शनिवार, 30 जून 2012

To LoVe 2015: पाकिस्तान में हैं कहां हुकुमत ?

"सरबजीत रिहा होगा, अरे नहीं सरबजीत नहीं, सुरजीत रिहा होगा...नाम की वजह से गलती हुई”
ये उल्टबांसी पाकिस्तान सरकार की है,,,पाकिस्तानी हुकुमत के पीछे का सच जानने वाले पाकिस्तान की पलटबाजी पर हैरान नहीं है। हकीकत ये है कि आप लाख सिर पटक लें समझ नहीं पाएंगे कि पाकिस्तानी हुकुमत किसे कहें। ऐसे में हमारे देश के हुक्मरान करें भी तो क्या करें। जिस तरह से  सरबजीत की रिहाई की खबर आते ही पाकिस्तानी सेना और इस्लामी कट्टरवादी संगठन और आतंकवादियों के हिमायती उछलकूद मचाने लगे...उससे जरदारी साहब की हुकुमत की सांस हलक में अटक गई और मजबूरन उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़ गए। सरकारी की इस पलटबाजी से खुद पाकिस्तानी मीडिया हैरान हो गया। वैसे शुरु में इस खबर के आते ही भारत में पाकिस्तान का सच जानने वाले हैरान थे..कि आखिर ये इतनी आसानी से कैसे संभव हो गया...पर जब पाकिस्तानी कट्टरवादियों और आतंकवादियों की नौटंकी शुरु हुई तब कोई हैरान नहीं हुआ। सबको पता था कि जरदारी साहब चाह कर भी भारत से रिश्ते सुधारने की मुहिम को इतनी आसानी से पटरी पर नहीं ला सकते।

कठिन है डगर लोकतंत्र की

पाकिस्तान में आज भी सेना ही सबकी माईबाप है। भले ही सेना अमेरिका के दवाब की वजह से खुलेआम जरदारी हुकुमत पर दवाब नहीं बना पा रही...लेकिन वास्तव में पाकिस्तान के लोकतंत्र की गाड़ी के पीछे सेना बैठी हुई है। पिछली सीट पर बैठी सेना ही तय करती है कि लोकतंत्र की गाड़ी का स्टेयरिंग किधर मुड़ेगा। लोकतंत्र की जो बची-खुची धीमी रफ्तार है...उसपर पाकिस्तानी अदालत अड़ंगा लगाने पर तूली हुई है। वैसे कहा जाता है कि पाकिस्तान की अदालतें सेना के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। ये सेना ही है जिसकी शह पर आतंकवादियों ने पाकिस्तान का बेड़ा गर्क किया हुआ है..और  आज पाकिस्तान दुनिया भर के आतंकवादियों की पनाहगाह बना हुआ है..इन इस्लामी कट्टरवादियों ने पाकिस्तान को आतंकिस्तान बना रखा है।

पाकिस्तान पर भरोसा करना बेवकूफी

जब पाकिस्तान में जनता का नुमांइदा वजीरे-आजम यानि प्रधानमंत्री संविधान कि दुहाई देते-देते थक जाए..पर न्यायालय न माने को इसे क्या कहेंगे। लोकतंत्र में जनता ही अपने चुने हुए प्रतिनिधी को हटाती है...मगर पाकिस्तान में अदालत ने निर्वाचन आयोग को वजीरे-आजम गिलानी साहब को पद से धक्का देने का आदेश दे दिया है। लोकतंत्रिक सरकार सेना और न्यायालय के आगे लाचार दिखती है। ऐसे में भारत में कोई जब पाकिस्तान पर भरोसा करने की बात करता है तो कलेजा कलस जाता है। शायद वो मुंबई हमला भूल जाते हैं।
       मुंबई पर हमले के वक्त पाकिस्तानी विदेशमंत्री भारत में थे..हमले की खबर से वो हक्केबक्के से थे। उन्होंने तुरंत कहा था कि आईएसआई प्रमुख पाशा को भारत भेजा जाएगा..। इस बयान के आते ही लोग हैरान भी हो गए थे। आईएसआई के सर्वेसर्वा पाशा लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि का आदेश मानंगे..इस पर सबको शक था। हुआ भी वही...पाकिस्तान पहुचते ही मंत्री महोदय की गुद्दी पर बंदूक रख दी गई और उनकी घिग्घी बंध गई। बाद के दिनों में भारत की बातचीत बहाल करने पर यही विदेशमंत्री चीखने लगे थे भारत को उनकी जरुरत है न कि पाकिस्तान को भारत की। जब ऐसे लोग लोकतंत्र में होंगे तो पाकिस्तान में लोकतंत्र जड़ जमा ही नहीं सकता। वैसे भी कट्टरवादियों पर लगाम लगाना ऐसे लोगो के बस की बात नहीं है। ऐसे में जो लोग पाकिस्तान पर भरोसे की बात करते हैं उनको लानत है।

पाकिस्तानी नागिरक संस्थाएं

पाकिस्तान में लोकतंत्र की सांस किसी तरह चल रही है..लेकिन पाकिस्तानी आवाम और नागरिक संस्थाएं इतनी ताकतवर नहीं जो मिस्र की तरह सेना के खिलाफ खुलकर सड़क पर आ सकें। इन हालात में जो नागरिक संस्थाएं औऱ मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान में मर-मर कर चल रही हैं उन्हें चलाने वालों के साहस को सलाम है। वैसे इतना तो तय है कि कट्टरवादियों कि वजह से निक्कमे और जाहिल लोग पाकिस्तान में अमनपंसद लोगों को आसानी से कामयाब होने नहीं देंगे।
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To LoVe 2015: बाबा का योग ना बाबा ना ....


अब मुझे तो नहीं पता  कि ये कौन सा आसन है ?
देश में योग की बहुत चर्चा हो रही है, पर सच मे योग है क्या ? इसे लेकर लोगों में कई तरह के भ्रम हैं। लिहाजा मैं कोशिश करुंगा कि आप को योग के बारे में आसान शब्दों में जानकारी दूं, वैसे मैं जानता हूं कि कुछ लोग मेरे इस लेख को ये कह कर खारिज कर देगें कि कांग्रेसी मानसिकता से लिखा गया लेख है। तीन दिन से देख रहा हूं कि गिने चुने लोग सत्य का गला घोटने के लिए मेरे पिछले लेख पर अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं। सच बात की जा रही है तो उसे वो तर्कों के आधार पर नहीं अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल कर दबाने की कोशिश कर रहे हैं। जो जितना पढा़ लिखा है वो उतना ही स्तर गिरा कर अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। हो सकता है कि बाबा प्रेम में आपको मेरी बात बुरी लगे, लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो है, वो आपको जानना ही चाहिए। मसलन योग आखिर है क्या ? आज देश में एक बड़ा वर्ग इसे सिर्फ शारीरिक क्रियाओं से जोड़ कर देखता है। उसे लगता है कि योग से सांस की  बीमारी ठीक होती है, उससे घुटनों के जोड़ ठीक रहते हैं। बाबा रामदेव ने योग को बीमारी की दवा बना कर रख दिया है। आज आप किसी से पूछो योग क्या है, वो अपने पेट अंदर बाहर करने लगता है। उसका  मतलब योग के मायने सिर्फ आसन और प्राणायाम हैं।

हालाकि महर्षि पंतजलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने योगसूत्र में शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग यानी आठ अंगों वाले साधक को ही सच्चा योगी बताया है। आप भी जान लीजिए ये क्या है। ये योग हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में ये सभी चीजें आती हैं। अब मैं एक एक कर आपको ये बताने की कोशिश करुंगा कि इनके मायने क्या हैं। महर्षि के योग को जानने के बाद आप  खुद तय करें  कि  बाबा जो योग टीवी पर करते दिखाई देते हैं, वो कितना सही है। ऐसा नहीं है कि योग  के जो नियम मैं बता रहा हूं, वो कुछ अलग दुनिया की बात है। बल्कि इसके अनुयायी बाबा रामदेव भी हैं, इसलिए उन्होंने अपने " योग कारखाने " का नाम महर्षि पतंजलि रखा है। महर्षि के नाम से कारखाने का नाम तो रख दिया, पर उस पर अमल कितना करते हैं। ये आप  योग के नियम को पढकर खुद तय  करें।

1.यम--.इसके तहत पांच सामाजिक नैतिकताएं आती हैं---
(क) अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना
( बताइये रामदेव ऐसा करते हैं ? )

(ख) सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना
( सच्चाई से तो दूर  दूर तक का वास्ता नहीं है)

(ग) अस्तेय - चोर-प्रवृति का न होना
( इतना बड़ा कारोबार, टैक्स चोरी सब तो सामने आ चुका है)

(घ) ब्रह्मचर्य - इसके दो अर्थ हैं:
चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना, सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना।
( बाबा ब्रह्मचर्य का कितना पालन करते हैं, ये विवादित विषय है, इसलिए ये बाबा  ही जानें वैसे इस मामले में कुछ अलग तरह की चर्चा हैं बाबा और  बालकृष्ण दोनों )

(च) अपरिग्रह - आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना।
( अपरिग्रह को आपको ठीक से समझना होगा, क्योंकि बाबा इसका पालन तो बिल्कुल नहीं करते। मतलब अगर आपको दो रोटी की भूख है, तो तीसरी रोटी के बारे में विचार भी मन मस्तिष्क में नहीं आना चाहिए। आवश्यकता से ज्यादा किसी चीज का संग्रह नहीं किया जाना चाहिए। अब बाबा रामदेव तो इस  पर बिल्कुल खरे नहीं उतरते। बिना संग्रह के  वो  इतना बड़ा अंपायर कैसे खड़ा कर सकते  थे। संग्रह के बिना तो बाबा एक पल  भी नहीं रह सकते। दिल्ली में अनशन के दौरान खुलेआम लोगों से चंदा वसूल किया जा रहा था)

२. नियम: पाच व्यक्तिगत नैतिकताएं

(क) शौच - शरीर और मन की शुद्धि
( मन में जब फिजूल की बातें भरीं हों, किसे कैसे ठिकाने लगाना है, आंखो में शैतानी दिखाई देती हो, तो भला मन को कैसे शुद्ध कर सकते हैं।)

(ख) संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना
( अपनी ताकत का विस्तार करने, देश दुनिया में संपत्ति बनाने, किसानों  की जमीन कब्जाने में लगा आदमी कैसे संतुष्ट हो सकता है। जब वो संतुष्ट नहीं हो सकता तो प्रसन्न रहने का सवाल ही नहीं उठता।)

(ग) तप - स्वयं से अनुशासित रहना
( बाबा और अनुशासन दोनों एक नदी के दो किनारे हैं, जो कभी मिल ही नहीं सकते।)

(घ) स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना
(मेरा  मानना है कि बाबा आत्मचिंतन तो करते होगे, पर वो उस पर अमल नहीं करते)

(च) ईश्वर-प्रणिधान - ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा
(आर्यसमाज में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार ही नहीं किया गया है)

३. आसन: योगासनों द्वारा शरीरिक नियंत्रण

४. प्राणायाम: सांस लेने संबंधी खास तकनीक द्वारा प्राण पर नियंत्रण

५. प्रत्याहार: इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना

६. धारणा: एकाग्रचित्त होना

७. ध्यान: निरंतर ध्यान

८. समाधि: आत्मा से जुड़ना। शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था में समाधि का अनुभव।

हाहाहहा, सब कुछ इसी पेट के खातिर 

मुझे लगता है कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग को आप सब काफी हद तक समझ गए होंगे। ऐसे में अब मैं अपने ब्लागर्स साथियों पर सब कुछ छोड़ देता हूं, वो अष्टांग योग को जानने के बाद बाबा को कहां रखते हैं, उनकी इच्छा। वैसे मैं आपको बताऊं मेरी एक जाने माने योग गुरु से बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि योग के दौरान दुनिया भर की फिजूल बातें नहीं की जा सकतीं, क्योंकि जब आपका ध्यान भटकता रहेगा तो आप सब कुछ कर सकते हैं, पर योग नहीं। अब देखिए मंच पर बाबा के उछल कूद करने को भी योग नहीं कहा सकता। योग कराने के दौरान हल्की फुल्की बातें, अजीब तरह से हंसना, अपने उत्पादों को बेहतर बताना, स्वदेसी के नाम पर अपने उत्पाद योग शिविर के दौरान बेचना, योग के दौरान बीमारी की बात करना ऐसे तमाम मसले हैं जो योग के समय नहीं की जानी चाहिए। पर ये बात बाबा और उनके अनुयायियों को कौन समझाए।
योगीराज महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग निर्विविद है, अभी तक किसी ने भी उनके अष्टांग योग पर सवाल नहीं खड़े किए हैं। खुद बाबा रामदेव भी इस योग के समर्थक हैं,पर अष्टांग योग मे शामिल मंत्रों का आधा भी अगर सार्वजनिक जीवन मे इस्तेमाल करते तो वो योग की असली सेवा कर रहे होते। आज उनकी नजर में योग महज बीमारी का इलाज भर है। लोग भी इतना ही जानते हैं। जबकि अष्टांग योग का  अगर सही मायने मे पालन किया जाए तो कोई भी आदमी हमेशा सदाचारी रहेगा और सदाचारी रहेगा तो प्रसन्नता उसके  चेहरे पर दूर से ही दिखाई देगी।

पर बाबा रामदेव को तो योग के बहाने लोगों  को जमा करके कई तरह  के काम करने होते हैं। पहले तो स्वदेसी के नाम पर अपने चूरन चटनी आचार मुरब्बे बेचने होते हैं। वो बताते हैं कि उनके उत्पाद क्यों खाने चाहिए। आंवला नगरी प्रतापगढ़ का आंवला उतना गुणकारी नहीं है, जितना बाबा रामदेव का आंवला। उत्पादों को बेचने के बाद कुछ  नेताओं को गाली गलौच करना होता है। फिर अपना एजेंडा बताते है कि काला धन आ जाए तो हर आदमी के हाथ में अगले दिन एक एक करोड़ रुपये से ज्यादा हो जाएगा। फिर ताली बजवाने के लिए वो अपने पेट में तरह तरह की हलचल करते हैं। पूरी सीडी लेकर बैठें तो देखता हूं कि दो घंटे से ज्यादा के कार्यक्रम के दौरान योग पर दो मिनट भी समय नहीं देते। अब लोगों को योग के बारे में बताएंगे तो जनता पूछेगी नहीं, कि फिर आप योग क्यों नहीं कराते  आप  ये सब  क्या बेच बाच रहे है।

चलते चलते

वैसे मैं ईश्वरवादी हूं। मुझे ईश्वर में पूरा भरोसा है। मैं मानता हूं कि भगवान ने मेरी जितनी सांसे तय कर दी हैं, उतनी सांसे लेनी ही हैं, ना कम ना ज्यादा। फिर मुझे लगता है कि अगर मैने योग किया तो जल्दी जल्दी सांस लूंगा तो जाहिर है जल्दी जल्दी छोड़ूंगा। इससे मेरी सांसों का स्टाक जल्दी खत्म हो जाएगा। बस इसीलिेए मै सोच रहा हूं आराम आराम से सांस लूं और आराम आराम से छोड़ूं, तो ज्यादा दिन तक सांसे चलेंगी।

( मित्रों अगर आप लेख से सहमत नहीं  हैं, इसकी आलोचना करें, कोई दिक्कत  नहीं है, पर भाषा  की मर्यादा का ध्यान रखें, क्योंकि ये  ब्लाग हमारे आपके परिवार  में पढ़े जाते हैं।  अशिष्ट भाषा होने पर मुझे मजबूरी में उसे यहां पब्लिश होने  से रोकना  पड़ेगा। )


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मंगलवार, 19 जून 2012

To LoVe 2015: योग भूल गए बाबा रामदेव !


 पहले तो आज का सबसे बड़ा सवाल ये कि रामदेव हैं क्या ? सन्यासी हैं, योगगुरु हैं, आयुर्वेदाचार्य हैं, व्यापारी हैं, उद्यमी हैं आखिर क्या हैं रामदेव ? वैसे आमतौर पर लोग इस सवाल का एक ही जवाब देंगे कि वो योगगुरु हैं। पर आजकल रामदेव का काम और उनका आचरण देख कर कहीं से नहीं लगता है कि वो योग गुर हैं या कभी योगगुरु रहे होंगे। उनकी बातचीत और हरकतों से तो यही लगता है कि वो योग की एबीसी भी शायद नहीं जानते। साध्वी चिदर्पिता की मानें तो योग का अर्थ होता है जोड़ना। जब योग को आध्यात्मिक घटना के तौर पर देखा जाता है तो योग का अर्थ है आत्मा का परमात्मा से मिलन। सरल शब्दों में कहा जाये तो, मनुष्य का ईश्वर से मेल। मानव मन को ईश्वर से जुडने के लिए मानसिक, आत्मिक और शारीरिक रूप से निरोगी होना जरूरी है। विकार युक्त मन से यह संभावना खत्म हो जाएगी। ध्यान से पहले के सभी आसन और प्राणायाम आदि उसी विकार मुक्त मन को पाने की कोशिश भर होते हैं। ये सही है कि रामदेव ने योग का बहुत प्रसार किया। इसे मुनियों की कुटी से निकाल कर घर-घर पहुंचा दिया। परंतु रामदेव का योग पेट कम करने, वज़न कम करने, जोड़ो के दर्द से छुटकारा पाने का व्यायाम बनकर ही रह गया। अब या तो रामदेव योग को इतना ही जानते हैं या फिर वो लोगों की रुचि और सुविधा के अनुसार इसे सीमित कर रहे हैं। योग के मामले में महर्षि पतंजलि के जो मूलमंत्र हैं, रामदेव का उससे भी कोई लेना देना नहीं है।
 अब फैसला आप ही करें कि रामदेव योग की कितनी सेवा कर रहे हैं। हां वो आयुर्वेद में भी हाथ आजमा रहे हैं। आपको पता होगा कि आयुर्वेद भारत की सनातन चिकित्सा पद्धति है, जो कि पूरी तरह वैज्ञानिक है। ऋषि-मुनि वन में जीवन बिताते हुए जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों के लाभ और उपयोगों की खोज किया करते थे। यह अनुसंधान से कहीं ज्यादा तपस्या और समर्पण पर निर्भर था। वैसे आज के समय में  उसकी जगह बीएएमएस डाक्टर ने ले ली है। सही मायने में इस डिग्री को हासिल करने के बाद ही कोई आयुर्वेदिक चिकित्सक के तौर पर प्रैक्टिस कर सकता है। अब रामदेव तो योगगुरु है, फिर उनके उत्पाद रामदेव के ही नाम पर बेचे जा रहे हैं। रामदेव की इस ईमानदारी का फैसला मैं आप पर छोड़ देता हूं। हालाकि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को मैं जानता हूं,वो कुछ भी अनाप शनाप बोलते रहते हैं। लेकिन जब रामदेव को वो ठग बताते हैं, तो मुझे लगता है कि उनकी बात में कुछ तो दम है। बालकृष्ण रामदेव के दोस्त हैं, शिष्य हैं, सहयोगी हैं या बिजिनेस पार्टनर ये तो वही बता सकते हैं। लेकिन सीबीआई को अभी तक वो आयुर्वेद की कोई मान्य डिग्री नहीं दिखा पाए हैं। उन्होंने अपनी शिक्षा की जो कुछ डिग्री पेश की है, जांच पड़ताल में वो फर्जी पाई गई हैं। वैसे डिग्री या उनके अन्य कागजात सही हैं या गलत इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन वारंट जारी होने पर उनके भाग जाने से साफ है कि दाल में कुछ काला जरूर है।
 आइये एक नजर डालते हैं कि रामदेव बनाते क्या क्या हैं। साध्वी चिदर्पिता ने इस पर काफी अध्ययन किया है। उनका मानना है कि रामदेव फार्मेसी के नाम पर हर वह उत्पाद बना रहे हैं जो बाज़ार में पहले से मौजूद है। ऐसे में सवाल ये है कि रामदेव किस सामाजिक उद्देश्य से मोइश्चराइज़र, फेस क्रीम, साबुन और एंटि रिंकल क्रीम बना रहे हैं? यदि उन्हें योग पर भरोसा है तो मुंह पर तरह-तरह की क्रीमें क्यों मलवाते हैं ? आयुर्वेद के नाम पर बने ये कास्मेटिक उत्पाद बिना लाइसेन्स के हैं जो गैरकानूनी है। आपने वीको टर्मरिक का विज्ञापन देखा है? विज्ञापन में विको टर्मरिक, नहीं कोस्मेटिक ऐसा क्यों कहते हैं, कभी सोचा? उसी लाइसेन्स की बाध्यता के कारण जिसके बिना रामदेव करोड़ों का कारोबार धड़ल्ले से चला रहे हैं। पतंजलि उत्पादों पर एमआरपी के जरिए भी चोरी की जा रही है। भारत के टैक्स के नियम साफ कहते हैं कि एमआरपी का मायने ऐसा मूल्य है जिसमें सभी तरह के टैक्स का भुगतान किया जा चुका हैं। अब रामदेव धड़ल्ले से अपने उत्पादों पर एमआरपी लिख रहे हैं और कोई टैक्स नहीं भर रहे। देश में घूम घूम कर ईमानदारी पर लंबी चौड़ी बातें भी कर रहे हैं।  
आइये रामदेव को भी जानने की कोशिश कर ली जाए। हिन्दू धर्म में संत की पहचान उसके संप्रदाय से होती है। यह व्यवस्था कुछ वैसी ही है जैसे समाज में जातियाँ। यहां बहुमान्य संप्रदाय सरस्वती संप्रदाय है जो आदि गुरु शंकरचार्य से प्रारम्भ है। यहां दीक्षित संत सन्यासी कहलाते हैं। यह संप्रदाय सनातन हिन्दू धर्म को मानने वाला है। जानकारी के अभाव में अधिकांश भगवाधारियों को समाज में सन्यासी ही मान लिया जाता है। अब रामदेव की बात की जाए तो ये आर्यसमाजी हैं। यह सनातन धर्म से बिल्कुल अलग धारा है। आर्यसमाज वेद को अपना आधार मानता है और सनातनी पद्धति का विरोध करता है। आर्य समाज की मान्यताओं के अनुसार फलित ज्योतिष, जादू-टोना, जन्मपत्री, श्राद्ध, तर्पण, व्रत, भूत-प्रेत, देवी जागरण, मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्रा मनगढ़ंत हैं, वेद विरुद्ध हैं। आर्यसमाज को समझने के बाद मैं जानना चाहता हूं कि रामदेव ने आर्यसमाज के लिए क्या कार्य किया? वैसे तो पूरे पतंजलि योगपीठ में एक भी मूर्ति नहीं है, फिर भी अधिकांश लोग उन्हें सनातनी ही मानते हैं। किसी सन्यासी को आर्यसमाजी समझा जाए तो वह इसका मुखर होकर विरोध करता है, पर आर्यसमाजी संत रामदेव को लोग सनातनी संत मान रहे हैं और वे खामोश हैं।
इसी से जुड़ा एक सवाल करते हैं रामदेव से। आर्यसमाज तीर्थ यात्रा का विरोध करता है। रामदेव को बताना चाहिए कि हरिद्वार का उनके लिए क्या महत्व है? हरिद्वार, गंगा के कारण विश्व भर में हिन्दू तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है। पतंजलि योगपीठ को हरिद्वार जैसे तीर्थस्थल पर बनाना इसके महत्व को भुनाना ही था। जब आपके पंथ में तीर्थ का कोई महत्व ही नहीं है तो उसके नाम को भुनाना कैसी ईमानदारी है?

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सोमवार, 18 जून 2012

To LoVe 2015: आमसहमति के बहाने ? .... Rohit

जाने क्यों हम लोग हर बार ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं कि हमारे बीच सबकुछ ठीकठाक है। ऐसे में कई बार सहज चीजों पर भी सवाल उठने लगते हैं। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। लोकतंत्र में चुनाव लड़ना एक सहज प्रक्रिया है। ऐसे में राष्ट्रपति पद की गरिमा के नाम पर आमसहमति बनाने का ढोंग हम क्यों कर रहे है। लग ऐसे रहा है जैसे ये कोई जोड़तोड़ हो। लोकतंत्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनाव का होना उसके जीवंत होने की निशानी है। ऐसे में खासकर मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी का पसोपेश समझ से परे है। ये ठीक है की राजनीतिक समीकरण कांग्रेस या बीजेपी के पक्ष में नही है। दोनों ही राष्ट्रीय पार्टीयां सहयोगियों के आगे मजबूर सी हैं। वोटो का गणित कांग्रेस या बीजेपी गठबंधन के पक्ष में नहीं है।
      हालात ये है कि आम सहमति के राग से उल्टा राष्ट्रपति पद की गरिमा घट रही है। इससे जनता में गलत संदेश जा रहा है। लग रहा है कि विपक्ष उपराष्ट्रपति पद पर अपना आदमी बैठाना चाहता है, इसलिए खुलकर यूपीए यानि कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुख़र्जी का समर्थन नहीं कर रहा है। तो क्या जनता में ऐसा संदेश जाना इस पद गरीमा को बढ़ाएगा? वैसे इस चुनाव में कोई व्हिप जारी नहीं होता। यानि किसी पार्टी का सांसद या विधायक पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देता तो भी उसपर दलबदल कानून लागू नहीं होता।
      देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुनाव का होना पद की गरीमा को बढ़ाएगा ही, न की घटाएगा। अगर चुनाव हो जाएगा तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा। कुछ लोगों का कहना है कि आम सहमति से चुनाव का खर्च बच जाएगा। बात कुछ हद तक ठीक है...पर बड़े-बड़े घोटाले, लेट होते प्रोजेक्ट से बढ़ती लागत, अनावश्यक विदेशी दौरे और अवैध खनन से जो चूना जनता के खजाने पर लग रहा है...क्या उसकी तुलना में राष्ट्रपति पद के चुनाव का खर्च ज्यादा है? अगर इनसब घोटालों से आधा पैसा भी बच जाए...तो देश की स्थिती सुधर जाए। राजनीतिक दलों को इस पद के लिए चुनाव के होने न होने के सवाल को अहम का सवाल नहीं बनाना चाहिए।  उलटा उनके इस राग से जो बवाल मचा हुआ है, वो कई सवाल खड़े कर रहा है। लग रहा है जैसे आम सहमति की आड़ में अपनी बात मंगवाने की कोशिशें हो रही हैं। ऐसे में है की चुनाव होने दिया जाए।
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To LoVe 2015: कलाम को मुसलमान बना दिया नेताओं ने ...


देश के जाने माने वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम को इन नेताओं ने मुसलमान बनाकर रख दिया है। देश ही नहीं दुनिया कलाम साहब की योग्यता का लोहा मानती है। उनकी काबिलियत के आधार पर ही वो 2002 में देश के 11 वें राष्ट्रपति बने। इसके पहले उन्हें उनके काम की वदौलत देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है। अब दो कौड़ी नेता उन्हें इस्तेमाल करने में लगे हुए हैं। देश का आम नागरिक भी जानता है कि श्री कलाम ऐसे सख्शियत हैं, जो जिस पद को ग्रहण करेंगे, उस पद की गरिमा बढेगी।
अब देखिए मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी बनने वाले मुलायम सिंह यादव अंदरखाने कुछ और ही खेल खेल रहे थे। एक ओर तो वो ममता बनर्जी के साथ प्रेस कान्फ्रेस कर एपीजे अबुल कलाम की उम्मीदवारी का ऐलान कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर वो कांग्रेस नेताओं के न सिर्फ संपर्क में थे, बल्कि ममता बनर्जी की बातचीत और ममता की रणनीति का ब्यौरा भी उन्हें दे रहे थे। मुलायम की हालत ये हुई कि रात होते ही मीडिया के कैमरों से छिपते छिपाते सोनिया के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच गए और उन्हें आश्वस्त कर दिया कि कुछ भी हो वो कांग्रेस का समर्थन करेंगे। इधर वो ममता बनर्जी से भी मीठी मीठी बातें करते रहे। खैर ये सब चाल तो मुलायम की रही।
अब ममता की भी सुन लीजिए। ऐसा नहीं है कि ममता बनर्जी कलाम साहब के काम से बहुत खुश हैं, इसके लिए वो उन्हें राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाना चाहती हैं। दरअसल ममता बनर्जी को मैं देख रहा हूं कि पिछले दो साल से वो मुसलमानों की सबसे बड़ी मददगार और खैरख्वाह बनने की कोशिश कर रही हैं। उनको लगता है कि अगर मुसलमानों की आवाज उठाई जाए तो इसका उन्हें सियासी फायदा होगा। पर ममता को कौन बताए कलाम साहब मुसलमान सबसे आखिर में हैं, इसके पहले वो 1962 में 'भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन' में शामिल हुए। यहां प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह (एस.एल.वी. तृतीय) प्रक्षेपास्त्र बनाया। जुलाई 1980 में इन्होंने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित किया। इसरो लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम को परवान चढ़ाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। डॉक्टर कलाम ने स्वदेशी लक्ष्य भेदी (गाइडेड मिसाइल्स) को डिजाइन किया। इन्होंने अग्नि एवं पृथ्वी जैसी मिसाइल्स को स्वदेशी तकनीक से बनाया। डॉक्टर कलाम जुलाई 1992 से दिसम्बर 1999 तक रक्षामंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा सुरक्षा शोध और विकास विभाग के सचिव भी रहे। उन्होंने स्ट्रेटेजिक मिसाइल्स सिस्टम का उपयोग आग्नेयास्त्रों के रूप में किया। इसी प्रकार पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर विस्फोट भी परमाणु ऊर्जा के साथ मिलकर इन्होंने किया। इससे भारत परमाणु हथियार के निर्माण की क्षमता प्राप्त करने में सफलता हासिल की। 1982 में वे भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में वापस निदेशक के तौर पर आये और उन्होंने अपना सारा ध्यान "गाइडेड मिसाइल" के विकास पर केन्द्रित किया। अग्नि मिसाइल और पृथवी मिसाइल का सफल परीक्षण का श्रेय काफी कुछ उन्हीं को है। जुलाई 1992 में वे भारतीय रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुये। उनकी देखरेख में भारत ने 1998 में पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ।
ऐसे कलाम को देश के नेताओं ने महज एक मुसलमान बनाकर रख दिया है। सच कहूं तो मैं भी चाहता हूं कि कलाम को राष्ट्रपति बनना चाहिए, लेकिन मैं ममता बनर्जी की अपील को खारिज करता हूं। उनकी अपील के पीछे गंदी, फूहड़ राजनीति छिपी हुई है। चूंकि कांग्रेस उम्मीदवार घोषित कर चुकी है, लिहाजा उससे अपील करना तो बेईमानी है। लेकिन एनडीए समेत सभी सियासी दलों को वाकई चाहिए वो कलाम साहब के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश करें। पर कलाम को राष्ट्रपति बनाएं तो इसलिए कि वो जाने माने वैज्ञानिक हैं, देश आत्मनिर्भर बनाने में उनका अहम योगदान है और सबसे बढिया ये कि वो कामयाब ही नहीं काबिल इंशान भी हैं।
सलाहकारों को बदलना जरूरी सोनिया जी ...

सोनिया गांधी को सबसे पहले अपने सलाहकारों को तत्काल प्रभाव से हटा देना चाहिए। ये बात तो सोनिया को भी पता है कि उन्हें लगातार गलत राय देकर विवाद खड़े किए जा रहे हैं। उत्तराखंड का मामला हो, आंध्रप्रदेश का मामला हो या फिर अब राष्ट्रपति के उम्मीदवार घोषित करने का मामला हो। हर मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की किरकिरी हुई है। उत्तराखंड में बस सोनिया की बात रखने के लिए लोगों ने वहां विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री स्वीकार कर लिया, वरना वहां कांग्रेस का टूटना तय था। आंध्र में जगन के साथ बातचीत करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, अगले चुनाव में आंध्र से कांग्रेस का पूरी तरह सफाया तय है।
अब कांग्रेस ने रायसीना हिल का चेहरा बिगाड़ कर रख दिया है। मेरा तो यही मानना है कि राष्ट्रपति का चुनाव खुले दिमाग और आम सहमति के आधार पर ही होना चाहिए। लेकिन कांग्रेस को पता नहीं क्या हो गया है कि उसका हर खेल विवादों में आ जाता है। पता किया जाना चाहिए कि कांग्रेस के किस सलाहकार ने सोनिया गांधी को ये सलाह दी कि सहयोगी दलों के साथ राष्ट्रपति के दो नाम शेयर किए जाएं। यानि प्रणव मुखर्जी के साथ हामिद अंसारी का नाम क्यों शामिल किया गया। क्या इसके पहले कभी लोगों  को दो नाम दिए गए थे। ऐसा आज तक पहले कभी नहीं हुआ, फिर ये किसकी सलाह थी दो नाम पर चर्चा करने की।
अक्सर देखा गया है कि सरकार के सहयोगी दलों के साथ ही सत्तारुढ पार्टी विपक्ष से भी मशविरा करती है। मैं पूरी तरह दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर सोनिया गांधी ने प्रणव मुखर्जी को उम्मीदवार बनाने के पहले एनडीए के नेताओं के साथ भी विचार विमर्श किया होता तो श्री मुखर्जी सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुन लिए जाते। ये इसलिए भी किया जाना जरूरी था कि लोकसभा और राज्यसभा में सत्र के दौरान विपक्ष ने प्रणव दा की जमकर प्रशंसा की और यहां तक कहा कि आप से बेहतर और कोई उम्मीदवार हो ही नहीं सकता। अन्य नेताओं के साथ ही लाल कृष्ण आडवाणी ने भी खुले मन से प्रणव दा की तारीफ की थी। मगर कांग्रेस इसका फायदा उठाने से चूक गई।
हालत ये है कि कांग्रेस को उसके सहयोगी तो निशाने पर लिए ही हैं, दूसरे छोटे मोटे दल भी आंख दिखा रहे है। ये अलग बात है कि कांग्रेस अपने गणित के आधार पर चुनाव में कामयाब हो जाए और मुखर्जी रायसीना हिल पहुंच जाएं, पर सच ये है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने गलत सलाह को अपनाया, जिसकी वजह से राष्ट्रपति चुनाव की, कांग्रेस की, सोनिया गांधी की छीछा लेदर हो रही है।


चलते - चलते
हंसी आती है टीम अन्ना पर। बड़बोले अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर मुंह खोला। इस बार उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति पद के लिए प्रणव मुखर्जी उन्हें मंजूर नहीं है। अरे भाई आपको मंजूर नहीं हैं लेकिन हमें तो हैं ना। अब हमारी आपकी लड़ाई का कोई मतलब नहीं, क्योंकि ना आप वोटर हैं और ना मैं वोटर हूं। लिहाजा जो वोटर हैं, उन्हें ही इस मामले को देखने दीजिए। वैसे भी जरूरी नहीं कि हर मुद्दे पर आप का मुंह खोलना जरूरी है।



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गुरुवार, 14 जून 2012

To LoVe 2015: मुश्किल में पार्टी, कहां गायब हो राहुल बाबा ...


राहुल बाबा आप इस वक्त कहां गायब हैं। यूपीए सरकार, कांग्रेस पार्टी ही नहीं सबसे ज्यादा आपकी मां सोनिया गांधी इस वक्त मुश्किल में है। उन्हें आपकी बहुत सख्त जरूरत है। आप जहां कहीं भी हैं, बिना देरी किए सीधे घर आ जाइये। ना जाने ऐसा क्यों है, जब कांग्रेस मुश्किल में होती है, देश को राहुल की जरूरत होती है, उस समय इनका कोई पता ही नहीं होता कि ये हैं कहां। जबकि राहुल बाबा कांग्रेस पार्टी में सबसे मजबूत राष्ट्रीय महासचिव हैं। इनके सामने बड़े बड़े कांग्रेसी दिग्गज सीधे खड़े भी नहीं हो पाते। वैसे भी पार्टी में राहुल प्रधानमंत्री के सबसे मजबूत दावेदार माने जाते हैं। ऐसे में जब भी सरकार या पार्टी क्राइसेस में हो, तब तो आपको महत्वपूर्ण भूमिका निभानी ही चाहिए।
मैने कांग्रेस के एक बड़े नेता से पूछा कि जब पार्टी विपरीत हालातों से गुजर रही होती है तो आप लोग राहुल बाबा को कहां छिपा देते हैं। बड़ी मासूमियत से बोले श्रीवास्तव जी आप क्यों हमारी पार्टी की ऐसी तैसी करना चाहते हैं। मैने अरे मैने तो कुछ कहा नहीं, मैं तो सिर्फ ये जानना चाहता हूं कि इस मसलों से भी निपटने की ट्रेनिंग बाबा को होनी चाहिए ना। वो वोले यूपी चुनाव में आपने नहीं देखा, उन्हें तो बात बात में गुस्सा आता है। चलिए चुनावी जनसभा में गुस्सा आ गया कोई बात नहीं। लेकिन यहां गुस्सा आ गया तो सरकार कल जाने वाली होगी तो आज चली जाएगी। भाई आज सरकार चलाना आसान है क्या ? कितने समझौते करने पड़ते हैं। इसलिए जानबूझ कर राहुल को पूरे मामले से दूर रखा गया है। मैने नेता जी से कहा कि चलिए ये बात आपने हमें समझा दिया और हम समझ भी गए, पर जनता को क्या समझाएंगे। उन्हें भी यही बताएंगे कि उन्हें गुस्सा आ जाता है और वो गुस्से में कुछ भी कर सकते हैं, इसलिए उन्हें अलग रखा गया है।  नेता जी बोले श्रीवास्तव जी आप बेफिक्र रहें, ये पब्लिक है, सब जानती है।
खैर राहुल वैसे भी जब समय आया है, तो राहुल फेल रहे हैं। अस्वस्थता के चलते जब सोनिया गांधी विदेश में इलाज करा रहीं थीं, तो राहुल के साथ एक कमेटी बना दी गई थी। उसी दौरान अन्ना का आंदोलन जोर पकड़ा। सरकार पर तरह तरह के आरोप लगे। देश भर के लोग सड़कों पर आ गए। सरकार गले तक फंस गई थी, इस आंदोलन से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा था, लेकिन राहुल गांधी टस से मस नहीं। जैसे उन्हें पता ही नहीं कि देश में चल क्या रहा है। एक ओर पार्टी में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने की बात हो रही है, दूसरी ओर राहुल देश की राजनीति में अपनी भूमिका बहुत ही सीमित बनाए हुए हैं। वजह सिर्फ यही कि वो बेवजह के विवाद में अभी से फंसकर आगे का खेल खराब नहीं करना चाहते।

चलते चलते
मुझे लगता है कि यूपीए गठबंधन से बाहर जाते जाते ममता बनर्जी कई और लोगों की नौकरी भी लेना चाहती हैं। उन्होंने लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार से बात की और उन्हें राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रुप में उनकी राय पूछी। मीरा कुमार ने उनसे कहा होगा कि ठीक है, मैं तैयार हूं। अब ममता ने मीरा कुमार का नाम भी राष्ट्रपति के रुप में उछाल दिया और ये भी कह रहीं हैं। अरे भाई सोनिया गांधी मीरा कुमार को नहीं चाहती हैं, क्यों उन्हें बेवजह बलि का बकरा बनाने पर तुली हैं।  
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बुधवार, 13 जून 2012

To LoVe 2015: ममता-मुलायम ने कसा सरकार का पेंच ....


ममता और मुलायम ने सोनिया गांधी और सरकार का पेंच थोड़ा ज्यादा कस दिया है। पहले तो सोनिया के साथ बैठक में हुई बातचीत का उन्होने मीडिया के सामने खुलासा कर दिया, बाद में उनकी बात मानने से इनकार कर दिया। सरकार के लिए शर्मनाक बात ये है कि ममता बनर्जी सरकार में शामिल होने के बाद भी यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी की बात को मानने से तो इनकार किया ही, यह भी कहा कि वो अंतिम फैसला समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ बात करके करेंगी। इससे उन्होंने एक तीर से दो निशाना साधा। पहला ये कि मुलायम सिंह को भरोसा हो गया कि ममता उनकी भरोसेमंद है, दूसरा कांग्रेस को ये सबक भी मिल गया कि ममता की अनदेखी कर मुलायम को अपने साथ नहीं किया जा सकता।

खैर मुलायम ममता ने बातचीत के बाद राष्ट्रपति के लिए तीन नाम सुझाए। उन्होंने तीन नाम सुझाए ये बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात ये है कि सोनिया के दोनों नाम यानि प्रणव मुखर्जी और हामिद अंसारी के खारिज कर दिए। उन्होंने तो तीन नाम गिनाए हैं, उसमें एपीजे अबुल कलाम, सोमनाथ चटर्जी और मनमोहन सिंह शामिल हैं। एपीजे कलाम का नाम तो हमे सिरे से खारिज कर देना चाहिए, क्योंकि अगर बंगामी राष्ट्रपति नहीं बना तो ममता का कोलकता में रहना मुश्किल हो जाएगा। अब बचे सोमनाथ दा और मनमोहन सिंह। सोमनाथ दा अभी लंदन में हैं, और उनसे किसी भी राजनीतिक दल ने राष्ट्रपति पद के लिए कोई बातचीत नहीं की है। वो खुद हैरानी जता रहे हैं। तीसरा नाम बहुत चौंकाने वाला है, और हां अगर तीसरे नाम में दम है, तो इसके पीछे की रणनीति और किसी की नहीं खुद प्रणव मुखर्जी की हो सकती है।

मनमोहन की छीछालेदर हो रही है, अगर उन्हे ग्रेसफुल एक्जिट देना तो ये सबसे बेहतर होगा कि उन्हें राष्ट्रपति बनाकर 7 आरसीआर यानि प्रधानमंत्री आवास से राष्ट्रपति भवन यानि रायसिना हिल शिफ्ट कर दिया जाए। बात यहीं खत्म नहीं होगी, इससे तो बंगाल में और तूफान आ जाएगा। बंगाल को खुश करने के लिए प्रणव दादा को प्रधानमंत्री बनाना ही होगा। आज जिस तरह से सरकार का परफारमेंस है, उसे देखते हुए मनमोहन को हटाने में किसी को कोई दिक्कत नहीं है। फिर उन्हें सम्मान के साथ राष्ट्रपति भी तो बनाया जा रहा है। रही बात इसके आगे क्या ?  इसके आगे ये होगा कि समाजवादी पार्टी को सरकार में शामिल कर लिया जाएगा। मुलायम सिंह को एक बार फिर रक्षामंत्रालय का आफर दिया जाएगा,क्योंकि वैसे ए के एंटोनी सेना को संभालने में नाकाम रहे हैं।

ममता मुलायम के एक होने से सरकार के सामने गंभीर संकट है। इसलिए इन दोनों की अनदेखी करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। कहा जा रहा है कि प्रणव के लिए तमाम लाबी यहां काम कर रही है। मुलायम जो बोल रहे हैं वो उनकी भाषा नहीं है, बल्कि तमाम उद्योगपति कई दिन से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं, जो इस रणनीति के पीछे काम कर रह हैं।

अब गेंद सोनिया के पाले यानि यूपीए के पाले में है। वैसे सोनिया गांधी को कांग्रेस के रणनीतिकार कब क्या सलाह दे दे, इस पर तो अंतिम समय तक सस्पेंस  बना रहता है। कांग्रेस के रणनीतिकार वाहवाही लूटने के लिए इधर उधर की सलाह देते रहते हैं। हमने उत्तराखंड में मुख्यमंत्री के सवाल पर देखा कि जिसने मेहनत की, उसे आखिरी समय में किनारे कर के दूसरे आदमी को मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिससे पार्टी की थू थू हुई। अब इस मामले में पार्टी से ज्यादा सोनिया की किरकिरी होने वाली है।

सबको पता है कि सोनिया गांधी कई दिनों से यूपीए में शामिल दलों के नेताओं से राष्ट्रपति के मसले पर बात कर रही हैं। ज्यादातर पार्टियों ने प्रणव के नाम पर मुहर लगा दी है। अब टीएमसी और एसपी के विरोध के बाद सोनिया ने जहां से मुहिम की शुरुआत की थी, फिर वहीं आ गई हैं। अब अगर उन्हें किसी नए नाम पर आमसहमति बनानी हुई तो पूरी प्रक्रिया उन्हें दोबारा शुरू करने होगी। फिलहाल राष्ट्रपति पद पर उम्मीदवार के चयन को लेकर पिछली बार की तरह इस बार भी कुत्ता फजीहत शुरू हो गई है।

   
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मंगलवार, 12 जून 2012

To LoVe 2015: हर रोटी का सवाल है

  • “एक सरकारी सर्वे की रिपोर्ट-शहरों की शादियों में करीब 58000 करोड़ का खाना होता है बर्बाद”
  • “इससे कहीं ज्यादा सरकारी गोदाम में अनाज सड़ जाता है”
  • “20-30 करोड़ लोग रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं”
  • “गोदाम में सड़ते अनाज को गरीबों तक पहुंचाने की उचित व्यवस्था नहीं है”
  • “दिल्ली सरकार ऐसी योजना बना रही है जहां गरीबों को खाना मिले...और फ्रीजर की व्यवस्था होने   पर होटलों और शादियों में बचे खाना को मंगाया जाएगा”
  • “रिकॉर्ड तोड़ खाद्य उत्पादन होने के बाद भी हर चौथा भारतीय भूखा”
    ये एक ऐसा विरोधाभाष है जिसे पढ़कर न तो हमें शर्म आती है, न ही सरकार को। कुछ मंत्री चिंता जताते हैं, तो बाकी ये सोच कर चुप हो जाते हैं कि ये उनके मंत्रालय का काम नहीं है। उधर जनता का अधिकांश हिस्सा शिकायत करने से ज्यादा कुछ नहीं करता।
       अजीब स्थिती है। जो लोग काम करते हैं उन्हें पूरी ईमानदारी से सरकारी सहायता नहीं मिलती। न ही आम जनता का ज्यादा समर्थन मिलता है और जो लोग पैसा देते भी हैं...वो ये देखने की जहमत नहीं उठाते कि उनका दिया पैसा कहां जा रहा है? हालात ये है कि गली-नुक्कड़ पर पिज्जा-चाउमिन आसानी से मिल रहा है, पर खाने की थाली में खाना कम होता जा रहा है। कुपोषण के मामले में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ्रीका के कुछ देशों से भी बदतर स्थिती में है हमारा देश।
     आखिर हम जा कहां रहे हैं? क्या कुछ देर रुक कर हम सोचेंगे? क्या य़े जरुरी है कि झूठी शान के लिए शादी में जरुरत से ज्यादा लोगो को बुलाया जाए? हम खाना बनवाते वक्त आखिर ये क्यों नहीं सोचते कि बचे खाने का क्या होगा? अगर जरा सा हम सजग हों तो क्या ये खाना सही लोगो तक नहीं पहुंचेगा?
     ये भी एक कड़वा सच है कई बार समाजिक लोगो की शादी में काफी लोग आ जाते हैं। ऐसे में गेस्ट कंट्रोल जैसा कानून भी पूरी तरह से उचित नहीं लगता, लेकिन खाने की बर्बादी को रोकने का कानून जरुर लागू किया जा सकता है। जिसपर हम अमल कर सकते हैं। हमें शादी के बाद के बचे खाने को ले जाने वाली एजेंसियों औऱ एनजीओ का पता मालूम होना चाहिए। हमारी आधी समस्या हल हो जाएगी।
  • तो क्या हम लोग इतना भी नही कर सकते...
  • क्या देश के भूखे लोगो के लिए हमारा कोई कर्तव्य नहीं है?
  • क्या डेढ़ लाख से ज्यादा करोड़पतियों के देश में बीस करोड़ लोगो का भूखे रहना इन करोड़पतियों के लिए शर्म की बात नहीं है? 
   सिर्फ सरकार कुछ नहीं कर सकती। ऐसे मामलों मे जनता का सक्रिय योगदान होना जरुरी है। आंकड़े बताते हैं सरकार की अच्छी योजनाओं में जनता के सहयोग का अभाव होता है। इन योजनाओं में पलीता का कारण सरकारी कर्मचारियों की उदासीनता जितनी जिम्मेदार है, उतनी ही लोगो की वो गलत सोच भी है जो मानती है कि सरकारी योजनाएं सिर्फ कागज पर ही रहती है। हमें इस सोच से उबरना होगा। एक सामूहिक समाजिक प्रयास भूखे भारत को खाना खिला सकता है। औऱतों को कुपोषण से बचा सकता है। 
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सोमवार, 11 जून 2012

To LoVe 2015: बद्जुबान क्यों हो रही है टीम अन्ना ...


मैं जब भी टीम अन्ना की गलत बातों का विरोध करता हूं तो इस टीम के चंपू बिना कुछ जाने समझे मुझे कांग्रेसी बताकर अपनी झेंप मिटाते हैं। इसलिए अन्ना टीम की बात करने से पहले मैं केंद्र सरकार की बात ही कर लूं। इससे कम से कम टीम अन्ना के चंपू शायद आत्म मंथन करने को मजबूर हों। अगर मुझसे कोई पूछे कि केंद्र सरकार के बारे में मेरी क्या राय है। मेरा सीधा जवाब होगा ये है "अलीबाबा चालीस चोर"। अगर आप मनमोहन सिंह के बारे में मेरी राय पूछें तो मेरा फिर जवाब होगा "चोरों की कैबिनेट के सरदार"। मुझे हैरानी होती है जब लोग प्रधानमंत्री के रुप में मनमोहन सिंह को ईमानदार बताते हैं और सारा दोष केंद्रीय और राज्यमंत्रियों पर थोप देते हैं। भाई प्रधानमंत्री सभी मंत्रालयों के प्रधान होते हैं और केबिनेट मंत्री या फिर राज्यमंत्री उनके बिहाफ पर मंत्रालय का कामकाज करते हैं। प्रधानमंत्री को ये अधिकार है कि जब कोई मंत्री उनके  मनमाफिक काम ना करें, तो उसे मंत्रिमंडल से हटा सकते हैं। ऐसे में जितने भी घोटाले हुए हैं, उसमें प्रधानमंत्री के पास उसका हिस्सा भले ना आया हो, पर वो भी बराबर के भागीदार हैं। मुझे लगता है कि अब इससे ज्यादा इस मरी गिरी सरकार के बारे में सभ्य भाषा में भला क्या कहा जा सकता है।

आइये अब मुद्दे पर आते हैं। क्या ऐसा नहीं लगता है कि टीम अन्ना और रामदेव बद्जुबान हो गए हैं। प्रधानमंत्री के लिए शिखंडी और धृटराष्ट्र शब्द इस्तेमाल करना क्या किसी सभ्य समाज में जायज है? क्या सरकार का सख्त विरोध का मतलब गाली गलौज की भाषा इस्तेमाल करना है? इस टीम में शामिल एक पूर्व महिला आईपीएस जो खुद दागी है। वो चर्चा में बने रहने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाती रहती हैं। पहले उन्होंने अन्ना के अनशन स्थल पर बने सार्वजनिक मंच से सिर पर डुपट्टा डाल कर फूहड और भद्दा नृत्य करने के साथ सांसदों की नकल उतारी। आज उन्होंने सारी मर्यादाओं को ताख पर रखते हुए प्रधानमंत्री को धृटराष्ट्र कहा। मुझे लगता है कि जो महिला हवाई जहाज के किराए में हेराफेरी करती हो और पकड़ जाए, कम से कम उसे तो ईमानदारी पर भाषण देने का अधिकार कत्तई नहीं है। क्योंकि मेरा मानना है कि उन्हें बड़ा हाथ मारने का मौका नहीं मिला, वरना जैहनियत में बेईमानी तो भरी ही हुई है, वरना हवाई जहाज के किराए में जानबूझ कर धांधली क्यों करती ?

कश्मीर पर विवादास्पद बयान देकर देश भर की आंखों की किरकिरी बने वकील साहब को लगता है कि वो दुनिया के सबसे ज्यादा समझदार आदमी हैं। हालाकि मैं मारपीट को जायज नहीं ठहराता, लेकिन मुझे लगता है कि युवाओं के दिलो दिमाग से अगर ज्यादा खिलवाड़ किया गया तो पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट परिसर में ही जिस तरह से वकील साहब के साथ हाथापाई की गई, वैसी घटनाएं आम हो जाएंगी। बहरहाल इनके टैक्स चोरी के कितने मामले सामने आ चुके हैं और कितनों में इन्होंने टैक्स चुकाया भी। अब ये जनाब प्रधानमंत्री को शिखंडी बता रहे हैं। इस टीम का दिमाग इतना खराब हो गया है कि ये प्रधानमंत्री और मंत्रियों के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं सुनते ही मन करता है कि इनके मुंह पर ......।

ताजा मामला और सुन लीजिए। इस टीम में एक महिला पत्रकार भी हैं। दरअसल न्यूज चैनल इतने ज्यादा हो गए हैं, कि सभी को रात में एक आदमी को गेस्ट के तौर पर चैनल पर बैठाना होता है। इससे इम महिला की लाटरी खुल गई है। टीम अन्ना की कोर कमेटी में शामिल इस महिला पत्रकार का नाम प्रधानमंत्री कि विदेश यात्रा में शामिल पत्रकारों की सूची में शामिल था। लेकिन अब इनका पत्ता कट गया है। वैसे भी या तो आप प्रधानमंत्री के साथ सरकारी यात्रा का मजा ले लीजिए या फिर सड़क पर आकर विरोध कर लीजिए। दरअसल ऐसे लोगों पर सरकार भरोसा भी नही कर सकती। दूसरे देश में जाकर वहां अपने ही प्रधानमंत्री की ऐसी तैसी करने लगें तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। यही वजह है कि इनका नाम प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा में उनके साथ जाने वाले पत्रकारों की सूची से काट  दिया गया। अब बेवजह हाय तौबा मचा रही हैं। अरे भाई जिस  आदमी को आप चोर लूटेरा, बेईमान बता रहे हैं, जिसे सुबह से शाम तक गरियाते नहीं थक रहे हैं, उसके साथ सफर क्यों करेंगी ? चलिए इसका फैसला आप खुद कीजिए।

वैसे टीम अन्ना की बौखलाहट की अंदरुनी वजहें कुछ और हैं। अन्ना और रामदेव की दोस्ती अन्ना की टीम को अच्छी नहीं लग रही है। लेकिन अन्ना इस मामले में स्पष्ट कर चुके हैं कि वो रामदेव का साथ नहीं छोड़ेगे। रामदेव के अभियान को भी अन्ना राष्ट्रहित में मानते हैं। टीम को लग रहा है कि रामदेव की फालोइंग अन्ना के मुकाबले कहीं ज्यादा है। अन्ना और रामदेव अगर मिल गए तो इसका सीधा असर टीम अन्ना के खजाने पर पडेगा। क्योंकि देश विदेश में रामदेव के ट्रस्ट भारत स्वाभिमान को ज्यादा लोग जानते हैं, जबकि इंडिया अंगेस्ट करप्सन की पहुंच अभी उतनी नहीं है। ऐसे में चंदे की राशि में सेंधमारी हो जाने का डर भी टीम अन्ना को सता रहा है। वैसे भी अगर टीम अन्ना के खातों की जांच की मांग उठ रही है तो इसमें टीम को सहयोग करना चाहिए और साफ करना चाहिए कि क्या वाकई उन्हें अमेरिका की कुछ संस्थाओं से चंदा मिल रहा है ? वैसे अमेरिका से चंदा लेने का आरोप काफी समय से टीम अन्ना पर लगता रहता है, और इसका आज तक कोई ठोस जवाब टीम अन्ना नहीं दे पाई है।

और हां टीम अन्ना की बौखलाहट की असल वजह कुछ और है। ये बेचारे 25 जुलाई से आमरण अनशन का ऐलान कर फंस गए हैं। पूरे दिन खान पान का मजा लेने वाली ये टीम दो टाइम भूखी नहीं रह सकती, मजाक मजाक में आमरण अनशन की बात मुंह से निकल गई। अन्ना तो समझ गए कि ये उन्हें भूखा रख खुद टीवी चैनलों के एयर कंडीशनर मे बैठ कर बड़ी बड़ी बातें करते रहते हैं। लिहाजा उन्होंने अपनी खराब सेहत का हवाला देते हुए अनशन करने से इनकार कर दिया है। ऐसे में अब अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी, प्रशांत भूषण और मनीष शिशोदिया को आमरण अनशन पर बैठना है। इन्हें लगता है कि गाली गलौच की भाषा इस्तेमाल कर ऐसा माहौल बना दिया जाए कि सरकार उन्हें आमरण अनशन की इजाजत ही ना दे। लेकिन सरकार भी सोच रही है कि इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता, इन्हें इजाजत दी जाएगी और ऐसी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था भी होगी कि ये अनशन छोड़कर भाग भी नहीं सकते। इस टीम के बदजुबान होने की एक वजह ये भी है।

अब चलते-चलते

दिल्ली के सियासी गलियारे मे आजकल एक चर्चा गरम है। अगर किसी सूबे मे ऐतिहासिक जीत दर्ज करनी है तो टीम अन्ना का बाजा बजाओ। खुल कर जनलोकपाल का विरोध करो। वजह भी जो बताई जा रही है उसमें दम है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने जनलोकपाल का खुला विरोध किया और नतीजा ये हुआ कि उन्होंने यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इतना ही नहीं अपनी बहू डिंपल को निर्विरोध लोकसभा में भेज कर टीम अन्ना की रही सही कसर भी पूरी कर दी। टीम अन्ना सरकार को चेतावनी देती फिर रही है कि 2014 में उसका पत्ता साफ कर देगे, लेकिन ये क्या कर पाएंगे, डिंपल के खिलाफ एक उम्मीदवार तो मैदान में उतार नहीं पाए। निर्विरोध निर्वाचित होकर डिंपल ने इतिहास रच दिया। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूडी को लगा कि लोकपाल बिल लाकर वो जनता का दिल जीत लेगें, इसलिए आनन फानन मे बिल पास करा दिया। बेचारे की सरकार तो गई ही खुद भी चुनाव हार गए। जय हो हाहाहाहहहाहा



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शुक्रवार, 8 जून 2012

To LoVe 2015: बाबाओं के बाप की भी मां निकली राधे मां ...


गता है आप नहीं समझे। चलिए मैं पूरी कहानी बताता हूं। अभी तक लोग निर्मल बाबा की करतूतों को सुनते देखते चले आ रहे थे। अब मार्केट मे धमाकेदार एंट्री की है मुंबई से राधे मां ने। चलिए पहले जान लीजिए कि राधे मां है कौन। बताते हैं कि राधे मां का जन्म पंजाब के होशियारपुर जिले के एक सिख परिवार में हुआ है।  इनकी शादी भी पंजाब के ही रहने वाले व्यापारी सरदार मोहन सिंह से हुई है। शादी के बाद इनका वैवाहिक जीवन ठीक ठाक चल रहा था, परंतु एक दिन इनकी मुलाकात शिव मंदिर के पास महंत श्री रामदीन दास से हुई। उन्होंने इनकी धार्मिक प्रतिभा तो पहचाना। महंत रामदीन के प्रभाव में आने के बाद ये राधे मां बन गईं और कथिक रूप से वह लोगों के व्यक्तिगत, व्यापारिक और पारिवारिक समस्याओं को दूर करने लगी। पहले तो इन्हें ज्यादा लोग नहीं जानते थे, लेकिन अब इनकी दुकान लगभग सभी बाबाओं से बड़ी हो गई है।

आज राधे मां का जलवा देश-विदेश में भी फैला हुआ है। मुंबई में उनके लिए बड़े-बड़े आयोजन किए जाते हैं। इन्हें उनके अनुयायी दुर्गा का अवतार बता रहे हैं। ये न तो कुछ बोलती हैं और न कोई प्रवचन देती हैं, लेकिन इनकी नजरों का कायल हर कोई है। पंजाबी के होशियापुर की रहने वाली इस महिला के आयोजनों में लाखों लोग शरीक होते हैं। शहर भर में बड़े-बड़े बैनर पोस्टर लगाकर इनका प्रचार किया जाता है। अच्छा राधे मां के आयोजन में श्रद्धालुओं को आनंद बहुत आता है। राधे मां दुल्हन की तरह सज संवर कर आती हैं और पूरे समय तक झूमती रहती हैं। उनके मंच के चारो ओर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी झूमते रहते हैं। इस दौरान राधे मां लोगों को अपनी नजरों से अपने वश में करतीं नजर आतीं है।
किसी भक्त पर मां जब बहुत खुश हो जाती हैं तो वो झूमते झूमते उसकी गोद में कूद जाती हैं। माना जाता है कि जिस भक्त की गोद में मां ने छलांग लगाई है वो बहुत भाग्यशाली है और उसकी सभी मन्नतें तत्काल पूरी हो जाएंगी। राधे मां जब गोद में आ जाती हैं तो भक्त दोगुनी खुशी से मां को लेकर नाचता है। मुंबई में आजकल राधे मां के एक के बाद एक आयोजन हो रहे हैं और खास बात ये है कि इसमें तमाम पढे लिखे लोगों के साथ ही सिनेमा जगत के लोग भी मां के दर्शन को आ रहे हैं।

राधे मां ने जब इस धंधे की शुरुआत की थी तो उन्हें पता नहीं था कि कभी उनकी ये दुकान इतनी बड़ी हो जाएगी। कुछ साल पहले राधे मां ने दिल्ली में कई दिन गुजारा। उस दौरान ये दिल्ली के लाजपतनगर मे जिसके घर रुकी हुई थीं, उनके घर का जीना मुहाल हो गया था। लाल टीशर्ट और लाल  ही टाइट सेलेक्स पर जिस तरह फिल्मी धुनों पर  घर में रात बिरात फूहड़ डांस करती फिर रहीं थी, घर के लोग परेशान  हो गए थे। जब लोग मना करते कि ये क्या हो रहा है तो इनके अनुयायी कहा करते थे की राधे मां खेल रही हैं। वैसे वीड़ियों में राधे मां अपने पिछले हिस्से को जिस फूहड़ तरीके से हिलाती दिखाई दे रही हैं, उस तरह का डांस हम गांव में लगने वाले मेलों में देखते रहे हैं। फूहड़ डांस का ही नतीजा है कि एक आयोजन के दौरान दो लड़के राधे मां को किनारे खड़े घूरते रहे। बाद मे जब ये बात इस राधे को समझ में आई तो इन्होंने माइक थामा और जोर जोर से चिल्लाने लगीं, मुझे देखने मत आओ, बस मेरा दर्शन करो। हाहाहाहहा.. इस बहुरुपिया मां को कौन समझाए कि जब आप देखने की चीज बन गई हो तो दर्शन करने कौन आ रहा है।

और हां अब बात प्रसाद की। इस मां का प्रसाद देने का जो तरीका है, उससे उल्टी आने लगती है। एक भक्त  खीर लेकर आता है, ये कथित मां उसमें से एक  चम्मच खीर मुंह में रखती है, पांच सेकेंड बाद वो खीर एक भक्त के हाथ पर उगल देती है और लोग एक एक चावल का दाना प्रसाद के रुप मे ग्रहण करते हैं। इसी तरह इसे कोई भी प्रसाद चढता है तो ये उसे जूठा करती है और गंदे तरीके से भक्तों  के हवाले कर देती है। बाद में उसे ही लोग प्रसाद के रुप में ग्रहण करते हैं। मैने तो जो कुछ देखा और इसके बारे में सुना है, उससे तो यही लगता है कि   ये धर्म की नहीं गंदगी की राधे मां है।

इतना ही नहीं इस  मां को धर्म की एबीसीडी  नहीं आती है, इसीलिए वो पूरे समय खामोश रहती है। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने इंगलिश में दो लाइनें बोल दीं, जिसको लेकर विवाद मचा हुआ है। अब हर मुंबई वासी कह रहा है कि ये तो बाबाओं के बाप की मां निकली राधे मां.।

 निर्मल बाबा छोडेगे बाबागिरी ? 
कल रात का सपना बड़ा भयावह था, देख रहा था कि मैं निर्मल बाबा के सिंहासन पर चूड़ीदार पैजामा और डिजाइनर कुर्ता पहने बैठा हूं और मेरे सामने खुद निर्मल बाबा घिघियाते हुए कह रहे हैं, बाबा मुझे बचाओ। उनकी आंखो से आंसू निकल रहे थे और मैं कह रहा था कि पहले ये बताओ आप कहां से आए हो ? हाथ जोड़े खड़े निर्मल ने कहा बाबा ने कहा पता मत पूछिए, मेरे पीछे पुलिस लगी है। अरे पुलिस को छोड़ो, अब ये बताओ तुम्हारे सामने मुझे आलू के पराठे क्यों दिखाई दे रहे हैं ? निर्मल बाबा बोले बाबा मैने कल रात पराठा खाया था और चार पांच पराठे गरीबों में बांटे भी थे। मैने कहा आपने पराठा किस चीज के साथ खाया, निर्मल बोले बाबा दही के साथ, और गरीबों को क्या दिया ? वो बोले केवल पराठा, बस यहीं कृपा रुकी हुई है। जाओ गरीबों को भी दही के साथ पराठा खिलाओ..। कृपा आनी शुरू हो जाएगी। निर्मल वापस अपनी कुर्सी पर जाने लगे तो मैने उन्हें फिर बुलाया और कहा ये हमारी मुठ्ठी बंद क्यों हो रही है भाई, एक बात बताओ, आपने दुनिया भर के लोगों से दसवंत निकलवाया, क्या आपने खुद दसवंत निकाला। अब निर्मल बाबा समझ गए थे कि गल्ती कहां हुई है और क्यों रुक गई कृपा। बेचारे चुपचाप जाकर पीछे की सीट बैठ गए। मेरे समागम में अगला श्रद्धालु आया तो मेरे सम्मान में कसीदें पढ़ने लगा। बोला

और मेरा कौन है, जो कुछ हैं सो आप हैं।
आप मेरे बाप के भी बाप के भी बाप हैं।।

मैने अपना बायां हाथ थोडा सा ऊपर करके उसे आशीर्वाद तो दे दिया, लेकिन मन ही मन सोचने लगा कि क्या ये मुझे पहचान तो नहीं गया है। क्योंकि शक्ल से तो ये श्रद्धालु बिल्कुल लुच्चा लग रहा है और मुझे अपने बाप का बाप बता रहा है। खैर नींद खुली तो सपने की बात को बड़ी देर तक सोचता रहा। निर्मल बाबा पर दया भी आ रही थी कि उन्हें क्या दिन देखने पड़ रहे हैं। बहरहाल अब मुझे लगता है कि निर्मल बाबा का खेल खत्म होने को है। अपने अजीबो-गरीब और बेतुके सुझावों से भक्तों पर कृपा बरसाने का दावा करने वाले निर्मल जीत नरूला उर्फ निर्मल बाबा के खिलाफ अब जनता ने पुलिस में रिपोर्ट लिखानी शुरू कर दी है और बाबा पर चार सौ बीसी के तहत गिरफ्तारी का खतरा भी मंडरा रहा है। बाबा अपनी बाबागीरी छोड़ने के मूड में आ गए लगता हैं। अपने चर्चित समागमों के द्वारा करोड़ों रुपये डकार चुके निर्मल बाबा ने पहली बार जून महीने के सभी समागम को अचानक रद्द कर दिया। बताते हैं कि बाबा को डर है कि कहीं श्रद्धालु बनकर पुलिस ही समागम में ना आ जाए और उनकी कृपा की दुकान बंद कर गिरफ्तार कर ले जाए।


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मंगलवार, 5 जून 2012

To LoVe 2015: जंजीरा दुर्ग ,मुरुड -महाराष्‍ट्र



जंजीरा  दुर्ग [Pic by Vikas]

 जंजीरा दुर्ग या मुरुड-जंजीरा किले के नाम से प्रसिद्ध यह किला मुरुड गाँव में हो जो की महाराष्‍ट्र राज्‍य के रायगढ़ जिले में स्थित है. अरब सागर में बना हुआ यह किला इतिहास में जंजीरा के सिद्दिकियों की राजधानी के रुप में प्रसिद्ध है.समुद्र की लहरों के थपेडों से अब तक अप्रभावित इस किले में आश्चर्जनक रूप से मीठे पानी का ताल भी है.




मीठे पानी का ताल





 सिद्दिकी लोग

सोमवार, 4 जून 2012

To LoVe 2015: इस अन्ना से बहुत बड़ा है वो अन्ना ... ( पार्ट 2 )


रालेगन सिद्दि में एक अन्ना नहीं है बल्कि अन्ना ही अन्ना हैं। जब तक मैं रालेगन सिद्दि नहीं गया था तो मुझे तो लगता था कि अन्ना गांधीवादी हैं इसलिए टोपी पहनते हैं, पर ऐसा नहीं हैं। उनके गांव में 90 फीसदी लोग टोपी पहनते हैं। टोपी वहां के पहनावे में शामिल है। वैसे आपको बता दूं कि इन टोपी वालो से दूरी बनाए रखना ही ज्यादा बेहतर हैं, क्योंकि मौका मिलते ही ये दूसरों को टोपी पहनाने से नहीं चूकते। मसलन अगर आप ने किसी टोपी वाले से गांव के बारे मे कुछ बात कर ली और उसने आपको पांच दस मिनट गांव के बारे में बताया तो अगले ही पल वो आप से पैसे की मांग करेगा। आप हैरान होकर उसे देखते रह जाएगे।
छोटा सा वाकया बताता हूं, मुझे रालेगन सिद्दि के बगल वाले गांव में एक सामाजिक कार्यकर्ता से मिलना था, मैने टोपी वालों से रास्ता पूछा तो तीन टोपीवाले मेरी कार में सवार हो गए और कहा चलिए मैं पहुंचा देता हूं। मुझे लगा कि ये कितने शरीफ लोग हैं, इतनी मदद कर रहे हैं, खुद वहां पहुंचा रहे हैं। बहरहाल मैं उनके घर पहुंचा, वो घर पर थे नहीं थे, हम वापस रालेगन सिद्धि आ गए। बगल वाले गांव की दूरी पांच किलोमीटर से भी कम रही होगी। हम आधे घंटे से भी कम समय में वापस आ गए, पर जब ये टोपी वाले कार से उतरे तो तीनों ने सौ सौ रुपये की मांग की। मैं हैरान हो गया कि ये क्या कह रहे हैं ये लोग, पर उन्होंने कहाकि हम फोकट यानि बिना पैसे के क्यों आपके साथ दूसरे गांव जाएंगे। बहरहाल मैं दो सौ रुपये उन्हें थमाकर चलता किया।
सदाशिव महापारी
आइये अब बात करते हैं किशन बापट बापूराव हजारे यानि अन्ना की। अन्ना का शुरुआती जीवन बहुत ही विवादित रहा है। गरीबी के चलते अन्ना की पढाई अपने पिता के साथ महज चौथी क्लास तक हुई, बाद में अन्ना को उनकी बुआ ने गोद ले लिया और अन्ना मुंबई आ गए। बुआ के घर रहकर अन्ना ने सातवीं तक पढाई की। बुआ का परिवार भी अभावग्रस्त था, लिहाजा अन्ना दादर के पास फूल बेचने लगे। इससे वो 40-50 रुपये महीने कमाने लगे। लेकिन इस दौरान वो गलत संगत में पड़ गए और युवा अवस्था की जितनी बुराइयां होती है, वो सब अन्ना के अंदर आ गई। सच तो ये है कि अन्ना की इमेज एक गलीछाप गुडे की बन गई। लड़ाई, झगड़ा मारपीट, सिनेमा हाल के बाहर टिकट की ब्लैकमेलिंग इन्हीं सब में अन्ना का समय बीतता रहा। 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान देश में नवजवानों से अपील गई कि वो सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करें। उसी दौरान अन्ना सेना में भर्ती हो गए पर उन्हें ट्रक ड्राईवर का काम मिला। अन्ना की सेना से वापसी कैसे हुई ? इसे लेकर विवाद है, कुछ लोग अन्ना को सेना का भगोड़ा बताते हैं, कुछ का कहना है कि उन्होंने पूरी नौकरी की और उसके बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। बहरहाल सच तो अन्ना ही जानें, लेकिन ज्यादा लोगों का कहना है कि अन्ना सेना से भाग कर ही यहां आए। अन्ना लगातार विवादों में रहे हैं। नौकरी के पहले के तमाम मामलों की छानबीन करती हुई पुलिस अक्सर अन्ना को तलाशती हुई इनके गांव आ जाती थी, बताया गया कि आर आर पाटिल से अच्छे संबंध होने के कारण इनके सभी मामलों का निस्तारण हो गया।
यही वो मंदिर है जहां अन्ना रहते हैं....
सच ये है कि अन्ना पुलिस से बचने के लिए ही मंदिर में शरण लिए हुए थे। पुलिस आती थी तो गांव के लोग इनका बचाव किया करते थे कि वो तो मंदिर में पड़ा रहता है, मंदिर में ही सेवाकार्य करता है। ये कहकर अन्ना को पुलिस से बचा लिया करते थे। खैर अब ये सब बातें पुरानी हो चुकी है। आइये अब मैं आपको मिलवाता हूं गांव के उस अन्ना से जिसकी सब आज भी बहुत रिस्पेक्ट करते हैं और गांव के विकास में जिनका अन्ना से कई गुना हाथ है। इनका नाम है सदाशिव महापारी। सदाशिव 1964 से लगातार 1995 तक गांव के सरपंच रहे हैं। गांव का कोई भी काम हो, सदाशिव सबसे आगे रहे हैं या फिर कहें कि गांव का विकास इन्हीं की देन है तो गलत नहीं होगा। कुछ मामलों का जिक्र करते हैं। गांव में स्कूल बनाने की बात हुई तो सदाशिव ने अपनी जमीन तो दी ही, लोगों को भी इसके लिए तैयार किया। बिल्डिंग बनाने का खर्च भी सदाशिव ने उठाया। शुरुआत में स्कूल में बहुत कम बच्चे थे, तो 50 बच्चों और 10 शिक्षकों को गांव में ही रखकर सदाशिव ने अपने घर से इनके खाने पीने का इंतजाम कई साल तक किया। जब छात्रावास की बात हुई तो अन्ना ने कहाकि पैसे कहां से आएंगे, ये कहकर वो इसका विरोध करते रहे। इन सबके बाद भी सदाशिव ने स्कूल मे पूरा फर्नीचर और बिल्डिंग बनवाने में सरकारी मदद से कई गुना ज्यादा पैसा अपने घर से लगाया। स्कूल को कुछ समय बाद मान्यता मिल गई, लेकिन थोड़े से पैसे सरकार की ओर से मिलते थे, जबकि कागजी खानापूरी इतनी ज्यादा करनी होती थी कि ऊब कर सदाशिव ने मान्यता ही वापस कर दी। नशावंदी के मामले में पहले ही बता चुका हूं कि सदाशिव ने इसमें अहम भूमिका निभाई।
गांव के लोग तो सदाशिव को ही असली अन्ना कहते हैं। लगभग 32 साल से भी ज्यादा समय तक गांव के सरपंच रहने की वजह से हर काम की शुरुआत वही किया करते थे। इस परिवार की इतनी मान्यता है कि आज भी गांव के सरपंच उनके बेटे जयसिंह महापारी हैं। अन्ना पहले जब भी किसी जनसभा या मीटिंग में बोलते थे तो गांव के विकास का पूरा श्रेय  सदाशिव महापारी को दिया करते थे। लेकिन अब अन्ना ऐसा नहीं करते। अब वो अपनी प्रशंसा सुनने के आदि हो गए हैं। हालाकि गांव में अभी भी ये हालत है अगर अन्ना श्रमदान की अपील करते हैं तो 40-50 लोग जमा होते हैं,जबकि महापारी की अपील पर छह सात सौ लोग जमा हो जाते हैं। सदाशिव के सरपंच रहने के दौरान कभी कोई मामला थाने में पंजीकृत नहीं हुआ, लेकिन अब किसी विवाद को लेकर लोग अन्ना के पास जाते हैं, तो वो मामला सुलझाने के बजाए वो लोगों को पुलिस के पास भेज देते हैं।
रालेगन सिद्दि में बना स्कूल 
मैं चाहता हूं कि आप सबको जब भी मौका मिले एक बार अन्ना के गांव जरूर जाएं। अन्ना हर सभा में दावा करते हैं कि वो तो एक मंदिर में रहते हैं, खाने के लिए प्लेट है, एक बिस्तर है। जब ये सुनता हूं तो हंसी आती है। इस मंदिर परिसर में आम लोगों के आने जाने पर रोक है। इसमें सात आठ बहुत ही आलीशान कमरे बने हैं। हर तरह की सुख सुविधा यहां उपलब्ध है। इस पद्मावती मंदिर के भीतर हुए निर्माण पर सरकार के डेढ करोड़ से ज्यादा खर्च हुए हैं, और अभी भी तमाम तरह का निर्माण चल रहा है। अन्ना जिस तरह से मुंह बनाकर कहते हैं कि मैं तो एक मंदिर में रहता हूं, ऐसा लगता है कि वो किसी सड़क छाप मंदिर के बरामदे मे पड़े रहते हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि ये अन्ना बनावटी ज्यादा है, इनका रहन सहन बहुत शानदार है।
अन्ना गांव के ईमानदार लोगों के साथ उठना बैठना पसंद नहीं करते। वो जिस सुरेश पढारे के साथ रहते हैं, हालत ये है कि गांव का एक भी आदमी उसे देखना नहीं चाहता। दरअसल सुरेश एक ठेकेदार रहा है। गांव के स्कूल के नाम पर दो हजार से ज्यादा ट्रक रेत उसने खुले बाजार में बेच दिया। इस पर ग्राम सभा की मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में सुरेश पढारे पर लगे आरोपों को सही पाया गया और सर्वसम्मत से तय किया गया कि आज से कोई भी काम सुरेश पढारे से नहीं कराया जाएगा। इस मीटिंग में अन्ना खुद मौजूद थे। अब सुरेश से काम वापस ले लिया गया, लेकिन अन्ना अगले ही दिन ही उसे गले लगा लिया। आज भी अन्ना का वो सबसे करीबी है। ना ज्यादा खेतीबाडी और ना ही कोई काम। टीम अन्ना दुनिया भर से हिसाब मांगती रहती है, कभी सुरेश पढारे से भी हिसाब मांगे कि उसके हाथ इतने मंहगे मोबाइल एक मजबूत बैंक बैलेंस कहां से है। गांव में एक भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन न्यास है। कहने को तो ये भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई करता है। लेकिन इसकी गतिविधियों पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। आरोप तो यहां तक है कि ये महज ट्रांसफर पोस्टिंग का धंधा बनकर रह गया है। इसके एक पदाधिकारी हैं अनिल शर्मा, ये भी अकूत संपत्ति के मालिक हैं। ये भी पूरे गांव वालों की आंखो की किरकिरी बने हुए हैं, पर अन्ना जी का आशीर्वाद है।
बहरहाल अन्ना के बारे में जिस तरह से हवा बनाई गई, ऐसे में किसी भी जीवंत आदमी के मन में सवाल उठना लाजिमी हैं, इन्हीं सवालों को तलाशता हुआ मैं पहुंचा था रालेगाव सिद्धि। आप हैरान होंगे ये जान कर कि गांव के लोग अन्ना से डरते हैं। नाम का खुलासा करुंगा तो उस आदमी की मुसीबत हो जाएगी, लेकिन उसने बताया कि यहां जो लोग सिर उठाने की कोशिश करते हैं, उन्हें पुलिस से पिटवाया जाता है। इतना ही नहीं अन्ना ने गांव में जिस तरह का विवाद पैसा कर रखा है, ईश्वर उन्हें लंबी उम्र दे, लेकिन सच यही है कि उनके ना रहने पर इस गांव में खून खराबे को कोई नहीं रोक सकता। इन सबके पीछे वजह सम्पत्ति पर कब्जे की होगी। मुझे लगता है कि अन्ना हजारे को इस मामले को बहुत ही गंभीरता से लेनी चाहिए, जिससे ऐसा ना हो कि उनके बाद गांव में खून की होली होती रहे। फिर ऐसा भी नहीं है कि विवादों के बारे में अन्ना को जानकारी नहीं है, उन्हें सब जानकारी है, लेकिन मुश्किल ये है कि उन्हें निष्पक्ष और ईमानदार होना पड़ेगा।

शाम होते ही टल्ली हो जाता है अन्ना का गांव ... ( पार्ट 1)
 
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शनिवार, 2 जून 2012

To LoVe 2015: छलिया तेरा नाम....The great showman Raj Kapoor....


 नीली आंखों का जादूगर..ग्रैट शौमेन..राजकपूर। भारतीय फिल्मों में एक से एक नायाब सितारे जुड़े..पर किसी सितारे में इतने रंग नहीं हैं, जितने अकेले राजकपूर में। महज 24 की उम्र में चंद फिल्मों के हीरो रहे राज कपूर डायरेक्टर, प्रोड्यूसर बनने का जोखिम उठाने से झिझके नहीं। उन्होंने कर डाली एक ऐसे स्टूडियो की स्थापना जिसने हिंदी फिल्मों को रोमांस का अमर पाठ पढ़ाया। फिल्मों को लेकर ऐसा जुनून....विरले ही किसी में देखने को मिलता है। इस आवारा को मैंने जाना दूरदर्शन पर आती फिल्मों से। मेरे पिताजी ने जीवन में एक ही फिल्म देखी थी आवारा...वो भी मजबूरी में....दरअसल पटना के रिजेंट हॉल के मालिक के बेटे निर्माता-निर्देशक शिवेंद्र सिन्हा पिताजी के लंगोटिया यार थे। एक दिन शिबू चाचाजी के पिताजी के कारण दोनों दोस्तों को हॉल में जा कर बैठना पड़ा...और इस तरह मेरे पिताजी ने जीवन की पहली और आखरी फिल्म देखी। तब से राजकपूर के लिए पिताजी के पास सिर्फ एक नाम था....आवारा....और यही नाम सुनकर राजकपूर को पर्दे पर देखना शुरु किया अपन जैसे लोगो ने।
      समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, संप्रदायिकता, तुष्टीकरण जैसे बड़े-बड़े शब्द बचपन से ही आंखों के सामने बहस-चर्चाओं में अपने अर्थ बताते....तो कभी उनका अनर्थ कैसे होता है.....ये सिखाते। ये सब राजकपूर कि शुरुआती फिल्मों में था...शायद ये भी कारण रहा हो राजकपूर से लगाव का। जाहिर है ब्लैक एंड व्हाइट दूरदर्शन पर नीली आंखें तो नहीं दिखती थीं....मगर पता नहीं कैसे फिल्मों का जादू तो बचपन से ही चल चूका था। शायद अखबारों, पत्रिकाओं या फिल्मी किताबों से..या जाने दूरदर्शन से..पक्का नहीं कह सकता। बचपन में सिनेमा हॉल तो जाना नसीब होता नहीं था। आखिर मेरे गांधीवादी पत्रकार पिता को फिल्में देखना वक्त की बर्बादी लगती थी। बचपन में किसी समय यानि 1979 में...जाने किस सिनेमा हॉल में एक फिल्म देखी थी..जिसमें गीत था..चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा....शायद किसी रिश्तेदार के साथ। तब हम दिल्ली के केनिंग रोड पर रहते थे....शिबू चाचा तबतक फिल्मों से दूर हो गए थे....फिल्म “किस्सा कुर्सी का” फिल्म को जलाने से लगे सदमे की वजह से...रहते कहीं मंडी हाउस के पास ही थे....शायद वो भी एक कारण बने फिल्मों से लगाव के। 
       उस समय दूरदर्शन पर फिल्में तो आती थीं...पर आर के बैनर की कोई फिल्म नहीं....तब सुना था कि राजकपूर का मानना था कि पिटे हुए डायरेक्टरों की फिल्में टीवी पर आती हैं...औऱ वास्तव में सिर्फ बॉबी को छोड़कर उनके जीवन में कोई फिल्म टीवी पर नहीं आई थी। बॉबी भी इमरजेंसी के दिनों में या उससे थोड़ा पहले टीवी पर आई थी..और चर्चाओं के मुताबिक किसी बंद को विफल करने के अनेक उपायों मे से एक उपाय के तौर पर बॉबी दूरदर्शन पर दिखाई गई थी...यानि राजनीतिक दवाब। 
     राजकूपर कि शुरुआती फिल्में भारतीय सोच को दिखाती रहीं..हमारे आसपास की दिक्कतों को रुमानी की चाश्नी को लपेट कर हमें हकीकत से रुबरु कराती रहीं। आह...बरसात....आवारा....श्री 420....बूट पॉलिश...बताइए कौन सी ऐसी फिल्म है जिसमें नेहरुवादी समाजवाद नहीं है....कौन सी ऐसी फिल्म है जो तमाम दुश्वारियों के बाद भी सबकुछ ठीक होने की आशा नहीं जगाती। संविधान के पहले पन्ने की पहली लाइन...हम भारत के लोग...क्या नजर नहीं आती इन फिल्मों में। हम भारत के लोग..गरीबी..गुरबत में....समाज के खिलाफ बागी होते तेवरों के बाद भी..क्या वापसी नहीं करते? जापानी जूता...इंगलिस्तानी पेंट और रुसी टोपी के बाद भी खालिस हिंदुस्तानी दिल नहीं रखते। हो सकता है कई लोगों को यह अतिश्योक्ति लगे....पर ये सच हमने अपने आसपास से ही सिखा। भले ही हालात बदतर होते जा रहे हों....पर प्रयास जारी रखने चाहिए..कौन जाने किस भेष में नारायण मिल जाए।
     ज्यादातर हमारे देशवासी उम्मीदों का दिया हमेशा पकड़े रहते हैं..भले ही कोई हमें भाग्यवादी कहकर हमारा मजाक उड़ाए...पर भले की उम्मीद हमें अच्छे की तरफ कदम बढ़ाने कि सोच देती है। यही इस जोकर ने भी किया....परदे पर कमर्शियल होने के बाद भी...मंनोरंजन के ताने-बाने में भी समाज को नहीं भूला....
      आज भी “प्यार हुआ इकरार हुआ” गीत जब बजता है अपना दिल तो बस धड़कने लगता है....आंखों में कोई न कोई...कुछ न कुछ तैरने लगता है। खैर जिंदगी का फलसफा तो मैं सीखता रहा कई लोगों से....ठीक गुरु दत्तात्रेय के चालीस गुरु की तरह...तो मेरे जैसे मामूली इंसान को कुछ समझाने वालों में....हंसाने वालों में....कुछ बताने वालों में...ये जोकर ..ये छलिया ..ये अनाड़ी ....ये ग्रैट शौमेन भी है।
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