गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

To LoVe 2015: Merry Christmas..क्यों भूल जाती है सुमुधुर घंटी की आवाज

आज क्रिसमस है .....खूबसूरत सा त्यौहार जहां सांता आता है..बच्चों के लिए उपहार लाता है....खासकर बच्चों को इसका इंतजार ज्यादा रहता है...लगता है काश सच में कोई सांता होता..हर बच्चे के लिए खुशियां लाता....चाहे पेशावर का बच्चा होता....चाहे असम का...चाहे वो बच्चा काले रंग का अमेरिका में होता.....जिंगल बेल की आवाज कान में पड़ती है तो कुछ ऐसा ही सुकुन होता है मुझे जैसे मंदिर कि घंटियों की होती है...लगेगी भी..आखिर बेल भी तो घंटी ही होती है....पर ये घंटी बचपन से बड़े होते होते सुननी क्यों बंद हो जाती है...पता नहीं। हो सकता है ऐसी कोई घंटी उन लोगो ने नहीं सुनी होगी या बड़े होने पर भूल गए होंगे ..जो पेशावर में...असम में बच्चों में मौत बांट रहे थे...तभी तो उनके हाथ नहीं थर्राये हथियार चलाते वक्त..वरना उनके हाथों में बच्चों के लिए उपहार होते...मौत बांटती गोलियां नहीं चलती उनके हाथों से...
होता है ऐसा जब लोग बहूत कुछ भूल जाते हैं...त्यौहार तकलीफ को भूलाकर खुशियां बांटने के लिए होता है..पर शायद कई लोगो को दूसरों को तकलीफ देकर मजा आता है...तभी तो दिल्ली की सड़कों पर आमतौर पर नमाज के बाद....गुरूपूर्व के बाद...होली के दिन....मोटरसाईकिल सवारों का कारंवा निकलता है.....कानून की धज्जियां उड़ाते हुए....ये कारवां ये भूल जाता है कि आसपास की गाड़ियों में उनके मां-बाप सरीखे बुजुर्ग भी होते हैं...खैर ये सोचना तो उनका काम नहीं हैं...ताकत का प्रदर्शन करने का घटिया तरीका यही होता है...त्यौहार बदनाम हो तो हो...मोटरसाईकिलों पर का ऐसा बेगैरत लोगो का कारवां क्रिसमस की रात दिल्ली की सड़कों पर अबतक नहीं देखा है मैने...कारवां होता है..पर आमतौर पर शांत....
     फिलहाल व्हाट्स अप पर काफी बधाई बाटं चुका हूं....ऑफिस में बैठ कर किया भी क्या जा सकता है? आज प्रार्थना का दिन है...तो आज के दिन मैं यही प्रार्थना करता हूं कि हिंदूकुश की पहाड़ियों की तलहटी में...उसके आसपास बसे जाहिल औऱ जंगली लोगो के कबीलों में ये घंटी बचपन से बजे....ताकि कोई बचपन बर्बाद न हो.....ताकि वो बड़े होकर हाथों से मौत बांटता न फिरे....पर क्या ऐसा हो सकता है....क्या सदियों से एक ही रवैया अपनाए कबीले बदल सकते हैं..क्या सांता वहां के बच्चों के पास नहीं पहुंच सकते? क्या वहां परियां बच्चों को कहानियों में नहीं मिल सकती...क्या....क्या...क्या...क्या...आखिर क्यों नहीं..???????????????
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गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

To LoVe 2015: क्यों सरेआम घूमते हैं स्त्री देह के भूखे दरिंदे?

    
एक रेप होता है और लोग धुंआधार भाषणबाजी करने लगते हैं। कहीं नेता तो कहीं विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग। सवाल ये है कि ये आग तभी क्यों लगती है  जब कोई मध्यमवर्गीय या क्रीम जॉब करने वाली वाली लड़की या फिर पॉश इलाके में कोई लड़की रेप का शिकार होती है? या फिर ऐसी ही किसी घटना के आसपास घटने वाली किसी लो प्रोफाइल परिवार की बच्ची के साथ घटित रेप पर ये सारी कवायद क्यों होती है? ये आंदोलन तबतक क्यों नहीं चलता जबतक सरकारी अमला सुरक्षा उपायों को पूरी सख्ती से लागू नहीं करता।
    ये ठीक है कि बलात्कार, हत्या जैसे जघन्य अपराध पूरी तरह रोके नहीं जा सकते, लेकिन ऐसे वारदातों में कमी लाई जा सकती है। मौजूदा कानून इन वारदातों पर लगाम लगाने के लिए काफी है। पर सवाल है कि कानून का पालन करवाने में सरकारी अमला घोर लापरवाही क्यों बरतता है? एक आदतन अपराधी आसानी से ड्राइविंग लाइसेंस औऱ करेक्टर सर्टिफिकेट हासिल कर लेता है, मगर इसका पता तबतक नहीं चलता जबतक वो पुलिस की पकड़ में नहीं आता। 
     आज सॉफ्टवेयर की दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। बावजूद इसके देशभर के अपराधियों का डाटा एक क्लिक पर उपलब्ध नहीं है। हालांकि चाहें तो चंद महीने में देश के अधिकांश थानों को ऑनलाइन किया जा सकता है। अगर ऐसा हो जाए तो कोई अपराधी ड्राईविंग लाइसेंस, राशन कार्ड  या पासपोर्ट नहीं बनवा पाएगा। मगर इसपर पर भाषण झाड़ने के अलावा अबतक खास काम नहीं हो सका है। हां इसपर काम जरूर हुआ है, पर जो भी हुआ है वो काफी देर से।
  कोई वारदात होने पर अक्सर लोग डायलॉग मारते हैं कि अपराधी भीड़ के सामने से अपराध करके निकल गया, पर कोई उसे रोकने आगे नहीं आता। ये डायलॉग मारने वाला कोई शख्स या सरकारी अधिकारी इस सवाल का जवाब नहीं देगा कि आवाज उठाने वाले की सुरक्षा का जिम्मा कौन उठाएगा? अगर विरोध करने वाले आदमी को अपराधी मार देता है, तो उसके परिवार को कौन पालेगा? कहने को गवाह की सुरक्षा का जिम्मा पुलिस औऱ प्रशासन का होता है, पर हकीकत ये है कि कई मामलों में गवाहों की रहस्यमय तरीके से मौत हो चुकी है। दोषी समाज भी है। अक्सर ऐसी मौत होने पर समाज उलटा नसीहत देता है कि दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की जरुरत क्या थी।
    समस्या इतनी ही नहीं है। हमारे देश में हर जगह दलालों का बोलबाला है। चंद रुपए देकर इन दलालों से कोई भी काम करवाया जा सकता है। ये दलाल पैसे लेकर किसी का भी राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि बनवा देते हैं। इन्हीं दलालों की मेहरबानी से लाखों बांग्लादेशी घुसपैठिए इलेक्शन कार्ड, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाकर भारत के नागरिक बन चुके हैं। हद तो ये है कि ऐसे घुसपैठिए और कई बार पकड़े भी जाते हैं, लेकिन ये सभी सेंट्रलाइज डाटा न होने का फायदा उठाकर दोबारा घुसपैठ कर जाते हैं। अगर पता भी चल जाए कि तो भी दोबारा घुसपैठ करने वाले को कोई कड़ी सजा नहीं दी जाती। आखिर अपराध में लिप्त घुसपैठियों को सीधे गोली क्यों नहीं मार दी जाती?
    सारे देश की सड़कों का नक्शा मोबाइल पर उपलब्ध है। बावजूद इसके हर गांव की डिटेल एक क्लिक पर उपलब्ध नहीं है। आखिर नकली इलेक्शन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस बनाने वाले दलालों औऱ सरकारी कर्मचारियों को कड़ी सजा क्यों नहीं होती? लोग दलाल का सहारा इसलिए भी लेते हैं, क्योंकि सरकारी बाबू ईमानदारी और तेजी से कामो का निपटारा नहीं करते।
    जाहिर है सिर्फ जबतक कई चीजों को सुधारा नहीं जाएगा, तबतक अपराधों पर कारगर लगाम नहीं लग पाएगी। रेप पीड़ित को न्याय दिलाने के नाम पर हल्ला मचाने से कुछ खास नहीं होने वाला। ये घटनाएं घटती रहेंगी, शाम होते ही सड़क पर बैखोफ चलना एक लड़की के लिए सपना बना रहेगा..औऱ किसी महिला या लड़की की जगह सड़कों पर स्त्री देह के वहशी शिकारी वहशी बैखोफ घूमते रहेंगे। 
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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

To LoVe 2015: आखिर कैमरे पर पकड़े गए केजरीवाल !

म आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल वैसे तो चप्पल पहनते हैं, दिखावे के लिए एक झरी हुई सी शर्ट पहनते हैं, कैमरे के सामने ट्रेन की सामान्य बोगी में सफर करते हैं, ड्रामेबाजी के लिए बदबूदार मफलर कान पर डाल लेते हैं और ठंड पडे तो कत्थई रंग का गंदा सा स्वेटर पहनते हैं, पर वही केजरीवाल जब हवाई जहाज के बिजनेस क्लास में सफर करते पकड़े जाते हैं तो उनके चंगू-मंगू सफाई देते हैं कि आयोजकों ने टिकट उपलब्ध कराया था, इसलिए वो क्या कर सकते थे ? हाहाहा, क्या केजरीवाल साहब आप  इतने ना समझ है । चलिए मैं बताता हूं क्या कर सकते थे ! बात पुरानी है, लेकिन जिक्र करना जरूरी है। आप पार्टी नेता आशुतोष भी इस बात के गवाह हैं। टीवी न्यूज चैनल IBN 7 में कार्य के दौरान चैनल का अवार्ड फंक्शन होना था । उस दौरान UPA की सरकार में ममता बनर्जी रेलमंत्री थीं। उन्हें आमंत्रित करने मैं उनके पास गया और कार्ड देते हुए आग्रह किया कि आपको इस आयोजन में जरूर आना है। ममता दीदी ने आग्रह को स्वीकार कर लिया और मुझे आश्वस्त किया कि वो जरूर पहुंचेंगी। उन्होंने मेरे सामने ही कार्ड अपने पीए को दिया और कहाकि प्रोग्राम में मुझे जाना है। मैने उस दौरान मैनेजिंग एडिटर रहे आशुतोष जी को बताया कि ममता बनर्जी से बात हो चुकी है और वो पहुंच रही हैं।

लेकिन शाम को जब मैं आफिस में था, अचानक उनका फोन आया और उन्होंने जो मुझसे कहा, कम से कम वो बात केजरीवाल को जानना बहुत जरूरी है। ममता जी ने कहाकि मैं आपके चैनल के आयोजन में आना चाहती हूं, उस दिन में मैं दिल्ली में हूं भी, लेकिन मजबूरी ये है कि " मैं कभी भी किसी पांच सितारा होटल में होने वाले आयोजन में नहीं जाती हूं और आपका आयोजन पांच सितारा होटल में है, इसलिए मुझे माफ कीजिए, मैं इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाऊंगी " पहले तो मुझे बुरा लगा कि वादा करने के बाद अब वो मना कर रही हैं, लेकिन सच कहूं उनका स्पष्ट बात कहना और सिद्धांतवादी होना मुझे अच्छा लगा।

इसलिए केजरीवाल जी ये कहना कि आयोजक ने टिकट उपलब्ध कराया तो ले लिया और बिजनेस क्लास में सफर कर लिया, ये ठीक नहीं है। इसका मतलब कोई बड़ा आदमी आपको कुछ आफर करेगा तो आप मना नहीं करेंगे ! फिर तो देश में आँफर देने वालों की कमी नहीं है। और हां वो बेचारे गरीब चाय वाले को गाली देते रहते हो, उन्हें भी तो अडानी ने चार्टर प्लेन का आफर कर दिया था, वो मना नहीं कर पाए, अब इसमें " चायवाले " की क्या गलती है ? आप उन्हें क्यों गरियाते रहते हो ? केजरीवाल साहब किसी पर उंगली उठाओ या किसी को बेईमान बताओ तो अपने तरफ भी देख लिया करो !

हां एक सवाल भी है : क्या आप पार्टी के चंदे का पैसा पार्टी के किसी नेता के पिता के खाते में ट्रांसफर हुआ है ? अगर हां तो उसका नाम क्या है ? पार्टी का पैसा पिता के खाते में ट्रांसफर करने की वजह क्या है ? क्या इस बात की जानकारी पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को दी गई हैं ? बाकी बातें बाद में ...


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शनिवार, 29 नवंबर 2014

To LoVe 2015: छोटी छोटी कहानियां और जिंदगी का सफर

  छोटी छोटी कहानियां कभी-कभी इतना सुखद एहसास देताी हैं, जिन्हें बताना मुश्किल है। बस इसे समझा जा सकता है। खासकर तब, जब आप कई तरह की परेशानी और तनाव से घिरे होते हैं। इनमें कई तनाव इसलिए होते हैं, क्योंकि लोग आपको समझ नहीं पाते, और आप उन्हें समझा नहीं पाते। इन हालातों से निपटने के सबके अपने-अपने तरीके होते हैं। इसके लिए मैं या तो कोई किताब पढ़ने लगता हूं या टहलने निकल जाता हूं। 
    ऐसे ही मानसिक तनाव और ज़िंदगी की गाड़ी को दिशा देने के बीच बड़े दिन बाद छोटी-छोटी कहानियों को पढ़ने का मन कर गया। इस बार कहानी पढ़ने के लिए किसी किताब की जगह इंटरनेट का रूख किया। इंटरनेट का ब्राउजर खुला ही था कि जिंदगी की कहानियां चारों तरफ बिखर गईं। ये वो कहानियां थी, जो दस साल  पहले लिखी गई थीं। इन कहानियों में देश भी है और विदेश भी। साथ ही है भारत और पश्चिम की कशमकश भी। ये वो कशमकश है, जो भी आज कस्बे औऱ छोटे शहर से निकल कर बड़े शहरों के बदले समाज में फंसे लोगे के जेहन में भी फंसी हुई है। पढ़ते-पढ़ते मन भी कहानियों के बदलते किरदारों के साथ जुड़ने लगा।  
   बारिश में भीगे किसी के खोज में लगे किसी मुसाफिर की कहानी, उम्र की सांझ में उलझनों से उलझते लोग, बच्चों के बीच पिसते मां-बाप, सपनों के राजकुमार का इंतजार करती प्रौढ़ स्त्री, अपनी ही शर्तों पर जीवन में अकेले रह जाने वाले अभिशप्त लोग...औऱ ऐसे अनेकों किरदारों से रूबरु होते खुद आप। ये क्षण अजीब से एहसास वाले होते हैं। जिन्हें आप जीते हैं, जब कहानियों के बीच होते हैं।
    इन किरदारों की कहानियां जरुरी नहीं कि आसपास ही हों। कहानी में भटकती भावनाएं, उलझने, सवाल, ये सब कई बार आपके जीवन के ही टुकड़े होते हैं। वो भटकन, वो इंतजार, कलेजे को चीरते सवाल, खुद का मूल्याकंन करते हुए भी नतीजे को खारिज करने की जिद, सबकुछ खुद के ही अलग-अलग रूप होते हैं। कितना सच होता है इन कहानियों में। इन कहानियों में वो कड़वा सच होता है, जिससे कई बार हम जीवन में मुंह चुराते हैं, मगर कहानियों में जी खोलकर मिलते हैं। 
     पढ़ने और घूमने के अपने पहले शौक में मुझसे जीवन दिल खोकर मिलता रहा है, बिना किसी दुराव-छुपाव के। पर क्या शत-प्रतिश्त पूरी ईमानदारी के साथ में उससे मिल पाता हूं? जवाब है बिल्कुल नहीं। कई बार मैं मुंह चुरा लेता हूं अनेक लोगो की तरह। कभी शब्दों में बयां इन सच की पक्की सड़क के किनारे-किनारे चलकर बच निकलने की जुगत निकालता हूं। कई बार इन शानदार सड़कों पर आराम से फूल स्पीड में दौड़ पड़ता हूं खुशी-खुशी। यही ज़िंदगी है और यही कहानी है मेरी, आप की, और उन सब की, जो कई बार चोर नजरों से, तो कभी आंखों में आंख डालकर, प्यार से ज़िंदगी की तरफ देखते हैं। 
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शनिवार, 8 नवंबर 2014

To LoVe 2015: दिग्गज कांग्रेसियों को क्या सांप सूंघ गया है?..... Rohit

     
लगता है कि कांग्रेस को सांप सूंघ गया है। दिग्गज कांग्रेसी लापता हो गए हैं। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही कांग्रेस के बड़े नेता कम ही दिख रहे हैं। अगर इसकी बानगी देखनी हो तो न्यूज चैनलों पर चल रही बहसों को देखिए। जो कांग्रेसी नेता टीवी चैनलों पर दिख रहे हैं, उनमें से आप कितनों को पहचाने हैं? क्या उनकी कोई राष्ट्रीय पहचान है?  चंद नेताओं को छोड़ दें, तो अधिकतर दिग्गज कांग्रेसी गायब हैं।   
    दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के बयान अखबारों मे जरुर छप रहे हैं, मगर उससे ऐसा लगता है कि वो बीजेपी की जगह अपनी ही पार्टी से लड़ रहे हैं। जो बात पार्टी फोरम मे होनी चाहिए, वो मीडिया में उठ रही है। हालांकि लोकतंत्र में ये बातें होती रहती हैं। वैसे कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी फोरम में मौका न मिलने के कारण ये दिग्गज मीडिया का सहारा ले रहे हों?
     जरा कुछ साल पहले का समय याद कीजिए जब बीजेपी में काफी उठापठक चल रही थी। उसवक्त तत्कालिन कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना जरुरी है। आज स्थिती पलही हुई है। बीजेपी कांग्रेस की जगह राष्ट्रीय स्तर पर काबिज होती जा रही है। कांग्रेस मोदी की आक्रमक शैली का जवाब नहीं दे पा रही है। 
   मीडिया में नजर आ रहे कांग्रेस के गैर अनुभवी युवा नेता कार्यकत्ताओं में जोश नहीं जगा पा रहे हैं। जनार्दन द्विवेदी, सत्यव्रत चतुर्वेदी, सीपी जोशी सरीखे नेताओं के फिर से बागडोर संभालनी चाहिए। इन लोगों के अनुभव का फायदा कांग्रेस के युवा नेताओं को पहुंचेगा। बाद में यही युवा नेता को कांग्रेस में जान फूंकेंगे। 
     ऐसा नहीं है कि केवल दिग्गज कांग्रेसी ही लापता से हैं। कांग्रेस की अगली पीढ़ी के फायरब्रांड नेता की पहचान बना चुके नेता भी राष्ट्रीय पटल से गायब से हैं। सचिन पायलट औऱ अजय माकन जैसे नेता भी नदारद दिख रहे हैं। यही हालत कांग्रेस की महिला नेताओं की भी है। रेणुका चौधरी-अंबिका सोनी सरीखी नेताओं का भी कोई अता-पता नहीं है। कांग्रेस को फिर से युवा औऱ महिलाओं में अपनी पैठ बनानी होगी। कांग्रेस में जान फुंकने के लिए युवा नेताओं को बड़े स्तर पर सक्रिय होना चाहिए।
      कांग्रेस किसी विपक्षी एकता की धूरी के तौर पर भी नजर नहीं आ रही। बीजेपी के विरोध के नाम पर स्थानीय पार्टियां जितनी भी एकता दिखा लें, हकीकत यही है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की अगुवाई जरुरी है। खराब हालत के बाद भी कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है। फिलहाल कांग्रेस अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करती नजर नहीं आ रही। अगर पर्दे के पीछे आने वाले समय के लिए कोई रणनीति बन रही हो तो अलग बात है। इस वक्त जनता औऱ कांग्रेसी कार्यकत्ताओं के बीच कांग्रेसी दिग्गजों का गायब रहना चर्चा का विषय बना हुआ है।
       कमजोर विपक्ष सत्ताधारी पार्टी के लिए भी फायदेमंद नहीं होता। मजबूत विपक्ष सरकार को भी सजग रखता है। विपक्ष परिपक्व लोकतंत्र की एक अहम पहचान भी है। कांग्रेस को नहीं भूलना चाहिए कि 2009 में जनता ने राहुल गांधी की युवा छवि औऱ सोनिया और मनमोहन सिंह के अनुभव को देखते हुए कांग्रेस को 200 से ज्यादा लोकसभा सीटें दी थी। अब 2014 में जनता का ये समर्थन बीजेपी औऱ मोदी के पास है। मोदी का जादू लोगो के सिर चढ़कर बोल रहा है। उनके सामने कोई नेता नजर नहीं आ रहा। यानि फिलहाल मोदी बढ़त बनाए हुए हैं, और कांग्रेस दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही। देखना ये है कि कांग्रेस कब तक कोमा वाली स्थिती में रहती है।
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बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

To LoVe 2015: शुभ दीपावली मित्रों

सभी दोस्तों को दीवाली की शुभकामनाएं। रोशनी का त्यौहार दीवाली हर घर में खुशियां लाए यह प्रार्थना है हमारी। मां लक्ष्मी सब पर कृपा करें। रोशनी का ये त्यौहार काफी महत्वपूर्ण होता है हमारे जीवन में। अगर धर्म से इतर होकर देंखे तो सारे भारतवंशियों के लिए दीवाली सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। दीवाली के समय मां लक्ष्मी का आगमन बताता है कि जीवन में सफाई, अनुशासन औऱ कर्म काफी अहम है। जिनमें ये गुण होते हैं उनके यहां मां लक्ष्मी मौजूद रहती हैं। । जहां मां लक्ष्मी की पूर्ण कृपा होती है, वहां धन के साथ-साथ सुख औऱ शांति, प्रेम भी होता है। जहां सिर्फ धन हो, वहां मां लक्ष्मी का अंश हो सकता है, पर पूर्ण मां लक्ष्मी नहीं। मां लक्ष्मी ने उन भगवान विष्णु का  वरण किया है जो धैर्यवान हैं, शक्तिशाली हैं, सहनशील हैं, कर्मयोगी हैं। क्या हममें ऐसा कोई गुण है? थोड़ा बहुत गुण हम सब में होता है, जाहिर है उसी तरह से हमें शांति, सुख और धन की प्राप्ति होती है। 
   दीवाली का त्यौहार मेरे अराध्य भगवान राम की घर वापसी का त्यौहार भी है। ये अलग बात है कि गुणों औऱ सामर्थ्य के इस पुरषोत्तम का कोई भी अंश मुझमें नहीं। जीवन में कितने आदर्श हो सकते हैं, कितने कर्तव्य होते हैं, ये भगवान राम के जीवन से सिखा जा सकता है। हर रिश्ता एक मर्यादा में बंधा हुआ। दुश्मन भी दुनिया का सबसे शक्तिशाली औऱ विद्दानों का विद्वान। भक्त भी तो सर्वगुण संपन्न हनुमान।  
    हमारे पूर्वजों ने हर त्यौहार को हमारे जीवन से जोड़ दिया था। दीवाली का त्यौहार ये बताता है कि संसार माया है, बावजूद इसके इस मायावी संसार में अर्थ की उपयोगिता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने जीवन के चारों आश्रम में गृहस्थ आश्रम को सबसे कठिन आश्रम बताया है। गृहस्थ ही संसार की धूरी को आगे बढ़ाता है। इस धूरी में धन भी अहम है। इसलिए संसार मिथ्या कहने वाले देश में धन को खारिज नहीं किया गया। साथ ही धन का सदूपयोग करने के लिए सूझबूझ और  बुद्भी भी काफी जरुरी होती है। इसलिए मां लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान गणेश औऱ मां सरस्वती की पूजा दीवाली वाले दिन की जाती है। जाहिर है कि धन होना जरुरी है, धन के साथ बुद्धि होना औऱ भी जरुरी है, बुद्धि सही दिशा में लगे इसके लिए शिक्षा भी जरुरी है। यानि तीनों देवता इंसान को आगे बढ़ने की शिक्षा देते हैं। पूजा करना, एक तरह से अनुसरण करना होता है। 
     
    दीवाली का ये त्यौहार मेरे लिए रोशनी का त्यौहार है, उम्मीदों का त्यौहार है। मैं आजकल तमाम परेशानियों में घिरा हुआ हूं। निराशा के घेरे में भी घिरा हुआ हूं। लोगों की छोटी ओछी हरकतें भी झेलनी पड़ रही हैं। इससे काफी कष्ट भी हो रहा है। हालात ऐसे हैं जैसे हंसने पर पहरा लग गया हो। मैं इतना जानता हूं कि रूपी अंधेरे रूपी निराशा में में उम्मीदों की रोशनी का दिया अंधकार को दूर भगा देता है। यही मेरी क्षमता भी रही है। हालात कितने भी प्रतिकूल हों, कहीं न कहीं आशावाद मेरा साथ नहीं छोड़ता। कहने वाले कहते हैं कि आशा ही निराशा का कारण है। बिना आशा के रहना आम इंसान के लिए संभव नहीं है। एक आम इंसान की हार तबतक नहीं होती जबतक वो आशा करना नहीं छोड़ता। और मैं पूरी तरह से खम ठोक कर कहता हूं कि मैं आम इंसान हूं। ऐसा ही बना रहना चाहूंगा। 
     मेरी प्रार्थना अपने दोस्तों के लिए भी है कि उम्मीदों का दिया उनके जीवन में जलता रहे। जब घमंड रावण का नहीं रहा, तब इस नश्वर दुनिया में हमारे आसपास के कंटकों कि बिसात क्या है। आखिर कुछ तो हमारे अराध्य अपना आशिर्वाद हमें देते ही रहेंगे। मां लक्ष्मी भी अभयदान देंगी ही। आखिर उनका त्यौहार है आज। तो जय श्रीराम दोस्तो, आपको दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं। 
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गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

To LoVe 2015: बापू-मोदी-सफाई औऱ हम बेशर्म

   बापू का सपना अपना...मोदी की आवाज हमारी। कहते हैं सदियां गुजर जाती हैं...मगर आदते नहीं...कुछ यही हाल है हमारा। साफ सफाई हमारी सनातन परंपरा का हिस्सा थी। 2400 साल पहले चाणक्य ने लिखा मुझसे सदियों पहले हुए ऋषियों की वाणी दोहराता हूं..जिस देश में स्वच्छ पानी, हवा न हो, वहां से प्रस्थान कर जाएं’’। सदियां गुजर गई...हमारी चिंतन परंपरा चोटी बचाने की चिंता में बदल गई। नतीजा हम धर्म से गए...देश से गए। बरसों के बाद फिर से याद आई...धर्म को याद कराने भक्त कवि चैतन्य महाप्रभू आए....धर्मों के मिलन से संत कबीर सरीखे फकीर आए। तीन सदी बाद सुधार के लिए राजा राममोहन राय औऱ ईश्वरचंद विद्यासागर सरीखे सुधारक आए....और आखिर में आए राजनीतिक चिंतक बापू। बापू भारतीयतता की निरंतरता के प्रतीक हैं। 
    बापू ऐसी विशाल छतरी थे, जिसके तले कई विचार इक्ठठे हुए। नतीजा हमारे देश में बिखरी ताकतें एकजुट हुईं। बापू की धूरी के इर्दगिर्द एक समय नेहरू, पटेल, सुभाष, शास्त्री, राजेंद्र प्रसाद जैसे व्यक्तित्वों का विकास हुआ। बाद में इन्हीं लोगो ने अपनी-अपनी अलग लकीरें खींची। सभी में एक बात समान थी, वो ये कि बापू की छाया में ही इन महान लोगो ने अपनी ताकत को पहचाना। बापू के जन्मदिन के ही दिन पैदा होने वाले लाल बहादूर शास्त्री तो सरलता कि मिसाल थे। बिना लावलश्कर औऱ दिखावे के रहने वाले वो इकलौते प्रधानमंत्री रहे हैं। उनसे ज्यादा मितव्ययी प्रधानमंत्री भी देश ने नहीं देखा है। 
      अब भारत इक्सवीं सदी में पहुंच गया है....पर अबतक समाजिक तौर पर हम सफाई पसंद नहीं बने है। इसका उदारहण दिखा देश की राजधानी दिल्ली के राजपथ पर। आज प्रधानमंत्री सफाई कार्यक्रम के बाद राजपथ से निकले ही थे, कि वहां पहुंची जनता गंदगी फैलाते में लग गई। पिकनिक मनाने के बाद कूड़ा पास पड़े कूड़ेदान में डालने तक की जहमत कोई नहीं उठा रहा था। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में गदंगी फैलाने पर एक साल तक चक्की पिसनी पड़ जाती है। तो ब्रिटेन में ढाई लाख रूपए तक जुर्माना हो जाता है।
   ये ठीक है कि हमारे यहां सार्वजनिक शौचालय की कमी है। मगर पिकनिक बनाने के बाद कूड़ा फेकने के लिए कूड़ेदान का प्रयोग हम क्यों नहीं करते? हम बड़े बेशर्म हैं। उपर से प्रधानमंत्री स्वच्छता की बात करते हैं, तो नाकभौं सिकड़ोते हैं।  
      हर बात पर सरकार को कोसने वाले लोग खुद कितना सफाई पसंद है। ये तो हर बाजार, पार्क में दिख ही जाता है। हां एक अच्छी बात जरुर हुई है अब गांवों में जिन घरों में शौचालय नहीं होते, वहां लड़कियां शादी करने से इनकार करने लगी है। ये एक कड़वा सच है कि देश में बलात्कार का शिकार होने वाली महिलाओं में खुले में शौच जाने को मजबूर औरतों की तादाद काफी है। जाहिर है कि बापू के कई सपने महाशक्ति बनने को आतुर भारत की राह में महत्वपूर्ण पड़ाव है। 
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गुरुवार, 18 सितंबर 2014

To LoVe 2015: बीजेपी-क्या मोदी बिन सब सून?


मोदी-लोकप्रियता बरकरार, पर सिपहसलारों की कमी
  मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुए सभी विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। 32 विधानसभा उपचुनावों के नतीजों में सिर्फ 13 सीटों पर बीजेपी के खाते में गई हैं। खासतौर पर यूपी में 10 में से बीजेपी सिर्फ 3 सीटें जीत पाई है। हालांकि बीजेपी पश्चिम बंगाल में खाता खोलने में कामयाब हो गई है।  
    इस वबंडर के बीच समाजवादी पार्टी अपना किला बचाने मे कामयाब रही है। मीडिया रिपोर्टो औऱ राज्य में बढ़ते अपराधों के ग्राफ से हलकान मुलायम सिंह यादव औऱ उनके पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है। लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव के परिजनों को छोड़कर पूरी पार्टी का राज्य से सफाया हो गया था। उधर कांग्रेस के चेहरे पर छाई निराशा कुछ हद तक कम हुई है। पार्टी के खाते में गुजरात की तीन सीटों समेत कुल 6 सीटें आई है।
      

मुलायम की बल्ले-बल्ले

समाजवादी पार्टी की सफलता के पीेछे सिर्फ पिता-पुत्र का कमाल ही नहीं है। दरअसल इसबार यूपी में बीएसपी ने चुनाव नहीं लड़ा। जिससे मुस्लिम मतदाताओं के पास विकल्प नहीं था। नतीजा उनके वोटों का बड़ा हिस्सा मुलायम सिंह यादव की झोली में चला गया। दूसरे इन चुनावों में न तो बीजेपी अध्यक्ष और न ही मोदी ने परोक्ष या अपरोक्ष रुप से प्रचार किया। मोदी इस दौरान पूरी तरह से प्रधानमंत्री बने रहे। यानि देश से जुड़े मुद्दे पर केंद्रित रहे।  लोकसभा चुनाव में मोदी ने 237 दिनों में 440 चुनावी रैलियां की थीं यानी एक दिन में दो रैली। इसी मेहनत का नतीजा था कि बीजेपी सत्ता में आई। ऐसे में अभी मोदी एंड कंपनी को चुका हुआ मानना बड़ी बेवकूफी होगी।
मोदी के बरक्स कौन?  

मतदाता मैच्योर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी अतिआत्मविश्वास का शिकार हो गई। मेरे आकलन के हिसाब से विधानसभा चुनाव के नतीजों का संदेश साफ है कि इसाबर मतदाता राष्ट्रीय औऱ स्थानीय समस्याओं को लेकर स्पष्ट था। मतदाता को मोदी में राष्ट्रीय नेता की छवि दिखी इसलिए वो देश की बागडोर मोदी के हाथ में सौंपने को लेकर निश्चित था, औऱ उसने लोकसभा में मोदी वाली बीजेपी को स्पष्ट बहूमत दिया। वहीं राज्य में भी मतदाता ने उस पर भरोसा जताया जिससे उसे उम्मीद कि वो स्थानीय समस्याओं का हल कर सकेगा। उसे यूपी में बीजेपी का कोई धाकड़ नेता नहीं दिखा। जो कि बिल्कुल सच है। पिछले बीस साल से सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले प्रदेश में बीजेपी एक कद्दावर नेता की कमी का नतीजा भूगत रही है। 
'प्रधामंत्री मोदी' व्यस्त हैं

मोदी का फायदा उठाने से चूकी बीजेपी

जाहिर है बीजेपी को मोदी के रुप में राष्ट्रीय नेता मिल गया है। मोदी के प्रचार ने बीजेपी को देश के हर जिले में पहचान भी दे दी है। अब बीजेपी के सामने चुनौती है कि मोदी की लोकप्रियता को भूनाने की सामर्थ्य वाला नेता राज्यों में हो। महाराष्ट्र और हरियाणा मे चुनाव की घोषणा हो चुकी है और प्रधानमंत्री के तौर मोद का महत्वपूर्ण विदेश दौरा है। जिस कारण मोदी इन चुनावों में इतना समय नहीं दे पाएंगे। जबकि आने वाले समय में देश में मजबूती से स्थापित होने के लिए बीजेपी को इस वक्त मोदी की सख्त जरुरत है। बीजेपी को जल्दी से जल्दी हर राज्य में जनता से जुड़े कद्दावर औऱ प्रदेश स्तर पर स्वीकार्य नेता ढूंढकर उन्हें स्थापित करे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की खाली हुई जगह कभी नहीं भर सकेगी।
   

विरोधियों के मजेदार तर्क

 वैसे बीजेपी के विरोधियों औऱ सांप्रदायिक सोच वाले लोगो के विचित्र तर्क भी आने लगे हैं। उनका कहना है कि बंगाल की जिस सीट पर बीजेपी जीती है वहां हिंदू वोटों का ध्रूवीकरण हुआ है। जहां बीजेपी हारी है तो वहां सिर्फ इसलिए कि वहां हिंदू वोटों का ध्रूवीकरण नहीं हो पाया, मसलन यूपी में। एक औऱ बकवास तर्क है कि मोदी की छोड़ी गई वडोदरा लोकसभा सीट पर घटे मतों से मिली जीत मोदी की लोकप्रियता का संकेत हैं। जबकि जाहिर सी बात है कि लोगो को पता था कि बीजेपी ये सीट जीतेगी ही इसलिेए कई वोटर उदासीन हो जाते हैं। बीजेपी ने वडोदरा की सीट को इज्जत का सवाल नहीं बनाया था। वरना मोदी इस सीट पर चुनाव प्रचार जरुर करते। 
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रविवार, 14 सितंबर 2014

To LoVe 2015: हिंदी दिवस : ऊंचे लोग ऊंची पसंद !

जी हां, आज ये कहानी आपको एक बार फिर सुनाने का  मन हो रहा है। जहां भी और जब  हिंदी की बात होती है तो मैं ये किस्सा लोगों को जरूर सुनाता हूं। मतलब ऊंचे लोग ऊंची पसंद। मेरी तरह आपने  भी महसूस किया होगा  कि एयरपोर्ट पर लोग अपने घर या मित्रों से अच्छा खासा हिंदी में या फिर अपनी बोलचाल की भाषा में बात करते दिखाई देते  हैं, लेकिन जैसे ही हवाई जहाज में सवार होते हैं और जहाज जमीन छोड़ता है, इसके यात्री भी जमीन से कट जाते हैं और ऊंची-ऊंची छोड़ने लगते हैं। मुझे आज भी याद है साल भर पहले मैं एयर इंडिया की फ्लाइट में दिल्ली से गुवाहाटी जा रहा था। साथ वाली सीट पर बैठे सज्जन कोट टाई में थे, मैं तो ज्यादातर जींस टी-शर्ट में रही रहता हूं। मैंने उन्हें कुछ देर पहले एयरपोर्ट पर अपने घर वालों से बात करते सुना था, बढिया हिंदी और राजस्थानी भाषा में बात कर रहे थे। लेकिन हवाई जहाज के भीतर कुछ अलग अंदाज में दिखाई दिए। सीट पर बैठते ही एयर होस्टेज को कई बार बुला कर तरह-तरह की डिमांड कर दी उन्होंने। खैर मुझे समझने में  देर नहीं लगी कि ये टिपिकल केस है। बहरहाल थोड़ी देर बाद ही वो मेरी तरफ मुखातिब हो गए ।

सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजी में मेरा नाम पूछा... लेकिन मैने उन्हें नाम नहीं बताया, कहा कि गुवाहाटी जा रहा हूं । उन्होंने  फिर दोहराया मैं तो आपका नाम जानना चाहता था, मैने फिर गुवाहाटी ही बताया। उनका चेहरा सख्त पड़ने लगा,  तो मैने उन्हें बताया कि मैं थोडा कम सुनता हूं और हां अंग्रेजी तो बिल्कुल नहीं जानता। अब उनका चेहरा देखने लायक था । बहरहाल दो बार गुवाहाटी बताने पर उन्हें मेरा नाम जानने में कोई इंट्रेस्ट नहीं रह गया । लेकिन कुछ ही देर बाद उन्होंने कहा कि आप काम क्या करते हैं। मैने कहा दूध बेचता हूं। दूध बेचते हैं ? वो  घबरा से गए, मैने कहा क्यों ? दूध बेचना गलत है क्या ?  नहीं नहीं  गलत नहीं है, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप क्या कह रहे हैं। उन्होंने फिर कहा  मतलब आपकी डेयरी है ? मैने कहा बिल्कुल नहीं  दो भैंस हैं, दोनो से 12 किलो दूध होता है, 2 किलो घर के इस्तेमाल के लिए रखते हैं और बाकी बेच देता हूं।

पूछने लगे गुवाहाटी क्यों जा रहे हैं.. मैने कहा कि एक भैंस और खरीदने का इरादा है, जा रहा हूं माता कामाख्या देवी का आशीर्वाद लेने। मित्रों इसके बाद तो उन सज्जन के यात्रा की ऐसी बाट लगी कि मैं क्या बताऊं। दो घंटे की उडान के दौरान बेचारे अपनी सीट में ऐसा सिमटे रहे कि कहीं वो हमसे छू ना जाएं । उनकी मानसिकता मैं समझ रहा  था । उन्हें लग रहा था कि बताओ वो एक दूध बेचने वाले के साथ सफर कर रहे हैं। इसे  अंग्रेजी भी  नहीं आती है, ठेठ हिंदी वाला गवांर है। हालत ये हो गई मित्रों की पूरी यात्रा में वो अपने दोनों हाथ समेट कर अपने पेट पर ही रखे रहे । मैं बेफिक्र था और  आराम  से सफर का लुत्फ उठा रहा था।

लेकिन मजेदार बात तो यह रही कि शादी के जिस समारोह में मुझे जाना था, वेचारे वे भी वहीं आमंत्रित थे। यूपी कैडर के एक बहुत पुराने आईपीएस वहां तैनात हैं। उनके बेटी की शादी में हम दोनों ही आमंत्रित थे। अब शादी समारोह में मैने भी शूट के अंदर अपने को  दबा रखा था, यहां मुलाकात हुई, तो बेचारे खुद में ना जाने क्यों  शर्मिंदा महसूस कर रहे थे । वैसे उनसे रहा नहीं गया और चलते-चलते उनसे हमारा परिचय भी हुआ और फिर काफी देर बात भी । वो राजस्थान कैडर के आईएएस थे, उन्होंने मुझे अपने प्रदेश में आने का न्यौता भी दिया, हालाकि  मेरी उसके  बाद से फिर बात नहीं हुई।



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शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

टुकड़ों टुकड़ों मे खुद को खोते रहे 
आँखें खुली थीं फिर भी सोते रहे 
किस्सों किस्सों मे तलाशा खुद को
ढूंढ न पाये हम बस रोते रहे रोते रहे 
टुकड़ों टुकड़ों मे खुद को खोते रहे



























































































































































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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

केजरीवाल भाई ये क्या हो रहा है

   
जब से आम आदमी पार्टी बनी है, तब से ही सुर्खियों में रही है। पार्टी में आना जाना लगा हुआ है। गड़बड़ ये है कि पार्टी छोड़ने वाले ज्यादातर सदस्य अरविंद को ही निशाना बना रहे हैं।  सबका आरोप भी एक ही है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? किसी राजनीतिक पार्टी में लोगो का आना जाना लगा रहता है। नेता अक्सर टिकट या पद के लालच में पार्टी छोड़ते हैं। बहुत कम लोग उसूलों को लेकर पार्टी से अलग होते हैं। हालांकि आप पार्टी के सत्ता में आने से पहले अबतक ज्यादातर वही लोग अऱविंद से अलग हुए थे जो राजनीति में नहीं जाना चाहते थे। शुरुआत में अरविंद के साथ ऐसे काफी लोग थे जिनका उद्देश्य राजनीति में बिना उतरे समाजिक दवाब औऱ आंदोलन के जरिए परिवर्तन लाना रहा है। अरविंद के राजनीति में कदम रखने के बाद यही लोग सबसे पहले अरविंद को टाटा बाय बाय करके गए।  
    इस बार जाने या अनजाने अरविंद केजरीवाल पर हमला शांति भूषण ने किया है। शांति भूषण उन्हीं प्रशांत भूषण के पिता हैं जो अऱविंद केजरीवाल के सबसे करीबी लोगो में एक हैं। अरविंद, मनीष औऱ प्रशांत की जोड़़ी इस पार्टी की सबसे बड़ी तिकड़ी है या कहें कि ये तीन बड़े हैं। अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शांति भूषण ने कहा है कि केजरीवाल में पार्टी को आगे बढ़ाने की क्षमता नहीं है। उन्हें ये काम किसी दूसरे को सौंप देना चाहिए। हालांकि पार्टी का चेहरा केजरीवाल को ही रहना चाहिए।
     शांति भूषण देश के बड़े वकीलों में गिने जाते है। जाहिर है कि उनकी बात आसानी से दरकिनार नहीं की जा सकती। अब ये तो केजरीवाल को ही देखना होगा कि ऐसा क्यों होता है? आखिर उनके करीबी रहा व्यक्ति उनपर घूमाफिराकर यही आरोप क्यों लगाता है? इतने करीबियों के आरोप अरविंद को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहे है। 
    दिल्ली में पार्टी की जमीन खिसकी नहीं है। लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर के बाद भी आम आदमी पार्टी ने काफी वोट बटोरे। इन वोटों को अगले विधानसभा चुनाव में बढ़ाए बिना सत्ता नहीं मिल सकती। जाहिर बिना सत्ता के कुछ बदलाव नहीं हो सकता। इसके साथ ही जरुरी है कि पार्टी में ऊपर से नीचे इसतरह के अंसतोष का निशाना केजरीवाल को नहीं बनना चाहिए। केजरीवाल को कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। कार्यशैली में बदलाव लाना बदलना नहीं होता। आखिर केजरीवाल कोई राजनेता नहीं हैंं। जब जंग का तरीका बदलता है तो बदलाव आना तो लाजिमी है। सवाल यही है कि अब क्या केजरीवाल बदलाव लाने को तैयार होंगे?
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सोमवार, 11 अगस्त 2014

To LoVe 2015: कुपात्रों से वापस हो " भारत रत्न "




श्री नरेन्द्र मोदी जी
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
नई दिल्ली 

विषय : देश के सबसे बड़े सम्मान " भारत रत्न " की गरिमा को बचाने के संबंध में !

महोदय,

देश में एक बार फिर " भारत रत्न " को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। टीवी चैनलों पर तमाम लोगों के नाम इस सम्मान के लिए जा रहे हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर अब ये सम्मान मिलता कैसे है ? वो कौन लोग हैं जो सम्मान के लिए नाम तय करते हैं ? मैने पढ़ा है कि देश के पहले शिक्षा मंत्री श्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को जब भारत रत्न देने की बात हुई तो उन्होंने सम्मान लेने से साफ इनकार कर दिया और कहाकि जो लोग इसकी चयन समिति में रहे हों, उन्हें ये सम्मान हरगिज नहीं लेना चाहिए। बाद में कलाम साहब को ये सम्मान मरणोंपरांत 1992 में दिया गया। अब हालत ये है कि टीवी चैनलों पर भारत रत्न के लिए रोजाना एक नया नाम लिया जा रहा है, जाहिर कि उन सभी को ये सम्मान नहीं मिल सकता, ऐसे में जो लोग रह जाएंगे, उन्हें निश्चित रूप से ना सिर्फ पीड़ा होगी, बल्कि समाज में उनकी बेवजह किरकिरी भी होगी। इसलिए प्रधानमंत्री जी भारत रत्न जैसे गरिमापूर्ण सम्मान की रक्षा के लिए मीडिया में चल रहे अनर्गल प्रलाप को तुरंत बंद करने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री जी आपको पता है कि मीडिया ने कैसे क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बना दिया। सोचिए ये क्रिकेट का भगवान भला क्या होता है ? भगवान की मौजूदगी में देश की टीम तमाम मैच हारती रही ! सचिन शतकों के शतक के करीब पहुंचे तो मीडिया का एक तपका उन्हें भारत रत्न सचिन तेंदुलकर लिखने लगा। धीरे-धीरे मीडिया ने ऐसा दबाव बनाया कि केंद्र सरकार सचिन को भारत रत्न देने पर मजबूर हो गई। मजबूर इसलिए कह रहा हूं कि सरकार खेल के क्षेत्र में पहला भारत रत्न हाँकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद्र को देना चाहती थी, लेकिन वो हिम्मत नहीं जुटा पाई। देश में लोकसभा का चुनाव होना था, इसलिए सरकार सचिन की अनदेखी कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए आनन-फानन में सचिन को भारत रत्न देने का एलान कर दिया गया। सचिन को भारत  रत्न दिए जाने का मैं तो उस वक्त भी विरोधी था, आज भी हूं।

प्रधानमंत्री जी, सचिन को भारत रत्न देने का मैं विरोधी यूं ही नहीं हूं, उसकी वजह है। पहले तो खेल मंत्रालय क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को  मान्यता ही नहीं देता है। इसके अलावा इस खेल में ईमानदारी नहीं है। देश विदेश के तमाम क्रिकेटर मैच फिक्सिंग, स्पाँट फिक्सिंग में पकड़े जा चुके हैं और उन्हें जेल भी हुई है। जब  इस पूरे खेल में ही ईमानदारी नहीं है तो भला क्रिकेटर कैसे ईमानदार हो सकते हैं ? अब देखिए सचिन को भारत रत्न का सम्मान क्रिकेट में योगदान के लिए दिया गया, लेकिन यही सचिन आयकर से कुछ छूट मिल जाए, इसके लिए दावा किया कि उनका मुख्य पेशा क्रिकेट खेलना नहीं बल्कि एक्टिंग करना है। प्रधानमंत्री जी अब आप ही तय कीजिए क्या हमें ऐसे ही लोगों को भारत रत्न जैसा सम्मान देना चाहिए ? मेरा तो कहना है कि सचिन ने भारत रत्न सम्मान की गरिमा को गिराया है।

प्रधानमंत्री जी कांग्रेस इस सचिन के सहारे राजनीति करती रही, यही वजह है कि भारत रत्न देने के कुछ दिन बाद ही सचिन को राज्यसभा में मनोनीति कर दिया। अब उनकी लगातार गैरहाजिरी पर राज्यसभा में सवाल भी उठ रहे है। भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति को किसी उत्पाद का विज्ञापन करना चाहिए, या नहीं ! ये भी एक अहम सवाल है। मैं तो इसके भी खिलाफ हूं। प्रधानमंत्री जी, सच कहूं ! मुझे लगता है कि इस बार स्वतंत्रता दिवस पर भले किसी को भारत रत्न से ना नवाजा जाए, बल्कि जिन लोगों को अब तक भारत रत्न दिए गए हैं, वक्त आ गया है कि उनकी ईमानदारी से समीक्षा की जाए। हम जान सकें कि जिन्हें दिया गया है, क्या वो उसके वाकई हकदार हैं ? इसके लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई जाए, जो तीन महीने के भीतर सरकार को अपनी रिपोर्ट जरूर दे, और अपात्र लोगों से ये सम्मान वापस लिया जाए !

प्रधानमंत्री जी देश ये भी जानना चाहता है कि वो कौन सी वजह रही जिसके चलते राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को तो "भारत रत्न" नहीं मिल सका , लेकिन एक परिवार से पंडित जवाहर लाल नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सभी को ये सम्मान मिल गए। मेरे जैसे तमाम लोगों का विचार है कि आजादी की लड़ाई में गांधी के मुकाबले नेहरू का योगदान बहुत कम था, फिर भी गांधी जी ने उन्हे भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भी कई दशकों तक भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के सूत्रधारों ने देश में राजतंत्र चलाया, विचारधारा के स्थान पर व्यक्ति पूजा को प्रतिष्ठित किया और लोकहितों की उपेक्षा की। कहा जाता है कि आसपास चाटुकारों को जोड़ कर स्वयं को देवदूत घोषित कराते रहे और स्वयं अपनी छवि पर मुग्ध होते रहे।

प्रधानमंत्री जी, देश में तमाम लोग देश की बहुत सी समस्याओं के लिये सीधे नेहरू को जिम्मेदार मानते है। जैसे लेडी माउंटबेटन के साथ नजदीकी सम्बन्ध, भारत का विभाजन, कश्मीर की समस्या, चीन द्वारा भारत पर हमला, मुस्लिम तुष्टीकरण, भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन का समर्थन, भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देना और हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने में देरी करना। देश की राजनीति में कुलीनतंत्र को बनाए रखने में भी नेहरू का बड़ा हाथ रहा है। सच ये भी है कि गांधीवादी अर्थव्यवस्था की उन्होंने हत्या की और ग्रामीण भारत की अनदेखी भी उनके समय में हुई। नेता जी सुभाषचंद्र बोस का पता लगाने में भी उन पर लापरवाही और गंभीरता ना बरतने के आरोप हैं। इन सबके बाद भी पंडित जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया, और सब खामोश रहे !

प्रधानमंत्री जी, मैं देख रहा हूं कि मीडिया में एक बार फिर नेता जी सुभाष चंद्र बोस को भारत रत्न दिए जाने की बात हो रही है। अच्छी बात है, नेता जी इसके हकदार है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि जब 1992 में नेताजी को भारत रत्न से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया था,  उस दौरान उनकी मृत्यु विवादित होने के कारण पुरस्कार के मरणोपरान्त स्वरूप को लेकर प्रश्न उठा था। इसीलिए भारत सरकार ने यह सम्मान वापस ले लिया। देश में ये सम्मान वापस लिए जाने का एक मात्र उदाहरण है। मेरा सवाल है कि हालात तो आज भी वही बने हुए है, ऐसे में नेता जी का नाम फिर क्यों लिया जा रहा है ? प्रधानमंत्री जी मैं जानना चाहता हूं कि ये नाम सरकार की ओर से उठाया जा रहा है, या फिर मीडिया ने शुरू किया है ? ये साफ होना चाहिए और इस पर सरकार का पक्ष सामने आना चाहिए !

प्रधानमंत्री जी, नेता जी के अलावा मीडिया में इन दिनों पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम को भारत रत्न दिए जाने की चर्चा हो रही है। मेरा मानना है कि श्री वाजपेयी जी का कद इतना बड़ा है कि उनके नाम पर पर उंगली उठाने की हैसियत वाला आदमी आज किसी पार्टी में नहीं है, रही बात कांशीराम की तो ये राजनीति इतनी बिगड़ चुकी है कि वोट के लालची नेताओं की इतनी औकात ही नहीं है कि कोई खिलाफ में मुंह खोल सके। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कांशीराम ने दलितों को एकजुट कर उनके हक को लेकर इनमें जो जागरूकता पैदा की वो आसान काम नहीं था।

प्रधानमंत्री जी आज मीडिया बहुत चालाक है, वो मूर्खता भी करती है तो इस हद तक करती है कि उसकी मूर्खता भी सच के करीब लगने लगती है। अब देखिए भारत रत्न के लिए  नियम या परंपरा कहें कि एक साल में तीन लोगों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है। लेकिन मीडिया को लगता है कि कहीं उसकी बात गलत साबित ना हो जाए, लिहाजा वो हर संभावना पर काम करती है। अब देखिए दो नाम मीडिया ने ऐसे जोड़ दिए, जिससे लगता है कि हां इन्हें भी मिल सकता है। पहला नाम वो, जिसे आपने गुजरात का ब्रांड अंबेसडर बनाया, मतलब बिग बी अमिताभ बच्चन और दूसरा नाम वो जहां से आपने चुनाव लड़ा और पर्चा दाखिल करने से पहले जिस मूर्ति का आपने माल्यार्पण किया, मतलब स्व. महामना मदन मोहन मालवीय जी। ये दोनों नाम ऐसे हैं, जिस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है।

खैर प्रधानमंत्री जी , आप इतने व्यस्त हैं कि आपको इतना समय कहां है कि आप लोगों के पत्र पढ़ सकें। लेकिन एक गुजारिश है, कुछ ऐसा कीजिए, जिससे हम सब को लगे कि वाकई हम देश में आजादी का जश्न मना रहे हैं, ऐसा ना लगे कि परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। इसलिए पात्रों को भले ही इस बार भारत रत्न ना दें लेकिन कुछ ऐसा करें कि एक भी कुपात्र के पास भारत रत्न ना रहे, उससे वापस लेने का ऐलान जरूर करें। 


आपका 

भारतीय नागरिक



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बुधवार, 6 अगस्त 2014

To LoVe 2015: 'पीके'-नंगू-पंगू हुए आमिर खान

आखिरकार आमिर खान भी नंगा पूंगा हो गए पीके....माफ कीजिएगा कुछ पीके नहीं..राजकुमार हिरानी की फिल्म पीके के लिए हुए हैं नंगू-पंगू आमिर खान। सलमान खान बरसों पहले कमीज उतार कर टॉपलेस हुए थे। अब आमिर ने इक्सवीं सदी में कमीज औऱ पेंट के साथ-साथ चढ्ढी भी उतार दी है। वैसे हो सकता है कि जिसे हम नंगू लूक कह रहे हैं बाद में उसके बारे में कहा जाए कि पोस्टर में आमिर ने चढ्ढी पहनी हुई थी..लेकिन स्कीन कलर की होने के कारण पोस्टर में नहीं दिखी।
   आमिर खान दस साल से लगातार सुपर हिट फिल्म दे रहे हैं। एकाध फिल्मों को छोड़कर उनकी हर फिल्म ने करोड़ों कमाए हैं। आमिर अपने समकालिन सुपरस्टारों से काफी ज्यादा एक्सपेरिमेंट भी करते हैं। सवाल है कि क्या इस बार उन्होंने नंगू पंगू होकर क्रिएटिविटी दिखाई है? पोस्टर वैसे शानदार है..आधुनिक है...पर एक सवाल ये भी है कि क्या आमिर के कंजरवेटिव दर्शक उन्हें पसंद करेंगे? अबतक मॉल कल्चर वाला दर्शक को नंगू आमिर पंसद आए हैं। साथ ही गली-दर-गली रहने वाली देसी शकीरा औऱ लेडी गागा की तो जैसे लॉटरी निकल गई है। आखिर उनका फेवरिट हीरो उस स्टाइल में है जिसके वो सपने में देखा करती थीं।
   आमिर से पहले एक औऱ बड़े सितारे जॉन अब्राहम न्यूड सीन दे चुके हैं। जॉन के अलावा नील नीतिन मुकेश भी फिल्म में न्यूड सीन कर चुके हैं। लेकिन नंगा-पूंगा हुए आमिर पहले सुपस्टार हैं। इस पोस्टर के साथ ही बहस भी छिड़ गई है। सवाल भी कई उठे हैं। मगर सब सवालों में सबसे बड़ा सवाल है कि अगर कोई हीरोइन आमिर की जगह होती तो लोग क्या कहते? आखिर हीरोइनें के बिकनी पोस्टर पर स्कीन शो का हल्ला क्यों मचने लगता है?
   सवाल में दम है। वैसे इस पोस्टर के बाद बहस ने बरसों पुरानी लड़कियों के टॉपलेस होने की मुहिम की याद तजा करा दी है। खैर इसतरह बात करने लगेंगे तो जाने कितने मुहिमों की कब्रें खोदनी पड़ेंगी। बेहतर है कि जिसे फिल्म देखनी हो वो देखे औऱ जिसने नहीं देखनी हो वा न देखे। भारत आधुनिक और पुरातन के बीच जी रहा है। दोनो को एक-दूसरे को जीने देना चाहिए। 
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बुधवार, 23 जुलाई 2014

To LoVe 2015: जस्टिस काटजू...बांध ही दी घंटी

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्केंडेय काटजू ने बर्रे के छत्ते को पकड़कर झकझोर दिया है। जो बात सालों से दबी छुपी औऱ निजी बातचीत में कही जाती थी उसपर काटजू की दमदार मुहर लग गई है।(काटजू को केंद्र ) न्यायाधीश काटजू की बात के बाद बवाल तो खड़ा होना ही था, सो हुआ। न्यायापालिका में भ्रष्टाचार पर खुलकर बोलना आसान नहीं है। दरअसल ये दूधारी तलवार है....ऐसी दुधारी तलवार जिसका शिकार सिर्फ लोकतंत्र या फिर औऱ लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले होते हैं। मानहानी के मुकदमे का डर कई लोगो को चुप रहने पर मजबूर कर देता है। इसके ठीक उलट मुसीबत ये है कि अगर अदालत की तौहिन पर सजा का प्रावधान न हो तो अनर्गल आरोप लगाने वालों की बाढ़ आ जाती है। जिससे केवल ईमानदार न्यायाधीशों पर दवाब बनता है।((Justice Katju Blog)
निचली अदालतों में न्याय को खरीदे जाने के आरोप खुलेआम वहां काम करने वाले लगाते हैं। उच्च अदालतों से होते हुए अब उच्चतम न्यायालय तक की प्रतिष्ठा पर सवाल उठने लगे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश का मामला पूराना नहीं पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के कुछ रिटायर न्यायाधीशों पर छेड़छाड़ के आरोप लगने लगे हैं। अब देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश लाहोटिया काटजू के सवाल के घेरे में आ गए हैं।(काटजू के सवाल) (2..जस्टिस काटजू)
मगर यहां उल्टा होता है। लोग पूछ रहे हैं जस्टिस काटजू ने इस बात को बताने में दस साल क्यों लगा दिए। हद है, आखिर किसी ने तो खुलेआम बिल्ली के गले में घंटी बांधी है। दस साल बाद ही सही, कोई तो आगे आया है। हो सकता है कि इस आरोप को लगाने की ये टाइमिंग सोची समझी हो, मगर न्यापालिका में होने वाले सुधारों को लागू करना चाहिए। इस समय आम लोग के लिए न्यायापालिका ही आशा का आखिरी केंद्र है।
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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

To LoVe 2015: पर्यावरण और गंगा-जमुना की तहज़ीब का रोना?...रोहित

बातें हजार...दिखावा दुनिया का...औऱ नतीजा सिफर। कुछ यही हाल हमारे देश के कर्ताधरताओं का है। हमारे नेता और अधिकारी पर्यावरण के बेड़ा गर्क होने, नदियों के प्रदूषित होने और हवा के जहरिले होने का रोना अक्सर रोते हैं। खरबों, पद्म औऱ महापद्म (खरब के बाद रुपयों की गिनती हिंदी में) अब तक हरियाली बढ़ाने और नदियों का प्रदूषण काबू में करने के नाम पर खर्च कर दिए गए हैं। इसके बावजूद पर्यावरण का जहर काबू में नहीं आ रहा। इसके लिए सत्ता चलाने वाली हर पार्टी के साथ ही अधिकांश उदासिन जनता जिम्मेदार है।  
    भारत की सबसे पवित्र नदियों में शामिल गंगा का पानी जीवनदायनी नहीं रह गया है। अभी लोकसभा में एक सवाल पर पर्यारवण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावेडकर ने जो लिखित बयान दिया वो आंखे खोल देने वाला है। चाहे दिल्ली हो या कोई राज्य, हर जगह बेड़ा गर्क हो रहा है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार सबसे ज्यादा महाराष्ट्र की 28 नदियां  प्रदूषित हैं। उसके बाद नंबर आता है गुजरात का, जहां 19 नदियां प्रदूषित है। तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है जहां कि 12 नदियां प्रदूषित हैं। इसी उत्तर प्रदेश के बड़े इलाके से गंगा-यमूना बहती है। जाहिर है जब यहां गंगा-जमुना का बेड़ागर्क हो रहा है, तो गंगा-जमुना तहजीब के दम तोड़ने पर रोना काहे। जब अपनी नदियों का हम ख्याल नहीं रखते, तो इनपर अधारित तहज़ीब क्या खाक बचाएंगे। खैर यूपी के अलावा कनार्टक की 11, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश औऱ तमिलनाडु की 9 नदियां प्रदूषण का बोझ लिए बह रही हैं। यानि सारे देश की नदियों का हाल बेहाल है। 
     रह गई देश की राजधानी दिल्ली..तो इसका हाल जानकर देश के बाकी राज्यों की  बेहाली समझ में आ जाएगी। यानि जब राजधानी का हाल बेहाल है तो देश के बाकी हिस्सों में नदियों की हालत खाक ठीक होगी। देश की राजधानी से मात्र एक ही नदी बहती है यमुना। यमुना का भी महज चंद प्रतिशत हिस्सा दिल्ली से गुजरता है, लेकिन इस पूरी नदी के प्रदूषण को 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा दिल्ली की ही देन है।(courtsey-Indiawaterportal.org - न लगाएं यमुना में डूबकी) इसी यमूना को साफ करने के नाम पर जितने खरब रुपए बहाए गए हैं उतने में जाने कितने नए शहर बस जाते। यहां हरियाली का ये हाल है कि एक रिकॉर्ड के अनुसार महज 7 साल में 15 फीसदी हरियाली सफाचट हो गई है। कई वाटर रिजर्व गायब हो गए हैं। केंद्र के अनुासर महज दिल्ली का नजफगढ़ नाला क्षेत्र, पड़ोसी शहर नोएडा और गाजियाबाद के साथ ही हरियाणा का फरीदाबाद और पानीपत देश के सबसे ज्यादा प्रदूषित क्षेत्रों में हैं। 
   इन नदियों का हाल इसलिए पता है क्योंकि ये नदियां देश के बड़े हिस्सों से होकर  बहती हैं। इसके उलट पहाड़ों औऱ राज्यों में बहने वाली जाने कितनी छोटी नदियों का अस्तित्व विलिन हो चुका है। जिसकी किसी को कोई फ्रिक नहीं है। इन छोटी नदियों का गायब होना सबसे बड़े खतरे की पहली बानगी हैं।
इन छोटी नदियों के गायब होने का मतलब टूटते पहाड़ों औऱ भयंकर अकाल के आगमन की सूचना है। सब जानते हैं कि नदियां अविरल नहीं बहेंगी तो कालांतर में हम भी नहीं बचेंगे। हमारी आने वाली पीढ़ियां हमारे जमा पैसे से सिर्फ जानलेवा बीमारियों का इलाज ही कराती रह जाएंगी। जो गरीब होंगे वो तड़प तड़प कर जिएंगे, आसानी से मरंगे नहीं।। यानि हमारी उदासिनता और लापरवाही हमारे ही बच्चों को खा जाएगी। सावधान रहने की जरुरत आ ज है, क्योंकि कल चिड़िया के खेत चुग जाने पर पछताने से कोई फायदा नहीं होगा। 
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