रविवार, 28 अक्तूबर 2012

To LoVe 2015: बस यूं ही कभी-कभी.....

बस यूं ही कुछ पंक्तियां बन गईं....कच्चे घड़े की तरह....कविता नहीं..गद्य का हिस्सा होती ये पंक्तियां...पर जाने क्यूं बस यूं ही निकल पड़ी ये पंक्तियां...बिना सोच समझे...

boletobindas
सफर बिना किसी तलाश के
बस यूं ही कभी-कभी
मन को उड़ान भरने दो
बस यूं ही कभी-कभी.....
चल पड़ो क्षितिज की ओऱ
हवा को बाहों में बांध लो
या दरिया के संग बह लो......
बस यूं ही कभी-कभी.......
चांदनी रातों को जग लो
किसी को ख्वाब में आने दो
बस यूं ही कभी-कभी.....
किसी को पुकार लो
बस यूं ही कभी-कभी.....
बादलों संग बरस लो
रिमझिम सावन संग भींग लो
बस यूं हीं कभी-कभी.....
चल पड़ो सफर पर
बिना मंजिल की तलाश के
बस यूं ही कभी-कभी
दिल का कहा मान लो...
बस यूं ही कभी-कभी......
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बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

जरुरत है धनुर्धर राम की...जय हो.....

           आज विजयदशमी है....नवरात्र का आखरी दिन...आज ही भगवान राम बुराई के प्रतीक रावण का अंत करते हैं और मर्यादा की स्थापना करते हैं। ये सदियों से होता आय़ा है। हमारी नजरों में लाखों सालों से औऱ आधुनिक इतिहास के पन्नों में दर्ज साक्ष्यों के अनुसार 5000 साल से। ज्ञात इतिहास के इन पांच हजार साल में भारत दुनिया का सिरमौर रहा। दुनिया को सबसे महानतम सम्राट अशोक दिया। बाद में इन्हीं सदियों के आखिरी के एक हजार साल में धर्म का अनुसरण करने वाली सभ्यता के लोगो का आध्यात्मिक-भौतिक पतन भी देखा।

          सालों तक अरब से उठने वाली हुण..मंगोलों और जंगली कबीलों की फौज को हमने तहस-नहस किया था। दसवीं सदी के अंत तक सागर की लहरों पर हम राज करते थे। दक्षिण में राजराजा चोल औऱ उनके बेटे राजेंद्र चोल ने समुद्र की लहरों पर हुकुमत की। उससे पहले मगध सम्राट समुद्रगुप्त की ताकत का ये आलम था कि समुद्र पार करके जिन देशों मे मगध की सेनाएं गई भी नहीं वहां के शासक उन्हें सालाना तौर पर नियमित कररुपी भेंट दिया करते थे। फिर हमने पतन की इंतिहा देखी..पहले अरब के लुटेरों से हारे.....नतीजा 700 साल की गुलामी मिली। अरब से आए लुटेरे बाद में भारत में ही बस गए....जिसका हमपर व्यापक असर हुआ। सत्ता के भय से हमारी काफी आबादी ने धर्म बदला। अंत में 1947 में विभाजन झेला। दरअसल पोगा पंडितों ने दुनिया के सबसे उन्नत लोगों को बर्बाद कर दिया। पोगा पंडितों के कारण ही सागर यात्रा को पाप माना जाने लगा। नतीजा ये निकला की समुद्र के रास्ते ही आए अंग्रेजों ने 300 साल तक भारत को गुलाम बनाए रखा।

         पहली बार इस गुलामी की छाती पर 1857 में शहीद मंगल पांडे ने पहली गोली दागकर भगवान राम के वंशजों की तरफ से ऐलान किया कि अब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ चुकी है। उसी सोते भारत की आत्मा को जगाने के लिए महात्मा गांधी ने राम नाम का सहारा लिया। जब भारत की आत्मा में जगी...तो बिस्मिल, अशफाक उल्ला, आजाद, शहीदे-आजम औऱ नेताजी सरीखे जाबांज भगवान राम के धनुष से छुटे अचूक बाणों की तरह गुलामी की छाती को भेदकर ही थमे।

         तमाम दुश्वारियों से भरी इन सदियों में अगर कुछ नहीं बदला तो वो है हमारी आस्था...औऱ उसी का एक प्रतीक है रामलीला। भारतीय धर्म की मर्यादा के आधार भगवान राम के जीवन पर अधारित रामलीला। गुलामी भरे हजार साल में यही मर्यादा की कथा थी जिसने हमारे अंदर की आस्था को मरने नहीं दिया। सात समुद्र पार वेस्ट इंडिज तक...एशिया में टाइगर देशों तक..आज भी भगवान राम विद्ममान है। दो दिन पहले ही रामलीला में दर्शकों की भीड़ ये साबित कर रही थी की अंतरमन में अब भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम जीवित हैं।
         आज आजादी के 65 साल गुजर चुके हैं...औऱ हमें उसी भगवान राम की जरुरत है जो शांति के लिए रावण का वध करते हैं। आज का रावण भ्रष्टाचार और आतंकवाद और गद्दारों के भेष में छिपा हुआ है। इस रावण का अंत कर शांति की स्थापना के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम धनुर्धर राम की जरुरत है।  भगवान राम के आदर्शों को अपनाने के लिए उनका जीवन चरित्र हमें अपने जीवन में उताराना होगा। याद रखिए धर्म की रक्षा भी तभी हुई जब भगवान राम ने धनुष उठाया। इसलिए पूजिए उन मर्यादा पुरुषोतम भगवान राम को जिन्होंने मर्यादा की स्थापना तो की..पर धनुष कभी नहीं छोड़ा। यही विजयादश्मी है...यही देशभक्ति है। यही विजयादशमी का संदेश है........। जय हिंद
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मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

To LoVe 2015: बीजेपी को नए अध्यक्ष की तलाश !


बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गड़करी अब भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिर गए हैं। गडकरी भले कहें कि वो किसी भी जांच का सामना करने को तैयार हैं, लेकिन नैतिकता की दुहाई देने वाले गडकरी को अब पार्टी का अध्यक्ष पद तुरंत छोड़ देना चाहिए । वैसे तो संघ चाहता था कि गड़करी को पार्टी के अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल भी दिया जाए, इसके लिए रास्ता भी बना दिया गया, लेकिन जिस तरह से नितिन के ऊपर गंभीर आरोप लगे हैं, उससे उन्हें दूसरी बार अध्यक्ष बनाना पार्टी के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा। संघ भी अब इतनी आसानी से उन्हें दूसरा कार्यकाल देने को तैयार नहीं होगा। अगर बीजेपी को 2014 में कांग्रेस के भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाना है तो उसे गड़करी को ना सिर्फ अध्यक्ष पद बल्कि जांच  होने तक पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखाना ही होगा। जानकार  तो यहां तक  कह रहे हैं कि पार्टी में नए अध्यक्ष की तलाश भी शुरू हो गई है।

एक-एक कर आजकल नेताओं का असली चेहरा जनता के सामने आने लगा है। बीजेपी  अध्यक्ष किसानों की जमीन हथियाने के आरोपों से पहले ही घिरे थे, इसी बीच अब एक और विवाद उनके नाम जुड़ गया है। ये आरोप हल्का फुल्का नहीं है, बल्कि एक अंग्रेजी अखबार ने खुलासा किया है कि उनकी कंपनी को घाटे से उबारने के लिए आईआरबी कंपनी ने 164 करोड़ रुपये का लोन दिया। आपको हैरानी होगी कि ये वही कंपनी है जिसे महाराष्ट्र में तमाम कार्यों का ठेका दिया गया, और ये ठेके उस समय दिए गए, जब गडकरी वहां के लोकनिर्माण मंत्री थे। आरोप तो ये भी है कि लोन में दिए गए पैसे का स्रोत भी साफ नहीं है।

इस खुलासे के बाद बीजेपी नेताओं की बोलती बंद है। आरोप है कि 16 अन्य कंपनियों के एक समूह के गडकरी की कंपनी में शेयर हैं। लेकिन इन 16 कंपनियों के जो डायरेक्टर हैं, उनके नाम का खुलासा होने से गड़करी का असली चेहरा जनता के सामने आ गया है। आपको हैरानी होगी कि उनका ड्राइवर जिसका नाम मनोहर पानसे, गडकरी का एकाउंटेंट पांडुरंग झेडे, उनके बेटे का दोस्त श्रीपाद कोतवाली वाले और निशांत विजय अग्निहोत्री ये सभी इन विवादित कंपनियों के डायरेक्टर हैं। ताजा जानकारी के अनुसार गड़करी के नियंत्रण वाली पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड 64 करोड़ रुपये के घाटे में चल रही थी । 30 मार्च 2010 को आइडियल रोड बिल्डर्स यानी आईआरबी ग्रुप की फर्म ग्लोबल सेफ्टी विजन ने उसे 164 करोड़ रुपये लोन दिया। आईआरबी ग्रुप को 1995 से 1999 के बीच महाराष्ट्र में तमाम सरकारी ठेके दिए गए। उस दौरान गडकरी ही लोक निर्माण मंत्री थे। आईआरबी ने पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड के तमाम शेयर भी खरीदे। मसला वही सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता का लगता है।

गडकरी महाराष्ट्र के लोक निर्माण मंत्री थे तो आईआरबी को भारी मुनाफा हुआ और जब गडकरी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए तो उनकी घाटे की कंपनी को उबारने के लिए वही आईआरबी सामने आ गई। इसके बाद भी गडकरी दावा कर रहे हैं कि वे जांच के लिए तैयार हैं। वो ये भी कह रहे हैं कि 14 महीने पहले कंपनी के चेयरमैन के पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उनके पास अब कंपनी के केवल 310 शेयर हैं जिनकी कीमत महज 3100 रुपये है। सच तो ये है कि देश की जनता गोरखधंधे की बारीकियों में नहीं जाना चाहती। मोटी-मोटी बात लोगों के समझ में आती है। यानि गड़करी के घाटे वाली कंपनी को कोई भी 164 करोड़ रुपये लोन यूं ही तो देने वाला नहीं है, जाहिर उसने कुछ अपना फायदा देखा होगा। आईआरबी को जो फायदा हुआ है, अब वो भी सबके सामने है, यानि गड़करी के लोक निर्माण मंत्री रहते हुए उसे बहुत सारे कामों के ठेके मिले।

इस खुलासे के बाद गड़करी खेमा सफाई देने में जुट गया है। कहा जा रहा है कि वो  हर तरह की जांच का सामना करने को तैयार हैं। बीजेपी का ये भी दावा है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार है, अगर बीजेपी अध्यक्ष की कंपनी में कुछ भी गडबड़ है तो वो उसकी जांच करा लें। हालांकि राजनीतिक स्तर पर कुछ भी कहा जाए, पर अहम सवाल ये है कि पूर्ति ग्रुप को आईआरबी या ग्लोबल सेफ्टी विजन ने लोन किस मद से दिया। मसलन पैसे का स्रोत क्या है ? 2009 के रिकॉर्ड बताते हैं कि पूर्ति में निवेश करने वाली 16 कंपनियों में चार ही लोग ही घूम-घुमाकर डायरेक्टर के पद पर हैं। नितिन गडकरी के बेटे निखिल को 22 फरवरी 2011 को पूर्ति का एमडी बनाया गया था। ऐसे में ये कहना कहां तक ठीक है कि गडकरी का कंपनी से रिश्ता नाममात्र का है।

जब राजनीति के किसी पूर्णकालिक कार्यकर्ता की जगह कारोबारी दिमाग के लिए जाने जाने  वाले गडकरी को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था, तो आरएसएस की वजह से ही उन पर ज्यादा सवाल नहीं उठ पाए थे। इस बीच पार्टी में पहले ही एक खेमा नितिन को अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल दिए जाने के खिलाफ था, अब गड़करी के खिलाफ गंभीर आरोप लगने से उन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाना पार्टी के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बना हुआ है, अगर बीजेपी को 2014 में कांग्रेस को दिल्ली से उखाड़ फेंकना है, तो उसे ये साहस भी दिखाना होगा कि वो वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। इसके लिए कोई कितने बड़े पद पर क्यों ना हो, उसे बाहर का रास्ता दिखाने में कोई हिचक नहीं है।

अगर बात बीजेपी के अंदर चल रहे घटनाक्रम की करें, तो एक तपका चाहता है कि नितिन गड़करी को तत्काल अध्यक्ष पद से हटा दिया जाना चाहिए। इस समय हिमाचल के साथ ही गुजरात में भी विधान सभा के चुनाव चल रहे हैं। बीजेपी के लिए गुजरात बहुत ही अहम है। दोनों ही राज्यों में पार्टी अध्यक्ष को चुनाव प्रचार के लिए जाना है। अब सवाल उठता है कि गड़करी जब खुद गंभीर आरोपों का सामना कर रहे है तो वो सरकार के भ्रष्टाचार की बात भला कैसे कर सकते हैं। हिमाचल में कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह को कटघरे में खड़ा करना भी उनके लिए आसान नहीं होगा। इन हालातों में अगर नितिन गडकरी का दो एक दिन में त्यागपत्र हो जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।  पता चला है कि चुनावों को  देखते हुए इस मामले  में संघ पर भी जल्दी फैसला लेने का दबाव बढ़ रहा है। पार्टी और संघ के भीतर नए अध्यक्ष के मसले पर मथन भी शुरू हो चुका है। हालांकि अभी इस मामले में पार्टी का कोई भी नेता कुछ भी बोलने  को तैयार नहीं है।

वैसे भी बीजेपी में चाल, चरित्र और चेहरे की बात अब पुरानी हो गई। आप ये भी कह सकते हैं कि बात पुरानी नहीं बल्कि खत्म हो गई है। अगर कोई मुझसे पूछे कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है, तो मैं पार्टी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेई और लाल कृष्ण आडवाणी को ही कटघरे में खड़ा करुंगा। आप हमारी बात से सहमत होंगे बीजेपी को मजबूत बनाने में इन्हीं दोनों नेताओं की मेहनत रही है, लेकिन ये पार्टी को संघ के चंगुल से बाहर नहीं निकाल पाए। यही वजह है कि आज पार्टी में ना अनुशासन है, ना मजबूती है ना ईमानदारी और ना ही पार्टी के प्रति समर्पण। देश जानता है कि बीजेपी अध्यक्ष नितिन गड़करी संघ की पसंद है, सच कहूं तो उन्हें पार्टी पर थोपा गया है, क्योंकि वो पार्टी में बहुत जूनियर हैं। सच्चाई तो ये है कि उन्हें अध्यक्ष बनाया ही नहीं जाना चाहिए था, लेकिन उन्हें दूसरा कार्यकाल दिए जाने का रास्ता बनाया दिया गया। बहरहाल अब उनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं और अगर बीजेपी 2014 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहती है तो उसे गड़करी को बाहर करना ही होगा।


जरूरी सूचना :  मैने अपने  नए   ब्लाग  " TV स्टेशन " को नया लुक दिया है। जरा  एक नजर वहां भी जरूर डालिए।   http://tvstationlive.blogspot.in/   कैसा लगा ? अगर ये भी बताएंगे तो मुझे खुशी होगी।



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शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

To LoVe 2015: Teacher's Day


In India, 5th September is celebrated as Teaches' Day as a mark of tribute to the contribution made by teachers to the society. 5th September is the birthday of a great teacher Dr. Sarvapalli Radhakrishnan, who was a staunch believer of education, and was the well-known diplomat, scholar, President of India and above all a Teacher.

When Dr. Radhakrishnan became the President of India in 1962, he was approached by some of his students and friends and requested him to allow them to celebrate 5th September, his "Birthday". In reply, Dr.Radhakrishnan said, "Instead of celebrating my birthday separately, it would be my proud privilege  if September 5 is observed as Teachers' Day". The request showed Dr.Radhakrishnan's love for the teaching profession. From then onwards, the day has been observed as Teachers' Day in India.

One of the most celebrated writers in the modern India today his work varies on philosophical, theological, ethical, educational, social and cultural subjects. He contributed numerous articles to different well-known journals, which, are of immense value and seems to surprise various readers because of the depth in the meaning of the articles.
Teachers mold the lives that they influence because the lessons learned from teachers remain with their students throughout life. We should always respect our teachers. Teachers need encouragement and support from the community to feel that their devotion to students is appreciated.


Teachers' Day

Teachers' Day is now one of the occasions that is looked forward by the teachers and students alike as on this occasion its not only when teachers are praised but also around various schools students dress up as a representation of their teachers and take various lectures that are assigned to the teachers they represent. As the day passes the students perform the regular activities that are performed by the teachers. On this day students realize what it means to be a teacher and what it means to control the future of several students in their classes and also teachers are reminded what it felt like when they were the students.

Apart from the fun aspect of the day it is also a day when one can look back, admire and get inspired by Dr. Radhakrishnan, a small town cunning boy, who grew up to become one of the most respected politicians in the history of democracy of India.

A good teacher is like a candle - it consumes itself to light the way for others.
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To LoVe 2015: THE FOX AND THE CROW




Once there was a hungry fox. She went out in search of food. She wandered here and there. But she failed miserably to get food anywhere. At last she saw a crow sitting on the top of a tree. He had a piece of cheese in his beak. The fox wanted to get his piece of cheese in his beak. The fox wanted to get this piece of cheese at all.

She reached near the tree. She thought of a plan there and then. She began to praise the black crow. She said to him,"You are very beautiful to look at. Your beak is equally very pretty. Your voice is as sweet as the honey itself." The crow was a fool of the first water. He was immediately puffed up. Without thinking twice he began to caw-caw. As son as he opened his mouth the piece of cheese fell down on the ground below. The cunning fox picked it up. She swallowed it at once. The poor crow remained without cheese. The poor crow remained without cheese. He proved himself extremely foolish.

The simple flattery of the fox made the silly crow lose his piece of cheese. After devouring the cheese the clever fox left the place saying : 'You are very black. Your voice is very ugly. You sing hoarse. You are an owl'.

The simple crow was cut to the quick. But what he could do now. It was too late. He had become a prey of flattery. He had been a victim of his own foolishness.


Moral :

Your flatteres are your real enemies.

OR

Flattery never pays.
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To LoVe 2015: Well Begun Is Have Done




If we begin a work with earnestness (sincerity), its completion is sure shot. There is no hitch or hesitation in its fulfillment. There arise hundreds of difficulties and troubles at the beginning stage. If your start is ok the end will be ok too. There is no doubt in the rewarding end. It is both bright and brilliant.


Those who start their daily work early in the morning, they ably do a lot of work when others are still asleep. Their beginning portion was well begun. It got a good start. In the race itself, the start counts a lot. It should be fine. It must proclaim your alertness. It must show your quickness. Here promptness is a must. Then the rest of the race is a usual matter. You will be at the top. No one will be a able to beat you, none will defeat you.

In the race of life, competition meets you at every step. If you prepare for it with all seriousness, if you give it a good start, the result will be remarkable. It will be fruitful. Your success will be dead certain.

Begin your every day’s work whole-heartedly. No half-heartedness will deliver us any good. Those who are work-shirkers, they make an ass of themselves. Plan your work quite intelligently, then excuse it with all resources at your command. Tap every resource within your means and even out of your reach. When you begin a work splendidly the completion will be equally splendid and superb. The million dollar question is the beginning part. Those who do not fail or falter at the starting point of the track, they outshine in the race, and this is the golden rule in every walk of life. Good beginners are at the top of everywhere. They begin their work in all faithfulness. They come out with flying colors. They win laurels. Their beginning is perfect. Their end will be fully perfect. No loophole ever persists in their work. There is a charm in this perfection. There is a permanent uniqueness. So, begin your work well and get the magnificent end. 



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शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

To LoVe 2015: चारो खाने चित "टीम केजरीवाल"

खुलासा सप्ताह मना रही टीम अरविंद केजरीवाल फिलहाल चारो खाने चित हो गई है। वजह और कुछ नहीं बल्कि केजरीवाल समेत उनके अहम सहयोगियों पर नेताओं से कहीं ज्यादा गंभीर आरोप लगे हैं। हैरानी इस बात पर है कि खुद केजरीवाल की भूमिका पर भी उंगली उठी है। इसे ही कहते हैं " सिर मुड़ाते ही ओले पड़े "। अरे भाई कितने दिनों से एक ही बात समझा रहा हूं कि बेईमानी की बुनियाद पर कभी भी ईमानदारी की इमारत खड़ी नहीं हो सकती है। इसलिए पहले खुद को साफ सुथरा दिखना भर ही काफी नहीं है बल्कि अपने काले कारनामों को बंद कर जनता के बीच माफी मांगना होगा। अगर जनता माफ कर देती है, फिर आप दूसरों पर उंगली उठाने की कोशिश करें। बताइये अपना दामन साफ किए बगैर खुलासा सप्ताह मनाने लगे। अब केजरीवाल को भी जवाब देना होगा कि क्यों वो सब कुछ जानते हुए एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के मामले में खामोश रहे। उनके सहयोगी प्रशांत भूषण को कैसे हिमांचल में चाय बगान की वो जमीन आवंटित हो गई, जो नियम के तहत सामान्य व्यक्ति को नहीं हो सकती। महाराष्ट्र की अंजलि दमानिया ने कैसे खेती की जमीन लेकर बिल्डरों को बेचा और मोटा मुनाफा कमाया ?

खुलासा सप्ताह की शुरुआत सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा से हुई। चूंकि मैं काफी दिनों तक मुरादाबाद में अमर उजाला अखबार से जुड़ा रहा हूं। इसलिए जब वाड्रा पर आरोप लगा तो मुझे कत्तई हैरानी नहीं हुई। मैं इस परिवार को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। दो दिन बाद केजरीवाल के निशाने पर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद आ गए। आरोप लगा कि विकलांगो के नाम पर सरकारी रकम की बंदरबाट की गई। कांग्रेस पर काफी हमला कर चुके थे, लिहाजा अरविंद पर ये आरोप ना लगे कि वो बीजेपी के इशारे पर सब कर रहे हैं, इसलिए अपनी छवि जनता में बनाए रखने के लिए उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी को भी निशाने पर लिया। नितिन पर आरोप लगाया तो गया, पर कमजोर तथ्यों को लेकर उन्हें घेरने की कोशिश हुई, इसलिए बीजेपी को ये मुश्किल में नहीं डाल पाए। गडकरी के मामले मे तो मैं ये भी कह सकता हूं कि केजरीवाल ने मीडिया और देश को गुमराह किया। उन्होंने तथ्यों को गलत ढंग से रखा, लगा कि जमीन के अधिग्रहण के मामले की उन्हें जानकारी ही नहीं है। वैसे भी नितिन गडकरी को ये जमीन बेची नहीं गई है। सरकार ने उन्हें सिर्फ 11 साल के लिए लीज पर दी है।

खैर एक के बाद एक खुलासे से केजरीवाल को लग रहा था कि उनका सियासी ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। लेकिन पूरी टीम तब बैक फुट पर आ गई, जब केजरीवाल समेत अहम सदस्यों पर भी गंभीर आरोप लगे। अच्छा इसमें केजरीवाल तो आरोप को खारिज भी नहीं कर सकते, क्योंकि उन पर किसी राजनीतिक दल ने आरोप नहीं लगाया है, बल्कि उन्हें महाराष्ट्र के एक पूर्व आईपीएस वाई पी सिंह ने कटघरे में खड़ा किया है। वाई पी सिंह को  पूरा देश जानता है कि वो एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रहे हैं, उन्होंने देखा कि मौजूदा सिस्टम में ईमानदारी से नौकरी करना संभव नहीं है तो नौकरी ही छोड़ दी। महाराष्ट्र के पूरे सिचाई घोटाले के मामले की जानकारी केजरीवाल को उन्होंने ही दी। केजरीवाल को जो अभिलेख और जानकारी दी गई थी, उसमें शरद पवार का लवासा प्रोजेक्ट भी शामिल था। लेकिन केजरीवाल ने मीडिया के सामने अधूरे तथ्य रखे और गडकरी को ही निशाने पर लिया, पवार का उन्होंने नाम तक नहीं लिया। जबकि वाईपी सिंह ने जो अभिलेख केजरीवाल को दिए थे, उसमें सिर्फ शरद पवार ही नहीं बल्कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले, भतीजे अजित पवार समेत कुछ और लोगों का काला चिट्ठा था। अब सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल पर ऐसा क्या दबाव था कि उन्होंने पवार फैमिली का नाम तक नहीं लिया।  अब केजरीवाल की भूमिका की जांच कहां होगी और कौन करेंगा ?

इंडिया अगेंस्ट करप्सन की एक और सदस्या अंजलि दमानिया की बात कर लें। टीवी कैमरे पर पानी पी पी कर नेताओं को कोस रही दमानिया का चेहरा भी दागदार निकला। आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि पर आरोप लगा है कि किसानों की ज़मीन खरीद कर उस ज़मीन का उपयोग बदलवा कर ऊंचे दामों में बेचा। अग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया है कि  अंजलि दमानिया ने 2007 में करजत के खरवंडी गांव में सात एकड़ ज़मीन खरीदी, इसके ठीक बाद इस जमीन का उपयोग बदलने की अर्जी दे दी। हालांकि ज़मीन बेचने वाले किसानों का दावा है कि दमानिया ने उनसे कहा था कि वो यहां खेती करेंगी, लेकिन उन्होंने ज़मीन का लैंड यूज चैंज करा दिया और 39 प्लॉट काट दिए। उन्हें ज़मीन का इस्तेमाल बदलने की इजाज़त रायगढ़ के कलेक्टर ने दी थी। लैंड यूज बदलते ही दमानियां भी बदल गईं और उन्होंने पूरी जमीन एसवीवी डेवलपर्स को दे दी, जिसमें दमानिया भी डारेक्टर हैं। आरोप है कि  कुल 39 प्लॉट काटे गए जिनमें से सैंतीस प्लॉट अलग अलग लोगों को मोटे दाम में बेचा गया।

इतना ही नहीं दमानियां जमीनों की जिस तरह से खरीद फरोख्त करती हैं, उससे तो नहीं लगता है कि वो सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनका काम बिल्डर जैसा ही दिखाई दे रहा है। कहा जा रहा है कि दमानिया ने करजत के जिस खरवंडी गांव में ज़मीन खरीदी, उसके बगल के गांव कोंदिवाड़े में भी उन्होंने 30 एकड़ जमीन खरीद ली। वहां बन रहे कोंधाणे बांध के खिलाफ दमानिया ने इसी साल अप्रैल में पीआईएल दायर की। आरोप तो ये भी है कि केजरीवाल अंजलि दमानिया की जमीन बचाने के लिए ही आरोप लगा रहे हैं। दरअसल अंजलि ने पिछले वर्ष जून में महाराष्ट्र में सिंचाई विभाग को एक पत्र लिखा था कि कोंधाने-करजाट बांध में उनकी जमीन अधिगृहीत न की जाए। इसकी जगह बांध को 700 मीटर आगे शिफ्ट कर दिया जाए जहां आदिवासियों की जमीन है। अंजलि की मौजूदा लड़ाई इसी से संबंधित है। अब अंजलि के मामले का खुलासा हो जाने के बाद स्थानीय प्रशासन ने सभी मामलों की जांच शुरू कर दी है।

टीम केजरीवाल के एक और सहयोगी प्रशांत भूषण का मामला भी कम गंभीर नहीं है। हिमाचल प्रदेश में प्रशात भूषण की सोसायटी को चाय बगान के लिए आरक्षित जमीन दे दी गई। भूषण ने कागड़ा जिले के पालमपुर में 2010 में करीब साढ़े चार हेक्टेयर जमीन खरीदी है। ये जमीन कुमुद भूषण एजुकेशन सोसाइटी के नाम है। प्रशांत भूषण ही इस सोसाइटी के सचिव हैं। ये जमीन यहां कॉलेज खोलने के नाम पर ली गई थी। 2010 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने बाकायदा धारा-118 के तहत ये जमीन खरीदने की इजाजत भी दी है। इस जमीन पर कुछ बिल्डिंग बन गई हैं और कुछ का काम चल रहा है। सवाल ये उठता है कि हिमांचल में आम आदमी तो जमीन भी नहीं खरीद सकता, फिर भूषण की सोसायटी को वो जमीन कैसे मिल गई जो चाय बगान के लिए आरक्षित थी ? जाहिर है कि उनकी पहुंच का ही नतीजा है। अगर भूषण को हिमाचल में वो जमीन मिल सकती है जो चाय बगान के लिए है, और जहां कोई निर्माण तक नहीं किया जा सकता। अपनी पहुंच का फायदा उठाने वाले ऐसे लोग दूसरों पर कैसे कीचड़ उछाल सकते हैं, इनमें इतना नैतिक बल आता कहां से है ? भूषण जी की जमीन पर केजरीवाल खामोश क्यों है ? नितिन गड़करी को तो जमीन सिर्फ 11 साल की लीज पर मिली है, तो हाय तौबा मचा रहे हैं।

इंडिया अंगेस्ट करप्सन के एक और हिमायती हैं मयंक गांधी। नाम के साथ गांधी शब्द जुड़ा है तो हम सबको उम्मीद थी कि चलिए कम से कम मयंक यहां ऐसे सदस्य है,जिन पर आप भरोसा कर सकते हैं कि वो गलत नहीं करेंगे। अब गांधी जी भी आरोपों के घेरे में है। वो भी ऐसे वैसे आरोप नहीं हैं, जमीन की धांधली की शिकायत है। कहा जा रहा है कि पहले तो उन्होंने एक एनजीओ बनाया। एनजीओ के नाम पर सरकारी जमीन ली और वो भी सस्ते में। लेकिन बाद में उन्होंने इस जमीन को अपने रिश्तेदारों को बेच दिया। ये सब क्या है भाई गांधी जी।

इसीलिए कहते हैं कि शीशे के मकान में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। अब देखिए ना लगभग पूरी टीम ही चोरी चकारी में घिरती नजर आ रही है। फिलहाल आज केजरीवाल साहब शाम को घर से बाहर निकले और कहा कि तीन लोगों की एक कमेटी बना दी है, वो हमारे सदस्यों के मामले की जांच करेंगे और अगर ये दोषी होंगे तो इन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा। हाहाहहाहाह कमाल है केजरीवाल साहब। पहले तो ये बताइये कि कमेटी किसने बनाई है ? जब आपने ही कमेटी बनाई है और आप सब पर आरोप है तो कैसे मान लिया जाए कि कमेटी आपकी सही जांच करेगी ? अच्छा पार्टी तो अभी बनी भी नहीं है तो इन लोगों को किस पार्टी से निकाल देंगे आप ?  अगर वाकई आपको अपने सदस्यों की जांच चाहिए तो जैसे दूसरों के मामले में जांच की मांग करते हैं, वैसे ही सरकार से मांग कीजिए की जांच कराए।

महत्वपूर्ण ये है कि आपकी बनाई कमेटी को कोई अधिकार हासिल  है नहीं। ऐसे में ये टीम जांच कैसे कर पाएगी। टीम को जांच के लिए सरकारी अभिलेखों  की भी  जरूरत  होगी। अब सरकारी अधिकारी आपकी बनाई टीम को सरकारी अभिलेख भला क्यों दिखाएंगे ? मान लीजिए अगर टीम प्रशांत भूषण की जांच करती है तो उसे सरकारी अभिलेख में ये देखना होगा कि जो जमीन चाय बगान के लिए आरक्षित थी, वो जमीन ही भूषण को दी गई है। अब भूषण जी तो आपको ये अभिलेख टीम को दिखाने वाले नहीं है, इसके लिए तहसील में अभिलेखों की जांच करनी  होगी। जांच का ये विषय भी होगा कि कैसे जमीन दी गई, किसके आदेश पर जमीन दी गई, नियमों की अनदेखी  कैसे की  गई। ये बात प्रशांत टीम  को बताएंगे ? अंजलि  के मामले  को ले लें, उनके मामले में भी सरकारी अभिलेखों  की जरूरत होगी। ये टीम कैसे सरकारी अधिकारियों और अभिलेखों को तलब कर पाएगी। कृषि की जमीन का किन हालातों  में लैंड यूज बदला  गया, इसमें कौन कौन से नेता  अफसर जिम्मेदार थे, ये कौन बताएगा। केजरीवाल  साहब देश को गुमराह  मत कीजिए। 

एक सवाल  आप  से  पूछता हूं  केजरीवाल साहब । अगर आप बिना जांच के कानून मंत्री का  इस्तीफा मांग सकते हैं,  तो बिना जांच के अपने सदस्यों को टीम से बाहर क्यों  नहीं  कर सकते ?  मैं कहता  हूं  कि गंभीर आरोप लगा  है, ऐसे में  कम से कम अपने सहयोगियों को तो  टीम से बाहर करने की  हिम्मत दिखाइये। ये कह कर आप बच नहीं  सकते  कि आपने जांच टीम बना दी है, कल को साबित  हो जाए कि  हां लोगों ने गडबड़ी की है तो आप अपना पुलिस स्टेशन  बनाकर कहें कि उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है। फिर अपनी अदालत और जेल भी बना लीजिए। वैसे  भी आप ने ऐलान  किया है कि आप  मनमोहन सिह को आप अपना  प्रधानमंत्री मानते ही नहीं है। मतलब  साफ है कि देश के लोकतंत्र में आपको  यकीन ही नहीं रह गया है। समानांतर व्यवस्था चलाने  के हिमायती  हैं, तो फिर दिखावा क्यों ?  बनाइये संसद, पुलिस स्टेशन, अदालत और जेल। 

बहरहाल नेताओं पर आरोप लगता है तो हमें उतनी हैरानी नहीं होती, क्योंकि आज लोग नेताओं के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करते। हालत ये है कि भले ही नेताओं पर आरोप ही लगे कि उन्होंने करप्सन किया है, फिर भी हम बिना जांच के ही मान लेते हैं कि हां नेता है तो जरूर किया होगा। लेकिन करप्सन के खिलाफ बड़ी बड़ी बातें करने वाले जब ऐसे मामले में शामिल होते हैं तो देश का भरोसा टूटता है। मैं देख रहा हूं कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन से जितने लोग भी जुड़े हैं, सभी के अपने एनजीओ की अलग अलग दुकान है। आमतौर पर सभी  अपने  एनजीओ से मोटा माल बनाने में लगे  हैं।  कुतर्क से सच  को नहीं दबाया  जा सकता, सच पारदर्शी  होता है,  जिसे जनता देख रही है। इस सवाल  का क्या जवाब  है आपके पास कि जो लोग  भी शुरू से आपके साथ  जुड़े थे, एक एक कर सब अलग हो गए। वजह क्या है कि अलग  हुए ज्यादातर लोगों को अरविंद केजरीवाल से ही शिकायत  है। बेचारे अन्ना को ये कहने  को क्यों  मजबूर  होना पड़ा की अब टीम केजरीवाल ना उनके नाम का इस्तेमाल करेगी  और ना  ही चित्र का। अगर अन्ना ऐसा कहते हैं तो आसानी से समझा  जा सकता  है कि दाल  में कुछ काला  जरूर है।


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To LoVe 2015: वाईपी जी अपने की तो न लो जान रे...

अपने तो न साधो निशाना
लगता है कि केजरीवाल को सभी ने नेता तकसीद कर लिया है...और इसकी बानगी कल दिखी मुंबई में जहां दूसरों पर आरोप लगाने वाले केजरीवाल पर निशाना साधा उनके ही सहयोगी पूर्व आइपीएस वाईपी सिंह ने। मुंबई में केजरीवाल पर वाईपी सिंह ने जमकर आरोप लगाए। उन्होंने केजरीवाल पर शरद पवार को बचाने का आरोप लगाते हुए कहा कि गडकरी का मामला पवार की तुलना में छोटा है। वाईपी सिंह केजरीवाल को हिटलर बताने से भी नहीं चुके। उन्होंने आरोप लगाया कि हिटलर ने जैसे कहा कि जर्मनी को बचाने के लिए उसे लाओ....ठीक उसी तरह केजरीवाल भी कह रहे हैं कि भारत खत्म हो जाएगा..देश को बचाने के लिए उन्हें लाओ...वगैरह....वगैरह.....।

      इस सबके बीच जनता भौंचकी होकर आरोपों का ये खेल देख रही है। ये किसी ने सोचा नहीं था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने वाले सिपाही बाद में इस तरह एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल लेंगे। शास्त्रों का मत है या शायद वेद वाक्य...”जितनी मुंडी होगी..उतने भिन्न-भिन्न विचार होंगे..”। तो अगर विचार भिन्न हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा...। यानि दो व्यक्ति हमेशा हर मुद्दे पर एकमत नहीं हो सकते। मगर इस बात को जानकर भी लोग बवाल खड़ा करने से बाज नहीं आ रहे। अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि जैसे-जैसे समय बढ़ा आंदोलन के सिपाही बिखरते चले गए। सबकी अपनी-अपनी ढफली...अपना-अपना राग है। हालात इतने खराब हैं कि ये सभी अपने ही लोगों पर निशाना लगा रहे हैं।

     अगर केजरीवाल ने पवार से पहले गडकरी पर निशाना साध दिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया है....। असल में जिस दिन से केजरीवाल एंड कंपनी ने वाड्रा और सलमान खुर्शीद पर हमला बोला था..उसी दिन से लोग इस बात का इंतजार कर रहे थे कि क्या केजरीवाल औऱ उनके साथी भाजपा पर निशाने साधेंगे या नहीं?..उधर कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही थी कि केजरीवाल एंव उनके साथी भाजपा की टीम बी हैं। ऐसे में लाजिमी था कि गडकरी का मामला पहले उठे......क्योंकि गडकरी पर हमला प्रमुख विपक्षी पार्टी को भी कठघरे में खड़ा करने के बराबर था। यानि गडकरी पर हमला बोल कर केजरीवाल एंड टीम ने सही राजनीतिक चाल चली। इन हालात में वाईपी सिंह जी का केजरीवाल सरीखे अपने ही लोगो पर निशाना साधना गलत है।
       उल्टा चंद उसूलों के नाम पर केजरीवाल को घेरकर पूर्व आईपीएस वाईपी सिंह जी ने नेताओं का काम ही आसान किया है। क्या ये सच नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में उठ रहे अंसतोष की अलग-अलग आवाज को एकजुट कर दिल्ली तक केजरीवाल एंड कंपनी ही आई। ऐसे में केजरीवाल पर निशाना साधना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है।
       जंतर-मंतर से उठे आंदोलन का मकसद जनलोकपाल के माध्यम से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना था....उसके उद्गम पर चोट करना था...औऱ ऐसा सख्त प्रहार सिर्फ संसद ही कर सकती है...औऱ संसद तक पुहंचने का एक ही रास्ता है औऱ वो है कि राजनीति। वाईपीजी की तारीफ की जानी चाहिए कि वो अदालत में लवासा प्रोजेक्ट के मामले में पवार के खिलाफ आखरी दम तक लड़ेंगे। मगर वाईपी सिंह जी को समझना चाहिए कि अगर हर मामला अदालत में लड़ा जाएगा तो न तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग तेज होगी....न ही हम किसी नतीजे पर पहुंचगे। ऐसे में आंदोलन का मकसद अदालतों के बाहर कतार में ही लगा रह जाएगा। ये बात सबको समझनी चाहिए कि बात सिर्फ एक नेता की नहीं है..बल्कि उस परिपाटी पर चोट करने की है जो हमें दीमक की तरह खा रही है।

 भ्रष्टाचार पर दमदार तरीके से वार करने के लिए समाज को झकझोरना होगा...मंजिल तक पुहंचने के लिए संसद के रास्ते पर ही चलना होगा...अदालतें इस रास्ते का एक अह्म पड़ाव जरुर हैं....पर भ्रष्टाचार के शिखर पर प्रहार संसद में बने कानून से ही होगा। मगर सब इसी तरह आपस में लड़ते रहेंगे कैसे काम होगा। ऐसे कदम देश की जनता के आंदोलन को कमजोर ही करेंगे...औऱ आंदोलन का कमजोर होना एक बड़ी त्रासदी होगा। मत भूलिए इस आंदोलन की धमक अमेरिका तक पहुंची थी। सरहद पार भी लाखों लोगों के दिलों में आशा जगी थी कि शायद आतंकवाद के खिलाफ वो जंग लड़ सकें।
    हम सबको यही दुआ करनी चाहिए कि आंदोलन का हर सिपाही सेनापती न बने...सेनापति अपने को एक सिपाही के समकक्ष ही समझे....औऱ मंजिल मिलने तक कोई एक-दूसरे के खिलाफ तलवार नहीं खींचे।
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मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

To LoVe 2015: मंत्री के काबिल नहीं रहे सलमान ...

 आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को अब पद पर बने रहने का अधिकार नहीं रह गया है। भाई आपको हो क्या गया है ? हर किसी को धमकी देते फिर रहे हैं, पत्रकार को कोर्ट में देख लेने की धमकी, अरविंद टीम को फर्रुखाबाद में देख लेने की धमकी। एक मंत्री अगर ऐसा कहे कि फर्ऱूखाबाद चले तो जाएंगे, लेकिन लौटने का भी इंतजाम कर लीजिए। ये क्या बात है ? क्या कहना चाहते हैं मंत्री जी, क्या आप ये कह रहे हैं कि जो आपके काले कारनामों की पोल खोलेगा उसकी आप सुपारी दे देंगे ? जो बात कहते हुए आपको देश ने सुना है, उसके बाद तो आप एक मिनट भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहने के काबिल नहीं है। ऐसी धमकी देने वाले की जगह जेल होती है। बिना किसी लाग लपेट के आपको तत्काल देश की जनता से माफी मांगनी चाहिए। वैसे भी जांच में जो प्राथमिक सूचनाएं उत्तर प्रदेश से मिल रही हैं, उससे आपका गोरखधंधा सामने आता जा रहा है।  
कानून मंत्री सलमान खुर्शीद साहब फिलहाल बुरे फंस गए। बेचारे अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार बैठे। खुर्शीद साहब आपको तो हम सब सुलझा हुआ नेता समझते हैं, पर आप भी वही निकले। ( जब तक मामला कोर्ट में है तब तक मैं आपको भ्रष्ट नहीं कह रहा।) पर एक बात बताऊं इस मामले में जितने कागजात मीडिया के पास हैं, उससे तो आप के खिलाफ स्टोरी बनती ही थी और आजतक ने अगर आपको कटघरे में खड़ा किया तो मैं समझता हूं कि कोई गल्ती नहीं की। वैसे सलमान जी एक बात बताइये, आप भी जानते हैं कि जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फैंकते। आपको ये राय किसने दे दी कि घर पर मीडिया को बुलाकर तेज आवाज में बात कर उनकी आवाज दबाने की कोशिश करो। क्या जरूरत थी प्रेस कान्फ्रेंस में पत्रकारों पर भारी पडने का प्रयास करने की। देखिए ना जो खबर एक दो दिन चल कर हट जाती, वो आज तक चल रही है और उसमें आपकी कितनी फजीहत हो रही है।

वैसे सलमान साहब सब जानते हैं कि चाहे आपका ट्रस्ट हो या फिर किसी और का। कहीं ईमानदारी नहीं है, इसीलिए तो जब नेताओं ने कहा कि लोकपाल के दायरे में नेताओं को डालो तो एनजीओ को भी शामिल कर दो। तो बड़े बड़े लोगों की हवा निकल गई थी, खुद अरविंद केजरीवाल ने भी इसका विरोध किया। बाद में सफाई दी गई कि उन एनजीओ को इसमें शामिल किया जाए जो सामाजिक कार्यों के लिए सरकार से पैसे लेते हैं। देश में 40 फीसदी से ज्यादा ऐसे एनजीओ हैं, जिन्हें विदेशों से पैसा मिलता है। उन्हें लगा कि वो ऐसा बोल कर बच सकते हैं, क्योंकि इस पैसे का दुरुपयोग होता ही है। सरकारी पैसे लेने वाले जो एनजीओ हैं उसमें 90 फीसदी एनजीओ नेताओं और अफसरों की पत्नियों के नाम है। नेता और अफसर अपनी पत्नी को एनजीओ का कर्ताधर्ता बनाकर सरकारी पैसे की लूट करते हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है, इसलिए इस पर ज्यादा चर्चा करना ही बेकार है।

आइये सलमान खुर्शीद साहब से ही बात की जाए। दरअसल सलमान जी देश में चोर वही है जो पकड़ा जाए। गुस्सा मत हो जाइयेगा, पर ये सच्चाई है कि आप पकड़ गए। आपके ट्रस्ट का कच्चा चिट्ठा सार्वजनिक हो चुका है। इसलिए अब ये कहना कि सब कुछ अच्छा भला है तो इस बात को कोई नहीं मानने वाला। सच बताऊं मुझे लगा कि आप लंदन से दिल्ली आने पर जब देखेंगे कि पूरा माहौल आपके खिलाफ है, तो आप कुछ ऐसा निर्णय लेगे, जिससे आपकी किरकिरी होने से बच जाए। आदमी कितना भी बड़ा क्यों ना हो, लेकिन जब वो बेईमानी में फंस जाता है तो उसके लिए आंख मिलाकर बात करना संभव नहीं रहता है। ऐसे में मुझे नहीं पता कि आप किसकी सलाह पर मीडिया से दो दो हाथ करने को तैयार हो गए और प्रेस कान्फ्रेंस में आस्तीन चढ़ाने लगे। सलमान साहब सच में आपने एक अच्छा मौका गवां दिया। आप कह सकते थे कि ये सारा मामला दो तीन साल पुराना है, मैं मंत्री बनने के बाद ट्रस्ट के काम में ज्यादा वक्त नहीं दे पाया। मीडिया ने जो भी आरोप लगाए हैं, मैं चाहूंगा कि उसकी जांच सरकार भी करे और मैं भी करुंगा। दोषी लोग बख्शे नहीं जाएंगे। इससे सांप भी मर जाता और लाठी भी बची रहती। पर आपने उल्टा किया, हालत ये हो गई कि मीडिया ने आपकी जितनी किरकिरी नहीं की, उससे ज्यादा तो आपने अपने आचरण से करा ली।

अच्छा अभी भी आप हास्यास्पद काम कर रहे हैं। मानहानि का मुकदमा दिल्ली, मुंबई और लंदन में कर रहे हैं। अखबारों में पढ़ा कि आपने दो सौ करोड़ रुपये की मानहानि का दावा  ठोका है। मैं सोचता था कि आप जैसे नेताओं के मान सम्मान की कोई कीमत नहीं लगा सकता, देश दुनिया में आपका नाम है। लेकिन आपने खुद ही अपने सम्मान की कीमत लगा दी, इसीलिए सब कह रहे हैं कि आपकी कीमत लगाई जा सकती है। खैर मेरा मानना है कि आप सैकड़ों अदालत में मामला दायर करते, लेकिन कीमत टोकन मनी एक रुपया रखते तो आपका सम्मान बहुत ज्यादा बढ़ जाता। सलमान साहब आप वकील हैं, ज्यादा बेहतर कानून समझते हैं। आपको ऐसा नहीं लग रहा है कि आप कई कोर्ट में मामला दर्ज कर मीडिया हाउस पर अनैतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ये तो टीवी टुडे ग्रुप है, कोई हल्का फुल्का ग्रुप होता तो उसका संपादक अब तक आपके चरणों में आ गया होता। आपकी कार्रवाई में इसी अहम की बू आ रही है। अच्छा एक सवाल मेरा भी है, एक ओर आप खुद सरकार को पत्र लिख रहे हैं कि पूरे मामले की जांच करा ली जाए, दूसरी ओर मानहानि का मामला भी दायर कर रहे हैं। अगर जांच रिपोर्ट में ये बात साबित हो जाए कि आपकी संस्था में भ्रष्टाचार हुआ है, तो फिर किस बात की मानहानि। ऐसे में पहले तो जांच रिपोर्ट का इंतजार आप भी कर लेते, उसके बाद कोर्ट जाते। लेकिन साहब आप तो मंत्री है, जांच रिपोर्द में जो लिखा होगा, वो आपको पहले ही पता है, इसीलिए तो जांच की बात भी कर रहे हैं और मानहानि का मुकदमा भी। 

सलमान साहब एक शिकायत है आपसे। आप बहुत पुराने नेता हैं और उत्तर प्रदेश में काफी समय तक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, मेरा मानना है कि आपको प्रेस कान्फ्रेंस में अपने व्यवहार पर चेक लगाना चाहिए था। आमतौर पर जब आदमी के पास किसी बात का जवाब नहीं होता है, या उसकी कोई चोरी पकड़ जाती है तो वो सामने वाले पर तेज आवाज में बोलकर हावी होने की कोशिश करता है। इसीलिए ना " चोरी और सीनाजोरी " की कहावत ज्यादा सुर्खियों में रहती है।  हो सके तो प्रेस कान्फ्रेंस की सीडी किसी मीडिया हाउस से मंगवा लें, और खुद देंखे कि उस दौरान आप कैसे लग रहे थे। वैसे भी जिस अंदाज में आप प्रेस कान्फ्रेंस में पत्रकार भाई को कोर्ट में देख लेने की चुनौती दे रहे थे, उससे यही मैसेज जा रहा था कि आप कानून मंत्री हैं और उसकी ताकत पत्रकार नहीं समझ रहे हैं।  
लक्ष्मण रेखा तो पत्रकार ने भी लांघी ...

मेरा मानना है कि हमें जर्नलिस्ट और एक्टिविस्ट में अंतर करना ही होगा। सलमान की प्रेस कान्फ्रेंस में जिस अंदाज में पत्रकार भाई नजर आए उसे भी सभ्य समाज में हम जायज नहीं ठहरा सकते। सलमान और उनकी पत्नी को अगर इस विषय पर कोई जवाब देना होता तो वो पहले ही दे देते। डेढ़ महीने से मीडिया हाउस इस स्टोरी पर काम कर रहे था। उनके पास कोई जवाब था ही नहीं। इसलिए वो फर्जीवाडा करते रहे। लेकिन प्रेस कान्फ्रेस में चैनल जानबूझ कर कहें या शरारतन हंगामे की स्थिति पैदा करने गया था, क्योंकि  जिस तरह से प्रेस कान्फ्रेस मे उस मीडिया हाउस के लगभग दर्जन भर पत्रकार और कैमरामैन थे, उससे ही ये लग गया कि कुछ होने वाला है। फिर एक कैमरा सलमान पर, दूसरा कैमरा पत्रकार पर लगा हुआ था। जब सलमान खुर्शीद बोल रहे थे, उस समय भी चैनल ने दो फ्रेम बनाया, मकसद साफ था, वो जनता को मैसेज दे रहे थे कि यहीं रहें हमारे पत्रकार जी कुछ करने वाले हैं। सलमान के व्यवहार की तो मैं निंदा कर चुका हूं, लेकिन पत्रकार के व्यवहार और अंदाज दोनों की जितनी निंदा की जाए वो कम है।


एक जरूरी सूचना :-

मित्रों आपको पता है कि मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुडा हूं। दिल्ली में रहने के दौरान सियासी गलियारे में जो कुछ होता है, वो तो मैं सबके सामने बेबाकी से रखता ही रहता हूं और उस पर आपका स्नेह भी मुझे मिलता है। अब लगता है कि आप में से बहुत सारे लोग टीवी न्यूज तो देखते हैं, लेकिन इसकी बारीकियां नहीं समझ पाते होगें। मैने तय किया है कि अब आपको मैं टीवी फ्रैंडली बनाऊं। मसलन टीवी के बारे में आपकी जानकारी दुरुस्त करुं, गुण दोष के आधार पर बताऊं कि क्या हो रहा है, जबकि होना क्या चाहिए। इसमें मैं आपको इंटरटेंनमेंट चैनल को लेकर भी  उठने वाले सवालों पर बेबाकी से अपनी राय रखूंगा। मेरी नजर प्रिंट मीडिया पर भी बनी रहेगी। इसके लिए मैने  एक नया ब्लाग बनाया है, जिसका नाम है TV स्टेशन ...। इसका URL है।   http://tvstationlive.blogspot.in । मुझे उम्मीद है कि मुझे इस नए ब्लाग पर भी आपका स्नेह यूं ही मिता रहेगा।    


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शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

To LoVe 2015: Diwali - Festival Of Lights



The Hindus in India celebrate many festivals. The Diwali or Dipabali is one such festival. This festival is celebrated on the new moon day after the Dasahara. The Goddess Kali is also worshipped on this day. This is a festival of lights. The Hindus decorate their houses with lights. The rich and the poor, both celebrate it. They use oil-lamps and candles at night. In the evening a holy offering of Shradha is made by the people for their fore-fathers. Goddess Kali is worshipped late at this night.

Diwali is a popular festival in Gujarat and Maharastra. It is also celebrated by the Oriyas with much enthusiasm. People follow the tradition of wearing new dress and preparing cakes and sweets at home. They celebrate the festival in the company of their friends and relatives. Display of fireworks is the most interesting part of this festival. Many temporary stalls are made to sell fireworks of various kinds. People purchase the fireworks and use them at night. They enjoy the night.

The festival has a legendary background. Lord Rama in the era of Tretaya won a glorious victory over the demon king Ravana of Lanka. After the victory, He came to Ayodhya with his dear brother Laxman and wife Sita. The people of Ayodhya celebrated the victory by lighting candles and lamps. Thus Lord Ramachandra was congratulated.

The Diwali has a great significance for the Hindus. The businessmen consider it as the beginning date of their business. Their business is renewed from this day. This day marks the end of autumn and the beginning of winter.

On the Diwali night fire accidents also occur at some places due to carelessness.






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To LoVe 2015: PLEASURE OF READING



Food is necessary for our body. Similarly, we also need
food for our mind. The best food for the mind is the reading
of books. It has a joy of its own, which perhaps nothing else
can give the pleasure one derives from reading is procreative
as well as ennobling. Reading gives us peculiar joy and we
forget the cares and worries of life.

Reading is of different kinds. First, there is light reading,
which means the reading of newspapers, periodicals, journals
etc. newspapers and journals are storehouses of information
about current events;. Through them we come to kn9w about
all that is happening in every part of the world. The modern
age is such that we can ill afford to miss at least this type
of light reading. We will be like a frog in a well without
newspapers. Therefore, such reading as is both delightful
and informative, cannot be ignored.
Now we come to the books on travel and adventure.
Man wants to escape from the dull realities of everyday life.
The spirit of adventure is in the very blood of man. Books
of travel and adventure infuse into us the same spirit of
adventure and fearlessness as. was displayed by the travelers
themselves. The reading of novels is a pleasant pastime and
nothing is more entertaining than to spend some time reading
a novel in the afternoon or in a train. The reader forgets his
own personality and existence for some time and totally
identifies with the characters o( the book. This identification,
through unconscious, is a source of endless pleasure to him.
Then there are books for serious reading. They include .
works of literature, history, culture, philosophy and many be
called books for all times and ages. Such books are indented
for the sober and thoughtful minds. A student of literature
comes in contact with the master minds of all ages and finds
a good deal of food for his thought. They give him an insight
into the spiritual values of life. He can thus make his life
noble and sublime. His outlook is widened and the field of
human sympathy broadened.
Now we come to the most important question, viz. how
to read books? Beacon has said, "some books are to be
tasted, others are to be swallowed and some few to be
chewed and digested." To treat a book as a text book has
the sense of compulsion. This compulsion many be useful.
but it kills all interest. Nobody can appreciate such a
temporary love of books. A real lover of books enjoys their
company all the time.
We should be very careful in the choice of books. If bad
books come into the hands of the young, their minds are
infected with their evil influence. Many promising youths have
been ruined because of the taste for bad books. Good books.
on the other hand, are purifying. They enlarge and enrich our
minds and mold our character. Therefore, it is necessary
that the youth should seek advice from those who are
competent to give it.
The habit of reading is a sign of culture. It is a great
source of enjoyment and the best means of utilizing leisure.
Books are a treasure richer than the treasure of any king.
They are the gold mines of art, literature. science and
information. They are our constant companions.


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