शनिवार, 31 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: तमिलनाडु का स्वर्ण मंदिर






तमिलनाडु राज्य के ३२ जिलों में से एक है वेल्लोर या वेल्लूर ।







चेन्नई से 145 किमी. की दूरी पर पलार नदी के किनारे यह शांत एवं छोटी जगह ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है.यहां कई वंशों जैसे पल्लव, चोल, नायक, मराठा, अरकोट नवाब और बीजापुरी सुल्तान ने शासन किया था.


यहाँ का 'वेल्लोर किला' बहुत प्रसिद्द है।




तमिलनाडु का स्वर्ण मंदिर










श्री नारायणी पीठ









यहाँ का

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

Happy NEW Year 2012

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We wish you a very Successful and Enjoyment 2012 year. DO hard Work and got Success. take care.




Regards:
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FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
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To LoVe 2015: अन्ना की आग में मीडिया का घी ...


लोकपाल बिल का हश्र यही होना था, अन्ना की लगाई आग में मीडिया ने घी डालने का काम किया और सब कुछ जलकर स्वाहा हो गया। यानि हम कहें कि अप्रैल में जब अभियान की शुरुआत अऩ्ना ने की, नौ महीने बाद अब लग रहा था कि हम लोकपाल बिल के बहुत करीब आ चुके हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अयोग्य, दागी, अकुशल और विवादित नेतृत्व के चलते लोकपाल बिल का मामला खटाई में पड़ गया है। सच तो ये है कि ये लड़ाई जहां से शुरू हुई थी वहीं फिर पहुंच गई है। अब हमें जिम्मेदारी तय करनी हो कि आखिर क्यों नहीं पास हो सका लोकपाल बिल। मैं बहुत ही जिम्मेदारी से कहता हूं कि लोकपाल बिल ना पास हो पाने के लिए मुख्य रूप से दो लोग जिम्मेदार हैं। पहली टीम अन्ना खुद और दूसरी मीडिया। यानि टीम अन्ना ने आग लगाया तो मीडिया ने उस आग में घी डालने का काम किया।

दरअसल बेलगाम और बदजुबान टीम अन्ना घमंड में चूर है। उनकी बातचीत का तौर तरीका बहुत ही भद्दा और सामान्य आचरण के खिलाफ है। ये बात ठीक है सरकार जनता की सेवक है और मतदाता मालिक है। लेकिन ये भी सही है कि सरकार कोई भी काम देश के हर मालिक से राय लेकर करे तो मैं विश्वास दिलाता हूं कि गांव में एक हैंडपंप तक नहीं लग सकता। किसी गांव के लिए एक हैंडपंप मंजूर होता है, तो विवाद शुरू हो जाता है कि इसे कहां लगाया जाए ? हर आदमी चाहता है कि हैंडपंप उसके घर के करीब लगे। भला ये कैसे संभव हो सकता है, हालत ये होती है कि यही मालिक बनी जनता आपस में जूतम पैजार कर लेती है। बाद में कमजोरों की लड़ाई का फायदा दबंग को मिलता है, और कहा जाता है कि उसके दरवाजे पर हैंडपंप लगने से किसी को एतराज नहीं होगा।

  अन्ना के आँदोलन के मामले में अगर आप शुरू से मेरे लेख को देंखे तो साफ हो जाएगा कि मैने पहले ही कह दिया था कि अन्ना का मुद्दा बिल्कुल सही है, लेकिन उनका तरीका गलत है। मंच से नेताओं को चोर कहना, ऐलान करना की लोकपाल बन गया तो आधे से ज्यादा मंत्री जेल में होगे, 180 भ्रष्ट सांसद हैं, बिल का समर्थन ना करने वालों के घर के बाहर धरना देंगे। अन्ना और अऩ्ना की टीम ने जिस असभ्य तरीके से संसद और सांसदों पर हमला बोला, उससे पहले ही साफ हो गया कि अब इस बिल का कुछ नहीं होने वाला है। गांव में कहावत है कि सूप बोले तो बोले चलनियों बोले, जिसमें 72 छेद। वैसे अन्ना हजारे अगर कुछ कहते हैं तो लोग उन्हें सुनते और स्वीकारते भी हैं, पर टीम अन्ना के  अग्रिम पंक्ति के ज्यादातर लोग विवादित छवि के हैं। इन पर भी गंभीर आरोप लगे हुए हैं। इसके बावजूद किरन बेदी ने जिस फूहड़ अंदाज में रामलीला मैदान में प्रदर्शन किया, वो संसदीय प्रणाली को शर्मशार करने वाला है। बहरहाल लोगों को लगा कि रामलीला में जब लोग उबने लगते हैं तो एक जोकर को आगे किया जाता है, जिसके हल्के फुल्के मनोरंजन से श्रोता खुश होकर ताली देते हैं।
अब आप बताएं कि जहां से आपको कानू्न बनवाना है, उसी संस्था पर आप कीचड़ उछाल रहे हैं। जिन नेताओं का समर्थन चाहिए उन्हें चोर बता रहे हो। एक खास पार्टी को टारगेट कर रहे हो। अगर आप संसदीय प्रणाली की एबीसीडी भी जानते हैं तो आपको समझ लेना चाहिए कि ऐसा नहीं हो सकता कि जिस पार्टी की सरकार हो, वो जो बिल चाहे पास करा सकती है। खासतौर पर  गंठबंधन की सरकार से तो ऐसी उम्मीद करना बेमानी ही है। अगर ऐसा होता तो रिटेल सेक्टर में एफडीआई को कांग्रेस संसद से पास करा लेती। लेकिन चाहते हुए भी वो ये बिल पास नहीं करा पाई। फिर लोकपाल बिल जिस पर उसकी पार्टी के नेताओं में ही मतभेद हैं। राजनीतिक दल उस पर राजनीति कर रहे हैं।

अगर मैं ये कहूं कि अन्ना एक कानून के लिए आंदोलन नहीं चला रहे हैं, बल्कि उनके और उनकी टीम के आचरण से ऐसा लग रहा था कि वो केंद्र की सरकार और नौकरशाही को भ्रष्ट मानते हैं और उन्हीं के खिलाफ लोकपाल लाने की मुहिम चला रहे है। अन्ना और उनके चेलों की बयानबाजी से लगने लगा कि ये आंदोलन किसी सिविल सोसायटी का नहीं बल्कि इनके पीछे कुछ राजनीतिक दलों का हाथ है। चोर उचक्के सब अन्ना टोपी पहन कर ईमानदार हो गए। अच्छा ये भाषा तो किसी तानाशाह शासक जैसा इस्तेमाल करने लगे। अन्ना ने जब राहुल गांधी पर हमला बोला और पत्रकारों ने इस सिलसिले में पूछा तो कहने लगे कि कई बार मुंह खुलवाने की लिए नाक दवानी पड़ती है।
कांग्रेस का जो राजकुमार पार्टी नेताओं के दिलों पर राज करता है, जिसे कांग्रेसी भविष्य का प्रधानमंत्री बता रहे हैं, उस पर हमला करके, अन्ना को लगता है कि सरकार उनकी सभी मांगे मान लेंगी। भला ये कैसे संभव है। फिर टीम अन्ना ने जब ये कहा कि वो सरकार पर दबाव बनाए रखने के लिए अपना आंदोलन जारी रखेंगी, तो साफ हो गया कि ये चुनाव का लोकपाल है। सरकार कुछ भी कर ले, खामोश बैठने वाले नहीं हैं, ये एक के बाद एक अपना अभियान चलाएंगे  और  इन लोगों के निशाने पर कांग्रेस सरकार ही रहेगी।

अच्छा अनशन का मंच हो, सामने हजारों लोगों की भीड़ तो कई बार वक्ता भावनाओं में बह जाते हैं और कुछ भी ऊटपंटांग बोलते हैं। मीडिया ने अनशन की खबरे लोगों तक पहुंचाने की आड़ में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। देश में तमाम सामाजिक संस्थाओं की ओर से सैकडों सामाजिक सरोकारों से जुड़े आंदोलन हुए हैं। लेकिन मीडिया ने कभी इस तरह उनका साथ नहीं दिया। इस आंदोलन में आखिर ऐसा क्या था कि मीडिया ने इसे हाथो हाथ लिया। सच तो ये है कि मीडिया ने ऐसी बातों को भी सार्वजनिक किया, जिससे नेताओं को लगा कि कुछ लोग एक  साजिश के तहत देश की सबसे बडी पंचायत संसद की मर्यादा को तार तार कर रहे हैं। यही सब  बातें  सुन कर नेताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, जिसका नतीजा ये हुआ कि सिविल सोसायटी नेताओं की आंखो की किरकिरी बन गई।
दरअसल कुछ शहरी मानसिकता के लोगों को लगता है कि ये तीन चार महानगर में जमा होने वाली भीड़ ही असली भारत है। सच तो ये है कि यू ट्यूब पत्रकारों को ना ही गांवों के बारे में जानकारी है और ना ही इनमें गांव को जानने समझने की कोई ललक है। हो भी क्यों, इन्हें लगता है कि गांव का आदमी उनका दर्शक ही नहीं है, क्योंकि वहां तक केबिल नेटवर्क की पहुंच नहीं है। फिर गांव को जानने समझने की माथापच्ची आखिर क्यों की जाए। मीडिया को भी लग रहा था कि ये आंदोलन इतिहास में दर्ज होने जा रहा है और इसके जरिए ऐसा बदलाव हो जाएगा कि देश की सूरत बदल जाएगी। ऐसे में जब नए भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो मीडिया की अनदेखी करने की कोई हिमाकत नहीं कर पाएगा। बस फिर क्या था, शुरू हो गया खेल। टीम अन्ना आग लगाती रही और मीडिया उसमें घी डालकर खुद  ही खुश होती रही।

सच कहूं तो ये आंदोलन अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण वेदी की वजह से अपने रास्ते से भटक चुका है। आंदोलन में आप 10 मांगे रखते हैं और सम्मानजनक तरीके से पांच मांगे पूरी करके आंदोलन को वापस लेने की अपील हो तो उसे मान लेना चाहिए। अच्छा ऐसा भला क्यों होता, अनशन पर बैठे हैं अन्ना हजारे और सरकार से बातचीत और न्यूज चैनलों में ज्ञान दे रहे हैं दूसरे लोग। इन्हें क्या पता कि जो आदमी भूखा बैठा है, उसके बारे में भी सोचना चाहिए। ये तो बस एक  जिद्द करके चलते हैं। हां मुंबई की भी चर्चा कर ली जाए। मुंबई में बीमार तो सिर्फ अन्ना थे, केजरीवाल और किरन बेदी ने तीन दिन का अनशन आगे क्यों नहीं चलाया। अन्ना के साथ उन्होंने ना सिर्फ अनशन तोड़ दिया, बल्कि अगले चरण के आंदोलन को भी वापस ले लिया।
गिरफ्तारी भी पहले अन्ना देगें तो बाकी लोग देंगे, वरना सब मलाई काटेंगे। आपने  दवाब बनाया था सरकार पर कि तीन अनशन फिर तीन दिन देश भर में जेल भरो आँदोलन। ये सब आंदोलन चलाने के लिए खूब रसीदें कट रही हैं। कार्यक्रम सब स्थगित कर दिए गए हैं। टीम अऩ्ना के पैर जमीन पर हैं नहीं हैं, सब हवा में उड़ रहे हैं।
 मै दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर टीम अन्ना ने थोडा संयम और सभ्यता के दायरे में रहकर काम किया होता तो आज उनकी हालत ये नहीं होती। ये भले दावा करते रहें कि आंदोलन तेज करेंगे, पर जनता समझ गई कि ये भी बहुरुपिए हैं। जिद्द कर रहे हैं कि मैया मै तो चंद्र खिलौना लैहों, जहियों लोटी धरन पर कबहू तोरी गोद ना अइहों.... अन्ना जी अब चंद्र खिलौना तो नहीं ही मिल सकता, जमीन पर लेटें या कुछ भी कर लें। हालाकि मेरी राय मायने नहीं रखती, पर आप इस टीम से मुक्ति पाकर नए लोगों के साथ आंदोलन की शुरुआत करें। ये चेहरे सियासी लोगों से कहीं ज्यादा गंदे दिखाई दे रहे हैं।
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रविवार, 25 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: आरक्षण-काहे के युवा नेता

लोकतंत्र की सबसे बड़ी मुसीबत यही है कि वोट के चक्कर में समझदार से समझदार नेता घनचक्कर बन जाता है। ज्यादातर फैसले वोट पर नजर रख कर लिए जाते हैं, जिनका दूरगामी परिणाम अच्छा नहीं होता। कई ऐसे कदम संविधान की मूल भावना के खिलाफ होते हैं। दलितों औऱ पिछड़ों के आरक्षण में मुस्लमानों को आरक्षण देकर यही कदम उठाया गया है।
    संविधान में सिर्फ दस साल के लिए आरक्षण की धारा रखी गई थी। सोच थी कि समाज में समानता आने लगेगी, और नेता देश को नई दिशा दे देंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। उल्टे इस मूल भावना को भूला कर नेता लगातार वोट की राजनीति के लिए इसकी समय सीमा बढ़ाते जा रहे हैं। परिणाम यह है कि कई वर्ग आगे बढ़ने की बजाए पिछड़े कोटे में शामिल होने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

संविधान नहीं, नेता फेल
       अगर वोट की राजनीति नहीं होती तो, आरक्षण के आसरे अबतक देश पूरी तरह से शिक्षित होता। जिससे बाद में सबको नौकरी के बराबर अवसर मिलते। जो जिस योग्य होता, उसे उसी के अनुसार काम मिलता। इसपर भी बात नहीं बनती, तो आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगो को सहायता दी जानी चाहिए थी। पर वोट बैंक के बहाने नेता देश को बीसवीं सदी में ढकेलने पर अमादा हैं।  हद तो ये हो गई है  नेता प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण की घटिया मांग उठा रहे हैं। अपनी असफलता छुपाने के लिए सियासतदां, उसमें भी खासतौर पर वो, जो पिछली सदी के नेता हैं, आरक्षण का राग अलापने लग जाते हैं। आरक्षण पहले ही एक क्रीमी लेयर बना चुका है जिसे आरक्षण की जरुरत नहीं, फिर भी ये वर्ग मलाई खा रहा है। उसपर अब नेताओं ने धर्म के नाम पर आरक्षण का नया मोर्चा खोल दिया गया है। 

बिना सोचे-समझे वोटिंग

    वैसे इसमें सीधे-सीधे नेताओं को कोसना ठीक नहीं है। इसमें गलती उन वोटरों की है जो धर्म, जाति औऱ रिश्ते के अधार पर वोट देते हैं। चाहे वो मुस्लमान हों, हिंदू हों या कोई भी। वैसे इसमें शक नहीं कि खासकर मुस्लमानों के वोट ज्यादातर एकमुश्त एक ही तरफ जाते हैं। ऐसे सामाजिक समीकरण के कारण अच्छा करने की कोशिश करने वाले नेता भी कोई कदम उठाने से पहले हिचकते हैं। कई मुस्लिम नेता इस कदम का स्वागत दिल से नहीं कर रहे हैं, पर पार्टी के खिलाफ जाने की उनकी हिम्मत नहीं होती। ऑफ द रिकार्ड ये मुस्लिम नेता भी कहते हैं जबतक ये स्थिती नहीं बदलेगी, तबतक  कुछ नहीं हो सकता।

मुस्लिम वोट की राजनीति

 संविधान के पहले पन्ने पर साफ लिखा है कि लिंग औऱ धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा...। पर मुस्लिम वोट की राजनीति करने वाले नेताओं को इसकी परवाह नहीं है। न ही परवाह है धर्म की ठेकेदारी करने वाले कट्टरवादियों को। कांग्रेस ने पिछडे़पन के आधार पर आरक्षण को मुहर क्या लगाई.......बाकी पार्टियों ने वोटों की राजनीति में आगे रहने के लिए बयानबाजी शुरु कर दी है। समाजवादी पार्टी अब आबादी के आधार पर आरक्षण मांग रही है। हैरानी की बात तो ये है कि कोई मुस्लिम समाजिक संगठन इसके खिलाफ खुलकर बोल नहीं रहा।
युवा नेताओं की चुप्पी खतरनाक

    वैसे ये भी कड़वी सच्चाई है हर पढा़-लिखा युवा धर्म से संचालित नहीं होता। वो समान अवसर चाहता है, न कि आरक्षण। वो इसके खिलाफ आवाज भी उठाना चाहता है, लेकिन  धर्म के ठेकेदारों के डर से उसकी हिम्मत नहीं होती। ये डर आम युवा तो छोड़िये युवा नेताओं में भी है। कई युवा नेता आम य़ुवा की भाषा समझते हैं..पर सिर्फ वोट का डर उन्हें खुलकर बोलने से रोकता है। 
    धर्म की राजनीति पहले ही देश को दो टुकड़ें में बांट चुकी है। पर कोई सबक लेने को तैयार नहीं। मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति समाज की आधुनिक सोच वाले लोगो को भी चुप रहने को मजबूर कर देती है। हैरानी होती है कि जिस धर्म में ऊंच नीच के लिए कोई जगह नहीं है उसी के नेता दलित होने का दावा करते हैं। वैसे जमीनी सच्चाई भी यही है कि उंच-नीच की भावना यहां के मुस्लमानों में भी है।

राहुल का असर तो है पर....
   राहुल गांधी के राजनीति में आने से आज युवाओं में राजनीति को लेकर उत्सुकता बढ़ी है। राहुल गांधी का ही असर है कि हर पार्टी में युवा नेताओं की अहमियत बढ़ रही है। बुढ़ाते नेता युवाओं के लिए जगह खाली करने की बात करने लगे हैं। पर मुझे डर है कि घाघ नेताओं के चुंगल में फंस कर कहीं राहूल गांधी की भी वही हालत न हो जाए, जो देश की दिशा बदलने वाले उनके पिता औऱ पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की हुई थी। 'मिस्टर क्लीन' को अपने आसपास एकत्र लोगो की वजह से काफी नुकसान हुआ था।

नक्कारखाने में तूती
    
     हालांकि बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने खुलेआम धर्म के आरक्षण को गैरसंवैधानिक कहने में देर नहीं लगाई। पर मुश्किल यह है कि उनकी तरह और कोई नेता तुरंत खुलकर नहीं बोल पाया। ऐसा नहीं है कि कोई विरोध नहीं करना चाहता। दूसरी पार्टी में भी ऐसे नेता हैं...पर वो खुलकर कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे। 

कब तक चुप रहेंगे  युवा
   
    पर सवाल वही है कि आखिर कब तक ये युवा नेता मजबूर होते रहेंगे?  क्या सत्ता के लिए धर्म की ओछी राजनीति होती रहेगी? क्या यूपी के चुनावों में ऐसा होगा कि आम युवा सिर्फ तिरंगे की सोचेगा और धर्म या रिश्ते और जाति को भूलकर वोट डालेगा? क्या रामलीला ग्राउंड में तिरंगे के नीचे एकजुट हुआ युवा धर्म की राजनीति करने वालों को धोबीपाट मार पाएगा? 

सवाल बड़ा है और उत्तर की प्रतीक्षा में काफी समय से सबके सामने खड़ा है।
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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: हां ब्लागर होने पर मैं हूं शर्मिंदा ...

ई दिन से एक बात बहुत परेशान कर रही है, सोचता हूं कि आखिर मैं यहां यानि ब्लाग जगत में क्या करने आया था और जो करने आया था वो कर रहा हूं या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ब्लाग पर आकर सिर्फ अपना समय खराब कर रहा हूं। यदा कदा लिखना और घंटो साथी ब्लागर्स के ब्लाग पर जाकर उन्हें पढ़ना। क्या इसे ही ब्लागिंग कहते हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं नहीं, ये तो ब्लागिंग नहीं हो सकती। दरअसल दिल्ली में मीडिया से जुड़े होने की वजह से सियासत के हर रंग को काफी करीब से देखने का मौका मिलता है। मीडिया संस्थानों की अपनी सीमाएं होती है, उसी दायरे में रहकर आपको अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। मुझे लगा कि मैं इस ब्लाग के जरिए उन बातों का यहां जिक्र करुंगा जो खेल पर्दे के पीछे चलता है।
मीडिया आजाद है, आपके साथ मैने भी सुना है, पर मीडिया रहते हुए मैने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। खैर आज मैं मीडिया पर नहीं ब्लाग परिवार पर बात करने आया हूं। मित्रों मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि जब हम सभी ब्लागर्स को दिल पर हाथ रखकर सोचना होगा कि क्या हम जो कर रहे हैं, यही सोच कर हमने ब्लागिंग की शुरुआत की थी। क्या वाकई हमारा मकसद सिर्फ ये था कि यदा कदा हम कुछ लिख दें और दूसरे साथियों के ब्लाग पढ़ें, उन पर कमेंट करें, फिर उनसे भी यही अपेक्षा करें। ब्लागिंग बस इतनी ही है क्या ?

आप मेरी बात से सहमत होंगे कि सोशल नेटवर्किंग साइट को अब अपनी ताकत को साबित करने की जरूरत नहीं है। इजिप्ट आंदोलन में सोशल नेटवर्किंग ने लोगों को जागरूक करने में एक अहम भूमिका निभाई। अन्ना का आंदोलन सही है या गलत है, इस पर विवाद हो सकता है, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि अन्ना को सोशल नेटवर्किंग साइट का भारी समर्थन रहा है। इसी की बदौलत एक बड़ा तूफान सड़कों पर दिखाई देता है। ऐसे में मुझे लगता है कि ब्लागिंग में जो बिखराव है, इसे समेटने की जरूरत है।

हमें सोचना होगा कि कैसे हम समाज की अनिवार्य जरूरतों में शामिल हो सकते हैं। मसलन जिस तरह लोग अगर एक दिन समाचार पत्र नहीं पढ़ते हैं तो उन्हें लगता है कि उनके दिन की शुरुआत ही नहीं हुई। मैं देखता हूं कि एक ही अखबार को ट्रेन में कितने लोग पढ़ते रहते हैं। बोगी में अखबार का हर पन्ना एक दूसरे में बट जाता है। क्रिकेट का मैच हम टीवी पर पूरा लाइव देखते हैं, फिर भी  अगले दिन अखबार का इंतजार रहता है। वो क्यों ? इसलिए कि टीवी पर सिर्फ वो दिखाई देता है,जो मैदान पर हो रहा है, लेकिन मैदान के बाहर जो खेल हो रहा है, वो अखबार ही बता पाएगा। कहने का मतलब ये है कि लोग अखबार पढ़ने के लिए जब इतना आतुर हो सकते हैं तो ब्लाग पर क्यों नहीं। हम ब्लाग को भी लोगों से जोड़ सकते हैं, पर इसके लिए पहले हमें लोगों का भरोसा जीतना होगा। हमें साबित करना होगा कि हम भी ईमानदारी से लेखन करते हैं।

आज बड़ा सवाल ये है कि हम कब तक चूं चूं करती आई चिड़िया, दाल  का दाना लाई चिड़िया लिखकर लोगों की झूठी वाहवाही लूटते रहेगें। हम जिम्मेदार कब बनेगें ? जिम्मेदार कोई एक दिन में नहीं बन सकता, सवाल ये है कि हम इसकी पहल कब करेंगे ? अच्छा ऐसा भी नहीं है कि इसके लिए हमें हिमालय पर्वत पड़ चढना है, हमें सिर्फ सामाजिक सरोकारों से जुडना होगा। समाज के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा। मै ये नहीं कहता कि हम अभी सामाजिक बुराइयों को लेकर संवेदनशील नहीं है, हम संवेदनशील हैं, लेकिन बिखरे हुए हैं। हम किसी बुराई को देखते हैं, एक लेख या फिर कविता के जरिए दो आंसू बहाकर आगे बढ़ जाते हैं। मुझे लगता है कि इतने भर से हमारा काम पूरा नहीं हो जाता। ये समझ लें, इससे तो हम किसी भी मुद्दे की शुरुआत भर करते हैं।

मित्रों अब वक्त आ गया है कि जब हमें लगे कि ये काम ठीक नहीं है, फला राज्य की  सरकार मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही है। तो हम सब को मिलकर आंदोलन छेड़ देना होगा। मैं दो एक मसले की चर्चा करना चाहता हूं। ब्लाग परिवार में महिलाओं की अच्छी संख्या है। राजस्थान  के एक मंत्री ने वहां की नर्स भंवरी देवी के साथ पहले अवैध संबंध बनाया, अब वो महिला गायब है। अभी तक उसका कोई सुराग नहीं मिला। मंत्री की कुर्सी चली गई, जांच सीबीआई कर रही है। क्या आपको लगता है कि इतना ही काफी है ? क्यों नहीं ब्लाग पर महिलाओं की आग दिखाई दी..। आपको नहीं लगता कि ये ऐसा मुद्दा था कि महिलाओं के साथ हम सब ब्लाग को भंवरी देवी से रंग कर लाल कर देते।

हम 21 वीं सदी की बात करते हैं, गोरखपुर में अज्ञात बीमारी से सौ से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई। आज तक सूबे की सरकार ये नहीं बता पा रही है कि मौत की वजह क्या थी। क्या हमारे भीतर इतनी संवेदनशीलत नहीं है, कि हम इसे एक मुद्दा बनाकर ब्लाग को रंग देते। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ विभाग का भ्रष्टाचार किसी से छिपा नही हैं। यूपी के ब्लागर्स ने कितनी बार इस मुद्दे पर अपनी  कलम चलाई। आज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। आए दिन सुनते रहते हैं कि उन्हें  यूपी सरकार के बेईमानी पर गुस्सा आता है। कोई उनसे पूछ सकता है कि राहुल आपको केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार पर आज तक गुस्सा क्यों नहीं आया ? जिस पार्टी की वजह से (डीएमके) केंद्र की सरकार बदनाम हो रही है, उससे किनारा क्यों नही कर लेते। क्या  सरकार में बने रहने के लिए बेईमान पार्टियों का सहयोग लेने से परहेज नहीं है कांग्रेस को। आपको नहीं लगता कि ये ऐसा मुद्दा है जिस पर हमें अपनी बेबाक राय रखनी चाहिए।

हम सब भारतीय संविधान में आस्था रखते हैं। हम जानते हैं कि हमारे देश की खूबसूरती हमारा लोकतंत्र है। पडोसी देशों में लोकतंत्र कमजोर हुआ तो उसका हश्र देख रहे हैं। मैं बार बार कहता रहा हूं कि अन्ना का मुद्दा सही हो सकता है, पर तरीका गलत है। आप संसद को बंधक बनाकर काम नहीं ले सकते। देश में भ्रष्टाचार गंभीर समस्या है, भ्रष्टाचारियों को सख्त सजा होनी ही चाहिए। लेकिन मित्रों लोकपाल भी तभी काम कर पाएगा, जब देश में लोकतंत्र होगा। बताइये जिस सरकार से टीम अन्ना दो दो हाथ करने निकली है, उन्हीं से अनशन के लिए मैदान का शुल्क माफ करने की भीख मांग रहे हैं। मेरा मानना है कि जनता की ताकत और जनता के पैसे को उन्होंने दो कौड़ी के नेताओं के पैरों में डाल दिया। मुझे इस बात की तकलीफ है कि जब भी आंदोलन अन्ना ने आंदोलन किया है, जंतर मंतर पर या रामलीला मैदान पर, वहां जितना खर्च हुआ, उससे कई गुना ज्यादा पैसा जनता ने उन्हें चंदा दे दिया, फिर ये फीस माफी के लिए क्यों अर्जी देते हैं ? यही वजह की मुंबई हाईकोर्ट से भी अन्ना को खरी खरी सुननी पड़ी।

खैर अब वो समय आ गया है जब लोगों को एक सूत्र में बंधना ही होगा। हमें सरकार से ये आवाज भी उठानी होगी कि जो सहूलियते इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मीडिया को दी जाती हैं, वो सहूलियतें ब्लागर्स को भी दी जानी चाहिए। क्योंकि हम भी तो लोगों की आवाज हैं, हम भी तो सूचनाओं का आदान प्रदान करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ब्लागर साथी हमें माफ करें तो मैं कुछ लोगों के नाम लेना चाहता हूं, जिनसे मैं कहना चाहता हूं कि वो ब्लाग परिवार में काफी वरिष्ठ हैं और उन्हें इसकी अगुवाई हाथ में लेनी ही चाहिए। चूंकि मेरी जानकारी कम है तो हो सकता है कुछ नाम छूट जाएं, लेकिन मै डा. रूपचंद्र शास्त्री, रश्मि प्रभा, पूर्णिमा वर्मन, रवींद्र प्रभात, ललित शर्मा, अविनाश वाचस्पति, वंदना गुप्ता, हरीश सिंह, डा. अनवर जमाल, राज भाटिया, यशवंत माथुर, राकेश कुमार, अनुपमा त्रिपाठी, विजय माथुर, आशुतोष, अंजू चौधरी, कविता वर्मा, चंद्रभूषण मिश्र गाफिल, दिनेश कुमार उर्फ रविकर, प्रवीण कुमार, सुमन, डा. मोनिका शर्मा का नाम लेना चाहता हूं जो ब्लाग परिवार से काफी समय से जुडे हैं और ये ब्लाग परिवार को नेतृत्व भी दे सकते हैं।

शुरुआत में दिक्कत हो सकती है, लेकिन हम अगर एक सूत्र में बंध गए और बुनियादी सवालों पर चट्टान की तरह खड़े हो गए, तो कोई ताकत नहीं, जो हमारी एकता के आगे नतमस्तक ना हो जाए। इससे दो फायदा होगा, पहला हमारी ताकत को लोग नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे और दूसरा आम जनता की जरूरतों की कोई अनदेखी करने की हिमाकत नहीं कर सकेगा। बडा सवाल ये है कि क्या हम ऐसा करने के लिए तैयार हैं और हमारे वरिष्ठ ब्लागर साथी क्या नेतृत्व देने के लिए आगे आएंगे ? अगर ऐसा नहीं  होता है, तो मुझे कहने में कोई हिचक नहीं कि हां मैं ब्लागर होने पर शर्मिंदा हूं..।
  
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बुधवार, 21 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: Best Football player of 2011 Sunil Chhetri

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Football captain of India named Sunil Chhetri announced best player of the year 2011 by All India Football Federation (AIFF, in Hindi called : अखिल भारतीय फुटबॉल संघ ).He was chosen the winner by I-League coaches who voted on a list of five players shortlisted.The 27-year-old football striker. AIFF told that his performance for the national team and general conduct, both on and off the field, and all this leads to declaring the title. The award carries prize money of 'two lakh ( 2 Lakh )' and a "silver plaque".

AIFF Logo
SAFF Logo

Note:
  • He is Football Ace strike
  • This is the 2nd  time Football player Sunil Chhetri  got the award. The Previous year is 2007 where he honor the "player of the year award".
  • Chhetri also conferred the Arjuna Award in 2011  year
  • The Mohun Bagan striker  called for trials at the Scottish club - Rangers FC - along with another forward Jeje Lalpekhlua.
    • He declared Man-of-the-Tournament following his brilliant show in the recently-concluded SAFF Championship that India won handsomely. 
 

Criteria:
  • As per decided by coaches on seeing performance on the field primarily for India’s international matches and general conduct, both on and off the field.

Some Facts:
  • Mr. Sunil Chhetri played 17 international matches in 2011 .
  • Chhetri scored 13 goals - the highest by any Indian player.
  • Apart from this, the Arjuna Award recipient has also scored 11 goals in 20 club appearances. He won the man of the championship in the recently concluded SAFF South Asian Football Federation Championship, sponsored by Karbonn in New Delhi. View Full Detail about SAFF
  • Sunil Chhetri cash award of Rs 2 lakh plus a silver plaque by AIFF.
  •  While two of his goals came in the Asian Cup, Qatar, in January, seven were scored in the SAFF Championship in the Capital this month, where he was also the Player of the Tournament.

Words by Mr. Sunil Chhetri:
It’s the highest recognition for an Indian footballer and I am honoured to receive the award for the second time. At a time when I am confined to my home with my plastered leg, this is perhaps, the best Christmas and New Year present.”

Early Life of The Player:
  • Born on the 3rd of August 1984 at Darjeeling, West Bengal. 
  • At the age of 17 years he began his Club Football career with the Delhi based City Club in the year 2001. 
  • Chetri played for the club for one year, and moved to Mohun Bagan Athletic Club, Kolkata in June 2002.
  • For almost 3 years he played for Mohun Bagan, and left the club in June 2005 to join JCT Mills Phagwara. He delivered his best club performance for JCT Mills in a Football match against Sao Pulo Football Club during the Super Soccer Series 2007. Sunil left JCT Mills in August 2008, and joined East Bengal Club, Kolkata and has still been playing for them.

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मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: बेचारे मजबूर प्रधानमंत्री ...

सेवा में
प्रधानमंत्री जी
भारत सरकार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, मैं पिछले कई दिनों से नहीं बल्कि महीनों से देख रहा हूं कि गल्ती कोई और कर रहा है, लेकिन निशाने पर आप हैं। इसके कारणों पर नजर डालें, तो लगता है कि है इन सबके लिए जिम्मेदार भी आप खुद ही हैं। दरअसल आप देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जो आज तक खुद स्वीकार ही नहीं कर पाया है कि वो देश का प्रधानमंत्री है। आपकी कार्यशैली से लगता है, जैसे "प्रधानमंत्री" एक सरकारी पद है, जिस पर आपको तैनात किया गया और आप प्रधानमंत्री का महज कामकाज निपटा रहे हैं। आपको डर भी लगा रहता है कि कहीं कोई गल्ती ना हो जाए। इसलिए कदम इतना ज्यादा फूंक फूंक कर रख रहे हैं कि आपके अधीनस्थ आपको डरपोक कहने लगे हैं।

प्रधानमंत्री जी आपकी कुछ मजबूरियों को मैं समझ सकता हूं, जिसकी वजह से आप पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। आपके हाव भाव से ये लगता है कि आप इस बात का हमेशा ध्यान रखते हैं कि आपको देश ने तो प्रधानमंत्री बनाया नहीं, प्रधानमंत्री तो सोनिया गाधी ने बनाया है। इसीलिए आप देश से कहीं ज्यादा सोनिया के प्रति वफादार रहते हैं। देखता हूं कि जब आप सोनिया गांधी के साथ होते हैं तो बिल्कुल निरीह दिखाई देते हैं। कई बार तो सच में ऐसा लगता है कि आपसे प्रधानमंत्री का काम जबर्दस्ती लिया जा रहा है। वैसे भी आपको मुश्किल तो होती ही होगी, क्योंकि जो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी आज आपके मंत्रिमंडल के सदस्य हैं, कभी आप उनके अधीन काम कर चुके हैं। इस सच्चाई को भले आप स्वीकार ना करें, लेकिन मुश्किल तो होती ही है। मुझे तो लगता है कि इन्हीं सब वजहों से आप मजबूत नहीं हो पा रहे हैं और देश को मजबूर प्रधानमंत्री से काम चलाना पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री जी अन्ना की अगुवाई में कुछ लोग सड़कों पर आकर देश में आराजकता की स्थिति पैदा कर रहे हैं। आपको पता है ना कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है, जिनको हम सब पूजते हैं। मर्यादा को मानने वाला भगवान राम से बढ़कर मुझे कोई और नजर नहीं आता। लेकिन भगवान राम को ही अगर हम उदाहरण मान लें तो हम देखते हैं कि वो भी तानाशाही को ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं कर पाए। लंका पर चढाई करने जा रहे भगवान श्रीराम ने समुंद्र से रास्ता मांगा, भगवान राम को लगा कि शायद मैं समुद्र से प्रार्थना करुं तो वो मान जाएं और हमें खुद ही रास्ता दे दे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ..

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होत ना प्रीत ।। 

मतलब साफ है कि विनय यानि प्रार्थना से काम नहीं बनने वाला है, ये सोच कर जब भगवान राम ने चेतावनी दी अगर अब रास्ता नहीं दिया तो एक वाण चलाकर पूरे समुद्र को सुखा दूंगा। जैसे ही भगवान ने क्रोध धारण किया, समुद्र देव प्रगट हुए और भगवान राम से माफी मांगने के साथ ही तुरंत रास्ता देने को तैयार हो गए। मेरा सवाल प्रधानमंत्री जी आप से ये है कि भगवान राम को तीन दिन में गुस्सा आ गया और आप को तेरह दिन में गुस्सा नहीं आया। कुछ लोग देश में आराजकता का माहौल बनाए हुए हैं, आप उनसे सख्ती से क्यों नहीं निपट पा रहे हैं। अगर आपने  शुरू  में ही सख्त रुख अपनाया होता, तो ये नौबत ना आती। आपकी पार्टी के एक युवा सांसद जब भी जनता के बीच में होते हैं, वो गुस्से की बात करते हैं, उन्हें देश की हालात पर गुस्सा आता है, लेकिन जिस बात पर गुस्सा आता है , उसका निराकरण करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती।
प्रधानमंत्री जी देश में ऐसा संदेश जा रहा है कि ये सरकार भ्रष्ट तो है ही, कमजोर भी है। कुछ लोगों की बंदरघुड़की से पूरा मंत्रिमंडल घुटनों पर नजर आता है। आप प्रधानमंत्री हैं और आपकी छवि साफ सुथरी है, आप पर किसी को शक भी नहीं है, फिर आप किस दबाव में हैं जो सही गलत का फैसला नहीं कर पा रहे हैं। अब समय आ गया है कि आप इस पर ध्यान ना दें कि कौन सड़क पर उतर रहा है, कौन जेल भर रहा है, इससे निपटने के लिए कानून में व्यवस्था है, वो अपना काम करेगी। आप सिर्फ ये देखें की कौन सा कानून देश के हित मे है। मैं तो इस बात के भी खिलाफ हूं कि देश के प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाया जाए।

प्रधानमंत्री जी दरअसल आपका काफिला जब सड़क पर आता है तो लोगों से रास्ता खाली करा लिया जाता है, इसलिए आपको पता नहीं है, जनता क्या चाहती है। जो जनता  रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर आती है, उसमें ज्यादातर लोग तफरी के लिए आते हैं। ये ऐसे लोग है, जो वोटिंग का महत्व भी नहीं जानते और चुनाव के दौरान दिल्ली से बाहर घूमने चले जाते हैं। देश के लोग भ्रष्टाचार से ज्यादा मंहगाई से परेशान हैं। आज जरूरत है मंहगाई को कैसे नियंत्रित किया जाए।

प्रधानमंत्री जी पूरा मंत्रिमंडल चार ऐसे लोगों को मनाने में जुटा है, जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। वो एक राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं। विपक्षी दल खासतौर पर बीजेपी की इस पूरे आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका है। जब सरकार लोकपाल  बिल पर काम करती नजर आ रही थी, उस समय भी टीम अन्ना एक राजनीति के तहत कांग्रेस का विरोध करती रही। इस टीम की स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जा रही है, इसलिए आप टीम को संतुष्ट करने के बजाए देश को संतुष्ट करने के लिए काम करें।

प्रधानमंत्री जी आपको तो पता है ना टीम अन्ना संघर्ष तेज करने और जब तक शरीर में जान है, तब तक लड़ने की बात करती हैं। लेकिन दिल्ली से महज इसलिए भाग खड़े हुए कि यहां ठंड बहुत है। जो लड़ाके ठंड़ से डरते हों, वो जान की बाजी की बात करते हैं तो हंसी ही आती है।  लोग संघर्ष की शुरुआत अपने गांव से करते हैं, फिर जिले, राज्य से  होते हुए केंद्र यानि दिल्ली आते हैं। अन्ना की लड़ाई उल्टी शुरू हुई। सीधे दिल्ली आ गए, यहां से अब अपने राज्य महाराष्ट्र वापस चले गए, अब जिले में जेल भरते हुए अपने गांव पहुंच जाएंगे। देश की जनता भी इस टीम की हकीकत को समझने लगी है। मैं गारंटी के साथ आपको बताना चाहता हूं कि लोकपाल के मामले में इनकी पूरी बातें मान भी ली जाएं तो ये दूसरी मांग को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर रहेंगे।

चलते चलते एक गुजारिश है प्रधानमंत्री जी,  आप लोकपाल बिल में एनजीओ को जरूर शामिल करें। क्योंकि देश में एक बड़ा तपका खासतौर पर सफेद पोश लोग एनजीओ की आड़ में गोरखधधा कर रहे हैं। ये कुछ विदेशी संस्थाओं से जुड़ कर बाहर से पैसे लाते हैं और उनका दुरुपयोग किया जाता है। इसी पैसे से ये राजनेताओं, सरकारी तंत्र को कमजोर करते हैं। मुझे पक्का भरोसा है कि इस मामले में भी एक ग्रुप आफ मीनिस्टर का गठन कर देशहित में आप सही निर्णय लेंगे। आज बस इतना ही।

धन्यवाद

महेन्द्र श्रीवास्तव
दिल्ली 
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शनिवार, 17 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: भारत रत्न – हॉकी बोले तो सिर्फ ध्यानचंद..पर क्रिकेट बोले तो सिर्फ सचिन नहीं(एक अपील)

परिवर्तन शाश्वत सत्य है। इसलिए नए का निर्माण होता है। कई बार इतिहास की नींव पर, तो कई बार इतिहास को दफन कर नए का निर्माण होता है। नए नियम भी बनते हैं। ऐसे ही एक अहम फैसले के तहत भारत रत्न के लिए कुछ चुनिंदा क्षेत्र की सीमा को सरकार ने खत्म कर दिया है। यानि कि ‘’खेलोगे-कूदोगे, तो बनोगे खराब’’ वाली पुरानी सोच को तिलांजलि दे दी गई है। जिस एक खिलाडी़ के कारण इस सोच में बदलाव आया औऱ नियम में बदलाव मजबूरी बन गई, वो इस वक्त देश का ही नहीं, दुनिया का सबसे चर्चित खिलाड़ी है। जी हां मैं बात कर रहा हूं सचिन तेदूंलकर की...जिन्हें उन देशों में भी पहचाना जाता है, जहां किक्रेट नहीं खेली जाती। तेंदुलकर का जबरदस्त फैन होने के कारण मुझे खुशी है कि अब उन्हें भारत रत्न दिए जाने का रास्ता साफ हो गया है। जाहिर है कि सचिन भारत के लिए कोहिनूर से भी ज्यादा कीमती हैं।

सचिन पर सियासत
भारत रत्न के लिए सचिन स्वाभाविक तौर पर पिछले काफी समय से सारे देश की पहली पसंद थे। पर जिस तरह से कुछ साल से सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने के लिए बयान देने की नेताओं में होड़ मची हुई थी, वो पूरे देश को रास नहीं आ रही थी। सचिन तेंदुलकर के न चाहते हुए भी उन्हें राजनीति ने वोट बैंक के लिए अपना मोहरा बनाते समय कोई शर्म महसूस नहीं की। सचिन को भारत रत्न देने की सिफारिश करके छोटे से छोटा नेता भी राष्ट्रीय स्तर अपना चेहरा दिखाने से बाज नहीं आ रहा था। जाहिर है कि आगे भी इसपर रोक नहीं लगेगी। एक होने वाले भारत रत्न को वोट बैंक का हिस्सा बनाने से ये नेता बाज नहीं आएंगे।

ध्यानचंद-सचिन की तुलना बेमानी
     सचिन भारत रत्न हैं इसमें कोई शक नहीं। पर हम भूल जाते हैं कि खेल की दुनिया का एक सितारा है जो सचिन से भी बड़ा है..और वो हैं हॉकी के जादूगर दद्दा ध्यानचंद। मेरी नजर में खेली की दुनिया में भारत रत्न अगर पाने का कोई पहला हकदार है तो वो हैं मेजर ध्यानचंद....और दद्दा ध्यानंचद के बाद मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदूलकर। वैसे दद्दा और मास्टर ब्लास्टर की तुलना करना बेमानी है, क्योंकि दोनो अलग-अलग समय में भारत की पहचान बने।

हॉकी के जादूगर  
      दद्दा ध्यानचंद ने गुलाम भारत की पहचान एक उभरते स्वाभामी देश के तौर दुनिया में बनाई थी। उन्होंने हिटलर को दो टूक जवाब दे दिया था, कि वो अपना देश छोड़कर किसी के लिए हॉकी नहीं खेलेंगे। एडिले़ड में दद्दा को खेलते देखकर डॉन ब्रैडमैन ने कहा था वो गोल ऐसे करते हैं जैसे कोई बल्लेबाज रन बना रहा हो।
courtsey-en.wikipedia.org/Dhyan_Chand_1936_final.
ध्यानचंद का खेल इतना जादूई था कि कोई मानने को तैयार नहीं होता था कि कोई खिलाड़ी इतना बढ़िया खेल सकता था। दुनिया को भ्रम था कि उनके हॉकी स्टिक में कोई चुंबक लगा होगा, जिस कारण गेंद उनके पास आने के बाद स्टिक से चिपक जाती होगी... औऱ इसी शक के चलते उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई कि उसमें कोई चुंबक तो नहीं। दूसरी बार इस लिए तोड़ी गई की कहीं इसमें गोद तो नहीं लगी। उन्हें दूसरी हॉकी स्टिक दी गई..पर दद्दा तो जादूगर थे...बदली हॉकी स्टिक से भी गेंद चिपक जाती थी और गोल में पहुंच कर ही अलग होती थी। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में लोगो ने दद्दा ध्यानचंद की जो मूर्ती लगाई उसमें उनके एक नहीं चार हाथ हैं औऱ चारों में हॉकी स्टिक है। यानि उनका मानना था कि ध्यानचंद एक हाथ से नहीं चार हाथ में हॉकी लेकर खेलते थे..औऱ यही है ध्यानचंद का जादू। एक हकीकत और...एक  मैच में जब देर तक दद्दा गोल करने में सफल नहीं हुए तो उनके कहने पर रैफरी ने गोल पोस्ट की चौड़ाई चैक की...तो पता चला की उसे दद्दा के डर से छोटा कर दिया गया था।

क्रिकेट का भगवान
    अब बात सचिन की। ये सच है कि सचिन की अपार लोकप्रियता और खेल पर उनकी छाप ही है कि क्रिकेट आज वहां भी पहचान बना चुका है जहां इसे कोई जानता नहीं था। अमेरिका की प्रतिष्ठत पत्रिका टाइम ने पहली बार क्रिकेट के रुप में किसी खेल को अपने कवर पेज पर जगह देने की सोची...तो क्रिकेट के प्रतिनिधी के तौर पर सचिन की फोटो छापी। ये सचिन ही थे जिन्होंने फिक्सिंग की बात पता चलने के बाद शारजाह के रेगिस्तान में सेमिफाइनल औऱ फाइनल में शतकों  तूफान खड़ा कर दिया...और क्रिकेटरों पर से भारतीयों का भरोसा नहीं टूटने दिया था। फिक्सिंग के फेर में फंस कर आज पाकिस्तान बदनाम हो चुका है। पर भारत की साख अगर बची है तो सिर्फ इसलिए कि हमारे पास सचिन तेंदुलकर हैं। ये भी हकीकत है कि फिक्सिंग के बाद मेरी तरह कई लोग काफी दिन तक सचिन के आउट होने के बाद मैच नहीं देखते थे। यही सचिन पर देश का भरोसा है और जादू है जिसके कारण आज सरकार को भारत रत्न देने के नियमों में बदलने की जरुरत पड़ गई। एक समय ऐसा भी था जब एक सर्वे में पता चला कि देश के लोगो को किसी राजनेता या अभिनेता के बदले सबसे ज्यादा भरोसा सचिन पर है। प्रधानमंत्री तक देशवासियों के भरोसे के पायदान पर सचिन से पीछे थे।

पर भगवान से भी बड़ा है जादूगर

  अब सवाल है कि दद्दा सचिन से पहले भारत रत्न के हकदार क्यों हैं? दरअसल  ध्यानचंद इसलिए भारत रत्न के पहले दावेदार हैं क्योंकि वो अपने जीवन में किवंदती बन गए थे। दद्दा हॉकी के पर्याय बन गए थे…दुनिया में दद्दा के बाद ये रुतबा फुटबाल के महान खिलाड़ी पेले को ही प्राप्त है। जबकि क्रिकेट की दुनिया में ब्रैडमैन का भी रुतबा क्रिकेट के समकक्ष नहीं बन पाया। उल्टे उनके जीतेजी ही सचिन ने उनकी बादशाहत को जबरदस्त चुनौती दे दी। बावजूद इसके सचिन क्रिकेट का पर्याय नहीं बन पाए हैं।
यानि बोले तो हॉकी मतलब ध्यानचंद’’
मगर....बोले तो क्रिकेट मतलब सिर्फ सचिन नहीं 

     यही एक ऐसा मुकाम है जो मास्टर ब्लास्टर की पहुंच से दूर है।   निंसदेह वर्तमान में सचिन क्रिकेट के भगवान हैं। पर यहीं भगवान भी जादूगर के आगे बौने सिद्द होते हैं। मेरी सरकार से यही अपील है कि खेल की दुनिया का पहला भारत रत्न उसके सही हकदार हाकी के जादूगर ध्यानचंद को दिया जाए औऱ तुरंत बाद अगला भारत रत्न क्रिकेट के भगवान को। क्योंकि किसी भी क्षेत्र में वर्तमान में देश में क्रिकेट के भगवान से बड़ा कोई भारत रत्न नहीं है।
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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: सोनिया को नहीं जानती मुनिया ...

स लड़की को नहीं पता कि देश की राजधानी दिल्ली में आज कल किस बात की जंग अन्ना छेड़े हुए हैं। इसे तो सिर्फ ये पता है कि अगर शाम तक उसकी लकड़ी ना बिकी तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा। पूरे शरीर पर लकडी की बोझ तले दबी इस लड़की की कहानी वाकई मन को हिला देने वाली है। मुझे लगता है कि देश की तरक्की को मापने का जो पैमाना दिल्ली में अपनाया जा रहा है, उसे सिरे से बदलने की जरूरत है। जंगल की जो तस्वीर मैने देखी है, उसे आसानी से भुला पाना मेरे लिए कत्तई संभव नहीं है। 
ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, मैं आफिस के टूर पर उत्तराखंड गया हुआ था। घने जंगलों के बीच गुजरते हुए मैने देखा कि जंगल में कुछ लड़कियां पेड़ की छोटी छोटी डालियां काट रहीं थी और वो इन्हें इकठ्ठा कर कुछ इस तरह समेट रहीं थीं, जिससे वो उसे आसानी से अपनी पीठ पर रख कर घर ले जा सकें। दिल्ली से काफी लंबा सफर तय कर चुका था, तो वैसे भी कुछ देर गाड़ी रोक कर टहलने की इच्छा थी, जिससे थोड़ा थकान कम हो सके।
हमने यहीं गाड़ी रुकवा दी, गाड़ी रुकते ही ये लड़कियां जंगल में कहां गायब हो गईं, पता नहीं चला। बहरहाल मैं गाड़ी से उतरा और जंगल की ओर कुछ आगे बढ़ा। हमारे कैमरा मैन ने जंगल की कुछ तस्वीरें लेनी शुरू कीं, तो इन लड़कियों को समझ में आ गया कि हम कोई वन विभाग के अफसर नहीं, बल्कि टूरिस्ट हैं। दरअसल लकड़ी काटने पर इन लड़कियों को वन विभाग के अधिकारी परेशान करते हैं। इसके लिए इनसे पैसे की तो मांग की ही जाती है, कई बार दुर्व्यवहार का भी सामना करना पड़ता है। लिहाजा ये कोई भी गाड़ी देख जंगल में ही छिप जाती हैं।
हमें थोडा वक्त यहां गुजारना था, लिहाजा मैं इन लड़कियों के पास गया और उनसे सामान्य बातचीत शुरू की। बातचीत में इन लड़कियों ने बताया कि उन्होंने दिल्ली का नाम तो सुना है, पर कभी गई नहीं हैं। बात नेताओं की चली तो वो सोनिया, राहुल या फिर आडवाणी किसी को नहीं जानती। हां इनमें से एक लड़की मुनिया है जो उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का नाम जानती है, पर वो क्या थे, नहीं पता। मैने सोचा आज कल अन्ना का आंदोलन देश दुनिया में छाया हुआ है, शायद ये अन्ना के बारे में कुछ जानती हों। मैने अन्ना के बारे में बात की, ये एक दूसरे की शकल देखने लगीं।
खैर इनसे मेरी बात चल ही रही थी कि जेब में रखे मेरे मोबाइल पर घर से फोन आ गया, मै फोन पर बातें करने लगा। इस बीच मैं देख रहा था कि ये लड़कियां हैरान थीं कि मैं कर क्या रहा हूं। मेरी बात खत्म हुई तो मैने पूछा कि तुम लोग नहीं जानते कि मेरे हाथ में ये क्या है, उन सभी ने नहीं में सिर हिलाया। बहरहाल अब मुझे आगे बढना था, लेकिन मैने सोचा कि अगर इन्हें मोबाइल के बारे में थोड़ी जानकारी दे दूं, तो शायद इन्हें अच्छा लगेगा। मैने बताया कि ये मोबाइल फोन है, हम कहीं भी रहें, मुझसे जो चाहे मेरा नंबर मिलाकर बात कर सकता है। मैं भी जिससे चाहूं बात कर सकता हूं। मैने उन्हें कहा कि तुम लोगों की बात मैं अपनी बेटी से कराता हूं, ठीक है।
मैने घर का नंबर मिलाया और बेटी से कहा कि तुम इन लड़कियों से बात करो, फिर मैं बाद में तुम्हें बताऊंगा कि किससे तुम्हारी बात हो रही थी। बहरहाल फोन से बेटी की आवाज सुन कर ये लड़कियां हैरान थीं। हालाकि ये लड़कियां कुछ बातें तो नहीं कर रही थीं, लेकिन दूसरी ओर से मेरी बेटी के हैलो हैलो ही सुनकर खुश हो रही थीं।
अब मुझे आगे बढना था, लेकिन मैने देखा कि इन लड़कियों ने लकड़ी के जो गट्ठे तैयार किए हैं, वो बहुत भारी हैं। मैने पूछा कि ये लकड़ी का गट्ठर तुम अकेले उठा लोगी, उन सभी ने हां में सिर हिलाया। भारी गट्ठर देख मैने भी इसे उठाने की कोशिश की, मैं देखना चाहता था कि इसे मैं उठा सकता हूं या नहीं। काफी कोशिश के बाद भी मैं तो इसे नहीं उठा पाया। इसके पहले कि मै इन सबसे विदा लेता, मेरी गाड़ी में खाने पीने के बहुत सारे सामान थे, जो मैं इनके हवाले करके आगे बढ गया।
मैं इन्हें पीछे छोड़ आगे तो बढ गया, पर सच ये है कि इनके साथ हुई बातें मेरा पीछा नहीं छोड़ रही हैं। मैं बार बार ये सोच रहा हूं कि पहाड़ों पर रहने वाली एक बड़ी आवादी किस सूरत-ए-हाल में रह रही है। ये बाकी देश से कितना पीछे हैं। इन्हें नहीं पता देश कौन चला रहा है, इन्हें नहीं पता देश में किस पार्टी की सरकार है। राहुल गांधी और केंद्र सरकार अपनी सरकारी योजना नरेगा की कितनी प्रशंसा कर खुद ही वाहवाही लूटने की कोशिश करें, पर हकीकत ये है कि जरूरतमंदो से जितनी दूरी नेताओं की है, उससे बहुत दूर सरकारी योजनाएं भी हैं।
अन्ना के साथ ही उनकी टीम अपने आंदोलन को शहर में मिल रहे समर्थन से भले ही गदगद हो और खुद ही अपनी पीठ भी थपथपाए, पर असल लड़ाई जो लड़ी जानी चाहिए, उससे हम सब अभी बहुत दूर हैं। हम 21 सदी की बात करें और गांव गांव मोबाइल फोन पहुंचाने का दावा भी करते हैं, लेकिन रास्ते में हुए अनुभव ये बताने  के लिए काफी हैं कि सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही मजबूत हैं। घर वापस आकर जब मैने बेटी को बताया कि रास्ते में कुछ ऐसी लड़कियों से मुलाकात हुई जो कभी दिल्ली नहीं आई हैं, उन्हें नहीं पता कि यहां किसकी सरकार है। यहां तक कि ये लड़कियों मोबाइल फोन देखकर भी हैरान थीं, तो बच्चों को भी यकीन नहीं हो रहा है, पर सच ये है कि तस्वीर खुद बोलती है।     
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: World's Cheapest TAB now in INDIA, Buy Online Now !!!

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This is a very good news that the most awaited TAB named as  Aakash tablet now, and pre-book your Ubislate7 (the upgraded version of Aakash) today! Aakash tablet can be ordered now (cash on delivery) and the delivery will be done in a week’s time. 

Picture Gallery:


SpecificationsAakashUbiSlate 7 (The upgraded version of Aakash)
AvailabilityNOW!Late January
PricingRs.2,500Rs.2,999
MicroprocessorArm11 – 366MhzCortex A8 – 700 Mhz
Battery2100 mAh3200 mAh
OSAndroid 2.2Android 2.3
NetworkWiFiWiFi & GPRS (SIM & Phone functionality)


 Order now 




Use Link below

Order now visit     akashtablet.com
Or Call at:
toll free: 1800-1802-180

What is  Ubislate 7.. ??



The much awaited India’s ultra low cost Aakash tablet is finally here and is creating ripples all around. Datawind launched Ubislate7 in India, and the student version is named as the Aakash tablet. It offers a web delivery platform that enables quality and interactive knowledge over the internet. 
The CEO of DataWind, Mr. Suneet Singh Tuli says ‘This is a made-in-India product. Thank you for giving me the opportunity to do this.’ He adds, ‘The final goal is to either provide the same features at a lower cost or provide better functionality and features at the same cost.’ 
The team of engineers at Datawind has come up with the upgraded version of the Aakash tablet. This upgraded version of Aakash is called Ubislate 7. 
Ubislate 7 will be commercially available everywhere and to everyone. This next generation of Aakash is loaded with better features and specifications, and any person can buy it. 
The Telecom and Education Minister, Kapil Sibbal, said at the launch of Aakash, "The rich have access to the digital world, the poor and ordinary have been excluded. Aakash will end that digital divide." 
There is definitely no other touch pad tablet or computing device anywhere near the price of Aakash tablet or Ubislate 7. It is a new generation device which comes with attractive features. This is the world’s cheapest tablet pc. This tab is made for the requirement of the users and especially for student needs. 


Add Ons 
The tablet has a lot of accessory options as well. Car chargers and external antennas can be attached to it. A keyboard case can also be used. It has 2 USB ports and can also be used as a phone. The commercial version will also have an option of 3G. External 3G dongle is also supported. 
Features
  • Unbeatable Price:
    • Only Rs.2,999 for the UbiSlate
    • Monthly internet charges: Rs.98 / 2GB
  • High Quality Web Anytime & Anywhere:
    • Connect via GPRS or WiFi
    • GPRS: Embedded modem eliminates the need for external dongles and allows Internet access everywhere
    • WiFi: Allows fast Youtube videos at hotspots
    • Fast web access even on GPRS networks, across the country using DataWind’s patented acceleration technology
    • Web, Email, Facebook, Twitter and much much more!
  • Multimedia Powerhouse:
    • HD Quality Video
  • Watching movies in the palm of your hand on a 7” screen
    • Audio library software helps manage your full collection of songs
  • Applications Galore with Android 2.2:
    • Games
    • Productivity software: Office suite
    • Educational software
    • Over 150,000 apps!
  • Full sized-USB port & Micro-SD slot:
    • Expand memory to 32GB
    • Use any ordinary pen-drive
    • Even plug-in a 3G dongle
  • And It’s a Phone!


Configuration

  • Hardware:
    • Processor: Connexant with Graphics accelerator and HD Video processor
    • Memory (RAM): 256MB RAM / Storage (Internal): 2GB Flash
    • Storage (External): 2GB to 32GB Supported
    • Peripherals (USB2.0 ports, number): 2 Standard USB port
    • Audio out: 3.5mm jack / Audio in: 3.5mm jack
    • Display and Resolution: 7” display with 800x480 pixel resolution
    • Input Devices: Resistive touch screen
    • Connectivity and Networking: GPRS and WiFi IEEE 802.11 a/b/g
    • Power and Battery: Up to 180 minutes on battery. AC adapter 200-240 volt range.
  • Software:
    • OS: Android 2.2
    • Document Rendering
  • Supported Document formats: DOC, DOCX, PPT, PPTX, XLS, XLSX, ODT, ODP
  • PDF viewer, Text editor
  • Multimedia and Image Display
    • Image viewer supported formats: PNG, JPG, BMP and GIF
    • Supported audio formats: MP3, AAC, AC3, WAV, WMA
    • Supported video formats: MPEG2, MPEG4, AVI, FLV
  • Communication and Internet
    • Web browser - Standards Compliance: xHTML 1.1 compliant, JavaScript 1.8 compliant
    • Separate application for online YouTube video
    • Safety and other standards compliance
  • CE certification / RoHS certification
    • Other: Additional Web Browser: UbiSurfer-Browser with compression/acceleration and IE8 rendering.
Accessories
  • Full set of accessory options:
    • Car charger
    • External antenna
    • Keyboard case
  • Convert it into a laptop!


Hope you Like it..
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Source: Click Here
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

To LoVe 2015: कौन लिख रहा अन्ना की स्क्रिप्ट ...

देश संकट के दौर से गुजर रहा है, ये वक्त है जब नेताओं को अपने दल से ऊपर देश को रखना होगा, उन्हें मिलकर सोचना होगा कि आखिर गल्ती कहां हुई, क्यों लोग सड़कों पर जमा हो रहे हैं ? सरकार के प्रति लोगों में इतनी नफरत क्यों है? इस समस्या का समाधान भी जल्दी तलाशना होगा। अगर सभी दलों के नेता आपस में ही झगड़ते रहे, तो उनका नुकसान तो ज्यादा नहीं होगा, लेकिन देश की जो दुर्गति होगी, उसकी भरपाई बिल्कुल आसान नहीं होगी। वक्त आ गया है कि राजनीतिक दल खुद ही भ्रष्टाचार से देश को बाहर निकालने का ऐसा रास्ता तलाशें, जिस पर लोगों को यकीन हो। सच्चाई ये है कि देश में महंगाई एक समस्या है, भ्रष्टाचार उससे भी बड़ी समस्या है, लेकिन सियासी दल जनता का भरोसा खोते जा रहे हैं ये सबसे बड़ी समस्या है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में अगर राजनीतिक दलों से जनता का भरोसा खत्म होने लगे तो समझ लिया जाना चाहिए कि लोकतंत्र खतरे में हैं। इसी का फायदा उठा रही है टीम अन्ना।

मै मानता हूं कि देश में भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में गुस्सा है। इसे रोकने के लिए पहले ही ठोस प्रयास किया जाना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ, गल्ती किसकी है, इस पर जाना बेमानी है। देश में वोट की राजनीति ने कानून को भी जाति धर्म के आधार पर बांट दिया है। आतंकवादियों से निपटने के लिए देश में बीजेपी की सरकार ने पोटा कानून बनाया, कांग्रेस ने महज एक तपके के वोट की लालच में इस कानून को खत्म कर दिया। मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ एक बात कहना  चाहता हूं कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून की बात की जा रही है। मैं कहता हूं कि कानून सख्त बन भी गया, लेकिन उस पद पर आदमी ढीला बैठ गया तो सख्त कानून का माखौल भर उड़ना है। मुझे लगता है कि कानून कैसा भी हो,आदमी सख्त हो तो वो सूरत बदलने में सक्षम होगा। आपको याद होगा निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को लोग गैरजरूरी समझते थे, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर तैनात हुए टीएन शेषन ने कानून के दायरे में रहकर बता दिया कि पद की मर्यादा कैसे कामय रखी जाती है।

बहरहाल मैं आज भी इस बात पर कायम हूं कि अन्ना की मांग सही है, परंतु तरीका बिल्कुल गलत। अन्ना का आंदोलन देश के लोकतांत्रिक ढांचे को तार तार करने वाला है, सच कहें तो ये आंदोलन संसद पर हमला है। संसद पर दस साल पहले पांच आंतकवादियों ने हमला किया था, लेकिन उनका मकसद कुछ लोगों की हत्या करना था, पर सिविल सोसायटी के पांच लोग संसद पर जो हमला कर रहे हैं वो उस आतंकी हमले के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि इनका मकसद देश के लोकतंत्र की हत्या करना दिखाई दे रहा है। जब भी मैं ऐसा कहता हूं तो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी मोर्चा संभाल लेते हैं और मुझ पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगाकर गंभीर मसले से जनता का ध्यान हटाने की साजिश करते हैं। अब आप ही बताएं कि सांसदों पर दबाव बनाया जा रहा है कि जो अन्ना कहें, संसद के भीतर उन्हें वही बोलना है, अगर वैसा नहीं बोला गया तो उस सांसद के घर के बाहर धरना शुरू हो जाएगा। यानि सांसद को देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में टीम अन्ना का बंधक बना रहना होगा।

मैं हैरान हूं आज तमाम बुद्धिजीवी अन्ना के आँदोलन  की तुलना उन देशों से कर रहे है, जहां किसी तानाशाह शासक का राज चल रहा है, वहां ना चुनाव होते हैं ना लोगों के नागरिक अधिकारों की रक्षा होती है। 30- 40 साल से कोई एक शख्स ताकत और पैसे के बल पर राज कर रहा है, ऐसे में एक ना एक दिन जनता का गुस्सा सड़कों पर आना ही था। अन्ना के सम्मान में तर्क दे रहे है कि ये आंदोलन कितना शांतिपूर्ण है, एक भी पत्थर नहीं चला। जबकि दूसरे मुल्कों के आंदोलन में कितना खून खराबा हुआ। अब इन्हें कौन बताए दूसरे मुल्कों में तानाशाह शासक हैं जो अपने ही देश के लोगों पर गोली बारी करा रहे थे, इसके जवाब में आंदोलनकारियों ने भी पत्थरबाजी और गोलीबारी की। यहां सरकार ने भी तो संयम बरता है, वरना जिस तरह से मंच से भड़काऊ भाषण देकर जनता को उकसाने की कोशिश हो रही है, अगर सरकार सख्ती करे, तो आंदोलन की सूरत यहां भी बदल सकती है। आंदोलन के शांतिपूर्ण होने का क्रेडिट अन्ना से ज्यादा सरकार को दिया जाना चाहिए। अन्ना के मुकाबले जेपी आंदोलन पर भी कीचड़ उछालने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि उनके आंदोलन के दौरान देश में हिंसा हुई। मुझे लगता  है कि उस  दौरान आंदोलन को ताकत के बल पर कुचलने की कोशिश हुई,  जिससे जनता में भी आक्रोश भड़का और कई जगह हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी की वारदातें हुईं।

जेपी आंदोलन आखिर में एक राजनैतिक आंदोलन बन चुका था, उन्हें लगने लगा था कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के लिए जरूरी है कि राजनैतिक विकल्प भी खड़ा किया जाए। इसके बाद लोकनायक ने एक मजबूत विकल्प भी दिया। आज अन्ना कहां खड़े हैं अभी तक साफ नहीं है। यानि " ना ही में, ना सी मैं, फिर भी, पांचो उंगली घी में "। पर्दे के पीछे  से सियासी लड़ाई नहीं लड़ी जाती। अगर वाकई मैदान में हैं और राजनीतिक दलों के साथ मिलकर सरकार को घेरना चाहते हैं, साफ कहना चाहिए। जिस जंतर मंतर से कुछ महीने पहले  राजनेताओं को खदेडा गया, फिर उन्हें उसी मंच पर स्थान देने के लिए टीम अन्ना क्यों इतनी उतावली दिखी। क्या देश  के लोगों पर से उसका भरोसा खत्म हो गया है। वैसे टीम अन्ना को पता था कि उनके मंच पर यूपीए के घटक दलों से तो कोई शामिल होगा नहीं, अच्छा मौका है जंतर मंतर पर विपक्ष को बुलाकर सरकार की किरकिरी कराई जाए, लेकिन ये दांव भी उल्टा पड़ गया। यहां बीजेपी नेता अरुण जैटली ने भले ही अन्ना की मांगो का समर्थन किया, लेकिन लेफ्ट नेता ए वी वर्धन ने टीम अन्ना को  खूब खरी खरी सुनाई।

बहरहाल बीजेपी और उनके सहयोगी दलों को ये बताना चाहता हूं कि आप राजनीति तब करेंगे जब देश बचेगा, जब संसद और उसकी मर्यादा बची रहेगी। आज संसद की सर्वोच्चता पर सवाल खड़ा किया जा रहा है। क्या हम मान लें कि कुछ लोग सड़क पर मसौदा तैयार कर सरकार पर दबाव बनाएं कि इसे इसी रूप में कानून बनाया जाना चाहिए, क्या सरकार को ऐसी मांगे मान लेनी  चाहिए। मुझे लगता है कि ये तरीका तो अनुचित है ही, अगर ऐसा होता है तो देश में एक ऐसा गलत रास्ता खुल जाएगा, जिसे बाद में बंद करना मुश्किल होगा।
मेरा मानना है कि कमजोर नेतृत्व के चलते  सरकार हर गंभीर मसले पर घुटनों पर आ जाती है। अन्ना के आंदोलन से निपटने में सरकार फेल रही है। वैसे भी टीम अन्ना पर भरोसा नहीं किया जा सकता, ये जो बातें करते हैं उस पर कायम नहीं रहते। इसलिए अगर सरकार सख्त रहती, तो रास्ता ये निकलता कि सिविल सोसायटी के ही कुछ लोग बातचीत का प्रस्ताव लेकर  सरकार के पास आते। सच तो ये भी है कि जिन लोगों से सरकार की बात हो रही थी, वो इसके काबिल नहीं थे। वरना प्रधानमंत्री के पत्र के बाद पहले तो अन्ना ने अनशन खत्म किया, फिर पूरे देश में जीत का जश्न मनाया गया। इस बीच ऐसा क्या हो गया जिससे टीम अन्ना लोकसभा उप चुनाव में हिसार जाकर कांग्रेस उम्मीदवार का विरोध करने लगी। यूपी के कई शहरों में जाकर कांग्रेस के खिलाफ बात की गई।

इस सवाल पर  टीम अन्ना का जवाब होता है कि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार चल रही है, वो चाहे तो जनलोकपाल बिल पास करा सकती है। टीम अन्ना को कौन समझाए कि  खुदरा व्यापार में प्रधानमंत्री एफडीआई के पक्ष में थे, लेकिन उनके सहयोगी और विपक्ष के तीखे विरोध के चलते ये बिल संसद में पास नहीं हो सका। हमारे देश के लोकतंत्र की यही खूबसूरती है। अगर सरकार चाह कर भी एफडीआई नही पास करा पाई तो वो जनलोकपाल बिल कैसे पास करा सकती है ? तमाम घटनाक्रम को देखने से साफ हो जाता है कि टीम अन्ना इस  ड्रामें की पात्र भर है, इनकी स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जाती है। टीम अन्ना लोगों को किस कदर गुमराह करती है, इसे भी  समझना जरूरी है। स्थाई समिति की रिपोर्ट का माखौल उड़ाते हुए कहा गया कि कमेटी में कुल 30 लोग हैं, जिसमें दो सदस्य कभी आए नहीं। 17 लोगों ने विरोध किया, जबकि सात कांग्रेस  के अलावा लालू यादव और अमर सिंह जैसे 11 लोगों ने मिलकर देश के कानून का मसौदा तैयार कर दिया। टीम ने कहा कि सिर्फ 11 लोग देश का कानून कैसे बना सकते हैं? मैं पूछता हूं, कि चलो वो तो 11 लोग थे, लेकिन आप तो सिर्फ पांच लोग ही हैं जो 121 करोड़ जनता के लिए कानून अपने मनमाफिक बनवाने पर आमादा हैं।
बहरहाल मैं चाहता हूं कि स्थाई समिति की प्रक्रिया की संक्षेप में जानकारी लोगों को होनी ही चाहिए। इस मसौदे में कुल लगभग 24 प्रस्ताव हैं। जिन 17  लोगों ने डिसेंट नोट (असहमति पत्र) दिया है,  उसका ये मतलब नहीं है कि उन्होंने कमेटी के पूरे मसौदे को ही खारिज कर दिया है। आमतौर पर कोई सदस्य किसी एक प्रस्ताव से सहमत नहीं होता है, किसी को दो पर आपत्ति होती है, कुछ को तीन चार पर भी आपत्ति हो सकती। इससे ये नहीं समझना चाहिए कि सदस्यों  ने पूरा मसौदा ही खारिज कर दिया, चूंकि इस मामले में गलत संदेश लोगों को देने की कोशिश हो रही है, लिहाजा इस पर चर्चा जरूरी थी। एक बात और की जा रही है कि प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया था कि निचले स्तर के अधिकारियों कर्मचारियों को लोकपाल  के दायरे में लाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अब टीम अन्ना लोगों मै कैसे जहर घोलती है, ये देखें। प्रधानमंत्री के पत्र में साफ किया गया था कि निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों को उपयुक्त तंत्र के जरिए नियंत्रित करने का प्रयास किया जाएगा। अब सरकार ने सीवीसी को उपयुक्त तंत्र माना है, तो ये कैसे कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने जो आश्वासन दिया था, उसे पूरा नहीं किया।

टीम अन्ना की मांगे बेतुकी भी हैं। वो कह रहे हैं सीबीआई को जनलोकपाल के अधीन कर दिया जाए। अब आप बताएं सीबीआई क्या केवल भ्रष्टाचार की ही जांच करती है? अरे सीबीआई के दायरे में दुनिया भर के अपराध शामिल हैं। कई बार हत्या और  बलात्कार जैसी घटनाओं की भी जांच सीबीआई करती है। ऐसे में जनलोकपाल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कैसे केंद्रित हो सकता है। जब ये सवाल उठा तो कहा गया कि पूरी सीबीआई को ना दें, आर्थिक मामलों  की जांच करने वाली टीम को लोकपाल के दायरे में कर दिया जाए। अब टीम अन्ना की ऐसी बातों से लगता है कि वो महज विवाद को बनाए रखना चाहते हैं। मैं एक वाकया बताता हूं, यूपी के स्वास्थ्य विभाग में करोडो का घोटाला हुआ, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। इसमें गिरफ्तार एक स्वास्थ्य महकमें  के अफसर को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जहां बाद में उसकी संदिग्ध हालातों में मौत हो गई। अब क्या एक ही मामले में आधी जांच लोकपाल और आधी जांच कोई अन्य विभाग करेगा ?

क्या होना चाहिए, क्या नहीं, ये सब जानते हैं। सभी को पता है कि देश में 121 करोड़ की आबादी को किसी कानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। जब तक लोग खुद नैतिक नहीं होंगे,  तब तक ईमानदारी की बात करना बेमानी है। अन्ना का आंदोलन पूरी तरह राजनैतिक आंदोलन  है और इससे राजनैतिक आंदोलन की तरह ही निपटा जाना चाहिए। सरकार जितना घुटना टेकेगी, टीम अन्ना एक के बाद एक मुद्दे पर ऐसे  ही सरकार को घुटनों पर लाने की कोशिश करेगी, क्योंकि इस आंदोलन के पीछे की कहानी कुछ और ही है।

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