बुधवार, 29 जून 2011

To LoVe 2015: PM Post, Jan Lokpal and PM Manmohan SIngh ... मनमोहन का मोहनी वार

तू डाल-डाल मैं पात-पात----मनमोहन सिंह का धोबीपाट
आखिरकार लंबे इंतजार के बाद प्रधानमंत्री ने मौन तोड़ ही दिया....कह दिया कि वो प्रधानमंत्री पद को जनलोकपाल के दायरे में लाने के खिलाफ नहीं है....पर साथ ही ये भी कह डाला कि उनके सहयोगियों में इसको लेकर मतभेद है....इधर प्रधानमंत्री ने मौन तोड़ा, उधर अन्ना ने भी प्रधानमंत्री की ईमानदारी के कसीदे पढ़ डाले....यानि दोनो ईमानदार एक साथ हैं..पर उनकी सेना में मतभेद है....अब इससे हालात ऐसे लग रहे हैं जैसे मंत्रियों और अन्ना के सहयोगियों के बीच पसरा तनाव कुछ कम होंगे...पर ऐसा है नहीं....प्रधानमंत्री के आज के बयान से कई निशाने सधे हैं.......दरअसल जब से अन्ना ने दिल्ली में दवाब बनाया है तब से ही नेताओं औऱ नौकरशाहों में तनाव है..इसलिए जनता का ध्यान बांटने के लिए सियासत औऱ नौकरशाही के भ्रष्ट गठजोड़ ने जनलोकपाल अभियान के खिलाफ इतने भ्रम फैलाये हैं कि खुद जनता असमंजस में है....हकीकत ये है कि जब भी प्रधानमंत्री पद को जनलोकपाल के दायरे में लाने की बात हुई तो इसे विरोधियों ने मनमोहन सिंह को आगे कर हल्ला मचाना शुरु कर दिया...माहौल ऐसा बनाने कि कोशिश हुई जैसे सिविल सोसायटी के सदस्य और लोकपाल बिल के समर्थक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदारी पर शक कर रहे है...मनमोहन सिंह को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है...और इस बहाने सारे भ्रष्ट नेता ईमानदार छवि के पीछे लामबंद होकर सारे मसले को मनमोहन सिंह बनाम जनलोकपाल बिल के तौर पर जनता के सामने पेश करने पर तुले हुए हैं...जबकि असलियत ये है कि बात प्रधानमंत्री के पद को जनलोकपाल के दायरे में लाने की बात सिविल सोसायटी के लोग कर रहे हैं...अब सीधा सवाल ये उठता है कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री पद की बात हो रही थी वहां व्यक्ति यानि डाक्टर मनमोहन सिंह कैसे आ गए...जाहिर है मनमोहन सिंह की आड़ लेकर भ्रष्ट नेता और सरकारी बाबू और अफसर अपनी खाल बचाना चाहते हैं....यानि कि भ्रष्ट नेताओं ने मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि के आसरे मुद्दे को भटकाने, जनता को बरगलाने और अपने बचाव की सूरत पैदा करने की सोच रहे हैं...आज तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिह हैं और उनकी छवि ईमानदार नेता की है...हालांकि आज भी वो नेता नहीं माने जाते....मैं खुद उन्हें एक नेता से ज्यादा कुशल प्रशासक मानता हूं....लेकिन सवाल ये है कि आज जिस पद पर ईमानदार मनमोहन सिंह है उसी पद को लोकपाल के दायरे में लाने की सख्त जरुरत महसूस की गई थी...अगर लोगो को याद न हो तो वो जरा बीस साल पीछे चलें और याद करें जब प्रधानमंत्री पद पर नरसिंमहा राव थे...एक के बाद एक..जेएमएम सांसद रिश्वत कांड, सेंट्स किट्स फोजरी कांड या लखूभाई पाठक चिटिंग कांड..हर कांड में उंगली नरसिंह राव की तरफ उगंली उठ रही थी..जो प्रधानमंत्री के पद पर थे..भ्रष्टायार के अधिकतर मामलों की कड़ी सीधे प्रधानमंत्री या उनके कटोरे के लोगो के पास पहुंच जाती थी.....ये अलग बात है कि दुनिया से रुखसत होते-होते नरसिम्हा राव को अदालत से लेकर जांच एजेंसियों तक से सभी मामलों में क्लीन चिट मिल चुकी थी...तो दूध से जली जनता अगर छाछ भी फूंक-फूंक कर पीना चाहती तो ऐतराज कैसा..
.आज जब भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की तरफ से पूरी सियासत पर अन्ना की सूरत में दवाब बढ़ रहा है तो भ्रष्ट तंत्र और भ्रष्ठ नेताओं ने शासन पर पकड बनाए रखने और अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री पद की जगह सारे मामला मनमोहन सिंह के इर्द गिर्द समेट कर जनलोकपाल बिल से बचने की कोशिश में लग गया है...जिस वक्त अन्ना और मंत्री समूह के बीच उठापठक चल रही थी...जनता समेत सबकी निगाहें निगाहें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरफ लगी हुई थी..कि आखिर इस पर उनकी क्या कहना है..? पर सियासी मजबूरी के चलते मनमोहन सिंह भी लगभग चार महीने तक चुप ही रहे..खुलकर सामने नहीं आए...और जब कल अखबार के संपादकों के साथ बातचीत में उन्होंने चुप्पी तोड़ी तो एक साथ कई निशाने साध दिए...जो ये बताता है कि अब वो भई राजनीति के चतुर खिलाड़ी बन चुके हैं....खासतौर पर पार्टी के अंदर उनके विरोधि धड़े के नेताओं को उन्होंने जता दिया है कि सोनिया गांधी का वरद हस्त उनपर है औऱ वो ही प्रधानमंत्री बनें रहेंगे..और उनके बाद राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद पर आएंगे...औऱ कोई कांग्रेसी नेता नहीं.....साथ ही अपनी चुप्पी तोड़ते हुए मनमोहन सिंह ने साफ कर दिया कि वो प्रधानमंत्री के पद को जनलोकपाल के दायरे में लाने के खिलाफ नहीं हैं, वो तो खुद इसमें आने को तैयार है...मगर इस पर मतभेद उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों में हैं....यानि एक चतुर सुजान नेता के तौर पर मनमोहन सिहं ने अपनी ईमानदार छवि को बड़े ही शानदार ढंग और पुख्ता करते हुए...गेंद सिब्बल एंड पार्टी के पाले में डाल दी है...। यानि प्रधानमंत्री ने जता दिया है कि राजनीति चातुर्य में किसी से कम नहीं....। प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद अब ये देखना मजेदार होगा कि जनलोकपाल बिल के विरोधी किस तरह से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को फिर से इसमें घसीटने की कोशिश करते हैं....तब तक तेल देखिए, तेल की धार देखिए और तैयारी करिए पंद्रह अगस्त के ठीक अगले दिन शुरु होने वाले एक और जंग की.....आमीन....
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रविवार, 26 जून 2011

Apple iPhone just Rs. 19,990 for Indian Market



Main Features of this I-phone are:
  • The iPhone 3GS comes with a 3.5" capacitive display with pixel dimensions of 320x480.
  • 3.15 MP camera
  • 600 MHz processor
  • 8 GB of internal storage without an expandable memory card slot
  • The handset is capable of reaching speeds of up to 7.2 Mbps on 3G HSDPA. It runs on iOS 4.3 out of the box, with support for iOS 5 when it is launched in a couple of months from now.
  • price 19,990 rupee keep in mind Indian market.
 I know price are still high but wait for couple of month for new offer by Apple really Nokia have to face Problems.
Enjoy Budy 
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शनिवार, 25 जून 2011

To LoVe 2015: IIFA: Awards detail

At the Begining of IIFA

IIFA stand for International Indian Film Academy ( Torrento)



Shahrukh Khan, often referred to as "King Khan," whose close-ups on the monitor screens drew the loudest cheers.
  • Romantic comedy "Band Baaja Baarat" and action drama "Dabangg" scooped up three early 
  • Also referred to as the Indian Oscars.
  • Namrata Rao won the IIFA award for editing
  • Naharika Khan for costume and Vijay Dayal for best song 'Ainvayi ainvayi' in 'Band Baaja Baaraat'
  • Pritam Das for best sound recording in 'Love, Sex aur Dhokha'
  • Shankar-Ehsaan-Loy for background score in 'My Name in Khan' 
  • Sudeep Chatterjee for cinematography in 'Guzaarish'
  • Dia Mirza performed a dance medley of hit numbers such as 'Pyar Do, Pyar Lo,' 'Parda Hai Parda,' and 'Aapka Kya Hoga.'

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नही चलेगी ये अन्नागिरी...


आज चर्चा के लिए तीन मुद्दे हैं जो मुझे बेहद परेशान कर रहे हैं। कल से यही सोच रहा हूं कि क्या करूं। अन्ना जी का मैं समर्थक हूं, मुझे ही नहीं देश के आम आदमी को उनके आंदोलन से बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं, लेकिन अब मुझे अन्ना को कटघरे में खड़ा करना पड़ रहा है। इस बारे में मैं कल ही लिखना चाहता था, लेकिन कल अन्ना और उनकी टीम को लेकर मैं बेहद गुस्से में था, लिहाजा मुझे लगा कि अभी मैं अपने लेख के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि मेरे लेख पर मेरे गुस्से का प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए मैं ये बात मन में दबाए रहा। लेकिन समय बीतने के साथ हालत ये हो गई कि हमें रात में डाक्टर के पास जाकर ब्लडप्रेशर चेक कराना पड़ा। मुझे जो अंदेशा था वही निकला। मेरा बीपी 105 और 180 था। चूंकि मैं अभी बीपी की दवा नहीं लेता हूं, लिहाजा काफी देर तक मैं बच्चों के साथ अपार्टमेंट के भीतर ही टहलता रहा। आज आराम है।  दूसरा मुद्दा उत्तर प्रदेश से जुड़ा है, जबकि तीसरी बात मुझे केंद्र सरकार की तेल नीति पर करनी है। आइये सबसे पहले बात अन्ना की कर लेते हैं।

नासमझ अन्ना
अब मुझे टीम अन्ना को नासमझ, अल्पज्ञानी, महत्वाकांक्षी कहने में जरा भी संकोच नहीं है, क्योंकि अन्ना जब जंतर मंतर पर आमरण अनशन कर रहे थे तो उन्हें आम जनता का भरपूर समर्थन मिला। इस दौरान कुछ राजनीतिक दलों के नेता भी उन्हें समर्थन देने के लिए जंतर मंतर पहुंचे, पर अन्ना समर्थकों ने नेताओं को खदेड़ दिया। मुझे लगता है कि ये इतनी बड़ी गल्ती थी कि अब अन्ना इस चूक की भरपाई आसानी से नहीं कर पाएंगे। अरे भाई भारत लोकतांत्रिक देश है, सबको पता है कि यहां कानून जंतर मंतर पर नहीं बनेगा, कानून बनेगा संसद में, और संसद में अगर कानून बनवाना है तो राजनीतिक दलों से नफरत नहीं दोस्ती करनी होगी। खैर कोई बात नहीं लेकिन अन्ना जी कल तक राजनीतिक दल अछूत थे तो अब राजनीतिक दलों के दरवाजे पर घुटने  टेकने क्यों पहुंच गए। अब आपको आडवाणी और ए वी वर्धन की याद आने की वजह क्या है। अब आप ऐसा क्यो सोच रहे हैं कि सभी दलों ने नेतृत्व से मुलाकात करें। आपको लगता है कि शरद पवार, करुणानिधि, मुलायम सिंह यादव, मायावती, लालू प्रसाद जैसे नेता जनलोकपाल बिल को समर्थन देंगे।
अन्ना जी आपके इस फैसले से आपकी किरकिरी हो रही है। जान लीजिए कि नेताओं से मिलने की जिसने भी सलाह दी है वो आपकी टोपी नेताओं के पैर में रखवाना चाहता है। उसकी नीयत में खोट है। देश का युवा आपको आज का गांधी मानता है, और गांधी दो कौडी के नेताओं के चौखट पर जाए, ये किसी को बर्दाश्त नहीं। अन्ना जी आप तो देश की जनता को मालिक और सियासी को नौकर बताते हैं, फिर ऐसा क्या हो गया कि मालिक को नौकर के दरवाजे पर मत्था टेकना पड़ रहा है, और नौकर दुत्कार रहा है। अरे आपकी टीम मूर्ख है क्या, जब आप सांसदों को जनलोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं तो सियासी दलों को कुत्ते ने काटा है कि वो आपका समर्थन करेंगे।
अन्ना जी लगता है कि कुछ गलतफहमी में आप और आपके सलाहकार भी हैं। उन्हें लग रहा है कि आपके अनशन से सरकार झुक गई और इसलिए आप से बातचीत को राजी हुई। अगर आप भी ऐसा समझते हैं तो मुंगेरीलाल के हसीन सपनों में खोए रहिए। लेकिन सच्चाई ये है कि आपके आंदोलन को मिल रहे अपार जनसमर्थन ने सरकार को झुकने पर मजबूर किया। अब आप जनसमर्थन को ठेंगा दिखा कर नेताओं के तलुवे चाटने उनके दरवाजे पर जा रहे हैं। आप समझते हैं कि जिन बेईमानों के खिलाफ आप झंडा उठाए हुए हैं, वो आपके साथ खड़े होंगे। किसी पार्टी के नेता ने आपकी बात मान ली तो वो अपनी पार्टी के सांसदों से पिटेगा। इसलिए अन्ना जी आपको सलाह है कि कहीं ऐसा ना हो कि आपको नेता भी दुत्कार दें और जनता भी। आप मौके की नजाकत को समझें, नेताओं से जो दूरी है, वो बनाए रखें। देश भर से जनसमर्थन जुटाएं, ऐसा माहौल बनाना होगा कि जो दल जनलोकपाल के खिलाफ बात करे, उसे देश की जनता दुत्कार दे। आप गांधी हैं, आप गांधी बने रहें। आप आशीर्वाद देने की भूमिका में रहें, लेने की कत्तई ना सोचें।

राजनीति के अयोग्य माया
चलिए आज आपको देश के एक हास्यास्पद कानून के बारे में बताता हूं। जिसके लिए निर्वाजन आयोग करोडों रुपये खर्च करता है। चुनावों में बेहिसाब खर्चों पर नियंत्रण के लिए निर्वाचन आयोग हर चुनाव क्षेत्र में पर्यवेक्षक भेजता है, जबकि पर्यवेक्षकों के आने जाने का कोई मतलब नहीं है, हर जगह उम्मीदवार मनमानी खर्च करते ही हैं। खास बात ये हैं कि चुनाव के बाद उम्मीदवार को चुनावी खर्च का पूरा व्यौरा निर्वाचन कार्यालय में जमा कराना पड़ता है। आपको पता है जो लोग चुनाव खर्चे को जमा नहीं कराते हैं, ऐसे लोगों को निर्वाचन आयोग चुनाव लड़ने के अयोग्य करार देता है और वो फिर चुनाव नहीं लड़ पाते।
लेकिन चुनाव जीतने के बाद आप कितने अपराध करें, आपको चुनाव के अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। अब यूपी की मुख्यमंत्री मायावती को ले लें। उत्तर प्रदेश में अब वो समय आ चुका है जब की सरकार को बर्खास्त कर राष्टपति शासन लगाया जाना चाहिए। मायावती पैसे की बर्बादी कर रही हैं। सरकारी पैसे से मूर्ति,पार्क पर उनका ध्यान ज्यादा है। एक खास बिल्डर ग्रुप को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों पर गोली चलाई जा रही है। उनके पार्टी के मंत्री - विधायक संगीन अपराधों में लिप्त हैं। प्रदेश की राजधानी में कानून का राज बिल्कुल नहीं रह गया है। लखनऊ जेल में डा.सचान की हत्या से साफ हो गया है कि सूबे की सरकार के कुछ बड़े लोगों की कारगुजारी खुल ना जाए, इसलिए ये हत्या कराई गई है।
लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने वालों पर लाठी चलाई जाती है, विरोधी दल के नेताओं के घरों को सरकार के विधायक अपने गनर के साथ जाकर फूंक देते हैं। ये तमाम ऐसे कारण मौजूद हैं कि सूबे की सरकार को ना सिर्फ बर्खास्त किया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा प्रावधान भी किया जाना चाहिए, मायावती जैसे लोगों को चुनाव के अयोग्य ठहराया जा सके, क्योंकि इनके नेतृत्व में गुंडे पल रहे हैं और उन्हें संरक्षण भी मिल रहा है।  

बेशर्म केंद्र सरकार
ये मेरे लिखने की शैली नहीं है, लेकिन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने मजबूर कर दिया कि उन्हें गाली की भाषा ही समझ में आती है। डीजल की कीमतों में तीन रुपये और रसोई गैस सिलेंडर में 50 रुपये की बढोत्तरी को इन दोनों नेताओं ने मामूली बढोत्तरी बताया है। इनसे ये कौन पूछे कि ये बढोत्तरी तुम्हारे लिए मामूली है, इन्हें तो रसोई गैस की कीमत क्या हो गई है, ये भी पता नहीं होगा। इस बढोत्तरी से ज्यादा इन नेताओं की गंदी टिप्पणी ने लोगों को आहत किया है। जनता को पांच जूते मारने के बाद कह रहे हैं कि अरे मेरी वजह से सिर्फ पांच ही पड़े वरना तो 25 पड़ने वाले थे।  

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शुक्रवार, 24 जून 2011

To LoVe 2015: UPA:: Unfortunate for Poor and Middle class in India



UPA again Prove their Failure among its  Poor Citizen

According to the latest report By PTI-New Delhi:  
  • Ggovernment hiking the prices of diesel, kerosene and LPG today
  • "The price of LPG  increased by Rs. 50"
  • The price of kerosene  increased by Rs. 2
  • Diesel prices will increase by Rs. 3 a litre .
Will Indian People tolerate  this ?


Really  in Indian Language "Hey Bhagwan(UPA Govt) Aab to Aaap he hai Sab kuch ...."




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गुरुवार, 23 जून 2011

धर्मनगरी का अधर्म...



जी हां आजकल देश भर में भ्रष्टाचार की बात जोर शोर से की जा रही है। आप सबको पता है कि समाज का कोई तबका ऐसा नहीं है, जिसके हाथ इस गोरखधंधे में ना सने हों। आप सब पहले से जानते हैं कि देश के ज्यादातर सियासी भ्रष्ट हैं, नौकरशाह भी ईमानदार नहीं रहे। यहां तक की सरकारी दफ्तरों के बाबू को भी घूस का खून लग चुका है। हमारी न्यायालयों में बहुत श्रद्धा थी, लेकिन जज के साथ बैठा उनका पेशकार जब उनके सामने ही पैसे थामता है, तो सिर शर्म से झुक जाता है। पेशकार को जब कटघरे में खडा किया जाता है तो वह साफ साफ बताता है कि इस पैसे में जज साहब की भी शाम की सब्जी शामिल है।
माफ कीजिएगा मैं भ्रष्टाचार की बातें कर रहा हूं, लेकिन मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, वजह आप कह सकते हैं कि मीडिया को ये बात कहने का अब कोई हक नहीं है, क्योंकि यहां भी चोर घुसपैठ कर चुके हैं। जी बिल्कुल...मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं। यहां भी चोरों ने पांव पसार लिए हैं। कारपोरेट दलाल नीरा राडिया का जो टेप सामने आया है, उसने मीडिया के ऐसे बड़े बडे़ चेहरों को दागदार किया है, जिससे हम सब को काफी उम्मीदें थीं। पंजाब के आईपीएस एसपीएस राठौर के खिलाफ छेडछाड़ का मामला दर्ज हुआ तो मीडिया ने इतना हो हल्ला मचाया कि उन्हे सर्विस के दौरान मिले सभी पदक सरकार ने वापस ले लिए, लेकिन मीडिया का दोहरा चरित्र तो  देखिए..जब बडे पत्रकारों की काली करतूतें सामने आ चुकी हैं, फिर भी कहीं से ये आवाज नहीं उठाई गई कि दागी पत्रकारों से पद्मश्री वापस लिया जाए।
 
आइये विषय पर आते हैं, जो मै कहना चाहता हूं। आज मैं बहुत ही जिम्मेदारी से ये बात कह रहा हूं कि देश के साधु संत भी अब ईमानदार नहीं रह गए। सिर्फ काली कमाई ही नहीं, जमीन कब्जाने, जमीन के लिए किसी भी हद तक जाने के साथ ही अब तो कई बाबाओं के चरित्र पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।  
फिलहाल छोटी सी बात पुत्तपार्थी की करते हैं। आप सब जानते हैं कि सत्य साईं बाबा का शुरू से ही विवादों से नाता रहा है। जीवन काल में उनके बारे में अनैतिक रिश्तों की बात सामने आई थी, और अब मौत के बाद अकूत संपत्ति की। हम विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए शोर कर रहे हैं, लेकिन देश में जमा कालेधन पर क्यों खामोश हैं। सत्य साईं आश्रम में चोरी से ले जाए जा रहे 35 लाख रुपये पकडे जाने के बाद ट्रस्टियों की भूमिका संदिग्ध हो गई है। अब तो यहां तक बताया जा रहा है कि आश्रम में कई तहखानों में अऱबो रुपये नकद और हीरा, सोना चांदी जमा है। हैरत है कि जब सत्य साईं के कमरे से धन बरामद हो रहा है, तो आप समझ सकते हैं कि जो संत लोगों को मोह माया से दूर रहने  का संदेश देते हैं, उनका असली चेहरा कितना भद्दा, गंदा और बदबूदार है।

ताजा मामला बाबा रामदेव का ही ले लें। वो कहते हैं कि मुझे दान मिलता है, जिससे 1100 करोड का ये विशाल एंपायर खड़ा है। बाबा जी अगर आपने सभी दान चेक से लिया है तब तो ठीक है, उसका हिसाब किताब आपके पास होगा ही, लेकिन अगर बड़ी मात्रा में आपने नगद चंदा लिया है, तो ये कैसे पता चलेगा कि आपकी सम्पत्ति में कालाधन नहीं है। बाबा जी पर जब भी सवाल दागे जाते हैं, तो वो ये नहीं कहते कि मेरे पास जो कुछ है सब नंबर एक में है। वो लचर कानून का सहारा लेते हैं, और कहते है कि जो कुछ भी उन्होंने किया है वो सब कानून के दायरे में रह कर किया है। वैसे तमाम ट्रस्ट और कंपनी बनाने से ही ये साफ है कि बाबा रामदेव भी दूध के धुले नहीं है। यही वजह कि अब खामोश हो गए हैं, उछल कूद और बोलती बंद है।
हो सकता है कि आप मेरी बात से सहमत ना हों, लेकिन मैं बहुत ही जिम्मेदारी के साथ ये बात कह रहा हूं कि नौकरशाहों ने संत समाज को भ्रष्ट बनाने में अहम रोल निभाया है। आप किसी भी बाबा, योगी, कथावाचक, या फिर संत को ले लें, उनके यहां कुछ नौकरशाह जरूर चिपके होगें। संत सरल होते हैं, इससे वो नौकरशाहों के कुचक्र में फंस जाते हैं। संत समाज में नौकरशाहों के बढते दखल से न्याय पालिका के भी कान खड़े हो गए, और जजों ने भी इन साधु संतो में घुसपैठ बना लिया। आज देश में ऐसा कोई साधु, संत, सन्यासी नहीं है, जिसके यहां कार्यरत नौकरशाह या फिर रिटायर नौकरशाह और जजों की फौज ना हो। इसमें दोनों का फायदा है। सत्य साईं के आश्रम पुत्तपार्थी में तो एक नौकरशाह पूरे साम्राज्य का मालिक बनने की फिराक में है। 
पिछले दिनों आईबीएन 7 चैनल के एक स्टिंग आपरेशन में कई बाबा पकड़े गए थे। वो लोगों के कालेधन को सफेद करते थे। कैमरे पर पकड़े गए बाबा  सौदेबाजी कर रहे थे, जिसमें वो बकायदा ब्लैकमनी को व्हाइट करने के लिए परसेंटेज की बात कर रहे हैं।  वैसे तो आप भी जानते हैं  कि जहां कहीं भी "साला " शब्द जुड़ जाता है, वहीं गड़बड़ी शुरू हो जाती है। जैसे धर्मशाला, पौशाला, गौशाला, पाठशाला आदि आदि। इन सबके नाम पर सरकारी छूट की लूट हो रही है। इसमें साधु संत सबसे आगे हैं। किसी भी साधु संत को देख लें, उनके पास करोडों की प्रापर्टी है। सबके धंधे चल रहे हैं। सबके साथ विवाद जुडा हुआ है। कम साधु संत ऐसे हैं जिनके खिलाफ कोई विवाद ना हो। जमीनों के विवाद जितने साधु संतो के साथ है, भूमाफियाओं के खिलाफ भी उतने मामले नहीं होंगे।
मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि साधु संतों के साम्राज्य पर सरकार कड़ी नजर रखे। चूंकि इन साधू संतों को इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स समेत अन्य सभी प्रकार के टैक्स से छूट दी गई है। छूट इसलिए कि ये समाज सेवा करते हैं। लेकिन अब कहां समाज सेवा रह गई। जब योग क्लास के लिए पंजीकरण शुल्क हजारों में हो, आर्ट आफ लीविंग के कोर्स की फीस ली जा रही हो, आगे बैठकर प्रवचन सुनने का अतिरिक्त शुक्ल देना मजबूरी हो, ऐसे में बाबाओं को छूट क्यों। क्यों नहीं बाबाओं को टैक्स के दायरे में लाना चाहिए। जब छूट का फायदा ये बाबा ले रहे हैं तो इन्हें सरकार के नियंत्रण में रहना चाहिए। सरकार को भी देखना चाहिए कि कैसे ये बाबा लोगों को चूना लगाकर रातोंरात अकूत संपत्ति जमा कर रहे हैं। मुझे लगता है कि इस मामले पर गंभीर बहस की जरूरत है और मैं जोर देकर ये कहना चाहता हूं कि बाबाओं के धार्मिक प्रतिष्ठानों, मंदिरों सभी जगह टैक्स का प्रावधान होना चाहिए।
और अब बात धर्मनगरी के अधर्म की। आप किसी भी धर्मनगरी मथुरा, हरिद्वार, श्रृषिकेश समेत और भी महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों पर चले जाएं। यहां आपको रहने के लिए एक से एक आलीशान धर्मशाला मिलेंगे। जिसमें सभी तरह की फाइव स्टार सुविधाएं मिलेंगी और आपसे हजारों रुपये किराया भी वसूला जाएगा। लेकिन जब आप यहां बिल मांगेगे तो वो किराए का बिल ना देकर  धर्मशाला के लिए सहयोग राशि यानि दान की रसीद थमा देगें। ये काम सबसे ज्यादा कृष्णनगरी मथुरा में है। खुलेआम लूट करते हैं धर्म के ठेकेदार, पर कोई बोलने वाला नहीं है।



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बुधवार, 22 जून 2011

हम भी चलें, तुम भी चलो.....Me, Anna Hazare & Life

लगभग चार महीने तक ब्लॉग से दूरी...कुछ अपने मन से भी दूरी...अंदर बिना बत्ती के ट्रैफिक जाम की तरह विचारों का झुंड भेड़चाल वाली हालात में...और हम तटस्थ....इस बीच काफी कुछ घट गया....न हम-हम रहे, न तुम-तुम रहे वाले अंदाज में...दुनिया कुछ इसी तरह है। ऐसा चलता भी है..और दुनिया के मेले कम नहीं होते..दुनिया का कारवां चलता रहता है..इसलिए कहते हैं कि चलते रहो....कुछ करते रहो....नदी की धारा की तरह। जैसे नदी की धारा रुकने के कुछ दिन बाद नया रास्ता बना लेती है...उसी तरह इंसान की ज़िदगी भी होती है। रुकती नहीं फिर से चलने लगती है...जहां नहीं चलती वहां भी ज़िंदगी को फिर चलाना पड़ता है...धकेलना पड़ता है...वैसे भी तो शांत रहना संभव नहीं....क्योंकि शांत दो ही लोग होते हैं...एक योगी, दूसरा जड़ इंसान...पर दोनों की शांति अलग-अलग होती है.....हमारे अंदर विचारों की उथल-पुथल से तटस्थ रहना ज्यादा दिनों तक नहीं हो पाता..असीम विचार मेरे जैसे महाआलसी को चलायमान कर ही देती है..कुछ उसी तरह जैसे देश के हालात संतों को शांती से बाहर आने को मजबूर कर देते हैं....109 साल पहले विदा हुए स्वामी विवेकानंद भी ताउम्र शांत नहीं रहे थे...आखिर क्षण तक सनातन धर्म और राष्ट्रधर्म को निभाते रहे...आखिर तक हमें निभाते रहना सिखाया था बिना नफ़रत के....पर क्या करें तब भी हम नहीं सुधरे थे...आज भी नहीं सुधरे हैं....

इन चार महीनों में बहुत कुछ हुआ....निजी जिंदगी में भी...देश में भी...निजी जि़दंगी में जहां कई रिश्तों ने जड़ता खत्म की....तो कई रिश्तों को मैंने जड़ से उखाड़ फेंका...वैसे है ये मस्त काम....हो भी क्यों न...आखिर उखाड़ना और बोना चलता रहता है जिंदगी में...ठीक इसी अंदाज में देश में मीडिया भी व्यस्त रहा...और देशवासी भी जड़ नहीं रहे..सभी चलायमान रहे, आंदोलित रहे....दिल से भी दिमाग से भी...

पहले 28 साल बाद विश्व कप जीता...मेरी उम्र के तमाम लोगों ने मास्टर ब्लास्टर के सपने में अपने सपने को जिया...काफी दिन बाद दिखा कि अभी भी हम राष्ट्र की खुशी में बिना भेदभाव के एकजुट रहते हैं...मिलकर कूदते हैं..नाचते हैं...फिर दो ही दिन बाद यही नजारा जंतर-मंतर पर दिखा अन्ना की सूरत में। अन्ना यानि बड़े भाई के सानिध्य में.....गांधीजी को हमने नहीं देखा....नई पीढ़ी में लोगो ने ठीक से नहीं जाना गांधी को...इस पीढ़ी ने सिर्फ सुना था वो भी अनेक टूकड़ों में, अनेक रंगों में..स्याह और सफेद रंग में...पर जंतर-मंतर पर इस पीढ़ी ने पहली बार जाना की सत्याग्रह की ताकत को..यानि गांधीगिरी का इक्सवीं सदी में भी वही रुप है जो बीसवीं सदी था.....मगर फिर साथ ही रामलीला मैदान में घमासान भी देखा... बिना तैयारी के मैदान में कूदने का मतलब बाबा रामदेव के रुप में देखा...साथ ही जाना की अंग्रेजों के जमाने में कैसा कहर बरपाया जाता था पुलिस द्वारा...

 अच्छा ये रहा कि किसी भी बहाने सही..जनता आंदोलित तो हो रही है...बच्चे सीख तो रहे हैं कि लोकतंत्र का मतलब सड़क पर उतरकर हिंसा मचाना नहीं होता...बल्कि सड़क से सरकार पर बिना हिंसा के भी दवाब बनाया जा सकता है...परिवक्व लोकतंत्र यही होता है। आज एक सच्चाई की ताकत अन्ना के आसरे नई पीढ़ी सीख रही है...पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को सिखा रही है। आखिर बाप, बाप होता है...क्यों ठीक कहा न?
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To LoVe 2015: Nokia N9 AND N8

Nokianew mobile: N9 phone 
  N9 curently  operating on Nokia's MeeGo platform.
Features
  • Soon ready with Windows Phone 7 operating system. 
  •  3G enabled
  • touch screen
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N8
Price in Indian Market:22,999 

  • Touch screen
  •  mem expam upto 16 GB
  • symbian 3 
  • Camera : 12Mega Pixal
  • 720 Video HD
  • able to play 3gp,mp4,flash video
  •  
     enjoy budy




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    मंगलवार, 21 जून 2011

    संकलन


    मित्रों,
    कई बार कुछ ऐसी रचनाएं नजर से गुजरती हैं, जिसे बार बार न सिर्फ दुहराने का मन होता है, बल्कि सोचे जागते आप उसी रचना में रमें रहते हैं। मैं यहां दो तीन रचनाएं आपके सामने रखता हूं, मुझे लगता है कि आप भी इसे पसंद करेंगे और मेरी तरह गुनगुनाते रहेंगे। चलिए बात वीर रस के जाने माने कवि डा. हरिओम पंवार से शुरू करता हूं।


    मैं भी गीत सुनाता हूँ, शबनम के अभिनन्दन के
    मैं भी ताज पहनता हूँ नंदन वन के चन्दन के ||

    लेकिन जब तक पगडण्डी से संसद तक कोलाहल है
    तब तक केवल गीत लिखूंगा जन गन मन के क्रंदन के ||
    जब पंछी के पंखो पर हो पहरे बम के गोली के,
    जब पिंजरे में कैद पड़े हो सुर कोयल की बोली के ||

    जब धरती के दामन पर हो दाग लहू की होली के,
    कोई कैसे गीत सुना दे बिंदिया कुमकुम रोली के ||

    मैं झोपड़ियों का चारण हूँ आंसू गाने आया हूँ
    घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

    अन्धकार में समां गए जो तूफानों के बीच जले,
    मंजिल उनको मिली कभी जो चार कदम भी नहीं चले||

    क्रांतिकथा में गौण पड़े है, गुमनामी की बाहों में,
    गुंडे तस्कर तने खड़े है राजमहल की राहों में ||
    यहाँ शहीदों की पावन गाथाओं को अपमान मिला,
    डाकू ने खादी पहनी तो संसद में सम्मान मिला ||

    राजनीति में लोह पुरुष जैसा सरदार नहीं मिलता,
    लाल बहादुर जी जैसा कोई किरदार नहीं मिलता ||
    ऐरे गेरे नत्थू खैरे तंत्री बन कर बैठे है,
    जिनको जेलों में होना था मंत्री बन कर बैठे है ||

    लोक तंत्र का मंदिर भी बाज़ार बना कर डाल दिया,
    कोई मछली बिकने का बाज़ार बना कर डाल दिया ||
    अब जनता को संसद भी प्रपंच दिखाई देती है,
    नौटंकी करने वालों का मंच दिखाई देती है ||

    पांचाली के चीर हरण पर जो चुप पाए जायेंगे
    ,इतिहासों के पन्नो में वे सब कायर कहलायेगे ||
    कहाँ बनेंगे मंदिर मस्जिद कहाँ बनेगी राजधानी,
    मंडल और कमंडल पी गए सबकी आँखों का पानी ||

    प्यार सिखाने वाले बस ये मजहब के स्कूल गए,
    इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गए ||
    कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल जले,
    सांझ चिरैया सूली टंग गयी पंछी गाना भूल गए ||

    आँख खुली तो पूरा भारत नाखूनों से त्रस्त मिला,
    जिसको जिम्मेदारी दी वो घर भरने में व्यस्त मिला ||

    क्या यही सपना देखा था भगत सिंह की फ़ासी ने,
    जागो राजघाट के गाँधी तुम्हे जगाने आया हूँ,
    घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||


    जो अच्छे सच्चे नेता है उन सबका अभिनन्दन है,
    उनको सौ सौ बार नमन है मन प्राणों से वंदन है ||
    जो सच्चे मन से भारत माँ की सेवा करते है,
    हम उनके कदमो में अपने प्राणों को धरते है ||

    लेकिन जो कुर्सी के भूखे दौलत के दीवाने है,
    सात समुंदर पार तिजोरी में जिनके तहखाने है ||
    जिनकी प्यास महासागर है भूख हिमालय पर्वत है,
    लालच पूरा नीलगगन है दो कौड़ी की इज्ज्ज़त है ||

    इनके कारण ही बनते है अपराधी भोले भाले,
    वीरप्पन पैदा करते है नेता और पुलिस वाले ||
    केवल सौ दिन को सिंघासन मेरे हाथों में दे दो,
    काला धन वापस न आये तो मुझको फ़ाँसी दे दो ||

    जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है,
    तो बगला भगतो की टोली हंसों को खा जाती है ||
    जब जब जयचंदो का अभिनन्दन होने लगता है,
    तब तब सापों के बंधन में चन्दन रोने लगता है ||

    जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है,
    तो माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है ||

    जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते है,
    तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते है ||
    सिंहो को म्याऊँ कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है,
    बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता दिल्ली में है ||

    कहते है की सच बोलो तो प्राण गवाने पड़ते है,
    मैं भी सच्चाई को गाकर शीश कटाने आया हूँ,
    घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

    कोई साधू संन्यासी पर तलवारे लटकाता है,
    काले धन की केवल चर्चा पर भी आँख चढ़ाता है ||
    कोई हिमालय ताजमहल का सौदा करने लगता है,
    कोई यमुना गंगा अपने घर में भरने लगता है ||
    कोई तिरंगे झंडे को फाड़े फूके आज़ादी है,
    कोई गाँधी को भी गाली देने का अपराधी है ||

    कोई चाकू घोप रहा है संविधान के सीने में,
    कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में ||
    कोई ढाँचे का गिरना UNO में ले जाता है,
    कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है ||

    कोई अपनी संस्कृति में आग लगाने लगता है,
    कोई बाबा रामदेव पर दाग लगाने लगता है ||
    सौ गाली पूरी होते ही शिशुपाल कट जाते है,
    तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ,
    घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ |

    -डॉ. हरिओम पंवार

    डा.हरिओम पंवार को पढने से ज्यादा उन्हें सुनना अच्छा लगता है। अक्सर कवि सम्मेलनों में उनकी बारी आने तक रात के डेढ दो बज चुके होते हैं, लेकिन जब डा. पवांर खडे होते है तो वो कवि सम्मेलन में मौजद लोगों में ऐसी जान फूंक देते हैं कि ऊंघ रहे लोग उठ बैठते हैं। अब हिन्दी के जाने माने कवि स्व. कैलाश गौतम की एक रचना। कैलाश जी की खास बात यह रहती है कि वो ऐसे विषय को लेते हैं जिससे आमतौर पर सभी का सामना होता है और गौतम जी अपने ही अंदाज में लोगों को संदेश देते नजर आते हैं।


    कभी मेरे बेटे कचहरी न जाना
    भले डांट घर में तू बीबी की खाना
    भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
    भले जा के जंगल में धूनी रमाना
    मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
    कचहरी न जाना- कचहरी न जाना.
    कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
    कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
    अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
    तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
    कचहरी की महिमा निराली है बेटे
    कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
    पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
    यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे
    कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
    यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
    खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
    सिपाही दरोगा चरण चुमतें है
    कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
    भला आदमी किस तरह से फंसा है
    यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
    यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
    कचहरी का मारा कचहरी में भागे
    कचहरी में सोये कचहरी में जागे है
    मर जी रहा है गवाही में ऐसे
    है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
    लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
    हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
    कचहरी तो बेवा का तन देखती है
    कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
    कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
    उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
    है बासी मुहं घर से बुलाती कचहरी
    बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
    मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
    हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
    कचहरी का पानी जहर से भरा है
    कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
    मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
    मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
    दलालों नें घेरा सुझाया -बुझाया
    वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया
    धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
    मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
    नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
    जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
    कचहरी का पानी कचहरी का दाना
    तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
    भले और कोई मुसीबत बुलाना
    कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
    कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
    न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
    जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
    वहीं कौरवों को सरग है कचहरी ||

    अवधी में हास्य व्यंग की बात हो और स्व. रफीक सादानी की चर्चा ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। सादानी साहब को जिसने एक बार भी सुना है, वो उनका कायल हो गया। उनकी रचना शैली का अलग अंदाज तो देखने को मिलता ही है, मै उनसे काफी संपर्क में रहा हूं, वो एक अच्छे इंशान भी थे। एक उनकी रचना भी..          


    कविता : कुपंथी औलाद
    औरन के कहे मा हम आयेन
    काया का अपने तरसायेन
    कालिज मा भेजि के भरि पायेन
          तू पढ़ै से अच्छा घरे रहौ,

          चाहे खटिया पै परे रहौ।
    हम सोचा रहा लिखि पढ़ि जइहौ
    आकास मा एक दिन चढ़ि जइहौ
    पुरखन से आगे बढ़ि जइहौ
          अब घर कै खेती चरे रहौ,
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
    जबसे तू इस्कूल गयौ
    तू फर्ज का अपने भूलि गयौ
    तुम क्वारै भैया झूलि गयौ
          भट्ठी मा हबिस के बरे रहौ,
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
    तुमसे अच्छा रघुआ हरजन
    डिगरी पाइस आधा दर्जन
    अस्पताल मा होइगा सर्जन
          तू ऊ ..............करे रहौ,
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
    हम सोचा रहा अफसर बनिहौ
    या देसभक्त लीडर बनिहौ
    का पता रहा लोफर बनिहौ
          अब जेब मा कट्टा धरे रहौ
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
    फैसन अस तुमपै छाइ गवा
    यक राही धोखा खाइ गवा
    हिजड़े का पसीना आइ गवा
          जीते जी भैया मरे रहौ,
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।

    हर बुरे काम पै अमल किहेउ
    कुछ पढ़ेउ न खाली नकल किहेउ
    बर्बाद भविस कै फसल किहेउ
          अब बाप कै सब सुख हरे रहौ,
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
    हम पुन्न किहा तू पाप किहेउ
    हम भजन तू फिल्मी जाप किहेउ
    गुंडई मा कालिज टाप किहेउ
          जो मन मा आवै करे रहौ,
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
    अइसन जौ बिगाड़े ढंग रहिहौ
    बेहूदन के जौ संग रहिहौ
    जेस रफीक हैं वैसन तंग रहिहौ
          पूलिस के नजर से टरे रहौ,
          ... चाहे खटिया पै परे रहौ।”

       [ अवधी कवि रफीक सादानी ]

    चलिए कुछ पंक्तियां राहत भाई इंदौरी की भी हो जाए, जो मुझे बेहद पसंद है। राहत भाई देश के उन चुनिंदा शायरों में हैं जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है। जब सरकारें पटरी से उतरने लगती हैं तो राहत भाई उसे अपने शेर के जरिए संभालने की कोशिश करते हैं। दुनिया में अमन का पैगाम देना हो तो राहत भाई के शेर इस काम को भी बेहतर अंजाम देते हैं। बात प्यार मोहब्बत की हो तो भी राहत भाई का क्या कहना... आइये उनकी एक रचना की दो चार लाइनें जो मुझे याद हैं।


    उसकी कत्थई आंखों में है, जंतर मंतर सब,
    चाकू, वाकू, छुरियां, वुरियां, खंजर,वंजर सब।

    जब से रूठी वो मुझसे, सब रुठे रुठे हैं,
    चादर, वादर, तकिया, वकिया, बिस्तर विस्तर सब।

    हम से बिछुड़ कर वो भी कहां अब पहले जैसी है,
    फीके पड़ गए कपड़े, वपड़े, गहने, वहने सब।

    इसमें कुछ और भी अच्छी लाइनें है, पर मुझे इस वक्त याद नहीं आ रही है। कोशिश करुंगा कि बाद में उसी भी शामिल किया जाए। मित्रों मैं चाहता हू कि अगर आपको ये संकलन अच्छा लगे तो इसे लोगों तक पहुंचाने के लिए आप अपने ब्लाग पर भी इसे जगह दे सकते हैं।







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    सोमवार, 20 जून 2011

    To LoVe 2015: Free contraceptives, condoms: by Indian Govt.

    PTI:

    The government shortly launch a scheme for male and female as they got contraceptives available at their doorsteps.

    Ghulam Nabi Azad said on June 2011:--

       It is a major boost in population control efforts, Health and Family Welfare Minister.…

     

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    To LoVe 2015: Maya Raj the Gunda Raj:6 Rapes in 10 days

    This is same full  to say that the UP the state of India and the women lived in this state are totally insecure as they daily Raped by Either The POLICE or Ganges Rape or may be the People on higher Post like MLA, SSP etc really harassing but true....

    Hope we Indian or UP people soon get resolve  such kind of problems, But the Current Govt. in UP failed to prove its Power as well as Ownership..
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    रविवार, 19 जून 2011

    To LoVe 2015: BCCI Deny to Lanka Premier League T20



    The BCCI  an acronym for [ The Board of Control for Cricket in India ] did not  allowed the Indian players' participation in the Sri Lanka Premier League(SLPL T20 League),

    • The island Nation's Cricket Board on Sunday rejected its Indian counterpart's claim that the event is being organized by a private party.
    • According to BCCI the Private party based in Singapore instead of the island nation's Cricket Board.
    • BCCI president Shashank Manohar told PTI from Nagpur.
    • Manohar said unless the Board gives them a No Objection Certificate, Indian players cannot participate in the Lankan Twenty20 league.
    • PTI -- It is the Press Trust Of INDIA (that share the national as well as International news broadly) 
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    गुरुवार, 16 जून 2011

    To LoVe 2015: Bhindi Bazaar Sizeler Movie Now Hit the Indian Theater



    Producer-director of Movie Bhindi Bazaar named as Karan Arora accompanied by Caterina Lopez the main lead role of Super Duper Exposed Video Song as well as Previous two weeks ago their video leaked ..all this leads to the market blunder.. and may be an action to promote movie...


    well whatsoever movie cast is good and hope Young People Like the Way movie present











    here is the Leaked video:





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    गांव गया था,गांव से भागा..


    मित्रों एक ऐसे आदमी को लेकर 20 दिन से हम सभी उलझे हुए थे, जो बात ईमानदारी की कर रहा था, लेकिन खुद इससे काफी दूर था। अब पिछले 20 दिन को देखता हूं तो लगता है कि बेवजह समय बर्बाद कर रहा था। खैर आप लोग भी ऊब गए होंगे। आइये आज आपको इलाहाबाद के जाने माने की कवि स्व. कैलाश गौतम की एक रचना से रुबरू कराता हूं। मुझे उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी।

    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
     रामराज का हाल देखकर
     पंचायत की चाल देखकर
     आँगन में दीवाल देखकर
     सिर पर आती डाल देखकर
     नदी का पानी लाल देखकर
     और आँख में बाल देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।

    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
     सरकारी स्कीम देखकर
     बालू में से क्रीम देखकर
     देह बनाती टीम देखकर
     हवा में उड़ता भीम देखकर
     सौ-सौ नीम हक़ीम देखकर
     गिरवी राम-रहीम देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।

    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
     जला हुआ खलिहान देखकर
     नेता का दालान देखकर
     मुस्काता शैतान देखकर
     घिघियाता इंसान देखकर
     कहीं नहीं ईमान देखकर
     बोझ हुआ मेहमान देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।

    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
     नए धनी का रंग देखकर
     रंग हुआ बदरंग देखकर
     बातचीत का ढंग देखकर
     कुएँ-कुएँ में भंग देखकर
     झूठी शान उमंग देखकर
     पुलिस चोर के संग देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।

    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
     बिना टिकट बारात देखकर
     टाट देखकर भात देखकर
     वही ढाक के पात देखकर
     पोखर में नवजात देखकर
     पड़ी पेट पर लात देखकर
     मैं अपनी औकात देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।

    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
     नए नए हथियार देखकर
     लहू-लहू त्योहार देखकर
     झूठ की जै-जैकार देखकर
     सच पर पड़ती मार देखकर
     भगतिन का शृंगार देखकर
     गिरी व्यास की लार देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।

    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
     मुठ्ठी में कानून देखकर
     किचकिच दोनों जून देखकर
     सिर पर चढ़ा ज़ुनून देखकर
     गंजे को नाख़ून देखकर
     उज़बक अफ़लातून देखकर
     पंडित का सैलून देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।

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