बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: कुंभ नगरी -नाशिक


नासिक [महाराष्ट्र ] -:

गोदावरी नदी के तट पर स्थित यह नगर हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिए प्रमुख है.महाराष्ट्र राज्य में यह शहर मुम्बई से लगभग  170  किमी और पुणे से २०५ किमी दूर है.पुराणों के अनुसार यह वह पावन धरती है जहां भगवान राम, सीता और रामानुज के पतितपावन चरण पडे हैं राम घाट पर कहते हैं स्वय भगवान राम ने डुबकी लगाई थी.

यहाँ बहुत से सुंदर मंदिर और घाट हैं,त्योहारों के समय बहुत

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: मनमोहन सिंह यानि स्पाँट ब्वाय आँफ 7 RCR

15 वीं लोकसभा में ना सिर्फ कामकाज कम हुआ, बल्कि मैने जितना देखा और पढा है, उसके आधार पर मैं पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि मौजूदा केंद्र की सरकार अब तक की  सबसे घटिया, भ्रष्ट और निकम्मी सरकार रही है। कांग्रेस में आज एक बड़ा तबका ना सिर्फ भ्रष्टाचार में शामिल रहा है, बल्कि उसका आचरण भी नारायण दत्त तिवारी जैसा रहा है।  हालत ये हो गई कि एक तरफ भ्रष्टाचार की खबरों से अखबार और न्यूज चैनल रंगे रहे, वही दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों की अय्याशी की भी खबरें रहतीं थीं। इन दोनों गंदगी का कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं था, वो सिर्फ प्रधानमंत्री की ईमानदारी छवि को आगे करने की कोशिश करते रहे। हालत ये हुई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीर से लोगों को बदबू आने लगी। मेरा अनुभव यही कहता है कि मनमोहन सिंह की हैसियत 7 आरसीआर के स्पाँट ब्वाय से बढ़कर नहीं रही, मुझे तो नहीं लगता कि 10 साल में एक दिन भी वो देश के प्रधानमंत्री रहे, असल में तो वो 10 जनपथ के पिट्ठू बन कर रहे। इस 10 साल का शासन मेरी नजर में इतना गंदा है कि बस चले तो मैं इस पूरे कार्यकाल को भारत के इतिहास से निकाल बाहर कर दूं।

खैर कहते हैं ना कि "बोया पेड़ बबूल का तो फल काहे को होय " अब कांग्रेस ने जो गंदगी बोई है, उसे काटना भी उसी को होगा, और इसके लिए कांग्रेस को पूरी तरह तैयार भी रहना चाहिए। वैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पता चल गया है कि जनता का कांग्रेस के प्रति कितना गुस्सा है । इतना ही नहीं कांग्रेस की जगह लेने के लिेए कौन आगे आ रहा है, ये भी उसे अब पता चल गया है। अगर मैं कहूं कि कांग्रेस की इसी गंदगी की पैदावार है अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी तो ये कहना कहीं से गलत नहीं होगा। अब जिस पार्टी की पैदावार के पीछे कांग्रेस हो, वो पार्टी आगे कैसा प्रदर्शन करेगी, इसे भी समझा जा सकता है। जब बुनियाद बेईमानी की होगी, जब बीज बेईमानी का बोया जाएगा, तो भला वो पार्टी कैसे साफ सुथरी रह सकती है ? अब देखिए पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा का चुनाव जीतते  ही बच्चे की कसम खाई और कहाकि कांग्रेस और बीजेपी से ना समर्थन लेगें और ना ही समर्थन देंगे। बच्चे की कसम से पलट गए और कांग्रेस के सहयोग से कुर्सी पर जम गए। एक दिन पहले फिर दोहराया कि भ्रष्टाचार से कहीं ज्यादा खतरनाक साम्प्रदायिकता है। मतलब केजरीवाल कांग्रेस को इशारों में ये संकेत दे रहे हैं कि घबराएं नहीं, अगर चुनाव के बाद चुनना हुआ तो वो भ्रष्टाचारियों के गोद में बैठ  जाएंगे।

वैसे भी कुर्सी मिलते ही केजरीवाल में कुर्सी की लालच की भी शुरुआत हो गई। वो तो  भगवान का शुक्र है दो चार न्यूज चैनलो में ईमानदारी अभी बची है, वरना तो केजरीवाल ऐसी सोने की लंका में पहुंच चुके होते जहां से वापस आना उनके लिए संभव नहीं होता। आप सबने सुना होगा कि चुनाव के दौरान वो पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भ्रष्ट बताते रहे, उन पर तमाम गंभीर आरोप लगाते रहे। केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद जब शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार के मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए विपक्ष ने दबाव बनाया तो कहने लगे कि नेता विपक्ष यानि हर्षवर्धन उन्हें सुबूत दे दें तो वो रिपोर्ट दर्ज करा देंगे। मैं केजरीवाल से पूछता हूं कि अगर आपके पास सुबूत नहीं था तो ये अनर्गल आरोप क्यों लगा रहे थे ? खैर अंदर की बात ये है कि शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित और केजरीवाल दोनों अभिन्न मित्र और एनजीओबाज हैं, दोनो को एक दूसरे की करतूतें पता है, लिहाजा संदीप की मम्मी के खिलाफ भला कैसे एफआईआर कराते।    

हालाकि मेरे साथ आप भी अरविंद केजरीवाल में तेजी से बदलाव महसूस कर रहे होंगे। केजरीवाल जब राजनीतिक पार्टी बना रहे थे तो बड़ी बड़ी बातें करते रहे। दावा कर रहे थे कि उनके यहां कोई हाईकमान नहीं होगा, सारे फैसले जनता से पूछ कर किए जाएंगे। यहां तक की पार्टी का उम्मीदवार कौन होगा, ये फैसला भी इलाके की जनता करेगी। केजरीवाल साहब क्या मैं जान सकता हूं कि लोकसभा के लिए कौन सा टिकट आपने जनता से पूछ कर दिया है ? जिस आम आदमी की आप बार-बार बात करते हैं वो आम आदमी को अपनी बात कहने के लिए आपके घर के सामने नारेबाजी क्यों करनी पड़ती है ?  फिर भी आप उनकी बात नहीं सुनते। दिल्ली की जनता जानना चाहती है कि अगर आपने सभी की राय से टिकट दिया है तो रोज आपके घर के बाहर प्रदर्शन करने वाले लोग कौन हैं ? चलिए आप तो ईमानदार हैं ना, बस ईमानदारी से एक बात बता दीजिए.. क्या वाकई आपके यहां कोई हाईकमान नहीं है ? सभी फैसले आम आदमी की राय मशविरे से होते हैं। मैं जानता  हूं कि इन सवालों का आपके पास कोई जवाब नहीं है। सच यही है कि केजरीवाल की हां में हां ना मिलाने वाला पार्टी बाहर हो जाता है, और उससे आम आदमी होने का हक भी छीन लिया जाता है।

अब देखिए..राजनीतिक पार्टी का ऐलान करने के दौरान और भी कई बड़ी-बड़ी बातें की। कहाकि हमारे मंत्री विधायक सरकारी बंगले नहीं लेगें। देश को लगा कि ये ईमानदारी आदमी है, देखो सरकारी बंगला लेने से भी मना कर रहा है। वरना तो लोगों ने राजनीति छोड़ दी, मकान नहीं छोड़ा। लेकिन चुनाव जीतने के बाद हुआ क्या.. केजरीवाल का असली चेहरा सामने आ गया, सरकारी आवास के लिए सिर्फ केजरीवाल ही नहीं उनके  माता पिता सब किस तरह बेचैन थे, वो पूरे देश ने देखा। मुख्यमंत्री को आवंटित होने वाले आवास को देखने के  लिए सबसे पहले माता - पिता ही घर से निकल लेते थे। बहरहाल खुद केजरीवाल ने पहले 10 कमरों के दो बंगला लेने के लिए हां कर दिया, टीवी चैनलों पर शोर शराबा मचा तो दो फ्लैट यानि आठ कमरे में आ गए। अगर ईमानदार होते और नैतिकता बची होती तो मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते ही सरकारी मकान से निकल लिए होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ.. उनके जूनियर मंत्री मनीष सिसोदिया भी सरकारी मकान दबाकर बैठ गए, इन्होंने भी मकान नहीं छोड़ा। सवाल उठा तो कहने लगे कि उनके पास कोई मकान नहीं है। मजेदार बात तो ये कि जब पत्रकारों ने केजरीवाल से पूछा कि क्या साहब आप सरकारी मकान क्यों नहीं छोड़ रहे हैं ? इस पर जो जवाब केजरीवाल ने दिया, इससे तो दिल्ली की जनता की निगाह से ही गिर गए। मकान के मुद्दे पर केजरीवाल ने कहाकि पहले जाकर शीला दीक्षित का बंगला देखो, फिर बात करो कि उनसे छोटा है मेरा घर या बड़ा है। लेकिन केजरीवाल को कौन समझाए, यहां बात छोटे बड़े मकान की नहीं ये तो आपकी ईमानदारी की बात है। रही बात शीला दीक्षित की तो मैं जानना चाहता हूं कि क्या मैडम शीला दीक्षित ही अरविंद केजरीवाल की रोल माँडल  हैं ? अंदर की खबर ये है कि आपके ही पार्टी के बाकी मंत्री अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं।

आपने बहुत राग अलापा कि कोई सरकारी कार इस्तेमाल नहीं करेगा। मीडिया में खबर बनने के लिए आपने 8 किलोमीटर की यात्रा भी रिजर्व मेट्रो ट्रेन से की। कार्यकर्ताओं ने मेट्रो स्टेशनों पर हंगामा बरपा दिया। पांच दिन तक केजरीवाल ने अपनी बैगनआर गाड़ी पर खूब तस्वीरें खिंचवाई। लेकिन थोड़े ही दिन बाद पूरा मंत्रिमंडल चमचमाती आलीशान सरकारी वाहनों पर आ गया। केजरीवाल साहब अगर आप सबको सरकारी वाहन इस्तेमाल ही करना था तो क्या आपकी मारुति कंपनी वालों से कोई साँठ गांठ थी कि टीवी चैनल पर उनकी कार वैगनआर का विज्ञापन कर रहे थे। अरविंद जी सच ये है कि आपको अवसर नहीं मिला, जब अवसर मिला तो आपने भी दूसरे नेताओं की तरह ओछी हरकत करने में आपको भी  कोई परहेज नहीं  रहा।

अब देखिए, केजरीवाल ने देश में आम आदमी की परिभाषा ही बदल दी। सबको पता है कि दिल्ली में इस बार " आप " पार्टी बेहतर कर सकती है। ऐसे में आप अगर सच में आम आदमी की हितों की बात करते तो किसी आँटो वाले को लोकसभा का चुनाव लड़ा देते। जो झुग्गी झोपड़ी वाले केजरीवाल के लिए लड़ते पिटते रहे हैं, वो किसी झुग्गी वाले को उम्मीदवार बनाते। लेकिन केजरीवाल ने ऐसा नहीं किया, वो हर क्षेत्र के शिखर पहुंचे लोगों को हायर कर रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि जिसे वो ले रहे हैं, या जिसे उम्मीदवार बना रहे हैं, वो अपने क्षेत्र में कितना विवादित रहा है। केजरीवाल को लगता है कि आज देश में ये हालत है कि अगर केजरीवाल किसी जानवर को भी टिकट दे दें तो वो ना सिर्फ आदमी हो जाएगा, बल्कि टोपी पहनते ही आम आदमी हो जाएगा। यही वजह है कि उन्हें सामान्य आदमी दिखाई ही नहीं दे रहे हैं। आप पार्टी ने एक अभियान चला रखा है कि बड़े आदमी को टोपी पहना कर आम बनाओ, लेकिन केजरीवाल साहब इस बड़े आदमी की काली और मोटी खाल को कैसे बदलोगे।

आखिरी बात !

केजरीवाल दुनिया भर से सवाल पूछ रहे हैं, मेरा मानना है कि कुछ जिम्मेदारी भी केजरीवाल साहब की है, इतना ही नहीं वो भी जनता के प्रति आप जवाबदेह हैं। लेकिन हो क्या रहा है, कोर्ट और गृहमंत्रालय केजरीवाल से लगातार पूछ रहा है कि उन्हें किस-किस विदेशी संस्था से धन मिल रहा है और वो उसका क्या इस्तेमाल कर रहे हैं। अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन और खुफिया एजेंसी सीआईए से केजरीवाल का क्या संबंध है ? अब केजरीवाल की हालत ये है कि वो दुनिया भर से सवाल पूछेंगे, जवाब ना आए तो गाली देगें, लेकिन वो खुद देश की संवैधानिक संस्थाओं को जवाब देना ठीक नहीं समझते। लेकिन उम्मीद कर रहे हैं कि राष्ट्रीय पार्टिया उनके इशारे पर नाचें और उनके हर सवाल का जवाब दें। एक बात सिर्फ केजरीवाल से... आपने राजनीति से हटकर कभी ईमानदारी से सोचा कि  49 दिन की सरकार में सच  में आपने जनता के लिए कितना काम किया। आप बिजली पानी में भी ईमानदार नहीं रहे। नियमों को ताख पर रखकर सिर्फ घोषणाएं करते रहे, यानि गरीब का बिजली पानी आपके  लिए लोकसभा चुनाव की जमीन तैयार करने भर से ज्यादा कुछ नहीं रहा। आए थे झुग्गी को पक्का करने, लेकिन खुद और अपने खास चेले मनीष के साथ मिलकर दोनों ने करोडो का मकान अपने नाम आवंटित करा लिया, जबकि दिल्ली की जनता को मिला बाबा जी का ठुल्लू.. मैने गलत तो नहीं कहा ना। वैसे मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि अगर टीम केजरीवाल को भी आठ दस साल मिल गया होता तो ये टीम भ्रष्टाचार के सारे कीर्तिमान तोड़ देती।




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गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: हम होगें कामयाब अभी...बशर्ते...!

      हमारे देश जैसा समाजिक तानाबाना किसी देश का नहीं है। हमारा समाज आधुनिकता के उस प्लेटफॉर्म पर खड़ा है, जिसकी नींव अनेक संस्कृतियों के मेल और विसंगतियों से बनी है। हम ऐसी जगह पर खड़े हैं जिसके चारो तरफ असमानता का बोलबाला है। जिसके कारण आर्थिक औऱ समाजिक तौर पर हम काफी पिछड़े हुए हैं। इसी पिछड़ेपन के कारण लोगो का माइंडसेट भी बूरी तरह से बंटा हुआ है। इनसब के कोलॉज को लिए भारत का युवा आधुनिकता की दौड़ में झिझक के साथ शामिल होता है। 
इंडस्ट्री बेस एजुकेशन समय की जरुरत 
  ऐसे हालात से युवाओं को बाहर निकालने के लिए जरुरी है कि हर क्षेत्र में मजबूत इच्छाशक्ति औऱ राजशक्ति के साथ विकास की गाड़ी सरपट दौड़े। तेज आर्थिक विकास औऱ समान अवसर से ही देश को पिछड़े समांतवादी दौर से बाहर निकलेगा। इसके लिए युवाओं के हाथ में काम देना होगा औऱ भ्रष्ट प्रशासन पर लगाम कसनी होगी।
  भारत की युवा शक्ति से दुनिया का हर देश परिचित है। मगर मुसीबत ये है कि हमारे यहां युवाओं के रुप में बेरोजगारों की फौज खड़ी है। सालों से इंडस्ट्री की शिकायत है कि हमारे यहां कार्यकुशल यानि स्कील्ड लोगो की भारी कमी है। इस शिकायत औऱ बेराजगारों की फौज को कम करने के लिए हमें एक समयबद्ध यानि टाइमबेस प्लान बनाना होगा। सबसे पहले ये देखना होगा कि आने वाले समय में किस क्षेत्र में कितने लोगो की जरुरत है। फिर उस हिसाब से देश के हर जिले में तकनीकि औऱ मैनेजमेंट संस्थान खोलने होंगे। जिनमें सस्ती औऱ क्वालिटी एजुकेशन लोगो को मिल सके। 
भ्रष्टाचार औऱ लापरवाही
   ऐसा नहीं है कि इंडस्ट्री के हिसाब से हमारे यहां रिपोर्ट औऱ सर्वे नहीं है। जैसे हमें पता है कि आने वाले समय में भारत को कितने डॉक्टरों की जरुरत पड़ेगी। मगर इन सब योजनाओं को अमली जामा पहनाने में भ्रष्ट प्रशासन सबसे बड़ा रोड़ा है। इस समस्या से निपटने के लिए जरुरी है कि अच्छा काम करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन मिले और भ्रष्ट को तत्काल दंड। इसके लिए एक उपाय ये है कि सरकारी सेवा में आने वाले हर शख्स से उसकी प्रॉपर्टी की डिटेल का फॉर्म भरवाया जाए। जिसमें उसकी औऱ उसके परिवार की आमदनी का रिकॉर्ड हो। ठीक वैसे ही जैसा चुनाव के वक्त राजनेताओं से भरवाया जाता है। 
    इस तरह से इन दो क्षेत्रों में युद्धस्तर पर काम करके हम बाकी समस्याओं को काबू करने कि दिशा में कारगर पहल कर सकते हैं। 

(भ्रष्टाचार पर कुछ पुरानी पोस्ट)
(India Corruption-1,Corruption-2,corruption-3., corruption-4, )
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बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: फिल्मी गानों में जीवन दर्शन : ( Philosophical Songs Collection)


विषय आधारित फ़िल्मी गाने - 12
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Philosophy of Life in Film Songs

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(Largest Collection)

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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: फिल्मी गानों में हिंदी मुहावरे / कहावतें


विषय आधारित फ़िल्मी गाने - 11
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Hindi Idioms In Film Songs

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To LoVe 2015: प्यार का आलम क्या होगा...वो जाने या हम



घर के सामने का पार्क...बारिश से चंद मिनट पहले की ये तस्वीरें हैं,.बूंदाबादी शुरु हो गई थी। इस बूंदाबादी में ये नन्हें पिल्ले मस्ती कर रहे थे। जैसे ही पता लगा की पिक्चर ले रहा हूं..दोनो पोज मारने लगे..पुचकारा तो पास आकर उछलने-कूदने लगे..पर बारिश की बूंदों से बचने के लिए गेट में आने को तैयार न हुए। कुछ देर में रिमझिम शुरु हो गई...दोनो भाग कर जाने कहां दुबक गए। मैं खिड़की के पास आ बैठा...बाहर की नारंगी रोशनी से नहाती गलियों औऱ पार्क में पड़ती रिमझिम का मजा ले रहा हूं...हां हाथ मैं गर्म कॉफी का कप भी है। थोड़ी देर में सुबह का उजाला फैलने लगेगा। आसपास लोग रोजमर्रा की चिकचिक के बीच दिन की शुरुआत करने लगेंगे....पर इन सबसे इतर वैलेंटाइन्स डे का रंग भी दिखने लगेगा...चंद घंटे बाद ही दिल्ली की सड़कों पर भी बाकी शहरों की तरह मोहब्बत का रंग बिखरने लगेगा...हाथों में गुलाब थामे प्रेमी नजर आने लगेंगे...साथ ही उनको तरेरती नजरें भी होंगी....कई ऐसी नाराज नजरें उन्हें घूरेंगी..जो अपने जमाने में नाकाम मोहब्बत
की कहानी के पात्र होंगे...ऐसा क्यों होता है कि अपनी जवानी में इंकलाब और मोहब्बत के तराने गाने वाले लोग....प्रोढ़ होने पर मोहब्बत और इंकलाब के तराने के घोर विरोधी हो जाते हैं। आजादी के समय से ही फिल्मों की नायिका का बाप उसकी मर्जी से शादी की वकालत करता नजर आता है..पर हकीकत के धरातल पर अभी वैंलेंटाइन्स डे मनाने के नाम पर ही लोग मरने-मारने पर उतारु हो जाते हैं। आजादी के 64 साल बाद भी कई प्रेमियों के लिए मर्जी से जीवनसाथी चुनने की बात मृगमरिचिका है।
ये नन्हें पिल्ले इन सबसे दूर अब भी कहीं बारिश के थमने का इंतजार कर रहे हैं....ताकि ठंड में भी इनकी मस्ती चालू रहे। ऐसी मस्ती हम लोगो की दोस्तों के बीच कायम रहती है..या फिर बचपन में कि होती है। बंसत अभी शुरु ही हुआ है...उसपर बारिश से गुलजार इस गुलाबी ठंड ने मोहब्बत के दिन वैलेंटाइन्स का इस्तकबाल कर दिया है। प्रकृति ने तो ठंडी सांसे भरती आहों और रतजगों के मारे प्रेमियों के सुकुन के लिए आगे बढ़कर स्टेज तैयार कर दिया है....बारिश की रिमझिम से मदहोश हुई इस रात औऱ आने वाली गुलाबी ठंड के बीच आती सुबह का अहसास ऐसा है जिसको बताया नहीं जा सकता। ये आलम वो ही समझेगा..जिसने प्रेम का प्याला पिया होगा....हीर-रांझे की कहानी जी होगी....मीरा की पीर सही होगी...विरह की अग्नि में जो जला होगा....मिलन की आस में जिसने अनेकों रातें आंखों में काटी होगी। जिसने इन लम्हों को नहीं जिया होगा..वो इन्हें समझ नहीं पाएगा...जिसने इन लम्हों को जिया होगा, वो इसे कह नहीं पाएगा। सच में....पहले बसंत की बयार...फिर बारिश की रिमझिम...उसपर बैलेंटाइन्स डे का बुखार...उस पर पिया मिलन की आस....इन्हें समझाया नहीं जा सकता....इसलिए बेहतर है इन लम्हों को अपने अंदर उतारते हुए अपने को समेटता हूं। 
....Happy Valentines Day....
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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: फिल्मी कव्वालियाँ संग्रह : (Films Qawwalies Collection)


विषय आधारित फ़िल्मी गाने - 10
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Largest Collection of 
Films Qawwalies 
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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: हंसी-मजाक के गीत : (Funny / Comedy Songs Collection)


विषय आधारित फ़िल्मी गाने - 9
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Biggest Collection Of 
Funny Songs / Comedy Songs
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रविवार, 2 फ़रवरी 2014

To LoVe 2015: नस्लवादी दिल्ली बोले तो...सारा हिंदुस्तान

दिल्ली में एक मौत होते ही लोगो ने हल्ला मचाना शुरु कर दिया कि नार्थ ईस्ट के लोग नस्लवाद का शिकार होते हैं। किसी नार्थ-ईस्ट की लड़की से बलात्कार होते ही हल्ला मचने लगता है कि नार्थ ईस्ट की महिलाओं के लिए दिल्ली सुरक्षित नहीं है। जबकि हकीकत ये है कि दिल्ली में आए दिन घिनौने बलात्कार का जो शिकार होती है वो सिर्फ एक महिला या लड़की होती है..किसी क्षेत्र विशेष की नहीं। उसपर अंकुश लगाने की जगह सब नस्लवाद-नस्लवाद(Racist attack in delhi,..timesofindia/) भजने लगते हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगो को, जो गंभीर समस्याओं को गलत मोड़ दे देते हैं। 
   हाल तक दिल्ली समेत देश के कई इलाकों में हर पूरबइए को गाली की तरह बिहारी कह कर फब्तियां कसी जाती थीं। तब कोई कैंडल मार्च औऱ धरना नहीं दिया गया। फब्तियां आज भी कसी जाती हैं..अब बस अंतर ये आया है कि बिहार का माहौल बदलने के बाद दिल्ली में इन फब्तियों में वो तुर्शी नहीं रही। संता-बंता चुटकले भी ऐसी ही सोच से उपजे हैं। जबकि अब लोग इसे चुटकले से ज्यादा तव्वजो नहीं देते। दिल्ली देश की राजधानी है और यहां अधिकतर लोग बाहर से आकर बसे हैं। इसलिए यहां फब्तियों की मौजदूगी देश की मानसिक सोच बताती है।  
  ये समस्या सिर्फ दिल्ली की नहीं है। सारे देश में अधिकतर लोगो में नस्लवाद औऱ क्षेत्रवाद का जहर किसी न किसी हद तक भरा हुआ है। विश्वास न हो तो जरा रेलगाड़ियों में सफर करिए। जैसे-जैसे स्टेशन आते जाएंगे वहां के स्थानीय लोग, खासकर सेंकेंड क्लास के आरक्षित डिब्बों में घुसकर यात्रियों को हड़काने लगते हैं। ये आदत अगर देशव्यापी न होती तो महाराष्ट्र में राज ठाकरे की राजनीति नहीं चमकती। नस्लवाद और क्षेत्रवाद की देशव्यापी आदत के कारण ही मुंबई और पुणे के स्थानीय चुनावों में राज ठाकरे की पार्टी को सफलता मिली है। 
   कड़वा सच ये भी है कि दक्षिण भारत में हिंदी बोलने पर उत्तरभारतियों के साथ अजीब व्यवहार होता है। एक कड़वी हकीकत ये भी है कि दिल्ली जैसे शहरों में स्थानीय लोगों से नार्थ-ईस्ट के लोग दूरी बनाकर रखते हैं। हकीकत ये भी है कि नार्थ-ईस्ट की लड़कियों या लड़कों को देखकर यहां की लड़कियां या आंटियां भी उन्हें ऐसे घूरती हैं जैसे कोई एलियन आ गया हो।
   इस तरह के हालात के लिए कहीं न कहीं शिक्षा भी जिम्मेदार है। विश्वास नहीं तो जरा स्कूल में पढ़ाए जाने वाले इतिहास के पन्नों को पलटिए। उन पन्नों से नार्थ-ईस्ट का इतिहास औऱ भूगोल लगभग नदारद है। इसलिए इस गंभीर बीमारी के लिए हमारे अदूरदर्शी समाजशास्त्री और शिक्षाविद् भी जिम्मेदार हैं।  
      अपने देश के लोगो की विचित्र मानसिक स्थिती का एक उदारहण देता चलूं। नौकरी शुरु करते हुए साल ही हुआ था। मेरे यहां पंजाब के एक बड़े शहर के बड़े हिंदी अखबार से दो सीनियर पत्रकार दिल्ली आए। दोनो अक्सर हैरत में दिखाई देते थे औऱ चुपचाप काम करते रहते थे। दो-तीन दिन उनकी ऐसी हालत देखकर मैने पूछा कि क्या बात है..क्या दिल्ली ऑफिस का वातावरण अच्छा नहीं लगा। 
   दोनो ने धीरे से मुझसे कहा-यार यहां आकर हम बड़े हैरान हैं। मैंने कारण पूछा तो दोनो बोले यार बिहारी इतने पढ़े-लिखे होते हैं..हमें विश्वास नहीं होता...हमारे यहां तो ज्यादातर बिहारी रिक्शा चलाते हैं..मगर यहां तो स्पेशल कॉरसपोंडेंट से लेकर संपादक के पद तक बिहारी बैठे हैं। हमें तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि बिहारी इतने पढ़े लिखे होते हैं। तुम कैसे इनके बीच काम करते हो?” दिल्ली में पले-बढ़े इस राष्ट्रवादी बिहारी को पहली बार देश के शिक्षित लोगो के मानसिक विकार की झलक मिली थी। इससे मैं आसानी से समझ गया कि जब पत्रकारों का ये हाल है तो देश के बाकी तबकों का हाल क्या होगा?
   दुनियाभर में फैली नस्लवाद या रंगभेद की ये समस्या हमारे लिए कलंक कि बात इसलिए है, क्योंकि हम सीना ठोककर कहते हैं कि हम एक जीवंत सभ्यता हैं। क्या जीवंत सभ्य समाज का दिमाग इतना कुंद हो सकता है, जो एक औरत के बलात्कार या झगड़े से हुई मौत को एक क्षेत्र या नस्ल विशेष के साथ जोड़ दे? अफसोस फिलहाल यही हो रहा है। बेहतर हो कि नेता औऱ समाजशास्त्री नस्लवाद की विचारधारा को लोगो के दिमाग से निकालने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी और पंजाब से अरुणाचल प्रदेश तक एक साझा प्रयास करें। लोग अपने दिमाग के ढक्कन को खोलें। वरना इसी तरह हर घटना को गलत मोड़ देते रहेंगे लोग।
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