सोमवार, 31 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: आमेर का किला




आमेर का किला 



भारत के प्रदेश राजस्थान की राजधानी जयपुर,जिसे भारत का पेरिस कहा जाता है.इसपर कछवाहा समुदाय के राजपूत शासकों का शासन था।

जयपुर से ११ किलोमीटर दूर ,कभी सात शताव्दियों तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाहा शासकों की राजधानी आमेर ही थी.
यहीं है यह प्रसिद्ध  आमेर का किला.......आरंभिक ढाँचा अब थोड़ा ही बचा है।.


महल के संस्थापक -:



अब इस में भी अलग अलग मत हैं.कहते हैं आमेर 'मीणा

Happy new year 2013




Wish you  a great and successful year 2013 . Hope it bring a lot of happiness to all of you.


Yet another big news updates that 247livenews blog stop its daily updates working and now you all are invited to its personal Website mention below. Hope you like this.


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To LoVe 2015: आ 2013 आ...झिझक मत, आ, साथ आ

हे 2013, तेरा स्वागत कैसे करुं ये समझ नहीँ आ रहा...जाते-जाते 2012 ने ऐसा झन्नाटेदार तमाचा मारा है हमारे दोगले समाज पर...जिसकी गूंज कब तक हमारे कानों में गूंजेगी...कह नहीं सकता.। हां कुछ कानों को ये गूंज सुनाई देनी बंद हो गई है..कुछ कानों ने अपने अंदर रुई ठूस ली है....हर तरफ तेरे स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए लोग नजर आ रहे हैं....नाचकर....गाकर वो तेरा हौसंला बढ़ा रहे हैं आने के लिए.....मैं जानता हूं कि ये देखकर तू झिझकते हुए आ रहा है...तुझे अपने स्वागत को देख शर्म आ रही है....2012 को देख तू ये सोच रहा है कि कहीं तूझे भी ऐसी ही विदाई न मिले....गले लगने वाले लोग कहीं तेरा दम ही न घोंट दे?

2013 तू नई उम्मीदें जगाना चाहता है...पर तू भी क्या करे..जिनके लिए तुने आना है उन्होंने ही बेड़ा गर्क कर रखा है....2012 से पहले हर बीता साल अपने दामन में कई दबी-कुचली आवाजें और आहें चुपचाप समेट कर ले जाता था..ये अवाजें शराब औऱ शोर के बीच दब जाती थीं...आने वाला बरस सोचता था कि चलो शायद अब लोग उसके आने के बाद इन अवाजों को सुनेंगे......पर ऐसा कुछ नहीं होता था....इस बीच सब ये भी भूल गए कि जब कोई क़ौम इतिहास से सबक नहीं लेती..तो इतिहास अपने को बड़े ही क्रूर तरीके से दोहराता है...इसलिए 2012 ने तो सिर्फ अपना एक नियम निभाया है...इतिहास को दोहराया है...एक करारे झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ।

हे 2013, मैं नाच कर तेरा स्वागत नहीं कर रहा हूं...मैं शैंपेन खोलकर भी तेरा स्वागत नहीं कर रहा हूं.....मैं हजारों रुपये लूटा कर रात की रंगिनियों में डूब कर भी तेरा स्वागत नहीं कर सकता....मैं ये सोच कर कि खुश होने के चंद बहाने है...नहीं नाच सकता..नहीं गा सकता....इसलिए हे 2013 मैं न तो 2012 को छोड़ने गया हूं...न ही कहीं तेरा स्वागत करने पहुंचा हूं....
2013...मेरे नए दोस्त... मैं सिर्फ खाली हाथ तेरे गले लग कर तेरा स्वागत करुंगा....2012 ने इधर-उधर के बीच झूलते समाज को जो लात मारी है उसका असर तूझे दिख रहा होगा....इस बार कई आवाजें उठी हैं..जो दबने को तैयार नहीं...ये अवाजें स्कर्ट से कहीं ज्यादा उंची हैं....जिसकी आवाज तूझे भी सुनाई दे रही है...मैं सिर्फ तुझे बता सकता हूं कि इस बार ये अवाजे औऱ उंची होंगी....जिस हर बार दबाया नहीं जा सकेगा...2013 मेरे दोस्त मैं इतनी संत्वाना दे सकता हूं तूझे कि मैं इतना जरुर करुंगा कि कुछ आंखों में पले सपने मरे नहीं...इसलिए आओ मेरे नए दोस्त 2013...औऱ हमारा हौंसला बढ़ाओ..झिझको नहीं मेरे दोस्त ..आओ
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शनिवार, 29 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: दामिनी .. समझ नहीं आ रहा

आज कुछ कहना बेकार है या कुछ न कहना बेकार..समझ नहीं आ रहा.. दामिनी कहूं या तुम्हें सही नाम से पुकारुं समझ नहीं पा रहा...नेशनल ब्राडकास्टर ने कहा है कि तुम्हारे अंतिम संस्कार को न दिखाया जाए..तो क्या उसे नेताओं के लिए आरक्षित छोड़ दे हम, समझ नहीं आ रहा दामिनी....जो  सड़कों पर उतर आए क्या उन सभी को नहीं है तुम्हें अंतिम विदाई देने का हक..समझ नहीं पा रहा हूं...

एक चुटकुला चल रहा है कि एक कुतिया के पीछे चल रहे कुतों ने उससे कहा कि घबराओ मत हम कुत्ते हैं भारतीय मर्द नहीं...ये पढ़कर शर्म से सिर झुकाउं कि भारतीय मर्द हूं, या ये सोच कर गर्व से सिर उठाउं कि एक मर्द जो तुम्हारा साथी था, उसने तुम्हें बचाने की भरपूर कोशिश की, पर तुम्हें न बचाने का दर्द लिए अब तक बदहबास है,, ये समझ नहीं आ रहा है दामिनी....और तुम अपनी इज्जत और अपने साथी की जान बचाने दरिंदों से भिड़ी औऱ मर्मांतक पीड़ा आखिरी सांस तक झेली....अब ऐसी बहादूर लड़की कि बहादूरी पर गर्व करुं या सिर्फ आंसू बहाता रहूं. ये समझ नहीं पा रहा हूं दामिनी....

दिल्ली पुलिस आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहर को बचाती है ये सोच कर गर्व से सिर उठा कर चलूं..या नहीं सोच कर सिर शर्म से झुकाए रहूं कि अगर सुप्रीम कोर्ट के काले शीशों वाली बसों और गाड़ी पर पाबंदी के आदेश का दिल्ली पुलिस ठोस कार्रवाई करके सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इमानदारी से पालन करती तो तुम बच सकती थी पर ऐसा न हुआ, ये समझ नहीं पा रहा हूं....दामिनी

दामिनी तुम तो चली गई....तमाम कष्ट में भी जीने की चाह होने के बाद भी....पर हम तो चोराहे पर खड़े हैं..समझ नहीं पा रहे कि जाएं तो कहां जाए....आज जाकर पता चला कि तुम एकदम करीब ही रहती थी दिल्ली में...अब ये जानने के बाद शर्म से सिर झुकाउं या नहीं ये भी समझ नहीं आ रहा है दामिनी.....

देखा दामिनी न समझते हुए भी कितना बक दिया है मैने ....अब समझ नहीं पा रहा हूं कि औऱ बकबक करुं या न करुं दामिनि.....?????????????
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To LoVe 2015: आप बताएं ! नायक या खलनायक ...


दिल्ली गैंगरेप पीड़ित बेटी की मौत ने देश को हिलाकर रख दिया है। इस पूरे घटनाक्रम को देखता हूं तो मुझे बलात्कारियों से कहीं ज्यादा गुस्सा देश की कमजोर सरकार से है। सोनिया गांधी महिला हैं, मैं उन पर सख्त टिप्पणी नहीं करना चाहता, लेकिन मुझे पक्का भरोसा है कि देश के बर्बादी की जब भी कभी कहानी लिखी जाएगी तो सोनिया गांधी का  नाम सबसे ऊपर  होगा। उन्होंने देश के प्रमुख पदों पर ऐसे कमजोर, गिजगिज, निरीह आदमी को बैठा दिया, जिससे देश की ऐसी तैसी हो जाए। प्रधानमंत्री बनाया मनमोहन सिंह को और गृहमंत्री बना दिया सुशील कुमार शिंदे को। अब ये दोनों कितने सक्षम है, देश की जनता जानती है। बहरहाल इन बदबूदार चेहरों की कल्पना मात्र से सिर शर्म से झुक जाता है पर ये चिकने घढ़े इस सब से बेपरवाह अपने राजनीतिक दाँव-पेचों से असल मुद्दों से जनता को भटकाने का खेल खेलते रहे हैं।

नाराणय दत्त तिवारी
आइये आज आपको मिलाते हैं कुछ ऐसे लोगों से जो हमारे बीच में ही हैं। ये देश की अगुवाई करते रहे हैं, इनके नाम के आगे हमें माननीय लगाने को मजबूर होना पड़ता है। ये ऐसे शख्स हैं जो होने वाले मुख्यमंत्री को शपथ दिलाते हैं। पहले इन्हीं की बात कर लें, नाम है नारायण दत्त तिवारी। इन्हें अगर हम रसिया तिवारी कहें तो गलत नहीं होगा। आंध्र प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए इनका ऐसा वीडियो बाहर आया, जिससे पूरा देश सन्न रह गया। आपको  पता है इनकी उम्र 80 के पार हो चुकी है। हम सब जानते हैं कि उज्जवला शर्मा और उनके बेटे रोहित शर्मा को न्याय के लिए कानून का सहारा लेना पड़ा। आखिर में डीएनए टेस्ट के बाद ये साफ हो गया कि रोहित शेखर कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी का बेटा है। तिवारी की करतूतों पर देश भले शर्मिंदा हो, पर तिवारी शर्मिंदा होंगे, लगता नहीं है।

गोपाल कांडा
हरियाणा के पूर्वमंत्री गोपाल कांडा सत्ता के गलियारे का काफी रसूखदार शख्स है। आलीशान हवेलियों में शानो शौकत से रहने के आदी कांडा ने देश की बेटी गीतिका का जीना मुहाल कर दिया था। इसके व्यवहार से वो इतना परेशान हो गई थी कि इसके कंपनी की नौकरी छोड़कर चली गई। लेकिन इस हैवान ने उसे परेशान करना नहीं छोड़ा। हालत ये हो गई कि बेचारी गीतिका फांसी के फंदे पर झूल गई। हालाकि बेटी गीतिका ने जाते जाते एक सुसाइड नोट छोड़ दिया, जिससे इस काले करतूतों वाले मंत्री का असली चेहरा देश के सामने आ जाए। गोपाल कांडा का असली चेहरा सामने आया, उसे हरियाणा के मंत्रिमंडल से बाहर किया गया, बाद में वो जेल गया। लेकिन जेल में इसके लिए वीआईपी सुविधाएं उपलब्ध थीं। एक ओर देश बलात्कारियों के लिए फांसी मांग रहा है, वहीं देश के अफसर ऐसे लोगों को जेल में भी वीआईपी सुविधा देकर जी हजूरी करते रहते हैं।

चंद्र मोहन उर्फ चांद मोहम्मद
ये शख्स किसी पहचान को मोहताज नहीं है। हरियाणा के उप मुख्यमंत्री रहे हैं। लेकिन उप मुख्यमंत्री के तौर पर इन्होंने क्या काम किया, ये तो देश को नहीं पता। लेकिन शादी शुदा होते हुए भी दूसरी शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन किया और चंद्र मोहन से बन गए चांद मोहम्मद। इन्होंने अपनी प्रेमिका अनुराधा बाली का भी धर्म परिवर्तन कराया और वो हो गई फिजा। दोनों ने शादी कर ली। मगर ये शादी ज्यादा दिन नहीं चली, महीने दो महीने में ही तलाक हो गया। शादी टूटने के बाद कुछ दिन तक तो अनुराधा उर्फ फिजा काफी आक्रामक रही। वो चंद्रमोहन और उसके परिवार को लगातार कठघरे में खड़ा करती रही। बाद मे ना जाने क्या हुआ कि फिजा का शव उसके घर में ही पंखे से लटका मिला। आज अनुराधा बाली उर्फ़ फिज़ा की संदिग्ध मौत ने राजनेताओं की चाल, चेहरा और चरित्र को बेपर्दा कर दिया ! अपनी हवस और मौजमस्ती के लिये ये नेता अपने माँ-बाप,भाई बहन , बीवी बच्चे और यहाँ तक कि दीन और इमान को भी छोडने में रति भर नही झिझके, तो सोचिये कि किस तरह के शासन/प्रशासन की हम इनसे उम्मीद लगाए बैठे हैं ?

अमर मणि त्रिपाठी
उत्तर प्रदेश के बड़े और ताकतवर नेताओं में अमरमणि त्रिपाठी का नाम भी शुमार है। कवियित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या में अमरमणि और उनकी पत्नी दोनों आरोपी हैं। कोर्ट ने दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी और जांच में यह बात सामने आई कि हत्या के वक्त मधुमिता गर्भवती थी और अमरमणि के इशारे पर ही उनके गुर्गे पांडेय और राय उसके घर जाकर मधुमिता को गोली मारी थी। सुनवाई के दौरान सीबीआई ने जो तथ्य अदालत में रखे थे, कोर्ट ने उससे सहमति जताई थी। इसी आधार पर कोर्ट ने अमरमणि उनकी पत्नी और उनके दो गुर्गों कुल मिलाकर चार लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। तत्कालीन सरकार में मंत्री रहे अमरमणि त्रिपाठी से मधुमिता के काफी करीबी रिश्ते थे। बताया जाता है कि मधुमिता मां बनने वाली है यह बात जैसे ही अमरमणि को पता चली उसने अपनी पत्नी संग मिलकर उसकी हत्या करवा दी। क्योंकि मधुमिता को अमरमणि के काले कारनामों का पता था, उसने धमकी दी थी कि अगर वो उनसे शादी नहीं करते तो उनके सारे राज उगल देगी। जिसके बाद मधुमिता को खतरनाक मौत मिल गयी।

स्वामी नित्यानंद
खद्दरधारी नेताओं पर तो बलात्कार के आरोप काफी समय से लगते रहे हैं, लेकिन बलात्कार के मामले में भगवाधारी भी पीछे नहीं रहे हैं। इसमें स्वामी नित्यानंद की तो बकायदा सीडी बाहर आ गई थी, जिसमें वो एक अभिनेत्री के साथ अश्लील हरकत करते हुए कैमरे में कैद हो गए थे। इस सीड़ी के बाद काफी बवाल मचा था, उनके खिलाफ हजारों लोग गुस्से में सड़कों पर निकल आए, जगह जगह उनका पुतला  फूंका जाने लगा। उनके आश्रम में छापे पड़े, लेकिन स्वामी नित्यानंद भूमिगत हो गए थे। वैसे नित्यानंद पर महिलाओं के साथ अश्लीलता का आरोप कोई नया नहीं है। उन पर अमेरिकी महिला के साथ पांच साल पहले उसका यौन शोषण करने का आरोप लगा था। इस आरोप से भी जनता भड़क गयी थी और कन्नड़ संगठनों ने प्रदर्शन भी किया था। नित्‍यानंद उस अमेरिकी महिला से कहते थे कि हम भगवान है तुम भगवान के साथ सेक्‍स कर रही हो, यह पाप नहीं है। तुमको स्‍वर्ग प्राप्‍त होगा। हम शंकर है तुम मेरी पार्वती। वाह रे स्वामी जी...


एसपीएस राठौर
सीनियर आईपीएस अफसर एसपीएस राठौर हरियाणा के पूर्व डीजीपी रहे हैं। इन पर जिस तरह का आरोप लगा है, अगर मजबूत कानून होता तो हो सकता  है कि अब तक ये वाकई सजा पा चुके होते।  एक नाबालिग लड़की रुचिका इनके उत्पीड़न से इतना परेशान हो गई कि उसे आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ गया। आरोप तो यहां तक है कि राठौर हमेशा पुलिस के रौब में रहे, यही वजह है कि उनके इशारे पर रुचिका के भाई को भी कई बार थाने पर बुलाकर प्रताड़ित किया जाता रहा है। रुचिका के भाई आशु ने आरोप लगाया था कि छेड़छाड़ मामले के बाद राठौड़ के इशारे पर उसके खिलाफ वाहन चोरी का झूठा मुकदमा दर्ज किया गया और हरियाणा पुलिस ने उसे प्रताड़ित किया। राठौर उस समय आईजी रैंक का आधिकारी था। इस मामले में सीबीआई की भूमिका पर भी उंगली उठी। मामले की जांच सीबीआई को ही सौंपी गई थी, लगभग सभी आरोपों में सीबीआई ने रटारटाया जवाब दिया कि जो आरोप  लगाए गए हैं, उनका कोई साक्ष्य नहीं मिला। वो तो भला हो रुचिका की सहेली और उसके परिवार का जो बगैर डरे, इस मामले  में लड़ते रहे, जिससे कुछ दिन के लिए ही सही कम से कम राठौर को जेल की हवा तो खानी पड़ी, वैसे तो राठौर पर कोई असर नहीं, वो तो कोर्ट में भी मुस्कुराता खड़ा रहता था।


स्वामी चिन्मयानंद
नित्यानंद का तो वीडियो मार्केट में आ गया था, लेकिन स्वामी चिन्मयानंद का मामला बिल्कुल अलग है। यहां तो स्वामी की शिष्या ने ही बकायदा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है। रिपोर्ट में स्वामी पर बलात्कार, अपहरण और गला दबाकर जान से मारने की बात कही गई है। अब इन स्वामी को भी जान लें, ये स्वामी कोई और नहीं बल्कि बीजेपी नेता, पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद हैं। इन पर गंभीर आरोप लगाने वाली इनकी ही शिष्या है, जिनका नाम है साध्वी चिदर्पिता। साध्वी बनने से पहले इनका नाम कोमल गुप्ता था। कोमल की बचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी। ये मां के साथ लगभग हर शाम मंदिर जाती थी। इसी बीच मां की सहेली ने हरिद्वार में भागवत कथा का आयोजन किया और इन्हें भी वहां मां के साथ जाने का अवसर मिला। उसी समय कोमल गुप्ता का स्वामी चिन्मयानन्द से परिचय हुआ। स्वामी जी उस समय जौनपुर से सांसद थे। तब कोमल की उम्र लगभग बीस वर्ष थी। स्वामी को ना जाने कोमल में क्या बात नजर आया कि वे कोमल को संन्यास के लिये मानसिक रूप से तैयार करने लगे। मैं कह नहीं सकता कि कोमल नासमझ थी या वो सन्यास लेकर नई दुनिया में खो जाना चाहती थी। बहरहाल कुछ भी हो कोमल ने स्वामी की बातों में हामी भरी और सन्यास के लिए राजी हो गई। स्वामी चिन्मयानंद ने कोमल को दीक्षा देने के साथ ही उसका नाम बदल कर साध्वी चितर्पिता कर दिया। दीक्षा के बाद साध्वी का नया ठिकाना बना शाहजहांपुर का मुमुक्ष आश्रम। चिन्मयानंद ने साध्वी को दीक्षा तो दी पर उसके सन्यास की बात को टालते रहे। ऐसा क्यों, इस रहस्य से स्वामी और साध्वी ही पर्दा हटा सकते हैं, बहरहाल स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ बलात्कार का रिपोर्ट लिखाने के बाद कोमल ने एक पत्रकार से शादी कर ली और वैवाहिक जीवन में हैं।

शशिभूषण सुशील
शशिभूषण सुशील सामान्य व्यक्ति नहीं है, ये आईएएस अधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश में तैनात हैं। इन अफसरों की जिम्मेदारी  होती है कि कानून की रक्षा कराएं और कानून तोड़ने वालों को सजा दिलाएं। लेकिन इस अफसर ने तो मर्यादा की सारी सीमाएं ही तोड़ दीं। यूपी में तकनीकी शिक्षा विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात वर्ष 2001 बैच के आईएएस अधिकारी शशिभूषण सुशील के खिलाफ एक युवती की शिकायत पर भारतीय दंड विधान की धारा 354, 376, 506 और 511 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। पीडित लडकी के साथ ही सफर कर रही उसकी मां द्वारा दर्ज करायी गयी रिपोर्ट के मुताबिक भूषण गाजियाबाद स्टेशन से लखनऊ मेल ट्रेन के एसी सेकेंड डिब्बे में सवार हुए। आरोप है कि सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में काम करने वाली महिला की मां जब शौचालय गयी तो भूषण ने अकेली पाकर उस युवती से बलात्कार की कोशिश की, इसकी शिकायत ट्रेन में तैनात सुरक्षा जवानों तथा कंडक्टर से भी की गयी। ट्रेन के लखनऊ पहुंचने पर राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) ने भूषण से करीब चार घंटे तक पूछताछ की और फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें बाद में स्थानीय रेलवे अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। सबसे ज्यादा शर्मनाक  बात तो ये रही कि इस आरोपी आईएएस  को बचाने के लिए यूपी के दर्जनो आईएएस स्टेशन पहुंच गए। इसके बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आरोपी को बचाने के लिए स्टेशन गए आईएएस की रिपोर्ट मांगी तो सब बगले झांकने लगे।

महिपाल मदेरणा
राजस्थान के पूर्वमंत्री महिपाल मदेरणा का नाम भी उनके काम की वजह से लोग नहीं जानते, बल्कि उनका नाम भी भंवरी देवी हत्याकांड के बाद चर्चा में आया। मॉडल से नर्स बनी भंवरी देवी के हत्‍याकांड ने पूरे देश की राजनीति को हिला कर रख दिया था। पहले सेक्‍स फिर ब्‍लू फिल्‍म की सीडी बनाकर ब्‍लैकमेल करने की बात को लेकर भंवरी देवी की हत्‍या कर दी गई। कहा जा रहा  है कि उसके शव को चूना बनाने वाले भट्ठे में फेंक दिया गया था। भंवरी देवी के लापता होने के बाद जब इसकी जांच शुरु हुई तो परत दर परत सारे मामले सामने आ गये। पुलिस की छानबीन के बाद मामला सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआई ने इस मामले में राजस्‍थान के जल संस्‍थान मंत्री महिपाल मदेरणा और कांग्रेस विधायक मलखान सिंह को गिरफ्तार किया। सीबीआई ने जब भंवरी के बैंक एकाउंट को खंगला तो उसके होश उड़ गये। भंवरी देवी के बैंक लॉकर से सैकड़ों सीडियां बरामद हुई जिसमें राजस्‍थान के बड़े नेता और अधिकारियों के आपत्तिजनक फिल्‍म थे। इतना ही नहीं राजस्‍थान के बड़े नेताओं के साथ भंवरी देवी विदेश यात्रा पर भी जा चुकी थी। मगर भंवरी का अंजाम क्‍या हुआ यह पूरा देश जानता है । सीबीआई के ह‍त्‍थे चढ़े भाड़े के अपराधियों ने कबूला कि मदेरणा और मलखान के कहने पर ही उन लोगों ने भंवरी की हत्‍या की थी।


रवींद्र  प्रधान
मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की प्रवक्ता कविता रानी बुलंदशहर स्थित घंसुरपुर गांव में दीवाली की छुट्टी बिताकर 23 अक्टूबर 2006 को मेरठ के लिए रवाना हुई थी, लेकिन वह इंदिरा गांधी वर्किंग विमिन हॉस्टल नहीं पहुंची। उसका मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ हो गया था। इस संबंध में कविता रानी के भाई सतीश ने हॉस्टल पहुंचकर पता किया तो उसके कमरे के दरवाजे पर ताला लगा था। सतीश ने 31 अक्टूबर 2006 को बुलंदशहर स्थित स्याना कोतवाली में कविता की गुमशुदगी दर्ज कराई थी। बाद में स्याना पुलिस ने मामला मेरठ पुलिस के पास स्थानांतरित कर दिया। पुलिस ने मेरठ स्थित हॉस्टल में कविता के कमरे का ताला उसके भाई सतीश की मौजूदगी में तोड़ा। जहां धमकी भरे लेटर और एक डायरी मिली। जिसमें कुछ राजनेताओं के नाम और नंबर थे। पुलिस ने रवींद्र प्रधान, सुलतान, योगेश, अशोक और रवींद्र को गिरफ्तार किया। इनकी गिरफ्तारी के बाद कुछ राजनेताओं के नाम भी उछले। जिसकी वजह से राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया था। 10 जनवरी 2007 को केस सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया गया। सीबीआई ने रवींद्र प्रधान, सुलतान, योगेश,अशोक और रविन्द्र के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में पेश कर दी। केस की सुनवाई के दौरान 29 मई 2008 को डासना जेल में रवींद्र प्रधान की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। गिरफ्तारी के बाद आरोपी सुलतान ने पुलिस और सीबीआई के सामने कविता की हत्या करने का जुर्म कबूल किया। शव को गाजियाबाद स्थित नहर में फेंकने की बाद बताई थी। पुलिस ने कविता का शव बरामद करने के लिए नहर में कई दिनों तक छानबीन की थी। मगर शव बरामद नहीं हुआ था। ( तस्वीर उपलब्ध नहीं )

आनंद सेन
फैजाबाद में कानून की छात्रा शशि भी एक मंत्री आनंद सेन के प्रेम के चंगुल में फंस गयी थी। जिसका खामियाजा भी शशि को अपनी दर्दनाक मौत से चुकाना पड़ा। 22 अक्टूबर 2007 को फैजाबाद में अपने घर से गायब हुई शशि के बारे में लंबी छानबीन के बाद पता चला कि उसकी हत्या कर दी गई है। शशि के पिता एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे। राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवार की तेज तर्रार शशि की आंखों में विधानसभा से चुनाव लड़कर विधायक बनने का सपना था, और इस सपने को साकार करने का सपना शशि को दिखाया खुद आनंद सेन ने। इसी सपने के जरिए शशि आनंद सेन के करीब होती चली गई। नतीजा ये हुआ उसकी दर्दनाक मौत हो गई। फिलहाल आनंद सेन को सजा हुई और वह जमानत पर बाहर भी निकल आये हैं मगर आजतक शशि का शव तक बरामद नहीं हो सका।

सुशील शर्मा
नैना साहनी केस ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। हालांकि यह मामला राजनीति से ज्‍यादा जुड़ा हुआ नहीं था मगर नैना का मित्र सुशील दिल्ली प्रदेश युवक कांग्रेस का अध्यक्ष था। घटना वर्ष 1995 की है। सुशील ने नैना की हत्‍या कर दी और उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। उसके बाद सुशील ने नैना के शव के टुकड़ों को तंदूर में डालकर जला दिया। फिलहाल इस मामले में सुशील को सजा हो चुकी है।

ये तो सिर्फ चुनिंदा घटनाएं हैं। इन घटनाओं से साफ है कि सत्‍ता से नजदीकियां रखने वाली महिलाओं का अंजाम हमेशा बुरा ही हुआ है। पिछले कुछ सालों में जिन महिलाओं की कहानियां सामने आईं हैं वो सत्‍ता और राजनेताओं के करीब तो रहीं मगर उनका अंजाम काफी बुरा हुआ। यहां तक की इन दरिंदे राजनेताओं ने उन्‍हें अपनी जिंदगी से ही हाथ धोने को मजबूर कर दिया। कुछ मामलों में अदालत ने नेताओं को सजा सुनाई तो कुछ पर मुकदमा अभी जारी है। कुछ की तो अभी पुलिसिया जांच चल रही है। दिल्ली गैंगरेप के बाद देश भर में गुस्सा है। बलात्कारियों को फांसी की बात की जा रही है। मेरा भी मानना है कि इन्हें वाकई सख्त सजा होनी चाहिए, लेकिन मैं इस मत का हूं कि अगर कानून पहले से सख्त होता तो ये लोग भी बच नहीं पाते। इन सबको सजा होती तो आज लोगों की हिम्मत ना होती कि वो देश की बेटी के साथ ऐसा सुलूक करते। बहरहाल अब एक उम्मीद जगी है कि सख्त कानून बनेगा और देश की बेटियां सुरक्षित रहेंगी।







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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: शिरड़ी : बाबा के वीआईपी ...


बात बड़े दिन यानि इसी 25 दिसंबर की है। बच्चों के स्कूल की छुट्टी थी,  मुझे भी आफिस से छुट्टी मिल गई, सोचा चलो बड़े दिन पर कुछ बड़ा करते हैं, शिरड़ी चल कर बाबा का दर्शन कर आते हैं। कार्यक्रम ये बना कि 23 दिसंबर की रात कर्नाटक एक्सप्रेस से दिल्ली से चलें  अगले दिन दोपहर तीन बजे के करीब वहां पहुंच जाऊंगा। चूंकि 25 दिसंबर को बड़ा दिन होने की वजह से बाबा का दर्शन आसान नहीं होगा, लिहाजा 24 को ही बाबा का दर्शन कर रात्रि विश्राम किया जाए और अगले दिन शनि महाराज के यहां हाजिरी लगाकर शाम को वापसी की ट्रेन पकड़ी जाए। पर ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि कुहरे की वजह से हमारी ट्रेन लगभग आठ घंटे लेट हो गई। लिहाजा अब 24 तारीख को तो कुछ होना नहीं था, 25 को दर्शन और वापसी भी थी। क्या करता, पूरा सफर मैने वीआईपी दर्शन के इंतजाम में काट दिया।

वैसे मैं शिरड़ी पहले भी कई बार गया हूं और हर बार वीआईपी रास्ते से ही दर्शन करता रहा हूं। सच कहूं तो मुझे पता भी नहीं था कि यहां लाइन में लगकर दर्शन किया कैसे जाता है। जब भी दर्शन करने गया तो कोई ना कोई साथ होता था, दो तीन कमरो से होता हुआ ना जाने कहां से वो सीधे बाबा के दाहिनी ओर लाकर खड़ा कर देते थे, पलक झपकते दर्शन और मंदिर परिसर से रवाना हो जाता था। इस बार जैसे-जैसे ट्रेन लेट हो रही थी, मेरी धड़कने बढ़ती जा रहीं थीं, मैं सोच रहा था कि कैसे बाबा के और शनि महाराज के दर्शन हो पाएंगे। आप यकीन करें, मै पूरे रास्ते फोन पर लगा रहा कि किसी तरह वीआईपी दर्शन का इंतजाम हो जाए। वैसे ये बड़ा काम नहीं है, हमारे चैनल के रिपोर्टर ही आसानी से पास बनवा देते हैं। लेकिन इस बार दर्शन की तारीख "बड़े दिन" यानि 25 दिसंबर को पड़ गई। इस समय शिरड़ी में बहुत ज्यादा भीड़ है,  इसलिए वहां पास बनाने पर ही रोक लगी हुई थी।

अब मैं जिससे भी बात करुं, सभी हांथ खड़े कर देते कि इस वक्त तो बहुत मुश्किल है। किसी का पास नहीं बन रहा है। बताया गया कि जहां से पास बनते हैं वो आफिस ही बंद कर दिया गया है, इसलिेए पास बनना तो संभव नहीं है। मेरा मन ये मानने को तैयार ही नहीं था कि वीआईपी  दर्शन पूरी तरह बंद होगा। मुझे लगा कि हो सकता है कि हिंदी पत्रकारों की यहां ज्यादा ना चलती हो, लिहाजा मैने मराठी चैनल के भी कुछ पत्रकारों से बात की, पर सबने हाथ खड़े कर दिए। हां मराठी चैनल के एक बंदे ने ये जरूर कहा कि " भाई साहब मुश्किल है, पर हम कोशिश करेंगे, कुछ ना कुछ इंतजाम जरूर होगा "। उसने तो ये बात बड़े ही विश्वास से की, लेकिन मुझे ही भरोसा नहीं हुआ।

पत्रकार बिरादरी, नेता, अफसर सबको  फोन खटखटा चुका तो मुझे ध्यान आया कि अरे मेरा  सहपाठी ही बहुत बड़ा साईं भक्त है। वो साईं संस्थान के ट्रस्टियों में भी शामिल है, ये काम तो उनके लिए बहुत आसान होगा। मैने उन्हें फोन मिलाया, काफी देर तक तो उनका  फोन ही बंद रहा, लेकिन हमारी ट्रेन शिरड़ी पहुंचती, उसके घंटे भर पहले मेरी बात हो गई। उन्होंने कहाकि मैं पांच मिनट में आपको दोबारा फोन करता हूं। मुझे लगा कि अब बाबा ने हमारी बात सुन ली और बेहतर इंतजाम हो ही जाएगा। थोड़ी देर बाद उनका फोन आया, बोले आपको वहां एक यादव जी मिलेंगे, वो आपका सारा इंतजाम करा देंगे। उनका फोन नंबर भी उन्होंने दिया और कहा कि आप एक बार बात कर लें।

दरअसल जिस यादव को मेरे हवाले किया गया था, मै उनसे पहले मिल चुका था, वो वहां बिजली विभाग के कर्मचारी थे और वाकई उन्होंने मुझे एक बार बहुत बढिया दर्शन कराया भी था। लेकिन साल भर पहले हार्ड अटैक से वो नहीं रहे, अब उनकी जगह पर उनका बेटा नौकरी कर रहा है। बेटे से मेरी बात हुई, उसने दर्शन की बात बाद में की, पहले एक होटल की बात की और कहा कि मैने होटल ओके कर दिया है। हालांकि  मैं दिल्ली से चलने के पहले ही नेट के जरिए होटल बुक करा चुका था, उसका कन्फर्मेशन भी मेरे पास आ चुका  था। लेकिन मुझे लगा कि होटल लेने पर ये बंदा और मन से जुटेगा। इसलिए मैने मना नहीं किया और उसके बुक कराए होटल में ही जाने का इरादा कर लिया। ट्रेन रात 10.30 बजे कोपरगांव पहुंची और टैक्सी से लगभग 11 बजे हम शिरड़ी पहुंच गए। यादव जी का बेटा मुझे होटल में मिला, हम कमरे में पहुंचे तो मैने उसे बताया कि मुझे कल ही बाबा और शनि महाराज के दर्शन करने हैं, शाम को वापसी भी है। वापसी की ट्रेन मनमाड़ से है, लिहाजा हमें दोपहर दो बजे के बाद शिरड़ी को छोड़ना होगा। उसने कहा कि "सर मैने तो कुछ दिन पहले ही यहां ज्वाइन किया है, मैं तो दर्शन कराने में कोई मदद नहीं कर सकता, मुझे लगा कि आपको रात में होटल बुक कराने में दिक्कत होगी, लिहाजा मैने ये इंतजाम कर दिया " उसकी बात सुनकर मैं सन्न रह गया।

बहरहाल हम लगभग 26 घंटे ट्रेन का सफर तय करके वहां पहुंचे थे, ट्रेन के एसी 2 बोगी में हमारी बर्थ थी, इसलिए यात्रा आरामदेय ही रही है, लेकिन लंबे सफर से थकान तो स्वाभाविक है। फिर भी मैने बच्चों से कहा कि अब एक ही चारा है, हम सब अभी यानि रात में ही स्नान ध्यान करें और रात में ही 12 बजे लाइन में लग जाते हैं। बाबा के दर्शन को लेकर सभी में उत्साह था, लिहाजा सबने कहा कि ये ठीक है। हम ये बात कर ही रहे थे कि हमारी छोटी बेटी तो स्नान भी कर आईं और बताया कि बाथरूम में गरम पानी नहीं आ रहा है, लेकिन पानी ठीक ठीक है, नहाया जा सकता है। बहरहाल हम सब घंटे भर में ही तैयार होकर नंगे पांव मंदिर की ओर रवाना हो गए। होटल से पैदल मात्र 10 मिनट का रास्ता था मंदिर का, वहां पहुंचे तो दूसरे दर्शनार्थियों का उत्साह देखकर हमारे अँदर भी ऊर्जा का संचार होने लगा।

हमें हाल नंबर तीन में जगह मिली। मतलब हमसे पहले हाल नंबर एक और दो में लोग पहुंच कर लाइन में लग चुके थे। एक हाल में लगभग सात आठ सौ लोग तो जरूर होते होंगे। अनुमान के मुताबिक हमारे आगे लगभग दो हजार लोग होंगे। बारह सवा बाहर बजे रात हम लाइन में लग चुके थे, मंदिर खुलने का समय था सुबह साढे चार बजे। मंदिर  खुलते  ही कांकड आरती होती है ये आप सब जानते हैं। अब मैं इत्मीनान में था कि आरती यहां हाल में लगे टीवी स्क्रिन पर देखेंगे, सुबह छह सात बजे तक हमें दर्शन भी मिल जाएगा। लेकिन बाबा हमारा बहुत इम्तिहान ले चुके थे, जैसे ही मंदिर खुला, लोगों को कांकड़ आरती के लिए मुख्य हाल में जाने की इजाजत मिली, हाल नंबर एक और दो के बाद मेरे हाल का नंबर भी आ गया और हम भी पूरे परिवार के साथ बाबा के सामने मौजूद हो गए और कांकड़ आरती में मैं पहली बार शामिल हुआ।

सुबह के छह नहीं बजे होंगे और हम कांकड आरती, दर्शन, मंदिर का प्रसाद वगैरह लेकर बाहर आ चुके थे। स्वाभाविक है कि पूरी रात के बाद जब भव्य दर्शन करने में कामयाबी मिली थी, तो उत्साह तो था ही। बच्चों से बात होने लगी तो मन से एक बात निकली कि इसके पहले भी कई बार बाबा ने यहां बुलाया तो जरूर, मगर इतना भव्य दर्शन पहली बार दिया है।  फिर मैने वहीं मंदिर में कान पकड़ कर तय किया कि अब आगे से कभी वीआईपी दर्शन के लिए मारा मारी नहीं करुंगा। जब इतनी भीड़ के बाद भी बाबा इतनी सहजता से दर्शन दिए हैं तो सामान्य दिनों में तो क्या कहने। तब तो और आसानी से दर्शन होंगे। यही बात करते हुए हम होटल पहुंचे और देखिए सबकी हिम्मत,  रात भर जागने के बाद भी सबकी यही राय थी कि अभी इसी वक्त शनि महाराज का दर्शन करने निकल पड़ते हैं।

मुझे भी लगा कि बात तो सही है, अगर बिस्तर पर गए तो आलस होगा और जल्दी उठना  मुश्किल हो जाएगा। बस हम सबने एक चाय पी और तुरंत होटल से बाहर आ गए। बाहर निकलते ही एक टैक्सी पर सवार हुए और निकल पड़े शनि महाराज के यहां हाजिरी लगाने। सवा घंटे के सफर के बाद यानि लगभग साढे आठ बजे हम शनि महाराज का भी दर्शन कर खाली हो गए। अब मन में जो शुकून था, उसका अंदाज आप सहज ही लगा सकते हैं। कहां मुझे लग रहा था कि दोनों जगह दर्शन कर पाऊंगा या नहीं, कहां सुबह साढे आठ बजे दर्शन कर हम खाली हो चुके थे। यहीं चाय नाश्ता करने के बाद हम आराम से शिरडी वापस आए और हमने सोचा जब समय है तो क्यों ना साईं बाबा के प्रसादालय में भोजन कर लिया जाए। हम यहां बने नए प्रसादालय पहुंचे, हजारों लोगों की भीड़, लेकिन क्या इंतजाम है, किसी को इंतजार करने की जरूरत नहीं। बमुश्किल यहां 45 मिनट लगे होंगे, हम कूपन लेकर प्रसाद ग्रहण कर चुके थे।

वैसे इस बार कुछ चीजें आंखो में खटकीं भी। बाबा फक्कड़ी स्वभाव के थे, उन्होंने कभी संचय नहीं किया, दिन में भोजन ग्रहण किया तो रात के इंतजाम में नहीं लगे। अब फकीर बाबा के आजू बाजू इतना सोना चांदी जड़ दिया गया है कि वो आंखो में खटकता है। बाबा के बारे में जो कुछ पढ़ा जाता है, वहां का माहौल उससे बिल्कुल अलग होता जा रहा है। कई बार से बाबा के चरण को छूता आ रहा हूं, संगमरमर का वो चरण आज भी आंखों में बसा हुआ है। जब भी बाबा के चरणों को याद करता हूं तो वही संगमरमर का चरण और उस पर पीले रंग का चंदन दो फूल याद आता है। इस बार वहां पहुंचा तो देखा अब पहले वाले चरण को भी बदल दिया गया है, यहां अब सोने के चरण मौजूद हैं, जो इतनी दूर है कि उस पर आप हाथ नहीं लगा सकते। खैर ये तो साईं संस्थान का विषय है, लेकिन मेरा मानना है कि बाबा को साधारण ही रहने दिया जाना चाहिए। इससे लोगों को एक सबक भी मिलता है।

मुझे एक बात बहुत अच्छी लगी। आप भी सुनिए। प्रसादालय में भोजन ग्रहण करने पहुंचा तो काउंटर पर लिखा था, बड़ों का कूपन 40 रुपये का और बच्चों का 20 रुपये। मैने पैसे आगे बढ़ाया तो काउंटर पर पैसे लेने से मना कर दिया। बिना पैसे के कूपन, मुझे बार- बार लग रहा था कि जब काउंटर पर लिखा हुआ है तो आखिर पैसे क्यों नहीं लिए। मैने वहां एक स्टाफ से पूछ ही लिया कि मुझसे पैसे नहीं लिए, तो उसने बताया कि आज का प्रसाद किसी सज्जन की ओर से है। मैने जानना चाहा कि आखिर वो कौन साहब हैं ? पता चला कि उसे भी नाम नहीं पता था, यहां तक की उन सज्जन ने अपना नाम जाहिर करने से मना किया था। आप के साथ भी ऐसा होता होगा कि इलाके में कोई छोटा मोटा धार्मिक आयोजन होता है तो जो कार्ड आपके पास आते हैं, उसमें दो सौ लोगों के नाम दर्ज होते हैं। ये भी लिखा होता है कि पंजीरी का प्रसाद राम प्रसाद की ओर से, चरणामृत का प्रसाद घनश्याम की ओर से, केले का प्रसाद राज कुमार की ओर से, सेब का प्रसाद, जुगुल किशोर और धनिया की पंजीरी करुणा माता की ओर से। आखिर कार्ड पर ये लिखने का क्या मकसद है यही ना कि लोग जान लें की जो प्रसाद वो खा रहे हैं वो भगवान का नहीं घनश्याम का है।

चलते - चलते

मैं एक बार फिर वही बात दुहराना चाहता हूं कि मैने तो वहां कान पकड़ कर तय कर लिया कि अब वीआईपी दर्शन की कभी कोशिश नहीं करुंगा, चाहता हूं कि आप भी एक बार ऐसा करके देखिए। आप खुद महसूस करेंगे कि वीआईपी दर्शन से कहीं ज्यादा शुकून सच्चे श्रद्धालु बनकर दर्शन करने में हैं। वैसे भी अब तो सौ रुपये फीस है, फीस दीजिए वीआईपी बन  जाइये, लेकिन भाइयों बाबा को ही वीआईपी  रहने दीजिए। जय साईं राम !








भव्य प्रसादालय















भक्तों का इंतजार 












( मेरे दूसरे ब्लाग tv स्टेशनhttp://tvstationlive.blogspot.in ) पर भी एक नजर जरूर डालें।  मैने कोशिश की है अपने अंदर झांकने की, यानि ऐसी गंभीर घटनाओं के बाद मीडिया का क्या रोल होना चाहिए, क्या मीडिया को महज भीड़ का हिस्सा बना रहना चाहिए। पढिए. गैंगरेप : मीडिया जिम्मेदार कब होगी ! )
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जिक्र आए उनका

जिक्र आए उनका तो पहले बताया करो
रातों में रोने की अब आदत नहीं रही
ख़यालों से उनके कह दो मत आया करो
पाबंद ए वक़त हूँ फ़ुरसत नहीं रही
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रविवार, 23 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: सूरते हाल दिल्ली..हंगामा है क्यूं बरपा

अमर जवान ज्योती पर अब जवान पीटे जाते हैं
इंडिया गेट औऱ विजय चौक का हाल बुरा है। एक हफ्ते से शांति से चल रहे प्रदर्शन पर पुलिस ने जमकर लाठियां भांजी हैं। लड़कियों और मीडिया के लोगो को भी जमकर पीटा गया। जिनकी रक्षा करने का काम पुलिस का है उन्हीं कि पिटाई करना अब दिल्ली पुलिस का शगल बन गया है। दिल्ली पुलिस का ये बहादुरी भरा काम उनके आकाओं को काफी रास आया होगा। रामलीला ग्राउंड में बाबा रामदेव के निहत्थे अनुयायियों के उपर उठी लाठियां अब जबतब पुलिस आसानी से कहीं भी किसी पर भी बरसाने लगी है।

हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि अगर पुलिस चाहती तो हिंसा फैलाने वाले चंद राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आसानी से गिरफ्तार कर सकती थी...पर ऐसा न करके पुलिस ने उनके बहाने शांति से प्रदर्शन कर रहे लड़के लड़कियों को पीट डाला। इस झड़प में दो पुलिस वाले भी बूरी तरह घायल हुए। मीडिया के एक कैमरामेन को पुलिस वालो ने पीटा। रिपोर्टिंग कर रही लड़की को भी पुलिस ने पीटा जिसके कारण वो घायल हो गई। 
पहला निशाना बसें ही बनतीं हैं

दिल्ली छात्र संगठन के दो ईकाइयों ने हंगामे की शुरुआत की। यानि राजनीति घुसी और शांत प्रदर्शनकारी पीटे। राजधानी की सड़कों पर बसें फिर निशाना बनती हैं आईटीओ पर.... यानि दिल्ली पुलिस कमिश्नर के दफ्तर के पास....आखिर वही हुआ जो मंडल दौर में हुआ था। राजनीतिक लोग घुसे....आंदोलन कमजोर। वैसे यही सियासत में लगे लोगो का मकसद होता है। जबकि आंदोलन करने वाले किसी के बुलावे पर नहीं आएं हैं। ज्यादतर महिलाएं सिर्फ इसलिए आईं हैं क्योंकि वो इस दर्द को समझती हैं। इनमें अधिकतर देश की वो युवा पीढ़ी है जो कॉलेज में पढ़ती है। वो स्वतंत्रता से जीने का हक मांगती है। इन्हें नहीं पता कि यहां से किसके पासा जाया जाए फिर भी वो डटी हैं। वो सरकार से निराशा हैं..इसलिए राष्ट्रपति भवन की ओर देखती हैं...मगर वहां से भी कोई नहीं निकलता...उन्हें नहीं मालूम इंडिया गेट या जंतर मंतर पर आने के बाद क्या करना है..फिर भी वो मौजूद हैं..शांति से आंदोलन में लगे हैं..न्याय की मांग कर रहे हैं..मगर नेताओं को ये रास नहीं आता..उनकी दो ईकाइयां...आइसा औऱ एनएसयूआई हुड़दंग करने पहुंच जाती हैं। उधर पहले से आंदलोन में रत आम जन अब भी अहिंसक हैं। 

बिना किसी के बुलावे पर लोग आंदोलन के लिए आते जा रहे हैं। इंडिया गेट, मंडी हाउस, आईटीओ पर घूम-घूम कर नौजवानों का रैला नारे लगाता रहा...We want Justice…We want Jusice…ल़ड़कियां फिर बहादुरी से सबसे आगे हाथ पकड़ कर चलती हैं..ताकि लाठी न पड़े उनके दोस्तों पर... पर भूल जाती हैं कि अब आदेश है....लड़कियों पर भी लाठी भांजने का...उधर कुछ नौजवानों का ग्रुप फिर से जंतर मंतर पर जमा हो कर केंद्र सरकार के खिलाफ नारे लगाने लगा...उन चंद लोगो को भी मीडिया कवर करता रहा। इस बीच सफदरजंग अस्पताल में भर्ती पीड़िता के पिता शांति की अपील करते हैं। उधर मणिपुर में एक पत्रकार के पुलिस की गोली से मौत की खबर आई।

मीडिया को इसलिए पीटा गया ताकि पुलिस की कार्रवाई न दिखा सके। शांत लोगो को इसलिए पीटा गया कि उनके अंदर पुलिस का खौफ उत्पन हो सके। यानि ख़ौफ जो अपराधियों में होना चाहिए अब वो निर्दोष लोगो के दिल में होगा। वाह रे दिल्ली का निजाम...सड़को पर खुलेआम लोग दारु पीते मिलेंगे पर उनपर लाठियां बरसते न देखा न सुना...पर अमर जवान ज्योति पर औरतों लड़कियों समेत सबको पिटते देखा।
नहीं किसी नेता की जरुरत बस We want Justice

अब समझिए की सारे देश में बलात्कार होता है पर दिल्ली में हंगामा क्यों ज्यादा है। दरअसल राजधानी किसी भी देश का आईना कहलाती है। वो देश की प्रगति का सूचक होती है। राजधानी का पतन देश का पतन माना जाता है। इसी राजधानी की पुलिस का अपने ही बच्चों को पीटने का बहादूरी भरा एक रुप देखने को मिले तो बाकी देश की पुलिस कैसी होगी सोचा जा सकता है। वैसे दिल्ली पुलिस एक वो रुप है जो आतंकवाद से दिल्ली को हमेशा बचाता है..ऐसे हादसे के बाद भी ज़िंदगी समान्य चलती है... मगर इसका एक वो रुप भी है जो राजनीतिक आका को खुश करने के लिए पुलिस अक्सर दिखाती है...और इसी पुलिस का एक रुप वो भी है राजधानी की सडकों पर दिखता है....यानि दक्षिण दिल्ली जैसे सुरिक्षत इलाके में काले रंग के शीशे लगी बस घूमती रहती है..पुलिस को नजर नहीं आती..जबकि यहीं सुप्रीम कोर्ट है जिसने काले शीशे पर पाबंदी लगा रखी है। इसी काले शीशे के पीछे बलात्कार होता है..दरिंदगी का नंगा खेल खेला जाता है..पर दिल्ली पुलिस कहीं नजर नहीं आती....पर हर अवैध तरीके से चलने वाली बस या किसी गाड़ी से वसूली करते बराबर दिखती है।

ये है दिल्ली...जहां से देश का निज़ाम चलता है..जहां आजकल दुनिया के दस देश के नेता आ रहे हैं..जहां अतंरराष्ट्रीय मीडिया है..जहां देश का सुप्रीम कोर्ट है..जहां से दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने का दावा होता है..उसी दिल्ली की सड़कों पर वो लड़की स्वतंत्रता से जीने को अपना हक समझती है...यही उससे सबसे बड़़ी गलती हो जाती है..वो गलती कर जाती है अपने मित्र के साथ फिल्म देखने की....वो बेचारी ये भूल जाती है वो उस दिल्ली में घूम रही थी जो उस देश की राजधानी है....जो कहने को तो आधुनिक राष्ट्र बन चुका है... पर अब भी मध्यकालीन दुनिया में उसके ही लोगो द्वारा धकेल दिया जाता है...

तो ये है आपकी राजधानी का हाल जनाब..औऱ आप पूछते हैं यहीं इतना हंगामा क्यों है बरपा
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To LoVe 2015: सचिन : बहुत देर कर दी, हुजूर जाते जाते ...


सचिन रमेश तेंदुलकर महान क्रिकेटर हैं, इस बात से किसी को एतराज नहीं हो सकता। देश उन्हें क्रिकेट का भगवान कहता है। मैं व्यक्तिगत रुप से ये मानता हूं कि अगर क्रिकेट में बैंटिंग को लेकर किताब लिखी जाएगी तो ये किताब सचिन से शुरू होगी और सचिन से ही समाप्त होगी। सचिन के योगदान को देशवासी कभी नहीं भूल सकते। इन सबके बाद भी आज क्रिकेट प्रेमी सचिन के रुख से खफा थे, बढिया प्रदर्शन ना कर पाने के बाद भी वो टीम से बेवजह चिपके रहे। होना तो ये चाहिए था विश्वकप जीतने के बाद ही सचिन सन्यास का ऐलान कर देते, विश्वकप में सचिन ने बेहतर प्रदर्शन भी किया था, इसलिए अच्छी तरह से उनकी टीम से बिदाई हो जाती, पर सचिन ने ऐसा नहीं किया। अब दो साल से सचिन की मैदान में छीछालेदर हो रही है, उनके आउट होने के तरीके पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कमेंट्रेटर उनकी बल्लेबाजी की तकनीक पर ठहाके लगा रहे हैं, यहां तक की सचिन के सन्यास को लेकर चुटकुले बनने लगे। क्रिकेट टीम से उनके चिपके होने को फेवीकाल का जोड़ बताया जाने लगा। पता नहीं ये सब कैसे सुनते रहे सचिन ! मैं तो इस मत का हूं कि...

अल्लाह ये तमन्ना है जब जान से जाऊं,
जिस शान से आया हूं उस शान से जाऊं।

मेरी समझ में नहीं आया कि ये बात सचिन को समझने में इतनी देर क्यों लगी ? मैं देख रहा था कि मैच की कमेंट्री के दौरान सचिन पर वो लोग भी हंस रहे थे, जिन्होंने अपने क्रिकेटिंग कैरियर मे जितने रन बनाए होंगे, सचिन ने उतने मैच खेले हैं। वैसे सचिन ने सन्यास का फैसला लेने में देऱ किया है, ये बात तो मैं भी कहता हूं। सचिन का पिछले दो साल का प्रदर्शन ना सिर्फ निराशाजनक रहा, बल्कि कई बार वो तेज गेंदबाजों को खेलने मे असहज भी दिखाई दिए। सौंवा शतक बनाने में उनका पसीना निकल गया। आखिर में एक कमजोर बांग्लादेश की टीम के साथ हुए मैच में उन्होंने किसी तरह शतक बनाकर  अपना सौंवा शतक पूरा किया। सच कहूं तो लोग सौंवे शतक की बात सुनते सुनते इतना पक चुके थे, किसी ने इसे उतनी गंभीरता से लिया भी नहीं।

चलिए अब अंदर की बात कर लेते हैं। सच ये है कि सचिन ने सन्यास का ऐलान खुशी से नहीं मजबूरी में किया है। दरअसल पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ होने वाले एक दिवसीय मैच के लिए आज टीम का चयन होना था। अब तक तो होता ये आया है कि चयन समिति का कोई सीनियर मेंबर सचिन को टीम के चयन के पहले पूछा करता था कि वो मैच के लिए उपलब्ध हैं या नहीं। सचिन जब हां कहते थे, तो उनका चयन टीम में कर लिया जाता था। इस बार सचिन को चयन समिति की ओर से कोई फोन नहीं गया। बताते हैं कि खुद सचिन ने दो दिन पहले चयन समिति को फोन करके बताया कि पाकिस्तान के खिलाफ होने वाले मैच के लिए वो उपलब्ध हैं। लेकिन चयन समिति की ओर से उन्हें कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया गया। इससे सचिन को भी संदेह हो गया कि शायद उन्हें इस बार टीम में जगह ना मिले।

पाकिस्तान के साथ होने वाली सीरीज के लिए आज यानि रविवार को चयन समिति की बैठक शुरू होने से पहले सचिन ने समिति को बताया कि वो एक दिवसीय मैंचों से सन्यास ले रहे हैं। सचिन को लगा कि शायद उन्हें मनाया जाए और टीम में आखिरी समय में शामिल भी किया जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बल्कि सचिन से बातचीत करके मीडिया को जानकारी दे दी गई कि सचिन ने सन्यास का ऐलान कर दिया है। हालाकि सचिन का जितना बड़ा कद है, मुझे लगता है कि उनकी मानसिकता और सोच उतनी ही छोटी होती जा रही है। अब देखिए ना पहले उन्होंने टी 20 से सन्यास लिया, अब वन डे से सन्यास का ऐलान किया है, मतलब उन्हें लगता है कि टेस्ट मैच में अभी वो बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। जबकि इंगलैंड के साथ हुए टेस्ट मैच में सचिन बुरी तरह फ्लाप रहे, फिर भी अभी टेस्ट मैच की लालच बनी हुई है।

आपको एक वाकया बताऊं, आफिस में हमारी एक सहयोगी सचिन की बहुत बड़ी प्रशंसक हैं। सचिन के बारे में कोई भी प्रतिकूल टिप्पणी उन्हें सहन नहीं होता। इंग्लैंड के साथ टेस्ट सीरीज में जब सचिन को टीम में लिया गया तो मैने यूं ही कहा कि अब टीम का बंटाधार हो गया, हम सीरिज हार जाएंगे। वो नाराज हो गईं, कहने लगी आप ये कैसे कह सकते हैं। खैर हमारे बीच शर्त लग गई, उनका कहना था कि चार टेस्ट मैच यानि आठ पारी में सचिन कम से कम दो शतक जरूर लगाएगें। मैने कहाकि आठ पारी में कुल मिलाकर सचिन के दो सौ रन पूरे नहीं होंगे। इस पर हमारी शर्त लग गई। आप जानते हैं कि शर्त मैने ही जीती है क्योंकि सचिन के सभी पारियों में मिलाकर दो सौ रन पूरे नहीं हुए।

वैसे ये तो मैं  भी मानता हूं कि सचिन का रिकार्ड अद्भुत है, उन्होंने अब तक 463 वन डे खेले हैं और लगभग 18,426 रन बनाए हैं। बल्लेबाज होने के बाद भी उन्होने 149 विकेट भी लिए हैं। सबसे ज्यादा मैच खेलने का उनका अपना रिकार्ड है। उन्होंने 1989 में ही अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट की शुरुआत की और आज तक खेलते रहे। ऐसे महान खिलाड़ी से उम्मीद नहीं थी कि उनकी इस तरह बिदाई होगी। सन्यास का ऐलान करने का सचिन के पास दो मौका था, पहला उन्हें तब करना चाहिए था जब टीम ने विश्वकप जीता था, या फिर उन्हें उस दिन कर देना चाहिए था कि जब उन्होने सौंवा शतक बनाया था। लेकिन सौवें शतक के बाद उनकी लालच बढ़ गई, उन्हें लगा कि अभी देश उन्हें और झेल सकता है।

अच्छा लगता है कि जब क्रिकेटर मैदान में और टीम रहते हुए ऐलान कर देते हैं कि अब बहुत हो चुका, अब वो सन्यास लेगें। सचिन जैसे महान खिलाड़ी से भी ऐसी ही उम्मीद की जा रही थी। लेकिन अंदर की खबर तो ये भी है कि सचिन को दो टूक समझाया गया कि 2015 में होने वाले विश्वकप में आपके लिए कोई जगह नहीं बनती है। ऐसे में अब समय आ गया है कि विश्वकप के मददेनजर टीम का चयन किया जाए, जिससे टीम के खिलाड़ी को तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल सके। वैसे भी आपको पता होगा कि पूर्व कप्तान सुनील गवास्कर का मानना है कि आपको ऐसे समय में संन्यास ले लेना चाहिए, जब लोग आप से पूछें कि अरे ये क्या..आपने सन्यास क्यों ले लिया? ऐसा मौका नहीं देना चाहिए कि लोग खिलाड़ी से सवाल पूछने लगें कि भइया संन्यास कब ले रहे हो। सचिन की हालत ये हो गई थी कि रोजाना उनसे यही सवाल पूछा जा रहा था कि आखिर सन्यास क्यों नहीं ले रहे हैं ?

वो खिलाड़ी महान होता है जो फैसला लेने में साफ रहता है। याद करें पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने 1992 में वर्ल्ड कप शुरू होने के पहले कह दिया कि ये मेरा आखिरी वर्ल्डकप है। उन्हें उस समय पता भी नहीं था कि पाकिस्तान की टीम फाइनल में पहुंचेगी, जब पाकिस्तान फाइनल में पहुंचा तो एक दिन पहले इमरान ने ऐलान किया कि ये उनका आखिरी वनडे है। हम सचिन से भी ऐसी ही उम्मीद कर रहे थे। हम सबको लग रहा था कि अगर बीसीसीआई, चयन समिति, कप्तान आपको रिस्पेक्ट दे रहे हैं तो उसका सम्मान कीजिए और अपने से सन्यास का ऐलान कर दीजिए। लेकिन सचिन को लगा कि वो वाकई अब क्रिकेट के भगवान है, उनको आंख दिखाने की किसी की हैसियत नहीं है। ये सही है कि सचिन को आंख दिखाने की हैसियत किसी भी क्रिकेटर की नहीं है, लेकिन जब देश की टीम चुनी जाएगी तो वहां व्यक्ति का महत्व नहीं रह जाता। यही बात नहीं समझ रहे थे सचिन।

सचिन को सिर्फ एक बात समझाना है, भाई सचिन यहां उगते सूरज को सलाम करने की परंपरा है।  देखिए जब तक आप बढिया खेल रहे थे, आपको लोगों ने हाथोहाथ लिया, देश भर से आवाज उठी कि आपको भारत रत्न दिया जाए। लेकिन आप विश्वास कीजिए आपका खराब प्रदर्शन और उसके बाद भी आपका टीम में बने रहना किसी भी क्रिकेट प्रेमी को अच्छा नहीं लग रहा था, वो तो अच्छा था कि आपको भारत रत्न अभी मिला नहीं है, वरना अब तक भारत रत्न वापस लेने की मांग उठने लगती। वैसे भी सचिन आपको पता है ना कई मैच ऐसे रहे हैं, जिसमें टीम आपके बिना उतरी है और कामयाब भी रही है। ऐसे में आपको सोचना चाहिए था कि उभरते हुए खिलाड़ी को कैसे मौका दिया जाए, लेकिन आपने कभी दूसरों के लिए रास्ता खोलने की कोशिश नहीं की।

बहरहाल सचिन, अगर आप को लगता है कि अगला वर्ल्ड कप भी भारत के हाथ में रहे तो अभी से भारत के 'भविष्य की टीम' की रूपरेखा तैयार करनी होगी। आप को पता है कि गंभीर ओपनर बैट्समैन हैं, पर आपकी वजह से उन्हें नंबर तीन पर खेलना पड़ रहा था। इसी तरह अन्य खिलाड़ियों की भी बैटिंग लाइन पटरी पर नहीं रह पाती है। आपकी वजह से कई बल्लेबाज बाहर बैठने को मजबूर थे। इसलिए देर से ही सही, लेकिन आपके टीम से हट जाने का फैसला सराहनीय है। अच्छा मौका है कि अब आप टीम इंडिया के खिलाड़ियों को आशीर्वाद दें और देश के साथ आप भी नए सचिन की तलाश में जुटें।

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शनिवार, 22 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: Where there is a Will, There is a way



where there is a will      there is a way
It is a time-tested saying and is hundred per cent correct. If you have a desire to accomplish a thing, you will find out the necessary means for its fulfillment. The thing will be got done certainly. There will be no let or hindrance. The idea behind all this is: first stand up, gird up your loins, make a firm resolve, ponder over the details of the plan and you will see the plan is fully carried out. There arises no hitch. It is all a smooth sailing.


The important thing is to have the requisite will, the wish to do anything. If you do not dream of good things of life, you will never be able to perform them in the first attempt. Though after a fair number of trials, you may succeed. The simple story of the thirsty crow is just is just a feeler for all of us. The crow was thirsty. He flew in search of water here and there. The basic thing is the thirst of the crow. Under the duress of the thirst he thought of a number of ways to quench it. His act of flying, gathering of pebbles and putting them in the pitcher are the means but not the beginning and the end of the whole endeavor.

Here we must remember that the will of the crow is paramount. His being thirsty is greatly important. Had he not been thirsty, he would have not incurred the trouble of flying here and there and gathering of pebbles would have not arisen at all. We have seen in the story that the way to quench thirst follows automatically. It is a natural outcome. It is the natural result of the will of the crow.

We students can learn a noble lesson from this simple story. Let us have the will to study. Let us awake, arise and the goal is achieved. Let us pre-determine the destination. Now to reach it there will be many lanes and by-lanes, many paths will come into sight on their own. Your first and foremost job was kindling the fire. The rest would follow spontaneously. If I am sleeping, I can never reach the winning post. To cut the matter short, we should have the required amount of will, the way will beckon us.
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर





Picture from wikipediaमुंडेश्वरी मंदिर 


संसार में सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर माना जाता है साथ ही भारत में सबसे प्राचीन पूर्ण जीवंत हिन्दू मंदिर भी इसी मंदिर को मानते हैं.
 आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने माना है कि इतिहास के मद्देनजर यह भारत देश का सबसे पुराना मंदिर है.

भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित इस मंदिर के पुरुत्थान के लिए योजनायें बन रही

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: मोदी : चमत्कार हुआ तभी हैट्रिक !


अगले तीन दिनों तक टीवी न्यूज चैनलों पर गुजरात चुनाव का रंग दिखेगा, मेरे ख्याल से इसके अलावा कोई और खबर चैनल पर अपनी जगह नहीं बना पाएगी। अखबार भी गुजरात चुनाव और नरेन्द्र मोदी से पटे रहेंगे। सच कहूं तो मीडिया ने जिस ऊंचाई पर गुजरात चुनाव को पहुंचा दिया है, उससे राजनीति में थोड़ी सी भी रुचि और दखल रखने वालों की जुबान पर सिर्फ एक ही सवाल है क्या नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार चुनाव जीत कर सरकार बना पाएंगे ? क्या कांग्रेस गुजरात में वापसी करेगी ? क्या गुजरात के दिग्गज नेता केशुभाई पटेल अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब होंगे ? तीनों सवाल महत्वपूर्ण है और इसका जवाब वाकई आसान नहीं है। लगभग 23 दिन तक गुजरात के विभिन्न जिलों में लोगों की नब्ज टटोलने के बाद मैं जरूर एक निष्कर्ष पर पहुंचा हूं और वो ये कि चुनाव के नतीजे ऐसे नहीं आने वाले है, जिससे नरेन्द्र मोदी की आसानी से ताजपोशी हो सके। मसलन मुझे नहीं लगता है कि 20 दिसंबर को गुजरात में मोदी दीपावली मना पाएंगे।

मैं दिल्ली में था तो लग रहा था कि अरे गुजरात में कोई मोदी का कोई मुकाबला ही नहीं है। यहां मीडिया ने भी मोदी को सातवें आसमान पर चढ़ा रखा है। दिल्ली की मीडिया का कहना है कि ये चुनाव गुजरात का नहीं, बल्कि ये चुनाव दिल्ली की कुर्सी का असली वारिस तय करेगा। दिल्ली की मीडिया ने अपनी आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा रखा है कि उसे गुजरात का असली रंग दिखाई नहीं दे रहा है। चुनाव के नतीजे मोदी के पक्ष में होंगे या नहीं, इसका फैसला तो 20 दिसंबर को होगा, लेकिन मैं कहता हूं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तो ये चुनाव पहले ही हार चुके हैं। यही वजह है कि मोदी को ना अपने किए गए विकास कार्यों पर भरोसा है, ना अपने विधायकों पर भरोसा रह गया है।

मैं कहता हूं कि चुनाव के नतीजों में विधायकों की संख्या के आधार पर मोदी भले जीत जाएं, पर मोदी भाई जिस नैतिकता और ईमानदारी की बात करते रहे हैं, उस पर वो खरे नहीं उतरे। चुनाव के पहले दावा किया गया था कि दागी, भ्रष्ट, बेईमान विधायक और मंत्रियों को पार्टी का टिकट नहीं दिया जाएगा। नरेन्द्र भाई बताइये ना आप किस बेईमान मंत्री का टिकट काटने का साहस आप जुटा पाए ? किस दागी विधायक को आपने टिकट नहीं दिया ? कई जगह तो ऐसे भी आरोप लग रहे हैं कि पार्टी के वफादार कार्यकर्ता को टिकट ना देकर टिकट बेच दिए गए। जिन चेहरों को लेकर नरेन्द्र भाई चुनाव मैदान में हैं, उसे देखकर तो यही लगता है कि मोदी को चुनाव हारने का डर सता रहा था, लिहाजा उन्हें समझौता करना पड़ा। दागी, भ्रष्ट और बेईमानों के चुनाव लड़ने की वजह से ही मोदी इस बार पूरी तरह बैकफुट पर हैं, वो अपनी चुनाव जनसभाओं में भी बार-बार एक बात दुहराते हैं कि गुजरात की जनता नरेद्र मोदी को देखकर वोट करे।

मोदी की अपील का मतलब आपको समझाना जरूरी है। चुनाव के वक्त मोदी किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहते। वो इन सवालों से बचना चाहते हैं कि भ्रष्ट मंत्रियों को दोबारा उम्मीदवार क्यों बनाया गया, वो इस बात से भी बचना चाहते हैं कि दागी नेताओं को उम्मीदवार क्यों बनाया गया ?  इस समय वो इस सवाल से भी पीछा छुटाना चाहते हैं कि वफादार कार्यकर्ताओं को टिकट ना देकर पैसे वालों को टिकट कैसे दे दिए गए ?  ऐसे ही सवालों से बचने के लिए मोदी कहते हैं कि जनता उम्मीदवार को बिल्कुल ना देखे, वो नरेन्द्र मोदी को देखे और पार्टी के चुनाव निशान कमल का फूल देखे और वोट करे। अब मुझे तो नहीं लगता कि गुजरात की जनता मोदी और फूल देखकर वोट कर देगी। आज गुजरात में हालत है ये है कि मोदी सरकार के मंत्रियों का चुनाव जीतना मुश्किल हो गया है। वैसे तो मोदी की जनसभाओं में काफी भीड़ु हुआ करती है, लेकिन इस बार कई मौकों पर मोदी लोगों के ना जुटने से खासा नाराज हुएउन्होंने जाते समय अपने उम्मीदवार को लताड़ा और कहा कि अगर भीड़ नहीं जुटा सकते तो टिकट लेने क्यों आ गए ?

मुझे पता है कि आप जानना चाहते हैं कि मैं मोदी को कितनी सीट दे रहा हूं, पहले इस पर चर्चा करूंपर थोड़ा इंतजार कीजिए, इस पर भी बिल्कुल चर्चा करूंगा, पर थोड़ी बात बीजेपी की चुनावी राजनीति पर हो जाए। वैसे तो सही यही है कि गुजरात में बीजेपी का मतलब सिर्फ नरेन्द्र मोदी हैं, वहां पार्टी का कोई और नेता कितनी ही सभा कर ले, किसी को दूसरे नेताओं में कोई इंट्रेस्ट नहीं है। लेकिन मोदी का हर जगह पहुंचना संभव नहीं हो पा रहा था, लिहाजा उन्होंने आधुनिक तकनीक का सहारा लेते हुए थ्रीडी के जरिए सभाएं करनी शुरू कीं, लेकिन उनके इस हाई प्रोफाइल प्रचार पर कांग्रेस हमला बोला तो मोदी बैकफुट पर आ गए, वैसे भी थ्रीडी सभाएं कोई असरदार साबित नहीं हो रही थीं।

अच्छा एक बात और...। 2007  के चुनाव में सोनिया गांधी ने नरेन्द्र मोदी के लिए जो काम किया था, वही काम इस बार क्रिकेटर बीजेपी नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने केशुभाई पटेल के लिए किया। मोदी का नाम लिए बगैर सोनिया ने उन्हें "मौत का सौदागर" बताया था, बस इसी एक शब्द को भुना ले गए नरेन्द्र मोदी और उन्होंने सोनिया गांधी और कांग्रेस पर ऐसा हमला बोला कि गुजरात में कांग्रेस हाशिए पर चली गई। इस बार केशुभाई पटेल को बीजेपी नेता नवजोत सिद्धू ने "देशद्रोही" कहा तो गुजराती पटेल बिल्कुल भड़क गए। केशुभाई जिन्हें गुजराती "बप्पा" यानि बड़ा मानते हैं, उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि हां अगर मैं देशद्रोही हूं तो "मुझे पत्थर मारो" । केशुभाई के इस हमले पूरी बीजेपी हिल गई। सच तो ये है कि केशुभाई की गुजरात परिवर्तन पार्टी जो महज तीन चार सीट जीत सकती थी, अब वो आठ नौ तक पहुंच जाए तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए।

कुल मिलाकर मैं कह सकता हूं कि देश के बाकी हिस्से में लोग भले मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीसरी जीत को लेकर आशान्वित हों, पर खुद मोदी पूरी तरह कत्तई आश्वस्त नहीं है। बहरहाल मेरा स्पष्ट मत है कि कोई चमत्कार ही मोदी के विधायकों की संख्या तीन अंकों में पहुंचा सकता है, वरना इस बार मोदी 85 से 95  यानि बहुमत से एक कम ही सीट जीतने की स्थिति में हैं। मोदी के खिलाफ नाराजगी की हालत ये है कि अगर बहुमत से पांच छह सीटें मोदी की कम रहीं तो उनके लिए ये नंबर जुटाना बहुत मुश्किल होगा। अच्छा मै मोदी को जो 95 सीटें बता रहा हूं इसलिए नहीं कि उन्होने बहुत अच्छा काम किया है, जिसकी वजह से उन्हें ये सीटें मिलेंगी, बल्कि कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल ने कांग्रेस को इतना नुकसान पहुंचा दिया है, वरना कांग्रेस की हालत यहां और बेहतर हो सकती थी।

मेरा मानना है कि इस चुनाव के बाद कम से कम कांग्रेस नेता सोनिया गांधी को अपने राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की छुट्टी कर देनी चाहिए। मेरा मानना है कि मोदी को गुजरात चुनाव में पटखनी देने के लिए कांग्रेस को ज्यादा मेहनत नहीं करनी थी, सिर्फ दो काम करने थे, पहला शंकर सिंह बाघेला को प्रस्तावित नेता घोषित कर देते और चुनाव तक पार्टी के दूसरे नेता अहमद पटेल को गुजरात जाने पर रोक लगा देते। इतना करके कांग्रेस यहां कम से कम 98 सीटें यानि बहुमत हासिल करने की स्थिति में पहुंच जाती।

दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सच में गलत सलाह दी जा रही है, जिसकी वजह से पार्टी को खासा नुकसान हो रहा है। गुजरात में कांग्रेस नेताओं में अहम के टकराव की वजह से पार्टी की हालत पतली है। शंकर सिंह बाघेला जिस तरह से गुजरात में पार्टी को मजबूत करने में लगे थे, अगर उन्हें केंद्र सपोर्ट मिलता तो मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि गुजरात की कमान कांग्रेस के हाथ में होती। लेकिन पार्टी के दूसरे नेता अहमद पटेल को लगा कि अगर ऐसा हुआ तो उनकी अहमियत घट सकती है, लिहाजा चुनाव के ठीक पहले तमाम ऐसे काम हुए जिससे पार्टी को बहुत नुकसान हुआ। कांग्रेस में गलत लोगों को टिकट दिए गए हैं, वो भी दो चार नहीं बल्कि बीसियों ऐसे लोग टिकट पाने में कामयाब हो गए, जिनकी इलाके में दो पैसे की पूछ नहीं हैं। ऐसे में पार्टी के सीनियर नेता घर बैठे हुए हैं।

सच्चाई  तो ये है कि गुजरात चुनाव  के पहले जिस तरह से सोनिया गाधी और राहुल गांधी को सक्रिय होकर आक्रामक तेवर दिखाना चाहिए था, उसमें कहीं ना कहीं कमी रही। लगता है नेतृत्व को समझाया गया था कि गुजरात में पार्टी कामयाब नहीं हो सकती, इसीलिए सोनिया और राहुल को दूर रखा गया। लेकिन जब बीजेपी नेताओं ने शोर मचाना शुरू किया कि कांग्रेस के बड़े नेता चुनाव मैदान छोड़कर गायब हो गए, तब जाकर सोनिया और राहुल की सभाएं लगाईँ गईं। बहरहाल चुनाव के आखिरी हफ्ते में कांग्रेस ने गुजरात में तेजी से वापसी की, सच कहूं कि यही तेवर कांग्रेस ने कुछ पहले दिखाए होते तो कांग्रेस आज सहज स्थिति में होती। वैसे भी जब पार्टी नेता अहमद पटेल ने देखा की कांग्रेस की स्थिति बेहतर हो रही है तो श्रेय लेने के लिए उन्होंने खुद भी सभाएं करनी शुरू कर दीं। वैसे उनके इलाके में भी  टिकट बंटवारे को लेकर लोगों मे खासी नाराजगी है।

जहां तक कांग्रेस की सीटों का सवाल है मैं तो उन्हें 80 +  रखूंगा। फिर दुहरा रहा हूं एक बात कि अगर कांग्रेस ने यहां शुरू से मेहनत की होती, मेहनत ना भी सही लेकिन कांग्रेस नेता शंकर सिंह बाघेला को ताकत दी गई होती तो यहां पार्टी की स्थिति कुछ और ही होती। कम लोगों को ही मालूम होगा कि यहां कांग्रेस नेता मोहन प्रकाश कई महीने से डेरा डाले हुए थे, उन्होंने भी जमीन तैयार करने में काफी मशक्कत की, लेकिन उनकी भी सीमाएं थी, बेचारे अहमद पटेल के आगे वो भी असहाय हो गए। यहां दो एक सीटें एनसीपी और एक सीट जेडीयू के खाते में भी जा सकती है। चलिए  जी बातें हो गई, अब इंतजार करते हैं 20 तारीख का, जब सभी की किस्मत का फैसला हो जाएगा। वैसे दुहरा दूं चमत्कार ही मोदी को इस बार मुख्यमंत्री बनाएगा।

 

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रविवार, 16 दिसंबर 2012

To LoVe 2015: बड़े भोले हैं बंटवारे वाले भाई(????)..। हां नहीं तो....


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 पाकिस्तान के गृहमंत्री आए औऱ चले गए। उनके आने से पहले ही लोग पूछ रहे थे कि वो आ क्यों रहे हैं? यहां तक की भारत सरकार भी इसी सवाल का जवाब जानना चाहती थी...राजनीतिक शिष्टाचारवश चुप रही...यही शिष्टाचार विपक्ष ने भी दिखाया। अब मलिक साहब के जाने के बाद सब पूछ रहे हैं इससे भारत को क्या मिला? लोग हमेशा ही नकारात्मक बातें करते हैं...अरे इंसानियत कहती है कि हमारा नुकसान हो तो हो..मेहमान को फायदा होना चाहिए। पाकिस्तान के नगारिकों को वीजा नियमों में ढील देकर हमने इंसानियत की लाज रख ली है। अब वो हमारे यहां चाहे आतंकवाद फैलाये या मुंबई हमला करवाए....। हां नहीं तो....

   वीज़ा नियमों में बदलाव पर बेकार ही सब हल्ला मचा रहे हैं..।  पहले ही कई पाकिस्तानी बिना वीज़ा के भारत को अपने बाप-दादा का घर समझ कर रह रहे हैं। बाप-दादा का न सही..अपना ससुराल समझ कर तो रह रहे हैं। कुछ दिन पहले ही तो दिल्ली में नाती-पोतो वाली एक अम्मा मिली हैं। किसी बीते समय में कुछ तकनीकि कारणों के बाद वो अम्मा नेपथ्य में चली गईं थीं। वो उनके मियां ने भी मारे मुहब्बत के शायद चुप्पी साध ली थी। वो तो जाने किसकी बुरी नजर लग गई जो दिल्ली पुलिस उन तक पहुंच गई..वरना वो तो युवती से दादी-नानी बन ही चुकी हैं औऱ पकड़े जाने पर उनके मियां उन्हें भारत का नागरिक बनवाने की गुहार लगा रहे हैं।  आखिर गलत तो कुछ नहीं कर रहे हैं...अब बीबी भले ही सरहद पार से मिली उनको...प्यार के लिए तो कुछ भी किया जा सकता है....। वैसे भी करगिल वार औऱ मुंबई हमला हो तो हो...वो तो इन अम्मा जैसे लोगो ने नहीं कराए हैं न। उसमें मरे लोग इनके खानदान के थोड़ी न थे....हां नहीं तो?

मासूम हैं पाकिस्तानी गृहमंत्री रहमान मलिक
    वैसे भी ऐसे जाने कितने सारे मामले हैं...अब पिछली सीरिज में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के साथ आए कई दर्शक नेपथ्य में जाकर आखिर किसी न किसी के सहारे यहां टिके हुए हैं कि नहीं। भले ही सुरक्षाकर्मी उन्हें ढूंढती रहे....उन दर्शकों के प्यार के मारे लोग उनका सहारा तो बने हुए हैं ही। ऐसे भलेमानुष(??) पाकिस्तानी दर्शक जानते हैं कि कोई उनतक  कोई पहुंचेगा नहीं..और अगर सुरक्षाकर्मी उनतक पहुंच भी गए तो सियासत वाले भाई-बंधु और वो उनके आश्रयदाता लोग तो हैं ही मदद करने के लिए....और वो ये भी जातने हैं कि उनके पकड़े जाने पर ये सभी लोग रंग बदलकर मानवता की दुहाई देने लगेंगे जिससे भारत सरकार का दिल पसीज ही जाएगा...और दूसरी बात ये कि अदालती कार्रवाई खत्म होते-होते वो दूसरी दुनिया में जाने लायक हो जाएंगे..फिर उनपर तरस खाना ही पड़ेगा........हां नहीं तो.....

कैप्टन सौरभ..जय हिंद
      वैसे भी हम कोई ऐरेगैरे थोड़ी न हैं...हम दक्षिण एशिया के सबसे बड़े मुल्क हैं यारों....अब भले ही पाकिस्तानियों के बाप-दादा अपना हिस्सा लेकर 65 साल पहले मुल्क के दो टुकड़े कर चुके हों.... पह हम तो बड़े भाई की तरह हैं न....भले ही दूसरा हर बार पीठ में छूरा घोपता हो...कनॉट प्लेस में बम रखता हो....मुंबई में ट्रैन में ब्लास्ट करवाता हो....हम तो भई हर बार गुहार करते रहेंगे कि हे सरहद पार के भाई ऐसा न करो..ऐसा करने वाले को सजा दो....वगैरह वगैरह.. हम तो संयम बरतेंगे आखिर हम बड़े मुल्क हैं.....हमेशा ही शिकायत न किया करो....कुछ तो बड़प्पन दिखाओ..हमेशा निराशावादी बातें न किया करो...स्वागत किया करो पाकिस्तान से आए ऐसे राजनीतिज्ञों का जो हाफिज सईद सरीखे भस्मासुर का बाल बांका न कर सकते हों...। वैसे भी मेहमान पाकिस्तानी गृहमंत्री रहमान साहब तो तो बेहद मासूम हैं....इतने मासूम हैं कि  उन्हें इसका फर्क भी नहीं पता कि करगिल की लड़ाई में शहीद हुए कैप्टन सौरभ कालिया के शरीर पर मिले जख़्म यातना देने से बने थे या मौसम की मार से.....
हां  नहीं तो.....
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