सोमवार, 30 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: नए साल पर केंद्रित गीत : [विषय आधारित फ़िल्मी गाने]


विषय आधारित फ़िल्मी गाने - 7
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Hindi Film's New Year Songs 

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Please Note -------------------

Titles of all the songs are hyper linked with YouTube links.If you want  to see related video song, Just click on them.We have done this for your convenience. /a>
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रविवार, 29 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: अभिनेता अभिषेक बच्चन : [नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने - 18]



[नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने -18]
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Abhishek Bacchan As a singer


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- Song -

एक मैं और एक तू है और हवा में जादू है
आरज़ू बेकाबू हैं समझो सारी बात बाकी
Ek Main Aur Ek Tu Hai Aur Hawa Men Jadu Hai 
Aarzu Bekaabu Hain Samjho Saari Baat Baaki



Film/a>
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To LoVe 2015: "आप" का समर्थन कर मुश्किल में कांग्रेस !

ज बिना लाग लपेट के एक सवाल  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पूछना चाहता हूं। मैंडम सोनिया जी, आप बताइये कि क्या कोई कांग्रेसी आपके दामाद राबर्ट वाड्रा को बेईमान और भ्रष्ट कह कर पार्टी में बना रह सकता है ? मैं जानता हूं कि इसका जवाब आप भले ना दें, लेकिन सच्चाई ये है कि अगर किसी नेता ने राबर्ट का नाम भी अपनी जुबान पर लाया तो उसे पार्टी से बिना देरी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। अब मैं फिर पूछता हूं कि आखिर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए ये कांग्रेस उनके पीछे कैसे खड़ी हो गई, जिसने आपके दामाद वाड्रा को सरेआम भ्रष्ट और बेईमान बताया। क्या ये माना जाए कि केजरीवाल ने जितने भी आरोप आपके परिवार और पार्टी पर लगाएं है, वो सही हैं, इसलिए आपकी पार्टी उनके साथ खड़ी हैं, या फिर पार्टी में कहीं कई विचार पनप रहे हैं,  लेकिन सही फैसला लेने में मुश्किल आ रही है और आपका बीमार नेतृत्व पार्टी को अपाहिज  बना रहा है।

खैर सच तो ये है कि आम आदमी पार्टी को समर्थन देना अब कांग्रेस के गले की फांस बन गई है। मेरी नजर में तो आप को समर्थन देकर कांग्रेस ने एक ऐसी राजनीतिक भूल की है, जिसकी भरपाई संभव ही नहीं है। सबको पता ही है किसी भी राजनीतिक दल को दिल्ली की जनता ने बहुमत नहीं दिया, लिहाजा लोग सरकार बनाने की पहल ना करते और ना ही किसी को समर्थन का ऐलान करते ! लेकिन कांग्रेस के मूर्ख सलाहकारों को लगा कि अगर वो आप को समर्थन का ऐलान करती है, तो ऐसा करके वो दिल्ली की जनता के दिल मे जगह बना लेगी और केजरीवाल जनता से किए वादे पूरे नहीं कर पाएंगे, लिहाजा वो जनता का विश्वास खो देंगे। इससे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। इधर पहले तो केजरीवाल समर्थन लेने से इनकार करते रहे और कहाकि वो किसी के समर्थन से सरकार नहीं बनाएंगे। इस पर कांग्रेसी दो कदम आगे आ गए और कहने लगे की उनका समर्थन बिना शर्त है, सरकार बनाकर दिखाएं।

अब कांग्रेसियों की करतूतों से केजरीवाल क्या देश की जनता वाकिफ है, सब जानते हैं कि इन पर आसानी से भरोसा करना मूर्खता है। लिहाजा केजरीवाल ने ऐलान किया कि वो जनता से पूछ कर इसका फैसला करेंगे। इस ऐलान के साथ केजरीवाल दिल्ली की जनता के बीच निकल गए, और जनता की सभा में उन्होंने आक्रामक तेवर अपनाया। हर सभा में ऐलान करते रहे कि सरकार बनाते ही सबसे पहला काम भ्रष्टाचार की जांच कराएंगे और दोषी हुई तो शीला दीक्षित तक को जेल भेजेंगे। आप पार्टी ने कांग्रेस पर हमला जारी रखा, लेकिन कांग्रेस को लग रहा था कि वो केजरीवाल को बेनकाब कर देंगे, इसलिए समर्थन देने के फैसले पर अडिग रहे। मैने तो पहली दफा देखा कि जिसके समर्थन से कोई दल सरकार बनाने जा रहा है वो उसके नेताओं को गाली सरेआम गाली दे रहा है और पार्टी कह रही है कि नहीं सब ठीक है। वैसे अंदर की बात तो ये भी है कांग्रेस में एक तपका ऐसा है जो पूर्व  मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का विरोधी है, उसे लग रहा है कि केजरीवाल जब जांच पड़ताल शुरू करेंगे तो शीला की असलियत सामने आ जाएगी।

केजरीवाल ने शपथ लेने से पहले कांग्रेस को इतना घेर दिया है कि अब उनके पास कोई चारा नहीं बचा। शपथ लेने के दौरान भी केजरीवाल ने साफ कर दिया कि वो किसी से समर्थन की गुजारिश नहीं करेंगे। बहुमत मिला तो सरकार चला कर जनता की सेवा वरना जनता के बीच रहकर उसकी सेवा। अब कांग्रेस के गले मे ये हड्डी ऐसी फंसी है कि ना उगलते बन रहा है ना ही निगलते बन रहा है। अगर कांग्रेस समर्थन वापसी का ऐलान करती है तो उसकी दिल्ली में भारी फजीहत का सामना करना पड़ सकता है। बता रहे हैं कि इस सामान्य मसले को पेंचीदा बनाने के बाद अब कांग्रेसी 10 जनपथ की ओर देख रहे हैं। अब ऐसा भी नहीं है कि 10 जनपथ में तमाम जानकार बैठे हैं, जो मुद्दे का हल निकाल देंगे। बहरहाल शपथग्रहण के बाद से जो माहौल बना है, उससे दो बातें सामने हैं। एक तो दिल्ली में कांग्रेस का पत्ता साफ हो जाएगा, दूसरा दिल्ली में आराजक राजनीति की शुरुआत  हो गई है।

वैसे आप कहेंगे कि सोनिया गांधी से सवाल पूछना आसान है, लेकिन किसी मुद्दे का समाधान देना मुश्किल है। मैं समाधान दे रहा हूं। एक टीवी  न्यूज चैनल के स्टिंग आँपरेशन में पार्टी के पांच विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग हट कर बयान दिया और केजरीवाल को  पागल तक बताया। कांग्रेस आलाकमान को इस मामले को तत्काल गंभीरता से लेते हुए अपने पांचो विधायकों को पार्टी से निलंबित कर उनकी प्राथमिक सदस्यता समाप्त कर देनी चाहिए। इससे दिल्ली की जनता में ये संदेश जाएगा कि पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर अरविंद की आलोचना करने पर इन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। उधर विधायक दल बदल कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगे।   



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शनिवार, 28 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: कहीं करती होगी, वो मेरा इंतज़ार : [Copied or Inspired Song]


Copied or Inspired By Other Song [24]
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फ़िल्म- 'फिर कब मिलोगी' (1974) में एक बहुत ही सुन्दर गाना था - 'कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार', जो कि संगीतकार आर डी बर्मन द्वारा संगीतबद्ध एवं गीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी द्वारा लिखा गया था और लता मंगेशकर व मुकेश जी ने अपनी आवाज़ से इस गाने को दिलकश बनाया था ! दरअसल ये गाना हॉलीवुड के गायक हर्ब /a>
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शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: ओ गोरी चोरी-चोरी जाना बुरी बात है - मुकेश : गीत वही अंदाज अलग - [4]




गीत वही अंदाज/आवाज़ अलग [4]

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- Song -

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O Gori Chori-Chori Jana Buri Baat Hai

Teri Kismat Ki Chabhi Mere Hath Hai

Singer : Hemant Kumar
Film : Ek Jhalak (1957)

Music : Hemant Kumar

Lyricist : S H Bihari



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ऊपर आप वीडिओ में फ़िल्म- 'एक झलक' (1957) में गायक हेमंत दा /a>
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To LoVe 2015: ईमानदार ही नहीं गंभीर भी हो सरकार !

बहुत बुलंद फजाँ में तेरी पतंग सही,
मगर ये सोच जरा डोर किसके हाथ में है ।

मुझे लगता है कि इन दो लाइनों से अरविंद केजरीवाल को समझ लेना चाहिए कि उनके बारे में आम जनता की राय क्या है ? हम सब जानते हैं कि केजरीवाल ने अन्ना के मंच से जोर शोर से दावा किया था कि कभी राजनीति में नहीं जाऊंगा, पर राजनीति में आ गए। राजनीति में आने के लिए इस कदर उतावले रहे कि उन्होंने अन्ना को भी किनारे कर दिया। यहां तक आंदोलन में उनकी सहयोगी देश की पहली महिला आईपीएस अफसर किरण बेदी से भी नाता तोड़ लिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई, बाद में
बच्चे की कसम खाई कि ना बीजेपी और कांग्रेस से समर्थन लूंगा और ना ही दूंगा, ये भी बात झूठी निकली, कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने जा रहे हैं। कह रहे थे कि सरकार में आते ही दिल्ली में रामराज ला दूंगा, अब कह रहे हैं कि हमारे हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है। बहरहाल जैसा दूसरे दलों में मंत्री पद के लालची होते हैं, वो चेहरा केजरीवाल की पार्टी में भी दिखाई दिया। उनकी पार्टी का एक विधायक मंत्री ना बनाए जाने से नाराज हो गया, महज नाराज होता तो भी गनीमत थी, वो तो कहने लगा कि प्रेस कान्फ्रेंस करके केजरीवाल की पोल खोल दूंगा। खैर रात भर मेहनत करके उस विधायक को मना तो लिया गया, लेकिन ये सवाल जनता में जरूर रह गया कि आखिर ये विधायक अरविंद केजरीवाल की कौन सी पोल खोलने की धमकी दे रहा था।


केजरीवाल कहते रहे कि सरकार बनाने की जिम्मेदारी बीजेपी को निभानी चाहिए थी, क्योंकि उनके पास 32 विधायक हैं। अरे भाई केजरीवाल साहब वो सरकार बना लेते, पहले आप कहते तो कि " मैं बीजेपी को समर्थन देने को तैयार हूं"। जब बीजेपी को कोई समर्थन नहीं दे रहा है, तो उनकी सरकार भला कैसे बन सकती थी ? आप रोजना उनकी आलोचना कर रहे हैं, मैं पूछता हूं कि आप तो इन राजनीतिज्ञों से हट कर हैं, आपको तो कुर्सी की कोई लालच भी नहीं है, आप हमेशा कहते रहे हैं कि अगर सरकार जन लोकपाल लाने का वादा करे, तो वो चुनाव के मैदान से भी हट जाएंगे। मेरा सवाल है कि आपने खुद शर्तों के साथ समर्थन देने की पहल क्यों नहीं की ? भाई केजरीवाल साहब समर्थन देने के मामले में तो आप ये कहते हैं कि उनका जनता से वादा है कि किसी को समर्थन नहीं दूंगा। मित्र केजरीवाल जनता से तो आपका ये भी वादा था कि किसी से समर्थन लूंगा भी नहीं, फिर ये वादा तो आपने तोड़ दिया। उस कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रहे हैं, जिससे चुनाव में आपकी सीधी लड़ाई थी, जिसके खिलाफ जनता ने आपको वोट दिया।


कांग्रेस  से जनता कितनी त्रस्त थी, ये बताने की जरूरत नहीं है। क्योंकि आपको  भी ये उम्मीद नहीं थी कि उनकी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी चुनाव में हार जाएंगी। ईमानदारी की बात तो ये है कि आप को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि आप चुनाव जीत सकते हैं। लेकिन जनता का गुस्सा ऐसा था कि कांग्रेस  के तमाम दिग्गजों को चुनाव हरा दिया। अब जिनको आप गाली देते रहे, उन्हीं की मदद से कुर्सी पर बैठ रहे हैं। वैसे तो आप पहले कुर्सी संभालिए, फिर जनता देखेगी कि कांग्रेस के बारे में आप की अब क्या राय है ? कांग्रेस के जिन मंत्रियों को आप गाली देते रहे, जिन पर गंभीर आरोप थे, जब आप विधानसभा में बहुमत साबित करेंगे तो वो आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे। चलिए एक आखिर बात कहकर इस विषय को यहीं खत्म करते हैं। चुनाव के दौरान 20 करोड़ रुपये चंदा आ गया तो आप ने कहाकि अब आपको पैसे की जरूरत नहीं है, लोग चंदा ना दें। यहां आप नैतिकता की बात कर रहे थे। अब विधानसभा में संख्या कम हो गई तो वही चोर, उचक्के, भ्रष्ट (ये सब  आप कहते रहे हैं) उनका साथ लेने से आपको कोई परहेज नहीं है। भाई अब नैतिकता की बात कभी मत कीजिएगा.. आपके मुंह से ये शब्द सुनना बेईमानी है।


पगलाई इलेक्ट्रानिक मीडिया टीआरपी के चक्कर में आपके आस पास चिपकी हुई है। दिन भर में आप और आपकी टीम भी कई बार कैमरे के सामने आती है। एक बार कहते हैं कि लाल बत्ती नहीं लूंगा, दो घंटे बाद फिर बाहर आते हैं अब कहते हैं गाड़ी नहीं लूंगा। केजरीवाल साहब लालबत्ती नहीं लूंगा का मतलब ही ये है कि आप गाड़ी भी नहीं लेगें। अब बताइये गाड़ी नहीं लेगें तो क्या लाल बत्ती हाथ में लेकर चलेंगे ? बात यहीं खत्म नहीं हुई, मीडिया में आप छाये रहें इसके लिए कुछ चाहिए ना.. इसलिए कुछ देर बाद आप फिर कैमरे के सामने आए और कहा कि शपथ लेने मेट्रो से जाएंगे। चलिए जनता  को मालूम हो आपकी हकीकत, इसलिए बताना जरूरी है कि रामलीला मैदान तक मेट्रो नही जाती है, ऐसे में केजरीवाल मैट्रो से बाराखंभा रोड तक मेट्रो से आएंगे, उसके बाद अपनी कार से रामलीला मैदान जाएंगे। आपकी कार बाराखंभा रोड पर तो रहती नहीं है, मतलब ये कि आप कार को घर से बाराखंभा तक खाली भेजेंगे, फिर यहां से उस पर सवार होंगे। ऐसे में मेरा सवाल है कि आप इस कार पर घर से ही क्यों नहीं सवार हो जाते ? ये हलकी  फुलकी  बातों से सरकार नहीं चलती केजरीवाल साहब ! ये सब करके आप  दिल्ली और मेट्रो यात्रियों को केवल डिस्टर्ब ही करेंगे। शहर में आराजकता के हालात पैदा करेंगे।


केजरीवाल कितने दिनों से गिना रहे हैं कि वो आटो पर चलेगे, मेट्रो का सफर  करेंगे, लाल बत्ती नहीं लेगें, बंगला और गाड़ी नहीं लेगें। आपने कभी गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर के मुंह से ये सब सुना है। वो काफी समय से गोवा के मुख्यमंत्री हैं। उनके पास भी  सरकारी गाड़ी, बंगला, लालबत्ती कुछ नहीं है। स्कूटी से दफ्तर जाते हैं, कई बार तो रास्ते में खड़े होकर किसी से  लिफ्ट लेते भी दिखाई दे जाते  हैं। और  हां केजरीवाल की पत्नी तो लालबत्ती की गाडी में ऑफिस जाती है जबकि गोवा के CM की पत्नी आज भी रिक्शे में बैठकर बाजार से खुद सामान लाती हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता  बनर्जी को ही ले लीजिए। रेलमंत्री रहने के दौरान कभी वो दिल्ली में लालबत्ती की कार पर नहीं चढ़ीं, मंत्रालय में अपनी टूटही जेन कार पर सवार होकर जाती हैं और सूती साड़ी के साथ हवाई चप्पल पहनती हैं। एक बार ममता ने देखा कि एक स्कूटर सवार सड़क पर अचानक गिर पड़ा , तो वो अपने कार से उतरी और घायल  को उसी कार से अस्पताल भेज दिया और खुद आटो लेकर संसद गईं। लेकिन उन्होने अपने मुंह से ये सब कभी नहीं कहा।


त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार भी साफ छवि वाले राजनेता हैं। गरीबी में पले-बढ़े माणिक सरकार की कुल चल और अचल संपति ढाई लाख रुपए से भी कम आंकी गई है। चुनाव आयोग को सौंपे शपथ पत्र के अनुसार, 64 साल के माणिक सरकार के पास 1,080 रुपए कैश और बैंक में 9,720 रुपए हैं। केजरीवाल तो फिर भी लाखों  रूपये के मालिक हैं। माणिक तो अपनी सैलरी और भत्ते भी पार्टी फंड में देते हैं। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी सादगी पसंद इंसान हैं। वह किराये के सरकारी मकान में रहते हैं। चुनाव आयोग को सौंपे शपथ पत्र में उन्होंने जानकारी दी थी कि उनके पास न ही कोई मकान है और न ही गाड़ी। कैश के नाम पर उनके पास केवल पांच हजार रुपए हैं। ऐसा नहीं  है कि गाड़ी, बंगला ना लेने वाले आप कोई पहले नेता हैं, बहुत सारे लोग ऐसे रहे हैं।  लेकिन हां आप इस मामले में जरूर पहले नेता हैं जो अपने मुंह से पूरे दिन मीडिया के सामने गाते रहते हैं कि मैं ये नहीं लूंगा वो नहीं लूंगा। दूसरे नेताओं ने कभी अपने मुंह से कहा नहीं।


खैर आप मुख्यमंत्री बनिए, हमारी  भी शुभकामनाएं हैं। हम भी चाहते हैं कि दिल्ली मे एक ईमानदार सरकार  ही न हो, बल्कि वो ईमानदारी से काम भी करे। लेकिन जिस सरकार की बुनियाद में बेईमान हों, उससे बहुत ज्यादा ईमानदारी की उम्मीद रखना, मेरे ख्याल से  बेईमानी होगी। मैं चाहता हूं कि दिल्ली में ना सिर्फ एक ईमानदार बल्कि गंभीर सरकार होनी  चाहिए। दिल्ली की सड़कों पर जिस तरह से टोपी लगाए गुमराह नौजवान घूम रहे हैं, इन्हें आपको ही नियंत्रित करना होगा, वरना कल ये आपके लिए ही सबसे बड़ा खतरा  बन जाएंगे।




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गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: नौशाद के साथ : गीता दत्त की आवाज़ में दुर्लभ गीत


हिंदी सिनेमा के  दुर्लभ गीत [19]
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संगीतकार नौशाद के निर्देशन में गीता दत्त जी ने केवल दो गीत गाये ! 
एक 1949 में रिकॉर्ड हुआ, दूसरा सन 1962 में !

1st - Song :
Tu Mera Chand Main Teri Chandani


Film - Dillagi[1949]



Music - Naushad



Lyrics - Shakeel



Singers - Shyam and Geeta Dutt

आश्चर्य है कि इस गीत को रिकॉर्ड में नहीं रखा गया, मगर फिल्म/a>
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To LoVe 2015: अनिल बिस्वास के स्वर में एक गीत : हिंदी सिनेमा के दुर्लभ गाने



हिंदी सिनेमा के दुर्लभ गाने [18]

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Music Director Anil Biswas as a Singer 

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अनिल बिस्वास (7जुलाई, 1914 - 31मई, 2003) को हिन्दी फ़िल्म संगीत का पितामह कहा जाता है ! 1965 में बनी फ़िल्म 'छोटी छोटी बातें' उनकी अंतिम फिल्म थी ! उनकी पत्‍नी गायिका मीना कपूर एक बहुत /a>
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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: Merry Christmas-हंसता हूं मैं..मुस्कुराता हूं मैं

....मैं ऐसा ही यारों

हंसना-मुस्कुराना जिंदगी का एक हिस्सा है....पर लगता है कि अब हर बात का मतलब बदल गया है। आजकल फेसबुकिया सूक्तियों ने अर्थ का अनर्थ करना शुरु कर दिया है। सीधी बातों का उल्टा मतलब निकाला जा रहा है। लगता है जैसे फेसबुकिया लोग बह्मज्ञानी और दार्शनिक हो गए हैं। ये आम बात है कि जब आदमी सहज होता है, तो मुस्कुराता है। अपन ऐसी ही फितरत के मालिक है। ऐसी तबीयत के मालिक होने के कारण अपन अक्सर फेसबुकिया ज्ञानियों के शिकार होते रहते हैं। ये फेसबुकिया तत्वज्ञानी हरबार एक मशहूर विज्ञापन की पंक्तियों में सवाल करते हैं.." भई इतना जो मुस्कुरा रहे हो..बताओ क्या ग़म चबा रहे हो".....हद है यार..काहे को विज्ञापन के जिंगल की वाट लगाते हो।
   ऐसे ही सदाबहार फिल्मी गाने सुनते वक्त कई बार सकारात्मक विचारों यानि की Positive thoughts की गाड़ी सरपट दौड़ने लगती है। तब मुझे शांत बैठे देखकर अक्सर लोग पूछ बैठते हैं, रोहित जी अपने जमाने के गाने सुनकर कहां खो गए? ऐसे लगता है गोया अपन पृथ्वीराज कपूर के चढ्ढी यार हैं। है न हैरानी की बात। जबकि फिल्मों के सदाबहार गाने उस वक्त के हैं, जब अपन पैदा भी नहीं हुए थे।
    लोग अक्सर पूछते हैं कि आखिर आप अकेले कैसे रहते हैं? मेरा जवाब होता है कि मैं अकेला नहीं हूं...तो फेसबुकिया ज्ञानी तत्काल कहने लगते हैं कि इसका मतलब है कि आप बहुत अकेले हैं। आपको चीजों की परवाह है। जबकि सच यह है कि लोग परिवार में भी अकेलापन महसूस करते हैं। जाहिर है मैं भी अलहदा नहीं..लेकिन मेरे पास करने को इतना कुछ है कि अकेलेपन की परछाई देर तक नहीं टिकती। चीजों की परवाह करना तो इंसान की सहज प्रवृति है। ऐसे में इन स्वनाम धन्य ज्ञानियों को कौन समझाए कि जो चीजें सहज हों...कुदरती तौर पर आपके अंदर हो..उसको इतना असहज मत बनाओ यार। क्यों मिलनसार लोगो को मतलबी औऱ हंसते बोलते लोगो को तन्हा समझते हो
   सच में हालात काफी बदल गए हैं। कुछ साल पहले तक जिन बातों का मजा लेकर हम दोस्तों की टांग खींचते थे वो आज कॉमेडी की दुनिया के सबसे बिकाउ प्रोग्राम बन गए हैं। देखा जाए तो ये एक गंभीर समाजिक समस्या है। जो चीजें पहले सहज औऱ सरल थी वो दुर्लभ हो गई हैं। आपस में लोग सहज होकर नहीं मिलते।जो सरलता औऱ हास्य समाज में सहज उपलब्ध था, उसके लिए अब लोग टीवी शोज के मोहताज हो गए हैं। समाजिक त्यौहारों को हमने व्यक्तिगत बना दिया है। जबकि इससे बचने के लिए ही हमारे पूर्वजों-ऋषियों ने हर महीने कोई न कोई उत्सव मनाने की परंपरा डाली थी। ताकि कम से कम हम इस दिन तो खुश रह सकें, लेकिन हम इस शानदार परंपरा का बैंड बजा चुके हैं।
 आज जब क्रिसमस का मौका है तो क्यों न हम ईसा मसीह के जीवन से सहज प्रेम को लेकर सांता की तरह लोगो में बांटे। हम तुलसी के पौधे औऱ सांता के क्रिसमस ट्री को अलग नहीं समझें। दरअसल यही सहजता हमारी ताकत थी..जिसे हमने खो दिया था। याद रखिए यही वो चीज है जो हमें औऱ हमारे समाज को जीवंत बनाएगी। 
     तो हे दोस्तों औऱ फेसबुकिया ज्ञानियों सहज मुस्कुराते आदमियों को देखकर इतने सवाल न करो कि उनकी मुस्कुराहट भी दुर्लभ हो जाए। यारो अगर ऐसे ही अपनी और दूसरों की मुस्कुराहटे गायब करते रहोगे तो हमारे समाज के DNA में गड़बड़ हो सकती है औऱ हम हिंदुस्तानियों की आने वाली नस्लें दुनिया में गंभीर थोबड़ा लिए पैदा होने लगेंगी। समझे...यकीन जानो गंभीर थोबड़े वाले नवजात (New Born Babies) अच्छे नहीं लगेंगे।
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मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: दिल देता है रो रो दुहाई, किसी से कोई प्यार ना करे : [Copied Song]




Copied or Inspired By Other Song [23]

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वर्ष 1963 में पाकिस्तान में एक फ़िल्म बनी थी - 'इश्क़ पर जोर नहीं' ! इस फ़िल्म में एक गाना था - 'दिल देता है रो रो दुहाई …' जिसे इनायत हुसैन के संगीत निर्देशन में माला & सायन अख्तर ने गाया था ! 30 वर्ष बाद भारत में फ़िल्म बनी - 'फिर तेरी कहानी याद आयी' ! इस फ़िल्म में पाकिस्तान के गाने को लिया /a>
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To LoVe 2015: अभिनेता महमूद : [नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने - 17]



नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने - [17]
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Actor Mahmood as a Singer

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ना बीवी ना बच्चा, ना बाप बड़ा, ना मैय्या 
द व्होल थिंग इज दैट कि भैय्या सबसे बड़ा रुपैया

Na Biwi Na Bachcha, Na Baap Bada, Na Maiyya
The Whole Thing Is That Ki Bhaiya Sabse Bada Rupaiya


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रविवार, 22 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: मोहब्बत चूमे जिनके हाथ - हेमंत कुमार : गीत वही अंदाज अलग - [3]




गीत वही अंदाज/आवाज़ अलग [3]

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इस गीत को फिल्म- 'आन' में मोहम्मद रफ़ी ने गाया था और बहुत लोकप्रिय हुआ था !
आज इसी गीत को आप हेमंत कुमार के स्वर में सुनिये -


'मोहब्बत चूमे जिनके हाथ

जवानी पाँव पड़े दिन रात'
Song : Mohabbat Choome Jinke Haath,

Jawaani Paanv Pade Din Raat'



Singer : Hemant Kumar
 Film : Aan [1951]
Music : Naushad

Lyrics : /a>
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To LoVe 2015: दिल मेरा तोड़ दिया उसने बुरा क्यूँ मानू : [Copied Song -22]



Copied or Inspired By Other Song [22]

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1973 में रिलीज हुयी पाकिस्तानी फ़िल्म- 'अज़मत' में एक गाना था - 'वो मेरा हो न सका .…'! कतील शिफई के लिखे इस गीत को नाशाद के संगीत निर्देशन में गायिका नूरजहां ने गाया था ! उसके बाद वर्ष 2001 में भारत में फ़िल्म- 'कसूर' आयी, जिसमें पाकिस्तान के इसी गाने को थोड़े शब्दों के हेर-फेर के साथ शामिल किया /a>
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शनिवार, 21 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: अभिनेता सलमान खान : [नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने -16]



Actor Salman Khan as a Singer

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आप ने अभिनेता सलमान खान को उनके इंटरव्यू या स्टेज शो वगेरह में कभी कभार गाते गुनगुनाते सूना ही होगा, मगर यह गीत उन्होंने फिल्म- 'हेलो ब्रदर' (1999) के लिए गाया है ! इस गीत को उन्हीं पर फिल्माया भी गया है ! इस गीत में अलका याग्निक के स्वर का साथ भी है !



Song
चांदी की डाल पर सोने का मोर/a>
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To LoVe 2015: ना आदमी का कोई भरोसा - महेंद्र कपूर : गीत वही अंदाज अलग [2]






गीत वही अंदाज/आवाज़ अलग [2] 
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Song
न आदमी का कोई भरोसा न दोस्ती का कोई ठिकाना

वफ़ा का बदला है बेवफाई अजब ज़माना है ये ज़माना .

Na Aadmi Ka Koyi Bharosa Na Zindagi Ka Koyi Thikana,

Wafa Ka Badla Hai Bewafayi, Ajab Zamana Hai Ye Zamana.


इस गीत को आपने फिल्म- आदमी (1968) में रफ़ी साहब की आवाज़ में ही सुना होगा ! 
आज आप इसे महेंद्र कपूर साहब की /a>
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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: गायिका राजकुमारी दुबे : (गायकों का पहला / आखिरी गाना- 12)




गायकों का पहला / आखिरी गाना- 12
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Rajkumari Dubey : First / Last Song 

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बोलती फिल्मों के साथ गायक सितारों का चलन हुआ, लेकिन जल्द ही यह युग समाप्त हुआ और पार्श्वगायन युग का आरम्भ हुआ, जिस के शुरूआती कलाकारों में एक 'राजकुमारी दुबे' थीं।/a>
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गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: सोन भंडार गुफा ,राजगीर [बिहार]


 
राजगीर बिहार में एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल है,प्रकृति की सुन्दरता यहाँ देखते बनती है पांच तरफ से पहाड़ियों से घिरे इस क्षेत्र से बानगंगा बहती है .
कभी यहाँ  वैभवशाली महानगर हुआ करता था आज वहां एक छोटा गाँव भर है.राजगीर अपनी गुफाओं,किलों,बोद्ध और जैन मंदिरों के लिए जाना जाता है.वेणु विहार एक बहुत ही खूबसूरत स्थल है जिसे भगवान बुद्ध  को उस समय के राजा बिम्बीसार ने भेंट में दिया था.यहीं जापानी

To LoVe 2015: गीता दत्त के दो गीत फिल्म चोरी-चोरी से : गीत वही अंदाज/आवाज़ अलग - [1]




गीत वही अंदाज अलग - [1] 

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गीता दत्त के इन गीतों को नेट पर इत्तेफ़ाक से सुना तो लगा कि यूँ ही उन्हें भाव गायिका नहीं  कहा जाता है ! गाना - "ये रात भीगी-भीगी ..." जो अभी तक लता जी के स्वर में ही सुना था, वही गाना गीता दत्त की आवाज़ में सुना तो मन बंध कर रह गया, न जाने कितनी बार सुन लिया लेकिन मन नहीं भरा ! थोड़ी और खोज की तो उनके गाये दो और /a>
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बुधवार, 18 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: अभिनेता नाना पाटेकर : [नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने -15]




नायक/नायिकाओं द्वारा गाये गाने -15


Actor Nana Patekar As a Singer

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अभिनेता नाना पाटेकर को उनके बेजोड़  अभिनय और दमदार संवादों के लिए जाना जाता है ! कुछ गीतों में उन्होंने संवाद बोले या एक -दो पंक्तियाँ गाई भी हैं ! आज जो गाना हम सुनाने  जा रहे हैं वह पूरा उनका गाया गीत है जो उन्हीं पर फिल्माया भी गया है !

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मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: शुक्रिया राजस्थान, शुक्रिया दैनिक भास्कर

तीन साल पहले १९ मार्च के दिन ही पहुंचा था श्री गंगानगर..पंजाब की मस्ती और राजस्थान के आतिथ्य भाव से सराबोर ये शहर मेरी जिन्दगी का माइल स्टोन साबित हुआ ..बतौर सम्पादक दैनिक भास्कर के साथ यहीं से मेरी तीन साल की यात्रा शुरू हुई ..एक खूबसूरत और जबरदस्त ट्रेनिंग वाली यात्रा ..घर, परिवार और दोस्तों से दूर ..इतने प्यारे लोग की कभी अकेलापन महसूस ही नहीं हुआ ..बात चाहे श्री गंगानगर की हो या बाड़मेर ..जैसलमेर ..जयपुर.. और उदयपुर की , हर जगह अपनी टीम के साथियों और वरिष्टों से काफी सीखा ..लखनऊ से एक रिपोर्टर राजस्थान आया था ...इसके आगे जो बना यहीं बना..अब जाने की तैयारी है ..वापस लखनऊ . ..शुक्रिया राजस्थान ..शुक्रिया दैनिक भास्कर ..

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To LoVe 2015: मुस्कराओ कि मै फिर जाता हूँ

मुस्कराओ कि मै फिर जाता हूँ
दस्तूर ही कुछ ऐसा आने जाने का
चाह कर भी रुक कहाँ पाता हूँ
एक हुनर जरूर सीख लिया है हमने
जो पलकों के पीछे है उसे छिपा ले जाता हूँ
मुस्कराओ कि मै फिर जाता हूँ


 
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To LoVe 2015: इस फैले हुए काजल ने चुगली की है

इस फैले हुए काजल ने चुगली की है
कल रात सावन चुपके चुपके बरसा है




हम क्या कहें तुमको और तुम्हारी नाराजगियों को
तुम कैसे समझोगे मुझको और मेरी खामोशियों को



नवीन जोशी जी का उपन्यास ..दावानल.. पढ़िये, पता चल जायेगा की गंगा ,अलकनंदा और हिमालय क्यों नाराज है , इस तबाही का जिम्मेदार कौन है और इस माफिया तंत्र की जडें पहाड़ों मे कितनी गहरी धंसी हैं ..टीवी चैनल वालों के लिये इसमे काफी रेफरेंस मटीरियल है ...ये मौका है जब पुरानी गलतियों को सुधारा जा सकता है


बूँद बूँद टपकती पत्तों से बारिश की बूंदों सी
तुम चली गयीं जाने कहाँ बारिश की बूंदों सी
हर फ़िक्र और जिक्र मे हम तुमको तलाशा किये
पर तुम तो खो गयी दरिया मे बारिश की बूंदों सी
 




आज फिर तपती धूप है
जलाती हुई झुलसाती हुई
उस सच को बताती हुई कि
थोडा रुक ये गर्मी ही बादल लायेगी
सूखी धरती पर हरियाली छायेगी
वक्त का क्या है वो भी ऐसे ही बदलता है
घनघोर अन्धकार से भी सूरज जरूर निकलता है
 
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To LoVe 2015: हमारे लिए पहले आप

सब कुछ ख्वाब सरीखा। या फिर किसी ऐसे ख्वाब की तामीर जो देखा तो था पर याद नहीं। भावनाओं पर काबू पाना आसान नहीं। फिर एक बार पीछे मुड़कर देखने को जी चाहता है। मां का चेहरा याद आता है, मौत से चंद घंटे पहले का। आखिरी बार उनका कहना-बेटा खूब पढ़ना बड़े इंसान बनना। बात करीब 33 साल पुरानी है पर आज बहुत याद आ रही है। वो सारे स्ट्रगल याद आ रहे हैं जो मैंने बरसों किए, वो सारे अच्छे लोग याद आ रहे हैं जिन्होंने जिंदगी में आगे बढ़ाया, वो सारे अपने जिनकी दुआएं हमेशा साथ रहती हैं। अपने लखनऊ में नवभारत टाइम्स का संपादक बनने में जरूर मेरी मेहनत शामिल है पर आपके प्यार, दुआओं और साथ के आगे मेरे लिए उसका कोई मोल नहीं

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To LoVe 2015:

खून बरसा है खेतों मे इस बार
सुना है खूब वोट उगेंगे इस बार
कलफ लगे खादी के सफेद कुर्ते वाले
भाई बंदी की तकरीरें करेंगे इस बार



काश लाशें बोल पातीं
वो जोर जोर चिल्लातीं
चिता मे शोर मचातीं
कब्रों से आवाज लगातीं
नेताओं.. वोट ले लो वोट
..मेरे खून से सने वोट



शब्द अम्रृत शब्द हैं विष
शब्दों से वार भी होते हैं
शब्द जीता दे शब्द हरा दे
शब्दों मे आकार भी होते हैं
 



हवा कुछ भीगी भीगी सी है
ये सीलन जाने क्या करेगी
हाँ ये दीवारें बदरंग तो हुई हैं
पुराने रंग झाँक रहे हैं इनमे से


वक्त किताब नहीं होता। इसके पन्ने भी नहीं होते। आप वापस कुछ नहीं पलट सकते। सिर्फ अहसास कर सकते हैं, बीते हुए पलों की उन खुशबुओं का, जो करीब न होते हुए भी खुद को महसूस कराती हैं, जो न होकर भी बसी होती हैं जेहन में, एक झूठ की तरह, एक फरेब की तरह, एक मृगतृष्णा सी, जो नहीं होकर भी दिखती है रेगिस्तान में पानी सी-  
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To LoVe 2015: हाँ थोड़ी सी टूटन तो थी

हाँ थोड़ी सी टूटन तो थी और ज़रा सी तड़प भी
खाली खाली सा हूँ अब उस खलिश के जाने से


कुछ हर्फ़ दिल से निकल कर कागजों पर क्या उतरे
खामोश पानी मे कंकर से उठ गयी जाने कितनी लहरें
हम तो खामोश थे ,खामोश ही हैं और खामोश रहेंगे
पर लफ्ज तो हैं आवारा, चाहूं भी तो मै ये कहाँ रुकेंगे
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To LoVe 2015: महकने लगी हवायें

महकने लगी हवायें मौसम हुआ सुहाना
गुजारिश है तुमसे जरूर खवाबों मे आना
हम बैठेंगे घने कोहरे मे उसी पेड़ के नीचे
जो गिर गया तूफा मे बन चुका अफसाना 


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To LoVe 2015: जब जब उलझी डोरों को सुलझाया हमने

जब जब उलझी डोरों को सुलझाया हमने
खुद को फिर और उलझा हुआ पाया हमने।

जिन्दगी काश इतनी आसां होती
लड़ाई सिर्फ दुश्मनों के साथ होती
दांव आते थे दुनिया भर के मुझको
कभी गैरों ने दुश्मनी तो अता की होती।
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To LoVe 2015: धुंधलाती सुरमई यादें...

धुंधलाती सुरमई यादों के उन पीले पड़ते पन्नों को
दिल के उस तनहा कोने मे मै रोज उलटता चुपके से
कुछ बाते थीं कुछ नगमे थे और किस्से खट्टे मीठे से
उस कोने की तन्हाई मे कुछ अब भी बिखरा बिखरा है
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ओस मे भीगी चांदनी चुनरी ओढे चाँद मेरा

बड़ी अच्छी महक आ रही है। शायद कहीं रातरानी खिली है। रात गहरी और खुशबू लगातार गाढ़ी होती जा रही है। नींद तो पिछली कई रातों से गायब है। हल्की ठंडी हवा। खुला आसमान और छत पर मैं अकेला। चार छत छोड़कर दोमंजिले पर दो खड़ी चारपाइयों के बीच एक टेबिल लैंप जल रहा है। एक छाया झुककर कुछ पन्ने पलटती और फिर थोड़ी थोड़ी देर में उसे दोहराती। मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा और न मैं कुछ देख पा रहा हूं, थोड़ी ठंड लग रही है। सोचता हूं सारी रात मैं उस टेबिल लैम्प को तापूं- मेरी एक कहानी का हिस्सा बनेगा शायद यह टुकड़ा
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To LoVe 2015: बेटे के स्कूल में





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To LoVe 2015: अंजली तेंडुलकर तुम कम महान नहीं हो


सचिन के करियर से युवा एक और बात सीख सकते हैं। शादी अपने से बड़ी लड़की से करो, कम से कम जहनी तौर पर, जो समझदार हो, आपके प्रफेशन की दिक्कतों और जिम्मेदारियों को समझते हुए तालमेल बैठाएं और लड़कियों के लिए भी यह समझने वाली बात है कि अगर वह चाहें तो अपने पति को उन ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती हैं जो सचिन ने हासिल की बशर्ते वह सारी परेशानियों को अपनी समझदारी से हैंडेल करने की क्षमता रखें- मेरी तरफ से सचिन-अंजली और उनके परिवार को ढेर सारी शुभकामनाएं-




सचिन होने का मतलब। 24 वर्षोँ तक मैदान में खेलते एक शख्स को देखते हुए कुछ पीढ़ियों का जवान होना। जवानी के सपने देखती एक पीढ़ी के बालों का सफेद होना। बेसिक फोन के जमाने से मोबाइल इंटरनेट के दौर में पहुंचना। सबकुछ बदल रहा था, क्रिकेट टीम में भी गावस्कर गए, कपिल गए, अजहर, सौरभ् और द्रविड़ गए। एक जगह जो नहीं बदली, वो थी सचिन की। वो इसलिए क्योंकि यह शख्स खुद को लगातार बदल रहा था, देश की जरूरत के हिसाब से, क्रिकेट मुकाबलों की आवश्यकता के हिसाब और शरीर की क्षमताओं के हिसाब से। सचिन होने का मतलब है-खुद में एक मैनेजमेंट कोर्स या प्रबंधन गुरू का होना। जो यह बताता है कि अपने प्रफेशन में अगर आपको लिविंग लीजेंड बनना है तो कैसा जूनून और खुद को लगातार बदलने की कैसी क्षमताएं होनी चाहिए-
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To LoVe 2015: बंधे बंधे से रहना ही नियति बन जाती है

वो मेरा हाथ देखकर एक बात कही थी तुमने। न जाने क्या देख लिया अंगूठे के पोरों के बीच में। जाने कितनी देर तक बेसाख्ता हंसती रही थीं तुम। सब कुछ भुला दिया, तुमने नहीं मैंने, सच कुछ भी याद नहीं आता। है न, कभी कभी हम अपने मन को भी बांध लेते हैं, ऐसी गाठों से जो दोबारा लाख चाहो तो भी नहीं खुल सकतीं। एक ऐसी जकड़न जो कभी आजाद नहीं होने देती, बंधे बंधे से रहना ही नियति बन जाती है-
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To LoVe 2015: आधी रात के बाद जब...

आधी रात के बाद जब नींद नहीं आती ..हाँ और जब तुम भी नहीं आतीं ..तब यादों के उलटते पन्नों से एक पुराने फूल सी तुम गिरती हो..मेरे सपनों के आँगन मे..बादलों की धुंध और धुंध के उस पार झील के किनारे ..फिर न जाने कहाँ खो जाती हो तुम ...
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To LoVe 2015: ...तुमको भी कितने काम हैं

मुड़ के देखता हूँ फलक को दूर तलक.. जाने कितने ही चेहरे नजर आते हैं धुंधले धुंधले से..वो जो चमकते थे कभी बारिश के बाद निकले चाँद से ..कुछ गुनाह मेरी नजरों का कुछ ऐब आ गया है उनमे भी ..चलो फिर आगे कहीं ..हम भी मसरूफ बहुत ..तुमको भी कितने काम हैं
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To LoVe 2015: सवेरा-ए-अवध


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To LoVe 2015: सोचना अब और नहीं

मुकम्मिल
सच मे कोई नहीं
अधूरा
आखिर कौन नहीं
ख्वाहिशों
का कोई छोर नहीं
चिल यार
सोचना अब और नहीं
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To LoVe 2015: बोझ हंसी का ढोना

बोझ हँसी का ढोना
फिर चुपके से रोना
नींद छुपी पलकों मे
खोल के आंखे सोना
फिर चुपके से रोना
बोझ हंसी का ढोना
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होशियार... कि जनता जाग रही है


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To LoVe 2015: बादलों से आज मेरी बातें हुई...

बादलों से आज मेरी बातें हुई ..उनके घर जाकर मुलाकातें हुई ..बारिशों की बूंदों से घिरी उस धुंध में ..शिकवे उनके मेरी शिकायतें हुई ..बादलों से आज मेरी बातें हुई ..छतरी जो देखी हाथ मे तो मुस्कराये वो ..मेघों के मल्हार मे इसको क्यों लाये हो..घूर के मैने कहा जानते हो आप भी ..वो तो चला गया पर आदत है आज भी..साये को उसके साथ रखता हूँ आज भी ..बूंदों से बचा कर तुम्हारी ..आगोश मे उसे रखता हूँ आज भी ..बादलों से आज मेरी बातें हुई


मेरे घर के सामने वाली पहाड़ी आज बादलों मे छुप गयी ..बारिशों की झूम ऐसी तन मन सब भिगो गयी ..याद आती है वो पुरानी छतरी जो अक्सर सूखी ही रहती थी ..सारे शहर मे बारिश होती थी फिर भी मेरी छत ना गीली होती थी ..बदले वक्त मे बारिशों ने भी रंग बदला है ..पानी शायद मेरे लिये सारा बचा के रखा है ..पर अब भीगने मे वो पहली सी खलिश नहीं होती ..बादलों तुम्हे वक्त पर बरसने की आदत क्यों नहीं होती..



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To LoVe 2015: दामिनी/निर्भया : इस शोक से सबक लेना होगा


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To LoVe 2015: परिक्रमा करने-रोकने का सियासी दांव


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To LoVe 2015: बाबू आखिर कब समझोगे इशारे


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To LoVe 2015: राजनीति में क्रिमिनल की एंट्री, आप ही रोक सकते हैं


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To LoVe 2015: सचिन और अमिताभ होने के मायने


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To LoVe 2015: 'आदमी की निगाह में औरत' ने बदली सोच


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To LoVe 2015: सचमुच नाज़-ए-लखनऊ हैं केपी सक्सेना


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To LoVe 2015: शिकागो एयरपोर्ट... बड़ी मुश्किल में फंस गए थे हम

यह नजारा तीन साल पहले दिसम्बर में शिकागो एयरपोर्ट का है। बड़ी मुश्किल में फंस गए थे हम। मोबाइल काम नहीं कर रहा था। माइनस 14 टैम्परेचर, बर्फ गिर रही थी, ज्यादा पैसे थे नहीं पास में और शिकागो से दिल्ली आने वाली हमारी एयर इंडिया की फ्लाइट छूट चुकी थी। हम मैक्सिको से वापस आ रहे थे। खैर हमने शिकायत की अमेरिकन एयरलाइंस के अफसरों से क्योंकि उनकी फ्लाइट लेट होने के कारण हमारा जहाज उड़ चुका था। कहते हैं जो होता है अच्छे के लिए होता है। हम जिस बात को लेकर परेशान थे, वही खुशी का सबब बन गई। हम से अमेरिकन एयरलाइंस वालों ने कहा कि अब एक दिन शिकागो घूमिए। बढ़िया होटल में ठहराया, खाने पीने के लिए कुछ डॉलर भी दिए ओर फिर अगले दिन की फ्लाइट में सीट दिलाने का वादा किया। यह एक सरप्राइज था, हमें अमेरिका में उतरना ही नहीं था और हम शिकागो घूम लिए। अगले दिन जब हम रवाना हुए तो सबके चेहरे विजयी मुद्रा में खिले हुए थे-

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To LoVe 2015: महात्मा गांधी की पोती इला गांधी जी से मुलाकात


यूएन क्लाइमेट समिट कवर करने के लिए डरबन गया था। वहां मुलाकात हुई महात्मा गांधी की पोती इला गांधी जी से। एक दिन कुछ वक्त था, हमने उनका नम्बर पता किया, बात की और पहुंच गए उनके घर। वाकई में गांधी जी जिस सादगी के लिए जाने जाते हैं, वह उनके संस्कारों में नजर आई। उन्हें खुद चाय बनाकर पिलाई और लगा ही नहीं कि हम पहली बार उनसे मिले हैं। उनसे भारत ओर यहां की राजनीति पर काफी चर्चा हुई। इला गांधी का जन्म दक्षिण अफ्रीका में ही हुआ। उन्होंने बच्चों, महिलाओं और भारतीयों के लिए काफी काम किया है। वहां की राजनीति में भी काफी सक्रिय रही हैं। नौ साल के लिए उन्हें हाउस अरेस्ट भी रहना पड़ा। नेल्सन मंडेला को आजाद कराने के मूवमेंट से भी जुड़ी रहीं। उनसे मिलना और कुछ वक्त उनके साथ गुजारना निश्चित तौर पर एक सुखद अहसास है, गांधी से तो हम मिल ही नहीं सकते थे, कम से कम उनकी पोती के साथ मिलकर ही यह समझ में आया कि उनकी महान विरासत को उनके वंशज कैसे सहेजे हुए हैं-
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To LoVe 2015: रोली और लाली

रुई के फाहे जैसे छह नन्हे पिल्ले। दो झक सफेद और चार चितकबरे। यानी काले सफेद का मिक्स। लाली ने बच्चे दे दिए थे। कालोनी के ज्यादातर बच्चों का मालूम था कि उनके खिलौने आने वाले हैं। जीते जागते खिलौने। पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था। सारा दिन सामने पार्क में धमाचौकड़ी मची रहती। नन्हीं रोली को जाने किसने बताया दिया था कि पिल्ले को कान पकड़ कर टांगो। अगर वो चिल्लाए तो ठीक, नहीं तो समझो कुत्ता चोर टाइप है। रोली की लीडरशिप में बच्चों ने सारे पिल्लों को जांच लिया था, कोई चोर नहीं निकला। सारे पिल्ले रोए। इस जांच पड़ताल से नाराज लाली ने एक बच्चे के हाथ में दांत मार दिए। उसे चौदह इंजेक्शन लगवाने पड़ेगे। खामियाजा नन्हे पिल्लों को भुगतना पड़ा। रोली एंड कंपनी अक्सर उन्हें दूध, बिस्कुट, ब्रेड और कभी कभी चिप्स तक दे देती थी। सब बंद हो गया। बच्चों के एक्जा़म भी करीब थे। तीन पिल्ले एक एक करके मर गए। बाकी के तीन और लाली की मायूस आंखें रोली को भीतर ही भीतर परेशान करतीं। इस बार फिर छह पिल्ले हुए हैं। गोलमटोल। लाली किसी को पास नहीं आने देती। पर करीब दस बारह दिन बाद छह नन्हे शैतान खुद ब खुद सड़क और फिर पार्क तक पहुंच गए। बच्चों की आंखे चमक रही थीं। इस बार किसी बच्चे ने नहीं जांचा कि कौन सा पिल्ला चोर है। लाली भी दूर से चुपचाप देखती। किसी को नहीं काटा। पर इस बार ठंड बहुत थी। रोली ने एक दिन देर रात बालकनी से देखा। नन्हे पिल्ले रो रहे थे। ठंड की वजह से। सब एक के ऊपर एक। उसका मन किया मम्मी से चादर मांग कर उन्हें उढ़ा दे। यह ख्वाहिश जाहिर करते ही उसे डाट पड़ गई। ठंड में कुड़ कुड़ करते बच्चों को देख रात भर सो नहीं पाई। अगले दिन संडे था। सुबह देर से उठी तो बच्चों का झुंड नीचे शोर कर रहा था। उसने नीचे झाका तो दिल धक से रह गया। सफेद वाला एक पिल्ला मर चुका था। लाली बार बार उसे सूंघ रही रही थी। बाकी के पिल्ले उसके ऊपर लेटकर मानो गरमी देकर उसे जिलाने की कोशिश कर रहे थे। रोली यह देखकर रोने लगी। मम्मी को जब पता चला तो उन्हें भी दुख हुआ। कुत्ते के बाकी पिल्लों को बचाने के लिए अब सारे बच्चे जुट चुके थे। हर बच्चा कुछ न कुछ लाया कालोनी में ही सीढ़ियों के नीचे एक पुरानी रजाई बिछाई गई। हर बच्चा फटी चादरें, रुई और खाने पीने का सामान लेकर आया और फिर लाली के पिल्लों को वहां रख दिया गया। लाली खुद वहां आ गई। बच्चों को देखकर वह दुम हिलाने लगी। बच्चों को भी समझ आ गया कि वह थैंक्यू बोल रही है और रोली मन ही मन सोच रही थी, इस बार लाली के बाकी पिल्ले जरूर जिंदा रहेंगे-
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To LoVe 2015: एक खास दिन मिसाइलमैन एपीजे कलाम के साथ

मिसाइलमैन एपीजे कलाम ने कहा-दुनिया भर के लेखकों से मैं कहना चाहता हूं। वह, यह जानने की कोशिश करें कि आखिर कैसे गांधी जी की बात हजारों गांवों के लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती थी। उस वक्त आज की तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो था नहीं। दरअसल यह गांधी की लिखने की ताकत का कमाल था, वह बेहतरीन लिखते थे और रोजाना कम से कम एक पेज जरूर लिखते थे। गांधी कहते थे-कुछ करने से पहले उस सबसे गरीब आदमी का चेहरा याद करो, उसकी मजबूरियां याद करो जिसे तुमने देखा और फिर सोचो कि मैं कैसे उसकी मदद कर सकता हूं-
सच में आज कलाम साहब के साथ बिताया वक्त जिंदगी के कुछ सबसे खास लम्हों में से एक था। मैं जानता हूं कि लिटरेचरर कार्निवाल में आए बच्चों ने उनसे बहुत कुछ सीखा- खासतौर पर मैंने-

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To LoVe 2015: लगातार काम के बाद तीन दिन जिम कार्बेट में

करीब आठ महीने लगातार काम के बाद तीन दिन जिम कार्बेट में बिताए। बेहद रिफ्रेशिंग। एकदम तरोताजा महसूस कर रहा हूं। चालीस फिट ऊपर से सीधे नीचे नदी में गिरना हो या हवा में नदी के ऊपर से एक तरफ से दूसरी ओर जाना। सबकुछ जीवन दर्शन में बदलाव लाने वाला साबित हो रहा है। दो बड़ी बातें समझ आईं, अगर टीम के साथ एकजुट होकर काम करते हैं तो मुश्किल कुछ भी नहीं और जोखिम हर जगह है जिसे उठाने को तैयार रहना चाहिए।

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To LoVe 2015: ओंटेरियो झील पर सीएन टावर के नीचे



लेक ओंटेरियो को झील कहना हर लिहाज से गुस्ताखी होगी। टोरंटो में हार्बर पर खड़े क्रूज व बड़ी बड़ी बोट्स। अमेरिका के न्यूयार्क प्रांत को कनाडा के ओंटेरियो राज्य से जोड़ने वाली इसकी सैकडों मील की लम्बाई। हजारों तरह की वनस्पतियों, पेड़ पौधों और जीव जन्तुओं वाली बायोडायवर्सिटी मुझे हमेशा मजबूर करती है कि मैं इस झील को समुद्र के रूप में याद करूं। टोरंटो यात्रा के दौरान रोजाना मेरी सुबह और शाम इस झील के के किनारे ही बीतती थी। सुबह अक्सर हमारे साथ अरुण त्रिपाठी होते थे। वरिष्ठ पत्रकार हैं अरुण जी। 2006 में मैं हिन्दुस्तान लखनऊ में सीनियर रिपोर्टर था और वह दिल्ली में सीनियर न्यूज एडिटर। हम दोनो साथ ही टोरंटो गए थे। खैर बात सुबह की हो रही थी तो अरुण जी का जि़क्र आया। शाम वाले साथी और थे। अब बात की जाए सीएन टावर की। यह टावर टोरंटो की दूरसंचार सेवाओं को दुरुस्त रखने के लिए बनाया गया था पर अब यह पर्यटन केन्द्र के तौर पर जाना जाता है। काफी लम्बे अरसे तक यह विश्व का सबसे ऊंचा टावर माना जाता रहा। बाद में दुबई में बुर्ज खलीफा बनने के बाद यह पीछे छूट गया। फिर भी टोरंटो आने वाले हर पर्यटक इसकी ऊंचाइयों पर जाकर शहर व झील के नजारों को देखना नहीं भूलता। इसे सत्तर के दशक में बनाया गया था। वैसे यह सारी जानकारियां तो आप गूगल से भी ले सकते हैं। मैं तो बस फील का जिक्र करना चाहता हूं। अगस्त के महीने में जाइए, सबसे बढ़िया समय होता है। बहुत मजा आएगा-
 
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To LoVe 2015: टोरंटो के गोलगप्पे

टोरंटो में रहते रहते करीब दस बारह दिन बीत गए। कांटीनेंटल खाते खाते जी ऊब चुका था। सादा सादा, स्वाद के नाम पर नमक या काली मिर्च। आखिर कब तक। फिर खोज शुरू हुई भारतीय स्वादों की। चूंकि यहां भारतीय बड़ी संख्या में रहते हैं तो जाहिर है रेस्टोरेंट तो थे ही। तो फिर एक दिन हम निकल पड़े जेरार्ड रोड की ओर। यहां भारतीय और खासतौर पर दक्षिण एशियाई मुल्कों से जुड़े लोगों की बाजार है। साड़ी सूट जैसे विशुद्ध भारतीय परिधान भी यहां आपको मिल जाएंगे। खैर हमने धावा बोला साउथ इंडियन फूड चेन के मशहूर रेस्टोरेंट उडुप्पी पर। दोसा और रसम चावल खाकर तृप्त होने के बाद हमने इस बाजार को घूमना शुरू किया। यहां भारतीय फिल्मों के पोस्टरों के साथ इंडियन म्यूजिक शॉप भी दिखायी पड़ी। इसी दुकान में भेलपूड़ी, दही भल्ला और गोलगप्पे जैसी भारतीय चाट भी मिल रही थी। वैसे यह बताना जरूरी है कि मैने आजतक इतना महंगा गोलगप्पा आजतक नहीं खाया। पूरे चालीस रुपए का का एक। कुछ लोगों ने पान खाए। वैसे अच्छी बात यह रही कि जिन भारतीय लोगों ने यहां इंडियन रेस्टोरेंट या खानपान की दुकानें खोली हैं, वह क्वालिटी बहुत अच्छी रखते हैं। खाने का मजा जरूर आता है। टोरंटो में जेरार्ड रोड के अलावा भी कई जगहों पर भारतीय रेस्टोरेंट हैं। इनमें ज्यादा भीड़ नहीं होती क्योंकि ज्यादातर इनमें स्थानीय भारतीय या इंडियन टूरिस्ट ही खाने पहुंचते हैं। इक्का दुक्का विदेशी भी आते हैं पर जस्ट फॉर चेंज के मूड में। भारतीय डिशेज यहां लोकप्रिय हो रही हैं, लोग इन्हें जानते भी हैं पर वह लोगों की जुबान पर वैसे नहीं चढ़ीं, जैसे मैक्सिकन, चाइनीज़, थाई या इटैलियन फूड। हां समोसा जरूर यहां के कई स्टोर्स में दिख जाता है। सादे नमकीन आलू वाला जिसे यहां आप किसीी भी हालत में खाना शायद ही पसंद करें-
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To LoVe 2015: एक दिन रिचर्ड गेर के साथ

चूंकि मेरी पढ़ाई हिन्दी मीडियम की रही थी, इसलिए शुरुआती दिनों में हॉलीवुड या दूसरी अन्य विदेशी फिल्मों के बारे में जानकारी थोड़ी कम ही थी। अलबत्ता कुछ विदेशी स्टार्स जरूर ऐसे थे जिन्हें महज मै अपनी जनरल नॉलेज बढ़ाने के नजरिए से पहचानने और याद रखने की कोशिश करता। इन्हीं में शामिल हैं अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स और अभिनेता रिचर्ड गेर। इन्हें मैं तब से पहचानता हूं जब मैंने दसवीं क्लास पास की थी। अब इसे इत्तेफाक कहें या मेरी किस्मत। हॉलीवुड स्टार्स के साथ मेरी पहली मुलाकात भी रिचर्ड गेर के साथ हुई। 13 अगस्त 1996 को टोरंटो में। हम इंटरनेशनल एड्स कान्फ्रेंस में गेट्स फाउंडेशन की मदद से काइज़र फाउंडेशन वालों के साथ गए थे। रिचर्ड गेर भी इसी मकसद से स्टार टीवी और गोदरेज ग्रुप के साथ हीरोज प्रोजेक्ट चला रहे थे। इसी सिलसिले में काइज़र वालों ने हमारी एक एक्सक्लूसिव मुलाकात रिचर्ड, परमेश्वरन गोदरेज और उस वक्त के स्टार टीवी के सीईओ पीटर मुखर्जी के साथ कराई। रिचर्ड बेहद जमीनी शख्स निकले। यहां यह बताना वाजिब होगा कि रिचर्ड गेर का हालीवुड में वही रुतबा रहा है जब बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन का। दोनो तकरीबन समकालीन ही हैं। जिस वक्त अमिताभ दीवार और जंजीर के जरिए मुंबई में पांव जमा रहे थे, लगभग उसी वक्त यानी सत्तर के दशक की शुरुआत में रिचर्ड गेर फिल़्म अमेरिकन जिगेलो के जरिए लोगों के दिल पर छा रहे थे। बहरहाल हमारी मुलाकात दिलचस्प रही। उन्होंने भारत में चल रहे अपने प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी। करीब दो घंटे तक साथ रहे और इस दौरान एक बार भी यह अहसास नहीं होने दिया कि वह कितने बड़े स्टार है। मेरी लिए उनसे सीखने के लिए शायद यही सबसे बड़ृी बात थी-हमेशा जमीन पर रहना-
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To LoVe 2015: पांच दिन यूरोप में


यह एम्सटर्डम है। हालैंड की राजधानी। 2006 की वल्र्ड एड्स समिट में जाने से पहले ही हमने यूरोप घूमने का प्लान बना लिया था। राजस्थान पत्रिका के हमारे साथी हरेन्द्र ने एम्सटर्डम, डेन हॉग और पेरिस में होटल की बुकिंग करा ली थी। वैसे हमें जर्मनी भी जाना था पर वक्त की कमी के कारण वो बुकिंग कैंसिल करानी पड़ी। पांच दिन की यह यूरोप यात्रा पूरी तरह से हमारी जेब पर निर्भर थी। हम तीन थे मैं हरेन्द्र और लोकसत्ता मुंबई के शेखरदेशमुख। हम तीनों ने ही कनाडा यात्रा के दौरान रोजाना मिलने वाले खर्च को बचाया, कुछ पास से मिलाया और यूरोप घूम लिया। दरअसल केएलएम एयरलाइंस की जिस फ्लाइट से हम दिल्ली से टोरंटो गए, उसको आते और जाते वक्त एम्सटर्डम में ब्रेक लेना था। लिहाजा हमने उसी टिकट में थोड़ा संशोधन कराकर पांच दिन का प्रोग्राम बना लिया। चूंकि यह पहली विदेश यात्रा थी और कोई टूर आपरेटर या गाइड भी साथ नहीं था, इसलिए काफी कुछ सीखा। हालैंड में तो खैर लोग अंग्रेजी बोलते थे लेकिन पेरिस में। वहां तो कोई अंग्रेजी में जवाब नहीं देता। हां इनफार्मेशन सेंटर जरूर अपवाद थे।





यह है कैनकुन। दक्षिणपूर्व मैक्सिको का एक खूबसूरत बीच। इसे अमेरिका का गोवा भी कहा जाता है। मेरे पीछे कैरेबियन सागर है। बेहद साफ और चमकदार। 2010 में मैं यहां गया था। दुनिया में जितनी भी सुंदर जगहें देखी हैं, उनमें से एक है कैनकुन। यहां के एयरपोर्ट से शहर के बीच के तीस किलोमीटर की हरियाली अद्भुत है। स्थानीय भाषा में कैनकुन का मतलब नेस्ट ऑफ स्नैक्स होता है। सांप तो नहीं दिखे पर कई विचित्र किस्म के जीव मैने यहां देखे। इनमें विशालकाय छिपकलियां भी शामिल हैं। 1974 के बीच यह जगह एक बड़े टूरिस्ट डेस्टिनेशन के तौर पर डेवलप हुई। भारतीयों के लिए दूरी जरूर ज्यादा है। यहां से अमेरिका और फिर न्यूयार्क से चार घंटे की फ्लाइट

यह कैरेबियन सागर है। मुझे तैरना नहीं आता पर मौसम बढ़िया था और पानी इतना साफ कि खुद रोक नहीं सका। थोड़ी हिम़्मत की और उतर गया पानी में। मेरे साथी सिद्दार्थ पाण्डेय ने वादा किया था कि अगर मैं डूबा तो वो बचा लेंगे। खैर यह नौबत नहीं आई क्योंकि उस दिन समुद्र में हाईटाइड या ज्वार नहीं था और मैं बहुत ज्यादा आगे भी नहीं बढ़ा। कैरेबियन सागर के आसपास ही वेस्टइंडीज के टापू वाले देश हैं। हमेशा अफसोस रहेगा कि काफी पास होने के बावजूद मै वहां नहीं जा पाया। हमारे देश के हजारों गिरमिटिया मजदूर तीन चार पीढ़ी पहले वहां जाकर बसे थे और अब वहीं के होकर रह गए हैं-

यह हैं दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में एक माया संस्कृति के कुछ अवशेष। इस जगह का नाम चेचेनइत्जा है। मैक्सिको के दक्षिणपूर्वी हिस्से के युक्तान प्रांत में कैनकुन से करीब दो सौ किलोमीटर दूर। दुनिया भर के लाखों पर्यटक हर साल यहां आते हैं। मेरे पीछे एक पिरामिड है जो माया वास्तुशास्त्र और उनकी ज्योतिषीय जानकारियों का अद्भुत नमूना है। हॉलिवडु से लेकर बॉलिवुड तक कबीलों, खजानों और तंत्र मंत्र पर जितनी फिल्में बनती हैं उनमें से ज्यादातर के पीछे माया सभ्यता की परम्पराओं का जिक्र होता है। अफ्रीका और भारतीय कबीलों की कई संस्कृतियों और माया सभ्यता के बीच काफी समानताएं भी दिखती हैं। मसलन यहां के लोग भी शेर और हाथी को पूजते थे जिस तरह हमारे यहां मां दुर्गा की सवारी और गणेश जी मानते हैं। ढेरों अन्धविश्वासों के साथ साथ इस सभ्यता में काफी कुछ वैज्ञानिक भी था। खासतौर से वास्तुशास्त्र। इन पिरामिडों की छाया से अलग अलग मौसम में अलग अलग आकृतियां बनती हैं। हमने खुद शाम के एक वक्त एक पिरामिड की छाया से मुंह खोले सांप की आकृति बनते देखी। यह माया सभ्यता के लोगों की अद्भुत निर्माण शैली का प्रतीक है-


टॉरटिया यानी मैक्सिकन रोटी। आमतौर पर मैक्सिकन जायके एशियन खासतौर भारतीय स्वाद के थोड़ा करीब हैं। यहां यूरोप की तरह ठंडा और बेस्वाद खाना नहीं है। टमाटर, लाल मिर्च और दूसरे तीखे मसालों से यहां की डिशेज का स्वाद काफी कुछ अपना सा लगता है। टॉरटिया का इस्तेमाल बिलकुल अपनी चपाती की तरह होती है। चाहें सब्जियां आदि भरकर टेको बना लो या फिर अलग अलग तरह के रोल बनाकर कोई अन्य डिश। रोटी मक्का के आटे की बनती है। वैसे काफी जगहों पर गेहूं के आटे का भी इस्तेमाल होता है। होटल व रेस्टोरेंट्स में टॉरटिया पारम्परिक तौर तवे पर बेल और सेंक कर बनती है पर यहां ऐसी मशीनें भी हैं जिनसे एक घंटे साठ हजार रोटियां तक बन जाती हैं। मैक्सिकन जायकों में मीट व सीफूड की बहुतायत है। वैसे मेरी अपनी पसंद तो टेको और सीफूड था। यहां इटैलियन और चाइनीज़ फूड भी आसानी से मिल जाता है। एक दो इंडियन रेस्टोरेंट भी हैं-

कैनकुन में मुख्य शहर से बाहर डाउन टाउन जाते ही आपको इस तरह आर्मी की गाड़ियां नजर आएंगी। इन पर मशीनगनों के साथ खड़े सैनिक अनायास भय का अहसास कराते हैं। दरअसल मैक्सिकों में पिछले कुछ सालों से ड्रग माफिया वार चल रही है। इसमें पांच हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। यह युद्ध ज्यादातर उन इलाकों में होते हैं जहां देश की सीमाएं हैं। कैनकुन के इलाके में भी करीब एक हजार किलोमीटर लम्बी सीमा है। वैसे अच्छी बात यह है कि कभी इस लड़ाई में टूरिस्टों को कोई नुकसान नहीं हुआ। हम यहां करीब दस दिन तक रहे, कभी भी किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। कैनकुन जाइए और आराम से घूमिए-



यह है मैक्सिकन हैट। मैक्सिको आने वाले ज्यादातर पर्यटक इस हैट को यादगार के तौर पर अपने साथ ले जाना नहीं भूलते। हालांकि मैं भूल गया। इस तरह की हैट ज्यादातर इस देश के कस्बाई इलाकों में लोगों के सिर पर दिखती है। टूरिस्टों में भी यह काफी लोकप्रिय है। वैसे मैक्सिको के अलावा इस तरह की हैट्स स्पेन में भी काफी पसंद की जाती हैं। मैक्सिकन हैट डांस भी काफी मशहूर है। इस डांस में थ्री पीस सूट के साथ ऐसी हैट पहने हुए प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए टैप डांस करता है। अपने स्टैप्स और हावभाव से उसे प्रभावित करना चाहता है। दूसरी तरफ प्रेमिका जो साधारण से कपड़े पहने हुए होती है, वह इस डांस से कतई प्रभावित नहीं होती और उसे इग्नोर करती है। डांस के आखिरी हिस्से में प्रेमी अपनी हैट उतारकर जमीन पर फेंक देता है और कुछ फुर्तीले स्टैप्स दिखाता है। मसलन वह अपनी टांगों को अपने सिर के ऊपर ले जाकर अपनी स्मार्ट्सनेस दिखाता है। इससे खुश होकर उसकी साथी फिर साथ में डांस करने लगती है। बहरहाल ऐसा करने का कोई अवसर मेरे पास नहीं था। इस बारे में मुझे यहां पूछने पर ही पता चला।

 
विदेश से अगर आपको दोस़्तों-रिश्तेदारों के लिए गिफ्ट खरीदने हों और ज्यादा खर्च भी न करना हो तो फ्लीया मार्केट सबसे अच्छा विकल्प होता है। इसकी तुलना अब लखनऊ के लव लेन से कर सकते हैं। फ्लीया मार्केट जैसे बाजार ज्यादातर देशों में होते हैं अलग अलग नामों से। मिसाल के तौर मैं अगर कैनकुन की बात करूं तो यहां काफी अच्छी चीजें मिल रही थीं। पर जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो वहां डरबन बीच पर लगी दुकानों के सामान न तो ज्यादा अच्छे थे और न ही सस्ते। लिहाजा खरीददारी देखभाल कर ही करनी चाहिए और हां मोलभाव सबसे जरूरी है। कई बार चीजें कई गुना महंगी करके बतायी जाती हैं। मैने कैनकुन की इस बाजार में इतना ज्यादा मोलभाव किया कि दुकान चला रही महिला झल्ला गई। एक स्वेटर मुझे बेचने के बाद उसने मुझसे मेरा नाम पूछा, मैने कहा सुधीर, उसने गुस्से में कहा-नो सुधीर यू आर चीपो फिलिपो, मैं हंसता हुआ चला आया-


 यकीन मानिए, यह मेरे पुराने ई 63 नोकिया मोबाइल से खींचा गया फोटोग्राफ है। सिर्फ दो मेगापिक्सल वाले कैमरे से। कैनकुन के ग्रैंड कैनकुन होटल की खासियत यही है कि यहां के ज्यादातर कमरों से समुद्र में उगते हुए सूरज की खूबसूरती को रोज सुबह निहार सकते हैं। मैने तो पहली ही रात पौने छह बजे का अलार्म लगाया। रात में मेरे रूम पार्टनर सिद्धार्थ और मैने तय किया था कि दोनो लोग देखेंगे पर वह गहरी नींद सो रहा था। मै चुपचाप एक कुर्सी लेकर कमरे के बाहर टैरेस पर आ गया। सूरज अभी निकला नहीं था। कैरेबियन सागर के क्षितिज पर जैसे ही लालिमा गहरी हुई, मैने मोबाइल कैमरा ऑन कर लिया। यकीन मानिए इतना सुंदर नजारा नहीं देखा। धीरे धीरे अंडे की जर्दी जैसा नारंगी सूरज उदय हो गया। सूरज उगने और डूबने के नजारे दुनिया के कई मुल्कों में बेहद खूबसूरत होते हैं। पर पहाड़ों और समुद्र के किनारे इनकी बात ही कुछ और होती है। खासतौर पर फोटोग्राफी करने में-
 मैक्सिको से भारत लौटते वक्त शिकागो होकर आना था हालांकि हमको वहां रुकना नहीं था। अमेरिकन एयरलाइंस में कुछ तकनीकी गड़बड़ी के कारण फ्लाइट लेट हो गई। इस वजह से दिल्ली जाने वाली हमारी फ्लाइट छूट गई। खैर, अमेरिकन एयरलाइंस वालों ने उस रात हमें होटल रेडिसन में ठहराया और कहा-कुछ घंटे शिकागो घूम लीजिए, फिर कल अगली फ्लाइट लीजिएगा। हमारी तो निकल पड़ी, खासतौर मैं क्योंकि मेरे पास एक गरम जैकेट थी और वहां काफी बर्फबारी हो रही थी। तापमान करीब माइनस आठ था। मै होटल पहुंचा और निकल पड़ा घूमने। पास में ही एक मॉल था। वहां जाकर खरीदारी की। फिर बाहर निकलकर बर्फबारी का मजा लिया। हम चार लोग थे। एनडीटीवी के सिद्धार्थ पाण्डेय, टेलीग्राफ के जयंतो और लोकमत के राजू नायक। ठंडे इतनी ज्यादा थी कि सबकी हालत खराब हो गई। उपाय सूझा कि रम पी जाए। कैप्टन मॉर्गन रम ली और शिकागो का मशहूर पिज्जा होटल के कमरे में ही मंगाया गया और फिर शुरू हुआ जश्न। वो रात कभी नहीं भूलती। बेहद ठंडी रात। रात दो बजे तक हम अमेरिका के होटल के उस कमरे में हिऩ्दी गानों पर नाचते रहे। बड़ा सुकून था कि अच्छी खरीदारी हो भी गई। मैने एक कैमरा और जैकेट ली। साथियों ने कई इलेक्ट्रानिक गैजेट्स खरीदे। वहां सस्ते मिल रहे थे। हां एक मलाल जरूर था कि हमारे पास शिकागो में चंद घंटे ही थे, ज़्यादा घूम नहीं सके। यादगार के नाम पर शिकागो के फिफ्थ वल्र्ड बैंक के सामने खिंचवाई गई यह तस्वीर ही है कि हमने कैसे शिकागो का मजा लिया। सच तो यही है कि हम वहां कुछ खास देख नहीं पाए। सिवा ओ हेर एयरपोर्ट, होटल रेडिसन और एक मॉल के- खैर फिर कभी शिकागो भी देखा जाएगा और अमेरिका भी-
 
यह नियाग्रा फॉल। सन 2007, यह पहला मौका था जब मुझे पासपोर्ट बनवाने की जरूरत पड़ी। काइज़र फाउंडेशन यूएस से मुझे एचआईवी एड्स पर रिपोर्ट करने के लिए एक फैलोशिप मिली। इसी दौरान कनाडा के टोरंटों में वल्र्ड एड्स कान्फ्रेंस हुई। मुझे भी इसमें जाने का मौका मिला। जिंदगी के वो पल सबसे ज्यादा रोमांचित करने वाले थे। मुझे पहली बार दिल्ली में कनाडा एम्बेसी में हुई एक पार्टी में जाने का मौका मिला। इसमें बताया गया कि कनाडा कैसा देश है, वहां की क्या खासियत है। कनूाडा के राजदूत हम लोगों से मिले। अगस्त के महीने में हम टोरंटो पहुंचे। हम कान्फ्रेंस से पांच दिन पहले ही पहुंच गए थे। इस दौरान हैल्थ जर्नलिज्म पर हमारी कुछ वर्कशॉप थीं। इसी दौरान काइज़र फाउंडेशन वाले हमे नियाग्रा फॉल दिखाने ले गए। अमेरिका और कनाडा के बीचोबीच नियाग्रा नदी के यह विशालकाय जलप्रपात सेवन वन्डर्स में गिने जाते रहे हैं। वाकई में यह आश्चर्य ही हैं। अथाह जलराशि इतनी तेजी से नीचे गिरती है कि उससे बादल बन जाते हैं जो मीलों दूर से आसमान में नजर आते हैं। फॉल्स के नीचे जाने के लिए क्रूज टाइप के बड़े बड़े मोटरबोट होते हैं। इनमें जाने से पहले नीली पॉलीथिन का एक रेनकोट पहनना होता है क्योंकि यहां काफी ज्यादा नमी होती है जिसमें लोग भीग जाते हैं। हम बोट से वहां गए और दुनिया की सबसे खूबसूरत मानी जाने वाली इस जगह के यादगार लम्हों को जेहन में समेट लाए। वाकई यह ऐसे पल थे जो कभी नहीं भूले। टोरंटो से नियाग्रा तक के करीब चार घंटे के बस के सफर की बात न की जाए तो यह गलत होगा। सफर बेहद खूबसूरत था। इस दौरान हमने कनाडा के कंट्री साइड को देखा। वाइनरीज देखीं जहां दुनिया की सबसे अच्छी माने जाने वाली वाइन बनती हैं। वाइनरीज़ के मालिक सीधे हैलीकाप्टर से खेतों में उतरते हैं। रास्ते में पड़ने वाले ढाबों में कोई भी तली भुनी चीज नहीं मिली। फल, जूस और ड्राइफूट जैसी चीजें। एकदम अलग और नया अनुभव था देने वाली थी यह यात्रा-
 हर किसी की जिंदगी में ऐसे लोग आते ही हैं जो गहरा असर छोड़ते हैं। मेरे जीवन के कुछ ऐसे लोगों में कल्पना जैन भी हैं। काफी पहले टाइम्स ऑफ इंडिया में हैल्थ एडिटर रही हैं। फिलहाल हावर्ड यूनीवर्सिटर में फैकेल्टी हैं। मेरी इनसे पहली मुलाकात शायद 2006 के आखिर या 2007 में हुई थी। उस वक्त कल्पना काइज़र फाउंडेशन की इंटरनेशनल फैलो थीं। उन्हीं के जरिए मुझे भी भारत में काम करने के लिए यह फैलोशिप मिली। इस फैलोशिप के दौरान मैने पहली बार हेल्थ जर्नलिज्म की गहराई और गंभीरता को सही अर्थों में समझा। कल्पना जैन पहली ऐसी जर्नलिस्ट हैं जिन्होंने एचआईवी पॉजिटिव लोगों की तकलीफ और उनके प्रति समाज के नजरिए को एक किताब के जरिए लोगों के सामने रखा। उनकी किताब का नाम पॉजिटिव लाइव्स है जिसे पेंग्विन ने छापा। यकीन मानिए कि मुझे पहले रोग, रोगियों औरक सेहत से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता न के बराबर थी, कल्पना जैन से मिलने के बाद मैने लोगों के दर्द को समझा। टोरंटों में ऐसी कई वर्कशॉप और सेशन हुए जिसने मुझे जर्नलिज्म के प्रति कहीं ज्यादा मेच्योर किया- खैर यह फोटो उसी दौरान नियाग्रा फॉल्स भ्रमण की है-
 नियाग्रा नदी अमेरिका और कनाडा के बीच का नेचुरल बॉर्डर है। 19वीं शताब्दी में इस नदी पर कोई पुल नहीं था। तब न्यूयार्क की एक कंपनी मेड ऑफ मिस्ट दोनों देशों के लोगों को इधर से उधर लाने ले जाने के लिए मोटरबोट की फेरी चलाती थी। इस मोटरबोट को ही मेड ऑफ मिस्ट कहते हैं। बाद में नदी पर ब्रिज बन गया। इससे बोट वालों की आमदनी एकदम से घट गई। बाद में इसे एक टूरिस्ट बोट में बदल दिया गया। आज हर साल लाखों लोग अमेरिका और कनाडा की साइड से इस विशाल जलप्रपात को देखने आते हैं। यहां आने वाले मिस्ट ऑफ मेड फेरीबोट के जरिए ही इस प्रपात के करीब तक जाना होता है। यह बेहद खूबसूरत नजारा होता है। पानी की फुहारों और सूर्य की रोशनी के परावर्तन से अक्सर अक्सर इंद्रधनुष दिखता है। मै जिस दिन गया, मुझे भी वो नजारा नजर आया। यहां जाने के लिए सभी लोगों को एक रेनकोट दिया जाता है जिस पर मेड ऑफ मिस्ट लिखा होता है। इसे लोग यादगार के तौर पर अपने साथ ले जाते हैं।
 सपनों की तामीर का शहर टोरंटो
मेरे सपनों की तामीर का शहर। भूगोल पढ़ना बहुत अच्छा लगता था बचपन से। कौन सा देश कहां है, महाद्वीप कितने हैं और कौन सा महासागर सबसे गहरा। प्रेयरीज घास के मैदान कहां हैं और आल्पस हिल्स की रेंज किस कांटीनेंट है। यह सारी बातें मुझे बचपन से रटी हुई थीं और आज भी हैं। बड़ी ख्वाहिश थी कि इन सारी जगहों को जिन्हें मैने पढ़कर याद किया है, उन्हें देख के समझूं। मेरी यह ख्वाहिश पूरी हुई और टोरंटो वह पहला शहर था जहां पहली बार विदेश की जमीन पर मैने पांव रखे। एक लम्बी लेमोजि़न सरीखी टैक्सी हमे लेने के लिए एयरपोर्ट पर खड़ी थी। आखिर हम उस वक्त दुनिया के सबसे बड़े रईस बिल गेट्स के फाउंडेशन के मेहमान जो थे। टोरंटो एयरपोर्ट शायद दुनिया का पहला ऐसा एयरपोर्ट है जहां अंग्रेजी और फ्रेंच के साथ साथ गुरुमुखी में भी शहर का नाम लिखा है। भारतीय बड़ी तादाद में यहां रहते हैं। खासतौर पर सिख् और गुजराती सिन्धी। यहां की सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनी का नाम खालिस्तान ट्रांसपोर्ट कंपनी है। भारतीय खाने, कपड़े, म्यूजिक और तमाम दूसरी चीजों की यहां बड़ी बाजारें हैं। घूमने लायक काफी जगहें हैं। ओंटेरियो झील के किनारे बसा यह शहर कनाडा के सबसे शहरों में से एक है। मै यहां वल्र्ड एड्स कान्फ्रेंस को कवर करने के सिलसिले में पहुंचा था-

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