बुधवार, 29 मई 2013

To LoVe 2015: क्रिकेट यानि सेक्स और सट्टेबाजी !

भारतीय क्रिकेट बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। अब क्रिकेट के साथ ही क्रिकेटर्स की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। हालत ये है कि भारतीय टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी पर भी सट्टेबाजी की छीटें पहुंचनी शुरू हो गई हैं। मुंबई पुलिस की जांच से अब जो जानकारी निकल कर बाहर आ रही है, उसके आधार पर मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि चेन्नई सुपर किग्स के मालिक गुरुनाथ मयप्पन ही नहीं बल्कि कप्तान धोनी भी कहीं ना कहीं इस सट्टेबाजी में शामिल रहे हैं। जब कुछ लोग जेंटिलमैन खेल की आड़ में "धंधा" कर रहे हों तो  सरकार को ही सख्त कदम उठाने के लिए आगे आना होगा। मेरा मानना है कि देश में सभी तरह के क्रिकेट पर फिलहाल एक साल के लिए तत्काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिए। दुनिया को सख्त संदेश देने के लिए चैंपियंस ट्राफी खेलने लंदन गई टीम को बिना देरी किए वापस बुला लेना चाहिए। इतना ही नहीं देश में क्रिकेट मैच के प्रसारण पर भी रोक होनी चाहिए। क्रिकेटरों के विज्ञापन टीवी पर दिखाने पर सख्ती से पाबंदी लगाई जानी चाहिए। क्रिकेट की आड़ में सट्टेबाजी और " सेक्स रैकेट " चलाने के आरोप में बीसीसीआई को बर्खास्त कर इस पर तत्काल प्रभाव से सरकार को अपने नियंत्रण में लेना चाहिए।

हालांकि मैं इस मत का हूं कि खेल में राजनीतिज्ञों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। क्रिकेट समेत सभी तरह के खेलों की पवित्रता को बनाए रखने के लिए एक सख्त कानून ये भी होना चाहिए कि जो लोग भी खेल से जुड़ी किसी भी संस्था में शामिल हैं, वो लोकसभा, राज्य सभा, विधानसभा या फिर विधान परिषद कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकते। खेल से जुड़ी जितनी भी संस्थाएं है, सभी संस्थाओं में सिर्फ खिलाडियों को ही चुनाव लड़ने की छूट होनी चाहिए। खैर राजनीतिज्ञों से तो बाद में निपट लिया जाएगा, अभी तो क्रिकेट को बचाना है। मुझे सबसे बड़ी शिकायत केंद्र की सरकार से है। जानवर की चमड़ी से बना एक आदमी अगर तमाम गंदगी उजागर हो जाने के बाद यही चिल्लाता रहे कि वो इस्तीफा नहीं देगा तो क्या पूरा देश यूं ही देखता रहेगा ? आज बीसीसीआई धनवान है, ये सही है। लेकिन ये भी सही है कि ये देशवासियों का पैसा है, हम सब क्रिकेट शौक से देखते हैं, टिकट खरीदते हैं, टीवी पर देखते हैं। क्रिकेट देखने की वजह से ही टीवी पर विज्ञापन मिलते हैं। लेकिन अब पता चल रहा है कि खेल का नतीजा मैदान पर तय नहीं होता, बल्कि पांच सितारा होटल में नतीजे तय होते हैं। जाहिर है ये देशवासियों के साथ विश्वासघात है। क्या ये पर्याप्त कारण नहीं है कि बीसीसीआई और आईपीएल मैनेजमेंट को बर्खास्त कर इनके बैंक खाते सीज किए जाएं। श्रीनिवासन का दामाद जो चेन्नई सुपर किंग्स का मालिक है, वो सट्टेबाजी तो कर ही रहा है, उसके पास लड़कियों को भेजा जा रहा है। क्या ये कारण पर्याप्त नहीं है कि चेन्नई की टीम को आईपीएल से बर्खास्त कर दिया जाए ?


रही बात भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी की। क्रिकेट प्रेमी धोनी की इज्जत करते रहे हैं, वजह ये कि एक छोटे से शहर से निकल कर धोनी ने ना सिर्फ अपनी पहचान बनाई, बल्कि देश के लिए दो विश्वकप भी जीता। आज मेरी नजर में धोनी और उनके प्रदेश झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधुकोड़ा में कोई अंतर नहीं है। अंतर सिर्फ ये है कि एक जेल के अंदर है दूसरा जेल के रास्ते में। वजह ये कि चेन्नई सुपर किंग के मालिक गुरुनाथ मयप्पन ने पुलिस को जो बयान दिया है, उसमें कहा गया है कि सट्टेबाजी के लिए वो धोनी से सलाह-मशविरा करके पैसा लगाता था। अच्छा धोनी की पत्नी खुद स्टेडियम में सट्टेबाज बिंदु दारा सिंह के साथ दिखाई दीं। क्या ये वजह पर्याप्त नहीं है कि सट्टेबाजी में धोनी की भूमिका की अच्छी तरह जांच हो। चैंपियंस ट्राफी के लिए लंदन रवाना होने से पहले मंगलवार को शाम धोनी पत्रकारों के सामने जिस तरह गूंगे बने हुए थे, उससे तो यही लगा कि वो मीडिया के सामने नहीं बल्कि पुलिस के सामने बैठे हैं। धोनी को देखने से कोई भी आदमी यही कहेगा कि कुछ तो गड़बड़ जरूर है। वैसे भी आज तक इस बात का जवाब नहीं आ पाया है कि धोनी पत्नी साक्षी सट्टेबाद बिंदु दारा सिंह के साथ क्यों मैच देख रहीं थी ? मुझे लगता है कि जांच शुरू करने के पहले धोनी को कप्तानी से हटाया जाना जरूरी है, क्योंकि वो श्रीनिवासन की कंपनी इंडिया सीमेंट में वाइस प्रेसीडेंट हैं। जाहिर है उनका वहां से आर्थिक हित जुड़ा है, ऐसे में श्रीनिवासन और गुरुनाथ मयप्पन के खिलाफ वो कुछ नहीं बोल सकते।

श्रीनिवासन के अड़ियल रूख से तो ऐसा लग रहा है जैसे ये बीसीसीआई के अध्यक्ष ना होकर क्रिकेट इंडिया के अध्यक्ष हैं, इनके ऊपर देश का कोई कानून लागू ही नहीं होता है। क्रिकेट इनकी खुद की और दामाद की प्रापर्टी है। किसी की कुछ सुनने को ये राजी ही नहीं हैं। इतना बड़ा खुलासा हो गया कि खिलाड़ी सट्टेबाजी में शामिल हैं, चेन्नई सुपर किंग का मालिक सट्टेबाजी कर रहा है । यही नहीं इस बात का भी खुलासा हो गया कि खिलाड़ी, टीम के मालिक और अंपायर देह व्यापार में शामिल हैं। उन्हें बकायदा कालगर्ल मुहैय्या कराई जा रही हैं। होटल के सीसीटीवी कैमरे में सब कुछ कैद हो चुका है। ये पाकिस्तानी अंपायर तो पहले भी कालगर्ल के साथ पकड़ा जा चुका है। इसके बाद भी उसे इस बार आईपीएल में बुलाया गया। आखिर इस मामले में किसकी जवाबदेही है? पुलिस की जांच में जिस तरह की बातें सामने आ रही हैं, उससे साफ होता जा रहा है कि आईपीएल की आड़ में दूसरा ही धंधा फल फूल रहा है। इस घिनौनी करतूतों के सामने आने के बाद भी अगर श्रीनिवासन कहते हैं कि वो साफ सुथरे हैं, फिर तो अब पुलिस कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं बचा है। मुझे लगता है कि पुलिस को छापा मारकर बीसीसीआई के दफ्तर पर भी तालाबंदी करनी चाहिए।

एक बात जो सबसे ज्यादा हैरान करती है वो ये कि इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी बीसीसीआई में शामिल राजनेताओं को कुछ गलत नहीं लग रहा है। चाल,चरित्र और चेहरे की बात करने वाली पार्टी बीजेपी ने तो अपने मुंह पर कालिख ही पुतवा ली है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जो प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे चल रहे हैं। लेकिन अभी तक बिल्कुल खामोश हैं। जब सबसे पड़ा नेता ही चुप है तो अरुण जेटली, अनुराग ठाकुर और दूसरे नेताओं से भला क्या उम्मीद की जा सकती है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, कल तक सभी चुप थे, लेकिन लगता है कि राजीव शुक्ला की वजह से पार्टी की हो रही छीछालेदर को अब हाईकमान ने नोटिस किया है। इसके बाद राजीव शुक्ला ने सीधे-सीधे श्रीनिवासन का इस्तीफा तो नहीं मांगा, लेकिन इतना जरूर कहा कि जब तक जांच चल रही है, तब तक वो दूर हो जाएं। इसके पहले कल नैतिकता के आधार पर ज्योतिर्रादित्य सिंधिया ने जरूर मुंह खोला और श्रीनिवासन का इस्तीफा मांगा। मामला बढता देख आज खेलमंत्री ने भी नैतिकता की दुहाई देते हुए श्रीनिवासन के इस्तीफे की मांग की। अब एक-एक कर लोग इशारे-इशारे में अपनी बात कह रहे हैं। इसी क्रम में एनसीपी नेता शरद पवार ने भी उन्हें हट जाने की सलाह दी है। लेकिन हद कर दी श्रीनिवासन ने... कह रहे हैं कि मेरे खिलाफ कोई मामला नहीं है, फिर मैं क्यों इस्तीफा दूं ? हाहाहाहहा । अभी दामाद ने कम गुल खिलाया है क्या ? या ये इंतजार कर रहे हैं कि परिवार के दूसरे सदस्य भी इस धंधे के लपेटे में आएं तो आप हटेंगे। 

सच कहूं तो पैसे ने सबका मुंह बंद कर रखा है। मेरा सवाल तो पुराने नामचीन क्रिकेटरों से भी है। पूर्व कप्तान कपिल देव, सुनिल गावस्कर, नवजोत सिंह सिद्दू, श्रीकांत, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड, अनिल कुंबले, जगावल श्रीनाथ इन लोगों की एक आवाज है। क्यों नहीं खुल कर सामने आते। इन सब को शोहरत इसी क्रिकेट ने दी है, आज क्रिकेट की ही ऐसी तैसी की जा रही है। देश भर के क्रिकेट प्रेमियों को अभी भी खिलाड़ियों से उम्मीदें है, इसीलिए मांग हो रही है कि बीसीसीआई की जिम्मेदारी पूर्व खिलाड़ियों की दी जाए। लेकिन पूरे दिन टीवी पर बकर-बकर करने वाले खिलाड़ी भी आज गांधी जी के बंदर बने बैठे हैं। सचिन को तो लोग क्रिकेट का भगवान कहते हैं, क्या भगवान को आज कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है, या अपने भगवान भी मजबूर हैं। वैसे हम सब जानते हैं कि क्रिकेट में फिक्सिंग कोई नई बात नहीं है। साल 2000 में दिल्ली पुलिस ने दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रोन्ये पर भारत के खिलाफ वनडे मैच में फिक्सिंग कराने का आरोप लगाया। हर्शेल गिब्स, पीटर स्ट्राइडम और निकी बोए पर भी उंगलियां उठी थीं। क्रोन्ये ने तो स्वीकार किया कि उन्होंने भारत में खेले गए एक दिवसीय सीरीज के दौरान अहम सूचनाएं 10 से 15 हजार डॉलर में बेचीं थीं।

याद कीजिए इसी साल यानि 2000 में ही मनोज प्रभाकर ने कपिल देव पर आरोप लगाया कि उन्होंने ही 1994 में श्रीलंका में खेले गए मुकाबले में पाकिस्तान के खिलाफ खराब प्रदर्शन करने को कहा था। इसी साल जुलाई में आयकर विभाग ने कपिल देव, अजहरुद्दीन, अजय जडेजा, नयन मोंगिया और निखिल चोपड़ा के घरों पर छापे मारे। अक्टूबर में क्रोन्ये पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया। नवंबर में अजहरुद्दीन को फिक्सिंग का दोषी पाया गया जबकि अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर, अजय शर्मा और भारतीय टीम के पूर्व फीजियो अली ईरानी के संबंध सट्टेबाजों से होने की पुष्टि की गई। दिसंबर में अजहरुद्दीन पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया।


चलते-चलते
मेरा एक मित्र क्रिकेट का बहुत बड़ा प्रशंसक है। उससे आज फोन पर बात हो रही थी, बोला श्रीवास्तव जी आप लिखते रहो क्रिकेट के गोरखधंधे के खिलाफ, लेकिन कुछ नहीं होने वाला। हां इस खुलासे से लोगों को एक सुविधा जरूर हो गई है। अभी तक लोग मुंबई जाते थे, अगर उन्हें कालगर्ल या माँडल की जरूरत होती थी, तो बेवजह इधर उधर भटकते थे। अब सबको पता हो गया कि ये सुविधा विंदु दारा सिंह के यहां उपलब्ध है। सीधे फोन करेंगे और उनका काम हो जाएगा। विंदू का भी धंधा अब चमक जाएगा।



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रविवार, 26 मई 2013

To LoVe 2015: नक्सली और बांग्लादेशी...इनपर कब होगा Final Assault?

महेंद्र कर्मा-नक्सल विरोध की सजा मिली मौत

नक्सलियों की मार ने देश की सबसे ताकतवर पार्टी को झकझोर दिया है....उसके कई नेता मारे गए हैं....पहली बार राष्ट्रीय स्तर के कद्दावर नेता गंभीर रुप से जख्मी हुए हैं। अब यहां सबसे बड़ा सवाल है कि क्या इससे कोई सबक सिखेगा? क्या राजनीतिक पार्टियां कुछ मसलों पर एकजुट होंगी? वैसे देखा जाए तो राजनीतिक दल कई जगह एकजुट होती हैं..और दिखावे के लिए लड़ती हैं। ये हमला निंसंदेह लोकतंत्र पर हमला है...पर कर्नाटक में बीजेपी दफ्तर पर हमला कांग्रेस नेता शकील अहमद को लोकतंत्र पर हमला नहीं लगा था..ऐसी मानसिकता से देश विरोधी ताकतों से नहीं निपटा जा सकता।

 एक नजारे को आंखों के सामने लाएं...IPL कमिश्नर हैं कांग्रेस के राजीव शुक्ला...दिल्ली क्रिकेट एसोशिशन के अध्यक्ष हैं बीजेपी नेता अरुण जेटली..जो राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं गुजरात से...खबरों के मुताबिक राजीव शुक्ला अगर BCCI अध्यक्ष बनते हैं तो जेटली उनके समर्थक होंगे....खैर छोड़िए...

दिवंगत नेता चाहे कैसे भी हों...ये नेता...लोकतंत्र की राह से चुनाव जीतकर ही आ रहे थे....और इनपर हमला प्रत्य़क्ष रुप से लोकतंत्र हिमायती जनता पर हमला है...अब सवाल उठता है कि इनसे निपटा कैसे जाए..जाहिर है कि सेना या CRPF को खुले हाथ देने होंगे....नक्सलियों को कुचलना होगा....पर सवाल है कि सुरक्षाकर्मियों को कितनी खुली छुट देनी होगी? क्या इससे समस्या हल हो पाएगी

मुख्यमंत्री रमण सिंह-नक्सलियों के खिलाफ हैं सख्त
अगर कोई ये सोचता है कि सुरक्षाकर्मियों को खुली छूट देने से समस्या हल हो जाएगी तो उससे बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा...।आदिवासी जो शांत रहते थे वो नक्सल कैसे बने? जंगल काटने के ठेके...खानों की खुदाई के ठेके...बिना जंगलवासियों की भावनाओं का ख्याल रखे ....पूजींपतियों को दे दिया गया..। जाहिर है कि इससे जो रोष उपजा...उसे भारतविरोधी नक्सलियों ने अपने पक्ष में कर लिया...तो  मानवाधिकार के नाम पर कई लोग खूनी हत्यारों की टोली नक्सलियों के भौंपू बन गए। दरअसल जो अंसोतष नासूर बन गया है...सुरक्षाकर्मी उस नासूर पर काबू पा सकते हैं...कानून व्यवस्था को तो कंट्रोल कर सकते हैं....पर राजनीतिक और समाजिक समस्या का हल प्रशासन को ही निकालना होगा।

वैसे ये सच है कि जो भी ताकत में होता है वो उसका नजायज फायदा उठाता है। प्रशासन ने नक्सल के नाम पर आदिवासियों को तंग किया...तो पूंजीपतियों ने जंगल का जमकर दोहन किया...उधर ताकत पाए नक्सली गद्दारों ने भोलेभाले आदिवासियों को अपना गुलाम बना लिया...। यानि दोनों तरफ से आदिवासी औऱ आम भारतवासी मारा जाता है। ऐसे में कई सवाल उठते है....नक्सलियों तक हथियार पहुंचने के रास्तों को बंद करने में कामयाबी क्यों नहीं मिली है? आखिर नक्सलियों को हथियार देने वालों की पहचान क्यों नहीं हो पा रही है? जो लाल रास्ता नेपाल से होकर केरल तक पहुंचता है उसे नेस्तनाबूद करने में समस्या क्या है?

सवाल केवल नक्सलियों का नही है...देश में अवैध रुप से बसे बांग्लादेशियों को भी कुचलना होगा....इन बांग्लादेशियों का समर्थन करने वाले गद्दारों से भी निपटना होगा....बरसों पहले वोट बैंक के नाम पर असम में बसाए गए बांग्लादेशी आम लोगो को मार रहे हैं। देश के अंदर धमाके कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे लोगो को पकड़-पकड़ कर गोली मारनी होगी....फांसी पर लटकाना होगा....तभी भारत में लोकतंत्र पर हमला रुक पाएगा...
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शनिवार, 25 मई 2013

To LoVe 2015: IPL ने क्रिकेट को " कोठा " बनाया !


क्या कहूं, एक हफ्ते से देश की सारी समस्याएं पीछे छूट गई हैं, हर तरफ सिर्फ एक ही चर्चा है, वो है क्रिकेट की। अच्छा क्रिकेट की भी चर्चा हो तो एक बार ठीक है, लेकिन यहां चर्चा हो रही है आईपीएल 6 की, वैसे इसकी चर्चा में भी कोई बुराई नहीं है। पर अब इस चर्चा में खेल कहीं शामिल ही नहीं है। आईपीएल का आँरेंज और पर्पल कैप किसके पास है और अभी इस कैप के लिए किसकी चुनौती कारगर हो सकती है, इससे किसी को कोई लेना देना नहीं है। आपको पता होगा कि कम से कम 16-16 मैच तो सभी टीमों ने खेले ही हैं, इस दौरान खिलाड़ियों ने बहुत सी अच्छी बाल फैंकी है और बहुत शानदार शाट्स भी लगाए हैं। लेकिन किसी को इससे कुछ लेना-देना नहीं है। जानते हैं आज चर्चा क्या हो रही है ? चर्चा हो रही है क्रिकेट में सट्टेबाजी की, चर्चा हो रही है क्रिकेट में लड़कियों के इस्तेमाल की, चर्चा हो रही है मैंच के बाद रात में होने वाली रंगीन पार्टियों की, चर्चा हो रही है नो बाल फेंकने लिए कालगर्ल के इस्तेमाल की,  चर्चा हो रही है क्रिकेट में अंडरवर्ल्ड के कनेक्शन की। हालत ये है कि क्रिकेट की खबरें जो न्यूज चैनलों पर "खेल के बुलेटिन" में हुआ करती थीं, आज ये खबरें चैनलों के " क्राइम शो " में चल रही हैं। इस खेल में आज जितनी बात खेल और खिलाड़ियों की नहीं हो रही है, उससे कहीं ज्यादा बातें चीयर गर्ल, कालगर्ल, मांडल्स, अभिनेत्रियों और रात में होने वाली रंगीन पार्टियों में पांच से दस ग्राम कपड़े पहन कर खिलाडियों के इर्द-गिर्द मंडराने वाली लड़कियों की हो रही है। आसान शब्दों में कहूं तो सच्चाई ये है कि इस आईपीएल ने क्रिकेट को कोठा बना दिया है।

देखिए आपको अगर इस खेल में होने वाले "असली खेल" को समझना है तो थोड़ा सावधानी और धैर्य से इस पूरे लेख को आराम से पढ़ना होगा। वजह इसमें किरदार बहुत सारे हैं। कुछ किरदार ऐसे हैं, जिनके बारे में चर्चा करना जरूरी है। बगैर कोई भूमिका के सबसे पहले मैं   बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन की बात करता हूं। अध्यक्ष के साथ ही ये चेन्नई सुपर किंग के मालिक भी हैं। इन पर बहुत ही गंभीर आरोप हैं, लेकिन बीसीसीआई इतनी पावरफुल बाँडी है कि इनका कोई कुछ नहीं कर सकता। इनके दामाद टीम के सीईओ की हैसियत रखते थे। मुंबई पुलिस की जांच में पाया गया है कि ये खुद ही सट्टेबाजी भी करते थे और अपनी ही टीम की रणनीति अभिनेता बिंदू दारा सिंह के जरिए सट्टेबाजों से साझा करते थे। अब गिरफ्तार हो चुके हैं। दामाद गुरुनाथ मयप्पन के गिरफ्तार हो जाने के बाद नैतिकता के आधार पर श्रीनिवासन को अध्यक्ष पद से हट जाना चाहिए था, लेकिन वो अड़े हैं कि इस्तीफा नहीं दूंगा। आईपीएल में एक नियम है कि अगर कोई फ्रैंचाइजी अनैतिक कार्य में शामिल पाया जाता है तो उसकी टीम को ब्लैक लिस्टेड कर दिया जाएगा। अब जिस टीम का सीईओ सट्टेबाजी कर रहा है, उस टीम को क्यों नहीं अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए ? अब तक तो इस टीम को अयोग्य घोषित कर आईपीएल से बाहर कर दिया जाना चाहिए था।

मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर श्रीनिवासन की चमड़ी कितनी मोटी है। कुछ दिन पहले जब राजस्थान रायल्स के तीन खिलाड़ी श्रीसंत के साथ दो अन्य पकड़े गए, तब इसी बीसीसीआई ने फ्रैंचाइजी के मालिकों पर दबाव बनाया गया को वो खुद उनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराएं। राजस्थान रायल्स ने मजबूर होकर रिपोर्ट दर्ज कराया और उन खिलाड़ियों से करार भी तोड़ दिया। मेरा सवाल है श्रीनिवासन साहब आपने अपने दामाद के खिलाफ पुलिस में अभी तक रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज कराया ? आप फंस ना जाएं इसलिए अपने सट्टेबाज दामाद को अब ये बता रहे हैं कि वो तो सिर्फ टीम में एक मानद सदस्य है। उसका टीम प्रबंधन से कोई लेना देना नहीं है, वैसे एक बात तो आपने सही कहा कि उसका टीम से कोई लेना देना तो नहीं था, उसका लेना देना आईपीएल की आड़ में कालगर्ल और माडल्स को रिसार्ट में बुलाना था, सट्टेबाजी कराना था, दलाली का काम था। एक नजर में ये दामाद वाकई कितना घिनौना दिखाई दे रहा है।

वैसे तो ये उनके घर की बात है, इसका जिक्र नहीं होना चाहिए, लेकिन जब श्रीनिवासन का बेटा अश्विन खुलेआम अपने पिता पर गंभीर आरोप लगा रहा है तो दो लाइन की चर्चा मै भी कर लेता हूं। कहा जा रहा है बीसीसीआई अध्यक्ष अपने बेटे से इसलिए नाराज हैं, क्योंकि कि वो समलैंगिक है। यानि मर्दों के साथ सोता है। बेटे का आरोप है कि इससे नाराज उसके पिता ने उसे अपने गुर्गों से पिटवाया भी। लेकिन बेटा चीख-चीख कर कह रहा है कि यह उसका निजी मामला है, इस पर उसके पिता नाराज क्यों हैं? हालांकि अब श्रीनिवासन इसका क्या जवाब देगें। वैसे मुझे लगता है कि बाप जो कुछ जमा करता है वो अपने बेटों के लिए ही तो करता है। अब आईपीएल से इतनी चीयर गर्ल, कालगर्ल, माडल्स, अभिनेत्रियों के अलावा हजारों लड़कियां जुड़ी हैं और बेटा है कि वो मर्दों के साथ सो रहा है, गुस्सा आना तो स्वाभाविक है। खैर बाप, बेटे और दामाद का असली चेहरा सबके सामने है। बेहतर तो यही था कि श्रीनिवासन को खुद बीसीसीआई अध्यक्ष का पद छोड़कर अलग हो जाते। लेकिन ये इतना आसान नहीं है, अगर श्रीनिवासन और मनयप्पा जाते हैं तो उनकी टीम भी तो जाएगी। इसलिए मुझे तो लगता है कि श्रीनिवासन अंतिम दम तक कुर्सी नहीं छोड़ने वाले हैं।

अब बात क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी की। धोनी आईपीएल में ही नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान हैं और क्रिकेटप्रेमियों को उनसे बहुत प्यार है। हो भी क्यों ना ,धोनी की अगुवाई में टीम ने दो-दो वर्ल्ड कप जीते हैं। लेकिन सट्टेबाजी में उनकी ही टीम के तथाकथित सीईओ दामाद मनयपत्ता का नाम सामने आया है, जो धोनी के बहुत अच्छे मित्र हैं। कई दफा प्लेइंग 11 तय करने में या फिर टीम की रणनीति बनाने के दौरान भी ये दामाद मौजूद रहता है। ऐसे में आसानी समझा जा सकता है कि जो आदमी सट्टेबाजी में पैसा लगा रहा है तो वो पैसा डुबोने के लिए नहीं, बल्कि कमाने के लिए लगा रहा है। ऐसे में इस बात से कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता कि वो टीम के भीतर की रणनीति भी सट्टेबाजों के साथ शेयर ना करता हो। धोनी की बात यहीं खत्म नहीं हो रही है। उनकी पत्नी साक्षी धोनी और बिंदू दारा सिंह की करीबी पर भी सवाल उठ रहे हैं। वैसे तो स्टेडियम के वीवीआईपी स्टैंड में आमंत्रित मेहमान यहां कहीं भी बैठकर मैच देख सकता है, लेकिन सट्टेबाजी में पुलिस के हत्थे चढ़े बिन्दुदारा सिंह ने कहा है कि उन्हें अपने पास बैठने के लिए साक्षी ने खुद बुलाया था। बिंदु सट्टेबाजी कर रहा है और साक्षी धोनी की पत्नी है, जाहिर है कि उसे भी बहुत सी चीजें पता होंगी। अब साक्षी और बिंदु की मित्रता में सट्टेबाजी शामिल नहीं है, इसे भरोसे के साथ कैसे कहा जा सकता है। जाहिर हर आदमी यही कहेगा कि इसकी भी जांच होनी चाहिए। वैसे धोनी की पत्नी का नाम एक जगह और आया है। स्पाँट फिक्सिंग में गिरफ्तार श्रीसंत ने जिस लड़की को मंहगा फोन गिफ्ट किया है, वो लड़की कोई और नहीं बल्कि साक्षी की दोस्त है और उसकी श्रीसंत से मुलाकात भी साक्षी ने ही कराई थी। इसलिए इस साक्षी कनेक्शन को भी खंगालने की जरूरत है।

वैसे अब ये मामला पुलिस के हाथ में है, धीरे-धीरे सबकुछ खुलेगा ही। लेकिन मैं तो यही कहूंगा कि आईपीएल ने इस खेल की ऐसी तैसी कर दी। क्रिकेट की चर्चा अब खेल कम नंगई, टुच्चई, गाली देने, मारपीट, थप्पड़ मारने, रात रंगीली करने, मैच के पहले-मैच के बाद सेक्स, अर्धनग्न औरतों के साथ शराब पीकर चिपकने, सोने, सट्टा लगाने, मैच फिक्सिंग, गलत तरीकों से पैसा कमाने, ड्रग्स लेने, बार डांसरों से नाम जुड़ने जैसी कारगुजारियों के चलते ज्यादा चर्चा हो रही है। पुलिस की जांच में जो बात सामने आई है, उसे सुनकर हैरानी होती है, नो बाल फैंकने के लिए कैसे एक गेंदबाज लड़की की मांग कर रहा है। कह रहा है नो रिपीट, मतलब उसे आज नई चाहिए। क्या है ये ? श्रीनिवासन साहब और राजीव शुक्ला जी देश में ये कौन सा क्रिकेट आपने शुरू कर दिया है। बात पिछले सीजन की है आईपीएल की नंगई, टुच्चई की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में आईपीएल की एक टीम के विदेशी खिलाड़ी ल्यूक ने दारु पी और फिर लगे एक एनआरआई महिला से चिपकने। उससे गंदी-गंदी हरकतें करने । जबरदस्ती बेडरुम में घूस गए और अश्लील हरकतें करने की कोशिश की। लड़की के दोस्त ने रोका तो उसे इतना पीटा कि वो बेचारा आईसीयू में पहुंच गया। मारपीट में ल्यूक को भी चोटें आईं। क्रिकेटर ल्यूक की गंदी हरकत से जो क्रिकेट शर्मसार हुआ, क्रिकेट के करोडो़ फैन्स आहत हुए उसे लेकर भी बीसीसीआई अध्यक्ष बिल्कुल चुप हैं। ठीक वैसे ही जैसे अपने बेटे के मर्दों के साथ सेक्स करने यानि समलैंगिक होने पर अपने पिता से हुए विवाद को सड़कों पर लाने पर चुप है।

अच्छा इतना कुछ हो जाने के बाद भी बेशर्मी की हद ये है कि आईपीएल या बीसीसीआई का कोई भी पदाधिकारी ये मांग नहीं कर रहा है कि आईपीएल से देश में क्रिकेट का फायदा कम बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का नुकसान ज्यादा हो रहा है। बहुत ज्यादा गंदगी बढ़ती जा रही है। खिलाड़ियों में भी चरित्रहीनता बढ़ रही है। कहा तो ये भी जा रहा है कि बकायदा फ्रैंचाइजी और आयोजक ही जहां खिलाड़ी रुकते हैं, उसी होटल में लड़कियों के कमरे भी बुक करातें हैं। मसलन ऐसा नहीं है कि "कोठेबाजी" के इस धंधे के बारे में किसी को जानकारी नहीं है, बल्कि सच ये है कि यही लोग इस तरह की सुविधाएं मुहैय्या करा रहे हैं। स्व. दारासिंह का नाम हम सब कितने सम्मान से लेते हैं, अब जांच से ये बात सामने आई है कि उन्ही का बेटा बिंदु दारा सिंह भी खिलाड़ियों, सट्टेबाजों और धंधे से जुड़े अन्य लोगों को लड़की की सप्लाई करता रहा है। वैसे अब तो वाकई देश भी जानना चाहता है कि सभी क्रिकेटरों का असली चेहरा क्या है? दो चार लोग ही यहां निकम्मे हैं, या फिर ये गंदगी पूरी टीम में फैली हुई है।

इस खेल में अगर नेताओं और पुलिस की चर्चा न की जाए तो बात पूरी ही नहीं होगी। राजनीतिक दल के नेता आम जनता से जुड़े मुद्दे पर तो एक दूसरे पर कुत्तों की तरह भोंकते दिखाई देते हैं। उनके विरोध के तरीकों से तो लगता ही नहीं कि ये कभी आपस में मिलजुल  कर शांति से बैठते भी होंगे। लेकिन ये देखकर हैरान हो जाता हूं कि क्रिकेट के मुद्दे पर सब एक दूसरे का तलवा चाटने को तैयार रहते हैं। अब देखिए ना फिक्सिंग पर कानून बनाने की बात कहकर कैसे राजीव शुक्ला और अरुण जेटली एक दूसरे के कंधे पर हाथ डाले घूम रहे हैं। दरअसल क्रिकेट में तमाम नेताओं का इंट्रेस्ट जुड़ा हुआ है। मसलन कृषिमंत्री शरद पवार, रेलमंत्री सीपी जोशी, फारुख अब्दुल्ला, अरुण जेटली, राजीव शुक्ला, अनुराग सिंह समेत तमाम राजनेता क्रिकेट में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ये सब कभी क्रिकेट खेलते रहे हैं, इनमें क्रिकेटर तो कोई नहीं है। हां सब चक्कर बस "मोटे माल" का है।

आखिर में चर्चा पुलिस की। दरअसल आईपीएल अब इंडियन पुलिस लीग में बदल गया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी भी इलाके में पुलिस की जानकारी के बगैर सट्टेबाजी हो ही नहीं सकती। पुलिस इन सबमें बराबर की भागीदार होती है। बल्कि जिस इलाके में सट्टेबाजी होती है, उस इलाके का थाना बहुत मंहगा होता है। यहां थानेदार की तैनाती के पैसे भी कुछ उसी हिसाब के होते हैं। मुझे तो पक्का यकीन है कि दिल्ली में बलात्कार की घटना के बाद जिस तरह से लोगों का गुस्सा पुलिस के खिलाफ था और लोग पुलिस कमिश्नर को हटाने की मांग कर रहे थे, बस जनता का ध्यान बांटने के लिए दिल्ली पुलिस ने ये तुरुप का चाल चला। सच कहूं तो दिल्ली पुलिस इस मामले में ज्यादा हाथ डालने वाली नहीं थी, उसने मुंबई से श्रीसंत को गिरफ्तार कर मीडिया का रुख मोड़ दिया था। उसका  मकसद पूरा हो गया था। आपको हैरानी होगी कि श्रीसंत को गिरफ्तार करने के बाद जब दिल्ली के पुलिस कमिश्नर मीडिया से मुखातिब थे, तो उन्होंने शातिराना अंदाज में ये बात कही भी कि आज आप लोग मेरा इस्तीफा नहीं मांग रहे हैं। मैं दिल्ली पुलिस से सवाल पूछना चाहता हूं कि अब वो किसे बचाने की कोशिश कर रही है कि अदालत को भी सही जानकारी नही दे रहे है, जिसकी वजह अदालत में उसे फटकार खानी पड़ी। ये जवाब तो दिल्ली पुलिस ही देगी।

बात मुंबई पुलिस की भी कर ली जाए। जब दिल्ली पुलिस ने श्रीसंत के साथ दो और खिलाड़ियों को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया और मुंबई पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगने दी, इस बात से मुंबई पुलिस ने आंखे तरेरनी शुरू कर दी। उसे लगा कि दिल्ली ने उसके साथ विश्वासघात किया है। बात इतनी बिगड़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का सहयोग करना ही बंद कर दिया। श्रीसंत मुंबई में जिस होटल में रुका था, वहां छापेमारी मुंबई पुलिस ने की और वहां से बरामद लैपटाप, फोन और अन्य सामान दिल्ली पुलिस के हवाले करने से ही इनकार कर दिया। अब मुंबई ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है, जिससे लोग मुंबई पुलिस पर उंगली ना उठा सकें। लोग ये ना कहें कि दूसरे राज्य की पुलिस मुंबई में अपराधियों को गिरफ्तार कर ले रही है और मुंबई पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। अब कोई बेवकूफ ही होगा जो ये कहेगा कि मुंबई पुलिस का सट्टेबाजों से कोई लेना देना नहीं है। वैसे जब मामला एक है, आईपीएल में मैच फिक्सिंग, स्पाँट फिक्सिंग, सट्टेबाजी तो इसकी जांच अलग-अलग पुलिस को क्यों करना चाहिए ? सभी  मामले सीबीआई को सौंप दिए जाएं, वो जांच कर लेगी। लेकिन इसके लिए दिल्ली और मुंबई दोनों ही पुलिस तैयार नहीं होगी। मामला क्रिकेट में सट्टेबाजी का नहीं मामला "मोटेमाल" का भी तो है।






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सोमवार, 20 मई 2013

To LoVe 2015: ये क्या कर डाला श्रीशंत

इज्जत...रास न आई ..श्रीशांत
श्रीशांत के फिक्सिंगकांड में फंसने से करोड़ों लोग स्तब्ध हैं। लोग अबतक समझ नहीं पा रहे कि ऐसा खिलाड़ी जो स्टार है..जो करोड़ो कमा चुका है...वो मैच फिक्सिंग जैसे घिनौने काम से क्यों जुड़ गया? आज की तारिख में किसी खिलाड़ी के लिए मैच फिक्सिंग शब्द गद्दार शब्द से कम नहीं है। मगर कई लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता औऱ वो जानते हुए भी इस दलदल में कूदने को तैयार रहते हैं। अब तक मिल रही खबरों के अनुसार श्रीशांत भी चंद मिनटों में लाखों रुपये कमाने के लालच से बच नहीं सके।  
    ये वो ही श्रींशांत हैं जो सचिन तेंदुलकर के साथ ड्रेसिंग रुम शेयर करते हैं.....द्रविड़ की कप्तानी में राज्स्थान रॉयल्स के लिए खेल रहे थे। इतने बड़े खिलाड़ियों की शालीनता और खेल के प्रति ईमानदारी औऱ श्रद्धा श्रीशांत को कुछ नहीं सिखा सकी। श्रीसंत के साथ ही खेल रहे दो अन्य खिलाड़ी अजित और अंकित भी द्रविड़ के  साथ खेलकर भी कुछ न सिख सके। श्रीसंत अगर करोड़ो कमा रहे थे...तो इन बाकी खिलाड़ी भी इतना कमा रहे थे जितना हमारे देश का एक बड़ा तबका जीवन भर नहीं कमा पाता। रणजी और IPL में इन खिलाड़ियों को इतना मिल रहा था जिसमें वो आराम से जिंदगी गुजार सकते थे। बावजूद इसके ये खिलाड़ी करोड़ों फेंस के  साथ धोखा करने से नहीं चूके। 

   
द्रविड़ की शालीनता से भी नहीं सीखा कुछ
नब्बे के दशक में बड़े खिलाड़ियों के फिक्सिंग में फंसने से
भारतीय क्रिकेट की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचा था...लोगों में क्रिकेट की विश्वसनीयता कम हुई थी...उस स्थिती से भारतीय क्रिकेट को सचिन औऱ द्रविड़ सरीखे खिलाड़ियों ने अपने शानादर खेल...संयम औऱ शालीनता से उबारा था। ये इन दो बड़े खिलाड़ियों की बदकिस्मती है कि उनके मैदान में होते हुए.... उनके साथ ही ड्रेसिंग रुम शेयर करते लोग उनके किए कराए पर पानी फेरने की कोशिश कर रहे हैं।
   हालात ये हो गई है कि अगर अब कोई खिलाड़ी गलती से भी कैच छोड़ेगा...कोई खिलाड़ी गलती से नोबॉल करेगा...कोई बल्लेबाज रन आउट होगा..तो भी लोगो को विश्वास नहीं होगा....सब यही मानेंगे कि ये सब फिक्स है। अनिश्चताओं के खेल को लोग अब फिक्सिंग का खेल कहने लगे हैं।

     इस कांड का खुलासा करने वाली दिल्ली पुलिस बधाई की पात्र है। दिल्ली पुलिस आतंकवादियों की कॉल्स का पीछा करते हुए अचानक मैच फिक्सिंग के अपराधियों तक जा पहुंची। ये वही दिल्ली पुलिस है जो 16 दिंसबर से लगातार अदालत और लोगो के गुस्से को झेल रही थी। पुलिस कमिश्नर के चेहरे से जो हंसी गायब हो गई थी...वो मैच फिक्सिंग के खुलासे के बाद उनके चेहरे पर लौट आई है। शायद लोगो में फिर से विश्वास हासिल कर सकने पर भगवान को धन्यावद करने के लिए ही दिल्ली पुलिस कमिश्नर साहब साईं को मत्था टेकने शिरडी पहुंचे। इससे एक बार साबित होता है कि दिल्ली पुलिस मुस्तैद है...बस ये मुस्तैदी दैनिदिन में भी दिखाई दे।

जैंटलमेन गेम हुआ क्लीन बोल्ड
   पकड़े जाने के बाद श्रीशांत जीजू जनार्दन नाम के खिला़ड़ी को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं...पर ये हकीकत है कि किसी ने उन्हें मैच फिक्सिंग के कीचड़ में कूदने को नहीं कहा था। श्रीशांत के साथ एक लड़की भी थी...वो भी पुलिस की पकड़ मे है। जिससे शायद अय्याशी का एक नया चैप्टर खुलेगा। हालांकि पुलिस इस मसले पर खुलकर कुछ नहीं कह रही..पर मुंबई के होटल के उस कमरे में  मिले कंडोम..जिसमें श्रीशांत ठहरे थे...अपनी कहानी खुद बयां कर रहे हैं। श्रीशांत अय्याशी करना चाहते थे तो करते....कोई फैन उन्हें रोक नहीं रहा था...पर कम से कम लोगो के साथ धोखा तो नहीं करते।
   श्रीशांत ने उन लोगो को धोखा दिया है जो अपना सब कामधाम छोड़कर कर क्रिकेट देखते हैं...लहराते तिरंगे को देखते हैं....जरुरी नहीं कि वो श्रीशंत के प्रसंशक हों...पर ये वो लोग हैं जो क्रिकेट ही खाते हैं..क्रिकेट ही पीते हैं..क्रिकेट ही ओढ़ते हैं...। जो इमानदारी से खेले गए खेल को देखने स्टेडियम जाते हैं या टीवी से चिपके रहते हैं.....ऐसे फैन्स से धोखा देने वाले खिलाड़ियों को किसी भी तरह से माफ नहीं किया जा सकता..ये सभी सजा के हकदार हैं..। 
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रविवार, 19 मई 2013

To LoVe 2015: अब "मिस्टर क्लीन" तो नहीं रहे मनमोहन !

आजाद भारत की ये पहली सरकार होगी जो इस कदर भ्रष्ट है। मनमोहन सिंह की अगुवाई में सरकार का प्रदर्शन तो दो कौड़ी का रहा ही, संवैधानिक संस्थाओं को भी कमजोर करने की साजिश की गई। चोरी पकड़े जाने पर केंद्र सरकार के मंत्रियों ने सीएजी के खिलाफ बातें कीं, सीबीआई के दुरुपयोग का मामला सबके सामने है। यूपीए-2 में प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, रेल मंत्रालय, संचार मंत्रालय, कोयला मंत्रालय और कानून मंत्रालय समेत कई और मंत्रालयों की भूमिका संदिग्ध पाई गई और मंत्रियों पर भी गंभीर आरोप लगे। साफ-साफ तो ये भी दिखाई दे रहा है कि सरकार के लिए जरूरी संख्या भी इस समय यूपीए-2 के पास नहीं है। लेकिन सीबीआई है तो सरकार को कोई खतरा भी नहीं है। अब सरकार को मैं क्या नंबर दूं या आप खुद ही पढि़ए उनका रिपोर्ट कार्ड और जरूरत समझें तो दे दीजिए नंबर भी। अब  नंबर दे ही दिया है तो मुझे भी बता दीजिए कि 10 में कितने नंबर दिए आपने ?

केंद्र की यूपीए-2 की सरकार बस दो दिन बाद यानि 22 मई को अपने चार साल पूरे करने जा रही है। वैसे तो यूपीए-2 शुरू से ही विवादों में रही है, लेकिन पिछले एक साल से सरकार की इतनी छीछालेदर हो चुकी है कि अब प्रधानमंत्री समेत किसी भी मंत्री की दो पैसे की  विश्वसनीयता नहीं रह गई है। बता रहे हैं कि आजकल कांग्रेस के दिग्गज काफी परेशान हैं, वजह ये कि उन्हें सरकार के चार साल का रिपोर्ट कार्ड तैयार करने की जिम्मेदारी गई गई है। कहा गया है कि रिपोर्ट कार्ड ऐसा हो, जिससे देश में सरकार की एक साफ सुथरी छवि बने। अंदर की बात तो ये है कि पार्टी में पहले तो इसी बात को लेकर काफी समय तक विवाद रहा कि ये रिपोर्ट कार्ड कौन तैयार करेगा ? सरकार बनाएगी रिपोर्ट कार्ड या फिर पार्टी के नेताओं को ये जिम्मेदारी दी जाए ? बताते हैं कि पार्टी नेताओं ने तो रिपोर्ट कार्ड कि जिम्मेदारी लेने से मना ही कर दिया था, खुल कर तो कोई बोलता नहीं है, लेकिन उनका मानना यही था कि " गोबर " सरकार के मंत्री करते फिरें और वो उसे साफ करते रहें, ऐसा कब तक चलेगा ? बहरहाल अब नाव को डूबती देख सब मिल जुल कर रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। खैर उनकी रिपोर्ट तो दो दिन बाद आएगी, लेकिन 48 घंटे पहले मैं जारी कर रहा हूं सरकार का रिपोर्ट कार्ड बोले तो इस सरकार का असली चेहरा !

सबसे बड़ा सवाल ! अगर  कोई मुझसे पूछे कि इस सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी आप क्या मानते हैं ? मेरा सीधा सा जवाब होगा कि " जो सरकार चार महीने देश पर शासन करने के लायक नहीं थी, उसने चार साल पूरा किया, यही इस सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी है "। मुझे याद है कि यूपीए-2 सरकार के शपथ ग्रहण के पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बहुत कोशिश की कि उनकी सरकार मे डीएमके कोटे से ए. राजा और टीआर बालू को मंत्री न बनाया जाए। मनमोहन सिंह इन दोनों को अपनी सरकार में लेने के बिल्कुल खिलाफ थे। लेकिन टीआर बालू को तो मंत्री न बनाने पर डीएमके प्रमुख करुणानिधि तैयार हो गए, पर राजा के मामले में वो पीछे हटने को एकदम तैयार नहीं हुए। बल्कि डीएमके ने ना सिर्फ राजा को मंत्री बनाने पर जोर दिया, बल्कि उन्हें टेलीकम्यूनिकेशन मंत्रालय ही दिया जाएगा, ये भी सोदैबाजी हुई। ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि डीएमके और राजा के सामने प्रधानमंत्री ने उसी समय घुटने टेक दिए थे, उन्हें मंत्री बनाना और मनचाहा विभाग देना मनमोहन सिंह की मजबूरी थी। आसान शब्दों में कहा जाए कि मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए डीएमके से ये "डील" शपथ लेने के पहले की  तो गलत नहीं होगा। अब पद की गरिमा होती है, वरना प्रधानमंत्री जानते हैं कि अगर रेल मंत्रालय उस वक्त ममता बनर्जी को नहीं देते तो उन्हें तृणमूल कांग्रेस का भी समर्थन नहीं मिलता। सच्चाई ये है कि मंत्रालय के नाम पर सभी दलों से प्रधानमंत्री को समझौता करना पड़ा। दरअसल सरकार के शपथ के पहले ही पार्टी और सहयोगी दलों ने मनमोहन सिंह को जिस हद तक घुटनों पर ला खड़ा किया था, मुझे लगता है कि मनमोहन सिंह की जगह कोई दूसरा आदमी होता तो वो प्रधानमंत्री बनने से साफ इनकार कर देता। लेकिन इस बात के तमाम उदाहरण है कि अपने प्रधानमंत्री को कुर्सी बहुत प्यारी हो और इसके लिए वो हर कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं।

सरकार के रिपोर्ट कार्ड में सीबीआई के इस्तेमाल की चर्चा ना की जाए तो मुझे लगता है कि रिपोर्ट कार्ड मुकम्मल नहीं होगी। अब देखिए सरकार के दो सबसे बड़े घटक दल यानि डीएमके और टीएमसी सरकार से समर्थन वापस लेकर बाहर हो गए, फिर भी सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। वजह आप जानते ही है, फिर भी मैं बता देता हूं। यूपी में ही नहीं बल्कि कहें कि राजनीति में एक दूसरे के कट्टर विरोधी मुलायम सिंह यादव और मायावती दिल्ली की सरकार के साथ बुरी तरह चिपके हुए है। मुंह खोलने की हिम्मत नहीं है इन नेताओ में। इसकी वजह केंद्र की सरकार का बढि़या काम नहीं है, बल्कि सीबीआई का डंडा है। दोनों के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति  का मामला विचाराधीन है। बेचारे मुलायम सिंह तो अपना दर्द छिपा भी नहीं पाते हैं, उन्होंने तो कई मौंको पर कहा कि समर्थन वापस लें तो ये सरकार हमारे पीछे सीबीआई को लगा देगी। अब ये अलग बात है कि जिस सीबीआई के दम पर केंद्र की सरकार चल रही है, वही सीबीआई आज प्रधानमंत्री के गले की ऐसी हड्डी बन गई है, जिसे ना वो निगल पा रहे हैं और ना ही उगल पा रहे हैं। सच तो ये है कि कहीं अगले चुनाव में कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई तो यही मनमोहन सिंह बेचारे सीबीआई मुख्यालय में कोल ब्लाक आवंटन के मामले में पूछताछ के लिए तलब  होते रहेंगे। बहरहाल आज तो ये कहा ही जा सकता है कि दो बड़े दल उनका समर्थन छोड़कर चले गए, लेकिन उन्होंने सरकार पर आंच नहीं आने  दी।

मुझे इंतजार है प्रधानमंत्री के जवाब का। एक समय में यही मनमोहन सिंह "मिस्टर क्लीन" कहे जाते थे। आज उन्हें लोग "अलीबाबा 40 चोर" कह रहे हैं। कोई "चोरों का सरदार" बता रहा है। ईमानदारी की बात तो यही है कि उनकी मिस्टर क्लीन की छवि अब पूरी तरह समाप्त हो गई है। यूपीए-2 सरकार में शुरू से ही विवादों का सिलसिला शुरू हो गया। कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर सुरेश कलमाड़ी को और टूजी मामले में सरकार के कैबिनेट मंत्री ए. राजा को जेल जाना पड़ा। इतना ही नहीं गठबंधन की सांसद कनिमोझी तक जेल गईं। ये ऐसा घोटाला था कि सरकार पूरी तरह बैकफुट पर आ गई, लेकिन प्रधानमंत्री ने इसे गठबंधन की मजबूरी बताकर पूरा दोष डीएमके पर मढ़ने की कोशिश की। इसी बीच आदर्श सोसायटी घोटाले में महाराष्ट्र के उस वक्त मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण कटघरे में आ गए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। ये घटना भी सरकार की छवि खराब करने के लिए काफी थी। लोकपाल के लिए अन्ना के आंदोलन से भी सरकार की छवि खराब हुई जबकि रामदेव के आंदोलन को पुलिस के बल पर कुचलने से देश भर मे तीखी प्रतिक्रिया हुई। दिल्ली में गैंग रेप कांड से भी सरकार की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

टूजी घोटाले को लेकर सरकार बुरी तरह घिरी हुई थी, संसद और सड़क तक प्रदर्शन हो ही रहे थे। इसी बीच जेल से बाहर आए पूर्व मंत्री ए राजा ने साफ किया कि उन्होंने जो भी फैसले लिए उन सबकी जानकारी वित्तमंत्री पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को थी। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसकी जानकारी इन दोनों नेताओं को पहले से ना रही हो। अगर राजा की ये बात सच है तो प्रधानमंत्री को अपनी रिपोर्ट कार्ड में इसका भी खुलासा करना होगा। खैर टूजी को लेकर प्रधानमंत्री घिरे ही थे कि इस बीच कोयला घोटाला सामने आ गया। इस घोटाले में तो साफ-साफ कहा गया कि कोल ब्लाक आवंटन में पीएमओ शामिल है और जिस दौरान ये आवंटन हुए थे, उस समय कोयला मंत्रालय भी प्रधानमंत्री के ही पास था। मामला काफी उलझा हुआ था, आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की जांच सीबीआई को दी। सीबीआई की स्टे्टस रिपोर्ट में छेड़छाड़ की साजिश का पर्दाफाश होने के बाद बेचारे कानून मंत्री अश्वनी कुमार को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालाकि विपक्ष प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग रहा है, क्योंकि कानून मंत्री तो प्रधानमंत्री को ही बचाने के लिए सीबीआई की रिपोर्ट में बदलाव करा रहे थे, मैं भी इस बात से समहत हूं कि अब प्रधानमंत्री को जांच होने तक पद पर रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। हेलीकाफ्टर घोटाले में भी सरकार की काफी किरकिरी हुई है। सेना के मामले में ज्यादा चर्चा नहीं हो पाई, लेकिन ट्रकों का सौदा काफी विवादित रहा है। रेलवे में प्रमोशन के लिए घूसखोरी में रेलमंत्री का भांजा रंगेहाथ पकड़ा गया, इसके बाद विपक्ष और मीडिया के भारी शोर-शराबे के बाद रेलमंत्री का इस्तीफा हुआ।

मनमोहन सरकार की कमजोरी और अनुभवहीता विदेश नीति के मामले में भी देखने को मिली। सरकार दावा करती है कि अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी से रिश्ते बेहतर हुए हैं, लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि पड़ोसी देशों के साथ हमारे रिश्ते क्यों लगातार खराब होते जा रहे हैं ? पाकिस्तानी सीमा पर तो तनाव बना ही रहता था अब चीन की सीमाएं भी सुरक्षित नहीं रहीं। यहां तक की श्रीलंका, मालदीव देशों के साथ भी हमारी कूटनीति कमजोर साबित हुई है। मैं पूछना चाहता हूं कि पाकिस्तान के साथ सीमा पार से आतंकवाद का मामला हो या फिर पाक सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों की हत्या और फिर सिर काट ले जाने जैसी अपमान की घटना, इतना ही नहीं सरबजीत की रिहाई का मामला, हर बार पाक सरकार भारत सरकार की कोशिशों पर पानी फेरती रही। लेकिन हम राजदूत को तलब कर आपत्ति जताने के अलावा कुछ नहीं कर पाए। आज देखा जा रहा है कि चीन के सैनिक भी भारतीय सीमा में लगातार घुसपैठ कर रहे हैं, हम अपने सीमावर्ती इलाके में विकास के काम तक नहीं कर पा रहे हैं। हालात ये है कि बीजिंग में दिल्ली की शिकायतें रद्दी की टोकरी में डाल दी जा रही हैं,  इसे सरकार की नाकामी नहीं तो भला क्या कहा जाए ?

मुझे लगता है कि पड़ोसी मुल्कों से बेहतर रिश्ते की उम्मीद इस सरकार से करना बेईमानी है। ये सरकार देश मे राज्यों के साथ मतभेद करती है। कई बार ऐसे मामले देखने को मिले  जहां केंद्र व राज्य सरकार के बीच दूरियां साफ नजर आईं। जहां राज्यों द्वारा संघीय ढांचे की दुहाई देकर केंद्र सरकार के एनसीटीसी बिल की राह में रोड़ा अटकाया गया, वहीं दूसरी ओर राज्यों के विरोध के चलते केंद्र सरकार अब तक आरपीएफ बिल नहीं ला पा रही। एनसीटीसी मामले पर तो मोदी, नीतीश, ममता, जयललिता, नवीन पटनायक मुख्यमंत्री केंद्र सरकार के खिलाफ बाकायदा लामबंद हो गए थे। राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति और एफडीआई को लेकर भी कई बार टकराव देखने को मिला, जिस तरह एफडीआई के मसले पर राज्यों की अनदेखी की गई, वही केंद्र और राज्यों के संबंधो को बताने के लिए पर्याप्त है।

आखिर में बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र की। देश को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री कमजोर ही सही, लेकिन उनके रहने से देश की अर्थव्यवस्था तो मजबूत रहेगी। मेरा तो मानना है कि इस मोर्चे पर भी मनमोहन सिंह फेल रहे हैं। हालाकि ये बात तो सही है कि  मंदी के दौर में जहां दुनिया की बड़ी-बड़ी इकॉनामी गच्चा खा गईं, वहीं सरकार ने एक के बाद एक एहतियाती कदम उठाकर देश की अर्थव्यवस्था को संभाले रखा। इस दौरान जहां अमेरिका की ग्रोथ रेट 1 से 2 फीसदी और यूरोपीय देशों की जीडीपी 1 फीसदी से भी कम हो गई थी, वहीं देश की ग्रोथ रेट 6 फीसदी और उससे ज्यादा बनी रही। लेकिन सरकार बढ़ती महंगाई पर रोक नहीं लगा पाई, जो प्रधानमंत्री और सरकार की एक बड़ी कमजोरी मानी गई। कृषि उत्पादों की मांग और आपूर्ति में आया अंतर, डीजल और पेट्रोल जैसे पदार्थों में हुए डिकंट्रोल ने महंगाई की दर को नई गति दी। बढ़ती कीमतें जनता की जेब पर भारी बोझ साबित हुई। एलपीजी पर सब्सिडी की वापसी ने महिलाओं के घरेलू बजट को बिगाड़ कर रख दिया। योजना आयोग ने गरीबों की थाली के रेट निर्धारण में हकीकत की अनदेखी कर गरीबों की गरीबी का मजाक बनाया।

बहरहाल विपक्ष के निशाने पर तो प्रधानमंत्री काफी पहले से थे, लेकिन पिछले दिनों आरोपी कानून मंत्री और रेलमंत्री के इस्तीफे के मामले में कांग्रेस की ओर से ऐसे संकेत दिए गए कि इस्तीफा ना होने से सोनिया गांधी बहुत नाराज है, इससे लगा कि मनमोहन सिंह ही इन दोनों को बचा रहे हें। इस संदेश के बाद तो प्रधानमंत्री की रही सही गरिमा भी खत्म हो गई। बहरहाल प्रधानमंत्री की नाराजगी के बाद अब पूरी पार्टी जरूर बैकफुट पर है। कहा तो जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने चार पांच महीनों में कई बार अपने इस्तीफे की पेशकश की है, लेकिन मुश्किल ये है कि जिसे सोनिया गांधी चाहती हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाए, वो सरकार का बोगडोर थामने को तैयार नहीं है, जो तैयार हैं उनकी छवि पहले ही इतनी खराब है कि वो सरकार की नइया भला क्या पार लगाएंगे। रही बात राहुल  गांधी की वो ऐसा काम चाहते हैं, जहां जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए, काम हुआ तो ठीक, नहीं हुआ तो भी ठीक। आसान भाषा में कहूं तो वो ऐसा काम चाहते हैं कि हर्रे लगे ना फिटकरी, बस रंग चोखा ! रिपोर्ट कार्ड में कुछ छूट गया हो तो कृपया आप पूरा कर दें।





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गुरुवार, 16 मई 2013

To LoVe 2015: IPL बोले तो इंडियन पाप लीग !


 वैसे तो मेरा हमेशा से मानना है कि इंडियन प्रीमियर लीग यानि आईपीएल की बुनियाद ही चोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, अश्लीलता पर टिकी हुई है, लेकिन इससे भला हमें या आपको क्या लेना देना। हम तो आज की भागमभाग जीवनचर्या से बिल्कुल थक गए हैं, इसीलिए इस छोटे फार्मेट का क्रिकेट मैंच पसंद करते हैं। ये मैच हमारी थकान को खत्म भले ना पाएं, लेकिन कम तो जरूर करता है। मैं तो इस टूर्नामेंट का ऐसा दीवाना हूं कि देर रात तक मैच तो देखता ही हूं, सुबह जल्दी उठकर अखबार का इंतजार भी करता हूं कि मैच की रिपोर्टिंग कैसे की गई है। मुंबई इंडियन हमारी फेवरिट टीम है, बुधवार की रात हुए एक नीरस मैच में उसने राजस्थान रायल्स को हराया और अंक तालिका में सबसे ऊपर पहुंच गई। ऐसे में थोड़ा शुकून महसूस किया और चैन की नींद सोया, लेकिन सुबह टीवी की एक खबर ने मैच का मजा किरकिरा कर दिया। खबर ये कि स्पाँट फिक्सिंग के मामले में पूर्व टेस्ट क्रिकेटर श्रीसंत समेत दो और खिलाड़ी पुलिस के हत्थे चढ़ गए।  हालांकि इस खबर से कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि क्रिकेट में अब स्पाँट फिक्सिंग कोई नई बात नहीं रह गई है। इसीलिए अगर आईपीएल को "इंडियन पाप लीग" कहा जाए तो मैं समझता हूं इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

बहरहाल दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़े फिक्सर क्रिकेटर श्रीसंत, अंकित चह्वाण और अजित चंडिला को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने निलंबित कर दिया और ऐलान किया कि ये तीनों जांच पूरी होने तक निलंबित ही रहेंगे। वैसे बीसीसीआई के इस कदम से थोड़ी हैरानी हुई। मसलन उसने केवल तीन खिलाड़ियों को निलंबित कर इस पूरे मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। सफाई में रटारटाया बयान आया कि कुछ खिलाड़ियों की वजह से पूरे आईपीएल पर उंगली उठाना सही नहीं होगा। मेरा तो मानना है कि बीसीसीआई को और सख्त कदम उठाना चाहिए था, मसलन तीनों खिलाड़ी एक ही टीम यानि राजस्थान रायल्स से जुड़े हैं, ऐसे में क्यों नही राजस्थान रायल्स को इस टूर्नामेंट से बाहर किया गया ? पुरानी बात नहीं है, रेलमंत्री पवन कुमार बंसल का भांजा रेलवे में ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए घूस लेते पकड़ा गया तो देश भर से मांग उठी कि नैतिकता के आधार पर रेलमंत्री को इस्तीफा देना चाहिए। ऐसे में नैतिकता का तकाजा तो यही है कि राजस्थान रायल्स को भी नैतिकता के आधार पर इस टूर्नामेंट में अयोग्य घोषित करते हुए बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। इसकी नैतिक जिम्मेदारी क्यों नहीं शिल्पा सेट्टी और उनके पति राज कुंद्रा को लेनी चाहिए ?

देश में आज क्रिकेट एक धर्म बन गया है, करोड़ों भारतीय आज क्रिकेट को अपना धर्म मानते हुए क्रिकेटरों को पूजने तक लगे हैं । आप देखिए ना सचिन तेंदुलकर को हम सब क्रिकेट का भगवान कहते हैं। ऐसे में अगर धर्म पर हमला हो तो भला इसे हम कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं ? बहरहाल आज क्रिकेट में जितना पैसा इन्वाल्व है, हम आसानी से इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। छोटा सा उदाहरण ले लेते हैं, मैच के दौरान क्रिकेटर जो जर्सी पहनते हैं, उसका कोना-कोना बिका होता है। मतलब वो मैदान में जो जर्सी पहनते हैं, वो साधारण जर्सी भर नहीं है। इसमे दारू, बिल्डर, हवाई जहाज, फोन, जूते, कोल्ड ड्रिंक्स, बैंकिग भर ही नहीं कच्छा बनियान तक के विज्ञापन देखे जा सकते हैं। इसके बाद भी इन खिलाडि़यों में पैसे की भूख बनी हुई है। मैने देखा कि जब तीन खिलाडि़यों को आज पुलिस ने गिरफ्तार किया तो तमाम क्रिकेट प्रेमी हैरान थे, कुछ ने मुझे भी फोन किया और पूछा कि क्या ये सब सही है, या दिल्ली पुलिस अपने ऊपर लगे आरोपों से जनता का ध्यान बांटने के लिए साजिश कर रही है। अब ये सही है या गलत, ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि दिल्ली पुलिस अपनी छवि सुधारने के लिए कम से कम ये काम तो नहीं ही कर सकती।

वैसे आईपीएल में गंदगी के लिए काफी हद तक फ्रैंचाइजी और हमारी मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। मीडिया में जिस तरह से इस आईपीएल की कवरेज हो रही है, मुझे लगता है कि ये ज्यादा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा है। हैरानी तब होती है जब इन खिलाड़ियों के नीलामी के लिए बकायदा मंडी सजती है और मीडिया इनकी नीलामी को भी पूरे दिन बड़े ही शिद्दत से कवर करती है। अब गौतम गंभीर 12 करोड़ में बिके या फिर दो करोड़ में इससे भला आम आदमी को क्या लेना देना है ? लेकिन मीडिया ने आज हर खिलाड़ी की कीमत तक सार्वजनिक कर दी है। हमें पता है कि नीलामी में कुछ लोग खिलाड़ी के नाम पर कीमत लगाते हैं, कुछ खिलाड़ी के खेल के आधार पर कीमत लगाते हैं। ईमानदारी से देखा जाए तो हैदराबाद की टीम में एक दो को छोड़ दें तो कोई बड़ा चेहरा नहीं है, लेकिन टीम का प्रदर्शन शाहरुख खान की टीम केकेआर से कहीं बेहतर है। आज की तारीख में सचिन तेंदुलकर क्रिकेट में बहुत बड़ा नाम भर है, अगर उनका प्रदर्शन आईपीएल 6 में देखा जाए तो टाप 10 में भी वो कहीं नहीं टिकते। यहां तक कि अपनी टीम में ही उनका प्रदर्शन छठें सातवें नंबर पर भी नहीं है। लेकिन वो क्रिकेट के बड़े आदमी हैं, लिहाजा देश के सबसे बड़े उद्योगपति की टीम में वो शामिल रहेंगे ही, ये तो अंबानी बंधुओं के भी नाक का सवाल बन जाता है।

एक बहुत गंदा काम जो आईपीएल में हो रहा है, जिसके लिए सभी टीमों के फ्रैंचाइजी जिम्मेदार है, ये मसला आज भले नहीं लेकिन कल देश में एक बड़ा मुद्दा बनने वाला है। आपको याद होगा कि आईपीएल की शुरुआत में चीयर गर्ल्स को लेकर बहुत विवाद हुआ। कुछ राजनैतिक दलों के साथ ही सामाजिक संगठनों ने इनके डांस क्या इनकी मौजूदगी पर ही सवाल खड़े किए। लेकिन पैसे की ताकत के आगे किसी की एक नहीं चली और आज भी मैच के दौरान इन चीयर गर्ल्स का फूहड डांस बेरोक टोक जारी है। हमें याद है कि कुछ चीयर गर्ल्स शारीरिक शोषक का भी आरोप लगा चुकी हैं, फिर भी ये रास लीला बंद नहीं हुई। मैं आईपीएल कमिश्नर से एक सवाल पूछता हूं। चेन्नई में माहौल ठीक ना होने की वजह से श्रीलंका के खिलाड़़ियों को चेन्नई में खेलने से रोकने में किसी को कोई तकलीफ नहीं हुई, ना आईपीएल कमिश्नर को, ना बीसीसीआई को और ना ही टीम की फ्रैंचाइजी को। लेकिन तमाम विरोध के बाद भी 10 ग्राम कपड़ों में इन चीयर गर्ल्स के नाचने पर कहीं रोक नहीं लगाया गया। मतलब माहौल ठीक ना होने पर खिलाड़ी तो बाहर हो सकते हैं, पर ये चीयर गर्ल्स नहीं ! अब आईपीएल का सबसे बड़ा पाप बताऊं ? विदेशी खिलाड़ियों ने जान लिया कि ये तो क्लब मैच है, यहां मजे लो और रंगरेलिया मनाओ। देश की एक अपनी सभ्यता और संस्कृति है, लेकिन इन सबको हम ताक पर रखकर विदेशी खिलाडियों को यहां रंगरेलिया मनाने की सुविधा दे रहे हैं। हालत ये है कि दर्जनों विदेशी खिलाड़ी यहां अपनी पत्नी के बजाए "गर्ल फ्रैंड" यानि महिला मित्र को साथ लेकर भारत आए हैं और फ्रैंचाइजी उन्हें अय्याशी के लिए उचित सुविधा दे रहे हैं।

खैर बाकी बातें बाद में करेंगे, आज क्रिकेट के कलंक पर ही थोड़ी और चर्चा कर लें। हम सब जब टीवी के सामने होते हैं तो गेंदबाजी और बल्लेबाजी देखते हैं। हमने तो आज तक ये नहीं सोचा था कि क्रिकेटर अगर अपने गले में पहने लाकेट को बाहर करता है तो वो बुकी बोले तो दलाल को कुछ संदेश दे रहा है। अगर हाथ में पहने घड़ी को घुमाता है तो वो कोई इशारा कर रहा है। अगर अपनी जर्सी से मुंह पोछता है तो ये उसका कोड वर्ड है। अगर वो तौलिये के साथ गेंदबाजी करता है तो इसका मतलब कुछ है और तौलिया हटा देता है तो इसका मतलब कुछ और हो जाता है। इशारों में होने वाली बात का खुलासा आज दिल्ली पुलिस ने किया तो सच कहूं मैं तो दंग रह गया। मैदान में होने वाली इन हरकतों पर ये खिलाड़ी करोडों का वारा न्यारा करते हैं और हम सोचते हैं कि बेचारा कितना मेहनत कर रहा है कि पसीने-पसीने हो गया। जबकि वो पसीना बहाने का पैसा फ्रैंचाइजी से और पसीना पोछने का पैसा देश के बाहर बैठे दल्लों से वसूलता है।


दो बातें क्रिकेटर श्रीसंत की। केरल के क्रिकेट खिलाड़ी और तेज़ गेंदबाज़ श्रीसंत की गणना उन खिलाड़ियों में होती है जो हमेशा विवादों में रहता है। सच तो यही है कि अपने व्यवहार की वजह से ही वो भारतीय टीम से बाहर है। कहा जा रहा है कि उसके इसी गंदे व्यवहार के कारण ही कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से संबंध बहुत मधुर नहीं है। श्रीसंत के गिरफ्तार होने के बाद उसके परिवार वालों ने धोनी और भज्जी पर आरोप लगाया कि इसके पीछे उनकी साजिश है। मुझे हैरानी ये जानकर भी हुई कि उसे खेल के मैदान में भज्जी ने थप्पड़ मारा भी या नहीं, ये थप्पड़ भी फिक्स बताया जा रहा है। श्रीसंत ने खुद ही एक ट्विट के जरिए अपने थप्पड़ पर विवाद खड़ा कर दिया। क्रिकेट प्रेमियों को याद होगा कि 2008 में एक आईपीएल मैच के दौरान हरभजन सिंह के कथित चाँटे के बाद वो कैमरे पर फूट-फूट कर रोता दिखाई दिया और बाद में उसने एक ट्विट करके कहा कि वो सब योजनाबद्ध था और उन्हें चाँटा मारा ही नहीं गया। बहरहाल श्रीसंत तो हमेशा विवादित रहा है, सच कहूं तो अब उसकी बातों को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत भी नहीं है। मेरा मन कहता है कि वो पैसे के लिए अब कुछ भी कर सकता है।

वैसे मुझे इन दो खिलाडि़यों से जरूर सहानभूति है। मैं नहीं जानता कि स्पाँट फिक्सिंग में ये शामिल हैं या नहीं। लेकिन अंकित अनिल चव्हाण और अजीत चंडीला दोनों ही रणजी खिलाड़ी हैं । बाएँ हाथ के बल्लेबाज़ अंकित मुंबई के लिए खेलते हैं जबकि अजीत चंडीला हरियाणा के लिए मैदान में उतरता है। अभी इनका क्रिकेट में इनका बहुत कैरियर है, ऐसे में ये खेल पर ध्यान देने के बजाए पैसे की ओर भागेंगे,  मुझे तो नही लगता, पर अब तो क्रिकेट मैदान में नहीं सट्टेबाजों की टेबिल पर खेली जाती है। कहा जा रहा है कि आईपीएल में 40 हजार करोड़ का सट्टा दांव पर लगा है। सट्टेबाज आईपीएल 6 का चैंपियन अभी से मुंबई इंडियन को बता रहे हैं, अगर कुछ ऐसा होता है तो मुझे भी लगेगा कि हां ये खेल मैदान में नहीं होता है बल्कि ये सट्टेबाजों की टेबिल पर होता है। चलिए हम सब इंतजार करते हैं, अब तो आईपीएल आखिरी दौर में पहुंच ही चुका है।






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शुक्रवार, 10 मई 2013

To LoVe 2015: सोनिया से नाराज प्रधानमंत्री को मनाने की कोशिशें तेज !


सोनिया गांधी और पार्टी के रवैये से नाराज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मनाने की कवायद शुरू हो गई है। इसी क्रम में आज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव जनार्दन दि्वेदी ने सफाई दी कि कानून मंत्री अश्वनी कुमार और रेलमंत्री पवन कुमार बंसल को हटाने का फैसला सिर्फ सोनिया गांधी का नहीं बल्कि प्रधानमंत्री का भी था। राष्ट्रीय महासचिव को ये सफाई इसलिए देनी पड़ी है कि प्रधानमंत्री ने दो दिन पहले 7  आरसीआर पहुंची सोनिया गांधी से इस बात को लेकर सख्त नाराजगी जताई थी कि उनके खिलाफ पार्टी के कुछ नेता मीडिया  में माहौल बना रहे हैं। मीडिया के जरिए देश में ऐसा संदेश जा रहा है कि सोनिया गांधी तो दागी मंत्रियों का इस्तीफा लेना चाहती  हैं, जबकि प्रधानमंत्री ही उन्हें बचा रहे हैं। पार्टी नेताओं के इस रवैये से प्रधानमंत्री इतने ज्यादा भड़के हुए थे कि उन्होंने सोनिया गांधी से साफ कह दिया कि अब वो मंत्रियों से इस्तीफा नहीं लेंगे, पूरे मामले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए खुद प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे देंगे। प्रधानमंत्री की दो टूक बातों से सोनिया हैरान हो गईं थी और उल्टे पांव 10 जनपथ लौट गईं। बाद में उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के जरिए इस मामले में फिलहाल तात्कालिक हल तो निकाला गया है, लेकिन अभी अंदरखाने खेल चालू है। प्रधानमंत्री की नाराजगी को कम करने के लिए फिलहाल जनार्दन दि्वेदी ने ये बयान देकर पहल शुरू कर दी है।

सच्चाई ये है कि सोनिया गांधी को लग रहा था कि अगर दागी मंत्रियों से इस्तीफा लिया गया तो देश में ऐसा मैसेज जाएगा कि सरकार ने विपक्ष के सामने घुटने टेक दिए। इसलिए सोनिया ने ही साफ-साफ कहा था कि सरकार और पार्टी को आक्रामक रुख अपनाना होगा, और विपक्ष के आगे कत्तई नहीं झुकना है। अंदर की बात तो ये है कि जब सफाई देने के लिए पूर्व रेलमंत्री पवन कुमार बंसल ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के सामने अपनी बात रखी और कहाकि उनके ही रिश्तेदारों ने उनकी पीठ में छुरा  भोका है, उनका इस रिश्वतखोरी में कोई हाथ नहीं है, तो बंसल के साथ ही सोनिया गांधी भी भावुक हो गईं थी। वो तो भला हो मीडिया का जिसने बंसल और उनके परिवार की अकूत संपत्ति का खुलासा किया और बताया कि कुछ सालों  में ही बंसल अकूत संपत्ति के मालिक कैसे हो गए ? तब जाकर सोनिया गांधी की आंख खुली और तय हुआ कि रेलमंत्री का इस्तीफा लिया जाना चाहिए।

आपको बता दूं प्रधानमंत्री की नाराजगी कि ये खबर अभी तक बाहर नहीं आ सकी है, लेकिन अगर आप मेरे ब्लाग "आधा सच"  के नियमित पाठक हैं तो आपने देखा होगा कि ये बात दो दिन पहले ही मेरे ब्लाग पर मौजूद है। आज कांग्रेस की ओर से आई सफाई से ये बात साफ हो गई है कि प्रधानमंत्री अब आक्रामक हैं और वो किसी तरह की बुराई अपने सिर लेने के लिए तैयार नहीं हैं। 


प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी को सुनाया खरी-खरी 

रेलमंत्री पवन कुमार बंसल और कानून मंत्री अश्वनी कुमार का इस्तीफा लेने में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के पसीने छूट गए। सियासी गलियारे में चर्चा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब अपना पाप धोना चाहते हैं, इसलिए आज पूरे रंग में थे। इसीलिए मंत्रियों के इस्तीफे के सिलसिले में 7 आरसीआर यानि प्रधानमंत्री आवास पहुंची सोनिया गांधी को मनमोहन सिंह ने धीरे-धीरे ही सही लेकिन खूब खरी-खरी सुनाई। वैसे जब मैने सुना कि प्रधानमंत्री आज गरम हो रहे थे तो मुझे पहले तो बिल्कुल यकीन नही हुआ। लेकिन सोनिया के जाने के बाद भी जब तीन घंटे बीत गए और मंत्रियों का इस्तीफा नहीं हुआ तो लगा कि  मामला गड़बड़ है। बताते हैं कि प्रधानमंत्री इस बात से खासे नाराज थे कि सोनिया गांधी के करीबी नेताओं ने न्यूज चैनलों के जरिए एक साजिश के तहत देश भर में ये संदेश पहुंचाने की कोशिश की कि वो यानि प्रधानमंत्री दागी मंत्रियों को बचा रहे हैं, जबकि सोनिया चाहती हैं कि  इन मंत्रियों का तुरंत इस्तीफा ले लिया जाए। गुस्से से लाल प्रधानमंत्री ने यूपीए अध्यक्ष को साफ कर दिया कि इससे सरकार की और पार्टी छवि तो खराब हुई ही है, साथ ही लोग उनके ऊपर भी उंगली उठा रहे हैं। जनता को लग रहा है कि बेईमान मंत्रियों को प्रधानमंत्री आवास से संरक्षण मिलता है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मनमोहन सिंह ने तय कर लिया है कि अब कुर्सी कल जाती हो तो आज चली जाए, लेकिन वो अपनी ईमानदारी पर किसी प्रकार का बट्टा नहीं लगने देंगे। सब को पता है कि कांग्रेस का चरित्र रहा है कि 10 जनपथ यानि गांधी परिवार के निवास को वो मंदिर की तरह पूजते हैं जबकि 7 आरसीआर उनकी नजर में एक ऐसा धर्मशाला है जहां कोई भी आ सकता है और कितनी भी गंदगी कर सकता है। लेकिन मनमोहन सिंह अब 7 आरसीआर को धर्मशाला बनाने के लिए तैयार नहीं है।


दिल्ली में शुक्रवार को राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदलता रहा। आप सब जानते हैं कि कोल ब्लाक आवंटन के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने केंद्र सरकार को बैकफुट पर ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि सीबीआई तोते की तरह काम कर रही है, वो वही भाषा बोलती है जो उसके मालिक यानि सरकार के मंत्री उसे सिखाते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सरकार का तोता कह दिया तो इतना हाय तौबा मच गया, पूरा देश जानता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए तोते ही तो हैं। बेचारे ये भी तो उतना ही बोला करते हैं जितना सिखाया और सुनाया जाता है। खैर मामला इस लिए बिगड़ा कि कोल ब्लाक आवंटन के मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को दी थी और साफ किया था कि ये रिपोर्ट सीधे उसे ही सौंपी जाए। लेकिन कांग्रेस कल्चर में चंपुई तो बहुत जरूरी है ना। बस फिर क्या, 10 जनपथ के गुडबुक में आने के लिए कानून मंत्री ने सीबीआई अधिकारियों को ड्राफ्ट रिपोर्ट के साथ तलब कर लिया और इस रिपोर्ट में तमाम हेरा फेरी करा दी। बात खुली तो सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा कि रिपोर्ट में उसकी आत्मा के साथ छेडछाड़ किया गया है। चूंकि इसमें पीएमओ यानि प्रधानमंत्री कार्यालय भी शामिल था, लिहाजा आरोप प्रधानमंत्री पर भी लगा। हालात ये हुई कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग लिया। अभी ये मामला चल ही रहा था कि रेलवे में बड़े पदों पर तैनाती को लेकर पवन बंसल मुश्किल में फंस गए। उनका भांजा घूस लेते रंगे हाथ पकडा गया। बस फिर क्या था, विपक्ष को मौका मिल गया और उसने दोनों मंत्रियों के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद को ठप कर दिया।

बताते हैं कि पार्टी और सरकार की लगातार किरकिरी से सोनिया गांधी परेशान हो गईं। जैसा कि गांधी परिवार की आदत है कि जो कुछ अच्छा हो वो गांधी परिवार के खाते में और जो बुरा हो वो 7 आरसीआर के खाते में डाल दिया जाता है। अब देखिए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत का सेहरा पार्टी के नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी के सिर बांधते रहे, जबकि दो दागी मंत्रियों को बचाने का आरोप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर मढ़ते रहे। हालांकि प्रधानमंत्री की ओर से इस मामले में कोई प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई, लेकिन जब  सभी न्यूज चैनलों पर ये खबर चली कि सोनिया गांधी चाहती हैं कि दोनों दागी मंत्रियों को इस्तीफा दे देना चाहिए,  इसे लेकर सोनिया गांधी काफी दुखी हैं। उन्होंने सरकार के कामकाज से नाराजगी भी जाहिर की है। बताते हैं कि 10 जनपथ के हवाले से न्यूज चैनलों पर एकतरफा खबरें चलने से प्रधानमंत्री हैरान हो गए। उन्हें लगा कि पार्टी के नेता एक साजिश के तहत 7 आरसीआर यानि प्रधानमंत्री निवास पर हमला करा रहे हैं, जबकि 10 जनपथ की वाहवाही की की जा रही है। हालाकि सच्चाई क्या है, ये सोनिया ही नहीं कांग्रेस के सभी नेता जानते हैं। बताते है इस खबर से प्रधानमंत्री ना सिर्फ आहत थे, बल्कि उन्होंने अपनी नाराजगी भी कांग्रेस मुख्यालय और 10 जनपथ तक पहुंचा दी।

दरअसल सच ये है कि जब इन दोनों मंत्रियों का विपक्ष ने इस्तीफा मांगा तो उसके बाद कांग्रेस की एक के बाद एक कई बैठकें हुई। इसमें सोनिया समेत पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद थे। बैठक में सोनिया ने ही साफ किया कि इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता, विपक्ष को राजनैतिक स्तर पर आक्रामक शैली में जवाब देने की जरूरत है। सोनिया जी ! एक ओर आप पार्टी नेताओं को आक्रामक शैली में जवाब देने की बात कर रही हैं, दूसरी ओर ये संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि आप दागी मंत्रियों का इस्तीफा ना होने से दुखी हैं। आखिर दोनों बातें कैसे सही हो सकती हैं ?  सच ये है कि जब कांग्रेस नेताओं ने देखा कि दागी मंत्रियो को लेकर देश भर में पार्टी की क्षवि खराब हो रही है और अब तो इसकी छींटे 10 जनपथ तक पहुंच रही हैं। इससे पार्टी के दरबारी नेताओं को लगा कि अब गांधी परिवार को यहां से बेदाग बाहर निकालना जरूरी है, वरना अगले साल चुनाव में ये दाग लेकर जनता के बीच जाना मुश्किल होगा। बस फिर क्या था ? माहौल बनाने के लिए मीडिया का सहारा लिया गया और जनता में ये संदेश देने की कोशिश हुई कि सोनिया बहुत नाराज हैं। वो चाहती हैं कि मंत्रियों का तुरंत इस्तीफा हो जाए। लेकिन प्रधानमंत्री इसके लिए तैयार नहीं तीन दिन तक तो ये खबर न्यूज चैनलों पर चलने से एक माहौल बन गया कि वाकई सोनिया सरकार से बहुत नाराज है। सोनिया ने देखा अब लोहा गरम है तो वो शुक्रवार शाम को प्रधानमंत्री आवास पहुंच गईं। राजनीतिक गलियारे की चर्चा को अगर सही माना जाए तो  प्रधानमंत्री आवास में जो कुछ हुआ, उससे तो खुद सोनिया गांधी ना सिर्फ हैरान रह गईं, बल्कि मनमोहन सिंह के तेवर से उनके पसीने छूट गए।

कहा जा रहा है कि आज की मुलाकात में वो गर्माहट नहीं थी। पता चला है कि प्रधानमत्री इस आरोप से काफी आहत थे कि वो दागी मंत्रियों को बचा रहे हैं, जबकि सोनिया गांधी चाहती हैं कि इनका इस्तीफा हो। शुक्रवार को शाम जब सोनिया गांधी प्रधानमंत्री आवास पहुंची तो सभी न्यूज चैनलों पर खबर चली कि अब दागी मंत्रियों को इस्तीफा देना ही होगा, क्योंकि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री से नाराजगी जाहिर करने उनके आवास पर गई हैं। इस खबर से प्रधानमंत्री और भी भड़के  हुए थे। बताते हैं कि उन्होंने पूरी तरह मन बना लिया कि अब वो दागी मंत्रियों का इस्तीफा नहीं लेंगे, बल्कि खुद ही इस्तीफा दे देंगे। बस फिर क्या था, जैसे ही सोनिया उनके निवास पहुंची, प्रधानमंत्री ने अपनी नाखुशी का इजहार कर दिया। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शायद इसके पहले कभी भी सोनिया गांधी से इस अंदाज में तो बात नहीं ही किया होगा, जैसे उन्होंने आज बात की। उन्होंने सोनिया से साफ कर दिया कि जब आप ही सरकार और प्रधानमंत्री के कामकाज से खुश नहीं हैं तो मेरा प्रधानमंत्री के पद पर बने रहना ठीक नहीं है। इसलिए मैने तय कर लिया है कि मैं खुद ही इस्तीफा दे देता हूं।

सियासी गलियारे में चर्चा है कि मनमोहन सिंह की बात सुनकर सोनिया गांधी हैरान रह गईं। उन्हें लगा कि प्रधानमंत्री की कुर्सी को भला मनमोहन सिंह कैसे ठुकरा सकते हैं, वो तो वही करते रहे हैं जो कहा जाता रहे है, पर इन्हें आज क्या हो गया है ? लेकिन सच ये है कि आज हालात बदले हुए थे, मनमोहन सिंह आक्रामक थे और सोनिया गांधी की हालत "बेचारी" जैसी बनी हुई थी। खैर सोनिया गांधी ये कहकर चली गईं कि दोनों मंत्रियों का इस्तीफा ले लीजिए । बताया जा रहा है कि मनमोहन सिंह ने उन्हें जाते जाते भी यही कहा कि वो मंत्रियों से इस्तीफा नहीं लेंगे, बल्कि खुद इस्तीफा देने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री के रुख से सोनिया गांधी फक्क पड़ गईं, लेकिन उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर किया क्या जाए? निराश होकर सोनिया गांधी चुपचाप यहां से 10 जनपथ पहुंची। यहां पहुंच कर उन्होंने अपने राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल को बुलाया और उनके साथ काफी देर तक पूरे मसले पर चर्चा की। उन्हें बताया कि आज मनमोहन सिंह काफी नाराज हैं, कह रहे हैं कि वो खुद इस्तीफा दे देंगे, लेकिन मंत्रियों से इस्तीफा नहीं लेंगे। दरअसल प्रधानमंत्री ने सोनिया को समझाने की कोशिश की अगर इस्तीफा लेना ही था तो पहले ले लिया जाना चाहिए था, इससे संसद की कार्रवाई भी बाधित ना होती और उन्हें तमाम जरूरी बिल पास कराने में विपक्ष का सहयोग भी मिलता। लेकिन उस समय कहा गया कि विपक्ष की मांग के आगे झुकना नहीं है। संसद को भी समय से पहले स्थगित कर दिया गया। अब कहा जा रहा है कि मंत्रियों का इस्तीफा लिया जाए।

खैर सोनिया गांधी से बात करने के बाद अहमद पटेल प्रधानमंत्री आवाज पहुंचे और उन्होंने मनमोहन सिंह से सभी मसलों पर विस्तार से बात की। मनमोहन सिंह की शिकायत जायज थी। बहरहाल अहमद पटेल से बात करने के बाद कुछ बीच का रास्ता निकाला गया और तय हुआ कि ठीक है वो दोनों मंत्रियों से इस्तीफा ले रहे हैं। रात नौ बजे के करीब पवन बंसल और अश्वनी कुमार प्रधानमंत्री निवास पहुंचे और अपना इस्तीफा उन्हें सौंप दिया। कहा जा रहा है कि तीन घंटे तक प्रधानमंत्री ने 10 जनपथ की चूलें हिला कर रख दीं। उन्होंने साफ कर दिया कि उनकी कुर्सी कल जाती हो तो आज चली जाए, लेकिन वो प्रधानमंत्री आवास की गरिमा के साथ समझौता नहीं कर सकते। अब अंदर क्या बात हुई ये तो सोनिया और मनमोहन ही जाने, पर जिस तरह से सोनिया गांधी प्रधानमंत्री आवास से वापस हुईं, उसके तीन चार घंटे बाद तक मंत्रियों का इस्तीफा नहीं हुआ, इससे तो लगता है कि दाल में कुछ काला है। बहरहाल ये समाधान भी अस्थाई है, प्रधानमंत्री का गुस्सा कम नहीं हुआ है, वो खुद को ठगा हुआ था महसूस कर रहे हैं, ऐसे में कुछ दिन बाद देश की राजनीति क्या करवट लेती है, इसका हम सबको इंतजार रहेगा।



( नोट : इसी से जुड़ी एक और खबर आपको जरूर पढ़नी  चाहिए, जिससे आज की मीडिया कैसे सोनिया गांधी की भोपूं बन गई है। शीर्षक है " ये मैडम सोनिया की मीडिया "  इसे पढ़ने के लिए लिंक है http://tvstationlive.blogspot.in/2013/05/blog-post.html    )






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गुरुवार, 9 मई 2013

To LoVe 2015: कैसे पुराने तोते के वोटर हैं आप

(डिस्केलमर-ये पोस्ट किसी तोते की बेइज्जती के लिए नहीं लिखा गया है। अगर किसी तोते की भावना आहत हो तो देश के सभी तोतो से क्षमा प्रार्थी हूं)
वंदे मातरम का बॉयकॉट करके बसपा के सांसद महोदय ने एक बार फिर शहीदों का अपमान कर दिया है। इस्लाम के खिलाफ वंदे मातरम् बताने वाले महोदय खुद हिंदुस्तान के इतिहास से अनजान हैं। ये एक सांसद हैं लेकिन ये नहीं जानते कि वंदे मातरम् के विवाद को बरसों पहले ही मौलाना आजाद जैसे राजनीतिज्ञ सुलझा चुके हैं। मगर 21वीं सदी में भी ऐसे नेता बार-बार विवाद जन्म देते रहते हैं। ऐसे नेता धर्म की आड़ केवल अपने मानसिक दिवालियेपन को छुपाने के लिए लेते हैं। जबकि मादरे-वतन बोलने वाले शख्स को वंदे मातरम् बोलने में कोई मुश्किल नहीं है। सवाल ये है कि इससे पहले क्यों नहीं इन्होंने संसद में इस तरह कि हरकत की थी? इस्लाम इस बात कि इजाजत नहीं देता कि आप राष्ट्र के प्रतीकों का अपमान करें। हर बात को धर्म से जोड़कर ऐसे ही नेता हिंदुस्तान को तरक्की की राह पर आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। लोगो को बरगला रहे हैं।
       हैरत है कि अब तक किसी बड़े नेता ने मुंह नहीं खोला है। केवल लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने इसे गंभीर माना है औऱ उन सांसद महोदय को सख्त चेतावनी दी है। उनके अलावा बीजेपी नेता शहनवाज हुसैन ने कहा है कि ऐसे मामलों में लोकसभा अध्यक्ष को और कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। जबकि आम लोगो के अनुसार इनकी सदस्यता रद्द कर देनी चाहिए। 
वंदे मातरम् में गीत के प्रथम दो पदों को गाया जाता है जिसमें किसी धर्म कि बात नहीं है। जिस विवाद को सुभाष चंद्र बोस,  मौलाना आजाद औऱ नेहरु ने मिलकर सुलझा दिया था...उस विवाद को केवल जाहिल...मूर्ख ...ही बढ़ावा देते हैं. 
    मुश्किल ये भी है कि जनता ऐसे आदमी को संसद में चुनकर भेज देती है...वंदे मातरम् का गलत अर्थ लगाता है। ऐसे लोगो का चुनना वोटरों के मानसिक दिवालियेपन को भी दिखाता है। जिन लोगो पर देश की सोच को पुरानी जंजीरों से निकाल कर आधुनिक बनाने की जिम्मेदारी है वो ऐसी बचकानी हरकतें करते हैं. जिससे समाज में केवल वैमनस्य फैलता है। इस हालत में खुद जनता को अपनी सोच बदलनी होगी। आखिर कबतक कोसते रहेंगे हम नेताओं को? कबतक पुरानी जंजीरों में जकड़े रहेंगे हम? लानत है ऐसे वोटरों पर जो देश को आधुनिक बनाने की जगह अंधे कुएं में धकेलने वाले लोगो को चुनती है। 
     समाज बदलने के लिए छटपटा रहा है। नई पीढ़ी पुराने चोले को उतार फेंकने के लिए उतारु है। पिछले तीन दशक से देश की युवा पीढ़ी अकेले लड़ाई लड़ रही है। मगर इन जैसे नेता समय के साथ चलने को तैयार नहीं हैं। अभी तक देश की सियासत पर बूढ़े तोतों का राज है औऱ ये बूढ़े तोते दीवार पर लिखी इबारत को पढ़कर भी सुधरने को तैयार नहीं दिखते। शायद उन्हें नहीं पता कि बदलाव के लिए छटपटा रहा युवा वर्ग आने वाले समय में उन्हें उठाकर बाहर फेंकने वाला है। मंडल की लड़ाई से लेकर हाल के रेप के विरोध में प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने बिना किसी अगुवाई के ही जंग लड़ी है। 
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सोमवार, 6 मई 2013

To LoVe 2015: बेशर्मी पर उतर आई है सरकार !

अगर मैं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या फिर यूपीए का चेयरपर्सन होता तो ये इंतजार बिल्कुल नहीं करता कि दागी रेलमंत्री पवन बंसल खुद इस्तीफा दें, मैं उन्हें अब तक मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर तिहाड़ भेज चुका होता। मुझे डर होता कि कहीं पवन बंसल खुद इस्तीफा देकर स्व. लाल बहादुर शास्त्री के साथ अपना नाम ना दर्ज करा लें, इसलिए उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई करता कि वो ही नहीं बल्कि दूसरे नेताओं के साथ ही उनके परिवार वाले भी सबक लेते। लेकिन प्रणव मुखर्जी, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इस कार्रवाई से चूक गईं। अब मैं इस नतीजे पर पहुंच चुका हूं कि देश की बर्बादी के सिर्फ दो कारण है, एक मनमोहन सिंह और दूसरी सोनिया गांधी। ये देश, देश के लोकतंत्र का जनाजा निकाल कर ही दम लेंगे। हालाकि इन दोनों बेईमानों से सवाल करना बेईमानी है, लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि अगर पवन बंसल को ये छूट है कि जांच के नतीजों के बाद उन पर फैसला होगा तो दूसरे नेताओं को ये छूट क्यों नहीं दी गई ? मसलन तेल के बदले अनाज घोटाले में नटवर सिंह, टू जी घोटाले में मंत्री रहे ए राजा, टूजी मामले में ही दयानिधि मारन, आदर्श घोटाले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चौव्हाण, भाई को गलत ढंग से कोल आवंटन में सुबोध कांत सहाय, कामनवेल्थ में सुरेश कलमाणी और आईपीएल घोटाले में शशि थरूर। ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन पर आरोप लगते ही सरकार ने इस्तीफा ले लिया। अब तो प्रधानमंत्री कार्यालय और कानून मंत्री पर गंभीर आरोप है, उन्होंने कोल ब्लाक आवंटन की जांच रिपोर्ट को प्रभावित करने की साजिश की, आखिर क्यों चुप हैं प्रधानमंत्री और खासकर सोनिया गांधी ?   सच बताऊं बेशर्म हो गई है सरकार !

 चेहरा छिपाने से भला क्या होगा  मंत्री जी ?




यहां रेलमंत्री पवन कुमार बंसल घूसखोरी के मामले में जितने भोले बन रहे हैं, उतने हैं नहीं। सच तो ये है कि अच्छी तरह से जांच हो तो बंसल के परिवार के लगभग सभी सदस्यों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। खैर जो हालात है वो किसी से छिपे तो हैं नहीं। सच्चाई ये है कि अगर सरकार पर लग रहे आरोपों की जांच भी ईमानदारी से हो जाए तो मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री समेत सरकार के 80 फीसदी मंत्रियों को तिहाड़ जेल जाना होगा। बहरहाल आज बात रेल मंत्रालय की करता हूं। मंत्रालय में मलाईदार पद पर तैनाती के लिए " मोटा माल " चलता है, ये बात सब जानते हैं। वैसे तो यहां पैसे का चलन कोई नया नहीं है, लेकिन लालू यादव के रेलमंत्री रहने के दौरान पैसे की ताकत काफी बढ़ गई, मसलन मोटा माल देकर मलाईदार पोस्ट पर तैनाती बहुत आसान हो गई। मंत्रालय में पैसे का ही करिश्मा है कि वरिष्ठता की अनदेखी कर रेलवे बोर्ड में चेयरमैन और मेंबर की तैनाती होने लगी। एक दो नहीं कई ऐसे उदाहरण हैं जहां अच्छे अफसरों को चेयरमैन नहीं बनाया गया और वो रिटायर हो गए। देखा जा रहा है कि जब भी बोर्ड में मेंबर और चेयरमैन की तैनाती का वक्त आता है, यहां ऐसे ही पैसे लुटाए जाते हैं। आगे विस्तार से बात करूंगा, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जानते हैं क्या ? इस अपराधिक साजिश में सीबीआई भी एक मजबूत पार्टी है और वो रेल मंत्रालय के एक खास गुट के इशारे पर काम कर रही है, अगर कोई ऐसी संस्था हो जो साथ-साथ सीबीआई अफसरों के यहां भी छापेमारी करे तो बड़ी रकम तो इनके यहां भी बरामद हो सकती है। 

आइये अब पूरे मामले में अंदर की खबर बताता हूं। पवन बंसल ने जब से रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला है, मंत्रालय के कामकाज में उनके परिवार का अच्छा खासा दखल है। सिर्फ भांजा, भतीजे और बेटा ही नहीं बल्कि उनकी बहू का भी बहुत ज्यादा हस्तक्षेप है। हालाकि उनके परिवार के लोगों का रेल मंत्रालय में आना जाना नहीं के बराबर है, लेकिन मैं कहूं कि तमाम बड़े मामले चंडीगढ़ से तय होते हैं तो ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा। भांजे के पकड़े जाने के बाद अब रेलवे बोर्ड में खुसुर-फुसुर शुरू हो गई है, कहा जा रहा है कि जब मंत्री जी परिवार पर लगाम नहीं लगाएंगे तो ऐसे दिन तो देखने ही पड़ेगे।  हालांकि जो अफसर आज दबी जुबान में रेलमंत्री के परिवार पर उंगली उठा रहे हैं, वो कल खुद भी चंडीगढ़ दरबार में हाजिरी लगाने जाया करते थे। सच तो ये है कि रेलवे बोर्ड चंडीगढ़ के खौफ से हमेशा डरा सहमा रहता था, क्योंकि वहां से आने वाले हर फरमान को रेलमंत्री का फरमान समझा जाता था। भांजे के रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद ये समझ लिया जाना चाहिए कि चंडीगढ़ से कितने बड़े बड़े फैसले पर मुहर लगती थी। क्योंकि चेयरमैन या रेलवे बोर्ड के मेंबर की तैनाती रेलमंत्री के भी हाथ में भी नहीं है, इस पर अंतिम फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय को करना होता है। इसके बाद भी अगर भांजा ऐसी सौदेबाजी में शामिल है तो समझा जा सकता है कि भांजा कितना मजबूत होगा और उसको अपने मामा पर कितना भरोसा होगा। इतना ही नहीं रेल अफसर भी जब उसे इतनी बड़ी रकम दे रहे हैं, तो वो भी जानते होंगे की भांजा ये काम कराने में सक्षम है, तभी लेन देन कर रहे थे।

जरा दो लाइन में बोर्ड के चेयरमैन और मेंबर की तैनाती की प्रक्रिया बता दूं। नियम तो ये है कि वरिष्ठता क्रम के अनुसार चेयरमैन, बोर्ड मेंबर या फिर जोन के महाप्रबंधक के लिए तीन-तीन नाम के पैनल तैयार किए जाते हैं। ये पैनल बोर्ड के अफसर तैयार करने के बाद रेलमंत्री को भेजते हैं। पैनल में जो नाम शामिल होता है उनकी वजह भी बताई जाती है। इससे संतुष्ट होने के बाद इस पैनल को प्रधानमंत्री के कार्यालय भेजा जाता है। प्रधानमंत्री तीन नामों में से जिसे चाहें किसी एक की तैनाती को हरी झंड़ी देते हैं। लेकिन देखा ये जा रहा है कि रेलमंत्री जिसे चाहते हैं उसे ही चेयरमैन, मेंबर या फिर महाप्रबंधक बनवा लेते हैं। मतलब ये कि रेलमंत्री जिस अफसर का नाम देते हैं, आमतौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय उस पर विरोध नहीं करता है। इसी का फायदा उठाया पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ने और उनके कार्यकाल में रेलवे बोर्ड में खूब मनमानी हुई, जिसे चाहा उसे ऊंचे और मलाईदार पद पर तैनात कर दिया। अफसर का जूनियर या सीनियर होना तो गया तेल लेने। मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि यही गंदगी अब और ज्यादा बढ़ती जा रही है। जब भी बोर्ड मे मेंबर या चेयरमैन के  रिटायर होने का समय आता है जोन के महाप्रबंधक यहां लाबिंग शुरू कर देते हैं, और उन्हें इस रास्ते से कामयाबी भी मिलती है।

आप ये भी जान लें कि रेल के बड़े अफसरों को सरकारी काम के लिए "आर ए" यानि रिजर्ब एकोमोडेशन मिलता है। वातानुकूलित ये ऐसी बोगी होती है, जिसमें बेडरूम, ड्राइंग और डाइनिंग स्पेश सबकुछ होता है। अफसर इस बोगी से को किसी ट्रेन में लगाकर दिल्ली लाते हैं और दिल्ली में इस बोगी का इस्तेमाल गोरखधंधे को अंजाम देने के लिए किया जाता है। मैं अगर बिना लाग लपेट के कहूं तो इस बोगी का इस्तेमाल यहां रेल के अधिकारी अय्याशी के लिए करते हैं, क्योंकि इस बोगी में किसी तरह का रिस्क भी नहीं होता है। नियम तो यही है कि इस खास बोगी का इस्तेमाल अफसर तभी कर सकते हैं, जब वो सरकारी यात्रा पर दिल्ली आ रहे हों। लेकिन होता ये है कि जीएम वगैरह रेलवे बोर्ड में किसी अफसर से बात कर मीटिंग फिक्स कर लेते हैं और अपनी यात्रा को सरकारी बना लेते है। बस फिर क्या है, बाकी का सामान तो इस बोगी में पहले ही उपलब्ध है। बहरहाल मैं बताना चाहता हूं कि अफसर कैसे-कैसे साजिश करते हैं। कई बार तो इसी बोगी में पत्रकारों को भी आमंत्रित किया जाता है, जो दिल्ली में उनके लिए माहौल बनाने में उनकी मदद करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि इतने बड़े पद पर तैनाती में भला पत्रकार क्या कर सकते हैं ? लेकिन ऐसा नहीं है। जो अफसर चेयरमैन, मेंबर या फिर जीएम बनने वाला होता है, कुछ अफसर तो उसके खिलाफ भी होते है नां। उनका काम होता है कि उन अफसरों ने अगर अपने कार्यकाल के दौरान कहीं भी जो कुछ गड़बड़ किया है, दिल्ली में इसी रिजर्ब बोगी में पत्रकारों के जमा होने पर उन्हें दारू मुर्गा के साथ अफसर के खिलाफ खबरें छापने के लिए दस्तावेज उपलब्ध कराए जाते हैं। जाहिर है जब खबर छपती हैं तो वो अफसर मुश्किल में पड़ता है और उसकी नए पद पर तैनाती खटाई में पड़ जाती है, कई बार तैनाती रुक भी जाती है।


अब आखं खोलने वाला सच सुन लीजिए। कहा जा रहा है कि जो काम अब तक पत्रकार करते रहे हैं वो काम इस बार सीबीआई ने किया है। सीबीआई के मौजूदा डायरेक्टर रंजीत सिन्हा इसके पहले यहीं रेलवे बोर्ड में तैनात थे। चूंकि वो यहां रह चुके हैं, लिहाजा उन्हें सब पता है कि तैनाती की प्रक्रिया क्या होती है ? अफसर बड़े और मलाईदार पोस्ट के लिए कैसे लाबिंग करते हैं और कैसे पानी की तरह पैसे बहाते हैं। जानकार बता रहे हैं कि मुंबई में महाप्रबंधक के रूप में तैनात महेश कुमार की इधर दिल्ली की यात्रा काफी बढ़ गई थी और वो पैसे के बूते मंत्रालय में अपनी धाक जमाने की साजिश कर रहे हैं, ये बात रेलवे के ही कुछ ठेकेदारों के जरिए विरोधी खेमें के अफसरों तक पहुंच गई। दूसरे खेमे के अफसरों को जब महेश कुमार की कारगुजारियों का पता चला तो उन्होंने इन्हें सबक सिखाने की तैयारी शुरू कर दी। बड़ौदा हाउस में तैनात एक बड़े अफसर ने महेश के खिलाफ झंड़ा उठा लिया और ये बात सीबीआई तक पहुंचाई गई। मैं आपको बता चुका हूं कि सीबीआई के डायरेक्टर रंजीत सिन्हा बोर्ड में तैनात रह चुके है, लिहाजा उन्हें सारा खेल पता है। हालाकि बोर्ड में तैनात रहने के दौरान रंजीत सिन्हा की छवि भी बहुत साफ सुथरी नहीं रही है, उन पर भी बहुत घटिया किस्म के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में रेलवे बोर्ड में चर्चा है कि सीबीआई ने जो धर पकड़ की है, वो तो बिल्कुल सही है, क्योंकि यहां रेलवे बोर्ड में पदों की खरीद फरोख्त होती ही है। लेकिन महेश का नुकसान होने के बाद अब फायदा किसका होने वाला है, उसके और सीबीआई के रिश्तों को भी खंगालना जरूरी है। कहा तो ये भी जा रहा है कि अगर कोई ऐसी संस्था हो जो इसी वक्त सीबीआई के यहां भी छापेमारी कर सके तो यहां भी बड़ी रकम मिल जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

खैर रेलमंत्री का बचाव करने उतरे पूर्व रेलमंत्री लालू यादव पर तो मुझे बिल्कुल हैरानी नहीं हुई। मुझे पता था कि इस मामले में लालू यादव रेलमंत्री बंसल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे। वैसे तो रेलवे बोर्ड में बड़े पदों के लिए काफी समय से पैसा चलता रहा है, मैं कहू कि ये सारे पद बिकाऊ हैं तो गलत नहीं होगा। लेकिन पहले अफसरों में थोड़ी शर्म थी, वो पैसे की बात करने में संकोच करते थे, लेकिन लालू यादव के बाद अब अफसर बेशर्म हो गए हैं, बकायदा सौदेबाजी होती है। मेंबर बनने की बात हो तो 25 करोड़ से इस पद की शुरुआत होती है, अब अफसर अपनी मजबूरी बताकर इस रकम में कितना कम करा सकता है, ये उसकी क्षमता पर है। आज के दौर में अगर कोई अफसर कहे कि वो वरिष्ठ है, ऐसे में उसे ही चेयरमैन या बोर्ड मेंबर बनाना चाहिए तो ऐसा अफसर मूर्ख कहा जाता है। आमतौर पर रेलवे के सभी पदों पर तैनाती की एक रकम तय है, जो इसकी भरपाई करते हैं, वो तैनात किए जाते हैं और मस्त रहते हैं, वरना वो कहां खो जाएंगे कोई पता नहीं। खैर बंसल साहब को एक सलाह है कि वो इस्तीफा देकर खुद भाग लें, वरना कहीं ऐसा ना हो कि जांच आगे बढ़े तो परिवार के और सदस्यों पर भी आंच आए।

खैर रेलमंत्री का चेहरा बेनकाब हो गया है। लेकिन इस समय प्रधानमंत्री और कानून मंत्री भी बुरी तरह फंसे हुए हैं। कोल ब्लाक आवंटन के मामले में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने अपने हलफनामे में कहा है कि उसकी जांच रिपोर्ट को पीएमओ और कानून मंत्री ने ना सिर्फ देखा, बल्कि उसमें सुविधानुसार बदलाव भी कराए, ये गंभीर मामला है। इस खुलासे के बाद तो प्रधानमंत्री को खुद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए। लेकिन अब ये सरकार पूरी तरह बेशर्मी पर उतारू है। जिस तरह का  माहौल है मुझे लगता है कि कहीं सुप्रीम कोर्ट ही प्रधानमंत्री और कानूनमंत्री को तलब ना कर ले और जरूरी पूछताछ करे। अगर ऐसा कुछ हुआ तो वाकई सरकार के लिए शर्मनाक होगा, लेकिन अब नैतिकता, शर्म वगैरह से ये सरकार आगे निकल चुकी है। अब तो लोग एक दूसरे से सवाल करते नजर आते हैं कि सरकार गिरने के बाद कितने मंत्री घर जाएंगे और कितनों को सीधे जेल जाना  होगा ?

चलते-चलते
बीजेपी नेताओं को क्या हो गया है, उन्हें बेईमानों से नैतिकता की उम्मीद है। मुझे लगता है कि अब मांग इस्तीफे की नहीं बल्कि राष्ट्रपति से इस सरकार को बर्खास्त करने की होनी चाहिए। बात बर्खास्तगी तक ही नहीं रुकनी चाहिए बल्कि इन बेईमानों को जेल भेजने तक संघर्ष जारी रहना चाहिए।



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गुरुवार, 2 मई 2013

To LoVe 2015: हम..हमारी राजनीति...औऱ चाणक्य-2

अक्सर हमें लिखना कुछ होता है..हम लिखने कुछ लग जाते हैं। ये आम बात है। जाहिर है विचारों के प्रवाह का क्या भरोसा...या कहिए बातों के घोड़े अचानक बेलगाम हो जाएं तो क्या कर सकते हैं। समाज में इस समय इतनी तेजी से घटनाएं घट रही हैं कि हम सब अचंभे में हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए ऐस-ऐसे विचार सामने आ रहे हैं कि पूछिए मत। बड़े-बड़े पद पर बैठे लोग तक ऐसे अजीबो-गरीब नियम बनाने की बात करते हैं कि पूछिए मत। हम भी  इस घालमेल का शिकार हैं। इसलिए बेहतर है कि हम अलग-अलग मुद्दों पर एक साथ बात करने की जगह  बारी-बारी चीजों पर नडर डालें। वैसे सारे मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हैं। पर बारी-बारी ही चीजों को समझना होगा। वरना हम भी ऐसे हो जाएंगे जैसे धतुरा खाया हुआ कोई इंसान। हालांकि आज के हालात में हमारे समाज में लगता है कि लोगो के विचार धतुरा खाकर ही पैदा हो रहे हैं। खैर पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों के बाद देश के अंदर की राजनीतिक स्थिती देखें। इसके बाद ही हमारी समझ में आएगा कि हमारे कानून बनाने वाले नेताओं के पास फुर्सत कहां है औऱ जनता अपने में कैसे उलझी हुई है। जिस कारण समाजिक मुद्दों पर भी गंभीर विचार नहीं आ पा रहे। 
फसाएंगे पार्टी नेता??
    अभी देश की जो राजनीति स्थिती है...उसे देख कर अच्छे-भले आदमी को चक्कर आ जाए...। जिधर नजर उठाओ उधर घोटालो का राज है। सभी इस हमाम में डूबे नजर आते हैं। चंद ही नेता हैं जो इससे बचे हुए हैं..पर जो बचे हुए हैं...उन्हें उनके चारों ओर जमा लोग डूबाने पर तुले हुए हैं। अब ममता बनर्जी को ही लीजिए। व्यक्तिगत तौर पर ममता बनर्जी की छवि उज्जवल है। पालिटिक्ल करेक्ट होना उन्हें आता नहीं है...इसलिए कई बार उल्टे-पुल्टे बयान देकर वो फंस जाती हैं। अब चिटफंड घोटाले में उनकी पार्टी के नेताओं के नाम आने से उनके लिए मुसीबत खड़ी हो गई है।     

 पंजाब हो या उड़िसा...असम हो या महाराष्ट्र....कश्मीर हो या केरल...हर राज्य का यही हाल है। हर जगह घोटालो की भरमार है। नेता से लेकर प्रशासन तक उमसें फंसा है। पूरा तंत्र बिखरा-बिखरा दिखता है। जनता प्रशासन से त्रस्त है। नेता अपने लोगो से त्रस्त है। प्रशासन अपने खुद के मकड़जाल और उपर बैठे नेताओं से त्रस्त है। हालात ये हैं कि मामूली काम के लिए भी अदालती चाबूक की जरुरत पड़ रही है। लगता है जैसे प्रशासन पंगु हो चुका है।
    नेता राजकाज करना भूल चुके हैं..या उन्हें राजकाज करना आता नहीं है। जो नेता निष्पक्ष काम करते हैं उन्हें हमेशा ये डर सताता रहता है कि वो अगला चुनाव जीतेंगे या नहीं। वैसे जो लगातार जीत रहे हैं उनके क्षेत्र में भी आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुआ है। ईमानदार नेता के पीछे कार्यकर्ताओं या जनता की फौज नहीं है। राष्ट्रीय स्तर का नेता भी स्थानीय मुद्दों के में फंसा रहता है। 
अय्यर-साफ छवि के बाद भी हारे
     हम भी बड़े आराम से कह देते हैं कि सभी चोर संसद में बैठते हैं....लेकिन उनको चुनकर हम भेजते हैं। अबतक कई ईमानदार नेताओं को जनता बूरी तरह हरा चुकी है। कई नेता भीतरघात से तो कई नेताओं को वोटरों की उदासिनता ले डूबी है। क्षेत्रीय पार्टियों की सोच राज्य में सत्ता में काबिज रहने से आगे नहीं बढ़ती। उनके घातक बयानों से जनता भी खुश रहती है। सारे देश में लोगों के विचारों में एकरुपता नहीं है। हालात ये हैं कि बड़े शहरों में किसी एक घटना को लेकर क्षेत्र विशेष के लोगो पर छींटाकशी शुरु हो जाती है।
 कहावत है कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है। यही समाज पर लागू होता है। नेता कहीं से टपकता नहीं है। गांधी भी तब पैदा हुए थे जब कांग्रेस के झंडे तले देश भर के राष्ट्रीय सोच वाले तमाम नेता एकजुट हो चुके थे। कांग्रेस भी तब पैदा हुई जब अंग्रेजों को जनता औऱ सरकार के बीच संपर्क का अभाव महसूस हुआ। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी उस समय सुप्रीम कमांडर बने जब जापान की कैद में मौजूद भारतीय सिपाही सरदार मोहन सिंह की कमान में पहुंच चुके थे। 

इसलिए जबतक राष्ट्रीय सोच के लोग को तमाम विरोधाभाष के बावजूद एकजुट नहीं होंगे..तबतक हमें कोई राजनेता नहीं दिखेगा....न ही कोई राजनेता राष्ट्रनेता बनने की सोचेगा।         (क्रमश:)
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