शनिवार, 29 सितंबर 2012

To LoVe 2015: धोनी : क्रिकेट का कलंक ...

मैदान में पानी ना मंगवाया तो  धोनी नहीं
तना सख्त शब्द मैं यूं ही इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं, इसकी ठोस वजह है। आपको पता है कि अब देश में क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं है, जब हम सचिन को भगवान कहते हैं, तो क्रिकेट को अपना धर्म भी मानते हैं। मुझे आपका तो पता नहीं, पर मैं अपने धर्म के साथ किसी को खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दे सकता। आपको पता होगा कि सरकार में भी जब कोई बड़ा मसला होता है तो कोई मंत्री उस पर अकेले फैसला नहीं लेता है। उसके लिए जीओएम यानि ग्रुप आफ मिनिस्टर का गठन किया जाता है। यहां उस मुद्दे पर चर्चा के बाद फैसला लिया जाता है। लेकिन धोनी ? कितना भी बड़ा फैसला हो, तुरंत ले लेगे।

देश की 121 करोड़ की आबादी जो क्रिकेट को धर्म की तरह मानती है और उससे प्यार करती है। यहां होने वाले हर फैसले से हम सब प्रभावित होते हैं। क्योंकि क्रिकेट से हमारी भावना जुड़ी हुई है। यही वजह है कि न्यूज चैनल भी मैच के कई दिन पहले से लेकर बाद तक हर पहलू की समीक्षा करते रहते हैं। ऐसे में एक अब बड़ा सवाल ये है कि टीम के कप्तान के पास कितना अधिकार होना चाहिए ? क्या उसकी पसंद नापसंद के आधार पर देश की टीम चुनी जानी चाहिए ? अगर एक आदमी को किसी खिलाड़ी की सूरत पसंद नहीं है तो उसे बाहर बैठा दिया जाना चाहिए ? क्या धोनी को इतना अधिकार दे दिया जाना चाहिए कि वो ओपनर बल्लेबाज को 12 खिलाड़ी बनाकर उससे मैदान में पानी को बोतल और तौलिए मंगवाए। फिर अगर आपने एक आदमी को इतना अधिकार दे दिया है और उसका फैसला गलत साबित होता है तो उसके लिए क्या कोई सजा का प्रावधान किया गया है ? मुझे तो लगता है कि उसके लिए सख्त सजा भी होनी चाहिए।

मैं ही नहीं पूरा देश जानता है कि ओपनर बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग और महेन्द्र सिंह धोनी के बीच कुछ अनबन है। अनबन की वजह कोई ज्यादा बड़ी नहीं है। बस सहवाग ने एक इंटरव्यू में ये कह दिया कि धोनी की अगुवाई में जितने मैच जीते गए हैं उसका पूरा क्रेडिट कप्तान को मिले, इसमें बुराई नहीं है, लेकिन ये टीम अफर्ट है, खिलाड़ियों के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब इसमें सहवाग ने ऐसा क्या कह दिया कि धोनी उससे इस कदर नाराज हो जाएं कि सहवाग का कैरियर खत्म करने का संकल्प ले लें। सच ये है कि धोनी की मनमानी की वजह से अब टीम बर्बाद हो रही है। धोनी टीम में खेल से कहीं ज्यादा गुटबाजी को हवा दे रहे हैं।

धोनी को कौन समझाए कि आईपीएल और वर्ल्ड कप में बहुत अंतर है। आईपीएल में आप जिसे चाहें उसे प्लेइंग 11 रखे, जिसे चाहें 12 वां खिलाड़ी बनाकर उससे मैदान में पानी मंगवाएं। बताइये हर बड़े मैच के पहले अभ्यास सत्र का आयोजन किया जाता हैं। क्या अभ्यास सत्र के दौरान हमने वीरेंद्र सहवाग के विकल्प के बारे में विचार किया था ? अगर वीरेंद्र सहवाग को चोट ही लग जाती है तो गौतम गंभीर के साथ ओपनिंग कौन करेगा ? मैं समझता हूं बिल्कुल विचार नहीं किया गया। अव वहां एक मैच में वीरेंद्र सहवाग का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा तो उसे 12 वां खिलाड़ी बना दिया और इरफान पठान से ओपनिंग करा रहे हैं। पहले मैच में तो इरफान आठ ही रन बना पाए। खैर अच्छा ये हुआ कि 12 बाल यानि दो ओवर ही खराब किया।

कल आस्ट्रेलिया के साथ मैच की हार में एक बड़ी वजह इरफान पठान ही रहा। बताइये बीस ओवर के मैच में 11 ओवर तक इरफान पठान मैदान में रहा और महज 30 रन बना पाए। बाद में जो खिलाड़ी आए, उन पर रन बनाने का इतना दबाव हो गया कि वो जल्दी जल्दी विकेट गवां बैठे। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं कि इरफान ने सबसे ज्यादा रन बनाया तो आप गलत हैं। दरअसल आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी जानबूझ कर इरफान पठान को आउट नहीं कर रहे थे। उन्हें लगा कि इसका मैदान पर रहना ही ज्यादा बढिया है। खेल पा नहीं रहा है और गेंद भी बर्बाद कर रहा है। जब दसवें ओवर के बाद इरफान ने थोड़ा हिम्मत कर गेंद को बाउंड्रीलाइन के बाहर किया तो आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने उसे आउट कर पवैलियन भेज दिया। आपको पता है कि सहवाग को ये कहकर धोनी ने बाहर बैठाया कि ओपनिग इरफान से करा लेगें और सहवाग के स्थान पर एक गेंदबाज को टीम में जगह दी जाएगी। 20 ओवर के मैच में गेंदबाज के रुप में जहीर खान, इऱफान पठान, आर अश्विन, हरभजन सिंह और पीयूष चावला यानि कुल पांच गेंदबाज मैदान में उतारे गए। हालत क्या हुई, सब पिटते रहे और धोनी को रोहित शर्मा, विराट कोहली और युवराज सिंह से भी गेंदबादी करानी पड़ी।

अब मैं जानना चाहता हूं कि धोनी किस बात के कप्तान है ? वहां कई दिन बिता चुके हैं। उन्हें हर मैदान का रुख पता होना चाहिए है, उन्हें मालूम होना चाहिए कि किस मैदान पर उनका कौन सा गेंदबाज कामयाब हो सकता है। अगर इतने दिन में आप ये भी नहीं पता कर पाए तो मेरी एक सलाह है। जिस तरह आपने वीरेंद्र सहवाग को बाहर बैठा दिया है, क्यों ना आपको भी नान प्लेइंग कप्तान बना दिया जाए ? आपको बाहर बैठाने की ठोस वजह भी है। जब हर गेंदबाज पिट रहा है, तो विकेट के पीछे आपकी जरूरत क्या है ? 20 ओवर यानि कुल 120 गेंद में कितनी गेंद विकेट के पीछे आप रोकते हो ? इससे बेहतर है कि नान प्लेइंग कप्तान रहो। बताइये हमारे टाप बल्लेबाज पवैलियन में मौजूद हैं और ओपनिग के लिए इरफान पठान मैदान में हैं, ये तो किसी सुलझे हुए कप्तान का फैसला नहीं हो सकता। ऐसा फैसला मेरी नजर में मूर्ख कप्तान ही कर सकता है।

दरअसल धोनी इस समय सेफ जोन में है। उसे पता है कि आईपीएल में जिस टीम से वो जुडा है, उसके मालिक की क्रिकेट वर्ल्ड में तूती बोलती है। उसके रहते इसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। दो दिन पहले सहवाग की पैरवी करने पर वरिष्ठ खिलाड़ी मोहिन्दर अमरनाथ को बीसीसीआई ने पैदल कर दिया। यानि उनकी चयन समिति से छुट्टी कर दी गई। इसके पहले आपको पता है कि धोनी के व्यवहार से खून के आंसू रो कर सीनियर खिलाड़ी वीवीएस लक्ष्मण ने क्रिकेट को ही अलविदा कह दिया। धोनी को लगता होगा कि ये उनकी जीत है, पर ये जीत नहीं है। देश के लोग पूरी टीम को प्यार करते हैं, फिर वीरेंद्र सहवाग जैसे खिलाड़ी हमेशा नहीं निकलते। ये खिलाड़ी हमारे देश के धरोहर हैं। इनके साथ अभद्रता कोई भी करे, क्रिकेट प्रेमी उसे माफ नहीं कर सकते।

धोनी फिर समझाने की कोशिश कर रहा हूं। आप विश्वकप के मैच खेल रहे हो। ऐसे फैसले से खुद को दूर रखो, जिससे स्वदेश वापसी पर जवाब ना दे सको। एयरपोर्ट से भी चोर रास्ते से निकलना पड़े। जिन लोगों के बल पर आप बेलगाम हो रहे हैं, वो आपको टीम में जगह दे सकते हैं, देश की जनता के दिलों में नहीं। अगर देश की जनता के दिलों पर राज करना है तो व्यक्तिगत खुंदस को दूर करके देश के लिए खेलो। अब गल्ती की गुंजाइस खत्म हो चुकी है। अगर विश्वकप की चुनौती में बने रहना है तो टीम को एक रख कर अच्छा प्रदर्शन करना होगा। ऐसा ना हो कि विश्वकप तो हाथ से जाए ही और लोग आपकी कप्तानी को मूर्खों का दर्जा दे दें। मुझे लगता है कि देशवासियों की भावना समझ गए होगे।


एक जरूरी सूचना :-

मित्रों आपको पता है कि मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुडा हूं। दिल्ली में रहने के दौरान सियासी गलियारे में जो कुछ होता है, वो तो मैं सबके सामने बेबाकी से रखता ही रहता हूं और उस पर आपका स्नेह भी मुझे मिलता है। मुझे लगता है कि आप में से बहुत सारे लोग टीवी न्यूज तो देखते होंगे, लेकिन इसकी बारीकियां नहीं समझ पाते होगें। मैने तय किया है कि अब आपको मैं टीवी फ्रैंडली बनाऊं। मसलन टीवी के बारे में आपकी जानकारी दुरुस्त करुं, गुण दोष के आधार पर बताऊं कि क्या हो रहा है, जबकि होना क्या चाहिए। इसके लिए मैने  एक नया ब्लाग बनाया है, जिसका नाम है TV स्टेशन ...। इसका URL है।   http://tvstationlive.blogspot.inमुझे उम्मीद है कि मुझे इस नए ब्लाग पर भी आपका स्नेह यूं ही मिता रहेगा।   


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बुधवार, 26 सितंबर 2012

To LoVe 2015: देवानंद के बहाने ..Rohit

     कई सपने ऐसे होते हैं जो आंखों में पलते हैं औऱ तब तक आपको थकने नहीं देते जब तक वो हकीकत नहीं बन जाते..तो कुछ ऐसे सपने होते हैं जो आप पूरा करना चाहते हैं पर उसमें इतनी देर कर देते हैं कि उनके पूरे न हो पाने की टीस जीवन भर सालती रहती है। ऐसे ही कुछ सपने होते हैं अपने समय की पहचान बन चुके लोगों से मिलने की..बतियाने की। ऐसे मौके अक्सर मीडिया में रहने वालों लोगों को मिलते रहते हैं..मगर चाहकर भी जब ये मौके निकल जाते हैं तो इसका मलाल हमेशा के लिए रह जाता है। कुछ ऐसा ही मलाल हिंदी फिल्मों में रोमांस के सरताज रहे देवानंद को लेकर मेरे लिए जीवन भर रहेगा।
     वैसे इस तरह के मौके की इच्छा या उनके पूरे होने की खुशी का खुलकर सार्वजनिक तौर पर इजहार करना आमतौर पर मीडिया में अच्छा नहीं माना जाता है। असल में हर पेशे की कुछ खास खासियत की तरह मीडिया की खास पहचान में एक पहचान ये भी होती है। दरअसल मीडिया में कार्यरत लोगो से अपेक्षा की जाती है कि वो ऐसे किसी भी मौके पर संयम का परिचय दें..क्योंकि अगर वो संयम नहीं बरतेंगे तो उनके काम में पक्षपात भी हो सकता है। इसलिए दशक पहले तक आमतौर पर पत्रकार किसी भी नेता या अभिनेता का कितना भी करीबी या फैन हो..उसपर कलम चलाते वक्त तटस्थ हो जाता था...औऱ उसके लिखे पर नेता या अभिनेता कभी खुलकर नाराजगी का इजहार नहीं करते थे।
       हालांकि अब समय काफी बदल चुका है। जाहिर है कि पत्रकारिता के एथिक्स में कई नए आयाम जुड़े हैं तो कई धूमिल हो चुके हैं। आज पत्रकार समाज से कम औऱ स्कूलों से गढ़कर ज्यादा आते हैं। जिसके कई फायदे भी हैं तो कई नुकसान भी हुए हैं। उसी तरह नेता भी बदल गए हैं अभिनेता भी। फिल्मी खबरें फिल्मी पत्रिकाओं औऱ पीछे के पन्नों से उठकर अब पहले पन्ने से लेकर पहली खबरों तक आ गए हैं। सो अभिनेता-अभिनेत्री भी बदल गए हैं। अब वे मीडिया से अपने हिसाब से बात करना पंसद करते हैं। एक वो दौर था जब राष्ट्रीय अखबारों कि सुर्खियों में अभिनेता बड़ी मुशिकल से आते थे....पर अब अभिनेता का हर कदम सुर्खियों का हिस्सा बन गया है। ये बदलाव समाज के खबरों को देखने औऱ पढ़ने के तरीकों में आए बदलाव की वजह से भी हुआ है..।
       इसी नए-पुराने की उलझन में देवानंद से मिलने औऱ उनसे बातचीत का मौका मेरे हाथ से पहले निकल चुका था। मैं दत्तात्रेय के 40 गुरु की तरह अनेक लोगों से प्रभावित रहा। 2011 की शुरुआत में मैं उन तैयारियों में लगने लगा था जिसमें ये तय किया था कि 2012 की शुरुआत से उन सभी गुरुओं से मिलूंगा.....पर शायद किस्मत को ये मंजूर नहीं था। पिता, शम्मी कपूर, देवानंद एक-एक करके इस फानी दुनिया से रुखसत हो गए...औऱ मैं जीवन भर का मलाल लिए रह गया। इसलिए कहते हैं अगर अच्छा सोचा जाए तो जितनी जल्दी हो उसपर अमल करें। इसके उलट ये भी सच है कि "मैं देर करता नहीं देर हो जाती है"। मतलब ये कि जितना जल्दी हो उतना बेहतर। अपने शौक के लिए समय निकाला जाए.....कुछ बेहतर भी किया जाए।
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रविवार, 23 सितंबर 2012

To LoVe 2015: अन्ना को दो करोड़ देने की हुई थी पेशकश !

जी अन्ना !  मैंने भी दो करोड़ ही कहा

न्ना को दो करोड़ रूपये देने की पेशकश अरविंद केजरीवाल ने की थी, लेकिन अन्ना ने ये पैसे लेने से इनकार कर दिया। आज की ये सबसे बड़ी खबर है। लेकिन इस खबर को न्यूज चैनलों ने अपनी  हेडलाइंस में शामिल नहीं किया। दो एक  चैनल ने इस खबर को दिखाया  भी, तो बस कोरम पूरा करने के लिए, मतलब इसे अंडरप्ले कर दिया। हालांकि अब इस पर  कुमार विश्वास की ओर से सफाई आई है कि ये रकम अन्ना को घूस की पेशकश नहीं थी, बल्कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई शुरू की गई है, उसे संचालित करने के लिए जनता ने चंदा दिया था। चूंकि इस पैसे को लेकर केजरीवाल  पर  तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे थे, लिहाजा  इंडिया अगेस्ट करप्सन के खाते से इस रकम का चेक अन्ना को देने के लिेए रालेगन सिद्धि भेजा गया था। बताया  जा रहा है कि केजरीवाल चाहते थे कि इस रकम की देख रेख अन्ना करें, लेकिन अन्ना ने चेक लेने से इनकार कर दिया और कहाकि ये सब काम आप लोग ही करें।

हंसी आ रही है ना। कितनी बड़ी-बड़ी बातें ये लोग किया करते थे। देश में ऐसा माहौल बना दिया था कि जैसे इस टीम के साथ जो लोग नहीं है, वो सभी भ्रष्ट हैं। देश में एक मात्र ईमानदार ये लोग ही हैं  या फिर ये जिन्हें  सर्टिफिकेट दें वो ईमानदार है। अगर आपने मेरे लेख को  पढ़े हैं तो आपको ध्यान होगा कि मैं एक बात पर बार बार जोर  दिया करता हूं। मेरा पक्का विश्वास है कि बेईमानी की बुनियाद पर ईमानदारी की इमारत नहीं खड़ी की जा सकती। और आंदोलन की शुरुआत से ही टीम के भीतर से जो खबरे बाहर आ रहीं थी, उसमें पैसे की हेरा फेरी को लेकर तरह तरह की चर्चा होने लगी थी। हो सकता है कि हमारी और आपकी सोच में अंतर हो, लेकिन मैं आज भी इसी मत का हूं कि जिसे आप सब आंदोलन कहते हैं, मेरा मानना है कि ये शुरू से आंदोलन के रुप में खड़ा ही नहीं हो पाया। दरअसल ये इलेक्ट्रानिक मीडिया का तमाशा भर रहा।

कुछ मीडिया के विद्वान इस आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई बता रहे थे। मैं बहुत हैरान था कि आखिर ऐसा क्या है इस आंदोलन में कि इसे आजादी की दूसरी लड़ाई कहा जाए। कुछ ने तो इस आंदोलन की तुलना जे पी आंदोलन से भी की। जब इसकी तुलना जेपी आंदोलन से होने लगी तो फिर सवाल खड़ा हुआ कि मीडिया इस आंदोलन को क्यों इतना बड़ा बना रही है? मेरा आज भी मानना है कि जेपी आंदोलन व्यवस्था के खिलाफ एक  संपूर्ण आंदोलन था। ये आंदोलन विदेशी पैसों से खड़ा किया जा रहा था, जिसमें कदम कदम पर पैसे बहाए जा रहे थे। लोगों को पूड़ी सब्जी हलुवा खिलाकर किसी तरह रोका जा रहा था। दिल्ली वालों के लिए शाम का पिकनिक स्पाट बन हुआ था रामलीला मैदान। मीडिया भी इस भीड़ में अपनी टीआरपी तलाश रही थी।

खैर ये बातें मैं आपको पहले भी बता चुका हूं। मैं आज की घटना पर वापस लौटता हूं। अच्छा चलिए आपसे ही एक सवाल पूछता हूं। जब आपको पता चला कि केजरीवाल दो करोड  रुपये का चेक लेकर रालेगन सिद्धि गए और अन्ना को इसे देने का प्रयास किया। ये सुनकर आपके मन में पहली प्रतिक्रिया क्या हुई ? मैं बताता हूं, आप भी मेरी तरह हैरान हुए होंगे कि आखिर ये सब क्या हो रहा है। लेकिन मैं जो बातें अब कहने जा रहा हूं उस पर जरा ध्यान दीजिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की अगुवाई में आंदोलन चल रहा हो, देश भर में लोग मैं अन्ना हूं की टोपी पहन रहे हों और उन्हें ही दो करोड़ रुपये की पेशकश की जाए और ये पेशकश कोई सामान्य आदमी नहीं खुद अरविंद कर रहे हों तो आप इसका मतलब आसानी से निकाल सकते हैं। मतलब ये कि अरविंद कितने दबाव में होगें कि उन्होंने अन्ना को पैसे देने का फैसला कर लिया। ये जानते हुए कि अन्ना पैसे स्वीकार नहीं कर सकते। उनके कई उदाहरण सामने है, जहां उन्हें पुरस्कार में लाखों रुपये मिले तो उन्होंने उसे गांव के विकास कार्यों में लगा दिया या फिर जरूरतमंदों को दान कर दिया। वैसे ये भी  कहा जा रहा है कि अरविंद  ने ये जानबूझ कर किया, क्योंकि वो जानते ही थे कि अन्ना पैसे लेगें नहीं, लेकिन पेशकश कर दिए जाने से उन्हें लगेगा कि अगर उनके मन में गडबड़ी करने की मंशा होती तो ये पेशकश भला क्यों करते ?

बहरहाल अब धीरे धीरे एक एक चेहरे नकाब उतरने वाला है। ये बात अब लगभग साबित हो गई है कि इस टीम के भीतर पैसे को लेकर विवाद शुरू से रहा है। टीम के भीतर जिसने भी अरविंद पर उंगली  उठाई, उसे यहां से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन किरन बेदी से अनबन अरविंद केजरीवाल को भारी पड़ गई। दरअसल अरविंद अपनी सारी बातें अन्ना से मनवा लिया करते थे। इसकी एक मुख्य वजह अन्ना के करीबी यानि पीए सुरेश पढारे हैं। ये कहने की बात है कि सुरेश अन्ना के पीए थे, सच्चाई ये है कि वो अन्ना की हर छोटी बड़ी जानकारी अरविंद को दिया करते थे। अरविंद भी पढारे को इन सबके लिए  अलग से खुश रखते थे। कहा जा रहा है कि सुरेश इस पक्ष में नहीं था कि अन्ना अभी अरविंद का साथ छोड़े, वो  चाहते थे कि अन्ना यहीं बनें रहें।

जानकार बताते हैं कि सुरेश ने अपनी राय भी अन्ना को बता दी थी, लेकिन अन्ना ने सुरेश को डांट दिया था कि तुम इस मामले में ज्यादा आगे आगे मत बोला करो। अरविंद की जरूरत से ज्यादा पैरवी करने को लेकर अन्ना सुरेश से पहले ही नाराज चल रहे थे। इस बीच अन्ना और रामदेव की मुलाकात जिसके बारे में गिने चुने लोगों को जानकारी थी, वो मीडिया तक कैसे पहुंची ? इसे लेकर भी सुरेश की भूमिका पर उंगली उठ रही है। हालाकि सच ये है कि इस बार अन्ना के साथ सुरेश यहां नहीं आए थे,लेकिन उनकी  सभी से बातचीत है, इसलिए अन्ना का मुवमेंट उन्हें आसानी से पता रहता है। बताते हैं कि अन्ना को शक है कि सुरेश ने ही ये जानकारी अरविंद को दी और अरविंद ने ये जानकारी  मीडिया से शेयर की। बहरहाल सुरेश की गतिविधियां पूरी तरह संदिग्ध थीं, यही वजह है कि अन्ना ने सुरेश पढारे की अपने यहां से छुट्टी कर दी।

सुरेश पढारे के बारे में भी आपको बताता चलूं। दरअसल सुरेश पहले ठेकेदारी करता था। गांव के स्कूल का काम  सुरेश ही कर रहा था, लेकिन वो रेत के गोरखधंधे में फंस गया। इस पर ग्रामसभा की बैठक में सुरेश के खिलाफ प्रस्ताव पास हो गया और उससे सभी काम छीन लिए गए। चूंकि ग्राम सभा जो फैसला करती है, उसे नीचा दिखाने की अन्ना कोशिश करते हैं। यही वजह है कि सुरेश के खिलाफ जब ग्राम सभा ने प्रस्ताव पास कर  दिया तो अन्ना ने उसे अपने से जोड़ लिया। हालाकि प्रस्ताव पास होने के दौरान खुद अन्ना भी वहां मौजूद थे। सुरेश को साथ  रखने  के कारण गांव में अन्ना पर भी उंगली उठती रही है।   
    
इसी तरह अन्ना के गांव में एक भ्रष्ट्राचार विरोधी जन आंदोलन न्यास नामक संस्था है। इसकी अगुवाई अन्ना ही करते हैं। कहा जा रहा है कि अगर ईमानदारी से इस संगठन की जांच हो जाए, तो यहां काम करने वाले तमाम लोगों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। आरोप तो यहां तक लगाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार का एक खास अड्डा है ये दफ्तर। यहां एक साहब हैं, उनके पास बहुत थोड़ी से जमीन है, उनकी मासिक पगार भी महज पांच हजार है, लेकिन उनका रहन सहन देखिए तो आप हैरान हो जाएगे। हाथ में 70 हजार रुपये के मोबाइल पर लगातार वो उंगली फेरते रहते हैं। हालत ये है कि इस आफिस के बारे में खुद रालेगनसिद्दि के लोग तरह तरह की टिप्पणी करते रहते हैं। अब अन्ना के आंदोलन का नया पता यही दफ्तर है।

खैर आप बस इंतजार कीजिए हर वो  बात जल्दी ही सामने आ जाएगी, जो मैं आपको पहले ही बताता रहा हूं। अन्ना प्रधानमंत्री पर उंगली उठाते हैं कि ये कैसे प्रधानमंत्री हैं  कि इनके नीचे सब  चोरी करने में लगे रहते हैं और उन्हें खबर तक नहीं होती। अब तो  प्रधानमंत्री  भी ये दावा कर सकते हैं कि अन्ना जी आपकी टीम में भी राजा, कलमाणी, जायसवाल, व्यापारी सब तो हैं। आप कैसे अपनी टीम को ईमानदारी का सर्टिफिकेट बांटते फिर रहे हैं। बहरहाल अभी दो करोड़ रुपये का मामला ठंडा नहीं  पड़ा है। सब  अरविंद  से इस मामले में सफाई चाहते हैं, अब सफाई देने के लिए अरविंद अपने साथियों से सलाह मशविरा कर रहे हैं। बहरहाल वो सफाई  भले दे दें, लेकिन अब जनता में वो भरोसा हासिल करना आसान नहीं है।    

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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

To LoVe 2015: आवश्यकता है एक " पोस्टर ब्वाय " की !


 देश के हालात और देश में चलने वाली हर गतिविधियों पर मैने हमेशा ही अपनी बेबाक राय रखी है। कभी इस बात की चिंता नहीं की कि कोई मुझे क्या बता रहा है। हालांकि मैं देख रहा हूं कि लोग मुझे जाने बगैर ही मेरी तस्वीर बनाने लगे। इसमें किसी ने मुझे दिग्गी के खानदान का बताया,   किसी ने संघी कहा, तो कुछ ने वामपंथी का ठप्पा लगा दिया। हां बिल्कुल ठीक समझ रहे हैं आप ! कुछ ने पागल तक करार दे दिया। खैर मेरे बारे में कौन क्या राय रखता है, मेरे लिए ये कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। मेरे लिए महत्वपूर्ण ये है कि मैं जो देख रहा हूं, या मेरी जो समझ है, उसे ईमानदारी के साथ आपके सामने रख रहा हूं या नहीं। यही वजह है कि अगर आप  इस आंदोलन के बारे में  मेरे ब्लाग पर लिखे लेख को पढ़ें तो आप खुद मानने को मजबूर हो जाएंगे कि जो बातें मैने कहीं है, वही आगे चल कर वो सच साबित हुई है। अब आप इसे सही समझें या गलत,या फिर मुझे पागल बताते रहें। वैसे भी  मेरा मानना रहा है कि

इन्हीं बिगड़े दिमागों में घनी खुशियों के लच्छे  हैं,
हमें पागल ही रहने दो कि हम पागल ही अच्छे हैं।

अच्छा इसके पहले की मैं बात-बात में एक जरूरी बात बताना भूल जाऊं, पहले आप सबको एक महत्वपूर्ण विज्ञापन के बारे में बता दूं। वैसे तो ये विज्ञापन मुझे ब्लाग पर प्रकाशित करने के लिए भेजा गया है, पर जिन लोगों ने भेजा है वो  बेचारे नई-नई पार्टी बनाने की कवायद कर रहे हैं। इसलिए सोचा कि विज्ञापन के बजाए इसे खबर बनाकर ही छाप देता हूं, क्यों इनसे पैसे लिए जाएं। दरअसल अन्ना के अचानक साथ छोड़ देने से बाकी टीम को एक चेहरे की जरूरत है,  इस टीम के शुभचिंतक भी बताते हैं कि यहां दिमाग तो बहुत लोगों के पास है, पर चेहरा बिकाऊ नहीं है। इसलिए थोड़ा बिकाऊ चेहरा चाहिए, जिसे देखकर देश की जनता को लुभाया जा सके।

आवश्यकता है "पोस्टर ब्वाय" की

उम्र 75 के पार होनी चाहिए। शिक्षा प्राइमरी से ज्यादा नहीं। अंग्रेजी का ज्ञान शून्य होना चाहिए, हिन्दी पढ़ना नहीं बस समझना जरूरी  है। विशेष योग्यता कम से कम 15 से 20 दिन भूखे रहने की आदत होनी चाहिए। दूसरों के काम का श्रेय लेने की क्षमता होनी चाहिए। पूर्व सैनिक को प्राथमिकता दी जाएगी। अगर बाकी मानक पर उम्मीदवार खरा उतरा तो उसे उम्र में पांच साल की छूट यानि 80 साल का भी हो तो चलेगा। वेतन उसकी आवश्यकतानुसार, चयन हो जाने पर इलाज मुफ्त सुविधा। हां जब तक वो "पोस्टर ब्वाय" रहेगा उसे अकेले कहीं जाने आने की छूट नहीं होगी। मंदिर ( तथाकथित) में रहना होगा, लेकिन वहां मूर्ति किसकी रखी जाएगी, ये अधिकार प्रबंधन का होगा। शर्तें. चयन हो जाने के बाद घर के किसी सदस्य और मित्र से संपर्क नहीं रख सकेगें। उसका असली नाम जो भी हो, उससे कोई  मतलब नहीं रहेगा। प्रबंधन जो नाम तय करेगा, पोस्टर ब्वाय उसी  नाम से जाना जाएगा। किसी भी शर्त को तोड़ने पर उसे देह त्याग करना होगा।

ये विज्ञापन मेरी आंखो के सामने आया तो सच बताऊं मैं भी हैरान रह गया। मैने जानने की कोशिश की आखिर एक " पोस्टर ब्वाय "  के लिए इतनी शर्तों की क्या जरूरत है ? ऐसा भी नहीं कि उसे बहुत ज्यादा वेतन भत्ता दे रहे हों कि इतनी सावधानी बरतने की जरूरत है। बहरहाल जो बातें  पता चलीं वो तो हैरान करने वाली थीं। पता चला कि इसके पहले जिसे पोस्टर ब्वाय की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, उसके कम पढ़े लिखे होने के ये सब फायदा उठा रहे थे। मसलन जब इनकी  मीटिंग होती थी और लोगों को लगता था कि इस बात की जानकारी अन्ना को नही होनी चाहिए , तो ये अंग्रेजी में बातें करने लगते थे। जब तक ये अंग्रेजी में बातें करते थे, बेचारे अन्ना इधर उधर सबके मुंह ताकते रहते थे। फिर जो फाइलें तैयार होती वो अंग्रेजी में या फिर हिंदी में। बेचारे अन्ना को दोनों भाषा पढ़ने में दिक्कत होती थी। बहरहाल अन्ना की ये दिक्कत बाकी लोगों को ये शूट करती थी। लेकिन अन्ना भी दुनिया देख चुके हैं,  वो अपनी तीसरी आंख से बहुत कुछ देख सुन लेते थे। इसलिए अब नए पोस्टर ब्वाय के एजूकेशन में कटौती की गई है। क्योंकि अन्ना के सातवीं क्लास तक पढ़ाई की जानकारी लोगों को है, उसके बाद की नहीं। इसीलिए नए पोस्टर ब्वाय को सिर्फ पांचवीं तक पढ़ाई की छूट होगी।

मैं देख रहा हूं कि विज्ञापन में हर बात पर बारीकी से ध्यान दिया गया है। उनकी सबसे बड़ी ताकत यही थी ना कि बेचारे 15 से 20 दिन तक बिना खाए रह जाते हैं। बताइये 80 साल का बूढा बिना खाए मंच पर लेटा रहता था, और उसके मंच के सामने भीड़ लगातार बनी रहे,  इसके लिए लंगर चलता था। यहां देशी घी की पूड़ी सब्जी और हलुवा लगातार बनाए जा रहे थे। मैं  देखता था कि सुबह  नाश्ते  और शाम को स्नैक्स के दौरान यहां भीड़ बेकाबू  हो जाया करती थी। लेकिन बेचारे अन्ना इतने लोगों को सामने खाता पीता देखने के बाद भी कभी ये नहीं कहा कि अब उनसे भूखा नहीं रहा जा रहा है। फौजी रहे हैं ना तो उनकी भूख तो तिरंगे को ही देखकर खत्म हो जाया करती थी। बहरहाल अब राजनीतिज्ञों की बात छोड़ दीजिए, क्योंकि लालू यादव सरीखे नेता ने तो उनके अनशन की ईमानदारी पर ही उंगली उठा दी थी। अब दूध से जला छांछ भी फूंक फूंक पर पीता  है। इसलिए कुछ और सावधानी बरती जा रही है। मसलन अन्ना जब दिल्ली में रहते थे तो दिल्ली की भाषा बोलते थे, यहां से बाहर जाते ही वो दिल की भाषा बोलने लगते। ये बात भी लोगों को बिल्कुल हजम नहीं हो रही थी।  लिहाजा नए पोस्टर ब्वाय को अनुबंध तक यहीं के मंदिर में रहना होगा,  यहां वो आराधना किसकी करेगा, ये भी टीम बताएगी। खास बात ये कि उसका असली नाम सबको नहीं पता होना चाहिए। देखा था ना, पहली पर कांग्रेस प्रवक्ता ने नाम क्या लिया, बवाल खड़ा हो गया। खैर देखिए भाई अगर ऐसा कोई आदमी आपकी  नजर में हो तो प्लीज मदद कर दीजिए दिल्ली की।

देश में कई बार सोशल साइट्स के दुरुपयोग की बात उठती है, या फिर इस पर अंकुश लगाने  की बात होती है तो ऐसी कोशिशों का विरोध करने में मैं भी आपके साथ मजबूती से खड़ा रहने वालों में हूं, कभी इसकी स्वायत्तता का विरोधी नहीं रहा।  पर आज जब कुछ पढ़े लिखे लोगों को देखा कि वो एक साजिश के तहत अन्ना के खिलाफ माहौल बना रहे हैं, तो मन दुखी हुआ। फिर ना जाने क्यों लगने लगा कि अभी हम उस काबिल नहीं हुए हैं कि हमें आजाद छोड़ दिया जाए, एक लक्ष्मण रेखा जरूरी  है। अब देखिए अन्ना विरोधी वाल पर लंपू चंपू टाइप के लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं। अच्छा आलोचना हो तो कोई खास बात नहीं, आलोचना होनी चाहिए, लेकिन यहां उन्हें अपमानित किया जा रहा है। जो लोग कल तक उनके नाम की टोपी अपने सिर पर रख कर गर्व कर रहे थे, आज उसी टोपी को पैरों तले रौंद रहे हैं। खैर ये सब किसके इशारे पर और किसके लिए किया जा रहा है, ये बातें किसी से छिपी नहीं है। टीम में  दूसरी तरफ  जो लोग हैं वो तकनीक फ्रैंडली हैं। तभी तो उन्होंने सप्ताह भर में  ही देश की नब्ज टटोल ली कि उन्हें राजनीतिक  दल बनाने का देश की जनता आदेश सुना रही है। देश की चुनाव प्रक्रिया को ये गलत बताते हैं और अपने सर्वे जिसकी कोई विश्वसनीयत नहीं है, उसे देश का फरमान कहते हैं। एक कड़ी बात कह दूं, जितनी फर्जी ये सिविल सोसायटी थी, उससे ज्यादा फर्जी इनका सर्वे है।

चलते चलते आखिरी बात और। मीडिया में एक बात बहुत तेजी से  चलाई  जा रही है। अन्ना और रामदेव गुपचुप मिले। मेरा सवाल है ? क्या अन्ना  और रामदेव पहली बार मिले हैं। क्या कभी  अन्ना ने या रामदेव ने इस बात से इनकार किया था कि उन  दोनों में आपस में रिश्ते  नहीं है। आपको याद दिला दूं दोनों ने एक साझा प्रेस कान्फ्रेंस में ये बात कहा था कि दोनों  एक दूसरे के आंदोलन में मदद करेंगे। हां बीच के कुछ लोग जरूर ये कोशिश करते रहे कि  इन्हें  अलग अलग ही रहने दिया जाए। अगर ये दोनों एक हो गए तो बाकी  लोगों की कोई पूछ नहीं रह जाएगी। अच्छा फिर इस मुलाकात की जिस तरह से हवा बनाई गई जैसे अन्ना  बाबा रामदेव  ने बल्कि किसी आतंकवादी से मिल  रहे हैं और मिलाने वाला कोई बड़े गिरोह का सरगना है। खैर ये अध्याय बंद हो गया है। हमें  भी  इस बात का दुख है कि एक महत्वपूर्ण आंदोलन कुछ लोगों  की अतिमहत्वाकांक्षा के आगे दम तोड़ दिया। लिखना बहुत कुछ चाहता हूं, पर अब स्वास्थ इजाजत नहीं दे रहा है। सुबह कहीं पढ़ रहा था कि ईश्वर या तो स्वास्थ दे या फिर शरण दे।  आगे फिर...

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बुधवार, 19 सितंबर 2012

To LoVe 2015: कांग्रेस के मनमोहनी वार से सब धड़ाम

ममता दी ने कांग्रेस को एक और धोबीपाट की कोशिश की है.....मगर कांग्रेस पर इसका ज्यादा असर होता नहीं दिख रहा है। सहयोगी पार्टियों के नेताओं की बयानबाजी से साफ है कि फिलहाल सरकार को कोई खतरा नहीं है। हालांकि इसका पता तब ही चल गया था जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि बिगड़ती देख बोल्ड फैसले लिए थे। उस वक्त समाजवादी पार्टी और बसपा सुप्रिमो के बयानों से साफ था कि मनमोहन सिंह एंड पार्टी जानती थी कि मुलायम और मायावती सरकार का साथ छोड़ने से रहे। सपा-बसपा की मजबूरी है कि वो अभी सरकार का दामन नहीं छोड़ सकते। भले ही बाद में इसकी कीमत के तौर पर सपा अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए केंद्र से पैसा झटक लें।

जांची-परखी चाल
यूपीए-1 के समय अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर जब मनमोहन सिंह अड़ गए थे...तब कांग्रेस ने कामरेडों को गच्चा देकर मुलायम सिंह को साध लिया था। इस बार भी ठीक वही होता दिख रहा है। यानि इतिहास अपने को दोहरा रहा है या कहें कि कांग्रेस परखी हुई सफल चाल फिर चल रही है। इसलिए इस बार कोलकाता में ममता दी की धमाचौकड़ी के बावजूद दिल्ली में सरकार में कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई दी। कॉमरेड गुरुदास दासगुप्ता ने ठीक कहा है कि ममता के समर्थन वापसी से कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि कांग्रेस को पता है कि कैसे अल्पमत की सरकार बचाई और चलाई जाती है।

मुलायम...मायावती पर भाजपा का हौवा
बाहर से समर्थन दे रहे मुलायम सिंह की मजबूरी है कि वो कांग्रेस का साथ दें। भले ही बहाना बीजेपी विरोध का हो और हकीकत में मुस्लिम वोट बैंक की चिंता। यही बात घूमाफिरा कर बसपा पर भी लागू होती है। दोनो ही पार्टीयां भले ही यूपी में आमने-सामने हों...कांग्रेस से टकराती हों...पर केंद्र में कांग्रेस के साथ हैं। यही सियासत है..सियासत की मजबूरी है। दोनों पार्टियां कांग्रेस का विरोध कर भाजपा के साथ खड़े होना नहीं दिखना चाहतीं। साथ ही कांग्रेस के फैसलों से मुलायम सिंह पूरी तरह से सहमत होते नहीं दिखना चाहते जिस कारण उनको भारत बंद का आह्वान भी करना पड़ा।

कांग्रेस -एक तीर कई निशाने
इन फैसलों से कांग्रेस ने एक तीर से कई निशाने भी साध दिए हैं। कोयला घोटाला से जनता का ध्यान डीजल औऱ सिलेंडर की तरफ मोड़ दिया है। मनमोहन सिंह की अतंर्राष्ट्रीय छवि बच गई है। ममता से लगभग छुटकारा मिल गया है। ज्यादा से ज्यादा अब ये होगा कि सरकार सब्सिडी वाले सिलेंडर की संख्या को 6 से बढ़ाकर 10 कर देगी...वैसे कांग्रेस की सरकारों को सोनिया गांधी ने 9 सिलेंडर तक देने का आदेश दे दिया है। जिससे कांग्रेस अपनी छवि भी कुछ हद तक सुधारने में कामयाब होगी।

जनता फिर बनेगी घनचक्कर
इस सब के बीच जनता एक बार फिर ठगी जाएगी। सरकार का सीधा फंडा है कि सिलेंडर की ब्लैकमार्किंटग से हो रहे नुकसान की भरपाई ईमानदारी से सिलेंडर खरीदने वाली जनता से वसूलो। घोटाले से खाली खजाने को ईमानदार जनता पर टैक्स थोप कर कर भरो। मतलब साफ है कि डीजल पर दाम बढ़े या घटे हर दो घंटे में किसान आत्महत्या करते रहेंगे। मध्यमवर्ग इंटरनेशनल ब्रैंड और सिलेंडर के चक्कर में घनचक्कर बनता रहेगा...यानि चोर चैन की बंसी बजाते रहेंगे...औऱ ईमानदार लूटते-पिटते रहेंगे।
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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

To LoVe 2015: अब अर्थशास्त्री पीएम को "अर्थ " का सहारा !


दिल्ली में मेरी और मनमोहन सिंह दोनों की हालत पतली है। मैं तो खैर दवा ले रहा हूं, जल्दी दुरुस्त  हो जाऊंगा, लेकिन मनमोहन सिंह को सामान्य होने में टाइम लग सकता है। आज तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया, हालांकि ये फैसला आसान नहीं था, उन्हें अपने नेताओं को एकजुट करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। वैसे  सच बताऊं दो एक दिन में टीएमसी में टूट की खबर मिले तो इसमें हैरान होने की जरूरत नहीं है।

आपको पता है कि कोयले की कालिख में इस बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नहीं  बच पाए। संसद का पूरा सत्र शोर शराबे की भेंट चढ़ गया। विपक्ष ने इस  बार सीधे प्रधानमंत्री को निशाने पर लिया और उनका इस्तीफा मांगा। अब प्रधानमंत्री और सरकार पर हमला होता देख कांग्रेस ने तुरुप चाल चली और आर्थिक सुधार के नाम पर देश में रिटेल में एफडीआई को मंजूरी, डीजल की कीमत बढ़ाई गई और रसोई गैस में सब्सिडी समाप्त करने का ऐलान कर बहस की दिशा ही बदल दी।

यूपीए सरकार को लगातार परेशान करने वाली ममता बनर्जी की साख भी इस बार दांव पर लगी हुई थी। राष्ट्रपति के चुनाव में पहले उन्होंने  प्रणव  मुखर्जी के विरोध का फैसला  किया, बाद  में उन्होंने उनका साथ दिया। जब भी पेट्रोल की कीमतें बढीं ममता ने  उसका  विरोध किया, लेकिन उनकी सुनी नहीं गई। ममता हमेशा कहती रहीं सरकार आम आदमी के हितों की अनदेखी कर रही है। इन सबके बाद भी वो सरकार में बनी रहीं। इससे जनता में ये संदेश जा रहा था कि वो सिर्फ गीदड भभकी देती हैं। ममता को इस छवि से अलग होना था, लिहाजा इस बार उन्होंने सरकार समर्थन वापस लेने और अपने मंत्रियों के इस्तीफे का ऐलान कर दिया।

खैर अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनीति  की ए बी सी भले ना जानते हों, पर उन्हें अपने "अर्थ" और अंकगणित पर पूरा भरोसा है। उन्हें पता है कि अंकगणित को अपने पक्ष में करने के लिए कैसे अर्थ का इस्तेमाल किया जाता है। देश की राजनीति में मनमोहन सिंह पहले प्रधानमंत्री हैं जिन पर सरकार को बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त का आरोप लगा है। यहां तक की संसद में पहली बार सांसदों ने पैसे लहराए और कहा कि ये पैसा उन्हें सरकार को बचाने के लिए दिए गए हैं। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि इन आरोपों में बिल्कुल भी सच्चाई ना हो, खैर मामला अभी विचाराधीन है।

सरकार से टीएमसी का समर्थन वापस ले लेने के बाद अब सरकार की नजर मुलायम सिंह यादव और मायावती पर है। मुझे लग रहा है कि आज पहली बार न सिर्फ सरकार को बल्कि  समाजवादी पार्टी को भी पूर्व समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह याद आ रहे होंगे। अगर वो  आज पार्टी में होते तो अब तक "सौदा" हो गया होता। उन्हें पता है कि कैसे सरकार गिराई और बचाई जाती है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं कि पिछली बार जब वामपंथियों  ने सरकार से समर्थन  वापस लिया था, उसके कुछ देर बाद ही अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव सरकार के साथ खड़े थे, जबकि  पहले खुद मुलायम सिंह भी न्यूक्लीयर डील के खिलाफ थे।  

खैर न्यूक्लीयर डील को आम जनता इतना नहीं समझ रही थी, लेकिन  डीजल, रसोई गैस और रिटेल में एफडीआई के असर को आम जनता  भी खूब समझती है। इसलिए मुलायम  के  लिए भी सरकार के साथ खड़े होना इतना आसान नहीं होगा। लेकिन ये राजनीति है, मुलायम सिंह और उनकी पार्टी इस मामले में हमेशा अविश्वसनीय रही है। वो किसी हद तक जा सकते हैं। अच्छा मुलायम को ये भी डर है कि कहीं ऐसा ना हो कि मायावती सरकार के पाले में खड़ी हो जाए  और जो मंत्री पद टीएमसी ने खाली किया है, उसे  वो अपने सांसदों से भर दें। मुलायम की कोशिश होगी कि वो सरकार के करीब आएं तो मायावती और दूर रहें।

बहरहाल देश  की राजनीति पर अमेरिका में भी काफी मंथन चल रहा है। सरकार को बचाने के लिए मुझे लगता है कि वहां आपात बैठकें जरूर चल रही होंगी, क्योंकि अमेरिकी  हितों  की पूर्ति जितना  मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हो सकता है, उतना  और किसी के रहने पर नहीं हो सकता। वैसे भी वहां राष्ट्रपति का चुनाव चल रहा है, इसीलिए तो यहां जल्दबाजी में एफडीआई को मंजूरी  दी गई थी, अगर सरकार रोलबैक करती है तो प्रधानमंत्री को अमेरिका की भी नाराजगी झेलनी पड़ सकती है, जो सरकार कभी नहीं चाहेगी। बहरहाल ममता ने भी  एक तरह से सरकार को दो दिन का वक्त दे दिया है, ऐसे में अब वालमार्ट की  भूमिका बढ़ गई है। सरकार के पक्ष में सख्या करने के लिए वालमार्ट अपने खजाने का ताला खोल देगा। अब देखना है कि वालमार्ट के खजाने में कितनी ताकत है।

अच्छा ऐसे समय में लालू  यादव जैसे लोगों की पूछ थोड़ा बढ़ जाती है। यूपीए एक में रेलमंत्री  रहे लालू को अगर कांग्रेस थोड़ा सा भी स्पेस दे तो  वो आज सरकार में सांख्यकी मंत्री बनने को तैयार हो जाएंगे। ममता के समर्थन वापसी के ऐलान से जहां सरकार सकते मे है, वहीं लालू अपनी कीमत बढ़ाने के लिए कह रहे हैं कि ये समर्थन वापसी का ड्रामा है। समर्थन शुक्रवार को क्यों वापस होगा, आज ही क्यों नहीं लिया। बहरहाल अभी तो सरकार  की  नजर समाजवादी पार्टी पर है, क्योंकि सरकार भी  जानती  है कि इन्हें "मैनेज"  करना सबसे ज्यादा आसान है।

चलिए कल को जोड़ तोड़ से ये सरकार भले बच जाए, लेकिन  इतना तो  साफ है अब इस सरकार की और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख दागदार हो गई है। ये तो पहले ही साफ  हो चुका है आजाद भारत में ये सरकार देश की सबसे भ्रष्ट सरकार रही है। जिसमें प्रधानमंत्री समेत एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों पर करप्सन के आरोप  हैं। कई मंत्री और नेता जेल तक जा चुके हैं।

आखिर में एक चुटकुला  सुनाते हैं। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कहा है कि वो सरकार से बात करेंगी। हाहाहहाहाहहाह। सोनिया जी लगता है वाकई आपकी तबियत ठीक नहीं है। रिटेल में एफडीआई,  डीजल और रसोई के दाम बढाने पर पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। 20 सितंबर को भारत बंद है। यूपीए के सहयोगी और सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले इस बंद का समर्थन कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने खुद आपसे तीन दिन पहले बात कर पूरे मामले की जानकारी दी और आप आज कह रही हैं कि अब सरकार से बात करेंगी। अच्छा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब कोई बड़ा फैसला लेने के पहले आपसे बात नहीं करते हैं, यही कहना चाहती हैं ना आप। ऐसी बातें क्यों कर रही हैं, जिससे लोग आपके ही ऊपर हंसे.....
 
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रविवार, 16 सितंबर 2012

To LoVe 2015: सोनिया भी नहीं हटा पाएंगी मनमोहन को !


पहले एक भ्रम दूर कर दूं आप सबका। अगर आपको  लगता है कि यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हटा सकती हैं, तो आप गलत सोच रहे हैं।  आज मनमोहन सोनिया की वजह से नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की वजह से प्रधानमंत्री बने  हुए हैं। अमेरिका में कारपोरेट जगत लगातार दबाव बना रहा था कि अगर भारत में अभी एफडीआई पर फैसला नहीं हुआ तो फिर देर हो जाएगा, क्योंकि ये सरकार अब वापस नहीं आने वाली, और दूसरा प्रधानमंत्री कम से कम मनमोहन जितना कमजोर नहीं होगा। अमेरिका के कारपोरेट जगत ने अमेरिकी प्रशासन को समझाया कि एफडीआई के फैसले  पर मुहर लगाने के बाद भी वहां सरकार ज्यों की त्यौं बनी रहेगी। दरअसल अमेरिका को पता है कि यहां नेताओं की कीमत कितनी है। न्यूक्लीयर डील के दौरान क्या हुआ था ? वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस लिया तो क्या सरकार गिर गई ? इस बार भी नहीं गिरेगी। अमेरिका कारपोरेट जगत देश में सक्रिय हो गया है। एफडीआई के मसले से नाराज ममता, मुलायम, मायावती को मनाने की जरुरत कांग्रेस को नहीं पड़ेगी, वो अमेरिकी मना लेंगे, उन्हें पता है इनकी कीमत। एफडीआई के फैसले पर मुहर लगने से वहां राष्ट्रपति बराक ओबामा  का चुनाव भी आसान हो गया है। राजनीति पर बात करने से पहले दो बातें मीडिया की भी  हो जाए, वरना लेख से मैं न्याय नहीं कर पाऊंगा.......


देश सच में कठिन दौर से गुजर रहा है, ऐसे में जरूरत है सोशल मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभाए। अगर आपको लगता है कि प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया आज जनता की आवाज बनकर हमारी नुमाइंदगी करेगी, तो आप बहुत बड़े भ्रम में हैं। मैं देख रहा हूं कि आज सड़क छाप राजनीति में मीडिया की भूमिका सिर्फ एक मदारी जैसी है, जो डमरू बजाकर भीड़  इकट्ठा करती है, फिर तरह तरह के मुंह बनाकर लोगों का मनोरंजन करती है। इसलिए वक्त आ गया है कि सोशल मीडिया अपनी जिम्मेदारी समझे और कम से कम सही गलत की जानकारी लोगों को दे। अगर आज बात की जाए इलैक्ट्रानिक मीडिया की, तो आप देखेगें कि रोजाना शाम को न्यूज चैनलों पर चौपाल लगी हुई है। यहां वही फुंके राजनीतिक चेहरे दिखाई देते रहते  हैं। सच कहूं तो टीवी पर ऐसी सियासी जमात दिखाई देती है, जिनकी उनकी पार्टी में ही कोई हैसियत नहीं है। ये हम सब बखूबी जानते हैं, लेकिन ये एक कोरम है, जिसे पूरा करना जरूरी है। प्रिंट की बात करें तो स्टेशन पर सबसे कम दाम वाले अखबार की बिक्री ज्यादा होती है, वो इसलिए कि लोग अखबार बिछा कर बैठते हैं। पान की दुकानों पर अंग्रेजी के अखबार ज्यादा बिकते हैं क्योंकि उसमें ज्यादा पेज होते हैं और जिसमें पान वाला ग्राहकों को पान लेपेट कर देता है। घरों में अखबार एक स्टेट्स सिंबल बन गया है कि बाबू साहब के यहां इतने अखबार आते हैं। जिनके घर में छोटे बच्चे हैं, वहां अखबार का इस्तेमाल क्या होता है, आप सब जानते हैं।

 अच्छा मीडिया की इस हालत के लिए कोई और नहीं हम सब ही जिम्मेदार हैं। कोई सिरफिरा अगर देश की शान तिरंगे, राष्ट्रीय चिह्न, संसद और भारत माता के खिलाफ अनर्गल प्रलाप करता है तो हम उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाते हैं। हम गलत काम का भी विरोध करने से परहेज करते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब अगर यही सब है, तो मुझे लगता है कि इस आजादी पर पाबंदी लग जानी चाहिए। अच्छा वो दिन कब आएगा जब मीडिया अपने भीतर भी झांकना शुरू करेगी ? नीरा राडिया के टेप में तमाम बड़े बड़े पत्रकारों का नाम आया, जो सत्ता की दलाली करते हैं। इस टेप में क्या है, किसका नाम है, मीडिया के लोग जानते हैं। लेकिन क्यों नहीं मीडिया के भीतर से ये मांग उठी कि इन्हें पत्रकारिता के अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए ? अगर मीडिया ऐसा नहीं कर सकती है तो क्या उसे भ्रष्ट्र मंत्री का इस्तीफा मांगने का हक है ? एक जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मीडिया अपनी लक्ष्मण रेखा खुद तय करे। चलिए मीडिया लक्ष्मण रेखा भले तय ना करे, लेकिन जिम्मेदारी तो तय कर ले।

आज हालत क्या है ?  सब जानते हैं, जिस तरह से सिगरेट के पैकेट पर लिखा रहता है कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उसके बाद हर शहर और राज्य में सिगरेट  की बिक्री पर कोई रोक टोक  नहीं होती,  ये धडल्ले से बिकती है। थोड़ा और शोर शराबा मचा तो सिगरेट बनाने वाली कंपनियों को कहा गया कि वो सिगरेट के डिब्बे पर एक काला चित्र भी  बनाएं, बस हो गई कार्रवाई। ठीक उसी तरह इलैक्ट्रानिक मीडिया ने भी चैनल पर चलाना शुरू कर दिया है कि " अगर आपको चैनल पर दिखाई जाने वाले किसी खबर पर एतराज है तो आप एनबीए को सुझाव दे सकते हैं। अरे मेरा मानना है कि जब सिगरेट पीना वाकई स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो इसे देश में बननी ही क्यों चाहिए और बिक्री क्यों होनी चाहिए ? मीडिया के मालिकान अगर ईमानदारी से सोचें तो क्या उन्हें नहीं पता  है कि हम कहां से कहां जा रहे हैं, क्या क्या सुधार की जरूरत है ? सभी सब कुछ  पता है, पर नहीं करेंगे, क्योंकि अब मीडिया मिशन नहीं प्रोफेशन हो गई है।

कई बार मुझे लगता है कि देसी मीडिया अपनी विश्वसनीयता भी खोती जा रही है। देखिए ना इलैक्ट्रानिक मीडिया हो या फिर प्रिंट मीडिया। सभी यूपीए सरकार की कारगुजारियों को जनता के सामने लाने  में कोई कसर बाकी नहीं रखी। सभी ने कहा कि देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र फेल हो गया है। प्रधानमंत्री कमजोर और असहाय नजर आ रहे हैं। देश मे इससे ज्यादा भ्रष्ट्र सरकार कभी नहीं रही। मनमोहन को मजबूत नहीं मजबूर प्रधानमंत्री कहा गया। कुछ लोगों ने तो उन्हें चोरों का सरदार तक कहा, क्योंकि उनके  मंत्रिमंडल में चोरों की संख्या कहीं ज्यादा है। हर बड़े मंत्री पर कोई ना कोई दाग है। अब देश की मीडिया ने प्रधानमंत्री तक को कोयले का गुनाहगार बता दिया। इसके बावजूद  कोई फर्क नहीं पड़ा। कभी सरकार ने सफाई देने की कोशिश नहीं की। लेकिन अमेरिकी  मैंग्जीन पहले टाइम ने फिर वहां के एक अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने प्रधानमंत्री को कमजोर प्रधानमंत्री बताया तो हल्ला मच गया। पीएमओ सफाई देता फिर रहा है। इससे एक सवाल पैदा होता है कि देश के प्रधानमंत्री भारत की जनता और मीडिया के प्रति जवाबदेह हैं या अमेरिका के। अमेरिकी पत्रिका में उनके खिलाफ खबर छपने से इतनी बौखलाहट क्यों ?

इसका जवाब भी मैं आपको बताता हूं। आपको पता है कि अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव चल रहा है। वहां का कारपोरेट जगत लगातार व्हाइट हाउस पर दबाव बना रहा था कि भारत में जल्दी ही एफडीआई शुरू होनी चाहिए। कारपोरेट जगत ने समझाया कि इस समय वहां सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, इनके रहते ही काम हो सकता है। वरना अब देश में कभी भी चुनाव हो सकता है और अब कांग्रेस की वापसी मुश्किल है। अमेरिकी राष्ट्रपति से कहा गया कि न्यूक्लीयर डील के दौरान भी सरकार से एक दल ने समर्थन वापस ले लिया था, पर वहां समर्थन के लिए दूसरे दलों को मैनेज कर लिया गया था। इस बार भी अगर कोई समर्थन वापस लेगा तो भी सरकार नहीं गिरेगी। आपको पता है देश में एफडीआई के मुद्दे पर जितनी बैठकें नहीं हुई होंगी, उससे ज्यादा बैठकें अमेरिका में हो चुकी हैं। आज अपनी चुनावी सभाओं में भी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत मे एफडीआई का रास्ता साफ हो जाने को अपनी उपलब्धि बता रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि आज एफडीआई के मुद्दे पर भले कुछ राजनीतिक दल जिसमे तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और द्रमुक शोर शराबा कर रहे हैं। कुछ  लोग समर्थन वापसी तक की धमकी दे रहे हैं, पर सरकार यूं ही चलती रहेगी। मनमोहन सिंह का कुछ नहीं होने वाला है। शोर मचाने वाले दलों को अमेरिकी कारपोरेट जगत खुश कर देगा। फिर ये खामोश हो जाएंगे, जैसे न्यूक्लीयर डील के दौरान हुआ था। वामपंथी गए तो मुलायम तुरंत उनका साथ छोड़कर सरकार के पास आ गये, जबकि मुलायम की कोई बात भी नहीं  मानी गई  थी। रोजाना सरकार के खिलाफ जहर भी उगल रहे थे, लेकिन चुपचाप  पड़े रहे।
मुझे तो हंसी आती है जब मैं सुनता हूं कि सोनिया गांधी ने त्याग किया और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया। लेकिन ये बात बिल्कुल गलत है। अगर सोनिया गांधी ने उन्हें  प्रधानमंत्री बनाया होता तो अब तक कब का उन्हें बाहर कर चुकी होतीं। साबित हो गया है कि ये कमजोर प्रधानमंत्री हैं, साबित हो चुका है कि इनके राज में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला, साबित हो चुका  है कि मंत्रियों पर मनमोहन का नियंत्रण नहीं है। ऐसी एक भी काबिलियत नहीं जिसकी वजह से ये प्रधानमंत्री बने रहें, फिर क्या वजह है कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं। आप जानना चाहते हैं तो सुन लीजिए अमेरिका की वजह से मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं।  आज अगर सोनिया गांधी भी चाहें तो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद से नहीं हटा सकतीं। इन्हें जब कभी हटाया जाएगा तो अमेरिका ही हटायेगा। इसीलिए अमेरिका जो चाहता है, वो काम मनमोहन सिंह तुरंत कर देते हैं। हां वो बस इस बात की गारंटी लेते हैं कि सरकार नहीं जाएगी और मैं ही प्रधानमंत्री बना रहूंगा।

एक बात बताइये अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट में एक खबर छपने  का नतीजा ये हुआ कि सरकार ने सबसे विवादित मुद्दे रिटेल में एफडीआई को मंजूरी दे दी। जबकि देश के सारे चैनल और अखबार इसके बारे में लिख रहे हैं, सरकार के सहयोगी दलों की ओर से विरोध किया जा रहा है और प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हम फैसला वापस नहीं लेगें। आप आसानी से समझ सकते हैं कि कमजोर प्रधानमंत्री को आखिर ताकत कहां से मिलती है। इसके अलावा ये बात भी सही है कि विरोध कर रहे राजनीतिक दलों का मकसद भी एफडीआई को वापस करना नहीं बल्कि अपनी कीमत बढाना भर है, आखिर लोकसभा के चुनाव आने वाले हैं, ऐसे  में चुनाव के लिए पैसा भी तो चाहिए।

जिस देश में ऐसे हालात हो, लोकतंत्र खतरे में हो, मीडिया दिग्भ्रमित हो तो फिर उम्मीद किससे की जा सकती है। मुझे लगता है कि सोशल मीडिया को यहां एक महत्वपूर्ण भूमिका  निभानी होगी, सभी को  कोशिश करनी होगी कि देश की असल सच्चाई को  कैसे  आम आदमी तक पहुंचाया जाए। मैं एक बात यहां फिर दुहराना चाहता हूं कि

वतन की फिक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है।
तेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में ।।
न समझोगे तो मिट जाओगे, ऐ हिन्दोस्तां वालों।
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।।

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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

To LoVe 2015: जरा बच के : ये हैं ब्लाग के आतंकी !

 हां मैं आपको ब्लाग के आतंकियों से भी मिलावाऊंगा, पर पहले बात देश में  घट रहे एक बड़े सियासी घटनाक्रम की कर ली जाए। पहले डीजल, रसोई गैस की कीमतों को बढ़ाने के बाद अब सरकार ने रिटेल में एफडीआई को मंजूरी दे दी है। मुझे लगता है कुछ दिन दिल्ली गरम रहेगी।  वैसे आपको पता है तीन दिन के लिए दिल्ली से बाहर था, वापस लौटा तो यहां कई चीजें देख रहा हूं। एक ओर मंहगाई के खिलाफ देश भर में आवाज उठाई जा रही है, दूसरी ओर ब्लागिंग के कुछ आतंकी बता रहे हैं कि वो कितने पढ़े लिखे हैं। आइये पहले बात करते हैं मंहगाई की। वैसे तो पेट्रोल, डीजल के साथ ही रसोई गैस की कीमतों को बढ़ाने का फैसला काफी समय पहले हो गया था, लेकिन बात ये हो रही थी कि इसे लागू कब से किया जाए। अगर संसद न चल रही होती तो ये बढोत्तरी पहले ही कर दी जाती। कोयले पर घिरी सरकार को लग रहा था कि इस समय कीमतों में बढोत्तरी आग में घी डालने जैसी होगी, लिहाजा संसद का सत्र खत्म होने के बाद इसे लागू करने का फैसला लिया गया। सरकार की मंशा पहले से साफ थी, इसलिए मुझे हैरानी नहीं हुई, क्योंकि मैं देखता हूं कि पेट्रोलियम मंत्रालय आज कल तेल कंपनियों के लिए पीआरओ का काम करता है। मंत्रालय हमेशा उनका पक्ष लेकर बताता रहता है कि बढ़ोत्तरी जायज है, वरना तेल कंपनियां बंद हो जाएंगी।

बहरहाल अब इतना तो साफ हो गया है कि सरकार को सीबीआई चल रही है। अब देखिए ना समाजवादी पार्टी के नेता अगर गल्ती से भी सरकार के खिलाफ या फिर उनके युवराज राहुल गांधी को लेकर कोई टिप्पणी करते हैं तो शाम होते-होते वो अपना बयान बदलने को मजबूर हो जाते हैं। सीबीआई का डर ही ऐसा है कि खुद मुलायम सिंह को देखा गया है कि कई बार वो दूसरे नेताओं के साथ मिलकर कोई फैसला करते हैं, फिर खुद चुपचाप सरकार के पाले में खड़े हो जाते हैं। अब ये बात तो किसी को पता नहीं कि वो कांग्रेस अध्यक्ष के सामने जाकर कहते क्या होगें, लेकिन जैसा दिखाई दे रहा है उससे तो लगता है कि मुलायम सिंह यही बताते होंगे कि मैं तो इसलिए वहां जाता हूं जिससे आपको वहां जो कुछ चल रहा है उसकी खबर दे सकूं।

अब देखिए ना मुलायम सिंह यादव राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के साथ घंटो बतियाते रहे। ममता को भी लगा कि मुसलमान उम्मीदवार के मामले में मुलायम सिंह बात मान जाएंगे। उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम का नाम भी ममता के साथ प्रेस कान्फ्रेस में आगे किया। फिर रात में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष से मुलाकात की और शाम की बात से पलट गए। हालांकि कि मैं मानने को तैयार नहीं हूं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा यहां तक है ये मुलाकात सीबीआई ने अरेंज की थी। मुलाकात के दौरान तमाम सरकारी फाइलें वहां मौजूद थीं, उन्हें खोल कर दिखाने का नंबर नहीं आया, क्योंकि इसके पहले ही मुलायम सिंह ने सरकार की हां में हां कर दी थी। अब बेचारी ममता अकेले क्या सरकार को घेर पातीं, चुपचाप बंगाल निकल गईं। वैसे ममता भी चाहतीं तो अपनी बात पर अड़ी रहतीं, लेकिन अंत में वो भी सरकार के पाले में आ गईं।

मुलायम और ममता को ऐसा क्यों लगता है कि देशवासी मूर्ख हैं, उनकी राजनीति लोगों के समझ में नहीं आएगी। मेरा स्पष्ट मानना है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी को जिस तरह ऐतिहासिक जीत मिली है, उसी उत्तर प्रदेश मे लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को मुंह की खानी पड़ सकती है। अगर ऐसा ही झूठा और दिखावे वाला विरोध ममता बनर्जी भी करतीं रहीं तो वो दिन दूर नहीं जब उन्हें बंगाल तगड़ा झटका दे दे। आप पूछ सकते हैं कि आखिर मैं इतनी तल्ख टिप्पणी क्यों कर रहा हूं। मेरी टिप्पणी तल्ख इसलिए है कि सरकार जब भी गलत फैसले लेती है, तब माया, ममता और मुलायम ही सरकार के साथ सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं। कई बार लालू भी सरकार की हां में हां मिलाते नजर आते हैं। मेरा सवाल है कि ये सड़कों पर उतर कर बवाल काटने का मतलब क्या है ? आप आइये दिल्ली और सोनिया गांधी से साफ-साफ बात कीजिए कि अगर बढ़ी कीमते घंटे भर में वापस नहीं होती हैं तो हम समर्थन वापस ले लेगें। मुझे पक्का भरोसा है कि आपको रायसीना हिल यानि राष्ट्रपति भवन जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और जनता को राहत मिल जाएगी। अगर एक प्रतिशत सरकार बढ़ी हुई कीमतें वापस नहीं लेती है तो सीधे समर्थन वापसी का पत्र राष्ट्रपति को थमा आइये।

लेकिन मुझे पता है कि आप ये काम नहीं करेंगे, क्योंकि आप सब के कई तरह के हित इन्वाल्व हैं। सीबीआई तो आपके पीछे है ही। इसके अलावा आपको यूपी के लिए बड़े पैकेज की भी लालच बनी रहती है। ममता की नाराजगी की एक खास वजह भी पैकेज रही है। बहरहाल आज की डेट में मायावती थोड़ा कम्फर्ट जोन में हैं। उनका आय से अधिक संपत्ति वाला मामला भी लगभग समाप्त हो गया है और अब सरकार में भी नहीं हैं कि उनकी कोई छीछालेदर हो सकती है। इसलिए मैं फिर दोहराता हूं कि जनता को मूर्ख बनाने के बजाए जनता के हित में सही निर्णय लेने का वक्त आ गया है, वरना 2014 आप सबको जीवन भर याद रहेगा, जब जनता अपना फैसला सुनाएगी।

ब्लाग में भी आतंकियों का गिरोह


चलिए अब थोड़ी सी बात ब्लाग के आतंकियों के गुंडागर्दी की कर ली जाए। मैं बाहर था, अचानक मेरे पास ब्लागर मित्रों के फोन आने लगे। सामान्य शिष्टाचार से बात शुरू हुई, फिर  उन्होंने बताया कि आपने तहजीब के शहर लखनऊ वालों की करतूत नहीं पढ़ी। मैने पूछा कि अब क्या कर दिया इन्होंने, हम कितने दिनों से इन्हें देख ही तो रहे हैं, फिर मैं ही क्या सभी ब्लागर देख रहे हैं। मित्र ने बताया कि आपके बारे में अनाप-शनाप लिखा गया है। मैने कहा जब खुद कह रहे हैं कि अनाप-शनाप लिखा है, तो अनाप-शनाप पर इतना ध्यान क्यों देना।  बहरहाल मित्र से तो यहीं बात खत्म हो गई। मेरा शूट चल रहा था, शाम को शूट खत्म करने के बाद होटल आया तो मुझे लगा कि देखा जाए, क्या कहा जा रहा है।

सच बताऊं तो आप हैरानी में पड़ जाएंगे, क्योंकि जिसके नाम से ये लेख पोस्ट किया गया है, दरअसल ये उसका लिखा नहीं है। इसे लिखने वाला है उसका चंपू नंबर एक। दरअसल लेख के जितने पैराग्राफ हैं, सब उसने मेरे लेख पर कमेंट किया था। मैने उसे पब्लिश होने से रोक दिया। आप मेरे लेख पर जाएं तो पाएंगे कि मैने खुद उसे सुझाव दिया था कि मेरे ब्लाग पर अभद्र भाषा मान्य नहीं है। इसके लिए आपके पास अपना ब्लाग है, वहां गंदगी कीजिए, पूरा स्पेश भी है और आपके परिवार और शुभचिंतक आसानी से आप तक पहुंच भी जाएंगे। चंपू भी चालाक है, उसने देखा कि इस भाषा से तो मेरे ऊपर लोग उंगली उठाएंगे, लिहाजा उसने अपने कमेंट को कट पेस्ट कर एक लेख बना  डाला और उसे सरगना के नाम से पब्लिश करा दिया। हालाकि ये लेख में कोई नई बात नहीं कह पाए। नया एक था जो उन्होंने अपने घर परिवार में बोली जाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया। खैर उनका पारिवारिक मसला है, जो जुबान पर आई उसे बोलते रहते हैं, फिर लिख दिया तो कौन सा तूफान खड़ा हो गया।  अच्छा होता कि घरेलू भाषा अपने घर तक ही सीमित रखते, क्योंकि बहुत जोर शोर से तहजीब और ना जाने क्या क्या कहते रहते हैं।

अरे एक बात तो रह ही जा रही थी। गिरोह के सरगना ने पहले खुद अपने पढ़ाई लिखाई की चर्चा की है, फिर उनकी संस्था से जुड़ी ब्लागर ने उनकी पढ़ाई लिखाई पर अपना ठप्पा लगाया है। यानि जो लिखा गया है वो सही है। अच्छा मुझे एक सवाल का जवाब चाहिए, अगर पिता से पुत्र ज्यादा पढ़ ले तो क्या उसकी हैसियत ये हो जाती है कि वो अपने पिता को सम्मानित करे। इस मामले में तहजीब के शहर से तो कोई उम्मीद नहीं है, पर सच में मैं अपने बड़ों का मार्गदर्शन चाहता हूं। बहरहाल मेरे लेख पर कई लोगों की टिप्पणी में ये बात सामने आई कि मैने सच्चाई कहने की हिम्मत की, किसी ने कहा आप कम से कम सब कुछ साफ-साफ लिखते हैं, मेरी तो हिम्मत ही नहीं पड़ती। इस बात से मेरे मन में काफी दिनों से सवाल था कि आखिर लोग सच क्यों नहीं कह पाते, ऐसी क्या बात है ?  अब समझ में आ गया। ये गिरोह के सदस्य ऐसी ही घरेलू भाषा में उनसे बात करने लगेंगे, जाहिर है कोई भी आतंकियों के मुंह नहीं लगना चाहेगा।

एक बात जानना चाहता हूं कि मैने शिखा जी के बारे में भला ऐसी क्या टिप्पणी कर दी, जिससे उनके सम्मान को चोट पहुंचा ? मैने तो यही कहा ना कि मेरी थोड़ी सी शिकायत उनसे है, वो शास्त्री जी की जानती थीं, वो चाहतीं तो शास्त्री जी अपेक्षित सम्मान मिलता। इसमें इतना हाय तौबा क्यों ? अच्छा चलिए आपको शिखा जी के बारे में बहुत तकलीफ हुई। लेकिन यहीं पर रश्मि दीदी के लिए क्या नहीं कहा गया। और महिलाओं के सम्मान की बड़ी बड़ी बातें करने वाले वहां क्यों खामोश रहे ? वैसे भी रश्मि दीदी तो आपकी पत्रिका परिवार से भी जुड़ी हैं ?

और आखिरी बात.. ये लेख जो आया तो मन थोड़ा हल्का हो गया। आप खुद सोचें कि आप किसी को गल्ती करने पर पीट रहे हैं और वो चुपचाप खड़ा रहता है तो गुस्सा और बढ़ता जाता है ना। लगता है कि इस पर कोई असर ही नहीं हो रहा है, क्योंकि इतना पिटने पर भी रो ही नहीं रहा। लेकिन जब गल्ती करने वाला रोता है तो उस पर दया आती है और पीटना बंद हो जाता है। अब भाई मैं इतना भी सख्त नहीं हूं कि किसी कि पिटाई भी करुं और उसे रोने भी ना दूं। लेकिन कुछ लोग बहुत शातिर होते हैं, वो इसलिए भी चीख चीख कर रोने लगते हैं कि पिटाई से बच जाएं।  अगर इशारे की बात समझ में आती है तो मस्त रहिए ..हाहहाहाहहा।

बहरहाल कई मित्रों ने मुझे मेल करके कहा कि आपने तहजीब के शहर वालों  को अच्छा आइना दिखाया है, ऐसे ही तमाम और भी मेल मुझे मिले हैं। अब उन्हें लग रहा है कि उस गिरोह के सरगना ने जैसे व्यक्तिगत मेल को सार्वजनिक कर दिया, और एक लेख पर उसे टिप्पणी के रुप में इस्तेमाल कर रहे हैं,  उससे कई लोग घबरा गए कि कहीं मैं भी ऐसा ना कर दूं। लेकिन मित्रों मैं इतना नीचे नहीं गिर सकता कि व्यक्तिगत मेल को आपकी टिप्पणी बना दूं।  अगर मजबूर हुआ तो मैं सबसे पहले गिरोह के उसी सदस्य का मेल  सबके सामने करुंगा जो मुझे तो माफीनामें का मेल करता है और रात में नशे के इंतजाम के लिए सरगना की चापलूसी करता है। उसने मुझे मेल करके अपनी मजबूरी बताई है, लिहाजा मैने उसे अभी तो माफ ही कर दिया है, जिससे रोजी रोटी चलती रहे बेचारे की । मेरी नजर है वहां आने वाली टिप्पणियों पर.. एक ने अपनी जात बताई है, उसके बारे में मैं जल्दी ही आपको पूरी जानकारी देने वाला हूं। 

(नोट: मैं अपने उन ब्लागर मित्रों से माफी चाहता हूं जिनकी सलाह थी कि मैं इन सबको उन्हीं की भाषा में जवाब दूं। मित्रों मैं सच में गाली नहीं दे पाता हूं, लेकिन आप विश्वास कीजिए मेरी सीखने की क्षमता बहुत तेज है, दो चार लेख मैं ऐसे ही पढ़ता रहा तो जरूर सीख जाऊंगा, फिर आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगा।  )


 
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सोमवार, 10 सितंबर 2012

To LoVe 2015: Book Fair vs साइबर पन्ने.....Rohit

पिछले हफ्ते बुक फेयर में जाना था पर जा नहीं पाया। नौ तारिख तक लगातार आफिस ही जाना था। रविवार को एक दिन की छुट्टी  मिली तो शाम की पहले से ही तय मीटिंग के कारण छुट्टी वाले दिन भी जा पाना संभव नहीं था। मेरे लिए बुक फेयर में जाने का सिर्फ एक ही मतलब होता है-सबकुछ भूल कर विचरना-खरीदना। जब इतना समय नहीं मिलता तो मैं अमूमन बुक फेयर नहीं जाता। आज भी वही हाल था। इन सब के बीच नेट पर कुछ मेल चेक करते-करते ब्लॉगिंग की दुनिया में जा घुसा। किस्मत शायद कुछ मेहरबान थी इसलिए दिल में बुक फेयर न जाने की जो हल्की सी कसक  थी..वो ब्लॉग की दुनिया में खत्म होनी लिखी थी।
    आज जाने कैसे शुद्ध राजनीतिक या कहें करेंट अफेयर से जुड़े ब्लॉग लापता से हो गए थे। साइबर की अजब दुनिया आज कुछ अलग ही रंग लिए हुए थी....ब्लॉग में जाने कैसे कहानी..किस्से...कविताएं..आपबीती..डायरी के कई बंद पन्ने...बतकही...यादें...जैसे .जीवन के अनेक पन्ने खुल गए। एक पन्ने को पढ़ते-पढ़ते दुसरे...दूसरे से तीसरे..जाने कितनी जिदंगियों में झांक आया। जाने कितनो का बीता कल साझा कर लिया...पता ही नहीं चला। कहीं टिप्पणी कर दी....तो कहीं सिर्फ आंगुतक यानि विजिटर के तौर पर रहा....जो पन्ना दिल को दर्द की गहराईयों की तरफ ले जाता दिखा..उसे कुछ पंक्तियों में ही महसूस कर आगे बढ़ चला....आज शायद हर ग़म को धुंए में उड़ाते चलना था....सो रुका नहीं। 
     ये कितना अजीब होता है कि अक्सर किसी का बीता कल...जाने कैसे कई लोगो से टुकड़ों में जुड़ा होता है। कुछ इस तरह लगा जैसे कई अलग-अलग पन्नों में खुद जी रहे हों हम....नमी चाहे आंखों में रुकी हों...या उन चिठ्ठियों में...जो पोस्ट हुई हो या न हुई हों....भिंगोती चली गई..। कहीं करीने से सहेजे रखे वेंलेटाइन कार्ड मिले..तो कहीं चिंदी-चिंदी होकर साइबर में तैरती चिठ्ठियां...हर कहीं अपना या किसी का जानापहचाना बीता कल झांक रहा था....मुस्कुराते हुए...आंखों में पहचान लिए...।
     बाहर से सब अलग-अलग....डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, शिक्षक, व्यापारी, नौकरीपेशा, बेरोजगार...जाने कितने पेशे में बंटे जीवन....पर सबके अंदर दर्द सामान सा..। बाहर से सभी पत्थर..पर अंदर कहीं न कहीं अकेलापन....कहीं पर्वत सी पीर..कहीं हंसकर दर्द से छुटकारा पाने की जद्दोजहद...कैसी अद्भूत समानता है..गज़ब....।
    इस साइबर संसार में जाने कितने खुले जख्म दिखे....जाने कितने सीलन भरे दिल के कोनों में साइबर की दुनिया की ताजी हवा के झोंके दिखे....जाने बंद डायरी के पीले पड़े पन्ने खुले दिखे...किस-किस कोने...किस-किस पन्ने का नाम लूं....किस-किस को याद करुं....दर्द का..किसी अहसास का...कोई एक चितेरा हो तो न.....कोई एक दिल के पन्ने खोले बैठे हो तब न....वैसे भी हर नाम याद नहीं रहता।
      जैसे हिमालय की हर चोटी का नाम याद नहीं रहता...पर हिमालय कहते ही सभी चोटियां महिमामंडित हो जाती हैं...वैसे ही ये सभी नाम हिंदी साहित्य के महासागर की लहरें हैं.....वो लहरें जिनका नाम नहीं होता...पर सागर से....साहिल से जिनका अट्टू रिश्ता रहता है.....वो लहरें जो कभी सागर में अठखेलियां करती हैं....तो कभी साहिल पर आकर सिर पटकती हैं...पर रुकना नहीं जानती थमना नहीं जानती..। यही है साइबर संसार की वो दुनिया...जो कोई बुक फेयर नहीं....सिर्फ पन्नों की दुनिया है....या कहें Life's Pages या कुछ भी...
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To LoVe 2015: क्या "नेशनल टायलेट" है संसद ?

भिव्यक्ति की आजा़दी का मतलब क्या है ? आजा़दी का मतलब क्या ये होना चाहिए कि आप कुछ भी बोलें  और लिखें, कोई रोकने वाला नहीं होगा। या फिर अभिव्यक्ति की आजादी की कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए ? मीडिया से जुडे़ होने के कारण आप समझ सकते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी का मैं तो कभी विरोधी नहीं हो सकता, क्योंकि मेरा मानना है कि अगर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिश हुई तो सबसे ज्यादा मुश्किल मीडिया को ही होगी। इसके बाद भी मैं अब इस मत का हूं कि इस आजादी की एक बार समीक्षा होनी चाहिए। समीक्षा ही नहीं बल्कि लक्ष्मण रेखा भी तय की जानी चाहिए, जिससे इस आजादी की आड़ में गंदा खेल ना खेला जा सके।

मेरा शुरू से मानना रहा है कि "इंडिया अगेंस्ट करप्सन"  से जुड़े तमाम लोग ऐसी भाषा  इस्तेमाल करते हैं जिसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। संसद की गरिमा के साथ जिस तरह इस टीम ने नंगा नाच किया है, मेरी नजर में ये अक्षम्य अपराध है। हां ये बात सही है कि संसद में दागी सांसद हैं, कई लोगों पर गंभीर अपराध हैं। लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि जब चुनाव लड़ने वालें उम्मीदवारों ने पर्चा दाखिल करने के दौरान हलफनामें में घोषित कर दिया कि उनके खिलाफ ये ये मामले लंबित हैं और न्यायालयों में विचाराधीन हैं। इसके बाद भी जब वो हमारे आपके वोट से चुनाव जीत कर संसद पहुंच गए  तो उन्हें गाली देने के बजाए एक बार खुद का भी मूल्यांकन करना चाहिए। सच तो ये है कि जो लोग दागी और भ्रष्टाचार का रोना रो रहे हैं, वो खुद इतने खुदगर्ज हैं कि वोट की कीमत नहीं जानते। वरना केजरीवाल जैसे लोग चुनाव के वक्त मतदान छोड़ कर गोवा जाने के लिए तैयार ना होते।
आइये मुद्दे की बात करें । ताजा मामला कानपुर निवासी कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का है। असीम भी इंडिया अगेंस्ट करप्सन से जुड़े हैं और व्यवस्था पर चोट करने वाले उनके कार्टून का मैं भी प्रशंसक हूं और मेरी तरह तमाम और लोग भी उन्हें पसंद करते हैं।  लेकिन फिर बात आती है आजादी की मर्यादा की। क्या हमें असीम को ये छूट दे देनी चाहिए कि वो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी कार्टून बनाने को स्वतंत्र हैं।  इस कार्टून पर एक नजर डालिए, क्या आपको इस कार्टून में कुछ भी  आपत्तिजनक नहीं लगता है। मेरी तो घोर आपत्ति है। पहले तो महिला को तिरंगे में लपेटा गया है,  ये असीम की दूषित मानसिकता को  बताने के लिए काफी है। मुझे याद है कि कुछ साल पहले समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां ने भारत माता को " डायन " कहा था, उसके बाद तो पूरे देश में हाय तौबा मच गई थी। मैं भी आजम खां के इस वक्तव्य को सही  नहीं मानता हूं। मुझे लगता है कि आजम खां से कहीं ज्यादा घिनौना कृत्य असीम का है। इस कार्टून के जरिए भारत माता को नीचा दिखाने के साथ ही तिरेंगे का भी अपमान किया गया है।  लेकिन यहां लोग असीम का समर्थन कर रहे हैं, क्या मैं इसकी वजह जान सकता हूं ? मीडिया में ये दोहरा मानदंड क्यों है।
 अब असीम के इस दूसरे कार्टून को ले लें। मैं कहीं से नेताओं का पक्ष नहीं ले रहा हूं, लेकिन हम ये क्यों भूल जाते हैं कि हम आज भी एक सभ्य समाज में रहते हैं और सभ्य समाज की एक अपनी मर्यादा है, यहां कोई लिखा पढ़ी में कानून तो नहीं है, कि हमें कैसे रहना है, क्या करना है क्या नहीं करना है, लेकिन इतना तो हम सब जानते ही हैं कि सभ्य समाज की क्या परिभाषा है और उसका दायरा क्या है।  पता नहीं मैं सही कह रहा हूं या नहीं,  पर जितना मैं जानता हूं कार्टून का मकसद यही है कि वहां कुछ लिखने की जरूरत ना पड़े, ऐसा कार्टून बनाया जाए, जिसमें सब कुछ साफ हो जाए । लेकिन अब कार्टूनिस्ट अपनी लक्ष्मण रेखा पार करने लगे हैं और कार्टून के जरिए व्यक्तिगत खुंदस निकालने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि कार्टून बनाने के बाद उसमें कुछ आपत्तिजनक शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। गैंग रेप आफ मदर इंडिया, नेशनल एनीमल ये सब उनकी घटिया सोच को दिखाती है।
असीम का एक ये भी कार्टून है। क्या इसे आप सही मानते हैं। हम संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं। हर पांच साल में जब चुनाव होता है तो देश की 121 करोड़ की आबादी सदस्यों को चुनने लिए मतदान करती है। कड़ी धूम, बारिश और ठंड की परवाह किए बगैर हम वोट डालकर अपने पसंदीदा उम्मीदवार को लोकतंत्र के इसी मंदिर में भेजते हैं। लेकिन यहां संसद की तरह तो पहले असीम ने टायलेट को डिजाइन किया, इसके बाद भी उनसे नहीं रहा गया तो अपनी घिनौने विचार को व्यक्त करने के लिए यहां इसे "नेशनल टायलेट" लिखा। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि इसके लिए सिर्फ राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज करने से कुछ नहीं होने वाला है। लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाने वाले दोषी को फांसी पर भी लटका दिया जाए तो ये सजा कम होगी। आइये एक और कार्टून पर नजर डालते हैं, उसके बाद आप देखें कि असीम की मानसिकता क्या है।
अब इस कार्टून के जरिए आप क्या साबित करना चाहते हैं। आपको नहीं लगता कि यहां जो भी कार्टून हैं वो देश की गरिमा के खिलाफ हैं। अगर कार्टून भ्रष्ट नेता के खिलाफ होता तो मुझे लगता है कि इससे किसी को इतनी तकलीफ नहीं होती। लेकिन यहां तो राष्ट्रीय गौरव यानि  तिरंगे का मजाक बनाया गया, फिर संसद कि गरिमा को तार तार करने वाला कार्टून और  राष्ट्रीय चिन्ह अशोक की लाट में तीन शेरों की जगह तीन भेड़िए बनाकर सत्यमेव जयते के स्थान पर भ्रष्टमेव जयते लिखा गया है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस कार्टून के पक्ष में भी नहीं हूं और ना ही मैं समझता हूं कि इसके जरिए कोई सकारात्मक संदेश ही जनता के बीच पहुंच रहा है। सिर्फ यही नहीं असीम का अगला कार्टून तो देखकर ही उसके प्रति मन में घृणा पैदा करती है। मैं वाकई ये सोचने के लिए मजबूर हो जाता हूं कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायने यही हैं। पहले इस कार्टून पर नजर
डालिए। अब मैं देश के उन विद्वानों से इस कार्टून के बारे में जानना चाहता हूं, जो उसकी गिरफ्तारी पर हाय तौबा मचा रहे हैं।  इसके जरिए देश की जनता को क्या संदेश देने की कोशिश की जा रही है। इस कार्टून के जरिए क्या कसाब को महिमा मंडित करने की कोशिश की जा रही है या फिर ये बताया जा रहा है कि हमारा भारतीय संविधान अब इसी के लायक है कि आतंकवादी इस पर पेशाब करें। कार्टून बनाने की बात तो दूर मैं तो समझता हूं कि किसी भी भारतीय के मन में भारतीय संविधान के प्रति ऐसी दुर्भवना कैसे आ सकती है। अगर आती है तो क्या वो सजा का हकदार नहीं है ? उसे सजा नहीं मिलनी चाहिए ? अगर देश संविधान की इज्जत करता है, तो हमें उन लोगों की पहचान करनी होगी, जो ऐसे आदमी की गिरफ्तारी के विरोध में सड़क पर निकले हुए हैं। मन में एक सवाल है कि क्या देश की प्रतिष्ठा के खिलाफ इस तरह जहर उगलने वाले के खिलाफ दुनिया के दूसरे देश भी यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं, या फिर ऐसी सख्त कार्रवाई करते हैं, जिससे कोई दूसरा आदमी ऐसी हिमाकत न कर सके।  
  
 सच कहूं तो मुझे असीम के खिलाफ दर्ज राष्टद्रोह के मामले को लेकर कोई आपत्ति नहीं है, मुझे आपत्ति इस बात पर है कि जो कार्रवाई बहुत पहले  करनी चाहिए थी, उसे अंजाम देने में इतना वक्त क्यों लगाया गया, इसके लिए जरूर पुलिस के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। मुझे पता है कि देश और प्रदेश में कमजोर सरकार है,  इसलिए मामला भले दर्ज कर लिया गया हो, लेकिन वो देश में कुछ लोगों के विरोध को झेल नहीं पाएगी। आज नहीं कल असीम को छोड़ दिया जाएगा। मैं अभी देख रहा हूं कि महाराष्ट्र सरकार फिलहाल घुटने पर आ गई है और वो पूरे मामले से सम्मान जनक तरीके से कैसे बाहर निकले, इस पर विचार कर रही है। पुलिस पर दबाव बना दिया गया है कि वो 16 सितंबर के पहले ही असीम को कोर्ट में पेश कर कह दे कि अब जांच पूरी हो गई है।  जिससे असीम की रिहाई का रास्ता साफ हो सके।

बहरहाल पुलिस तो अब असीम को छोड़ना चाहती है, लेकिन उसके खिलाफ मामला दर्ज हो गया है और उसे कोर्ट ही छोड़ सकती है। लिहाजा पुलिस के हाथ में अब कुछ नहीं रह गया है। दवाब में पुलिस भले आ गई हो, लेकिन कोर्ट ने आज उसे 24 सितंबर तक जेल भेज दिया है। जेल भेजना कोर्ट की भी मजबूरी थी, क्योंकि हीरो असीम ने जमानत की अर्जी ही नहीं दी।  अब देशवासियों की समझ में नहीं आ रहा है कि देशद्रोह जैसा मामला दर्ज करने के बाद पुलिस अब घुटने पर क्यों आ गई? खैर जल्दी ही असीम को विदेशों में तमाम पुरस्कार और सम्मान मिलने का क्रम शुरू हो जाएगा। नेताओं को नेशनल एनीमल और संसद को नेशनल टायलेट बताने वाला अब देश का राष्ट्रीय हीरो होगा, जिससे हर जगह सम्मान मिलेगा। शर्म की बात है..।
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शनिवार, 8 सितंबर 2012

To LoVe 2015: अन्ना मैं हूं और मैं ही रहूंगा ...


जी हां, आज अन्ना ने बता दिया कि मैं अन्ना हूं और मैं ही अन्ना रहूंगा। अरविंद केजरीवाल आप कभी मेरी जगह लेनी की मत सोचिए। अगर मैं समर्थन देकर आंदोलन खड़ा  कर सकता हूं तो एक अपील कर सब कुछ खत्म भी कर सकता हूं। कुछ दिनों से अन्ना अपने गांव रालेगन से कुछ ऐसा कर रहे हैं कि दिल्ली वालों के पसीने छूट जाते हैं और अगले ही दिन इन्हें मत्था टेकने अन्ना के यहां जाना पड़ता है। पहले दिल्ली वालों को विश्वास में लिए बगैर उन्होंने  टीम अन्ना को भंग कर दिया और कहाकि अब इसकी जरूरत नहीं रही, क्योंकि जनलोकपाल आंदोलन के लिए टीम अन्ना बनी थी, अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। टीम भंग हुई तो सभी ने खुद को अन्ना का सहयोगी कहना शुरू कर दिया। अन्ना खामोश रहे, लेकिन पिछले दिनों आंदोलन के दौरान जब कुछ लोगों ने मैं अरविंद केजरीवाल हूं कि टोपी लगाई और अरविंद ने इसे रोका नहीं तो अन्ना का नाराज होना स्वाभाविक था। बस फिर क्या, उन्होंने ऐलान कर दिया कि राजनीतिक पार्टी बनाने का कोई मतलब नहीं है, वो ना दल मे शामिल होंगे और ना ही किसी का प्रचार करने जाएंगे। इससे दिल्ली फिर हिल गई और घुटने के बल केजरीवाल फिर पहुंच गए अन्ना के गांव रालेगन। खैर अन्ना ने थोड़ी नरमी दिखाई और कहा कि राजनीति में आने के लिए जनता से पूछो, मुझसे नहीं। अब टीम जनता के दरबार मे जाएगी..... हा हा हा हा. अन्ना से पंगा, सोचना भी नहीं। अन्ना तो अन्ना ही रहेंगे।   

सामाजिक न्याय का सिद्धांत यही है कि जब आप दूसरी संस्था पर उंगली उठाते हैं तो अपने बीच भी क्या चल रहा है, उस पर भी अपनी बेबाक राय रखनी चाहिए। पत्रकारिता की बुराइयों पर तो मैं समय-समय पर बिना लाग लपेट के बात करता ही रहता हूं। हफ्ते भर पहले ब्लागरों के गोरखधंधे में भी झांकने की कोशिश की। जो कुछ देखा, वो तो आपको बता चुका हूं, खैर उसकी बदबू उसी शहर तक रहे तो ज्यादा बेहतर है। ये बुराई दूसरे शहर और समाज तक ना फैले, ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा।

वैसे तो आपको पता है इस समय देश में क्या चल रहा है। कोयला ब्लाक के आवंटन में धांधली को लेकर संसद का मानसून सत्र एक दिन भी नहीं चल सका। कालेधन के खिलाफ आग उगल रहे बाबा (बेचारे) रामदेव बुरी तरह फंस गए हैं, जांच पड़ताल में उनके यहां तमाम खामियां मिली हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर और फैसले लेने में अक्षम बताया है अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने। खेल की दुनिया से बड़ी खबर ये है कि कैंसर के आपरेशन के बाद क्रिकेटर युवराज ने फिर टीम में वापसी की है। बहरहाल इन सब विषय पर भी जरूर लिखूंगा, पर आज बात टीम अन्ना में टकराव की।

एक समय में ईमानदारी की ऐसी-ऐसी बातें टीम अन्ना कर रही थी जैसे देश में इन पांच लोगों के अलावा कोई दूसरा आदमी ईमानदार है ही नहीं। इतना ही नहीं मैं बहुत से चोरों को जानता हूं जो सरकारी महकमें की ठेकेदारी में दलाली करते हैं या फिर आरटीओ विभाग में दलाली करते फिरते हैं, लेकिन जंतर मंतर पर सबसे ज्यादा सफेद टोपी उन्हीं की चमकती दिखाई देती थी। फेसबुक की प्रोफाइल पर कुछ अफसरों की बीबीयों ने "मैं अन्ना हूं" की टोपी वाली तस्वीर लगा ली। जबकि उनके अफसर पति पूरे दिन तिकड़म और घूसखोरी के नए नए फार्मूले इजाद करने में लगे रहते हैं। यानि एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई कि जो टीम अन्ना के साथ है वही ईमानदार बाकी सब चोर।

मीडिया भी बौरा सी गई। दरअसल इलैक्ट्रानिक मीडिया देश में जब से सक्रिय हुई है, उसके बाद ये पहला जन आंदोलन था। आंदोलन में मीडिया की भूमिका क्या होनी चाहिए, ये बात  मीडिया समझ नहीं पाई। उसने इस आंदोलन को भी अपनी टीआरपी का मैदान भर माना। यही वजह है कि न्यूज चैनलों पर कुछ भी चलता रहा, मंच की ओर कैमरा लगाकर लोगों ने चैनल को समर्पित कर दिया आँदोलन के नाम। ये भी मानीटर करने की जहमत नहीं उठाई गई कि आखिर यहां चल क्या रहा है, इसे दिखाया जाना चाहिए या नहीं। यही वजह है कि ओमपुरी, किरन बेदी क्या अरविंद केजरीवाल तक कुछ भी बोलते रहे। हालत ये हुई ओमपुरी को माफी मांगनी पड़ी और दूसरे लोगों का मामला संसद की विशेषाधिकार समिति के पास विचाराधीन है।

खैर ये तो हुई पुरानी बात। चलिए आज की बात की जाए। जंतर मंतर पर टीम अन्ना ने अपना अनशन खत्म करते हुए ऐलान किया कि अब देश में राजनीतिक विकल्प खड़ा किया जाएगा। अब खाना छोड़कर नहीं बल्कि खा पीकर आंदोलन किया जाएगा। इन्होंने सरकार को असंवेदनशील बताया और कहा कि इनके सामने उपवास करना बेकार है क्योंकि ये उपवास की भाषा नहीं समझते हैं। अन्ना ने कहाकि अब हम राजनीतिक दल बनाएंगे, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि वो इस राजनीतिक दल में शामिल नहीं  होंगे, हां जरूरत महसूस हुई तो देश भर में पार्टी उम्मीदवार के लिए प्रचार करेंगे।  बस अब क्या, टीम बेलगाम हो गई, उसे लगने लगा कि कल को हम ही एक मजबूत विकल्प होंगे।

अगर आप हमारे पुराने लेखों को पढ़े तो मै पहले से कहता रहा हूं कि जो लोग भी टीम में हैं, सबकी महत्वाकांक्षा बहुत अधिक है। इन सबको लग रहा है कि कल देश की कमान उनके ही हाथ में आने वाली है। आपको बताऊं अभी पार्टी बनी नहीं, लेकिन ये तो मंत्रालय तक तय करने लगे हैं कि 2014 में किसे कौन सा मंत्रालय दिया जाएगा। अच्छा मैं महत्वाकांक्षा को बिल्कुल अन्यथा नहीं लेता हूं, मेरा मानना है कि आदमी को महत्वाकाक्षी होना चाहिए। लेकिन महत्वाकांक्षा जब लालच में बदल जाए तो समझ लिया जाना चाहिए आपकी उलटी गिनती शुरू हो गई। टीम अन्ना के साथ भी कुछ ऐसा ही रहा। वैसे मैं बार बार कहता रहा हूं  कि देश में भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त हैं, इसलिए लोग जंतर मंतर पर जमा होते रहे, उन्हें लग रहा था कि हो सकता है कि इस आंदोलन से कुछ बदलाव हो। पर हम ही नहीं लोग भी खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं।

देखिए टीम की असलियत सबके सामने आ चुकी थी। हवाई जहाज के किराए की सामाजिक संस्था से वसूली में किरन बेदी पकडी गईं। अब आप सोच सकते हैं आखिर किराए में कितने पैसे की गड़बडी की जा सकती है। लेकिन इससे ये साफ हो गया कि मौका हाथ लगने पर बेदी चूकतीं नहीं है। केजरीवाल सरकार का पैसा दवाए पड़े थे, जब शोर मचा तो अपनी झेंप मिटाने के लिए प्रधानमंत्री के यहां नौ लाख रुपये का चेक भेज दिया। अब केजरीवाल कौन समझाए कि प्रधानमंत्री के यहां कोई बकाया जमा करने का काउंटर है क्या ? लेकिन इससे पता चल गया कि इस आंदमी का अहमं किस जगह पहुंच चुका है। भूषण बंधुओं का मामला किसी से छिपा नहीं रहा। उन्होंने भी राजस्व की चोरी की और मामला तूल पकड़ा तो पैसे जमा करना पड़ा। हां मैं अन्ना को बेईमान तो नहीं कह सकता, लेकिन वो रालेगन से लेकर दिल्ली तक जिनके साथ रहते हैं, उनकी ईमानदारी शक के दायरे में हैं।

बहरहाल अब टीम में बिखराव की खबरें आ रही हैं। किरन बेदी ने लगभग अपना रास्ता अलग कर लिया है। इस टीम से इसके पहले भी तमाम लोग बाहर हो चुके हैं। अब अन्ना  भी कह रहे हैं कि वो इस बात से सहमत नहीं है कि राजनीतिक दल बनाया जाए। सवाल ये है कि जब राजनीतिक दल बनाने के मामले में बात हो रही थी तो क्या अन्ना को भरोसे में नहीं लिया गया था ? अगर लिया गया था, तो फिर अन्ना कैसे कह रहे हैं कि राजनीतिक पार्टी बनाना गलत है। वो चुनाव प्रचार में भी नहीं जाएंगे। हंसी  इस बात  पर आती है कि अरविंद केजरीवाल बहुत दावा करते रहे थे कि हमारी पार्टी में हाईकमान नहीं होगा, सभी फैसले पार्टी फोरम पर तय होंगे, सब समान रहेगे, कोई बड़ा छोटा नहीं होगा। फिर ऐसी क्या बात है कि एक-एक कर सब आपसे दूर होते जा रहे हैं और जो भी बाहर जाता है उसकी वजह अरविंद केजरीवाल ही क्यों होते हैं?

टीम में विवाद के मूल में जाएं तो वही सबकुछ यहां भी है जो दूसरी जगह  देखने को मिलता है। आप जानते हैं कि जहां भी "पद और पैसा" इन्वाल्व होगा, वहां विवाद तय है। जनलोकपाल बिल के लिए चल रहे आंदोलन को जनता ने समर्थन दिया और इस आंदोलन को चलाने के लिए करोड़ों रुपये चंदे में दिए। सही मायने में देखा जाए तो जनता ने जो पैसा  दिया था वो इसलिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन मजबूत हो। ये पैसा इसलिए नहीं दिया गया था कि उससे राजनीति की जाए। बहुत ईमानदारी की बात करते हैं तो आंदोलन के नाम पर वसूले गए पैसे को वापस कर दिया जाना चाहिए। खैर इतनी नैतिकता कि उम्मीद मुझे तो बिल्कुल नहीं है।

बहरहाल अभी तो कुछ दिन टीम में मान मनौव्वल चलेगा,  जो खबरें आ रहीं है, उससे तो यही लगता है कि टीम में अरविंद केजरवाल की तानाशाही है, जिसकी वजह से टीम बिखर रही है। लगता ये है कि अब अरविंद की कोशिश है कि अन्ना को रालेगन तक सीमित कर दिया जाए, वो वही अपना स्वास्थ्य लाभ करते रहें। अरविंद केजरीवाल उनका स्थान ले लें। इसका देश में कैसा रियेक्शन होगा ये देखने के लिए पिछले आंदोलन में कुछ कार्यकर्ताओं को मैं अरविंद केजरीवाल हूं की टोपी पहनाई गई। टोपी सामने आते ही मीडिया में इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई, लिहाजा अब इस टोपी को हटा तो लिया गया है, लेकिन केजरीवाल ने इस मामलें में सफाई नहीं दी।  मैं एक बात तो दावे के साथ कह सकता हूं कि केजरीवाल ने इस आंदोलन और टीम को बहुत नुकसान पहुंचाया है। जब तक  टीम में सभी को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता है और अन्ना अपनी मीटिंग केजरीवाल के घर के बजाए कहीं और शिफ्ट नहीं करते हैं, तब तक ना टीम मजबूत होगी और ना ही आंदोलन।

खैर अन्ना को भी ये आभास है कि उनकी टीम के लोग ही उन्हें हाशिए पर रखना चाहते हैं।  दरअसल सच्चाई ये है कि अन्ना की जरूरत उनकी टीम को बहुत ज्यादा नहीं है। टीम चाहती है कि अन्ना भले ही रालेगन मे ही रहें, देश में सभाएं भी ना करें, लेकिन टीम के खिलाफ कुछ ना बोलें, टीम उनके चित्र वाले पोस्टर को इस्तेमाल करके ही अपना काम चला लेगी। लेकिन ये अन्ना है, आंदोलन से ही आज यहां तक पहुंचे हैं, कोई उन्हें हाशिए पर कर दे, ऐसा संभव नहीं है। सच तो ये है कि आंदोलन ही उनकी वजह से खड़ा हो पाया है। उन्होंने देखा कि लोग ज्यादा उड़ने लगे हैं तो रालेगन मे  एक बयान जारी किया कि टीम अन्ना को भंग कर दिया गया है, अब टीम अन्ना नाम की कोई टीम नहीं रही। दिल्ली के उनके  सहयोगी हिल गए, आखिर क्या हो गया। अब अन्ना के सहयोगी के रूप में टीम काम कर रही है। अभी अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने को गैरजरूरी बता दिया तो टीम के सदस्यों के पसीने छूट गए, क्योंकि यहां तो लोग चुनाव जीता हुआ माने बैठे हैं और मशक्कत तो दो साल बाद सरकार बनाने की हो रही है, मंत्री पद बांटे जा रहे हैं।

इस बीच अन्ना ने टीम को बैकफुट पर ला दिया और कहा है कि जाइये पहले जनता के बीच और पूछिए कि राजनीतिक दल बनाना चाहिए या नहीं। मुझे कई बार हंसी आती  है अन्ना और उनके सहयोगियों का देश कितना छोटा है। सप्ताह भर में उनके पास रिपोर्ट  आ जाएगी कि राजनीतिक दल बनाया जाए या नहीं। इसके अलावा क्या-क्या फैसला हुआ है ये भी सुन लीजिए..

1. अभी राजनीतिक दल बने या ना बने, इसका फैसला नहीं हुआ है। इसके लिए जनता के बीच में जाएंगे।
2. पर उम्मीदवार कैसा होगा, ये तय हो गया।
3. चुनाव जीता नहीं है, पर जीतने के बाद वो क्या करेगा, ये भी तय हो गया। मसलन सरकारी आवास में नहीं रहेगा, छोटे से घर में रहेगा,  वेतन 25 हजार से ज्यादा नहीं लेगा, सांसद निधि का इस्तेमाल नहीं करेगा, सुरक्षा नहीं लेगा।
4. उम्मीदवार इसी तरह के तमाम  बिंदुओं वाले हलफनामें पर साइन करना होगा।

चलिए लेख ज्यादा लंबा हो रहा है, बस थोडा नियम बता दूं। ये राजनीतिक दल बना भी लें तो उसे राष्ट्रीय स्तर या राज्य स्तर की मान्यता तुरंत नहीं मिलेगी। उम्मीदवार को मिलने वाले वोट के आधार पर बाद में तय होता है कि आपके दल को मान्यता मिले या नहीं। इससे जो भी उम्मीदवार हैं उनके सबके चुनाव निशान अलग अलग  होंगे और उन्हें एक तरह से निर्दलीय उम्मीदवार ही माना जाएगा। ऐसे में अगर वो आपके हलफनामें पर हस्ताक्षर करे और बाद में मुकर जाएं तो आप कुछ नहीं कर सकते। बहरहाल मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने से भला किसी को कैसे रोक सकते हैं।



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बुधवार, 5 सितंबर 2012

To LoVe 2015: सचिन के पाछे काहे पड़े हो भाई....Rohit

सचिन के बोल्ड होते ही फिर से हायतौब मच गई है। बेकार की लफ्फाजी शुरु हो गई है। ये भी उन सचिन के खिलाफ जो पिछले 22 साल से लगातार दवाब के बीच खेल रहे हैं। इतना दवाब तो हमारे देश के प्रधानमंत्री को भी नहीं झेलना पड़ता। जनता की उम्मीदों का दवाब नेताओं पर होना चाहिए..लेकिन हकीकत उलट है...नेताओं को सिर्फ डर होता है कि कोई उनकी कुर्सी न छीन ले..कोई चेला पीठ में छुरा न घोप दे। जनता का डर पांच साल में सिर्फ एक बार होता है। हो सकता है ये अतिश्योक्ति लगे..पर सच है कि इतने सालों से देश में कोई एक शख्स इतने दवाब में नहीं है।
     सचिन रमेश तेंदुलकर नाम का ये शख्स पिछले 22 साल से लगातार जनता की उम्मीदों का बोझ उठा रहा है। फिर भी सवालों की बरसात उसे घेरे रहती है।
...“आज तो शतक तो लगा नहीं..शतक लगा तो क्या..दोहरा क्यों नहीं लगा...दोहरा शतक मार दिया तो तो क्या तीर मार लिया..तिहरा तो आज तक नहीं लगा.....लारा तो दो बार 400 बना चुके हैं...उम्र हो गई है...मुंबई का छोरा था इसलिए जल्दी मौका मिला....देखो फिर बोल्ड हो गया....पेड से गेंद लगकर विकेट में गई तो क्या हो....अगर फुटवर्क अच्छा होता तो पैड पर गेंद लगती ही नहीं..“
.....भगवान जाने कितने सवाल।

     फिर भी ये योद्धा टिका हुआ है मैदान में। सिर्फ अपने जुनुन और क्रिकेट से प्यार की वजह से। पिछले दस साल में संन्यास को ही लेकर जितने सवाल सचिन ने झेले हैं उतने शायद ही किसी ने झेले हों...वो भी पूरी शालीनता से। जबकि नेता लोग तो दो-तीन सवाल में ही भड़क जाते हैं। पहले नेता के चेल-चपाटे और उसके बाद नेता खुद गाली-गलौज से लेकर हाथापाई तक करने लगते हैं। यही हाल बाकी खिलाड़ियों और अभिनेताओं का है। अक्सर खिलाड़ी और अभिनेता या तो प्रेस कांफ्रेंस छोड़कर चले जाते हैं..या फिर पहले शर्त रख देते हैं कि उनसे कौन-कौन से सवाल पूछे जाएं। कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें सफलता पच नहीं पाती। काबंली की याद है न। कांबली न याद हों तो सानिया मिर्जा को ही ले लीजिए..फेमस होते ही वो प्रेस कांफ्रेंस छोड़कर चलती बनीं थी। भले ही उनकी सफलता में प्रेस का योगदान नहीं था..पर ऐसा तो सचिन के साथ भी है। मगर सचिन ने हमेशा शालीनता बरती है। यहां तक की न्यूजीलैंड के खिलाफ आखरी टेस्ट में मैदान में खीझ उतारते-उतारते अचानक संभल गए थे सचिन। हालांकि ये भी 22 साल में पहली बार हुआ। वरना जाने कितनी पारी में वो गलत आउट दिए गए...खासतौर पर तब जब पारी को संभाल रहे होते थे। किसी और क्रिकेटर को इतनी बार गलत आउट नहीं दिया गया है जितना सचिन को। 
     सचिन पर ये आरोप भी लगता है कि वो अब पैसे के लिए खेलते हैं। ये आरोप कुछ खिलाड़ी भी लगाते हैं। मगर मजेदार बात ये है कि ये वो खिलाड़ी हैं जिनका करियर लंबा नहीं चला। इनमें तो कई चेहरे सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण जाने पहचाने बने हैं न कि अपने खेल के कारण। ये लोग शारजहां भूल गए..जब अंशुमन गायकवाड़ को रात में फोन आया कि मैच फिक्स हो गया है..भारत के इतने खिलाड़ी इतने रन बनाएंगे...इतने खिलाड़ी रन आउट होंगे..वगैरह..वगैरह। तब रात में परेशान गायकवाड़ सचिन के पास गए औऱ उन्हें ये बात बताई। तब सचिन ने कहा था कि आप चिंता न करें। फिर उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। पहले सेमिफाइनल..फिर फाइनल..दोनों में शतक लगाकर सचिन ने जीत दिला दी। सोचिए उस वक्त एक छोर से रन आउट होते अन्य खिलाड़ियों को देखकर क्या बीत रही होगी इस शख्स पर...लेकिन सीमा पर खड़े सैनिक कि तरह सचिन डिगे नहीं औऱ भारत की लाज रख ली।

     चलिए एक बार मान लेते हैं कि सचिन पैसे के लिए खेल रहे हैं..तो जरा बताइए इसमें गलत क्या है? हकीकत ये है कि  अगर कोई खिलाड़ी गरीबी में होता है तो कोई उसकी सुध नहीं लेता। सरकार तो रहने दीजिए आम लोग खुद गायब हो जाते हैं। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की याद है न। आज जितना उन्हें भारत रत्न देने को लेकर बयानबाजी चल रही है..ध्यानचंद कि इतनी चिंता उनके जिंदा रहते की होती तो दिल्ली के एम्स के जनरल वॉर्ड की खाट पर वे अंतिम सांस नहीं लेते। एम्स भी ध्यानचंत को तब लाया गया जब प्रेस ने हल्ला मचाया। ध्यानचंद की याद न तो उनके शहर के धनाढ्यों को आई और न ही सरकारी बाबूओं को। जब ध्यानचंद को जीते-जी ये देखना पड़ा तो बाकी कि बिसात क्या है?

     वैसे भी अगर पैसे कमाने की कूव्वत आप में है तो क्यों नहीं कमाते। कोई रोक तो नहीं रहा न। सचिन जितना कमाते हैं उससे भी लोगो को जलन होती है। वो चाहते हैं कि वो सारा पैसा दान कर दें। भई क्यों करें दान। उनका पैसा है..दे न दें उनकी मर्जी। उनके अनाथालय में 200 से ज्यादा बच्चे हैं जिनका खर्च वो खुद उठा रहे हैं। दान वो होता है जो पता न चले..औऱ यही सचिन करते हैं।
       कहने का मतलब ये है कि 22 साल से लोगों का दवाब ये शख्स अकेला झेल रहा है..अब तो कम से कम उसे छोड़ दो। जनता की नजरों में कलाम साहब के साथ सचिन कई सालों से आदर्श के रुप में पहले पायदान पर ऐसे ही नहीं टिके हैं...। ये दोनों ही शख्स न तो राजनीति से हैं औऱ न ही सिनेमा से। फिर भी दोनों सबसे बडे आदर्श बने हुए हैं। इसलिए आलोचनाओं जितनी करनी है करिए...पर इतनी भी नहीं कि संदर्भ विशेष में आलोचना अपने अर्थ ही खो दे।
    विश्वास रखिए उम्मीदों पर खरा उतरना सचिन को आता है...चाहे कितना भी दवाब हो....औऱ हर बार कि तरह वो जवाब अपने बल्ले से ही देंगे। इतना याद रखिए।
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