रविवार, 29 जुलाई 2012

To LoVe 2015: दिल्ली : जंतर मंतर से live ...


जंतर-मंतर पर भव्य मंच तो सजाया गया है इसलिए कि लोगों को बताया जाए कि भ्रष्टाचार के चलते देश कहां पहुंच गया है, लेकिन पांच दिन से देख रहा हूं यहां भ्रष्टाचार की तो बात ही नहीं हो रही है, बात महज भीड़ की हो रही है। सबको चिंता इसी बात की है कि भीड़ कहां गायब हो गई। अच्छा मैं हैरान इस बात से हूं कि जो लोग इनके आंदोलन को समर्थन कर रहे हैं, टीम अन्ना  उन्हें "भीड़" कहती है। ये सुनकर मैं वाकई हैरान हूं। बहरहाल जंतर मंतर पर एक बार फिर लोग जमा हैं, उनका दावा है कि वो खाना नहीं खा रहे हैं। कह रहे हैं तो झूठ नहीं बोलेंगे, नहीं खा रहे होंगे। लेकिन एक बात आज तक मेरी समझ में नही आती है कि जो लोग भूख हड़ताल कर रहे हैं, वो सरकारी डाक्टर से जांच कराने से क्यों कतराते हैं, क्यों सरकारी डाक्टर को वापस लौटा कर निजी चिकित्सक की मदद लेते हैं। वैसे मुझे उम्मीद है कि आमरण अनशन कैसे होता है, इसके क्या तरीके हैं, ये आपको पता होगा, लेकिन संक्षेप में मैं इसलिए जिक्र कर देना चाहता हूं जिससे अगर किसी को कोई संदेह हो तो वो दूर हो जाए।

आमरण अनशन पर बैठने के लिए पहले आपको इसकी सूचना स्थानीय प्रशासन को देनी होती है, जिसमें उन मांगो का जिक्र करना होता है, जिसके लिए आप अनशन के लिए मजबूर हुए। इस सूचना पर स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वो वहां अपेक्षित संख्या में पुलिस की ड्यूटी के साथ ही एक चिकित्सक की तैनाती करे, जिससे अनशन पर बैठे व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रोजाना जानकारी प्रशासन को मिलती रहे। अब चिकित्सकों का दल जब अरविंद, मनीष और गोपाल के स्वास्थ्य की जांच करने पहुंचा, तो इन लोगों ने डाक्टरों के दल को वापस भेज दिया। चूंकि ये टीम बदजुबान के साथ बद्तमीज भी होती जा रही है, इसे पता ही नहीं है कि डाक्टर आपकी मदद के लिए  हैं और उनकी रिपोर्ट मायने रखती है।

आपको याद होगा कि पिछली बार अन्ना ने 13 दिन से ज्यादा अनशन किया और उसके बाद जब अनशन खत्म हुआ तो लालू यादव जैसे लोगों ने उनके अनशन पर ही सवाल खड़े कर दिया। उन्होंने कहा कि पहले इस बात की जांच हो कि अन्ना बिना खाए पीए 13 दिन रह कैसे गए ? उनके कहने का मकसद साफ था कि सरकारी डाक्टरों ने तो इनके स्वास्थ्य का परीक्षण किया नहीं और निजी चिकित्सक की बात का कोई मतलब नहीं है। इसी का फायदा उठाते हुए लालू ने तो यहां तक कहा कि बाबा रामदेव नौ दिन अनशन नहीं कर पाए, उनकी सांस टूटने लगी, जबकि वो तो व्यायाम वगैरह भी करते हैं,  तब  अन्ना 13 दिन कैसे भूखे रह सकते हैं ? ये सवाल उठाया गया और इसका किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं था। यही सब इस बार भी हो रहा है, निजी चिकित्सकों ने पहले ही दिन कहा कि अरविंद को शूगर है और उनकी तबियत बिगड़ गई है, जबकि तीन दिन बाद कहा गया कि वो सामान्य हैं। ऐसी मेडिकल रिपोर्ट भी बेमानी है, क्योंकि ये विश्वसनीय नहीं रही।
सच तो ये है कि अनशनस्थल के पीछे बने कैंप में बहुत ज्यादा समय अरविंद, मनीष और गोपाल बिताते हैं।  इसलिए वहां भी ज्यादातर लोग यही चर्चा कर रहे हैं कि ये आमरण अनशन कई साल चल सकता है, क्योंकि सब कुछ ना कुछ खा पी रहे हैं, वरना छठें दिन तो हालत पतली हो ही जाती है, जबकि अनशनकारी पहले से ज्यादा टनाटन नजर आ रहे हैं। अच्छा मीडिया भी अनशनकारियों से ये सवाल पूछ रही है कि जनता को आपके अनशन पर भरोसा नहीं रहा,  उसे लगता है कि आप खा पी रहे हैं।  बहरहाल सच तो अनशनकारी ही बता सकते हैं, लेकिन जब सभी स्वस्थ हैं तो सरकार भी मस्त है, चलो खाते पीते रहो, कोई दिक्कत नहीं। इसलिए अब इसे कथित अनशन कहना ज्यादा ठीक होगा, क्योंकि ये खा रहे हैं या नहीं खा रहे हैं, इस बारे में भरोसे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

बहरहाल कथित अनशन का आज पांचवा दिन है, इन पांच दिनों में मंच से या फिर टीवी पर चर्चा क्या हो रही है आपको पता है ? चर्चा ये हो रही है कि आज  भीड़ आई , कल नहीं आई थी। इसकी क्या वजह है। चैनलों के रिपोर्टर बताते हैं कि पहले दो दिन बहुत गर्मी थी,  शनिवार और रविवार को छुट्टी के साथ ही मौसम बहुत सुहाना हो गया, लिहाजा बड़ी संख्या में लोग यहां जुटे।  मतलब भ्रष्ट्राचार का मुद्दा खत्म हो कर  मुद्दा भीड़ में बदल गया है। पांच दिन से सिर्फ यही एक बात हो रही है। कहा जा रहा है कि पहले तीन दिन तो सौ दो सौ लोग ही यहां थे। एक दिन बाबा रामदेव समर्थन देने आए तो उनके साथ हजार बारह सौ लोग आए, लेकिन वो भी रामदेव के जाते ही खिसक गए। फिर कथित अनशन  का कामयाब बनाने के लिए भगवान ने मदद की। यहां बारिश नहीं  हुई, लेकिन पूरे दिन काले बादल से मौसम थोड़ा खुशनुमा हो गया और सबसे बड़ी बात शनिवार और रविवार की छुट्टी हो गई। तो लोग वीकेड  इन्ज्वाय करने पहुंच गए जंतर मंतर।
वैसे यहां आने पर लोग मायूस हुए, लोगों को उम्मीद थी कि जिस तरह रामलीला मैदान में अनशन के दौरान देशी घी की पूड़ी कचौड़ी का फ्री में इंतजाम था, वैसा कुछ इस बार भी  होगा, पर यहां इस बार ऐसा कुछ नहीं, लिहाजा लोग यहां आए और कुछ देर तमाशा देख कर खिसक गए कनाट प्लेस की ओर। वैसे इस कथित अनशन से एक बात और साफ हो गई जो कुछ साख बची है वो सिर्फ अन्ना हजारे की है। क्योंकि जब तक अरविंद की अगुवाई  में ये शोर शराबा चल रहा था तो यहां गिने चुने लोग ही मौजूद थे। लेकिन रविवार को जब अन्ना इस अनशन मे शामिल हुए तो जरूर कुछ  लोग घर से निकले और जंतर मंतर पहुंचे। अन्ना की वजह से ये आंदोलन शांतिपूर्ण  है, वरना इस अनशन में जिस तरह उपद्रवी शामिल हैं,  ये तो दूसरे ही दिन पिट पिटाकर कुछ जेल चले जाते और बाकी घर में दुबक कर बैठ जाते। मंच से कुमार विश्वास जिस तरह से अनर्गल बातें कर माहौल खराब कर रहे हैं,  उससे भी आंदोलन पर खराब असर पड़ रहा है।

आप खुद भी देखें जंतर मंतर पर लगे मजमें कुछ नया भी नही है। अन्ना दो साल  से एक ही बात जनता को समझा रहे हैं कि वो देश के मालिक है और संसद में बैठे लोग सेवक है। हंसी आती है उनकी बात सुनकर..। अरे अन्ना जी ये बात तो हम सब जानते है, पर हम कैसे मालिक हैं ये आप भी जानते हो। टीम अन्ना की बात करें तो वो अब बातों से हार कर गाली गलौच पर उतर आई हैं। दरअसल हर जगह कुछ ऐसे लोग होते हैं जो संतुष्ट नहीं होते। ऐसी ही एक बड़ी संख्या नौकरशाहों में है। सिस्टम से असंतुष्ट कहें, या अवसर ना मिलने से हताश कुछ नौकरशाह इस टीम के संपर्क में हैं, जो इक्का दुक्का सरकारी अभिलेख इन तक पहुंचाते हैं, जिसके बल पर ये कुछ मंत्रियों की चार्जशीट लिए फिर रहे हैं। हालाकि मैं जानता हूं कि इन्हें मेरे सलाह की जरूरत नही है, लेकिन सच ये है कि अगर आंदोलन को वाकई एक  सही  दिशा देनी है तो कुछ और करना पड़ेगा। टीवी चैनल और मीडिया के बूते पर आंदोलन अधिक दिन तक टिका नहीं रह सकता। आज ये पूरा आंदोलन मीडिया संभाले हुए है। बातें गांधी की करते हैं, तो दो एक चीजें उनसे सीख भी लें, और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पदयात्रा करें। हर कोने से पदयात्रा निकालें जो एक जगह मिले। जमीन पर काम नहीं सीधे दिल्ली से टकराना आसान नहीं मूर्खता  है। आप जैसा अनशन चला रहे हैं चलाते रहिए, क्योंकि आपके अनशन पर जनता को ही भरोसा नहीं है तो सरकार को क्या होगा। सब यही चर्चा कर रहे हैं,  टीम अन्ना भोजन छाजन मस्ती से कर रही है।

चलिए ये तो रही बात कथित अनशन की। लेकिन जिस मांग को लेकर ये अनशन चल रहा है, वो मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है। पिछले तीन दिनों में अन्ना ने कई न्यूज चैनल से बात की। इस बात चीत में एक नई बात सामने  आई। अन्ना ने स्वीकार किया है कि अब उन्हें इस सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। इस लिए उनकी कोशिश होगी कि दो साल बाद होने वाले लोकसभा के चुनाव में देश भर में सच्चे और ईमानदार उम्मीदवार  को समर्थन दिया जाएगा। मतलब अब अन्ना देश की सियासत में भी अपनी भूमिका  तलाश रही है। वैसे तो इस टीम पर पहले ही आरोल लगा करता था कि ये जनलोकपाल और भ्रष्ट्राचार की आड़ में राजनीति कर रहे हैं और खासतौर पर इनके पीछे आरएसएस का हाथ है। बहरहाल इनके पीछे किसका हाथ है, ये तो टीम अन्ना ही जाने, लेकिन इतना तो साफ है कि कुछ ना कुछ तो छिपा एजेंडा जरूर है, जिस पर ये काम कर रहे हैं।

वैसे इस कथित अनशन से सरकार कनफ्यूज्ड है। मीडिया वाले जब किसी मंत्री से पूछते हैं कि आप अनशनकारियों से बात कब करेंगे ? मंत्री उल्टे सवाल पूछते हैं कि आप ही बताइये ये अनशनकारियों की मांग क्या है। बताया जाता है कि वैसे तो उनकी मांग जनलोकपाल है, लेकिन अभी वो 15  भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ जांच चाहते हैं। तब मंत्री का सवाल  होता है कि अब ये मांग बेचारे प्रधानमंत्री कैसे मान सकते हैं। उनकी सूची में प्रधानमंत्री भी शामिलि हैं, फिर तो उन्हें ये मांग सरकार से नहीं करनी चाहिए। जिसके खिलाफ आप अनशन कर रहे हैं, उसी से मांग पूरी करने को दबाव बना रहे हैं, ये तो सामाजिक न्याय के भी  खिलाफ है। मंत्री जी बात तो आपकी सही है, लेकिन आप ही बताएं उन्हें करना क्या चाहिए ? बोले अरे उनके यहां तो जाने माने वकील है, वो मंत्रियों के भ्रष्टाचार से संबंधित जो भी फाइलें हैं, वो लेकर सुप्रीम कोर्ट चले जाएं, जांच का आदेश करा लें।

बहरहाल सरकार और टीम अन्ना के बीच चूहे बिल्ली का खेल चलता रहेगा। ना सरकार कानून लाने वाली, ना टीम अन्ना आंदोलन खत्म करने वाली। अच्छा सरकार भी चाहती है कि ये आंदोलन चलता रहे, जिससे देशवासियों का ध्यान मुख्य समस्या से हटा रहे। टीम अन्ना भी चाहती है कि मांग पूरी ना हो, जिससे उनकी दुकान भी चलती रहे। दुश्यंत कुमार की दो लाइनें याद आ रही हैं..

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं,
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
   
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बुधवार, 25 जुलाई 2012

To LoVe 2015: अनशन: टीम अन्ना का टीवी प्रेम ...

आज एक बार फिर जरूरी हो गया है कि टीम अन्ना की बात की जाए ।वैसे तो मेरा मानना है कि इनके बारे में बात करना सिर्फ समय बर्बाद करना है, लेकिन दिल्ली में जो माहौल है, उसमें जरूरी हो गया है कि कुछ बातें कर ली जाए। मैं जानता हूं कि एक सवाल आप सब के मन में होगा कि हर बार टीम अन्ना का अनशन सुबह आठ बजे के करीब शुरू हो जाता था, आज क्या वजह थी कि ये अनशन दोपहर बाद शुरू हुआ। इस सवाल का जवाब आप जानेगें तो चौंक जाएंगे। इसकी वजह और कुछ नहीं दिल्ली की टीवी मीडिया रही। दरअसल देश के 13 वें राष्ट्रपति के रूप में प्रणव मुखर्जी को संसद भवन के सेंट्रल हाल में आज शपथ लेना था। इसके चलते सभी न्यूज चैनल पर राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह का सीधा प्रसारण हो रहा था। अब टीम अन्ना को लगा कि अगर वो भी इसी समय अनशन शुरू करते हैं तो कैमरे का फोकस उनके ऊपर नहीं रहेगा। फिर जंगल में मोर नाचा किसने देखा.. हाहाहहाहाह
बस यही वजह थी कि टीम अन्ना के सदस्य भी सुबह से घर में बैठ कर शपथ ग्रहण समारोह का आनंद लेते रहे। जब ये समारोह समाप्त हो गया तो वो भी घर से निकले, उन्हें लगा कि अब उन्हें भी न्यूज चैनलों में जगह मिल जाएगी। मित्रों अगर आप हमारे पुराने लेखों को ध्यान से पढें तो आपको पता चल जाएगा कि इस टीम का असल मकसद क्या है। वैसे तो मैं पहले से कहता रहा हूं टीम अन्ना सुर्खियों में रहना चाहती है। मैं सौ फीसदी दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर जंतर मंतर से न्यूज चैनलों के कैमरे हटा लिए जाएं, तो आमरण अनशन सुबह से शुरू होकर शाम को खत्म हो जाएगा। वैसे टीम अन्ना के सदस्य आजकल जिस तरह बहकी बहकी बातें कर रहे हैं, उससे उनकी झल्लाहट साफ झलकती है। माइक हाथ में लेने के बाद ये बेकाबू हो जाते हैं, इन्हें समझ मे नहीं आता दरअसल ये किसके बारे में और क्या कह रहे हैं।

आज जब देश के राष्ट्रपति के रूप में प्रणव दा शपथ ले रहे थे, उस समय टीम अन्ना का एक कारिंदा मंच से कह रहा था कि अगर लोकपाल होता तो प्रणव दा राष्ट्रपति नहीं बन पाते। वैसे ये बात तो उन्होंने मंच से नहीं कहा, लेकिन उनके कहने का मकसद यही था कि अगर लोकपाल होता तो दादा राष्ट्रपति भवन में नहीं बल्कि जेल में होते। देश में इस तरह की आराजकता तब होती जब सरकार का नेतृत्व कमजोर हाथो में होता है। केंद्र की सरकार जितना पीछे हटती है, ये बिगडैल उतना ही आगे बढ़ जाते हैं। इन्हें पता नहीं क्यों लगता है कि इन पर हाथ डाला तो देश मे तूफान खड़ा हो जाएगा। सरकार अगर मजबूत होती तो आज कुछ लोग देश को इस तरह गुमराह नहीं कर पाते। सच तो ये है कि जनता का ये आंदोलन भटक गया है, फिर भी टीम अन्ना को लगता है कि वो एक सामान्य नागरिक नहीं बल्कि भगवान हैं। उनमें इतनी शक्ति है कि वो लोगों को देख कर बता सकते हैं कि ये ईमानदार है और ये बेईमान है। मैं जब भी तर्क और साक्ष्य के साथ कोई बात कहता हूं तो मुझपर कांग्रेसी होने का आरोप लगा दिया जाता है। मैं जानता हूं कि वही बात फिर दुहराई जाएगी, पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं सच्चाई को ठोंक कर कहने की हिम्मत रखता हूं।

मैं हमेशा से एक बात कहता रहा हूं कि बेईमानी की बुनियाद पर ईमानदारी की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती। जब टीम अन्ना अनशन में ईमानदारी नहीं बरत सकती तो उन्हें ईमानदारी की बात करने का कम से कम नैतिक हक तो बिल्कुल नहीं है। चलिए पहले मैं आपको बताने की कोशिश करता हूं कि अनशन के मायने क्या हैं ? टीम अन्ना और गांधी के अनशन में अंतर क्या है ? आपको पता है महात्मा गांधी के लिए अनशन का अर्थ क्या था ? गांधी के लिए अनशन का अर्थ धर्म से जुड़ा हुआ था, इसका एक लक्ष्य हुआ करता था। यानि शरीर और आत्मा की शुद्धि। गांधी जी कहा करते थे कि उपवास या अनशन कभी भी गुस्से में नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि गुस्सा एक प्रकार का पागलपन है। टीम अन्ना तो गुस्से में ही अनशन करती है, ये तो अलग बात है कि टीवी पर गाली गलौज नहीं दिखाया जा सकता, वरना इनकी भाषा तो ऐसा ही लगता है कि खामोश हो जाओ, वरना ये तो किसी की भी मां बहन कर सकते हैं। गांधी जी का मानना था कि अनशन का अर्थ बिना कुछ कहे अपनी बात लोगों तक पहुंचाना है। बापू अनशन के जरिए दुश्मनों को दोस्त बनाने का काम करते थे, जबकि टीम अन्ना दुश्मन से और दूरी बढ़ाने का काम करती है।

मित्रों अनशन में शरीर को तपाया जाता है, मकसद को हासिल करने के लिए शरीर को कष्ट दिया जाता है। अनशनकारियों को ऐसा कोई कृत्य नहीं करना चाहिए, जिससे उनकी वजह से दूसरों को कष्ट हो या वो आहत हों। केजरीवाल की जो भाषा है, उसका भगवान ही मालिक है। कई बार तो उनकी बात से ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने किसी से बयाना ले लिया है कि वो सरकार की ऐसी तैसी कर देंगे, लेकिन जब वो इसमें नाकाम रहते हैं तो अभद्र और अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करते हैं। टीम अन्ना बड़ी बड़ी बातें करती हैं, लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि अनशन के लिए करोंड़ो रुपये फूंकने की क्या जरूरत है ? अनशन तो जंतर मंतर पर एक दरी बिछा कर भी की जा सकती है, फिर ये फाइव स्टार तैयारी क्यों की जाती है ? आप नहीं समझ सकते, क्योंकि ये आपका विषय नहीं है। आपको याद होगा कि यही टीवी चैनलों ने गुजरात के मुख्यमंत्री के सद्भावना उपवास का मजाक बनाया था और कहा कि ये फाइव स्टार उपवास दिखावटी है, तो उनकी नजर इस अनशन पर क्यों नहीं है? क्या ये दोहरा मापदंड नहीं है ?

मंच तैयार किए जाने के दौरान ये कई बार टीवी चैनलों के कैमरामैन से भी बात करते हैं कि मंच की ऊंचाई कितनी रखी जाए कि अनशनकारी ठीक से चैनल पर दिखाई दें। इन्हें मकसद से ज्यादा मतलब नहीं होता,ये बार बार कैमरे की ओर नजर गड़ाए रहते हैं। वैसे आज इन्हें चैनलों पर ज्यादा जगह नहीं मिल पाई। वैसे भी आज तो दोपहर बाद यानि लगभग दो बजे तो अनशन शुरू ही हो पाया। खैर इन्हें पहले पता होता कि टीवी चैनल उनका अनशन छोड़कर प्रणव दा के शपथ ग्रहण समारोह में भाग जाएंगे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये टीम अपना अनशन कब का आगे बढ़ा चुकी होती। हो सकता है कि आप मेरी बात से सहमत ना हों, पर जब देश के प्रथम नागरिक यानि राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था, जिसे दुनिया भर के लोग देखते रहे थे, उस दौरान अपने ही देश के प्रथम नागरिक प्रणब मुखर्जी के लिए अनाप शनाप बातें करके टीम अन्ना के सहयोगी अरविंद ने साफ कर दिया कि उनमें नैतिकता का पतन हो चुका है, फिर ये देश के लिए बड़ी बड़ी बातें करते हैं तो हंसी आती है।

वैसे इस बार अन्ना भी अपनी टीम का इम्तहान ले रहे हैं। वे चाहते तो टीम के साथ आज भी अपना अनशन शुरू कर सकते थे, पर वो अपनी टीम की ताकत देखना चाहते हैं। दरअसल मुंबई में अन्ना का अनशन फ्लाप हुआ तो टीम के सहयोगी अन्ना की बुराई करने लगे। लोगों मे सुगबुगाहट हुई की अन्ना भले ही महाराष्ट्र के रहने वाले हैं, पर उनकी वहां कोई पूछ नहीं है। इसीलिए मुंबई का अनशन कामयाब नहीं हो पाया। दिल्ली में अनशन इसलिए कामयाब हुआ कि टीम अन्ना के सहयोगियों को दिल्ली वाले हांथो हाथ लेते हैं। बस इसी बात से खफा अन्ना देखना चाहते हैं कि उनके बिना इस अनशन में कितने लोग जमा होते हैं और ये टीम कितने दिन भूखी रह सकती है ? और हां बड़ी बड़ी बातें करने वाली टीम अन्ना पहले ही दिन से उस रास्ते की तलाश कर रही है कि कैसे इस अनशन को सम्मान के साथ समाप्त किया जाए।

टीम अन्ना को पता है कि लोकपाल बिल मानसून सत्र मे पास होने वाला नहीं है, जिन मंत्रियों के खिलाफ जांच की बात की जा रही है, वो बात मानी नहीं जा सकती। सरकार अब बात चीत के लिए तैयार भी नहीं दिखाई दे रही है। अभी तक जो लोग सरकार से बातचीत कर रहे थे, वो अनशन पर हैं, उनकी मांग है कि अब सरकार से बात जनता के सामने मंच पर होगी, ये संभव नहीं है। अब अनशनकारी बेचारे यही सोच रहे हैं कि कैसे रास्ता निकाला जाए, जिससे अनशन तोड़ने में आसानी हो..।

चलते - चलते आज तो टीम अन्ना ने हद ही कर दी। सुर्खियों में आने के लिए कुछ नौजवानों के साथ जानबूझ कर धक्का मुक्की की गई और मीडिया में शोर मचाया गया कि कांग्रेस के छात्र संगठन ने टीम अन्ना पर हमला किया। दरअसल सच ये है कि आज अनशन को कोई भी चैनल इतनी गंभीरता से नहीं ले रहा था, लिहाजा सुर्खियों मे आने के लिए ये एक साजिश रची गई, और कहा गया कि कांग्रेसियों ने जंतर मंतर आकर हमला किया।

 
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सोमवार, 23 जुलाई 2012

To LoVe 2015: हां मैने काका का क्रेज देखा है....Rohit

1994 की गर्मियों की एक दुपहरिया….नई दिल्ली की सरोजनी नगर मार्किट....स्वीट शॉप-कम-रेस्टोरेंट खाली-खाली सा....19 वर्षीय नवयुवक यानि मैं मैगजीन में मग्न था।

“एक्सक्यूज मी” .. लगा जैसे हल्की घंटी बजी हो...
खूबसूरत आवाज की मल्लिका को देखने के लिए मैने कांउटर पर बैठे-बैठे नजर उठाई.....नजरें हल्के मैरून रंग की कॉटन साड़ी से होते हुए एक खूबसूरत चेहरे पर जा टिकी....खूबसूरत चेहरे पर दो खूबसूरत आंखें....आंखों में शराफत और कुलिनता का मिलाजुला भाव....और गोद में मुस्कुराता चंद महीने का मासूम....।
“जी कहिए...” मैंने पूछा..।
“एक मसाला डोसा.....” उसने कहा....
मैंने इधर-उधर देखा...दोनो वेटर गायब थे....। शायद खाली दुपहरिया देख निकल लिए थे बाजार घूमने...।
“बाबा....एक मसाला डोसा”...मैने आर्डर देकर उस सुंदरी को थोड़ा इंतजार करने की गुजारिश करते हुए बैठने को कहा।
“ओके” कहकर वो टेबल की तरफ बढ़ी...लगा जैसे कोई राजहंसनी चल रही हो।
चंद सेंकेड गुजरे थे....फिर घंटी सा मधुर स्वर गूंजा....”
सुनिए ये डोसा तो ठंडा है....” सुंदरी के स्वर में हल्की सी नाराजगी का पुट था...।
मैं तुरंत किचन की खिड़की की तरफ घूमा....”बाबा डोसा ठंडा क्यों है?”
“नहीं अभी बनाया ही था..जब मैडम आईं थीं...” डोसा बनाने वाले बुजुर्गवार बोले।
”क्या बाबा....डोसा ठंडा होने में कितनी देर लगती है, बनाकर रखना नहीं चाहिए था न...चलिए दूसरा बनाकर दीजिए” आर्डर देकर मैं सुदंरी की तरफ घूमा....। वो बच्चे को टेबल पर बैठा कर खड़ी हो गई थी।
“बस दो मिनट” मैंने खेद भरे शब्दों में कहा।
कोई बात नहीं“ उनके मुस्कुराते हुए जवाब के बीच अनारदानों सी सुदंर दंतपंक्तियां चमकीं।
अभी मैं उसकी तरफ देख ही रहा था कि बाहर शोर मचा...सबका ध्यान उधर गया....वो सुंदर महिला भी बाहर की तरफ देख रही थी। उसकी आंखों में शोर की वजह जानने की उत्सुकता थी।
“निगम का तोड़फोड़ दस्ता मार्किट में आया हुआ था....” मैं बोला।
समझने वाले अंदाज में सुंदरी का सिर हिल रहा था। तभी बाबा ने गर्म डोसा सर्व किया...। ये देखकर वो राजहंस सी गर्वीली सुंदरी बैठ गई। अचानक दुबारा शोर के साथ-साथ नारे की आवाज भी सुनाई दी..।
“राजेश खन्ना जिंदाबाद.....”
“राजेश खन्ना जिंदाबाद.....”
नारे की आवाज सुनते ही उस सुंदर महिला के चेहरे का रंग तेजी से बदला....अविश्वास से उसकी आंखें औऱ बड़ी हो गईं....उसने पलट कर दुकान के बाहर देखा....उसकी देखादेखी मेरी नजरें भी दुकान के बाहर चली गई। सामने से राजेश खन्ना गुजर रहे थे...उस इलाके के सांसद...मैंने देखा राजेश खन्ना का चेहरा गर्मी की वजह से पूरा लाल टमाटर सा हो गया था। ..उधर वो खूबसूरत महिला सकते की हालत में थी....पर दूसरे ही क्षण उसके गले से दबी-दबी सी चीख निकली.....""""राजेश खन्ना...."""""....पलभर में वो सुंदर महिला सुध-बुध खोकर बावली होकर बाहर दौड़ी....।
मैं हैरान था...इसे क्या हुआ...बच्चा छोड़कर कहां भागी....। तभी बच्चे कि किलकारी मेरे कानों में पड़ी...उसकी खिलखिलाहट ने मां के पैरों को भी रोका..पर सिर्फ पलभर के लिए...वो सुदंरी तेजी से पलटी....बच्चे को गोद में उठाकर बाहर लपकते हुए बोली...”बेटा देख राजेश खन्ना....”
मैं हक्का-बक्का.....। अरे...बच्चा क्या जाने कौन राजेश खन्ना....। इसे क्या हो गया है...अभी तो गर्वीली हंसनी सी चाल थी...और अब किसी पागल सी लपक ली। अपना पर्स भी छोड़ गई। भई राजेश खन्ना ही तो हैं...उनको तो आना ही था...भले ही सुबह मुंबई में थे...पर सासंद तो नई दिल्ली के थे...। तो कौन सी बड़ी बात हो गई...जो ये सुंदरी पागलों जैसा व्यवहार कर रही है....मैं हैरत में खड़ा सोच रहा था।
    थोड़ी देर में वो सुंदरी वापस आई....चेहरे पर जबरदस्त मुस्कुराहट...और आंखों में गजब कि चमक लिए...उसके पैर जमीन पर टिक नहीं रहे थे..लगा जाने कहां खोई हुई है...। किसी तरह चुपचाप कुर्सी पर बैठी.....बच्चे को फिर से टेबल पर बिठाया...। तबतक डोसा ठंडा हो चुका था....पर वो बिना शिकायत धीरे-धीरे ठोसा खाने लगी। मैं अचंभे में उसे ठंडा डोसा खाते देख रहा था। शायद अब इसकी गलती से डोसा ठंडा हुआ है..इसलिए बिना शिकायत खा रही हो...सोचता हुआ मैं अपनी कुर्सी पर बैठा पत्रिका के पन्ने पलटने लगा।
अभी चंद पन्ने ही पलटे थे कि मेरे जेहन को जोर का झटका लगा...मेरे दिमाग में जैसे धमाका सा हुआ....
""ओह गॉड"" तो ये बात है....ये सुपरस्टार राजेश खन्ना का जादू है...काका का स्टारडम...सुपरस्टार का करिश्मा....जो ये राजहंसनी सब भूलकर हिरणी सी कुलांचे भरती भागी.....। आज उसने पहली बार राजेश खन्ना को देखा....वो भी तब...जब काका स्टारडम से कोसो दूर हैं....और तब भी उनका ये जलवा.....
गजब...मैं अपलक उस सुंदरी को देखे जा रहा था....दीवानगी ऐसी की बच्चे को  भी भूल गई....।
.....मेरी नज़र राजेश खन्ना नेता पर थी....सांसद पर थी..जो बीतेजमाने के सुपरस्टार थे....मगर उसी सुंदरी की नज़र में वो शख्स था..शायद जिसे देखकर उसने पहली बार आहें भरी होंगी...जिसने नाम जाने कितनी रातें पलकों में काटी होगी...शायद ये उसका पहला प्यार भी हो...।
जब ये वाकया हुआ....तबतक तोड़फोड़ दस्ता जा चुका था...और राजेश खन्ना अपनी गाड़ी की तरफ जा रहे थे। उस वक्त उस सुदंरी की आयु होगी 35 साल....उससे भी 20 साल पहले यानि काका के स्टारडम के समय शायद 15 साल के आसपास...। मगर काका का जादू उनके फैन पर कायम था..। जो उन्माद औऱ पागलपन लड़कियों में राजेश खन्ना का था...उसका उदारहण सामने था। 
आज उस घटना को 18 साल गुजर चुके हैं.....पर उसके बाद आज तक मैने सूती साड़ी में इतनी तेजी से कुलांचे भरते किसी को नहीं देखा..।
20 साल पहले चंद सेंकेंडो में वो घटना घटी थी..
पर आज एक पूरी एक पोस्ट है...।

""""उस दिन के चंद सेंकेंड के वाकये को पढ़ने के लिए कुछ मिनट लगेगें...
शायद समझने में आपको एकाध और मिनट लगें....क्योंकि चंद सेंकेंड में हजारों क्षण भी होते हैं...और उन क्षणों के अहसास ऐसे होते हैं जो आसानी से शब्दों में नहीं ढलते...।
शायद इसलिए इस पोस्ट को लिखने में घंटे-दर-घंटे लगे..और सबसे साझा करने में पूरा दिन....."""""

सच काका..आपसे आपके फैन कोई नहीं छीन सकता....।
खुद बाबू मोशाय भी नहीं....
भले काका यू Hate Tears…पर आपके अंतिम सफर में बाबू मोशाय भी खूब रोया....आपके अनगिनत फैन की तरह......।
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शनिवार, 21 जुलाई 2012

To LoVe 2015: THE FESTIVAL OF DUSSEHRA

The festival of Dussehra falls twenty days before the Diwali. It shows victory of virtue over vice, of right over wrong. Rama stands for virtuewhereas Ravana, the demon king, depicts vice and wrong.

The story goes that the crowning Prince Rama of Auyodhya undertook fourteen years of exile. In the last year of his wandering, Ravana the king of Lanka carried away his consort, Sita. The result was a bloody fight between the two. Lakhs of people died from both sides. In the end Ravana, his son Meghnat and his powerful brothers were killed and Mother Sita was freed.

This day is celebrated as the Dussehra Day through the length and breadth of India. The schools and colleges are off. There is autumn break or Dussehra Holidays. The Ramlila is enacted in every street and corner. There are well-established Ram Lila Committees who attract millions of people. For ten days continously the Ramlila is played day and night. Then comes the last day.



It is the climix of the whole show. In a big and spacious ground the main function of Dussehra is held. There is an atmosphere of great festivity. Everyone is happy and joyous. Each one attends the celebration in his best spirits. Children put on new clothes. The bazaars(markets) are arranged. Vendors sell all types of wares, especially toys for children. Elders can eat mouth watering dishes.

In the middle of the ground effigies of Ravana, Meghnath and other demons stand head and shoulders above the rest of the crowd. They can be seen from afar. They are made of bamboo sticks and coloured papers. They are stuffed with high-powered crackers. With the fall of the sun, these effigies are ignited (kindled). The deafening sound of the burning effigies sends a wave of thrill and excitement in every heart. Their ashes and half-burnt bamboosticks are considered to be exceptionally sacred. People gather them and preserve them.

People return home with great satisfaction. Thus the festival come to a happy ending, giving the message of virtue and goodness.



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चिर युवा बने रहना .एक मानसिक बीमारी .
राजेश खन्ना नहीं रहे . ये जिन्दगी के मेले दुनिया में कम ना होंगे .अफ़सोस हम ना होंगे , होंगी यहीं बहारे उल्फत की यादगारें .होंगे यही झमेले . अफ़सोस हम ना होंगे उक्त गीत की पंक्तियाँ .ये दर्शाती है की .शरीर नश्वर है .और मृत्यु एक कटु सच्चाई दुनिया में वर्गीय असमानता इतनी बढ़ गई है की गरीब का जीना मुहल हो गया है अतः वो फोरन से पेश्तर इस झुमले पर अमल करने को सदेव तेयार रहता है इसी कारण समाज में आत्महत्याओं की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है क्योंकि गरीब के लिए ये धरती नर्क बन गई है .इसी कारण वो स्वर्ग में जाने का आकांक्षी हो गया है . वहीँ दूसरी और कथित विकास के नाम पर गरीब का माल मत्ता समेट कर अपने कब्जे में करने वाले अमीर वर्ग ने अपने लिए स्वर्ग इसी धरती पर रचित कर दिया है इस कारण वो उस काल्पनिक स्वर्ग में जाने को तेयार नहीं . वो मरने को कतई तेयार नहीं .और ज्यादा लम्बी और योवन से भरपूर जिन्दगी जीने की मशक्कत में दिन रात लगा रहता है .ताकि अटल और शास्वत सत्य मौत को वो अपने से सदेव के लिए दूर ना कर सके पर इतना तो वो कर ही सके की वो देर से उसके शरीर को निष्प्राण करे और वो जब तक जिए . स्वर्गिक आनंदों से ओत प्रोत जीवन जिए . उसके चहुँ ओर . अप्सराओं का जमघट लगा रहे ,और वो चेन की पुंगी बजाता हुआ गलबहियां डाले पसरा रहे मृत्यु को नकारने की कामना उसे ज्यादा जीवित रहने का हौंसला देती है . वो इसके लिए सभी जतन करता है विज्ञानं ने इस वर्ग के लिए नए दरवाजे खोले हैं .मेडिकल साइंस की कोस्मेटिक और प्लास्टिक सर्जरी ने इनकी कामनाओं को हवा दी है गोरा रंग बाजार में किसी रेवड़ी की तरह बिकता है . स्वाभाविक तौर पर युवा दिखना अलग बात है .और सिंग कटवा कर बछड़ा बनना दूसरी बात . आज के दौर में . सिंग कटवा कर बछड़े बनने का दौर है . टी वी धारावाहिकों और फिल्मो ने . इस कथित युवा बने रहने की ग्रंथि को और पुष्ट किया है माँ -बेटी और पिता -पुत्र में महज .उन्नीस- बीस का बहुत मामूली अंतर दिखा कर . सोंदर्य के कृत्रिम बाजार को गढ़ा गया है इस प्रकार के बाजारू सोंदर्य का लाभ लेने वाला वर्ग एक उपभोक्ता है .वहीँ .इन्हें इसकी प्रेरणा देने वाला फ़िल्मी ओर धारावाहिक कलाकारों का वर्ग इसे राउंड ओ क्लोक अपने में आत्मसात करके जीता है इसी कारण फ़िल्मी कलाकार बूढ़े नहीं होना चाहते , बूढ़े फिल्म कलाकार ओर बूढ़े बेल को एक ही डंडे से हांकने की हमारे समाज में परम्परा रही है . इन दोनों की दो कौड़ी की कद्र नहीं रहती जब वे बूढ़े हो जाते है बुढ़ापा सभी को भयभीत कर देता है . सिवाय उन संतोषी लोगो के जो जीवन को क्षण भंगुर समझते हैं हर समय शीशे में अपना अक्स देख कर आत्ममुग्ध होने वाले फ़िल्मी कलाकार किसी समय अचानक अपने चेहरे पर आ धमकी झुर्री को देख अपना आपा खो देते हैं ओर अपने को युवा साबित करने के लिए किसी नई नवेली बिना सींगो वाली बछिया जेसी षोडशी को अपनी फिल्म में नायिका लेते हैं ओर इस तथ्य को स्थापित करने के लिए की वे अभी भी घनघोर ऊर्जा से लबरेज है ..वे उस बछिया जेसी नायिका के साथ रोमांटिक गीत गाते हैं . ओर पेड़ों के चारों ओर बंदरों की तरह गुलाटियां खाते हैं इस दौर में उनकी फिल्मो में प्रणय दृश्य भी बढ़ जाते हैं . देव साहब ,कभी बूढ़े नहीं हुए .. वे कभी नहीं मरेंगे और सदेव युवा ही बने रहेंगे इसका एहसास उनके चाहने वालों में बनाये रखने के लिए उन्होंने अपने मृत शरीर को भारत में नहीं लाने दिया अपनी फिल्मो में ढलती उम्र के दौर में ,वे अपनी पोती की उम्र की नायिकाओं के साथ भी आये .देश परदेश. फिल्म में वे 62 साल के कडक युवा थे वहीँ टीना मुनीम महज 20 साल की थी अमिताभ बच्चन ने भी चीनी कम ओर निशब्द जेसी फिल्मो में स्वयं को मानसिक युवा साबित किया धर्मेन्द्र भी अभी तक युवा है , वे धरम गरम है . उनकी जीने की ललक और , बाजुओं में दौड़ता गर्म लहू उन्हें युवा बनाये रखता है . उन्होंने श्री देवी जेसी नायिका के साथ भी काम किया जो उनके बेटे की नायिका भी बनी थी ,उन्होंने अमृता सिंह के साथ भी यही दोहराया जीतेन्द्र पचास की उम्र पार करने के बावजूद किसी कोलेज बॉय की तरह जमीन से दो दो हाथ ऊँचे किसी नायिका के हाथों में हाथ डाले कूदते थे . कहते हैं .आदमी उम्र से बुढा होता है . शरीर से उतना नहीं . वहीँ अगर जीने की ललक है तो मानसिक रूप से सदेव युवा रहता है मेने कई युवा ऐसे देखे हैं जो योवन काल में ही बूढों जेसा बर्ताव ही नहीं करते बल्कि वे बूढ़े भी हो जाते हैं इसका मुख्य कारण गरीबी और रोजगार की समस्या है . जीने के लिए भोजन चाहिए और इस कथित लोक कल्याणकारी सरकार के राज में भोजन मुफ्त नहीं मिलता और रोजगार के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ता है .जो एक कडक जवान युवा की जवानी को ठिकाने लगा देता है स्त्रियाँ हमारे समाज में सदेव हाशिये पर रही है वे चाहे अमीर हो य गरीब .वे अपने पुरुष की अनुचरी रहती है .उसका मुख्य कार्य अपने पुरुष की देखभाल करना उसे उर्जावान बनाये रखना ताकि वो उसे आर्थिक सामाजिक सुरक्षा दे सके . और पुरुष , स्त्री को अपने साथ इसलिए रखता है क्योंकि उसके बिना उसका गुजारा नहीं , वो उसकी सम्पति को भोगने वाले वाले वारिस को जन्म देती है इसके लिए आवश्यक है की वो अपने पुरुष को लुभाए रखे .इसी कारण वो सुंदर और आकर्षक देह की मालकिन बने रहना चाहती है . सोंदर्य का बाजार उसका इसके लिए साथ देता है फ़िल्मी नायक इस युवा बने रहने की बीमारी से सबसे ज्यादा ग्रसित है , उनकी यही कामना है की उन्हें देख कर दर्शक आहें भरने लगे फ़िल्मी नायिकाएं चाहती है की उनकी भोतिक सुन्दरता का इक़बाल इतना बुलंद हो की .कई मर्द और फेंस उसके सामने पालतू कुत्तों और गुलामो की तरह लोटते हुए नजर आये . उसकी गदराई रेशमी मांसल देह को एक्सरे नजर से परखे और मन में उसके प्रति आसक्ति के भाव लाये की .और सोचे की ..हाय रब्बा .. में मर जावां .बड़ी सोणी कुड़ी है . हम सभी इस बीमारी से ग्रस्त हैं कोई कम कोई ज्यादा .पर . सामाजिक रिश्तें हमें बुजुर्ग बनाते हैं .पिता बनाते हैं . दादा नाना बनाते हैं चाचा बनाते हैं .इन रिश्तों को निभाने की खातिर ही सही .हमें हमसे उम्र में छोटे लोगो के साथ बड़ा होने बुजुर्ग होने का एहसास प्रस्तुत करना चाहिए मौत को जितने की कामना और युवा बने रहने की चिर काल से चली आ रही कामना मानव को आशावान बनाती है . प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने साबित कर दिखाया था की ..अगर कोई समय से आगे निकल जाएगा तो वो कभी नहीं मरेगा .. दो घटनाओं के बीच के अन्तराल को समय कहते हैं .,वर्तमान में तो मानव इस बीच के अन्तराल की चक्की में पिस रहा है ,,जय हो/a>
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

To LoVe 2015: दक्षिण का बनारस -'रामेश्वरम -एक पवित्र तीर्थ'

अब तक हम ११ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर चुके हैं .ये हैं उन पहले ११ ज्योतिर्लिंगों के लिंक सहित नाम --:(1) सोमनाथ, (2) मल्लिकार्जुन, (3) महाकालेश्वर, (4) ओंकारेश्वर (5) वैद्यनाथ, (6) भीमशंकर, (7) रामेश्वर,(8) नागेश्वर, (9) विश्वनाथजी, (10) त्र्यम्बकेश्वर, (11) केदारनाथ, (12) घृष्णेश्वर [घुश्मेश्वर].अब हम अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचे हैं जो भारत के दक्षिण में स्थित है .दक्षिण का बनारस इस स्थान को

बुधवार, 18 जुलाई 2012

To LoVe 2015: क्योंकि मैं हूं सोनिया गांधी ...


मैं चाहे ये करुं, मैं चाहे वो करुं मेरी मर्जी। अरे अरे आप सब तो गाना गुनगुनाने लगे। ऐसा मत कीजिए मै बहुत ही गंभीर मसले पर बात करने जा रहा हूं। मैं इस बात को मानने वाला हूं कि देश की कोई भी संवेधानिक संस्था हो, उसकी गरिमा बनी रहनी चाहिए। मैं ये भी मानता हूं कि अगर संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हुईं तो देश नहीं बचने वाला। अच्छा संवैधानिक संस्थाओं को बचाने की जिम्मेदारी जितनी संस्था के प्रमुखों की है, उससे कहीं ज्यादा हमारी और आपकी भी है। सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव के ठीक पहले मतदाताओं को पांच सितारा होटल में लंच देकर चुनाव की आदर्श आचार संहिता को तोड़ा है, लेकिन निर्वाचन आयोग पूरी तरह खामोश है। मैं देखता हूं कि जब कहीं भी मामला सोनिया गांधी का आता है तो यही संवैधानिक संस्थाएं ऐसे दुम दबा लेतीं हैं कि इनकी कार्यशैली पर हैरानी होती है।
टीम अन्ना जब दागी सांसदों पर उंगली उठाती है, तो मैं उनका समर्थन करता हूं। लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, पप्पू यादव, ए राजा, सुरेश कलमाड़ी, मायावती ऐसे तमाम नेता हैं, जिनका नाम लेकर अगर कोई बात की जाए, तो मुझे लगता है कि कोई भी आदमी इन नेताओं के साथ खड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि ये सब किसी ना किसी तरह करप्सन में शामिल हैं, सभी पर कोई ना कोई गंभीर आरोप है। लेकिन गिने चुने नेताओं को लेकर जब आप संसद पर हमला करते हैं और तब सबसे पहले मैं टीम अन्ना के खिलाफ बोलता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करके हमें ईमानदारी नहीं चाहिए। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की  जो हालत है ये इसीलिए है कि वहां संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हो गई हैं। ऐसे में वहां तख्तापलट जैसी घटनाएं होती रहती हैं। आपको याद दिला दूं कि जिस तरह देश में एक ईमानदार पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह के साथ सरकार ने व्यवहार किया है, अगर वैसा पाकिस्तान में होता तो वहां सरकार नहीं रहती, बल्कि वहां का सेना प्रमुख तख्ता पलट कर सत्ता पर काबिज हो जाता। पर हमारे देश मे संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और उनके अनुशासन का ही परिणाम है कि आज भी देश में लोकतंत्र है और ये मजबूत भी है।

अब बात भारत निर्वाचन आयोग की। एक जमाना था कि निर्वाचन आयोग मे और रोजगार दफ्तर में कोई अंतर नहीं था। क्योंकि इन दोनों को नान परफार्मिंग आफिस माना जाता था। लेकिन पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन ने बताया कि निर्वाचन आयोग का महत्व क्या है। उसके बाद दो एक और निर्वाचन आयुक्तों में भी शेषन की छवि दिखाई दी। पर अब धीरे धीरे निर्वाचन आयोग अपनी पुरानी स्थिति में पहुंचता जा रहा है। दस पंद्रह साल से लगातार चुनाव आचार संहिता की बहुत चर्चा हो रही है। यानि ग्राम प्रधान, ब्लाक प्रमुख, विधायक और सांसद के चुनाव में निर्वायन आयोग ये अपेक्षा करता है कि वोटों की खरीद फरोख्त ना हो, मतदाताओं को लालच ना दिया जाए, खर्चों की एक निर्धारित सीमा होती है, उसके भीतर ही उम्मीदवार चुनाव लड़े। इसके लिए देश भर में आयोग पर्यवेक्षक भेजता है। पर्यवेक्षक देखते हैं, जहां कहीं कोई उम्मीदवार अगर लोगों को दावत देता है, तो वो अनुमान लगाता है कि इस दावत में कितना खर्च हुआ होगा और ये पैसा उसके खर्च रजिस्टर में दर्ज कर दिया जाता है।

लेकिन देश के पहले नागरिक यानि राष्ट्रपति के चुनाव में आयोग की आचार संहिता कहां है ? मैं पूछना चाहता हूं आयोग से राष्ट्रपति के चुनाव में खर्च की सीमा कीतनी है ? इस चुनाव में पर्यवेक्षक कौन है ? आदर्श आचार संहिता तोड़ने वालों के खिलाफ रिपोर्द दर्ज कराने की जिम्मेदारी किसकी है ? वोटों की खरीद-फरोख्त पर नजर कौन रख रहा है? हो सकता है कि निर्वाचन आयोग को ये सब दिखाई नहीं दे रहा हो, लेकिन राष्ट्रपति के यूपीए उम्मीदवार को जिताने के लिए सरकारी खजाने का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है। वोट हासिल करने के लिए राज्यों को पैकेज देने की तैयारी है। यूपी के अफसरों के साथ तो बैठक भी हो गई और 45 हजार करोड मिलना लगभग तय हो गया है। बिहार में कहां एक केंद्रीय विश्वविद्यालय को लेकर यूपीए सरकार के मंत्री कपिल सिब्बल और बिहार सरकार के बीच ठनी हुई थी, जेडीयू का समर्थन मिलते ही वहां दो केंद्रीय विश्वविद्यालय की बात मान ली गई। मायावती को कोर्ट के जरिए एक बड़ी राहत यानि आय से अधिक मामले को लगभग खत्म करा दिया गया। ये सब तो ऐसे मामले हैं जो आम जनता तक पहुंच चुकी हैं, इसके अलावा अंदरखाने क्या क्या सौदेबाजी हो रही होगी, ये सब तो जांच का विषय है। पर सवाल ये है कि कौन करेगा जांच और इस जांच का आदेश कौन देगा ?

अब चुनाव के लिए कल यानि 19 जुलाई को वोटिंग है। इसके ठीक पहले आज यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने सभी वोटर सांसदों को लंच पर निमंत्रित किया। लंच के बहाने वो प्रणव दा की जीत को पूरी तरह सुनिश्चित करना चाहती हैं। मेरा सवाल है कि अगर ग्राम प्रधान के चुनाव में उम्मीदवार बेचारा गांव वालों को एक टाइम का भोजन करा देता है तो उसके खिलाफ चुनाव की आदर्श आचार संहिता को तोड़ने का मामला दर्ज करा दिया जाता है। सोनिया गांधी दिल्ली के पांच सितारा होटल अशोका में लंच के बहाने सिर्फ यूपीए ही नहीं उन सब को भोजन पर बुलाया है जो प्रणव दा को वोट कर रहे हैं। मसलन समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के अलावा कई और ऐसे दल आमंत्रित हैं, जिसने दादा को समर्थन देने का ऐलान किया है। मैं पूछता हूं कि क्या ये लंच चुनाव की आदर्श आचार संहिता के खिलाफ नही है? और अगर है तो क्या निर्वाचन आयोग इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कराएगा ?

मुझे जवाब पता है कुछ नहीं होने वाला है। क्योंकि देश में राष्ट्रपति सोनिया बनाती हैं, उप राष्ट्रपति सोनिया बनाती हैं, प्रधानमंत्री सोनिया बनाती हैं, लोकसभा स्पीकर सोनिया बनाती हैं, मुख्यमंत्री सोनिया गांधी के सहमति से बनते हैं, राज्यपाल सोनिया गांधी की सहमति से बनते हैं, निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त भी सोनिया बनाती हैं। ये सब देखने मे भले लगते हों कि लोग एक निर्धारित प्रकिया से चुन कर आते हैं या फिर सरकारी सिस्टम से बनते हैं, पर ये सब गलत है, सच है कि हर तैनाती में सोनिया की ना सिर्फ राय होती है बल्कि उनकी अहम भूमिका होती है।  ऐसे में भला सोनिया के खिलाफ ये मामला कैसे दर्ज हो सकता है। बहरहाल मामला भले ना दर्ज हो, पर मैडम..ये पब्लिक सब जानती है।




   
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मंगलवार, 17 जुलाई 2012

To LoVe 2015: Padma Awards 2012

The country’s highest civilian awards the Padma Awards are conferred in three categories:

  1. Padma Vibhushan
  2. Padma Bhushan
  3. Padma Shri.

 The Awards are given in all disciplines/ fields of activities, example:

  • Art
  • Social work
  • Public affairs
  • Science and engineering
  • Trade and industry
  • Medicine
  • Literature and education
  • Sports
  • Civil service

Note:

  • Padma Vibhushan is awarded for exceptional and distinguished service.
  •  Padma Bhushan for distinguished service of high order 
  • Padma Shri for distinguished service in any field.

Some more key points:

  • The awards are announced on the occasion of Republic Day every year.
  • The awards are conferred by the President of India at a function held at Rashtrapati Bhawan sometime around March/ April.

  • This year the President has approved 109 awards including one duo case (counted as one) and 14 in the category of Foreigners/ NRIs/ PIOs/ Posthumous

  • Its 5 Padma Vibhushan, 27 Padma Bhushan and 77 Padma Shri Awards. There are 19 ladies among the awardees.
Padma Vibhushan

List of Names for the awards :

Padma Vibhushan

 Sl No. Name Discipline State/ Domicile
1. Shri K G Subramanyan Art-Painting & Sculpture West Bengal
2. Late Shri Mario De Miranda Art-Cartoonist Goa*
3. Late (Dr.)Bhupen Hazarika Art- Vocal Music Assam*
4. Dr. Kantilal Hastimal Sancheti Medicine - Orthopedics Maharashtra
5. Shri T V Rajeswar Civil Service Delhi

Padma Bhushan

Sl No. Name Discipline State/ Domicile

1. Smt. Shabana Azmi Art - Cinema Maharashtra
2. Shri Khaled Choudhury Art - Theatre West Bengal
3. Shri Jatin Das Art - Painting Delhi
4. Pandit Buddhadev Das Gupta Art - Instrumental Music - Sarod West Bengal
5. Shri Dharmendra Singh Deol alias Dharmendra Art - Cinema Maharashtra
6. Dr. Trippunithwra Viswanathan Gopalkrishnan Art - Classical vocal and instrumental music Tamil Nadu
7. Ms. Mira Nair Art - Cinema Delhi
8. Shri M.S. Gopalakrishnan Art - Instrumental Music-Violin Tamil Nadu
9. Shri Anish Kapoor Art - Sculpture UK*
10. Shri Satya Narayan Goenka Social Work Maharashtra
11. Dr. (Judge) Patibandla Chandrasekhar Rao Public Affairs Germany*
12. Shri George Yong-Boon Yeo Public Affairs Singapore*
13. Prof. Shashikumar Chitre Science and Engineering Maharashtra
14. Dr. M S Raghunathan Science and Engineering Maharashtra
15. Shri Subbiah Murugappa Vellayan Trade and Industry Tamil Nadu
16. Shri Balasubramanian Muthuraman Trade and Industry Maharashtra
17. Dr. Suresh H. Advani Medicine - Oncology Maharashtra
18. Dr. Noshir H Wadia Medicine-Neurology Maharashtra
19. Dr. Devi Prasad Shetty Medicine-Cardiology Karnataka
20. Prof. (Dr.) Shantaram Balwant Mujumdar Literature and Education Maharashtra
21. Prof. Vidya Dehejia Literature and Education USA*
22. Prof. Arvind Panagariya Literature and Education USA*
23. Dr. Jose Pereira Literature and Education USA*
24. Dr. Homi K. Bhabha Literature and Education UK *
25. Shri N Vittal Civil Service Kerala
26. Shri Mata Prasad Civil Service Uttar Pradesh
27. Shri Ronen Sen Civil Service West Bengal

Padma Shri

Sl No. Name Discipline State/ Domicile

1. Shri Vanraj Bhatia Art - Music Maharashtra
2. Shri Zia Fariduddin Dagar Art - Music - vocal Maharashtra
3. Smt. Nameirakpam Ibemni Devi Art - Music- Khongjom Parba Manipur
4. Shri Ramachandra Subraya Hegde
Chittani Art - Yakshagana dance drama Karnataka
5. Shri Moti Lal Kemmu Art - Playwright Jammu and
Kashmir
6. Shri Shahid Parvez Khan Art - Instrumental Music-Sitar Maharashtra
7. Shri Mohan Lal Kumhar Art - Terracotta Rajasthan
8. Shri Sakar Khan Manganiar Art - Rajasthani Folk Music Rajasthan
9. Smt. Joy Michael Art - Theatre Delhi
10. Dr. Minati Mishra Art - Indian Classical Dance-
Odissi. Orissa
11. Shri Natesan Muthuswamy Art - Theatre. Tamil Nadu
12. Smt. R. Nagarathnamma Art - Theatre Karnataka
13. Shri Kalamandalm Sivan Nambootiri Art - Indian Classical Dance-
Kutiyattam Kerala
14. Smt. Yamunabai Waikar Art - Indian Folk Music-Lavani. Maharashtra
15. Shri Satish Alekar Art - Playwright Maharashtra
16. Pandit Gopal Prasad Dubey Art - Chhau dance and
choreography Jharkhand
17.
Shri Ramakant Gundecha # Art - Indian Classical Music- Vocal Madhya Pradesh
Shri Umakant Gundecha # Art - Indian Classical Music- Vocal Madhya Pradesh
18. Shri Anup Jalota Art-Indian Classical Music- Vocal Maharashtra
19. Shri Soman Nair Priyadarsan Art - Cinema- Direction Kerala
20. Shri Sunil Janah Art-Photography Assam
21. Ms. Laila Tyebji Art-Handicrafts Delhi
22. Shri Vijay Sharma Art-Painting Himachal Pradesh
23. Smt. Shamshad Begum Social Work Chattisgarh
24. Smt. Reeta Devi Social Work Delhi
25. Dr. P.K. Gopal Social Work Tamil Nadu
26. Smt. Phoolbasan Bai Yadav Social Work Chattisgarh
27. Dr. G. Muniratnam Social Work Andhra Pradesh
28. Shri Niranjan Pranshankar Pandya Social Work Maharashtra
29. Dr. Uma Tuli Social Work Delhi
30. Shri Sat Paul Varma Social Work Jammu and
Kashmir
31. Smt.Binny Yanga Social Work Arunachal
Pradesh
32. Shri Yezdi Hirji Malegam Public Affairs Maharashtra
33. Shri Pravin H. Parekh Pubic Affairs Delhi
34. Dr. V. Adimurthy Science and Engineering Kerala
35. Dr. Krishna Lal Chadha Science and Engineering -
Agriculture Delhi
36. Prof. Virander Singh Chauhan Science and Engineering Delhi
37. Prof. Rameshwar Nath Koul Bamezai Science and Engineering Jammu and
Kashmir
38. Dr. Vijaypal Singh Science and Engineering -
Agricultural Research Uttar Pradesh
39. Dr. Lokesh Kumar Singhal Science and Engineering Punjab
40. Dr. Yagnaswami Sundara Rajan Science and Engineering Karnataka
41. Prof. Jagadish Shukla Science and Engineering USA*
42. Ms. Priya Paul Trade and Industry Delhi
43. Shri Shoji Shiba Trade and Industry Japan*
44. Shri Gopinath Pillai Trade and Industry Singapore*
45. Shri Arun Hastimal Firodia Trade and Industry Maharashtra
46. Dr. Swati A. Piramal Trade and Industry Maharashtra
47. Prof. Mahdi Hasan Medicine-Anatomy Uttar Pradesh
48. Dr. Viswanathan Mohan Medicine - Diabetology Tamil Nadu
49. Dr. J. Hareendran Nair Medicine - Ayurveda Kerala
50. Dr. Vallalarpuram Sennimalai Natarajan Medicine - Geriatrics Tamil Nadu
51. Dr. Jitendra Kumar Singh Medicine - Oncology Bihar
52. Dr. Shrinivas S. Vaishya Medicine-Healthcare Daman and Diu
53. Dr. Nitya Anand Medicine - Drugs Research Uttar Pradesh
54. Late Dr. Jugal Kishore Medicine - Homoeopathy Delhi *
55. Dr. Mukesh Batra Medicine-Homeopathy Maharashtra
56. Dr. Eberhard Fischer Literature and Education Switzerland*
57. Shri Kedar Gurung Literature and Education Sikkim
58. Shri Surjit Singh Patar Literature and Education - Poetry Punjab
59. Shri Vijay Dutt Shridhar Literature and Education -
Journalism Madhya Pradesh
60. Shri Irwin Allan Sealy Literature and Education Uttarakhand
61. Ms. Geeta Dharmarajan Literature and Education Delhi
62. Prof. Sachchidanand Sahai Literature and Education Haryana
63. Smt. Pepita Seth Literature and Education Kerala
64. Dr. Ralte L. Thanmawia Literature and Education Mizoram
65. Shri Ajeet Bajaj Sports - Skiing Delhi
66. Smt. Jhulan Goswami Sports - Women's Cricket West Bengal
67. Shri Zafar Iqbal Sports-Hockey Uttar Pradesh
68. Shri Devendra Jhajrija Sports - Athletics- Paralympics Rajasthan
69. Shri Limba Ram Sports - Archery Rajasthan
70. Shri Syed Mohammed Arif Sports - Badminton Andhra Pradesh
71. Prof. Ravi Chaturvedi Sports- Commentary Delhi
72. Shri Prabhakar Vaidya Sports-Physical Education Maharashtra
73. Shri T. Venkatapathi Reddiar Others-Horticulture Puducherry
74. Dr. K. (Kota) Ullas Karanth Others-Wildlife Conservation and
Environment Protection Karnataka
75. Shri K Paddayya Others-Archaeology Maharashtra
76. Shri Swapan Guha Others-Ceramics Rajasthan
77. Dr. Kartikeya V. Sarabhai Others - Environmental Education Gujarat

Note: * indicates awardees in the category of Foreigners / NRIs/ PIOs/ Posthumous. # indicates duo case.
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रविवार, 15 जुलाई 2012

To LoVe 2015: List of Top organizations and their Foundation Days

The motto behind the article  written is to aware about the the most commonly asked question in competition examination related to Headquarter details,full forms etc.The foundation of  blaa-blaa you found in every coroner or your exam, in respect of Banking, or IAS or SSC or UPSC patterns. So here a list List of Top organizations and their Foundation Days, headquarters their full forms and much more.


 

CSIR: Council of Scientific and Industrial Research

 CSIR Foundation Day comes from the day of Dr.  S.S. Bhatnagar. CSIR Foundation day is celebrated every year on 26th September, to honour those who stood apart in various fields in Science.

 National Foundation Day

National Foundation Day (in Japanese called Kenkoku Kinen no Hi  is celebrated annually on February 11and a National holiday in Japan. On this special day Japan switched from the traditional Japanese calendar - a lunar calendar based on the waxing and waning of the moon - to the Gregorian calendar starting in January 1873. It was at this time that the day of the enthronement of Emperor Jinmu, the first Japanese emperor, was made a national holiday and named Kigen-setsu. February 11 was determined as the day of enthronement by calculating the date in the solar calendar corresponding to the date recorded in the Nihon Shoki (The Chronicles of Japan), Japan's first history compiled on imperial orders. (However, many historians believe that Emperor Jinmu's enthronement, as described in the Nihon Shoki, was not a historical fact but folklore.)
Flag of WHO.svg

WHO:World Health Organization

A specialized agency of the United Nations (UN) that is concerned with international public health. Established on 7 April 1948. Its headquarters in Geneva, located in Switzerland, this isa also a member of the United Nations Development Group. Who predecessor the " Health Organization ",was an agency of the League of Nations.

 

IMF:International Monetary Fund

This is an organization of 188 countries , Started on July 22, 1944 but actually starts working on December 27, 1945 total 29 countries signed the Articles of Agreement that time.Motto is to foster global monetary cooperation, secure financial stability, facilitate international trade, promote high employment and sustainable economic growth, and reduce poverty around the worldwide Nations. Its Headquarters in Washington, D.C. (from wiki)

 ICC: International Cricket Council

This is the  international governing body of cricket. In Starting this was founded as the
Imperial Cricket Conference in 1909 by the  representatives from England, Australia and South Africa, after that is renamed to International Cricket Conference in 1965, and in 1989 it knows as (International Cricket Council).ICC motto is Great Sport Great Spirit. Its Headquarters in Dubai, United Arab Emirates.The ICC has 106 members for cricket game.This is the ICC Code of Conduct for their games.



Much more updates..please waits. 

South Asian Association for Regional Cooperation
Economic Cooperation Organization
Commonwealth of Nations


 

 


 

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To LoVe 2015: बाबा रे बाबा - रामदेव का रामराज



बाबा  रामदेव योग गुरु के रुप में देश दुनिया में जाने जाते हैं, पर इन दिनों वो योग को छोड़ कई दूसरे मामलों में अपनी टांग फंसा चुके हैं। इसलिए वह आए दिन किसी न किसी विवाद में उलझे ही रहते हैं। वो कालेधन का विरोध करते और स्वदेशी की बात भर करते तो किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन स्वदेशी की आड़ में वो अपने खुद के उत्पादों की मार्केटिंग कर रहे हैं। अच्छा रामदेव नियम कायदे से इन कंपनियों का संचालन करते तो  शायद इतना ज्यादा विरोध नहीं होता, लेकिन वो भी बाजार की उसी गोरखधंधे का हिस्सा है जो दूसरे लोग कर रहे हैं। यानि अधिक धन की लालसा में टैक्स की चोरी समेत तमाम गैरकानूनी हथकंडे अपनाने के आरोप उनकी कंपनियों पर लगते  रहे हैं।  बाबा दूसरी कंपनियों के उत्पादों को घटिया और अपने उत्पादों को शुद्ध बताने के साथ सस्ता भी कहते हैं, पर इसमें उतनी सच्चाई बिल्कुल नहीं, जितना दावा  किया जा रहा है।

कुछ समय पहले मेरे एक लेख पर बाबा के कुछ समर्थकों ने यहां अभद्र टिप्पणी से वातावरण को दूषित किया। लेकिन मेरा मानना है कि सच को दबाने का ये तरीका सही नहीं है। इसलिए मैने कोशिश की है कुछ और प्रमाणिक तथ्यों के साथ आप सबके पास आऊं। 11 हजार करोड़ से अधिक कारोबारी साम्राज्य के ‘मालिक’ रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव आज विवादों में हैं। केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) उनकी संस्थाओं द्वारा विदेशी लेन-देन की जांच कर रही है, तो उत्तराखंड का बिक्रीकर विभाग उनके विभिन्न ट्रस्टों के खिलाफ टैक्स चोरी की तहकीकात कर रहा है। अब आए दिन दवाओं से लदे उनके ट्रक पकड़े जा रहे हैं। जब इसकी जांच  की जाती है तो, भारी टैक्स चोरी का पता चलता है। सबको  पता है कि उनका महर्षि पतंजलि आश्रम भी कई तरह के विवादों में घिरा रहा है। बाबा की व्यावसायिकता से परेशान हो उनके तमाम पुराने सहयोगियों ने यहां से किनारा कर लिया है।

हंसी आती है, जब हम बाबा की पुरानी बातों को सुनते हैं। वो कैंसर व एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों को जड़ी-बूटियों से ठीक कर दिए जाने के ‘उल्टे-सीधे’ दावे किया करते थे। इसके खिलाफ मेडिकल काउंसिल भी बाबा रामदेव को कठघरे में खड़ा करने के लिए एकजुट होने लगा था। इसके संभावित खतरे को बाबा भी भांप गए। इसलिए अपने बचाव में उन्होंने हाथ-पांव मारना शुरू कर दिया है। वे कभी अखिलेश यादव-मुलायम सिंह यादव के दरबार में मत्था टेक रहे हैं। यदि वे अखिलेश सरकार के साथ ही उत्तराखंड सरकार का भी गुणगान करते नजर आएं, तो हैरानी की बात नहीं होगी। सवाल भी तो हजारों करोड़ के साम्राज्य को बचाने का है। वैसे इस बात में कोई दो राय नहीं  कि योग को व्यावहारिक बनाने और जन-जन तक पहुंचाने में रामदेव का परिश्रम बेजोड़ है। लेकिन काले धन के सवाल पर केंद्र सरकार को मुश्किल में डालने वाला योग गुरु बाबा रामदेव खुद भी बड़ी मुश्किल में फंसते नजर आ रहे हैं। उनके खिलाफ जांच कर रही केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट में रामदेव की ट्रस्ट की ओर से संचालित कंपनियों के विदेशी लेन देन में गड़बड़झाले की बू सूंघ ली है।

सूत्रों के मुताबिक ईडी ने कुछ ऐसे लेन देन पकड़े हैं, जिनमें उसे घपले-घोटाले का अंदेशा है। रिपोर्ट में ये भी बताया जा रहा है कि बाबा की कई सस्थाएं कालेधन के खेल में शामिल हो सकती हैं। इतना ही नहीं, उत्तराखंड के बिक्री कर विभाग ने भी बाबा की कंपनियों के खिलाफ कई मामले दर्ज किए हैं। बाबा की कहानी शुरू करने से पहले यहां यह बताना जरूरी है कि कुल 34 कंपनियों के किसी भी निदेशक मंडल में बाबा रामदेव नहीं हैं। इसी तकनीकी पहलू का लाभ उठाते हुए वे छाती ठोक कर कहते हैं कि उनके पास ब्लैकमनी का एक भी पैसा नहीं है। जो  भी जांच चल रही है, उसे बाबा और उनके समर्थक राजनीति से प्रेरित बताते हैं। पिछले दिनों कुछ ब्लाग को पढने के दौरान मेरी नजर पड़ी "हमवतन" पर। यहां मुझे इसी विषय पर कई तथ्यपरक जानकारी मिली। लीजिए आप भी देखिए।

ईडी का कसता शिकंजा

प्रवर्तन निदेशालय की एक ताजा गोपनीय रिपोर्ट में रामदेव के विदेशों में किए गए करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन का खुलासा किया गया है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक जांच के दायरे में 64.49 करोड़ की राशि है। बाबा के लगभग 11,000 करोड़ रुपये के साम्राज्य में पांच ट्रस्ट हैं। इनमें तीन ट्रस्ट भारत में हैं, जबकि एक-एक अमेरिका व ब्रिटेन में हैं। कंपनियों की जांच के दौरान ईडी को इतने सारे संदिग्ध लेन-देन की जानकारी मिली है कि जांच एजेंसी को अपनी जांच का दायरा बढ़ाना पड़ा है। जांच के दायरे में रामदेव के पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड और दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की अनेक सहायक कंपनियों के जरिए किए गए निर्यात शामिल हैं।  सूत्रों ने बताया कि सहायक कंपनियों का इस्तेमाल भी शक के दायरे में है। इन सहायक कंपनियों में दिव्य फार्मेसी, दिव्य योग साधना और दिव्य प्रकाशन शामिल हैं। ये सभी दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के तहत काम करती हैं। आरंभिक जांच में यह भी पता चला है कि पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड ने 2009 से 2011 के बीच 20 करोड़ का सामान आयात किया था। जांच के दायरे में दो और लेन-देन हैं। इनमें ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट के रूप में एक लाख 50,000 अमेरिकी डॉलर (74.98 लाख रु .) और 2 लाख 42,000 ब्रिटिश पाउंड (1.9 करोड़ रु .) रेमिटेंस शामिल है। निदेशालय के नोट में पांच ऐसे संदिग्ध लेन-देन का खुलासा हुआ है। सभी में फेमा के उल्लंघन की जांच की जा रही है।

जांच में यह भी पता चला है कि पतंजलि आयुर्वेद ने भारतीय निवेश परामर्श और पंजीयन शुल्क नाम से अमेरिका में 6 लाख 10,000 डॉलर (3.04 करोड़ रुपये) भेजे थे। यही नहीं, ‘आस्था’ नाम के चैनल का संचालन करने वाली कंपनी वैदिक ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड ने भी करीब 2 लाख 75000 पाउंड (2.15 करोड़) और 3 लाख 79000 डॉलर (1.89 करोड़ रुपये) विदेश भेजे थे। यह सारी राशि पेशेवर तकनीकी शुल्क के नाम से भेजी गई थी। वैदिक ब्रॉडकास्टिंग उन 34 कंपनियों में शामिल है, जिनका संचालन रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण करते हैं।

पिछले साल अप्रैल माह में रामदेव ने घोषणा की थी कि पतंजलि एक अमेरिकी फर्म को खरीदने वाली है। इसके बाद रांची के निकट बनने जा रहे झारखंड मेगा फूड पार्क की 107 करोड़ रुपये की लागत   वाली एक परियोजना में पतंजलि ने 25 फीसदी निवेश किया है। बालकृष्ण और बाबा के एक अन्य सहयोगी स्वामी मुक्तानंद को इस पार्क का निदेशक बनाया गया है। प्रवर्तन निदेशालय के नोट में इस बात का भी जिक्र  है कि कंपनी को इक्विटी के रूप में दुबई से भी भारी भरकम निवेश हासिल हुआ था।

ट्रस्ट द्वारा संचालित 34 कंपनियों में से रामदेव खुद किसी भी कंपनी के बोर्ड में शामिल नहीं हैं। वे सीधे तौर पर लाभान्वितों में भी नहीं हैं। सभी कंपनियों में बालकृष्ण का दखल है। वे या तो उनमें प्रबंध निदेशक हैं या फिर निदेशक की हैसियत से हैं, जबकि मुक्तानंद 11 फर्मों में निदेशक हैं। सूत्र बताते हैं कि योग गुरु  का सारा कारोबार उनके सहयोगी चला रहे हैं, इसलिए निदेशालय ने अब तक एक बार भी रामदेव को पूछताछ के लिए नहीं बुलाया है।

करोड़ों की सेल्स टैक्स चोरी

ताजा मामला गत 27 मार्च का है। राज्य बिक्री कर विभाग ने बाबा रामदेव की लक्जर स्थित पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड से दवाओं से भरे ट्रक पकड़े जिन पर तेरह लाख रुपये मूल्य की दवाएं लदी थीं। बगैर टैक्स चुकाए ये दवाएं ले जाई जा रही थीं। पकड़े जाने पर कंपनी के अधिकारियों ने कहा कि दवाएं गरीबों में बांटने के लिए ले जाई जा रही थीं। इससे पहले भी बाबा रामदेव के कई ट्रस्टों पर सेल्स टैक्स चोरी के आरोप लग चुके हैं। सूत्रों ने बताया कि दिव्य फार्मेसी पर पांच करोड़ रुपये के टैक्स चोरी का आरोप है। जांच के दौरान उत्तराखंड के बिक्री कर विभाग ने बाबा के दिव्य फार्मेसी पर छापा भी मारा था। छापामार टीम का नेतृत्व विभाग के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर जगदीश राणा ने किया था। सूत्र बताते हैं कि छापे के बाद सरकार में हड़कंप मच गया था। उत्तराखंड के तत्कालीन राज्यपाल सुदर्शन अग्रवाल बेहद खफा हो गए थे। उन्होंने इस संबंध में सरकार से पूरी रिपोर्ट तलब की थी। अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन प्रिंसिपल सेक्रेटरी इंदु कुमार पांडे ने छापे की कार्रवाई को सही व निष्पक्ष करार दिया था। गौर करने योग्य तथ्य यह भी है कि छापा मारने वाले डिप्टी कमिश्नर जगदीश राणा पर दबाव इस कदर पड़ा कि उन्हें चार साल पहले ही रिटायरमेंट लेना पड़ा था।

बाबा स्वदेशी, मदद विदेशी

रामदेव ने अपनी छवि मल्टीनेशनल कंपनियों के विरोधी, स्वदेशी अभियान के कट्टर समर्थक और विकास के देशी रोडमैप तैयार करने वाले के रूप में बनाई है। वे कहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए मैं स्वदेशीकरण का हिमायती हूं।  शायद यह काफी कम लोग जानते होंगे कि स्वदेशीकरण के हिमायती बाबा रामदेव ने अपने रेडी-टू-ड्रिंक सॉफ्ट ड्रिंक्स बेचने के लिए अमेरिकी मल्टीनेशनल पैकेजिंग कंपनी टेट्रा से हाथ मिलाया है। आने वाले समय में पतंजलि फलों के करीब 30 नए पेय पदार्थ ऐसी ही पैकिंग में पेश करने की योजना बना रहा है। पहले जूस पूरी तरह कांच व प्लास्टिक की बोतलों में बेचा जाता था। धीरे-धीरे इसकी जगह टेट्रा पैक ले रहा है। इतना ही नहीं बाबा के ट्रस्ट ने अमेरिका में   आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी हर्बों बेद का अधिग्रहण कर लिया है। कितने में, यह एक रहस्य है। कुछ साल पहले दिव्य फार्मेसी के 113 मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन छेड़ने पर हमेशा के लिए नौकरी से निकाल दिया गया था। रामदेव के कारोबारी कदम बहुराष्टÑीय कंपनियों के विरोध में उनके बयानों का समर्थन करते प्रतीत नहीं होते हैं।

रहस्यमय है पतंजलि योगपीठ

पतंजलि योगपीठ शुरू से ही संदेह व सवालों के घेरे में रही है। खोजबीन बताती है कि वर्ष 2006 में इस योगपीठ की स्थापना रामदेव, शंकरदेव, कमला साध्वी, स्वामी कर्मवीर, भूपेंद्र सिंह ठक्कर, जीव राज पटेल और बालकृष्ण ने मिलकर की थी। सपना था पतंजलि को जन-जन तक पहुंचाना और लक्ष्य था, योग को घर-घर तक पहुंचाना। हरिद्वार के आश्रम की पूरी संपत्ति आचार्य शंकरदेव की थी। वर्षों से यह  आश्रम गरीब-बेसहारा लोगों का सहारा था। रामदेव ने येन-केन-प्रकारेण यह जगह खाली करवाई थी। मामला कोर्ट तक गया था। लेकिन गरीबों की किसी ने नहीं सुनी। पतंजलि ने और भी बहुत सी जमीनें हासिल कीं और साम्राज्य फैल गया। इन्हीं दिनों रामदेव के भाई रामभरत व बहनोई यशदेव शास्त्री जो शंकरदेव के चेले थे, ने भी पतंजलि में घुसपैठ कर ली थी। इस तरह योगपीठ परिवारवाद से अछूता नहीं रह सका। रामदेव इसके मुखिया बन बैठे।

बाबा के कई साथी लापता

मुखिया बनने व नाम फैलने के साथ ही रामदेव बाबा के व्यवहार में भी बदलाव आया। उनके इस बदलते आचरण से ट्रस्ट के सदस्यों में गुटबाजी शुरू हो गई थी और वे अलग-अलग खेमों में बंट गए। रामदेव की कथित दादागीरी से क्षुब्ध होकर उनके परम मित्र पीठ के उपाध्यक्ष आचार्य कर्मवीर ने त्यागपत्र दे दिया था। ट्रस्ट के सबसे पुराने सदस्यों में से एक साध्वी कमला, जिन्हें आश्रम वाले माता कहकर बुलाते थे, को जबरन आश्रम से निकाल दिया गया था। रहस्यमय तरीके से गायब हुए बाबा रामदेव के गुरु शंकरदेव का आज तक पता नहीं चला है। इसी तरह कई पुराने लोगों ने भी बाबा रामदेव व बालकृष्ण जैसे उनके सहयोगियों के व्यवहार से खफा हो आश्रम से अपना नाता तोड़ लिया। भ्रष्टाचार के कई आरोपों से घिरे आजादी बचाओ आंदोलन के पूर्व संचालक राजीव राधेश्याम दीक्षित पर भी बाबा रामदेव की मेहरबानी हुई थी। काफी कम समय में बाबा ने दीक्षित को भारत स्वाभिमान का राष्टÑीय सचिव व ट्रस्टी बना दिया था, जबकि राजीव दीक्षित को कार्यकर्ताओं के विरोधस्वरूप आजादी बचाओ आंदोलन नामक संस्था छोड़नी पड़ी थी। 30 नवंबर 2010 को रहस्यमय परिस्थितियों में भिलाई में राजीव दीक्षित की मौत हो गई थी। उनकी मौत आज भी एक रहस्य है।  क्या देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाले बाबा रामदेव स्वयं भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं? क्या योग गुरु की तस्वीर कॉरपोरेट बाबा के रूप में तब्दील नहीं हो गई है? यहां सवाल खड़ा होता है कि क्या बाबा रामदेव की मुहिम के बाद स्विस बैंकों में जमा काला धन स्वदेश लौट आया? क्या मल्टीनेशनल कंपनियों पर किसी तरह की कोई लगाम लगाई जा सकी? देश विदेश में लगातार महंगी संपत्तियों की खरीद फरोख्त, आश्रम के पुराने व अनुभवी लोगों के साथ दुर्व्यवहार, बालकृष्ण जैसे विवादास्पद व्यक्ति को अपनी छत्रछाया में पालना, योग शिविरों के महंगे पैकेज, परिजनों को लाभान्वित कर व्यावसायिक साम्राज्य का विस्तार जैसी घटनाएं साफ संकेत कर रही हैं कि बाबा रामदेव भी पूंजीवाद व बाजारवाद की गिरफ्त में आ गए हैं।

कौन हैं बाबा रामदेव ?

बाबा रामदेव का जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के गांव नारनौल में हुआ था। बचपन में उनका नाम रामकिशन यादव था। उन्होंने केवल 8वीं कक्षा तक पढ़ाई की और बाद में घर से भाग गए थे। घर से भागने से लेकर ‘बाबा रामदेव’ बनने तक के उनके सफर के बारे में सिवाय उनके और कोई भी यकीन से कुछ नहीं कह सकता। बताया जाता है कि घर से भागने के बाद वे काफी दिनों तक हरिद्वार के आसपास साइकिल में पंक्चर लगाया करते थे। कोेई कहता है कि 1990 के दशक में वे साइकिल पर आंवला, अदरख आदि बेचा करते थे। उसी दौरान उनकी मुलाकात किसी ऐसे व्यक्ति से हुई, जो उन्हें गुरुकुल में ले गया। वहीं उन्होंने योग आदि की शिक्षा ली और एक दिन दुनिया के सामने ‘बाबा रामदेव’ बन कर अवतरित हुए।

जांच के दायरे में संदिग्ध लेन-देन

झारखंड मेगा फूड पार्क में निवेश 26.75 करोड़

विदेशों में प्रत्यक्ष निवेश 2.64 करोड़

2009-11 के बीच सामानों का आयात 20.00 करोड़

अमेरिका की एक कंपनी में निवेश 8.04 करोड़

विदेश से प्राप्त धन 7.06 करोड़

कुल 64.49 करोड़

बाबा पर आरोप

कथित टैक्स चोरी में बाबा रामदेव के कई ट्रस्ट लिप्त।

कई प्रतिबंधित जड़ी-बूटियों का प्रयोग दवा बनाने में।

डोनेशन के तौर पर कालाधन लेना।

सहयोगी बालकृष्ण का पासपोर्ट फर्जी।

बालकृष्ण है नेपाली भगोड़ा।

बालकृष्ण ने किया है अस्त्र-शस्त्र नियमों का उल्लंघन।

फैक्ट्रियों में लेबर लॉ का उल्लंघन।

एड्स व कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को ठीक करने का झूठा दावा।

कारोबारी साम्राज्य

सालाना अनुमानित टर्नओवर 1,100 करोड़

योग कैंप से सालाना 50 करोड़ से अधिक की आमदनी

दवा बिक्री से सालाना 50 करोड़   की आमदनी

पुस्तक व सीडी बिक्री से 2.3 करोड़ सालाना आय

निवेश व अचल संपत्ति

17 करोड़  : विदेश में आइलैंड की कीमत (गिफ्टेड)

1,115 करोड़  :  हरिद्वार में एक हजार एकड़ जमीन की कीमत

500 करोड़  : फूड पार्क, हरिद्वार में निवेश

44 करोड़  : झारखंड के फूड पार्क में 40 प्रतिशत स्टेक

100 करोड़  : पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार

90 करोड़  :  सोलन, हिमाचल प्रदेश में 38 एकड़ जमीन

(कीमत अनुमानित है,  हमवतन से साभार)



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गुरुवार, 12 जुलाई 2012

To LoVe 2015: तालीबानी साये में महिलाओं की बगावत

  अफगानिस्तान से एक और तालीबानी वीडियो रिलीज.....एक असहाय, कमजोर महिला पर एके-47 से गोलियों की बौछार....गोली चलाने वाला उसका पति....महिला को मौत की सजा दी गई अवैध संबंधों रखने के आरोप में। एक घंटे तक न्याय की नौटंकी हुई....उसके बाद महिला को सुनाई गई सजा-ए-मौत। महिला से अवैध संबंध रखने वाले दोनों तालिबानी कमांडर सलामत है।
     दरअसल अफगानिस्तान की पहाड़ियां में...जहां काबूल की सीमा खत्म होती है..वहां से शुरु होता है जंगली और बर्बर तालिबानियों का राज....जिनके राज में इंसानियत दम तोड़ देती है....महिलाएं इंसान नहीं....महज एक उपभोग की वस्तु बन जाती है..जिसका काम होता है सिर्फ मर्दों का बिस्तर गर्म करना।
      अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिती बदतर है। इस वीडियो को समझने के लिए जानना होगा वहां महिलाओं की स्थिती के बारे में। अगर कहा जाए कि महिलाओं के लिए कहीं अगर नर्क है तो वो तालिबानियों के कब्जे वाला अफगानिस्तान है तो कोई अतिश्योक्ती नहीं होगी। वहां मर्द जब चाहे वो किसी भी उम्र की महिला को अपने हवस के लिए चुन सकता है, मगर महिलाओं की स्थिती उलट है। वहां लड़कियों को जवानी में जीवनसाथी मिलता है कोई अधमरा बूढ़ा...या फिर परिवार के सम्मान और वादे के नाम पर 16-17 साल की लड़की ब्याह दी जाती है 4-5 साल के बच्चे से।
    कम उम्र की लड़कियों का निढाल बूढ़ा पति हवस पूरी करके जल्दी सो जाता है, पर इन अभागिनों की रातें बैचेन शरीर के साथ जागी रहती हैं। वहीं बच्चे के साथ ब्याही गईं मजूबर लड़कियों का सारा दिन नन्हें पति को खिलाने-पिलाने....नहाने में बीत जाता है। फिर जब रात आती है...पांच साल का पति उसकी छाती पर सिर रख कर चैन की नींद सो जाता है...उस वक्त इन मजबूरों की आंखों से नीद कोसो दूर होती हैं। अपनी किस्मत को कोसती..खून के आंसू रोती....इन लड़कियों को समझ नहीं आता कि नन्हें पति की वो क्या हैं..आया, मां या पत्नी.।
     इसी दर्द और बेबसी भरे दिल से निकलती हैं चंद लाइनें जिन्हें लांदे कहा जाता है। जिनमें अक्सर लड़कियां पूछती हैं कि जब ये नन्हा बालक बड़ा होकर जवां मर्द बनेगा..तब तक ये बूढ़ी हो चुकी होंगी....तब उनका क्या होगा। इन लांदे में शायरी वाली नफासत नहीं होती.....शब्दों का जादू भी नहीं होता...पर होती है दिल की चीत्कार....कैद सांसों की तड़प....घुट-घुटकर जीने का दर्द....पुरुषों के खिलाफ नारी देह की खुली बगावत...प्रेमी को पुकारती दिल से निकली आवाज।
      पर हाय री किस्मत....अफगानिस्तान में लड़कियों को लांदे भी गाने की इजाजत नहीं....अगर पता चल जाए कि कोई लड़की लांदे लिखती है...तो उसे मिलती है ऐसी सजा..जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं....। सोचिए जिस पर गुजरती है उसका क्या हाल होता होगा। पहले उस लड़की या औरत के साथ किया जाता है खुलेआम बलात्कार....कई बार सामूहिक बलात्कार...फिर दी जाती है मौत की सजा। कभी पत्थर मार-मार कर मौत की नींद सुलाया जाता है..तो कभी एके-47 की गोलियों की बौछार। यानि जिल्लत भरी मौत....आज अफगानिस्तान वो देश बन चुका है जहां औरत को मोहब्बत का हक नहीं है। अपनी मर्जी से खुली हवा में सांस लेने की इजाजत नहीं है। जाहिर है दुनिया बदल गई, पर हिंदुकुश पर्वत पर या उसके आसपास रहने वाले कई जंगली कबीले आज भी जंगली ही हैं। ऐसे में जहां इन कबीलों का राज हो वहां महिला होना किसी अभिशाप से कम नहीं। कंधार के आसपास के कुछ शहरों के पास तो कई ऐसे गांव हैं जहां भाड़े के हत्यारे रहते हैं...जो धर्म के नाम पर खून बहाने की आदिम परंपरा जिंदा रखे हुए हैं।
  वैसे भी पुरुषों को जब भी हैवानियत का नंगा नाच करना होता है ..या झूठी श्रेष्ठता और ताकत का प्रदर्शन करना होता तो औरत ही उनका पहला शिकार बनती है......और ये कड़वा सच दुनिया के हर कोने का सच है।
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