंशन की मांग हो या फिर एक साल में 12 सिलिंडर की बात हो। (राहुल अहम पड़ाव पर)
बीजेपी-कांग्रेस की नीतियों पर जनता भ्रमित
विदेश नीति से लेकर, अर्थव्यवस्था को तक कांग्रेस की नीति साफ है। वोटों की राजनीति औऱ अंतर्राष्ट्रीय हालात के दवाब के बीच कांग्रेस की एक नीति है। बावजूद इसके कांग्रेस कि नीतियां से आज जनता ज्यादा उत्साहित नहीं है। ठीक उलट, बीजेपी का अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का रोडमैप अबतक जनता को साफ नहीं मालूम। यानि केवल प्रचार के दम पर मोदी अपनी कमजोरी को ताकत में बदल चूके हैं। कांग्रेस औऱ राहूल गांधी को देर से शुरु हुए प्रचार अभियान ने बैकफुट पर धकेल दिया है। (मोदी-राहूल आगे देखें प्लीज) 
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