रविवार, 29 जनवरी 2012

To LoVe 2015: जय हिंद-ये रातें कितनी मतवाली है...????

ये मेरा आवारापन है या.....
खूबसूरत ठंडी शामें गुजरी.....सर्दी अपने रंग बिखेरने के बाद बंसत के लिए रास्ता खाली कर रही है...चारों तरफ पेड़ों पर नए हरे चमकीले पत्तों का डेरा जमने वाला है....हिमालय की गोद से आती बर्फीली हवाएं अब शरीर को कम काटती है...महज दो दिन पहले ही ठंडी हवा में ठिठुरते हुए अपने को गर्म कपड़े के अंदर ही सिकोड़ रहा था..जाने क्यूं इस बार ठंड पहली बार ज्यादा लग रही थी....बावजूद इस कंपकंपाती ठंड में भी अवारगी का नशा मुझ पर सवार था...कहीं भी...कभी भी...अकेले निकल पड़ने की आदत से मजबूर....निंशक तफरीह करने से मैं कभी बाज नहीं आता...न दिन देखता...न रात...इसी आदत के कारण अपने शहर (दिल्ली) को अक्सर नापता रहता हूं..खासतौर पर नई दिल्ली को..जिसे बने सौ साल हो गए हैं.....कहीं भी सड़क किनारे गर्मागर्म चाय का आनंद लेते...कहीं किसी रेस्त्रां में रुक कर गर्म सूप आहिस्ता-आहिस्ता पीते हुए उसके स्वाद का आनंद लेते रहता....गर्म और बादलों से ढकी दुपहरिया में मस्त चाल से चलती मेट्रों में सवार हो ऑफिस भी जाता रहा...तो आधी रात के बाद घर लौटते हुए सहयोगियों के साथ..तो कभी अकेले भी..रात में गर्म पकौड़ों का आनंद लेने के लिए कहीं रुक जाता....इस बार भी कुछ ऐसे ही कट रही थी दिल्ली की सर्दी....इस बार तफरीह करते-करते मैं पहुंच गए गणतंत्र दिवस पर....वाह...क्या बात थी...राजपथ पर कदमताल करते बांके जवान...टैंकों और तोपों के साथ-साथ अग्नि मिसाइल...आसमान के पहरेदार हमारी वायुसेना के गर्जन करते लड़ाकू विमान...देखते ही सर्दी छूमंतर सी हो गई...सीना फ़क्र से चौड़ा हो गया....दिल संतुष्टी से भर गया..कोई मुसीबत आएगी तो डर नहीं...हम सुरक्षित हाथों में हैं.....तभी ख्याल आया...ये मस्तमौला तफरीह..ये सर्दी की गुलाबी शामें....ये रोमानी रातें...बर्फानी हवाओं कि ठिठुरन....हमारी रुमानियत....बैखोफ आवारगी...सुकुन भरी नींद....ठंड भरी रातों में गर्म चाय की चुस्की...रजाईयों में गुजरती गर्म रातें...सभी तो इन जाबांजों के रतजगों के दम से ही तो मस्त हैं...हिमालय की गोद मे भयंकर सर्दी में सेना के जावन रतजगे करते हैं...ताकि हम सुकुन से सो सकें...बैखोफ अवारगी कर सकें.....ऐसे में तो बस दिल में एक ही आवाज गूंजती है-जय हिंद.....
राजपथ से आवारा कदम चल पड़ते हैं राजधानी की  सड़कों पर...यहां भी रतजगा है...यहां भी रजाईयां नहीं हैं..पर अलाव है....अलाव...जो हम जैसों के लिए जीवनोत्सव है...वही सड़क किनारे रतजगा करने वालों के लिए जिंदा रहने का एक आसरा..ये बुझा नहीं कि सर्दी से संघर्ष शुरु हो जाता है...कोई जीत जाता है...कोई सांस छोड़ देता है...ठिठुरती रातों में हम रजाई से बाहर निकले हैं सर्दी का मजा लेने...सड़कों के किनारे भी लोग रजाई में नहीं है..असल में यहां रजाई है ही नहीं....कैसी विंडबना है.....तीन रतजगे....एक तरफ सरहदों के रतजगे हैं...जो हमारे रतजगों में खुशियां भरते हैं...एक सड़क किनारे रतजगा है...जो सर्दी से ज़िंदगी की ज़ंग है...उधेड़बुन में ही था...तभी बसंत टकरा गया....लगा जैसे चारों तरफ फूलों की बहार छाने वाली हो...प्रकृति मुस्कुराने लगी है...जैसे कह रही हो...गुनगुनी धूप का आनंद ले लो जल्द...अब तो बस चारों तरफ खुशुबू की बयार फैलने  वाली है....आज .एक जनवरी के बाद फिर से नए साल का आंदोत्सव.....मदोनोत्सव कंहू...या बंसोत्सव...ईसा से शुरु होने वाला नया साल 29 दिन पहले ही ठिठुरती रात से ठिठुरती सुबह में टकराया था...और बंसत कुय़ इसी तरह बस यूं ही आवारगी करते हुए टकरा गया है...अचानक मिलने से वही हालत है ई जो 2012 से मिलते हुए थी...हम कुछ खोए-खोए से हैं...खुश हैं..पर इजहारे मोहब्बत की तरह...खुशी व्यक्त नहीं हो रही.....पर बंसत ने आना था...आ ही गया...पार्कों में धूप सेंकने के साथ ही फूलों की सेज सजने की तैयारी है.....होली से महीने पहले की ये गुनगुनी दुपहरिया...ये गुलाबी शामें हैं...ये ठिठुरती रातें हैं....हम सोच रहे हैं ठगे से खड़े....और बंसत सर्दी को विदाई देने को कहने लगा है....तो चलिए बंसत का कहा मानते हैं...साथ ही अपने खुशी भरे रतजगों के लिए रतजगा करते पहरेदारों को सलाम भी बोलते हैं....औऱ दुआ करते हैं और हो सके तो कुछ कर सकें...तो करते हैं..ताकि अलाव के सहारे रातें काटते लोगो को भी सुकुन भरी रातें नसीब हो...ये सर्दी के अलाव हर किसी की जीवन में खुशियां लाए...बंसत की बहार लाए.....।
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शनिवार, 28 जनवरी 2012

To LoVe 2015: नहीं चल रहा युवराज का जादू ...

मैं जानता हूं कि राहुल गांधी को युवराज लिखने पर हमारे मित्रों को आपत्ति हो सकती है, फिर भी मैं लिखूंगा, उसकी एक वजह है। भाई इस लेख को कांग्रेस के लोग भी पढ़ते हैं, वो तो इन्हें इसी नाम से जानते हैं, बहुत रिस्पेक्ट करते हैं, कई बार तो कांग्रेसी  राहुल गांधी का चित्र भर देखकर कुर्सी छोड़ कर खड़े हो जाते हैं। इस युवराज के दरबार में हर कोई मत्था टेकता है, चाहे वो कांग्रेस पार्टी का नेता हो या फिर सरकार का मंत्री। सरकार के सरदार को भी खड़े होकर राहुल की आगवानी करनी पड़ती है।
बहरहाल इस युवराज ने जब यूपी चुनाव में पार्टी की कमान संभाली तो कांग्रेसियों को लगा कि अब तो उनकी सत्ता में वापसी तय है। युवराज ने भी आम आदमी खासतौर पर दलितों के यहां भोजन करके के ये बताने की कोशिश की कि वो भले युवराज हों, लेकिन दलितों के प्रति उनके मन में आदर है और वो उन्हें बराबरी का दर्जा देते हैं। इसलिए वो उनके साथ जमीन पर बैठ कर भोजन करते हैं। मैं कई बार सोचता हूं कि दलितों को ज्यादा खुशी युवराज के साथ दिल्ली में डाईनिगं टेबिल पर बैठ कर खाने से होगी या फिर युवराज को जमीन पर बैठाकर भोजन कराने से। मेरा तो मानना है कि बेचारे दलित तो रोज ही जमीन  पर बैठकर खाना खाते हैं, एक दिन अगर कुर्सी मेज मिल जाए तो क्या कहने। पर ये बात राहुल के समझ में नहीं आएगी, क्योंकि अपने को नीचे झुकाना आसान है, पर सामने वाले  को ऊपर उठाना मुश्किल ही नहीं  राजनीति में तो नामुमकिन है।

खैर छोड़िये बेकार की बातों में भला क्यों उलझा जाए, बात चुनाव की करते हैं और  वो भी बिना लाग लपेट के। यूपी में बाराबंकी से शुरु हुए हमारे चुनावी सफर को आज एक हफ्ता हो गया। इस  दौरान हम बाराबंकी, फैजाबाद, बहराइच, बलरामपुर और कपिलवस्तु यानि सिद्धार्थनगर में चुनावी दंगल का आयोजन कर चुके हैं, और आज पहुंच गए गोरखपुर। सफर के दौरान हमारी बात बहुत सारे नेताओं से तो हो ही रही है, मतदाताओं से भी  हम रुबरू होते हैं। बातचीत में मैं देख रहा हूं कि मतदाता बहुत जागरुक है और बहुत ही सावधानी से सभी बातों का जवाब दे रहा है। अब मतदाताओं को बरगला कर वोट लेना आसान नहीं है। मैं यहां एक ग्राम प्रधान का नाम और गांव नहीं बता सकता, पर उसने बहुत ही सहजता से कहा कि " ये ससुरा नेता लोग चुनाव के बाद गायब हो जाता है, अभी आ रहा है और खूब लालच दे रहा है। का करना है अगर ई सब हमको पइसा दे रहे हैं तो हमको लेने में का हरज है। हमने गांव भर को बता दिया है कि अब तक हमको चार पार्टी के उम्मीदवार माल दे चुके हैं, पूरे गांव से कहा हूं कि आप सब भोट जिसको मन हो उसको दें, चुनाव के बाद हम इस पइसवा से गांव में जोरदार पार्टी करेंगे। "

यानि मतदाता नेता जी का पइसवो सटा दे रहा है और भोटवो देने की बात नहीं कर रहा है। अब युवराज को कौन समझाए कि ये मतदाता जिससे पैसे ले रहे हैं, उसे भी वोट नहीं दे रहे है, सोच समझकर वोट देने की बात कर रहे हैं, तो भला  कांग्रेस को वोट क्यों देंगे। बेचारे दलितों ने युवराज का कुछ खाया नहीं है, उल्टे खिलाया ही है। बेवजह राहुल को गुस्सा आ जाता है, और ये बेचारे राहुल के गुस्से का भी सामना करते हैं। खैर इस पूरे इलाके में पार्टी के तीन बड़े नेता हैं, बेनी प्रसाद वर्मा, जगदंबिका पाल, और पी एल पुनिया हैं। वैसे चुनाव में टिकट के बटवारे में बेनी बाबू ही बाजी मार पाए, उन्होंने अपने बेटे समेत 60 से ज्यादा टिकट अपने चहेतों को दिलवाए, पाल साहब की भी नहीं चली, पर वो अपने बेटे को टिकट दिलवाने में कामयाब हो गए। सबसे बेचारे की हालत रही पूनिया की, उनके किसी भी चहेते को टिकट नहीं मिला। अब हालत ये है कि कांग्रेस उम्मीदवारों को कांग्रेसी ही हराने में लगे हैं। इतना लंबा सफर तय कर चुका हूं, लेकिन सच तो ये है कि मैं दावे के साथ कांग्रेस के किसी एक उम्मीदवार को भी नहीं कह सकता कि वो जीत सकता हैं। यहां तक की बेनी बाबू  और पाल साहब को अपने बेटों को भी चुनाव में जीताने में पसीने बहाने पड़ रहे हैं।
मुझे लगता है कि आज राहुल राजनीति के सलमान खान हैं, जिन्हें लोग देखने आते हैं। वैसे आपको पता होगा कि आज भी पिछड़े गांव में आप कार से चले जाएं तो गांव में भीड़ लग जाती है, कार देखकर बच्चे ताली बजाते हैं, तो महिलाएं दरवाजे के पास खड़ी होकर  देखती हैं कि कार किसके दरवाजे पर रुक रही है और अगर आपने किसी आदमी से रास्ता पूछ लिया तो एक साथ आठ आदमी कार वाले को रास्ता बताते हैं। बच्चे तो कार के आगे आगे दौड़ लगाकर जहां जाना होता है, वहां तक जाते हैं। ऐसे में जब युवराज पैदल चल रहे हों और उनकी एक  नहीं कई गाड़ियां उनके पीछे पीछे चल रही हों तो भला लोग इन्हें नही देखने आएंगे। ऐसी भीड़ में दिल्ली के पत्रकारों को दिखाई देता है कि राहुल क्या से क्या करने जा रहे हैं। सच तो ये है कि जितनी जगह से होकर आया हूं अभी तक कहीं भी कांग्रेस का कोई उम्मीदवार कांटे के संघर्ष में नहीं दिखाई दे रहा है। लेकिन टेलीविजन  में इस चौथे नंबर की पार्टी की चर्चा सबसे पहले होती है और सबसे ज्यादा होती है।

वैसे अभी कुछ कहना जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन इस सियासी सफर पर जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे हैं, मैं समाजवादी पार्टी को और पार्टी के मुकाबले बेहतर हालत में पा रहा हूं।  जिस तरह लगातार समाजवादी पार्टी का ग्राफ बढ रहा है, उससे तो लगता है कि पिछले चुनाव में जिस तरह बसपा को अप्रत्याशित समर्थन मिला है, वैसा ही कुछ अगर इस बार समाजवादी पार्टी के साथ हो सकता है। कुछ सीटें अगर कम रह भी गईं तो मुलायम सिंह कांग्रेस और आरएलडी के साथ मिलकर सरकार भी  बनाने  में कामयाब हो सकते हैं। बहरहाल जब तक नौबत यहां तक पहुंचेगी, तबतक को काफी देर हो चुकी होगी। लेकिन एक बात तो है, यूपी कांग्रेस के नेता हैं बहुत चालू, सब राहुल को नेता बता रहे हैं,  ऐसे में अगर पार्टी की हार भी होती है तो सब जिम्मेदारी राहुल पर डालकर किनारे हो जाएंगे।


  
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बुधवार, 25 जनवरी 2012

To LoVe 2015: चुनाव में ईमानदारी ... ना बाबा ना

त्तर प्रदेश के चुनावी सफर पर निकला तो कुछ उत्साहित था, मुझे लग रहा था कि ईमानदारी को लेकर अन्ना ने इतनी तो जागरुकता फैला ही दी होगी कि गांव गांव में लोग ईमानदारी की बात करते होंगे और चुनाव में इस बार दागी उम्मीदवारों से दूरी बनाकर ईमानदार और साफ सुथरी छवि वाले उम्मीदवार के साथ खड़े होंगे। सच बताऊं मेरा सोचना गलत था, चुनावों में कुछ भी नहीं बदला है। चोर, उचक्के, बदमाश, भ्रष्टबेईमान सब तो हैं इस चुनावी दंगल में। टीम अन्ना का यूपी  में कितना भी दौरा कर ले, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यहां वो ईमानदारी को मुद्दा नहीं बना पाएंगे। यहां लोगों की छोटी छोटी जरूरते हैं, उम्मीदवार उनके पास आते हैं तो वो उनसे हैंडपंप और गांव  गली की सड़कों की बात ही कर करते हैं। इसके अलावा  समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  तो वाकई लोगों की नब्ज पकड़ ली है।  हालांकि उन्होंने ये बात कही तो मजाक में ही कि जब शाम की दवा  यानि दारू मंहगी हो जाए तो  समझ लेना चाहिए कि सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। वाकई इस बात का ग्रामीण अंचलों में असर देखा जा रहा है। आप यकीन माने यूपी में चुनाव के दौरान शराब की कीमतों में भारी कटौती की गई है।

बाराबंकी के बाद कल फैजाबाद यानि राम लला की नगरी अयोध्या में था। बाराबंकी में तो हमें पता बाद में पता चला जहां हमारा कार्यक्रम तय था, वहां के आसपास  की जमीन पर बीएसपी के उम्मीदवार संग्राम सिंह ने कब्जा कर लिया है। शापिंग काम्पलेक्स के लिए काम भी शुरू हो गया था, लेकिन कुछ लोग हिम्मत करके कोर्ट चले गए और काम रुक गया। यहां अब पुलिस तैनात है। संग्राम सिंह लगातार कहते रहे कि हां मैं जनता की अदालत में शामिल होऊंगा, पर कार्यक्रम वाले दिन उन्होने बताया कि परिवार में किसी ने खुद को गोली मार ली है और वो अब नहीं आ सकते। मुझे लगा कि हो सकता है कोई हादसा हो गया होगा, लेकिन हैरान तब हुआ मैं जब कल फैजाबाद में कार्यक्रम शुरू होने के 10 मिनट पहले बीएसपी के उम्मीदवार वेद प्रकाश गुप्ता ने कहा कि उनके घर मिट्टी हो गई है। मिट्टी हो जाने का मतलब किसी की मौत हो गई है, लिहाजा वो नहीं आ सकते। मुझे हंसी आईऔर एक कहानी याद आ गई।

साहब हुआ ये मेरे एक मित्र के घर अचानक कुछ मेहमान आ गए, ठंड का दिन है लिहाजा किसी को जमीन पर सुलाना ठीक नहीं था। बेचारे मित्र पड़ोसी के यहां चारपाई मांगने चले गए। एक पड़ोसी के यहां जब उन्होंने चारपाई की मांग की तो पड़ोसी ने बडे ही भोलेपन से कहा " भाई क्या बताएं, मेरे यहां तो सिर्फ दो चारपाई है, एक पर मैं और मेरे पिता जी सोते हैं, दूसरी चारपाई पर मेरी मां और मेरी बीबी सो जाती है। इसलिए मैं चारपाई नहीं दे पाऊगा। मित्र बोले कोई बात नहीं, चारपाई आप दें या ना दें, पर आपको मेरी एक सलाह है कि आप लोग सोया तो ठीक से करें। बीएसपी के नेताओं को भी मेरी यही सलाह है कि आप कार्यक्रम में आएं या ना आएं, पर मौत का बहाना  थोडा  ज्यादा हो जाता है। वैसे भी यूपी में जो माहौल है उससे तो पार्टी की नानी तो मरनी ही है, फिर पहले ही क्यों मरने लगे।

अयोध्या पहुंच कर थोड़ा मन दुखी हुआ, हमारे कार्यक्रम का आयोजन स्थल गुफ्तार घाट था। कहते हैं कि भगवान राम ने यहीं पर जल समाधि ले ली थी। यानि यहीं सरयू के तट पर भगवान का शरीर अंतिम बार लोगों ने देखा था। भगवान राम मर्यादा को मानने वाले थे, और कुछ लोगों ने सारी मर्यादाओं को ताख पर रख कर भगवान का मंदिर बनाने की कोशिश कर रहे थे। हालत ये हो गई  जो उनकी ठीक ठाक  छत थी, वो भी नहीं रही। दूर दराज से आने वाले भक्त रामलला से ज्यादा यहां हुई तोड़फोड़ की चर्चा करते हैं। बहरहाल एक अच्छी बात है कि चुनाव में फिलहाल राम मंदिर का मुद्दा गायब है। कई बार यहां से बीजेपी के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं, लेकिन उन्होंने किया क्या है, इसका जवाब उनके पास नहीं है। लिहाजा यहां से ख़डी  एक किन्नर  उम्मीदवार गुलशन बिंदू के पीछे  पूरा शहर पागल हुआ पड़ा है। राजनीतिक  दलों से ज्यादा भरोसा ना जाने क्यों लोगों को इस किन्नर पर है। बिहार की रहने वाली ये किन्नर लोगों को समझाती है कि वो सीता माता जो बिहार में जन्मी थीं, वो उनके यहां  से भगवान राम के पास यानि माता सीता के ससुराल आई है। चुनाव के नतीजे कुछ भी हों, लेकिन किन्नर ने इस कड़ाके की ठंड में राजनीतिक दलों के पसीने तो छुड़ा ही दिए हैं।

दिल्ली मैं बैठकर अखबार और चैनल पूरी तरह राहुल गांधी पर फोकस किए हुए हैं। यहां लोगों से राहुल के बारे में बात करो तो लोग हंसने लगते हैं। कहते हैं कि राहुल फैक्टर की जब कोई बात करता है तो हम समझ जाते  हैं कि  ये लोग यहां के रहने वाले नहीं है, दिल्ली या फिर किसी और प्रदेश से आए हैं। फैजाबाद के सुदूर इलाके में मैं सीधे साधे ग्रामीणों की ये बात सुनकर हैरान रह गया। बहरहाल दोस्तों आज हम पहुंच चुके हैं बहराइच। तैयारियां चल रही हैं रात के चुनावी दंगल की। आप भी जुड़िए हमारे साथ आईबीएन 7 पर रोजाना रात आठ बजे.. हर रोज नए शहर से।

नोट.. मित्रों मैं लगातार सफर  में हूं, हर रात एक नए शहर में बीतती है, फिर वहां शुरू होता है चुनानी दंगल। यही वजह है कि मैं आप सबके ब्लाग पर आ नहीं पा रहा हूं, लेकिन जब ये कारवां गोरखपुर पहुंचेगा तो हमें एक दिन पूरा वहां आराम करना है। कोशिश होगी कि उस दिन हम आप सबके साथ  कुछ देर जरूर रहूं।
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रविवार, 22 जनवरी 2012

To LoVe 2015: चलिए ! मिल कर करें नेताओं का हिसाब ...


उत्तर प्रदेश में चल रहे सत्ता के संघर्ष एक छोटी सी भूमिका निभाने के लिए मैने भी अपना रुख कर दिया है यूपी की ओर। महीने भर से ज्यादा समय तक के लिए रविवार को सुबह छह बजे हम सभी ने दिल्ली छोड़ दिया और कल ही शाम को हम पहुंच वहां जहां अपना दबदबा जमाने के लिए सभी राजनीतिक दल एक दूसरे से आगे निकलने की फिराक में जी जान से लगे हैं यानि प्रदेश की राजधानी लखनऊ।

अपने चैनल यानि आईबीएन 7 के जरिए तो हम आपको कल 23 जनवरी से रोजाना रात आठ बजे किसी ना किसी शहर में चल रहे इस घमासान की हकीकत से तो वाकिफ कराएंगे ही, अगर इस भागमभाग में मैं अपने ब्लाग परिवार के लिए समय निकाल पाया तो कोशिश होगी कि इस चुनाव के भीतर चल रही आबोहवा की जानकारी आपको यहां भी दूं।

हमारे सफर की शुरुआत भले ही लखनऊ से हो रही हो, लेकिन हमारी कोशिश है कि हम हर गांव हर कस्बे और हर जिले तक पहुंचे और लोगों से जाने उनकी राय। मसलन जिन्हें आपने चुना था वो आपकी कसौटी पर खरे उतरे या नहीं, जिन्हें चुनने जा रहे हैं, उनमें आप क्या देख रहे हैं। मुझे देखना चाहता हूं कि पांच साल के शासन में मायावती उत्तर प्रदेश को तरक्की की राह पर कितना आगे बढा पाई हैं, मुझे ये भी देखना है कि मुख्य विपक्षी दल होने के नाते समाजवादी पार्टी यानि मुलायम सिंह यादव जनता के हितों को लेकर कितना गंभीर रहे हैं। वैसे तो प्रदेश में अब बीजेपी के लिए बहुत कुछ नहीं बचा है, फिर मैं देखना चाहता हूं कि उनकी फायर ब्रांड नेता उमा भारती क्या मध्यप्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी पार्टी का झंडा बुलंद कर पाती हैं या नहीं। कांग्रेस की राहुल गांधी दलितों के यहां लगातार रोटी तोड़कर उन्हें लुभाने में किस हद तक कामयाब रहे हैं।

मुझे लग रहा है कि मैं आपको अपने चुनावी सफर की जानकारी दे दूं, जिससे कहीं मौका मिला तो हम आप आमने सामने रुबरू भी हो सकेंगे। हम 23 जनवरी को बाराबंकी, 24 को फैजाबाद (अयोध्या), 25 बहराइच, 26 को बलरामपुर, 27 जनवरी कपिलवस्तु (नेपाल बार्डर), 28 जनवरी गोरखपुर, 30, जनवरी आजमगढ, 31 जनवरी बलिया, 1 फरवरी वाराणसी, 2 फरवरी इलाहाबाद, तीन फरवरी अमेठी, 4 फरवरी जौनपुर, 6 फरवरी रायबरेली, 7 फरवरी प्रतापगढ, 8 फरवरी लखनऊ, 9 फरवरी फतेहपुर, 10 को उन्नाव, 11 फरवरी कानपुर में हैं।

ये कारवां यहीं थमने वाला नहीं है। इसके बाद 13 फरवरी को हम आपसे फर्ऱखाबाद में मिलेगे। इसी तरह 13 को इटावा, 14 आगरा, 16 को मथुरा, 17, नोएडा, 18 फरवरी, मेरठ, 20 को मुजफ्फर नगर, ,21 को बिजनौर, 22 को मुरादाबाद, 23 को रामपुर, 24 को बरेली, 25 को पीलीभीत, 26 को सहारनपुर और 28 को लखीमपुर (गोला) मैं हम आप सबके साथ चौपाल लगाएंगे।

और जरूरी बात तो रह गई, रोजाना आठ बजे आप आईबीएन 7 पर हमारा ये विशेष चुनाव बुलेटिन यानि चौपाल लाइव देख सकेगे। हम आपको निराश भी नहीं करेंगे, क्योंकि इस शो को एंकर करेंगे हमारे स्टार एंकर भाई संदीप चौधरी। तो मित्रों मुझे लगता है कि आज से 28 फरवरी तक आप हमारे साथ रोज रात को आठ बजे टेलीविजन पर जरूर हमारे साथ होंगे। यहां मैं आपसे कुछ मदद भी चाहता हूं, अगर आप इन इलाको के निवासी है तो आप हमें स्थानीय मुद्दे, नेताओं से अपेक्षा, उम्मीदवार से आप क्या पूछना चाहते हैं, ये सभी बातें हमें मेल के जरिए बता सकते हैं और हम वादा करते हैं कि आपका सवाल कितना भी तीखा क्यों ना हों, हम उसे रखेंगे जनता की सबसे बड़ी पंचायत में, जहां आप होगे, नेता होंगे और जहां आप दोनों हैं तो भला हम क्यों नहीं होगे ?
Srivastava.mahendra1965@gmail.com

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शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

To LoVe 2015: नार्वे - जागो मोहन प्यारे..भारत को समझो

Courtsey-despardes.com

       आज खबरों के बीच विचरते हुए एक खबर पढ़कर अजीब लगा। खबर के मुताबिक नार्वे में एक भारतीय दंपत्ति से वहां की सरकार ने उनके मासूम बच्चों को छीन लिया है। दोनो का कसूर था कि वो अपने हाथ से बच्चे को खिला रहे थे और एक बच्चा अपने पिता के साथ सोया हुआ था। वैसे  नार्वे का कानून इस बात की इजाजत नहीं देता की बच्चों को हाथ से खिलाया जाए या अपने साथ सुलाया जाए। हद हो गई....ये भी कोई कानून है औऱ वो भी तब. जब भारतीय बच्चे हों। बच्चों के माता-पिता सागरिका और अनुरुप ने नार्वे के अधिकारियों को भारतीय संस्कृति के बारे में बताया भी..पर उन्होंने नहीं मानना था सो नहीं माने। शायद हिटलर की आत्मा का असर आ गया हो...भारत में जबतक मां बच्चे को अपने हाथ से न खिला ले..उसे ठीक से नींद नहीं आती...जब तक बाप की गोद पर लेटकर बच्चा सोता नहीं, , ..बच्चे को भी सुकुन की नींद नहीं आती...पर नार्वे का प्रशासन इसे समझने में इतनी देर क्यों लगा रहा है समझ से परे है। हैरत है कि भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप के बाद भी बच्चों को अब तक माता-पता को सौंपा नहीं गया है। लड़के की उम्र तीन साल औऱ लड़की की उम्र एक साल है। काहे का आधुनिक देश है जो दूसरों की परंपरा को नहीं समझ पा  रहा।
     आज जब दुनिया ग्लोबल विलेज बन गई है वहां नार्वे जैसे यूरोपीय देश के अधिकारी किसी मध्युगीन समांतों जैसा वर्ताव क्यों कर रहे हैं? सूचना के इस युग में Norway के अधिकारी क्या कूपमंडूक बन हुए हैं????। हैरानी इस बात पर भी है कि दंपत्ति का वीज़ा मार्चे में खत्म हो रहा है..फिर भी अब तक बच्चे उन्हें नहीं सौंपे गए हैं। क्या नार्वे का प्रशासन अपने दिमाग की खिड़की खोलकर भारतीय परंपरा को जानने की कोशिश नहीं कर सकता ? जबकि  सारी जानकारी महज एक क्लिक पर उपलब्ध है। हालांकि वहां कि चाइल्ड प्रोटेक्टिव सोसायटी १२५०० बच्चों को परवरिश के लिए ले जा चुकी है। जिसकी आलोचना संयुक्त राष्ट्र भी कर चुका है। वैसे नार्वे का मीडिया लगतार इस खबर को चर्चा में रखे हुए है। शायद इसी बहाने वहां का आवश्यकता से अधिक कड़ा ये कानून लोगो की भावनाओं के अनुरुप बदल जाए। 
    चंद दिन पहले ही चीन में भी भारतीय दूतावास के अधिकारियों से स्थानीय लोगो ने बुरा बर्ताव किया था। जाहिर है इन हालात में भारत के लिए जरुरी है कि वो विदेशी मामले से जुड़े हर मोर्चें पर अधिक सक्रिय हो। खासतौर से तब जब भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने कि ओर अग्रसर है। इसलिए जरुरी हो गया है कि भारत सरकार कुछ सख्त रुख अपनाए। हालांकि भारतीय नेता ममता बनर्जी और वृंदा  करात इस मामले में हस्तक्षेप कर चुकी हैं। पर अब भारत सरकार को इस मसले  पर तत्काल दिल्ली में नार्वे के राजूदत को तलब करना चाहिए, ....ताकि नार्वे के अधिकारियों को भारतीय सभ्यता में माता-पिता और बच्चे की परवरिश का रिश्ता समझ आ सके। साथ ही भारत के सभी दूतावास को और सक्रिय होना होगा। सभी दूतावासों को भारतीय मूल के लोगो की खोज खबर रखना होगा और सतत उनसे संपर्क में रहना होगा। विदेशों में बसे भारतीयों की संख्या इतनी नहीं है कि उनकी दुश्वारी का  पता चलने पर उनतक मदद पहुंचने में समय लगे। 
     वैसे अक्सर विदेश दौरे करते  अपने संतों में से कोई भी यूरोपिय देशों में कम ही जाता है। खासकर उन देशों में जहां अंग्रेजी कम बोली जाती है।    लगता है कि आधुनिक भारत को फिर से स्वामी विवेकानंद की जरुरत है, ,..जो पाश्चात्य सभ्यता को सनातन परंपरा से रुबरु कराए औऱ बताए कि किस तरह से 5000 साल से इंसानी जीवन का हर मानवीय पहलू भारतीय परवरिश में लगातार सम्माहित है।

खबर के लिए यहां क्लिक करें
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/11558566.cms
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गुरुवार, 19 जनवरी 2012

To LoVe 2015: जरूरी है बेवकूफी की सजा ...


चुनाव निशान हाथी को लेकर जिस तरह की बातें हो रही हैं वो मुझे हैरान करती हैं। मुझे लगता है कि वाकई ये देश चल कैसे रहा है। यहां जो लोग बड़ी बड़ी कुर्सियों की जिम्मेदारी संभालते हैं, अगर वो कोई गलत फैसला करते हैं और उससे देश को नुकसान होता है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है, जिम्मेदारी अगर तय भी हो जाए तो नुकसान की भरपाई कैसे होगी ? मैं तो इस मत का हूं कि अगर किसी हुक्मरान के किसी गलत फैसले से सरकारी खर्च बढता है तो वो रकम उस हुक्मरान से ही वसूली जानी चाहिए, क्योंकि देश के जो हालात हैं, हम किसी एक व्यक्ति की गलती का खामियाजा देश को भुगतने के लिए नहीं छोड़ सकते।
भला हो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन का जिसने अपनी सख्त कार्यप्रणाली से लोगों को बताया कि देश में एक भारत निर्वाचन आयोग जैसी स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था भी है, जो निष्पक्ष चुनाव के लिए कड़े से कडे़ फैसले कर सकती है। ये सब करके दिखाया भी टी एन शेषऩ ने। सच कहूं तो आप किसी से भी बात कर लें और पूछें कि शेषन के पहले भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त कौन था, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कोई उनका नाम नहीं बता पाएगा, क्योंकि उसके पहले ये आयोग में तैनात होने वाले अफसर किसी तरह समय काटते थे और सेवानिवृत्त होकर घर बैठ जाते थे। खैर शेषन के बाद 10 साल तो ठीक से चला, लेकिन उसके बाद फिर उसी ढर्रे पर आयोग लौट रहा है। अब निष्पक्ष होकर कड़ा फैसला लेने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते।
ताजा मामला लेते हैं बीएसपी यानि मायावती की पार्टी के चुनाव निशान हाथी का। मायावती ने सरकारी धन का दुरुपयोग कर पूरे प्रदेश में कई पार्क बनवा दिए। पार्क का नाम दलित नेताओं के नाम पर रखा। मुख्यमंत्री मायावती इस कदर बेलगाम हैं कि उन्होंने अपनी पार्टी के संस्थापक कांशीराम और खुद अपनी मूर्तियां तो पार्क में लगवाई हीं, पार्टी के चुनाव निशान हाथी को भी खूब इस्तेमाल किया। पार्क में एक दो जगह पर हाथी की प्रतिमा रख दी जाती, तो किसी को कोई परहेज नहीं था, लेकिन हजारों मूर्तियां रखे जाने से बवाल होना ही था।
बवाल हुआ और ये मामला निर्वाचन आयोग पहुंच गया। लेकिन इस गल्ती के लिए आयोग को सजा सुनाना चाहिए था बीएसपी सुप्रीमों के खिलाफ, लेकिन आयोग ने सजा सुनाया सरकारी खजाने के खिलाफ। आयोग का फैसला तो मायावती के फैसले से भी ज्यादा खराब है। मुख्य चुनाव  आयुक्त ने कहा कि चुनाव तक सभी मूर्तियों को ढक दिया जाए। बताया जा रहा है कि एक अनुमान के मुताबिक केवल लखनऊ और नोएडा में ही मूर्तियों को ढकने में पांच करोड रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं। अभी इन मूर्तियों को ढकने में खर्च हुआ और चुनाव बाद इसे हटाने में खर्च किया जाएगा। मैं एक सवाल पूछता हूं ये मूर्तियां अगर आज गलत हैं, तो कल भी गलत होंगी। ऐसे में क्या अब हर चुनाव में मूर्तियों को ढकना और उतारऩा होगा। इस पर जो खर्च आएगा, उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा, फिर अगर ऐसा है तब तो इसके लिए सरकार को एक स्थाई फंड बनाना होगा। मुझे नहीं लगता कि इसका कोई जवाब निर्वाचन आयोग के पास होगा। जिस देश में जिंदा हाथियों के रखरखाव का मुकम्मल इंतजाम ना हो, उस देश में पत्थर की मूर्तियों को ढकने और उतारने पर करोडों रुपये पानी की तरह बहाने को क्या जायज ठहराया जा सकता है। मेरा मानना है कि कोई भी इसे सही फैसला नहीं मानेगा।

निर्वाचन आयोग के पास किसी भी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न जब्त करने और उसे बदलने का अधिकार है। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर आयोग ने अपने इस अधिकार का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। हैरानी तो इस बात पर होती है कि बीएसपी सुप्रीमों मायावती इतने पर भी नहीं मानतीं कि उन्होंने कुछ गलत किया है। उनका तर्क है कि उनके चुनाव निशान में जो हाथी है, उसका सूंड नीचे है जबकि पार्कों में लगे हाथियों का सूंड ऊपर है। इसलिए ये कहना कि चुनाव निशान का दुरुपयोग किया गया है, वो गलत है। अब मुझे लगता है कि आयोग को मुझे समझाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, अगर मायावती मानती हैं कि उनके चुनाव निशान और पार्क के हाथियों में अंतर है, वो एक जैसे नहीं है, तो आयोग को उनकी बात मानते हुए सूबे के निर्दलीय उम्मीदवारों को सूड ऊपर किए हाथी चुनाव निशान आवंटित कर दिया जाना चाहिए, फिर मैं देखता हूं कि मायावती को आपत्ति होती या नहीं। लेकिन आयोग ने जो फैसला सुनाया, उससे तो सरकारी खजाने पर ही बोझ बढ़ा है।
भारत निर्वाचन आयोग के फैसले को मैं तो सही नहीं ठहरा सकता, बल्कि मुझे लगता है कि इस मामले को न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए कि आयोग का फैसला गलत है, क्योंकि ये सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाने वाला है। इतना ही नहीं इस गलत फैसले जो नुकसान  हुआ है, उसकी भरपाई भी मुख्य चुनाव आयुक्त से ही की जानी चाहिए। कड़ाके की इस ठंड में इंसान के शरीर पर एक कपडा नहीं है, किसी तरह वो आग के पास बैठ कर रात गुजार रहे हैं और पत्थर की इन मूर्तियों को मंहगे कपडों से ढका गया है। आखिर इस बेवकूफी की सजा तो मिलनी ही चाहिए ना।  



 
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बुधवार, 18 जनवरी 2012

To LoVe 2015: wikipedia closed down its Services....!!!!!



Imagine a World


Without Free Knowledge
For over a decade, we have spent millions of hours building the largest encyclopedia in human history. Right now, the U.S. Congress is considering legislation that could fatally damage the free and open Internet. For 24 hours, to raise awareness, we are blacking out Wikipedia. Learn more.
Make your voice heard

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मंगलवार, 17 जनवरी 2012

To LoVe 2015: Car maker Maruti hikes their prices about Rs 2,400-17,000 approx.







  • Maruti Suzuki India Ltd which is also well known as  India’s largest carmaker on Jan 2012 announced that they ready to raised prices of all its cars barring the entry-level sedan, Dzire, by Rs 2,400-17,000.


  • The price of the SX4 was the least affected, going up Rs 2,400 per unit. The biggest hike, of Rs 17,000, was on the diesel variant of its New model " Swift ", which has a waiting period of over 8 months.
  • Maruti had warned of the price hike last year 2011. That hepls to gain in its shares, they gained 10.48% on the Bombay Stock Exchange at Rs 1,109.95.
Reason:
  • Price raised due to the  impact of rising input costs and adverse foreign exchange fluctuation in the last six months,” the company said. The Dzire was left untouched as Maruti is set to launch a new smaller version next month.
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रविवार, 15 जनवरी 2012

To LoVe 2015: Asian Shooting Championship DOHA 2012

12th Asian Championship Doha,Qatar

 

Dates

11.01 – Arrival day;
12.01 – Official training day, Opening Ceremony, Technical Meeting;
13-21.01 – Competition days;
22.01 – Departure day;
 
Venue

Competitions will be conducted in
Lusail Shooting Complex, venue of the 15th Asian Games 2006 and 3rd  Asian Air Gun Championships 2009. It is located 12 km away from the north outskirt of Doha. The Complex is under upgrading currently. 

For the competition time the facilities are planned to be as follows:

10m range: indoor, 80 firing lanes, equipped with electronic target machines Sius-Ascor
 
25m range: outdoor, 12 target groups, 60 firing lanes equipped with electronic target
machines Sius-Ascor, shooting direction is pointed to the North, targets are covered from direct sunlight 50m range: outdoor, 80 firing lanes equipped with electronic target machines Sius-Ascor, shooting direction is pointed to the North, targets are covered from direct sunlight 

10m Running Target range: indoor, 3 electronic target machines Sius-Ascor Final hall (Rifle/Pistol): 10 firing lanes 50 and 10m, 3 target groups 25m equipped with electronic target machines Sius-Ascor 6 combined shotgun ranges are pointed to the North. They are equipped with Laporte target throwing machines and electronic scoreboards manufactured by Elettronica Progetti

Events - categories


1  10m Air Rifle  
2  10m Air Pistol  
3  10m Running Target
4  10m Running Target Mixed 
5  50m Rifle Prone ..


6  50m Three Positions 
7  50m Pistol 
8  25m Rapid Fire Pistol
9  25m Standard Pistol 
10  25m Pistol
11  25m Center Fire Pistol 
12  Skeet  
13  Trap 
14  Double Trap  

All the Olympic events for both categories – senior and junior – will be conducted with finals.

For the period of competitions shooters of the junior category are born in 1992 or younger.

National Federations may enter three shooters in each competition event plus two extra shooters for MQS in all Olympic events. For non-Olympic events maximum entries are three individual shooters.
Team events - three competition shooters from one country may complete a team for this event.



Entry fees

Entry fees are as follows:
For each shooter in each event – 150 USD
For each team – 75 USD
For each trainer, coach or any other accompanying team official – 50 USD

Payments will be accepted in the Lusail Shooting Complex in US Dollars or Qatari Riyals.
Personal checks and credit cards can not be accepted. Advanced payment of fees is not essential but may be completed to the following bank account:
 
Beneficiary: Qatar Shooting & Archery Association
IBQ: International Bank of Qatar
Address: P.O.Box 2001, Suhaim Bin Hamad Street, Doha, State of Qatar
Account Number: 0001-500009-001
Swift code: IBOQQAQA 
Tel: (+974)44478000
Fax:(+974)44473745


(!) In case of bank transfer please notify the Organizing Committee as soon as possible
regarding details of payment.

Entry process and deadlines

Shooter’s ISSF ID number is compulsory for competition entry. It is the responsibility of
delegations to obtain valid ID numbers for all shooters before the final entry deadline. 

Any entry after the final entry deadline will incur additional penalty according to ISSF Rule 3.7.3.4.3 and ASC Rule 8.4.1.

The deadlines for the entry end registration forms are as follows: 


Entry visas
 

Entry visas for participants will be issued according to the legal visa procedure of the State of Qatar. The Visa Request forms should be sent for each participant along with clear photocopy of passport. Please send the passport copies by courier mail or as attachment to e-mail. Faxed copies of passports can not be proceeded. Original visas will be kept in Doha International airport. Copies of entry visas for all participants will be forwarded to the National Federations and should be presented on passport control upon arrival.

Firearms and ammunition permits
 
Temporary importation permit for guns will be issued upon arrival according to the
Competition Gun Form sent.  The guns and ammunition will be transported from airport to the stores in the Lusail Shooting Complex and back to the airport at the end of the competitions. It is strictly prohibited to take guns to the hotels for any purpose. 
Accommodation

Accommodation offer will be issued by 30.06.2011.

Transportation
 

Transportation from airport to official hotels and from official hotels to the Shooting Complex will be provided to all participants starting from the day of arrival (11.01) until the day of departure (22.01).

Weather

The averages of temperature for January in Doha are as follows:
Min: 13C
Max: 20C
The average precipitation is 12mm.
 
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12th Asian Shooting Championships - Doha, Qatar
Useful Information

LIVE TICKER
Results can be viewed here or here

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12th Asian Shooting Championships - Invitation
::
12th Asian Shooting Championships - General Information and Its Updated Info
::
Final Program as of 25/12/2011
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All Relevant Final Forms
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Source:ASIA-Championship
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To LoVe 2015: रात भर जागता है इंदौर ...

प सोच रहे होंगे अरे भाई रात भर जागने का क्या मतलब है, क्या लोग इतना काम करते हैं कि रतजगा करना पड़ता है, तो मैं आपको बता दूं ये काम के चलते नहीं जागते। इंदौरी सच में बहुत चटोरे यानि खाने पीने के शौकीन हैं। यहां लोग डिनर के बाद जितना कुछ मीठा और चटपटा खाते हैं, हम पूरे दिन उतना नहीं खा सकते। मैं बात कर रहा हूं इंदौर के सर्राफा बाजार की, जहां शाम होते ही सोने चांदी की दुकानें बंद हो जाती हैं और ये पूरा बाजार सज जाता है खाने पीने के व्यंजनों से। खैर कुछ चीजें शहर के मिजाज पर भी निर्भर होती हैं। यात्रा के इसी क्रम में मेरा एक प्रवास इंदौर में भी रहा है। पिछले हफ्ते की ही बात है मुझे उज्जैन जाकर बाबा महाकालेश्वर का दर्शन करना था। इसके लिए मैं इंदौर पहुंचा अपने इंजीनियर मित्र श्री एस एस वर्मा जी के घर। उनकी पत्नी कविता वर्मा जी वैसे तो मैथ की टीचर हैं, पर उनकी ब्लाग लिखने में बहुत ज्यादा रुचि है। काफी समय से वो इस ब्लाग परिवार से जुडी हुई हैं।

वर्मा जी के यहां मैं दोपहर में पहुंचा और घंटे भर बाद ही हम बाबा के दर्शन को उज्जैन के लिए रवाना हो गए। डेढ घंटे के सफर के बाद हम बाबा के मंदिर में थे और खूब अच्छी तरह से दर्शन के बाद हम वापस इंदौर आ गए। एक छोटे से वाकये का अगर यहां जिक्र ना करुं तो ऐसा लगेगा कि बात अधूरी रह गई। बिल्कुल शहर में आकर हम घर का रास्ता भूल गए। लोगों से पूछते पाछते आगे बढ रहे थे। काफी पूछताछ कर चुके लेकिन घर तक पहुंच नहीं पा रहे थे, हमने सोचा रास्ता आटो वाले से पूछते हैं, वो ठीक से बता देगा। बस फिर क्या एक आटो वाले से रास्ता पूछ लिया, बेचारा बहुत ही आत्मीयता से आटो से उतर कर हमारी गाडी के पास आया और रास्ता समझाने लगा। लेकिन जब तक वो दूर था तो रास्ता बता रहा था, पास आकर जब उसने मुझे देखा तो एक आफर दिया, बोला आप 50 रुपये दो हम आटो से आगे आगे चलते हैं आप मेरे पीछे आ जाओ। मेरी बोलती बंद हो गई। खैर मैने तुरंत अपनी शकल शीशे में देखी, क्या सच में मैं देखने में बेवकूफ लगता हूं ? इस आटो वाले ने आखिर ऐसा क्यों कहा। बहरहाल हम उसके बताए रास्ते पर कुछ ही दूर आगे बढे कि एक ऊंची बिल्डिंग से हमें रास्ते की पहचान हो गई। लेकिम मैं आज भी उस आटो वाले को भुला नहीं पाया हूं।

 वैसे तो मैं अपने परिवार से 700 सौ किलोमीटर से ज्यादा दूर था, लेकिन यहां सब लोगों के साथ वाकई नहीं लगा कि मैं अपने घर में नहीं हूं। दरअसल वर्मा जी के परिवार और हमारे परिवार में एक बडी समानता है। वर्मा जी की दो बेटियां हैं और मेरी भी। अंतर महज इतना है कि मेरी बडी बेटी की 11 वीं की स्टूडैंट है और वर्मा जी की छोटी बेटी इसी क्लास में पढ रही है। हां और एक दोनों में अंतर भी है। मैं नानवेज का शौकीन लेकिन पूरा वर्मा परिवार संत है, हालाकि हमारे यहां मैडम भी शाकाहारी ही हैं। बात खाने की शुरू ही हो गई है तो इंदौर के सर्राफा बाजार का एक चक्कर लगा ही आते हैं। सच कहूं तो इंदौर की कोई शाम सर्राफा बाजार के बगैर पूरी हो ही नहीं सकती। शाम सात बजे से इस बाजार में रौनक शुरू होती है और देर रात दो बजे कई बार तो तड़के तीन बजे तक यहां ऐसी चहल पहल रहती है, जैसे शाम के छह बज रहे हों। दरअसल इंदौर में मुझे एक रात ही रुकना था और हम इस दिन को पूरी तरह यादगार बना देना चाहते थे। उज्जैन से वापस लौटने के बाद थोड़ी थकान थी, क्योंकि पूरी रात ट्रेन का सफर करके यहां पहुंचे थे और उसके तुरंत बाद उज्जैन से आए थे। लिहाजा हम सब डिनर के लिए चले गए इंदौर के नामचीन क्लब साया जी। अच्छा क्लब है, शाम को एक हजार के करीब लोग यहां मौजूद रहते हैं। ट्रिपल डी यानि ड्रिंक्स, डिनर डांस सबकुछ यहां सलीके से चलता रहता है। साया जी में डिनर करते हुए ही 11 बज चुके थे, इस समय आमतौर पर लोग सोने की तैयारी या यूं कहे कि सो चुके होते हैं। पर इंदौर का क्या कहना। यहां से हमारी सवारी निकल पड़ी मशहूर सर्ऱाफा बाजार के लिए।

इतनी रात में सर्राफा बाजार की चकाचौंध वाकई मेरे लिए चौकाने वाली थी। लग ही नहीं रहा था कि इस वक्त रात के एक बजने वाले हैं। पकवानों के नाम गिना दूं तो आपके मुंह में भी पानी आ जाएगा। रबडी, गुलाब जामुन, मालपुआ, कलाकंद, गाजर का हलवा, श्रीखंड,कुल्फी, पानी पूरी, पाव भाजी, चाट, चाईनीज, साबूदाने की खिचड़ी, आलू टिक्की, मसाला डोसा, पिज्जा, खमड, मूंगदाल, बर्फ का गोला, सैंडविच, फाफडा, गराडू ये सब तो उन चीजों के नाम मैने गिनाएं जिन्हें मैं जानता था। सैकडों ऐसे पकवान जो मेरे लिए नए थे। वर्मा जी और कविता मैडम का लगातार आग्रह कि मैं यहां भी कुछ व्यंजनों का स्वाद लूं, पर सच बताऊं पेट ने बिल्कुल हाथ खड़े कर दिए। हालाकि ये बात तो मैने पहले ही बता दिया था कि अब मेरे लिए तो कुछ भी खाना संभव नहीं है, लेकिन कविता जी को लग रहा था कि शायद बाजार घूमें तो खाने का लालच आ जाए, और मैं कुछ चीजें खाने को तैयार हो जाऊं, पर सच में मुश्किल था अब मेरे लिए।

ओह.. एक बडी गल्ती हो गई हम सीधे डिनर पर आ गए, लंच की बात ही छोड़ दी मैने। लंच के दौरान इंदौरी सेव की सब्जी की बात ना हो तो खाने की बात पूरी हो ही नहीं सकती। मैं दो साल पहले रतलाम से एक शूट पूरा करने के बाद दिल्ली वापस आ रहा था तो मुझे इंदौर से फ्लाइट लेनी थी। उस समय इंदौर पहुंचने पर हमने किसी होटल में लंच किया तो वहां हमने पहली  बार  सेव की सब्जी खाई। मुझे ही नहीं पूरी मेरी टीम को ये सब्जी बहुत अच्छी लगी। ये स्वाद मुंह में लगा हुआ था, इसलिए मैने इंदौर में कविता जी से इस सब्जी के बारे में बात की। उन्होंने मुझे बताया नहीं कि मैं लंच में ये सब्जी भी बना रही हूं, पर खाने की टेबिल पर इस सब्जी की वजह से मेरा भोजन ज्यादा हो गया। इतना ही नहीं आप हैरान होंगे कि मैं 12 घंटे से ज्यादा का सफर करके अगले दिन जब दिल्ली वापस आया तो हमने अपने घर भी सेव की सब्जी खुद ही बनाई और सबने इसका स्वाद लिया।

बात खाने पीने की चल रही है तो ये बात पूरी ही कर ली जाए। बीजेपी नेता सुमित्रा महाजन दिल्ली में हर साल पत्रकारों को लंच पर बुलाती हैं और यहां लंच में दाल बाफले होता है, जिसे बनाने के लिए खासतौर पर इंदौर से कारीगर आते हैं। मैने दाल बाफले का नाम भी पहली दफा यहीं सुना। इंदौर पहुंचा तो मुझे दाल बाफले की बात याद आ गई। मैने बातचीत के दौरान इसकी चर्चा कविता जी से कर दी। मेरा चर्चा करना की अगली सुबह दाल बाफले की पार्टी हो गई। भाई क्या कहूं दाल बाफले के बारे में..। मैनें तो सच में बहुत स्वाद लेकर खाया। आज हफ्ते भर बाद जब इसकी बात कर रहा हूं तो लग रहा है कि दाल बाफले की प्लेट सजी है और मैं बेटी क्रुति और कविता जी के साथ भोजन कर रहा हूं। हालाकि मुझे जो लोग थोडा़ भी जानते हैं तो उन्हें पता है कि मैं नानवेज का बहुत ज्यादा शौकीन हूं, कहीं भी रहूं रात में नानवेज खाना ही है. इसे आप मेरी कमजोरी या फिर बीमारी कहें तो भी मुझे ऐतराज नहीं है। लेकिन दो दिन मैने नानवेज बिल्कुल नहीं छूआ, और सच कहूं मुझे नानवेज की याद भी नहीं आई। अगर नानवेज की कमी खली होती तो मैं इंदौर से दिल्ली आने पर पहले नानवेज बनाता इंदौरी सेव की सब्जी थोड़े बनाता।

हां दो लाइन मे अपनी बात भी कर लूं, आमतौर पर मीडिया को लेकर लोगों में तरह तरह की चर्चा होती है, मुझे लगता है कि नकारात्मक बातें ज्यादा ही होती है। लेकिन जर्नलिस्ट किस तरह अपनी जान को जोखिम में डालकर किसी मामले की रिपोर्ट करते हैं, ये सिर्फ कविता जी के लिए नहीं बल्कि बच्चों के लिए भी नई जानकारी थी। मैंने 1989-90 का वो वाकया उनके साथ शेयर किया, जब मैं एक  अखबार में काम करने के दौरान बोड़ो आंदोलन के मुखिया उपेन ब्रह्मा से बात चीत करने कोकराझाड़ के जंगलो में तीन दिन रहा। अरुणांचल के पूर्व मुख्यमंत्री दोरांजी खांडू तवांग से वापस लौटते हुए जिस हेलीकाप्टर दुर्घटना में मारे गए, मैं भी उसी हेलीकाप्टर में एक केंद्रीय मंत्री के साथ गुवाहाटी से तवांग जाते समय तूफान में फंस गया था। मौत के मुंह में 18 सदस्यीय टीम को जाते देख रहा था, उस वक्त मैने खुद महसूस किया कि हम सब अपनी जान से कितना प्यार करते हैं। कोई ऐसा नहीं था जो हंसी खुशी मरने के लिए तैयार हो। खैर एक प्रशंगवश मैंने इस बात का जिक्र कर दिया।
  
एक बात का जिक्र मैं करना चाहता हूं, हालाकि मुझे पता है कि कविता जी को मेरी ये बात ठीक नहीं लगेगी। हो सकता है कि इसके बाद वो दो चार दिन मुझसे नाराज भी रहें, लेकिन जिक्र करना जरूरी है। कविता जी को कार ड्राइव करने का बहुत शौक है, मुझे भी उनके साथ कार में सवारी करने का मौका मिला, बहरहाल हुआ तो कुछ नहीं, लेकिन जब तक कविता जी कार चला रहीं थी, मैं तो शर्ट की जेव में रखे साईंबाबा की तस्वीर को ही याद करता रहा। रेड सिंगनल क्रास करना, वनवे को नजर अंदाज करना, कार को दूसरे गियर से उठाना तो कविता जी के लिए सामान्य बात है। हां भगवान की ही कृपा थी कि कार एक ठेला गाडी में ठुकते ठुकते बच गई। बहरहाल उनके साथ कार का सफर सच में यादगार है, जो आसानी से नहीं भूलाया जा सकता। मजेदार बात तो तब हुई जब हम सब डिनर पर साया जी क्लब ले गए। यहां भी बात शुरू हो गई कार ड्राईविंग की। कविता जी ने पहले बच्चों से फिर वर्मा जी से ये कहलवा लिया कि हां वो बहुत बढिया ड्राइव करती हैं। मुझसे पूछा गया कि मेरी राय क्या है। मैने कहा कि हां ड्राइव कर लेती हैं, पर बढिया करती हैं, मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता हूं। मैने देखा कि कविता जी को मेरी बात अच्छी नहीं लगी, सोचा डिनर का स्वाद फीका हो जाएगा, इसलिए मैने भी हा में हां मिलाया और कहा कि नहीं नहीं आप बहुत अच्छा ड्राइव करती हैं, मैं तो मजाक कर रहा था। 

खैर खाने पीने की बात तो अलग है, लेकिन मैं बार बार एक बात दुहराना चाहता हूं कि इस ब्लाग परिवार को हम ब्लाग परिवार कह कर इसको कम करके आंकते हैं। यहां सच में सभी लोग बहुत व्यस्त हैं। यहां मकान दूसरी और तीसरी  मंजिल को बनाने का काम भी चल रहा है। इसके चलते लगातार मार्केट आना जाना भी लगा रहता है। पर सच कहूं दो दिन कैसे सबके साथ बीत गया, बिल्कुल पता नहीं चला। यहां अपनापन, स्नेह, प्यार, सम्मान सब कुछ तो है। ये सम्मान ही मुझे  प्रेरित करता है कि जहां कहीं भी जाऊं, ब्लागर साथियों से जरूर मुलाकात करूं। 23 जनवरी 29 फरवरी तक उत्तर प्रदेश के 50 से ज्यादा जिलों में चुनाव परिचर्चा करना है। देखिए लौट कर बताऊंगा कि कितने लोगों का साथ मिला।  

अब देखिए कुछ तस्वीरें....




 मालपूआ

















पाव भाजी















स्वादिष्ट मिठाइयां


















आलू की टिक्की














      गराडू














छेने का रसगुल्ला और रस मलाई














        गरम गरम समोसे















इंदौरी पोहा













 वाह- गरम गरम जलेबी













दही बडे का मसाला










वैसे जी तस्वीरें तो मैं एक से बढ़कर एक दिखाता रहूंगा, इससे  तो बस आपकी और हमारी लालच ही बढेगी। मैं एक बार इंदौर का दौरा सिर्फ इसलिए करना चाहता हूं कि सर्ऱाफा बाजार का खूब आनंद ले सकूं। फिर मिलते हैं किसी नए सफर पर....
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