रविवार, 19 फ़रवरी 2012

To LoVe 2015: Leander Paes First Grand Slam

GK highlights:
  • Veteran star Leander Paes become the first Indian to complete a career Grand Slam 
  • He win the Australian Open men’s doubles title
  • His fellow name  Radek Stepanek
  • The opponents are:Bob and Mike Bryan World No. 1 pair players
  • Indo—Czech pair played tremendously to win 7—6(1) 6—2  summit clash, which lasted 1 hour and 24 minutes.

     
  • SomePoints:Paes  reached the Australian open final 3times but lost on all ocassions - twice to the Bryan brothers.

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To LoVe 2015: आसान नहीं है गुंडाराज की वापसी ...


यूपी चुनाव की सरगरमी बढ़ती जा रही है, सभी लोग अपनी अपनी तरह से चुनाव नतीजों को लेकर कयास लगा रहे हैं। ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की है जो समाजवादी पार्टी की सरकार बनवा रहे हैं, जो थोड़ा संकोच कर रहे हैं, उनका कहना है कि सरकार तो समाजवादी पार्टी की ही बनेगी, बस देखना ये है कि वो अकेले सरकार बनाते हैं या फिर उन्हें कांग्रेस और आरएलडी की जरूरत पड़ती है। नतीजे कुछ भी हों, पर देखा जा रहा है कि मायावती को लेकर पूरे प्रदेश में भारी नाराजगी है। वैसे ये गुस्सा भी बेवजह नहीं है, गुस्से की मुख्य वजह है कि पूरे प्रदेश में कोई काम हुआ ही नहीं है।

मायावती की अगुवाई में बेईमानों का एक गिरोह सरकार में बना रहा, और चुनाव आते आते खुद मायावती भी समझ गईं कि उनके मंत्री निकम्में है, यही वजह है कि एक के बाद एक मंत्री को वो बाहर का रास्ता दिखातीं रहीं। हालाकि बेईमान मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने में देरी हो चुकी थी, क्योंकि कई मंत्री लोकायुक्त की जांच के दायरे में आ चुके थे। शुरु में माना जा रहा था कि यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच मुख्य लड़ाई होगी। हां अगर पूरे प्रदेश में एक ही दिन वोटिंग होती तो समाजवादी पार्टी बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब भी हो जाती। लेकिन मैं देख रहा हूं कि अब समाजवादी पार्टी का रास्ता आसान नहीं है।

यूपी में लगभग पांच हजार किलोमीटर का सफर और 50 से ज्यादा जिलों तक घूमने के बाद मै इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि पहले दो चरण के मतदान में बेहतर प्रदर्शन के के बाद समाजवादी पार्टी के लिए अब कुछ मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। शुरू में तो ऐसा लग रहा था कि सूबे में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। लेकिन समाजवादी पार्टी के पक्ष में हवा चलते ही सिर्फ आम आदमी ही नहीं व्यापारी, डाक्टर, नौकरशाह तमाम लोगों के कान खड़े हो गए और ये लामबंद होकर  एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश में जुट गए कि अगर ऐसा हुआ तो सब बर्बाद हो जाएगा। अभी तक प्रदेश में बेईमान सरकार थी और अब तो गुंडाराज कायम होने जा रहा है। इस हालात में तो लोगों का घर से निकलना बंद हो जाएगा, अच्छे प्रैक्टिस करने वाले डाक्टरों को यूपी छोड़कर दिल्ली की ओर रुख करना होगा, जेल से गुंडे छूटने लगेंगे और सड़कों पर महिलाओं का निकलना मुश्किल हो जाएगा। आज पूरे प्रदेश में ऐसी हवा चल रही है कि गुंडाराज को रोकना है, अब गुंडा राज को रोकने की बात हो तो जाहिर है कि लोगों को विकल्प तलाशना होगा। यूपी में विकल्प बीजेपी के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता। वैसे भी मैने देखा है कि उत्तर प्रदेश में जब भी समाजवादी पार्टी मजबूत होती है तो बीजेपी अपने से मजबूत हो जाती है, या बीजेपी मजबूत होती है तो समाजवादी पार्टी की ताकत खुद ही बढ़ जाती है।

समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा गुंडाराज का दाग मिटाना उसके लिए आसान नहीं है। हालाकि पिछले दिनों बाहुबली नेता डी पी यादव को पार्टी में शामिल करने के सवाल पर हुए विवाद के बाद लग रहा है कि पार्टी बाहुबलियों से दूरी बनाए रखेगी, लेकिन ऐसा कब तक होगा, विश्वास के साथ कहना मुश्किल है। मुलायम के राज में यादव दरोगा अपने एसपी  को कुछ नहीं समझता था, हालत ये थी कि एसपी अपने ही दरोगा से डरता था और अपनी सिफारिश उसी के जरिए कराता था। अगर मैं एक लाइन में कहूं कि उस समय कानून का राज पूरी तरह खत्म  हो गया था, तो गलत नहीं होगा। मायावती से परेशान लोग जब मुलायम के गुंडाराज के बारे में सोचतें हैं तो उनकी रुह कांप जाती है, यही वजह है कि पहले दो चरण में बहुत अच्छा प्रदर्शन करने वाली समाजवादी पार्टी के लिए आगे का सफर बहुत मुश्किल भरा है। वैसे कुछ भी हो जाए, कितना भी उसके खिलाफ प्रचार हो जाए, लेकिन समाजवादी पार्टी और दलों के मुकाबले अच्छी बढ़त बना चुकी है और उसके खाते में 160 से अधिक सीटें आनीं लगभग तय है।

इस पूरे चुनाव में अगर किसी के लिए अच्छी खबर है तो वो है बीजेपी के लिए। लेकिन ऐसा नहीं है कि नीतिन गडकरी, राजनाथ सिंह कमाल कर रहे हैं, या फिर उमा भारती का जादू चल रहा है। बस समाजवादी पार्टी के गुंडाराज को सोच कर लोगों ने बीजेपी की ओर रुख कर लिया है। वैसे तो बीजेपी की हालत ये है कि उनके प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही की ही जीत आसान नहीं है, पार्टी में सिर फुटव्वल किसी से छिपी नहीं है। बीएसपी से आए बाबूलाल कुशवाह के मामले को लेकर विनय कटियार सरीखे नेता खामोश बैठे हैं। पार्टी में अहम का टकराव चरम पर है, पर यूपी के बड़े नेताओं को पता है कि अगर सूबे में अपनी नाक बचानी है तो कुछ सीटें भी जीतनी जरूरी है। यही वजह है कि लगे तो सब हैं, पर कितने मन से कौन लगा है ये सबको पता है। दिल्ली के ड्राइंग रूम नेताओं की सभा यूपी में लगाई जा रही है, जो 10 वोट इधर उधर नहीं करा सकते, वो यूपी के आसमान में उडन खटोला लिए कुलाचें मार रहे हैं। बहरहाल कुल मिलाकर आज ये हालत है कि बीजेपी 75 प्रतिशत सीटों पर कड़ी टक्कर दे रही है और 90 से 100 सीटों को जीतने के करीब पहुंच चुकी है।

इस बार हम बीएसपी से किसी तरह की अप्रत्याशित परिणाम की उम्मीद नहीं कर सकते। पार्टी की छवि पर जो धब्बा लगा हुआ है, उसे धोना मायावती के लिए आसान नहीं है। हम कह सकते हैं अब बहुत हो गया। आइये कुछ जिलों  की चर्चा कर लेते हैं। 2007 में बीएसपी ने बलिया में 6 सीटें जीतीं थी, इस बार सिर्फ एक सीट की उम्मीद है। यहां चार सीटें समाजवादी पार्टी और दो बीजेपी के खाते में जाने वाली हैं। आजमगढ में भी पिछले चुनाव में बीएसपी को 6 सीटें मिलीं थी, इस बार बमुश्किल उसे एक सीट मिल सकती है, यहां भी पांच सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में जा रही है, जबकि एक बीजेपी को मिल सकती है। जौनपुर में बीएसपी की पांच सीटें थीं, इस बार दो ही हाथ हाने वाली है, अमेठी में एक थी वो भी नहीं मिलने वाली। सुल्तानपुर में बीएसपी की चार थीं दो मिल  सकती है। सबसे तगड़ा झटका बीजेपी को इलाहाबाद से लगने जा रहा है, यहां उसकी आठ सीटें थीं, दो ही वापस मिलने वाली हैं। यहां बीजेपी को चार और चार ही समाजवादी पार्टी को मिल सकती है।
यहां हमने कुछ जिलों का जिक्र करके वो ट्रेंड बताने की कोशिश की है, जो यूपी में देखा जा रहा है। अगर हम कुछ और जिलों का जिक्र करें तो बाराबंकी, फैजाबाद, बहराइच,गोंडा, बलरामपुर, गोरखपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र, भदोही, फतेहपुर, कानपुर, बांदा, झांसी, आगरा, मथुरा, मेरठ समेत तमाम और जिलों में बीएसपी  को जहां भारी नुकसान हो रहा है, वहीं समाजवादी पार्टी को फायदा हो रहा है। जबकि कई सीटों पर बीजेपी भी मुकाबले में आ गई है। वैसे इन तमाम निगेटिव वोट के बाद भी बीएसपी का अस्तित्व पूरी तरह खत्म नहीं होने जा रहा है, यहां 70 से 80 सीटें बीएसीपी को मिल सकती है और  उसके हाथ में सरकार की चाभी हो सकती है।

आप सोच रहे होंगे कि अभी तक मैने कांग्रेस की कोई बात ही नहीं की। सही बात तो यही है कि यूपी में भी कांग्रेस की कोई बात नहीं कर रहा है। कांग्रेस की बात दिल्ली में हो रही है। वो भी इलेक्ट्रानिक मीडिया में। दरअसल इलेक्ट्रानिक मीडिया राहुल  को लेकर बहुत गंभीर है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के ज्यादातर कर्ताधर्ता जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं, उन्हें लगता  है कि राहुल गांधी इतने दलितों के यहां जाकर भोजन कर चुके हैं, इसलिए दलित तो राहुल को ही वोट देगें। मैने एक दलित से पूछा कि भाई आपके यहां राहुल गांधी आकर भोजन कर गए और आप उन्हें वोट नहीं देगें। वो बोला अरे हमने उन्हें भोजन कराया है, उनका भोजन किया थोड़े ही है, उनका कोई हम पर अहसान थोड़े है। वोट उसे देगें जिसे ठीक समझेंगे। खैर बात तो इसकी भी सही है। इसके अलावा कांग्रेस मुस्लिम वोटों को रिझाने के लिए जिस तरह नंगई पर उतारू रही, इससे खुद मुसलमान कांग्रेस से नफरत कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि कांग्रेसी हमें वोट बैंक समझते हैं और चौराहे पर खड़ा करके हमारी इज्जत तार तार कर रहे हैं। वो खुद कहते हैं कि आरक्षण का मुद्दा सलमान खुर्शीद ने उस समय क्यों नहीं उठाया जब चुनाव आचार संहिता लागू नहीं हुई थी। सुर्खियों में आने और बीबी के लिए वोट  बटोरने के लिए उन्होंने ये घटिया बयान दिया। कांग्रेस ने बेनी प्रसाद वर्मा पर भरोसा किया और लगभग 80 टिकट उनके कहने के अनुसार दिए। हालत ये है कि बेनी बाबू अपने बेटे राकेश को ही जिता लें तो उनके लिए बड़ी सफलता होगी। जगदंबिका की सिफारिश तो नहीं चली, लेकिन वो भी अपने बेटे को टिकट दिलाने में कामयाब हो गए। पर बेटा बेचारा चक्रव्यूह में फंस गया है। जो हालात हैं, उससे तो लगता है कि सलमान एक बार फिर बीबी को लखनऊ पहुंचाने में कामयाब नहीं हो पाएँगे। लेकिन मरी गिरी हालत में भी कांग्रेस 2007 से बेहतर प्रदर्शन करेगी और वो 40-45 सीटें जीतने में कामयाब हो जाएगी। चौधरी अजित सिंह के सरकार में शामिल होने से जाट बहुत नाराज हैं। पर आखिर जाट जो जाट ही हैं, वो आखिर में जाट के पक्ष में ही जाएंगे और 10 से 12 सीटें चौधरी के खाते में आ सकती हैं। लेकिन चौधरी के बेटे जयंत जीतेंगे ये कहना मुश्किल है।

यूपी में कई बार छोटे दल बड़ी भूमिका में आ जाते हैं। सोनेलाल पटेल के बाद अब अपना दल का दम निकल चुका है। हालाकि इसमें जान फूंकने की बहुत कोशिश हो रही है, पर मैदान में कही दिखाई नहीं दे रहा है अपना दल का दम। हां दो एक बाहूबली  अपने दम पर जीत हासिल कर लें तो ये अलग बात है। लेकिन अपना दल का जो जनाधार तेजी से बढ़ रहा था, वो अब कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। इस बार चुनाव में पीसपार्टी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कहा तो ये जा रहा है कि पीस पार्टी को भगवाधारी फंडिंग कर रहे हैं, जिससे वो मुसलमानों  के वोटों को काटे और इसका फायदा भगवा उम्मीदवारों को मिले। इस बात में कितनी सच्चाई है, ये तो पीसपार्टी के कर्ताधर्ता  ही बता सकते  हैं। लेकिन ये बात को जानना जरूरी है कि इस पार्टी को फंड  कहां से मिल रहा है। वैसे इतना तो जरूर है कि पीसपार्टी की चर्चा पूरे चुनाव में है। भले लोग इसे वोट कटुवा पार्टी  ही क्यों ना कहें। लेकिन दो तीन सीटें पीसपार्टी के खाते में आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उलेमा काउंसिल लगभग खत्म हो चुकी है, इस चुनाव के बाद अब इसका कोई नाम लेवा नहीं रहेगा।

सोमवार यानि कल अब मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर रुख कर रहा हूं। इसमें मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, बदायूं, बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर और आखिर में लखीमपुर जाना है। 29 फरवरी को पूरे प्रदेश का भ्रमण खत्म हो जाएगा। उसके बाद मैं एक बार फिर आपके साथ चुनाव के रुझान के साथ मौजूद रहूंगा।  
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बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

To LoVe 2015: ये इश्क और मेरा आवारापन

इस वैलेंटाइन डे पर काफी अवारागर्दी की...क्या देखा..क्या पाया..ये तो बता नहीं सकता..पर प्यार के आवरण में ढका मैं अवारगी करता रहा...औऱ जो रंग दिखा...उसे कुछ कुछ आपके संग बांटने चला आया........................


http://tomodacy.com/views/love-pictures-for-valentines-day.html
’सर हम दिया तो रोज ही जला सकते हैं...फिर दिवाली पर ही खास क्यों...जैसे दिवाली खास दिन होती है न...बस सर ऐसे ही आज प्यार का खास दिन है....”.कुछ ऐसा ही था संवाद यानि डॉयलॉग ..सोनी टीवी के सीरियल ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ में....कितना आसान कितना सिंपल.....अक्सर ऐसे ही जवाब मिल जाते हैं कई बेसिर पैर सवालों के...। प्यार कितना पवित्र औऱ आसान होता है....जो आसानी से खुद की व्याख्या कर देता है....पर हम समझ कर भी समझने को तैयार नहीं होते। वैसे इस डॉयलॉग को सुनकर लगा जैसे मेरी उस सारी कवायद का उपसंहार हुआ जो अनायास शुरु हो गया था...
      वेलेंटाइन से एक दिन पहले अखबार में एक खबर पढ़ी...एक समारोह में 40 ऐसे जोड़े बुलाये जा रहे थे...जिन्होंने अपने जीवनसाथी को अंगदान किया था....मगर एक अजीब सा संयोग था इस कार्यक्रम में आमंत्रित इन सभी जोड़ों में...इन सभी जोड़ों में पत्नी ने ही लीवर या किडनी देकर अपने पति का जीवन बचाया था...। खबर के मुताबिक कार्यक्रम से जुड़े डायरेक्टर डॉक्टर सिंह का कहना था कि पत्नियां हमेशा पहल करती हैं अपने पती को बचाने के लिए।.....मगर ये खबर औऱ डॉक्टर के कहे शब्दों को दिल ने कबूल नहीं किया। लगा जैसे वेंलेटाइन डे पर अनजाने में पती का प्यार नज़रअंदाज हो गया हो....। लगा की इस खबर में प्यार को लिंगभेद में बांट दिया गया है.....ख़ैर  बैलेंनटाइन डे था..इसलिए मैने सोचा जरा वैलेंटाइन डे पर देंखूं कि कौन करता है प्यार सबसे ज्यादा...।
        पहली बार संयोग से प्यार के दिन छुट्टी थी। सो दिन में बारह बजे तक बिस्तर तोड़ता रहा... लेकिन दुपहरिया की गुनगुनी धूप में निकल पड़ा बाजार कि तरफ कुछ किताबें खरीदने के लिए...या शायद खिन्न मन निकला था जवाब तलाशने.....। बाहर हर तरह का जोड़ा था..हर समय का जोड़ा था....आज का जोड़ा...होने वाले कल का जोड़ा...बीते कल का जोड़ा..। जोड़ों के बीच मस्ती से टहलता हुआ....मैं कभी किसी रेस्तरां में बैठा..तो कभी बाहर किसी पार्क में...। हर तरफ प्यार फैला था...जिनको ठीक से पता नहीं था वो भी आज सेलिब्रेट कर रहे थे..जो जानते थे प्यार का मतलब..उनके बारे में तो पूछिए ही मत। इसी तरह टहलते हुए एक जोड़े से टकराया....ऐसा जोड़ा जो उम्र के बंधन को तोड़कर साथ हुआ। दस साल पहले 20 साल की लड़की और 33 साल का पुरुष...हमराही बने...आज भी 13 साल का फासला नजर नहीं आता। मेरी अवारगी रवानगी पर थी..सो मैं आगे चल पड़ा....शाम गहराने लगी थी...और प्यार के जोड़े हर जगह छाने लगे थे।
     प्यार की इस बयार के बीच पहली बार ऐसा हुआ जब पूरे समाचार जगत से दूर रहा। कहां प्यार पर पहरा पड़ा..कहां प्यार पर हमला हुआ..इससे कोई मतलब नहीं रखा। खजुराहो और मदोनोत्सव के देश में पोगापंडितों और कट्टरवादियों का जोर..कैसा विरोधाभाष। अब ये संयोग था या नियति...मैं दूर की खबरों से दूर रहकर अपने आसपास की बयार के बीच टहल रहा था।
         मैं टहलता रहा..,,चलता रहा...इस बाजार से उस बाजार..एक रेस्तरां से दूसरे रेस्तरां...। कहीं कोई टकराया..कहीं कोई...इसी अवारगी में  मैं मुस्कुराती नाज़िया और उसके पति हेमंत से टकरा गया....ये जोड़ा आज से चार साल पहले धर्म के बंधन को तोड़कर एक हुआ था..औऱ जल्दी ही दोनो के परिवार ने इस रिश्ते को मंजूरी दे दी। मैं सोच रहा था कि इस जोड़े में पति-पत्नी दोनो ही मध्यमवर्गीय...छोटे शहर से निकले हुए। फिर कैसे इनके परिवारों के दिल इतने बड़े निकले। मुस्लिम लड़की के माता पिता को हिंदू दामाद अपनाने में कोई समस्या नहीं।
   आगे स्कूल और कॉलेज के प्यार को देखते हुए मैं बढ़ता रहा...तभी दिखा प्यार का एक नया रंग.....पारिवारिक प्यार....एक रेस्तरां में बैठा हुआ था...जहां एक पूरा परिवार दादा-दादी से लेकर पोते-नाती तक..सब टेबलों पर जमे थे...तभी साथ के टेबल से अचानक थोड़ी तेज....लेकिन हैरत भरी आवाज कानो से टकराई...‘’’सर आप’’’’...देखा तो चमकीली आंखों वाली दीप्ती थी.....पूरे परिवार के साथ....पती, बच्चे, सास-ससुर..सभी...पता चला सब मिलकर वेलेंटाइन डे सेलिब्रेट करने आए हैं....वहीं पर वो मुझे भी प्यार  बांटने लगे...मुझे अकेला समझ कर अपने साथ खाने की दावत में शामिल होने का न्यौता दे बैठे...पर अपन तो अवारगी में रमे थे....आवारगी में कभी कोई अकेला नहीं होता...सो मैं फिर निकल पड़ा। 
        दिन बीता..रात गई..सुबह हुई...फिर समाचार पत्र हाथ में.....एक नई खबर से रुबरु हुआ। एक दिन पहले अंगदान करने वाले जोड़ों की खबर का छुटा हुआ हिस्सा नजर आ रहा था अखबार के पेज पर...दो दिन पहले पढ़ी खबर की कसक दूर होने वाली थी...खबर थी अंगदान करने वाले तीस के लगभग जोड़ों के एक समारोह में जुटने की...। इसमें 16 जोड़ो में पति था जिसने अपनी पत्नी को अंगदान करके प्यार की परिभाषा को साकार किया था।   सच है....प्यार करने वाला कोई भी हो सकता है...आदमी-औरत...कोई भी..बस प्यार करना आना चाहिए। चाहे.कितनी भी आधुनिकता आ जाए..सुपर फास्ट प्यार हो जाए....पर बिना किसी आशा के, बिना किसी शर्त के ही प्यार होता है..औऱ यही प्यार होता है जो हर सवाल को बौना कर देता है..हर दीवार को गिरा देता है...।

जैसा कि गालिब.....बुलाते हैं..प्यार वालों को निमंत्रण देते हैं...

ये इश्क नहीं आसां
एक आग का दरिया है
और डूब के जाना है...

औऱ अगर ये प्यार न होता....तो न तो हमारे हाथ में मोबाइल होता...न ही एनी टाइम मनी यानि एटीएम मशीन होती....। कई लोग जानते होंगे इस बात को...। अगर नहीं..तो कोई बात नहीं अगली पोस्ट में दोनो की कहानी ... पढ़ना न भूलना..। यानि प्यार की पोस्ट का सिलसिला जारी है।
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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

To LoVe 2015: पेप्सी का बाप है फैंटा ...

यूपी के चुनावी चौपाल का आज 22 वां दिन है, इस दौरान आईबीएन 7 की टीम ने लगभग पांच हजार किलो मीटर का सफर पूरा कर लिया है और अब तक 35 जिलों में हम दस्तक दे चुके हैं। इसमें 19  जगहों पर हम चौपाल लगा चुके हैं। सफर का अंत महीने की आखिरी तारीख यानि 29 फरवरी को लखीमपुर से होना है। तब तक हम लगभग 10 हजार किलोमीटर से अधिक सफर कर चुके होंगे।
दरअसल आज ये बात करने का मन इसलिए हो रहा है कि यूपी के हालात देख कर वाकई आंसू निकल आते हैं। चुनावी  चौपाल के लिए जब आफिस में टीम बनाई जा रही थी, तो इस टीम में मेरा नाम इसलिए शामिल किया गया कि मैं यूपी का रहने वाला हूं और यूपी को बहुत अच्छी तरह से जानता और समझता हूं। मैं  भी  अभी तक यही मानता था कि मैं यूपी को अच्छी तरह से जानता हूं। लेकिन सच बताऊ, आज मेरी आंखे खुल गईं है, कसम से मैं यूपी को बिल्कुल नहीं जानता और ना ही मैने अभी तक यूपी को करीब से देखा था। लग तो ये रहा है कि मैने सिर्फ वही चीजें देखीं है, जो मुझे दिखाई गई है।

यूपी के हालात के बारे में चर्चा कहां से शुरू करुं, मैं तो यही नहीं समझ पा रहा हूं। दिमाग पर काफी जोर डाल रहा हूं कि कुछ तो अच्छी बातें मिल जाएं, जिससे मैं अपने प्रदेश की नाक बचा लूं, पर नहीं.. कुछ भी यहां ऐसा नहीं है, जिस पर मैं गर्व कर सकूं और आपके सामने जोरदार तरीके से सूबे की तारीफ करूं। चूंकि ये सफर सड़क के रास्ते चल रहा है, तो बात पहले सड़कों की ही कर ली जाए। सड़कों की बात होती है तो कहा जाता है कि सबसे ज्यादा खराब सड़क बिहार की है, मुझे लगता है कि अब ऐसा नहीं होगा, खराब सड़कों की बात हो तो यूपी पहले नंबर पर ही होगा। वैसे भी हम लोग खराब सड़कों पर सफर करने से हम सब कमर दर्द से परेशान हैं। हालत ये है कि हम सब रात में पेनकिलर लेकर किसी तरह सोने को मजबूर हैं। मेरी तो नींद उड़ गई है और लिहाजा देर रात तक तो गपबाजी करते हुए बीताना पड़ता है।

वैसे एक एक समस्या के बारे में चर्चा करुंगा तो मुझे लेख नहीं बल्कि किताब लिखनी होगी। इसलिए मैं संक्षेप में बता दूं कि सूबे के एक बड़े हिस्से में दूषित पेयजल  होने से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। स्वास्थ सेवाएं पूरी तरह पटरी से उतर चुकी हैं। शिक्षण संस्थाओं का भारी अभाव है। ज्यादातर जिले या तो उद्योग शून्य हैं, या फिर वहां चल रहे काम धंधे बंद होने के कगार पर हैं। माफ कीजिएगा लेकिन सच ये है कि गांवो  में विकास की बात करना बेईमानी है। मुझे लगता है कि जब प्रदेश में छोटे छोटे बच्चों के शरीर पर इतनी ठंड में पूरे कपड़े ना हों और प्रदेश की सरकार बड़े बड़े विज्ञापन देकर तरक्की की बात कर रही हो तो लगता है कि इन नेताओं के भीतर जो दिल धड़कता है वो असली नहीं है, बल्कि आर्टिफीशियल है, जो बैटरी के जरिए धड़कता रहता है।

बहरहाल सूबे में विकास की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं। मैं दो ऐसे जिलों की चर्चा करना चाहता हूं, जिस जिले के नेता प्रधानमंत्री तक हुए हैं। पहले चर्चा करते हैं यूपी के बलिया जिले की, जहां के नेता स्व. चंद्रशेखर जी देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। बलिया के मुख्यालय पर हमारी चौपाल एक स्कूल में लगनी थी और अगले दिन हमें जौनपुर के लिए रवाना होना था। रात बलिया में कटनी थी, हमने यहां पता किया तो बताया गया कि सबसे बेहतर होटल स्टेशन के पास है, जिसका नाम होटल पेप्सी है। नाम से लगा कि अच्छा  होटल  होगा, चलो रात शुकून से बीत जाएगी। लेकिन नहीं, कमरे घुसे तो नाक बंद करनी पड़ी। बिस्तर पर दाग धब्बे वाले चादर  बिछे  हुए थे, पूरे कमरे से बदबू आ रही थी। रात काटना तो दूर कुछ मिनट खडा होना भी यहां मुश्किल था। हमारे लिए तो  वहां के मित्रों का आग्रह था कि मैं उनके घर जाकर रुकूं, पर टीम को छोड़कर अकेले कहीं जाना ठीक नहीं लगा। बहरहाल इसी कमरे में अगरबत्ती जलवाने के बाद कमरे में बैठना संभव हो पाया। इस कमरे में खाना खा पाना तो  संभव ही नहीं था, लिहाजा लोगों ने इतनी रात तक ड्रिंक्स किया कि उन्हें पता ही ना चल पाया कि हम सब कहां सो रहे हैं।
बलिया के पेप्सी के बाद कई शहरो से होता हुआ हमारा काफिला एक बार फिर ऐसे जिले में पहुंचा जिस जिले ने देश को प्रधानमंत्री दिया है। ये जिला है फतेहपुर और यहां से स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह सांसद रहे और प्रधानमंत्री भी बने। बताया गया कि होटल विशेष यहां का सबसे अच्छा होटल है। हमें प्रतापगढ़ से फतेहपुर आना था, हमारी टीम सुबह ही निकल गई और होटल पहुंची तो सब हैरान रह गए। दोपहर बाद जब मैं फतेहपुर पहुंचा तो मेरे एक मित्र ने कहा कि सर ये होटल तो पेप्सी का बाप यानि फैंटा है। मानों  पैरों तले जमीन खिसक गई हो। होटल में अंदर जा रहा था तो  देखा कि मेरे कमरे के सामने एक आदमी साबुन से हाथ धो रहा था, पूछने पर पता चला कि वो फ्रेश होकर आया है और यहां वासवेसिंग नहीं है, इसलिए वो यहीं  हाथ धो रहा है।

बहरहाल यूपी के इस थका देने वाले सफर से हम सभी को तमाम नई नई जानकारी मिल रही है। दिल्ली में बैठकर विकास की तमाम बाते होती हैं, बड़ी बड़ी योजनाओं पर चर्चा करते हुए कहा जाता है कि इसका लाभ गरीबों को मिल रहा है। लेकिन मैं आज भी इसी मत का हूं कि विकास नापने का जो पैमाना सरकार के पास है, उसे बदल दिया जाना चाहिए, क्योंकि विकास के दावे खोखले हैं, इसमें कत्तई सच्चाई नहीं है। मेरी कोशिश है कि मैं आपको इस यात्रा के दौरान होने वाले अनुभवों को जरूर शेयर करुं। मेरा सवाल है कि जब मुझे इन जिलों के सबसे अच्छे होटल में रात बितानी मुश्किल है, तो ये बेचारे जिनके सिर पर छत नहीं है, जेब में धेला नहीं है, बच्चों के तन पर कपड़े नहीं है, महिलाएं घर गृहस्थी के साथ बोझा ढोने को मजबूर है तो फिर विकास की बात करना बेईमानी नहीं तो क्या है।
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शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

To LoVe 2015: Important NEWS: Weekly Current Affairs and General awareness questions

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Lets Start a New Beginning for Open Source


Hello My dear Friends Just giving you the important update that I provides you on this blog . Now its Time for New Year Celebration with new Resolution in Mind and now its Time to roll out the Issues and Possible the Reality your Dreams, Just a new Innovative Website and its Content waits for you So here I introduce new Free Source of information that always keeps you happy and stay update. :)

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    "Weekly Current Affairs and General awareness questions now in new Platform new format"


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    शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

    To LoVe 2015: फिर पड़ोस में आग..सावधान

    
    कभी-कभी पड़ोसी देशों की उथल-पुथल मुझे परेशान कर देती है। दरअसल इन पड़ोसी देशों की वजह से हमारे देश में काफी मुसीबतें हैं। आजकल हिंद महासागर में बसे हमारे छोटे पड़ोसी देश मालदीव की हालात खस्ता है। ये भारतीय उपमहाद्वीप कि विंडबना है कि हमारे सभी पड़ोसी देशों में लोकतंत्र से ज्यादा बंदूक की ताकत है। धार्मिक कट्टरता भारत के चारों तरफ खतरनाक तरीके से हावी है...जिसका सीधा असर भारत में भी हो रहा है। हमारी यहां सारी आतंकवादी घटनाएं लगभग इसी का परिणाम हैं। देखा जाए तो श्रीलंका को छोड़कर सभी पड़ोसी देशों में लोकतंत्र की हालत खस्ता है। बांग्लादेश में पिछले महीने ही तख्ता पलट की बड़ी साजिश का पर्दाफाश हूआ था। बेशर्मी तो ये है कि इसमें सेना के कुछ अफसर थे। जो इस्लामी कट्टरवाद के समर्थक हैं।  बांग्लादेश में विपक्षी पार्टी ही लोकतंत्र को कमजोर करने का काम कर रही है। उधर नेपाल अब तक चीन की माओवादियों विचारधारा के चंगुल में फंसा हुआ है। जो न तो उससे निगलते बन रहा है न उगलते। हालांकि बर्मा में लोकतंत्र बंदूक के साये में चलने की कोशिश कर रहा है। पर लोकतंत्र की जड़ को वहां मजबूत होने में समय लगेगा। रह गया पाकिस्तान..तो उसके बारे में कुछ भी कहना बेकार है।
        हमारी सबसे बड़ी मुसीबत ये है कि पड़ोसी देशों से हमारे यहां मुख्यत आतंकवादियों....हत्यारों की टोली और धार्मिक कट्टरवाद की आमद ही अधिक होती है। जिसकी  वजह से हमारे देश के कुछ युवा भी दिग्भर्मित हो जाते हैं और देश से गद्दारी करने से बाज नहीं आते। चिंता की बात तो ये है कि इनमें पढ़े लिखे लोग भी शामिल पाए गए हैं। हालांकि मालदीव से इस तरह के किसी खतरे की गुंजाइश हमारे लिए काफी कम है।
         हिंद महासागर में बसे करीब तीन लाख से अधिक आबादी वाले मालदीव में बहुसंख्यक आबादी सुन्नी मुस्लामों की है। पर इनमें कट्टरपन इस तरह हावी नहीं रहा है। यही इस देश की अबतक की खासियत रही है। पर अब हालात में कुछ बदलाव देखने को मिल रहे हैं..जो अच्छे संकेत नहीं है। खबरों के मुताबिक अरब देशों के पैसे की सहायता से मालदीव में लोकतंत्र पर हमला हो रहा है। चंद दिन पहले ही मालदीव के राष्ट्रपति नाशीद को पुलिस विद्रोह के कारण उपराष्ट्रपती को सत्ता सौंपनी पड़ी है...पर दो दिन पहले ही अपदस्थ राष्ट्रपति नशीद ने ये कहकर दुनिया को चौंका दिया कि उनसे बंदूक की नोक पर इस्तीफा लिया गया है। ये नशीद थे जिन्होंने अब्दूल गयूम की तीस साल पुरानी सरकार को चुनाव में हराया था....औऱ अब यही गयूम नशीद के खिलाफ सक्रिय हैं। खबरों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति गयूम को मालदीव के कट्टरपंथियों का समर्थन है।

            वैसे अपदस्थ राष्ट्रपति नाशीद एक जाने-माने पर्यावरणविद् हैं। उन्होंने बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण मालदीव पर आने वाले संकट पर दुनिया का ध्यान खींचा था। इसके लिए उन्होंने अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ समुद्र के अंदर कैबिनेट बैठक की थी।    बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण मालदीव पर अगले कुछ दशकों में डूबने का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में भी इस छोटे से देश में कट्टरपंथी ताकतें और विपक्षी दल अस्थिरता फैलाने से बाज नहीं आ रहे।
        ये वही गयूम हैं जिनको अस्सी के दशक में कट्टरपंथियों ने तख्ता पलट कर लगभग सत्ता से बेदखल कर दिया था। लेकिन उस कोशिश को हमारी फौजों ने नाकाम कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गयूम की गुहार पर सैनिक हस्तक्षेप करते हुए किसी भी अंतर्राष्ट्रीय ताकत के भारतीय उपमहाद्वीप में दाखिल होने के मंसूबे धराशाही कर दिए थे। हालंकि इस बार हालात को हमारे हुक्मरान मालदीव का अंदरुनी मामला बता रहा है। दरअसल मालदीव के संविधान के तहत राष्ट्रपति के बीच में सत्ता छोड़ने के बाद उपराष्ट्रपति ही बाकी कार्यकाल पूरा करता है। शायद इस वजह से भी हमारी सरकार किसी तरह के सैनिक हस्तक्षेप से बच रही है। परंतु मालदीव के अंदरुनी हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि वहां जो कुछ भी हो रहा है वो लोकतंत्र के हित में नहीं है। इसलिए हमारे देश के लिए जरुरी हो जाता है कि जितना जल्दी हो सके लोकतंत्र की स्थापना के लिए मालदीव में वो सीधे दखल दें। पहले ही कट्टरपंथी ताकतों से घिरा हमारा देश एक और पड़ोसी को कट्टरपंथियों के कब्जे में जाने की इजाजत नहीं दे सकता। देता।
          सभी को याद होगा कि दिल्ली के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हमारे देश के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायण ने जब सउदी पैसे की वजह से बढ़ते कट्टरपंथ की बात की थी तो सउदी अरब के मंत्री या राजदूत (ठीक से याद नहीं) काफी नाराज भी हो गए थे। जाहिर है ऐसे में हमें अपने देश के अंदर और बाहर दोनों तरफ कट्टरपंथियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी। यानि जितने प्रभावी तरीके से हमारी सरकार इस संकट में दखल देगी, उतनी ही हम सभी की चिंताएं घटेंगी। वैसे भी नीति कहती है कि शांति के समय में भी दुश्मनों से सावधान रहना चाहिए। 
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    ...कुरसी के लिए जज्बात को मत छेडि़ए

    सुधीर मिश्र...रिपोर्टर डायरी (19 सितम्बर 2008)
    बटला हाउस एनकाउन्टर सही था या गलत। इसकी तस्वीरें देखने के बाद सोनिया गांधी रोईं थीं या नहीं? झूठ सलमान खुर्शीद-दिग्विजय सिंह बोल रहे हैं या गृहमंत्री और प्रधानमंत्री? सवाल सिर्फ इतने ही नहीं हैं। एक और सवाल है जो इन सबसे बड़ा है। क्या इस देश के सियासतदां इतने बेगैरत, अमानवीय, संवेदनहीन और स्वार्थी हो गए हैं कि उन्हें पीडि़त, परेशान और दुखी लोगों की भावनाओं से खेलने में जरा भी झिझक नहीं होती? आजमगढ़ में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के बयान देने और पलटने के बाद जनकवि मरहूम अदम गोंडवी की एक मशहूर कविता याद आती है-
    हिन्दू या मुसलमान के अहसासात को छेडि़ए
    ..अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेडि़ए
    दिन मंगलवार, 19 सितम्बर 2008। उस वक्त मैं एटीएस, कानून-व्यवस्था और आतंकवाद जैसे मसलों की रिपोर्टिंग करता था। मुंबई के एक सीनियर एटीएस अफसर ने मुझे तीन-चार दिन पहले बताया था कि दिगी में हुए सीरियल ब्लास्ट को लेकर आजमगढ़ और फैजाबाद में कुछ गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लिहाजा मैं 18 सितम्बर को आजमगढ़ पहुंच गया। बटला हाउस एनकाउन्टर से ठीक एक दिन पहले। मैंने शिबली कॉलेज के कुछ प्रोफेसरों से मुलाकात की। प्रतिबंधित संगठन ..स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी सिमी के अध्यक्ष शाहिदबद्र फलाही से बातचीत की जो जमानत पर छूट कर वहीं हकीमी करते हैं। सबका कहना था कि आजमगढ़ के मामले में कुछ गलत हो रहा है। आजमगढ़ आतंक की नर्सरी नहीं हैं। यहां रहने वाले नौजवानों को मजहबी तालीम दी जाती है न कि आतंक की। तालीम, साहित्य और सियासत के मामले में आजमगढ़ ऐतिहासिक जगह रही है। अगर किसी जगह से कुछ लोग आतंकवाद जैसे मामलों में पकड़े भी जाते हैं तो उससे सारा शहर, इलाका या एक खास कौम आतंकी नहीं हो जाती। मैं अपनी इस सोच पर तब भी कायम था और अब भी। आतंकवाद की घटनाओं में यहां के नौजवान शामिल थे या नहीं, इसकी पूरी पड़ताल मैं कर नहीं पाया। मेरे असाइनमेंट बदल गए क्योंकि जर्नलिज्म में मेरा रोल ही बदल चुका था।
    खैर, 19 तारीख को मैं सुबह-सुबह ही सरायमीर इलाके में पहुंच गया। गुजरात, यूपी और दिगी में हुए सीरियल ब्लास्ट के सिलसिले में कुछ लोग आसपास के गांवों से उठाए गए थे। तभी दिगी से एक क्राइम रिपोर्टर का फोन आया-बॉस.. बटला हाउस में एक बड़ा एनकाउन्टर चल रहा है..कुछ आतंकवादी हैं आजमगढ़ के। मेरे कान खड़े हो गए। मैंने तुरंत उस वक्त आजमगढ़ के एसपी रमित शर्मा और एडीजी लॉ एंड ऑर्डर बृजलाल से बात की। कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। दोपहर तक मुझे एटीएस के ही कुछ सूत्रों से पता चला कि लड़के संजरपुर गांव के हैं। मैं, दिगी से आए दो पत्रकार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ स्थानीय संवाददाता संजरपुर पहुंच गए। पता चला कि इस गांव में रहने वाले समाजवादी पार्टी के एक नेता का बेटा भी गिरफ्तार हुआ है। यहां रहने वाले आतिफ अमीन और मो. साजिद मारे गए थे जबकि सैफ और जीशान नाम के दो लड़कों को गिरफ्तार किया गया था। गांव में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। हम सपा नेता के घर पहुंचे और उनसे बातचीत शुरू की। तब तक गांव वालों का उनके घर के बाहर जमावड़ा लगना शुरू हो चुका था। ज्यादातर लोग मुसलमान ही थे। गुस्से में भरे हुए, उनके चेहरों से आग बरस रही थी। अभी बातचीत चल ही रही थी कि कुछ लोग चिगाने लगे-मारो इन मीडिया वालों को। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दो स्थानीय संवाददाताओं व फोटोग्राफरों को लोगों ने लाठी-डंडों से पीटना शुरू कर दिया। इत्तेफाक से पिटने वाले सभी पत्रकार भी मुस्लिम ही थे। लिहाजा यह बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि वहां हिन्दू-मुसलमान का कोई मुद्दा था। हमने उन्हें बचाने की कोशिश की तो लोग हमारी ओर भी लपके। सब गालियां बक रहे थे और गुस्से में आगबबूला हो कर कह रहे थे..जहां बम फटा-वहां इन हरामजादों को सिर्फ लम्बा कुर्ता और छोटा पजामा पहने दाढ़ी वाला नजर आने लगता है। सबको आतंकी बना देते हैं साले। आज बताते हैं इनको कि आतंक क्या होता है..सबको फूंक देंगे।
    यह रिफरेंस महज़ इसलिए कि मैं बताना चाहता हूं कि स्थानीय लोगों में इस मसले को लेकर कितना गुस्सा था और अब भी बना हुआ है, खैर तब तक मैं डीजीपी, अखबार के साथियों, डीआईजी व एसपी और होम सेक्रेटरी को चुपचाप मैसेज कर चुका था कि हम गंभीर खतरे में हैं। इधर, गांव के कुछ समझदार लोगों ने बीचबचाव शुरू किया। उनमें वह सपा नेता भी शामिल थे जिनका लड़का गिरफ्तार हुआ था। करीब एक घंटे बाद पुलिस पहुंची। पुलिस की गाडिय़ों को वहां मौजूद सैकड़ों लोगों ने तोड़ दिया और आग लगाने की भी कोशिश की। तब तक अंधेरा होने लगा था। लग रहा था कि आज तो जान गई। खैर किसी तरह पुलिस और गांव के ही कुछ लोगों व एक समझदार मौलाना की मदद से सभी पत्रकार किसी तरह गांव से निकले और हमारी जान बची। वहां से निकलने के बाद मैंने महसूस किया कि पत्रकारों की गलत रिपोर्टिंग किसी खास समुदाय में इतनी नफरत पैदा कर सकती है कि वो वह भी बनने को तैयार हो जाते हैं, जो वो वास्तव में नहीं होते। यह गुस्सा महज इसीलिए था कि पुलिस किसी को भी आतंकवादी होने के आरोप में गिरफ्तार करती है तो ज्यादातर अखबार उसे आरोपित या एक्यूज्ड लिखने के बजाए टेरेरिस्ट या आतंकवादी लिख देते हैं। पत्रकारिता के बेसिक्स को फॉलो न करने वालों की गलती मुसलमान अक्सर भुगतते हैं। थोड़ी सी हम पत्रकारों ने भी उस दिन भुगती पर जो गलती अब राजनीतिज्ञ कर रहे हैं, उसका खमियाजा तो सारा देश झेल सकता है और झेलता रहा है।
    गौर करिए दिग्विजय सिंह क्या कहते रहे हैं-बटला हाउस एनकाउन्टर शक के घेरे में है, उसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। सलमान खुर्शीद कहते हैं कि सोनिया गांधी एनकाउन्टर की तस्वीरें देखकर फफककर रोईं हालांकि बाद में वह बोले-रोईं नहीं भावुक हुई थीं। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कहते हैं कि एनकाउन्टर सही था। वह मानवाधिकार आयोग की जांच का हवाला भी देते हैं। आखिर एक ही सरकार और एक राजनीतिक दल के भीतर इतने सारे विरोधाभास क्यों हैं। एक बात तो सच ही है न कि इनमें से आधे झूठ बोल रहे हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयानों को उनकी पार्टी यह कहकर खारिज करती रही है कि यह उनके निजी विचार हैं। अब सलमान खुर्शीद के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। आखिर ऐसा क्यों, कांग्रेस में क्या इतनी अराजकता है कि कोई कुछ भी बोल सकता है या फिर सबकुछ जाने-बूझे ढंग से हो रहा है। खुद यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी क्यों नहीं बोलतीं कि आखिर सच क्या है। चुनाव के वक्त मुसलमानों को रिझाने की यह कोशिश वास्तव में उनके घावों में मिर्च छिड़कने सरीखी ही है। दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद की कांग्रेस पार्टी में बड़ी हैसियत है। अगर वह समझते हैं कि बटला हाउस एनकाउन्टर गलत था तो उन्हें न्यायिक जांच करवाने के लिए अपनी पार्टी पर दबाव बनाना चाहिए। वोटिंग से एक दिन पहले आजमगढ़ के लोगों से झूठी-सगाी बातें करके वह क्या साबित करना चाहते हैं। इसका संदेश क्या जाता है, अल्पसंख्यकों में और देश के सभी नागरिकों में। वोट के लिए ऐसे तमाशे को देखकर तो एक बार फिर अदम गोंडवी ही याद आते हैं जो कह गए हैं-
    छेडि़ए एक जंग, मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ
    ..दोस्त, मेरे मजहबी नज्मात को मत छेडि़ए
    कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी क्या इस पर ध्यान देंगे, जो दावा कर रहे हैं कि वह उत्तर प्रदेश को बदल देंगे..क्या वह अपनी पार्टी के नेताओं को बदल पाएंगे ?
    ..और अभी लिखना बंद ही कर रहा था कि तभी खबर आई। उड़ीसा में बीएसएफ के चार अफसरों को नक्सलियों ने उड़ा दिया..फिर एक सवाल-क्या देश के किसी बड़े नेता या मंत्री की आंखों में आंसू रहे हैं..?
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    मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

    To LoVe 2015: Voter day special





    Main Points:


    • 2nd National Voters' Day (NVD) observed on January 25,2012
    • the First One was on last year 2011 to commemorate the foundation day of the Election Commission of India and to enhance the participation of the voters , especially the youth, in the democratic process.

    Some Interesting facts:


    • The reports of Voters' registration, approximately 3.83 crore new registrations have been done throughout the country, out of which 1.11 crore are in the age group 18-19 as on January 1, 2012.

    • Approximate  52 lakh young voters, who had attained the age of 18 years, had been enrolled in last year.
    Total Working :
    • Past 60 years, the Election Commission of India conducted 15 General Elections to the Lok Sabha (House of the People) and 331 general elections to State Legislative Assemblies, thus facilitating peaceful voter working
    • The Former President Dr. A.P.J. Abdul Kalam will grace the second National Voters' Day function and distribute Elector Photo Identity Cards (EPIC) to 20 newly eligible and enrolled voters of Delhi, belonging to different sections of society, along with a badge "Proud to be a Voter- Ready to Vote"
    • The voter panel was set up Jan 25, 1950, as a constitutional body to conduct free and fair elections.
    source:http://indiatoday
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    ले लो न सब आकर

    कितना उधार है तेरा मुझ पर
    ले लो सब आकर
    वो जो तुमने गले से लगाया था अनायास यूं ही
    और सांसों से सहलाया था कंधों को मेरे
    ले लो सब आकर
    कितना उधार है तेरा मुझ पर

    बिलख कर रोई थीं उस दिन तना
    इत्ती छोटी सी एक बात पर
    खूब संभाल कर रखा है मेरे सफेद रुमाल ने
    आंसुओं में लिपटे काजल को आज भी
    ले लो सब आकर
    कितना उधार है तेरा मुझ पर

    कोहरे से भरी एक सर्द शाम को
    लिपटे-लिपटे साथ चल रहे थे हम
    हां, उसी दरख्त के नीचे पार्क में
    बड़ी शरारत से पीली शर्ट पर
    होठों की लाली से दो पंखुडिय़ां बनाई थीं तुमने
    ले लो सब आकर
    कितना उधार है तेरा मुझ पर

    नहीं संभलती हैं ये स्मृतियां
    डरता हूं बार-बार
    भुला दूं इन बातों को वैसे ही
    जैसे भूलकर चला आया था
    दूर बहुत दूर तुमसे, सिर्फ यादों के साथ
    ले लो सब आकर
    कितना उधार है तेरा मुझ पर
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    To LoVe 2015: यूपी चुनाव से तय होगा असली " युवराज "

    मुझे लगता है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में राहुल गांधी बुरे फंस गए, बेचारे अभी तो राजनीति की एबीसीडी सीख रहे हैंऔर पार्टी ने उन्हें यूपी में फंसा दिया। अरे भाई पहले राहुल को किसी छोटे और शांतिप्रिय राज्य में चुनाव के दौरान भेजा जाना चाहिए था, जैसे गोवा, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा जैसे छोटे राज्यों में। यहां उन्हें कोई खास दिक्कत भी नहीं होती। वहां जाते और पार्टी के लिए काम करते, पार्टी को जीत भी मिल जाती और वाहवाही लूटते। लेकिन पता नहीं क्यों लगता है कि कुछ लोग राहुल के खिलाफ ही साजिश कर रहे हैं। उनको स्टार प्रचारक बता कर यूपी चुनाव में टहला रहे हैं।

    बहरहाल अब तो यूपी में राहुल की साथ और ताज दोनों दांव पर लगा है। साख मतलब कई महीनों से बेचारे कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए गांव गांव दौड़ लगा रहे हैं। दलितों के यहां भोजन कर रहे हैं, पार्टी को उन पर भरोसा है कि वो यूपी में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने में कामयाब हो जाएंगे। ताज भी दावं पर लगा है, यानि असली युवराज कौन है, ये मसला भी इस  चुनाव में तय हो जाएगा। मित्रों सच तो ये है कि जिस तरह मुलायम सिंह यादव के बेटे  अखिलेश यादव की सभाओं में भीड़ उमड़ रही है, उससे इतना तो साफ  है कि इस चुनाव के बाद वो भी  किसी युवराज से कम नहीं रहेंगे। यानि हम कह सकते हैं कि चुनाव के नतीजे ये भी साफ करेंगे कि असली युवराज कौन है, राहुल या फिर अखिलेश ।

    पिछले दिनों पेड न्यूज की बात चल रही थी, देश भर में बहुत हायतौबा मचा। लोगों ने ऊंगली उठानी शुरू कर दी अखबार मालिकों पर। लेकिन ये पेड सर्वे के नाम पर क्या हो रहा है। कुछ लोगों ने सर्वे को धंधा बना लिया है। यूपी के 25 से ज्यादा जिलों में हो आया हूं, ईमानदारी से कह रहा हूं कि खुद ऐसे कांग्रेसी भी नहीं मिले जो दावे से अपने उम्मीदवार की जीत का दावा कर रहे हों। हालत ये है कि बाराबंकी में बेनी प्रसाद वर्मा, बस्ती में जगदंबिका पाल को अपने बेटों को चुनाव जीताने में पूरी ऐडी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं अमेठी में डा.संजय सिंह अपनी पत्नी को चुनाव जीताने के लिए रात दिन एक किए हुए हैं। इन सबके बाद भी ये तीनों चुनाव  जीत पाएंगे या नहीं, इस पर लोगों को शक है।

    मैं आज रायबरेली में हूं। सच बताऊं तो बहुत थका हुआ हूं, क्योंकि शनिवार को वाराणसी में रात नौ बजे कार्यक्रम खत्म होने के बाद मैने मुगलसराय से रांची राजधानी पकड़ लिया और दिल्ली के लिए रवाना हो गया, क्योंकि संडे को कोई कार्यक्रम नहीं था, सोमवार को ये चौपाल गांधी परिवार के गढ रायबरेली में लगनी थी। रविवार को दोपहर बाद मैं घर पहुंच गया, 15 दिन बाद बच्चों से मुलाकात हुई। कुछ देर घर मे रुकने के बाद मैं बच्चों को लेकर मांल घूमने चला गया। वापसी देर रात में हुई और सुबह जल्दी उठकर दिल्ली से हवाई जहाज से लखनऊ और लखनऊ से कार लेकर दोपहर दो बजे रायबरेली आया हूं। अभी शाम के चार बजने वाले हैं, जब में ये ब्लाग लिख रहा हूं। मैने ये सब सिर्फ इसलिए बताया कि इतना थका होने के बाद भी अगर ब्लाग लिखने बैठा हूं तो कुछ खास बात जरूर होगी।

    दरअसल रायबरेली के जिस होटल में मैं हूं, ये यहां का जाना माना होटल है। लेकिन होटल के ज्यादातर कमरे खाली  पड़े हैं। मैने वैसे ही होटल के कुछ लोगों से बातचीत के दौरान पूछ लिया कि भाई बहुत सन्नाटा है आपके होटल में। फिर  उसने जो कुछ बताया वो हैरान करने वाला था। उसका कहना है कि यहां जब भी चुनाव होते हैं, यहां देश के बड़े बड़े कारपोरेट घरानों के नुमाइंदे यहां आकर डेरा डाल देते हैं और हर गांव में ना सिर्फ पैसे बांटे जाते हैं, बल्कि महीनों तक पूरे गांव का भरपूर मनोरंजन किया जाता है।  करोडो रुपये इसी होटल से लोगों को बांट दिए जाते हैं। लेकिन इस बार रास्ते में इतनी चेकिंग हो  रही है कि रुपये पैसों का बांटना इतना आसान नहीं रह गया है।
    बताइये जब ये हाल  उस निर्वाचन क्षेत्र का है जहां कांग्रेस का बोलबाला माना जाना है। सोनिया और राहुल गांधी का निर्वाचन क्षेत्र है। हालाकि मैं ये बात होटल से मिली जानकारी के आधार पर ही कह रहा हूं। लेकिन मुझे इनकी बातों में सच्चाई इसलिए लगती है कि यहां  से राहुल सोनिया तो जीत जाते हैं, परंतु विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के ही उम्मीदवार हार जाते हैं। क्या इसकी वजह ये तो नहीं कि बड़े चुनाव में खूब पैसे बंटते है और छोटे चुनाव में नहीं बंटते, लिहाजा लोग गुस्से  में आकर कांग्रेस के खिलाफ वोट करते हैं।

    खैर दिल्ली में बैठकर कुछ लोग कांग्रेस का झंडा बुलंद किए हुए हैं, कांग्रेस को लगभग 100 सीटें दे रहे हैं। लेकिन 25 से ज्यादा जिलों में घूमने के बाद मेरा मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस को किसी भी तरह की गलतफहमीं में नहीं  रहना चाहिए, उनके गंठबंधन को 60 सीटें मिल  जाएं तो वो इसे पार्टी और राहुल गांधी की कामयाबी समझें। हां एक बात तो मैं कह सकता हूं कि चुनाव में काग्रेसी भी इस बार मैदान में दिखाई दे रहे हैं। चुनाव भले हार जाएं, पर वो चुनाव लड़ते तो नजर आ रहे हैं। ऐसे में जहां पिछले चुनावो में 85 फीसदी से ज्यादा कांग्रेस उम्मीदवारों  की जमानत जब्त हुई थी, इस मुझे लगता है कि इस प्रतिशत में  दस पांच प्रतिशत लोगों की गिरावट दर्ज होगी। यानि कुछ और भी कांग्रेस उम्मीदवार अपनी जमानत बचाने में कामयाब हो सकते हैं।  बहरहाल देखना अब देखना ये है कि युवराजका ताज राहुल  गांधी बचा पाते हैं या फिर  मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव इस ताज को भी अपने  नाम करने में कामयाब हो जाते हैं। 
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    शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

    To LoVe 2015: पिता-क्या कहूं, क्या करुं, कैसे करुं....

    दो फरवरी को पूरा एक साल हो गया पिताजी को गए हुए। आज भी मानसिक तौर पर वो जुड़े हुए हैं। खासतौर पर जब-जब किताबों से भरे घर को छेड़ता हूं लगता है साथ ही हैं। पचास साल पुरानी रिपोर्ट, अखबार की कतरनें, अनगिनत पुराने आलेख, हर छोटे से छोटे पेज, अखबार के पन्नों, डाक से आए लिफाफों..सब पर कुछ न कुछ लिखा हुआ देखकर दिल लरज जाता है। समझ नहीं आता कि क्या करुं। कैसे उन कागजों को रद्दी में डाल दूं जिस पर पिताजी की हेडराटिंग है। साल हो गया है पर सारे कागजों को घर से विदा नहीं कर पाया हूं। जब भी कोशिश करता हूं लगता है कि जैसे पिताजी को फिर से विदा कर रहा हूं। शायद ही समझा पाउं कि कैसी वैचारिक बैचारगी महूसस करता हूं। जीवन में खासतौर पर तब ऐसी रिक्ता आ जाती है जब पिता मानसिक रुप से सुलझे, कर्मठ, ईमानदार, समाजिक रुप से सजग हों।
        समाजिक जीवन से जुड़ा काम पिताजी करके गए। गांव के लिए सड़क बनवाने से लेकर, स्कूल, अस्पताल तक सब बनवा गए। जाने कितनी लड़कियों का विवाह कराया या लड़कियों कि शादी के निमित्त बने। सिर्फ उनके नाम लेने से कई लोगो ने गरीब घऱ की लड़कियों को अपनी बहू बनाया, तो जाने कई लोगों की नौकरियां लग गई। मैं खुद नहीं जानता..न ही कभी पिताजी ने बताया। कई बात तो पिताजी को ही खुद पता नहीं होता था कि कौन उनके नाम के इस्तेमाल से कितना आगे बढ़ गया है। कहते हैं कि अच्छे लोगो के लिए अच्छे लोग मिल जाते हैं। अनेक गरीब लोगो की नौकरियां पिताजी के कारण बचीं..जो लोग बेईमान कहलाते थे..उन लोगो ने भी सिर्फ पिताजी के नाम पर ही कई काम कर दिए। पिताजी ने कभी कोई काम अपने स्वार्थ के लिए नहीं किया।

         ऐसे ही एक घटना याद आती है जब पिताजी खुद ही  ये जानकर हैरान हो गए थे कि उनकी बड़ी बहू एक प्रतिष्ठित संस्थान में अच्छे पद पर कार्यरत है। उस महिला की नौकरी के लगने का कारण था कि उस संस्थान में उसका परिचय पिताजी की बहू  के तौर पर उसके पती ने कराया था। वो पती-पत्नी इतने बेशर्म थे कि उन्होंने पिताजी को ये बात बताना भी जरुरी नहीं समझा। पिताजी को ये बात तब पता चली जब उस संस्थान के निदेशक एक समारोह में उनसे मिले। जबकि हकीकत ये है कि हम दोनो भाई अब भी अविवाहित हैं। 

       पत्रकारिता में पिताजी को जानने वाले हमेशा ही ईमानदार और बड़े पत्रकार के तौर पर जानते  रहे। ईमानदारी के कारण धन की कमी हमेशा रही पर कभी हम पर जाहिर न होने दी। हमेशा कहते रहे कि कोई काम पैसे के कारण नहीं रुका। पर ये नहीं कहते थे कि पैसे के कारण कितने किलोमीटर वो पैदल चल देते थे। सत्ता के कर्णधारों का घर पर भी आगमन कम ही होता था। हालांकि राष्ट्रपती पद के उम्मीदवार सिन्हा साहब से लेकर मजदूर तक हमारे घर कई दिनों तक मेहमान की तरह रहे। एक सिद्धांतवादी पिता की ईमानदारी के साये में पैसे कि परेशानी को करीब से देखते हुए बड़े होना अपने आप में एक ऐसा अनुभव है जिसे बताना काफी मुशिक्ल है। इसे अक्सर दो-चार होता रहता हूं आज भी।

         पत्रकारिता में कभी पापा ने समझौता नहीं किया। समाजिक कामों से कभी समझौता नहीं किया। अपने बच्चों से ज्यादा एक गरीब के बच्चे की पढ़ाई उनके लिए जरुरी थी। इसी सिद्धांत के कारण अपनी जमीन पर ही दसवीं तक का स्कूल बना कर उसे सरकार को दे दिया। नाम भी रखा था नेफा बलिदान स्मारक स्कूल। यानि न अपने गांव के नाम पर, न ही अपने पिता के नाम पर। जब हर जगह लोग नाम कमाने के लिए जाने क्या-क्या करते हैं उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। उनके अंतिम दिनों में कितने लोग उनसे मिलने आए...ये एक ऐसा सबक रहा मेरे लिए..जो जिदंगी भर कई तरह के प्रश्न चिंह मेरे सामने खड़ा करता रहेगा। 

      आज जब कागजों की छंटाई कर रहा था तो उनके लिखे कई आलेख मिले। आज जिन समस्याओं से हम जूझ रहे हैं वो उसपर काफी पहले ही लिख चुके थे। आज भी घूमाफिरा के हम वही लिखते हैं। यानि की पिताजी जैसे पत्रकारों के कारण हर समस्या औऱ उसके समाधान की बात काफी पहले से ही अखबारों के माध्यम से सत्ताधिशों तक, समाज तक पहुंचती रही है। पर अमल कम ही होता है। आजकल तो लगभग न के ही बराबर।

         कहने को बहुत कुछ है। पर ठीक से सिलसिलेवार कह पाना मेरे लिए मुश्किल है। आप को आज भी मिस करता हूं। मैं ही नहीं वो सब जो ईमानदार पत्रकारिता की बात करते हुए कभी-कभी आज भी घर आ जाते हैं। उन लोगो की विवश्ता और आंसू देख कर समझ नहीं पाता पापा कि क्या कहूं। कर तो कुछ सकता नहीं..सो चुप ही रहता हूं। बाबूजी हमने तो आपको कोई सुख नहीं दिया ..पर उन आपके किए हुए काम को देखकर हमें काफी सुख मिलता है।
       
        सच में आदर्श के लिए किसी औऱ कि तरफ देखने की हम जैसों को कोई जरुरत नहीं होती। हम जानते हैं कि तमाम कमियों और हर अवगुण के बावजूद आपके गुणों की रोशनी हमें किसी भी दलदल से निकाल लाने में सक्षम है। कहीं न कहीं तमाम विषाद, निराशा, क्रोध के  बाद भी धरातल में अगर कहीं शांति है..तो वो सिर्फ आपके वो दिए संस्कार की वजह से है जो खून में आज भी बहता है...भले ही मुझसे ये संस्कार नजरअंदाज हो सकते हों..पर इनका खत्म होना अंसभव है।

       पर आपके सपनों को सच कर पाना भी मेरे लिए असंभव ही है पापा। पापा जो जीते-जी सुख न दे सके वो नालायक संतान आपके जाने के बाद भी आपके सपनों को पूरा करने की ताकत कभी बटोर भी नहीं सकती ।
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