शनिवार, 30 नवंबर 2013

To LoVe 2015: महापरिनिर्वाण मंदिर-कुशीनगर [गोरखपुर]


गोरखपुर-----------उत्तर प्रदेश राज्य पूर्वांचल में गोरखपुर जिले को बाबा गोरखनाथ का धाम कहा जाता है .
मुंशी प्रेमचन्द की कर्मस्थली व फिराक गोरखपुरी की जन्मस्थली के रुप मे भी प्रसिद्धि प्राप्त है.अनेकानेक पुरातात्विक, अध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों की धरती को अमर शहीद पं0 राम प्रसाद बिस्मिल, बन्धु सिंह व चौरीचौरा आन्दोलन के शहीदों की शहादत स्थली के रूप में भी याद किया जाता है.वैदिक

बुधवार, 27 नवंबर 2013

To LoVe 2015: हाय ये फिल्मी बिच्छुआ. ..औऱ मेरी रिसर्च

हम भारतीयों में से ज्यादातर किसी न किसी तरह फिल्मों से जुड़ना चाहते हैं। हो भी क्यों न....हर किसी को फिल्मी दुनिया का तिलिस्मी दरवाजा या कोई खुली खिड़की आंख खोलते ही दिख गई थी। इन्हीं दरवाजों औऱ खिड़की से हमने राजकूपर (RAJ KAPOOR) (छलिया तेरा नाम) के रुमानी प्यार से लेकर मुगलिया सल्तनत को चुनौती देती प्रेम दिवानी अनारकली (Madhubala...हे मेरे खुदा) को देखा। प्रेमी सलीम के बगावती तेवर की कहानी से लेकर सबकुछ उलट-पलट कर देने वाला गुस्सैल युवा देखा। सिमरन की खोज में लंदन से पंजाब के गांव पहुंचे एनआईआर राहुल की जद्दोजहद देखी तो तारों को जमीं पर उतरते देखा। ऐसी सारी कहानियां पिछली पीढ़ी से लेकर आज की पीढ़ी तक को जाने-अनजाने बचपन से ही घुट्टी में मिला कर पिला दी गई हैं।
   
  इसलिए जिदंगी के किसी भी पड़ाव पर बैठा आदमी मौका पाते ही किसी न किसी तरह से रुपहले परदे से नाता जोड़ने की कोशिश करने लगता है। दिल्ली से लेकर बैंगलुरु तक, हर बड़े शहरों में ऐसे ही सपने लिए नौजवानों से लेकर पचास बसंत देख चुके लोगों का जमावड़ा जमता है। काफी हाउसों की टेबलों पर दुनिया की परवाह किए बिना अपने सपनों को जमीन पर उतारने का ताना-बाना बुना जाता है। अब चाहे www.youtube.com हो या फिर फिल्मी परदा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फिल्मों का जुनून और अपनी बात को कैमरे के सहारे कहने की चाहत इनसभी लोगो को एकजुट कर रही है।
   
   अब सवाल ये उठता है कि मुझे ये पता कैसे चला। असल में हुआ यूं कि एक दिन फिल्मी कीड़े के एक रिश्तेदार खुराफाती विचार के कीड़े ने मुझे काट खाया। उधड़ कीड़े ने मुझे काटा औऱ इधर मेरे दिल में विचार कौंधा कि क्यों न जेनेरेशन नेक्सट के फिल्मी बुखार का मीटर नापा जाए। बस फिर क्या था, मैं फिर निकल पड़ा अनजानी राहों पर अपनी प्रोफेशनल पहचान छुपाकर। इस यात्रा में मैं अनेक लोगो से मिला...कई जगहों पर मैंने अड्डा जमाया....फिल्मी गानों से अपनी शामें सजाईं....अलग-अलग रेस्टोरेंट में लाजवाब जायकों का लुत्फ लिया...जन्मदिन की पार्टी की....स्टैंडअप कॉमेडी और नाटकों के शो देखे....किताबें पढ़कर सुनाई...केजरीवाल के बाद उलझे राजनीतिक समीकरण के चक्कर में चकराए नौजवानों से बतियाया।
       इस रिसर्च रुपी घुमक्कड़ी में मैंने पाया कि 19 साल से लेकर 72 साल तक की उम्र के इन सभी में एक बात समान है, और वो ये कि इन सभी को बचपन में ही फिल्मी कीड़े ने काट लिया था। अब भले ही इनके पास संसाधनों की कमी हो, लेकिन इनके जुनून ने इन सभी लोगो को उस रास्ते पर डाल दिया हैं जहां से मंजिल साफ दिखाई देती है। उसपर अनुराग कश्यप औऱ तुगमांशु धुलिया जैसे नए सफल डायरेक्टर्स ने इनके जुनून को हिम्मत दी है तो बाजार में नित नए आते डीजिटल कैमरों ने लोगो के सपनों को पंख लगा दिए हैं। कई आइडियाज़ ने नई औऱ पुरानी जेनरेशन के बीच की दूरी को पाट दिया है....ये मिलकर काम करने को तैयार हैं।

        कई बुरी घटनाओं औऱ बदलते नैतिक मूल्यों के बीच ये जानकर सुकुन पहूंचता है कि हमारे देश का वर्तमान औऱ भविष्य, मिलकर सपने देखने औऱ उसे पूरा करने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। रिसर्च में एक सुखद बात सामने आई कि लोग जमीनी हकीकत से जुड़े हैं औऱ किसी समस्या पर कैमरे के सहारे अपना नजरिया दुनिया के सामने रखना चाहते हैं।
    
   तो दोस्तों मेरी एक औऱ रिसर्च पूरी हुई। अब सवाल ये है कि जब सब कैमरे का सहारा ले रहे हैं तो मेरी रिसर्च कैमरे के सहारे क्यों नहीं आती। तो उस फिल्मी कीड़े की कसम जिसने मुझे भी काटा था...मेरी रिसर्च भी टीवी औऱ www.youtube.com के परदे पर उतरेगी। आमीन.....
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शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

To LoVe 2015: जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए : Copied or Inspired By Other Song [15]



[Original Song]
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If you miss the train I'm on,

you will know that I am gone

You can hear the whistle blow a hundred miles



[Five Hundred Miles (Peter, Paul, & Mary)]




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[Copied / Inspired Song]
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- गाना - 

जब कोई बात बिगड़ जाए, 

जब कोई मुश्किल पड़ जाए/a>
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शनिवार, 16 नवंबर 2013

To LoVe 2015: सवाल-जवाब / पहेली वाले गीत : [विषय आधारित फ़िल्मी गाने]



सवाल-जवाब / पहेली वाले गीत

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 Please Note 

Titles of all the songs are hyper linked with YouTube links.

If you want  to see related video song, Just click on them.

We have done this for your convenience.

Hope you appreciate our efforts ! 


Aadhi Roti Sara Kabab, Bol Mere Murge Ku Kadu Ku
Film - Janta Hawaldar (1979)
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To LoVe 2015: सचिन सावधान ! ये है चुनाव का " भारत रत्न "

सचिन सावधान !  भूल से भी प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की तारीफ मत कर देना। वरना ये वो कांग्रेस है जो भारत रत्न देकर वापस मांगती है, आपको तो अभी मिला भी नहीं है, सरकार ने बस देने का फैसला भर किया है। ऐसे में सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। लता दी को आप मां की तरह मानते हैं, इन कांग्रेसियों ने उनसे " भारत रत्न " वापस  मांगने की मांग शुरू कर दी है। मुझे लगता है कि जनवरी में भारत रत्न देने के बाद आप पर एक और जिम्मेदारी होगी, वो ये कि लोकसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करें। चूंकि अब कांग्रेस नेताओं की सभाओं में भीड़ नहीं हो रही है, लिहाजा आपको इस्तेमाल करने की तैयारी चल रही है। आपका " भारत रत्न " इसी तैयारी का हिस्सा है।   

दुनिया भर के करोडों क्रिकेट प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले सचिन तेंदुलकर ने आज भारी मन से क्रिकेट को अलविदा कह दिया। ये भावुक क्षण था, उनकी  आंखों में आंसू थे, उनकी मां की आंखे छलक रहीं थी, पत्नी अंजली आंसुओं को रोकने की भरपूर कोशिश कर रही थीं, लेकिन वो रोक नहीं पाईं। इसके अलावा न सिर्फ स्टेडियम में मौजूद हजारों क्रिकेटप्रेमियों की आंखें डबडबा रहीं थी, बल्कि जो लोग टीवी पर सचिन का विदाई भाषण सुन रहे थे, वो भी बार-बार रुमाल से आंखे पोछते नजर आ रहे थे। देश की जनता की आंखो में आंसू देख सरकार गंभीर हो गई और शाम होते होते पीएमओ ने सचिन को " भारत रत्न " देने का ऐलान कर क्रिकेटप्रेमियों के आंसू पोछने की कोशिश की। 

सरकार को लग रहा था कि भारत रत्न के ऐलान से देश भर में सरकार की जय-जयकार होगी, लेकिन सरकार का ये दांव उलटा पड़ गया। भारत रत्न की घोषणा के आधे घंटे बाद ही  सोशल साइट पर क्रिकेट प्रेमी सरकार की किरकिरी करने लगे। आप जानते ही होंगे कि जानी मानी गायिका लता दी को " भारत रत्न " मिल चुका है। पिछले दिनों एक समारोह में उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि जैसी देशी की इच्छा है कि नरेन्द्र भाई मोदी प्रधानमंत्री बनें, वैसे ही मैं भी चाहती हूं कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनें। उनका इतना कहना भर था कि कांग्रेस के दिग्गज लाल पीले होने लगे और उन्होंने लता दी से भारत रत्न वापस लेने की मांग शुरू कर दी। 

हालांकि लता दी सरल महिला हैं, इसलिए उन्होंने किसी बात का जवाब नहीं दिया। वरना अगर वो भारत रत्न वापस करने के लिए 10 जनपथ रवाना भर हो जातीं, तो पूरी सरकार और पार्टी घुटनों पर  नजर आती। खैर अब सरकार ने सचिन को भारत रत्न देने की बात की तो सोशल साइट पर सचिन को नसीहत दी जा रही है। कहा जा रहा है कि सचिन भूल से भी नरेन्द्र मोदी का नाम मत ले लेना, वरना ये भारत रत्न वापस मांग लेंगे। ये कांग्रेसी बहुत अवसरवादी है। सच तो ये है कि इन्होंने सचिन को भारत रत्न नहीं दिया है, बल्कि देश की करोडों जनता की भावनाओं को भुनाने के लिए एक साजिश के तहत ऐसा किया है।

आपको याद होगा कि सचिन को भारत रत्न की मांग क्रिकेट प्रेमियों ने ही उठाई थी। सरकार पर दवाब बढ़ा तो इतना तो कर लिया गया कि भारत रत्न की श्रेणी में खेल को शामिल कर लिया गया। पहले खेल के क्षेत्र में भारत रत्न  देने का प्रावधान नहीं था। जब बात भारत रत्न देने की आई तो सरकार ने हीला हवाली शुरू कर दी और उन्होंने पहले हाँकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का नाम भारत रत्न के लिए सामने किया। कहा गया कि मेजर का योगदान सचिन के मुकाबले कहीं ज्यादा है। ऐसे में खेल का पहला भारत रत्न मेजर को ही दिया जाना चाहिए। देश में किसी ने इस बात का विरोध भी नहीं किया। लेकिन अब चुनाव आ गया है और कांग्रेस हर किसी की कीमत लगाना जानती है। इसलिए मैं तो यही कहूंगा कि ये क्रिकेट का नहीं चुनाव का "भारत रत्न" है।



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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

To LoVe 2015: गायिका मुबारक बेगम : (गायकों का पहला / आखिरी गाना- 9)





Mubarak Begum : First / Last Song

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मुबारक बेगम ने 50 के दशक में अपने करियर की शुरुआत रेडियो से की थी लेकिन जल्दी ही वो फिल्मों में गाने लगीं। राजस्थान की रहने वाली मुबारक बेगम ने जब फ़िल्म 'हमारी याद आएगी...' (1961) के शीर्षक गीत 'कभी तनहाईयों में यूं हमारी याद आएगी…' और फिल्म 'हमराही' (1963) के लिए ‘मुझको /a>
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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

To LoVe 2015: ... ताकि फिर कोई " लंपट " न बने प्रधानमंत्री !

पांच छह महीने बाद देश में एक बार फिर लोकसभा का चुनाव हो जाएगा और जोड़-तोड़ के बाद कोई प्रधानमंत्री भी बन जाएगा, फिर अब तक के प्रधानमंत्रियों की तरह वो भी देश को हांकने लगेगा। कई बार जब लोग कहते हैं कि भारत का लोकतंत्र दुनिया में सबसे ज्यादा मजबूत है, ये सुनकर मैं तो भड़क जाता हूं। मेरा मानना है कि भारत का लोकतंत्र सबसे ज्यादा मजबूर है। सवा सौ करोड़ से ज्यादा लोग एक मजबूत और भरोसेमंद सरकार के लिए वोट करते है, घंटो लाइन में लगकर इसलिए वोट डालते हैं ताकि वो अपना भविष्य सुरक्षित बना सकें। लेकिन हैरानी तब होती है जब चुनाव के बाद एक ऐसा व्यक्ति सामने आता है जो चुनाव के दौरान कहीं पिक्चर में ही नहीं था, वो अचानक प्रधानमंत्री बन जाता है। सच बताऊं मैं बात कर रहा हूं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की। मैं कांग्रेस से जानना चाहता हूं कि क्या देश के मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट इसलिए दिया था ताकि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनें ? मेरा मानना है कि देश में एक भी मतदाता ऐसा नहीं होगा जो ये कहे कि उसने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के लिए ही वोट किया था। अगर ऐसा नहीं है  तो फिर किस बात का लोकतंत्र ?

देश का लोकतंत्र लगभग 65 साल पुराना हो गया है, फिर भी लगता है कि इसमें बहुत खामियां हैं। पिछले दो लोकसभा चुनावों में पहले तो देश ने किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं दिया। मतलब साफ है कि देश की जनता ने राजनीतिक दलों को खारिज कर दिया। अब जो जीत कर आए, कम से कम इतना तो है कि उन्हें अपने इलाके की जनता का समर्थन  हासिल है। लेकिन हुआ क्या ? सोनिया गांधी ने एक थके हुए बिना रीढ़ की हड्डे वाले व्यक्ति का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाया, और सब ताली बजाकर उन्हें अपना नेता मानने को तैयार हो गए। खैर सोनिया गांधी की राजनीति समझ को तो आसानी से समझा जा सकता है, उन्हें तो सरकार और पार्टी में अपनी हनक बनाए रखने के लिए कमजोर आदमी को ही प्रधानमंत्री बनाने के लिए नाम आगे करना था और उन्होनें किया भी। हैरानी इस बात पर हुई कांग्रेस को छोड़ दें तो गठबंधन के दूसरे नेता भला क्यों चुप्पी साधे रहे ? शरद पवार,  करुणानिधि, मुलायम सिंह यादव, अजित सिंह, मायावती, लालू यादव, राम विलास पासवान, फारुख अब्दुल्ला जैसे लोगों की खामोशी का राज क्या है ? इनकी ओर से मांग क्यों नहीं उठी कि कोई मजूबत आदमी प्रधानमंत्री होना चाहिए, किसी को भी नेता हम सब स्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, सहयोगी दलों के ज्यादातर नेता मंत्रालयों की बंदरबांट में ही लगे रहे।

एक सवाल का जवाब दीजिए, क्या मुलायम सिंह यादव और मायावती को यूपी में इसलिए समर्थन मिला था कि वो दिल्ली में जाकर कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को समर्थन दें और समर्थन के एवज में अपने मुकदमें निपटाते रहें। हम सब जानते हैं कि चुनाव के पहले कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में कोई गठबंधन नहीं था, सब एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में थे, फिर दिल्ली में सपा और बसपा ने कांग्रेस को कैसे समर्थन दे दिया ? करुणानिधि ने तो हद ही कर दी, उन्होंने ए राजा के लिए संचार मंत्रालय मांग लिया। मांग पूरी होने के बाद क्या हुआ, ये किसी से छिपा नहीं है। आज इस गठबंधन सरकार की हालत ये हो गई समर्थन के एवज में छोटे-छोटे राजनीतिक दल एक तरह से हफ्ता वसूली कर रहे हैं। मैं तो प्रधानमंत्री से सवाल पूछता हूं कि दिल पर हाथ रखिए और बताइये कि क्या आप वाकई प्रधानमंत्री पद का काम बिना दबाव के कर पा रहे हैं ? क्या  जो आप करना चाहता है, वो करने के लिए आजाद हैं ? अच्छा छोड़िए, आप साफ सुथरी बात करने वाले व्यक्ति है, खुद ही बताएं कि क्या जैसे आप प्रधानमंत्री बने, ऐसे ही पिछले दरवाले से प्रधानमंत्री बनना चाहिए ? मुझे पता है कि इसका कोई जवाब आपके पास नहीं है। जवाब होगा भी तो आप में इतनी हिम्मत नहीं है कि साफगोई से बात कर सकें।

बस देश के लोकतंत्र में यही कमी है। अब देश मेच्योर हो चुका है, देशवासियों को हर बात का हिसाब चाहिए। जब से कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद पर थोपा है, देश की जनता खुद को छला हुआ महसूस कर रही है। उसे लगता है कि उसके वोट के साथ कांग्रेस ने न्याय नहीं किया। इतना ही नहीं आगे भी कांग्रेस जनता के वोट के साथ न्याय करेगी, इसमें लोगों को संदेह है। देश ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहता है, जिसके शरीर में और कुछ हो ना हो, पर रीढ की हड्डी जरूर हो। उसमें आत्मसम्मान जरूर हो, उसमें इतनी क्षमता हो कि वो " नाँनसेंस " कहने  वालों को मुंहतोड़ जवाब दे सके। लेकिन ये तभी संभव है, जब वो खुद जनता के बीच से चुनाव जीत कर आए। इतना ही नहीं उसे पार्टी नेता घोषित करे और वो अपने दम पर पार्टी उम्मीदवारों को भी जिता कर लाए। यहां तो हालत ये है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पार्टी के उम्मीदवार प्रचार के लिए अपने क्षेत्र में बुलाने से घबराते हैं।  बात होती है तो लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री कह कर चुप हो जाते हैं। सवाल ये है कि देश एक कमजोर को प्रधानमंत्री कैसे स्वीकार कर सकता है?

मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि संविधान में बड़ा फेरबदल किया जाए। फेरबदल करके ये व्यवस्था बनाई जाए कि हर राष्ट्रीय पार्टी चुनाव में जाने के पहले अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करे। देश के मतदाताओं को अब पार्टी नेताओं पर भरोसा नहीं रहा है। उन्हें लगता है कि राष्ट्रीय पार्टी के नेता उनके मतों का सम्मान नहीं करते। अगर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी देश के मतदाताओं के वोट की कीमत समझतीं तो कम से कम प्रधानमंत्री के पद पर मनमोहन सिंह को कभी नहीं बैठाती। उन्होंने एक कमजोर व्यक्ति को जानबूझ कर प्रधानमंत्री बनाया जिससे पार्टी और सरकार दोनों पर उनकी पकड़ मजबूत रहे।

सुझाव..

1. राष्ट्रीय पार्टी चुनाव की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम का ऐलान करें ...     
2. क्षेत्रीय पार्टियों के लोकसभा चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, क्योंकि  वो दिल्ली आकर सौदेबाजी करते हैं। 
3. अगर प्रतिबंध संभव ना हो तो क्षेत्रीय दल जिसे समर्थन देते हैं, वो सरकार के एक अंग माने जाएं, अगर समर्थन वापस लें तो उनकी सदस्यता खत्म हो। 
4. अगर प्रधानमंत्री पद का घोषित उम्मीदवार चुनाव हार जाता है तो पार्टी + समर्थक दल के सांसद गु्फ्त मतदान के जरिए नेता का फैसला करें । 
5. नेता चुनने का अधिकार किसी भी पार्टी के अध्यक्ष को नहीं होना चाहिए । 
6. प्रधानमंत्री के लिए ये अनिवार्य  होना चाहिए कि वो लोकसभा का चुनाव लड़कर सदन मे पहुंचे। राज्यसभा सांसद को प्रधानमंत्री के अयोग्य घोषित किया जाए।
7. अगर राज्यसभा को कोई सदस्य प्रधानमंत्री बनता है तो उसे छह महीने के भीतर देश के किसी भी हिस्से से चुनाव लड़कर लोकसभा में आने की बाध्यता होनी चाहिए। 
8. जो दल एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में हों, सरकार बनाने के लिए उनके एक दूसरे का समर्थन करने पर रोक होनी चाहिए।
9. समर्थन के लिए गलत तरीका अपनाने वालों और समर्थन के एवज में सौदेबाजी करने वाले दलों की मान्यता रद्द करने का प्रावधान होना चाहिए।
10. यही व्यवस्था राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी होनी चाहिए। 


अब भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। सभी जानते हैं गुजरात दंगे को लेकर मोदी पर तरह तरह के गंभीर आरोप हैं। अब उनके बारे में देश की जनता अपना फैसला सुना देगी। दूसरी तरफ कांग्रेस है, उसका प्रधानमंत्री कौन होगा, किसी को नहीं पता। अगर राहुल गांधी उनके नेता हैं तो प्रधानमंत्री पद पर उनके नाम का ऐलान कर दिया जाना चाहिए। तीसरी ओर क्षेत्रीय राजनीतिक दल है। वो एक तरफ तो सरकार को समर्थन देकर अपने मुकदमें निपटा रहे हैं और बंगले हथियाने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर तीसरे मोर्चे की भी हवा बना रहे हैं। मैं फिर वही बात दुहराऊंगा कि क्षेत्रीय दलों पर लोकसभा का चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए।
 



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To LoVe 2015: मुझे नींद न आये, मुझे चैन न आये, न जाने कहाँ दिल खो गया : [Copied or Inspired Song]



Copied or Inspired By Other Song [14]

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1990 में 'इंद्र कुमार' निर्देशित और आमिर खान, माधुरी दीक्षित, अनुपम खेर व सईद जाफरी अभिनीत ब्लॉक बूस्टर सुपर हिट फ़िल्म- 'दिल' प्रदर्शित हुयी थी, जिसमें एक गाना- 'मुझे नींद न आये, मुझे चैन न आये, न जाने कहाँ दिल खो गया' जबर्दस्त लोकप्रिय हुआ था ! गीतकार 'समीर' के लिखे इस गीत को 'आनंद-मिलिंद' के/a>
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बुधवार, 13 नवंबर 2013

To LoVe 2015: इतिहास छोड़ें, भविष्य देंखें MR Modi & Mr Rahul Gandi...plz



आजकल पता ही नहीं चल रहा है कि चुनाव कौन लड़ रहा है...अचानक ही पटेल और नेहरु को स्वर्ग से जमीन पर घसीट लिया गया है। लगता है जैसे मुद्दे खत्म हो गए हैं। दोनों ही पार्टियां और उनके नेता ये भूल जाते हैं कि आज का युवा आज की समस्या को सुलझते हुए देखना चाहता है....किसान अपनी बिरादरी को खुश देखना चाहता है। जबकि न तो गांवों के विकास की कोई य़ोजना और न ही युवाओं को रोजगार मुहैया कराने का रोडमोप मोदी या राहुल गांधी अब तक देश के सामने रख सके हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों ये बात जानते नहीं हैं, पर हैरत होती है कि बात करते-करते एक दूसरे पर निशाना साधते हुए दोनो नेता व्यक्तिगत बातें करने लगते हैं। एक तरफ नरेंद्र मोदी लोहपुरुष पटेल बनाम  नेहरु की लड़ाई छेड़ देते हैं, तो राहुल गांधी उस तुष्टीकरण की पैरवी करने लगते हैं, जिसे सुन-सुन कर कई पीढ़ियां परेशान हो चुकी है। कभी कभी लगता है कि ये चुनाव सिर्फ मुस्लिम समाज के उत्थान के लिेए ही लड़ा जा रहा है....।
      लगता है कि 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे दोनो पार्टियां भूल गई हैं। 2009 में कांग्रेस चुनाव जीती थी, लेकिन बीजेपी को उसने नहीं हराया था। बीजेपी खुद 2009 लोकसभा चुनाव हारी थी। 2009 में बीजेपी के पीएम पद के केंडिडेट आडवाणी जी जब भी बात करते थे सोनिया गांधी को निशाना बनाते थे, जबकि राहुल गांधी युवाओं के विकास की बात करते थे। राहुल गांधी के पीछे का आभामंडल सशक्त अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के राजनीतिक कौशल से चमकता था। जबकि आडवाणी जी पुरजोर तरीके से आर्थिक विकास की अपनी योजनाओं को वोटरों के सामने नहीं रख पाए थे। बीजेपी की टीम में कोई इस कमी को पूरा कर पाया था। नतीजा ये निकला कि उस वक्त देश के युवाओं औऱ मध्यवर्ग ने बीजेपी की तुलना में कांग्रेस को चुनावी जीत दिलाई थी।
     हालंकि 2014 लोकसभा चुनाव अभी 7 महीने दूर हैं, परंतु दिल्ली समेत चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे मोदी और राहुल गांधी की राजनीतिक दिशा तय करेंगे। दोनो नेता वैसे तो युवाओं पर ही फोकस कर रहे हैं, पर बात-बात में दोनो इतिहास में पहुंच कर लड़ने लगते है।  पुराने जख्मों को बार-बार कुरेदा जाता है। जहां जनता पूराने जख्मों को भूल कर आगे बढ़ना चाहती हैं..वहीं मोदी और राहुल के सलाहकार इन दोनो को पीछे पहुंचा देते हैं। 
      आम जनता को अब तक पता नहीं चल पाया है कि उसकी बेहतर जिदंगी के लिए और देश की तरक्की के लिए मोदी और राहूल की योजना क्या है? अब देखना ये है कि बीजेपी 2009 के इतिहास से सबक लेती है या नहीं? राहुल गांधी नए सिरे से युवाओं को किस तरह विकास की योजनाओं को समझा पाते हैं?
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To LoVe 2015: मैंने प्यार तुम्ही से किया है, मैंने दिल भी तुम्ही को दिया है : Copied or Inspired By Other Song [13]



[Original Song]

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मुझे देख के बीन बजाएं 

डर है न पकड़ ले जाएँ  

सपेरों से मैं छुपती फिरुँ

Mujhe dekh ke been bajaen

Dar Hai Na Pakad Le Jaayen

Singer - Musarrat Nazir

Pakistani Film - Himmatwala (1981)

Music - M.Ashraf

Lyricist - Masroor Anwar

Film Director - Aziz Tabassum



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[Copied Song]
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गुरुवार, 7 नवंबर 2013

To LoVe 2015: साहित्यिक कृतियों पर आधारित हिंदी सिनेमा



Films Based on Indian Novels & Literature

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हमारे अधिकाँश फिल्मकारों का यह मानना रहा है कि
चूँकि सिनेमा का मूल
उद्देश्य जनता का मनोरंजन करना है अतैव साहित्यिक कृतियों के जरिये दर्शकों
की अपेक्षाओं को पूरा करना कठिन हो जाता है ! इसके बावजूद भी अनेक
प्रबुद्ध और सजग फिल्मकारों ने समय-समय पर /a>
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शनिवार, 2 नवंबर 2013

To LoVe 2015: दीपावली / दीवाली : [विषय आधारित फ़िल्मी गाने]



दीपावली गाने 
[Deepawali Songs]



Please Note 
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Just click on them if you like to see related video song.

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Hope you appreciated our efforts!


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Aayi Divali Aayi Divali Dipak Sang Nache Patanga 

Film - Rattan  (1944)



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शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

To LoVe 2015: अभिनेत्री रेखा : [नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने -14]



Actress Rekha as a Singer




'इन आँखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं...' लगता है मानो ये पंक्ति जैसे इन्हीं अदाकारा के लिए ही लिखी गयी हैं ! रेखा जो अब 59 साल ही हो चुकी हैं मगर इस उम्र में भी सांवली सलोनी खूबसूरती का पर्याय बनी हुई हैं ! वे फिल्म अभिनेता जेमिनी गणेशन और फिल्म अभिनेत्री पुष्पावली की बेटी हैं और उनका वास्तविक नाम भानुरेखा गणेशन है !




तेलुगू भाषा की फिल्म 'रंगुला रत्नम' में/a>
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