सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: मनोरंजन का दादा!!

पिछले लेख में हम बात कर रहे थे कि किस प्रकार कुछ टीमों के खिलाङी धैर्यपूर्ण पारियाँ खेलकर भी उतनी ही मज़बूत स्थिती में आ रहे हैं जितनी कि शायद ताबङतोङ,धमाकेदार और विस्फोटक जैसे शब्दों से परिभाषित और कादाचित अतिशयोक्ति से अभिमानित भारतीय टीम कर सकती हो,चर्चा में कुछ नाम भी आए जैसे पाकिस्तान के मिसबाह और यूनुस ख़ान और इंग्लैंड के ट्रॉट और स्ट्रॉस,तीन ही दिन में यह सिद्धांत भलीभाँति प्रतिपादित हो गया कि खेल आकर्षक न होकर भी कितना रोमांच पैदा कर सकता है,पहले पाकिस्तान ने श्रीलंका को हराकर उलटफेर किया और फिर इंग्लैंड ने 28 फरवरी को चेन्नास्वामी में वह खेल खेला जो क्रिकेट की किताब के श्रेष्ठतम मुका़बलों मे दर्ज हो गया,खेल के विवरण पर तो हज़ारों पृष्ठ आने वाले समय में लिखे जाते रहेंगे,सहसा स्मरण हो आया प्रथम I.P.L. के दौरान दिखाया जाने वाला वह प्रचार जिसमें I.P.L. को "मनोरंजन का बाप" कहा गया था,किंतु यह मुकाबला तो I.P.L. का भी बाप निकला,यानि के "मनोरंजन का दादा"।
 यह टक्कर चक्षु खोलने वाली थी,निश्चित रुप से भारत पिछले कुछ वर्षों में एक मज़बूत टीम के रुप मे उभरा है और इसलिए इस बार लोगों की उम्मीद बेमानी नहीं है,कई ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो क्रिकेट के प्रति उदासीन हो चुके हैं क्योंकि बङी उम्मीदें बार-बार टूटी भी हैं,किंतु जो क्रिकेट के अंधबक्त हैं वो तो हर बार छले जाने पर भी आशावादी बने ही रहते हैं,कई वर्ग और कई विचार हैं,क्रिकेट अपनी चमक खो रहा था,किंतु ये फीकापन सूरज को ढँकने वाले बादलों वाला निकला,जब रविवार की दोपहर क्रिकेट का रवि अपने प्रचण्ड तेज के साथ चमका तो भक्तो ने अपने भगवान का 98वाँ शतकावतार देख लिया,आत्मा तृप्त हो गयी,आशंका जाती रहीं,क्रिकेट से विमुख हो चुके लोगों में भी नयी ऊर्जा का संचार हो गया,सबने विशाल विजय का स्वप्न देख लिया,किंतु कौन जानता था कि अतिशयोक्ति से अभिमानित,धरातल से दो इंच ऊपर सीना फुलाए घूमती,जनमानस के शोर में अतिविश्वास से भरी टीम के लिए ये स्वप्न स्वप्नदोष बन जाएगा। सब एक दुस्वपन की तरह होता गया,फासला कम होता रहा और गयारह खिलाङी जैसे मैदान में किसी खूँटे से बँधे गेंद को देखते छटपटाते रह गये,जब तक नींद खुली देर हो गयी थी किंतु कदाचित उन करोङों प्रर्थनाओं का चमत्कार था कि सहसा बेजान टीम में जान आ गयी ,ज़हीर ने भारत को मैच मे वापस ला दिया,कई दर्शकों ने घर में ४ फीट ऊँची छलाँग लगा दी और कईयों ने *** वाले विशेषणों की बौछार कर दी,किंतु त्रुटियाँ दोनों टीमों से हुईं थीं और इस खेल को जीतने की दावेदारी कम और न जीतने के कारण अधिक थे,दोनों ही जीत की हक़दार नहीं थीं और हार की भी नहीं, अंततः साँस रोक देने वाले मुका़बले का अंत रोमांच के चरम से हुआ एकदिवसीय क्रिकेट जीता और साबित हुआ कि मनोरंजन के बाप का बाप कौन!!!
Courtesy:castrolcricket.com
 
C.R.I.C.K.E.T. का कर्मवीरः टाईटल मुझे भी कुछ जमा नहीं,थोङा आज-तक टाईप हो गया किंतु आज से अपना IP :-)
क्या कमाल की पारी खेली इस कर्मवीर ने,भगवान की तारीफ़ तो जितनी की जाए कम है किंतु ऐसा प्रत्युत्तर कि सबको निरुत्तर कर दिया,वाह भाई स्ट्रॉस!!सिद्ध कर दिया कि किस प्रकार तकनीक पर अडिग रहकर और धैर्य से बँधे रहकर भी वही काम किया जा सकता है जो सहवाग उबलते और बिलबिलाते हुए करते हैं ( यहाँ सहवाग पर कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं है वरन स्ट्रॉस की प्रशंसा है) क्रिकेट को मुगदर भाँजने वाला बेसबॉल बना देने वाले भी समझ गये होंगे कि क्रिकेट का मतलब मात्र युसुफ पठान और kkkkkkkiran पोलार्ड ही नहीं है.सिद्ध कर दिया कि स्ट्रॉस ऐसे ही Castrol Cricket Index के टॉप टेन खिलाङियों में नहीं हैं, 

Courage:कमाल का शौर्य एक योजना जिस पर अंत तक यह लङाका डटा रहा और विशाल लक्ष्य को भी बौना सिद्ध कर दिया।
Rigidity:कई ऐसे अवसर आये जब कोई और खिलाङी होता तो अपना धैर्य खो देता स्ट्रॉस लङता रहा,खचाखच भरे स्टडियम में जहाँ हर नज़र सिर्फ उसे आऊट होते देखना चाहती थी वो डटा रहा।
Intelligence:एक निश्चित योजना और उस पर अमल करने की प्रतिबद्धता शातिर दिमाग का ही काम था
Class:ऐसी शानदार पारी और दर्शनीय शॉट जैसे अभी क्रिकेट के स्कूल से निकला मेधावी हो।
Knowledge:जानकारी पिच की,भारत की कमज़ोरी की,और फील्ड की जमावट की।
Energy:इतनी लंबी पारी और चेहरे पर शिकन तक नही.
Talent:सारी बातों का सार प्रतिभा,अनूठी प्रतिभा,हतप्रभ कर देने वाली प्रतिभा,वाह स्ट्रॉस वाह कमाल कर दिया।
चतुर की च-टाईः आज चतुर चटाई मे टाई की बात बताने वाला है,विश्व कप के वो चार मैच जो टाई हुए हैं:
ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका (1999):इस अविस्मरणीय मैच की चर्चा पहले आलेख में भी हुई थी, ऑस्ट्रेलिया ने 213 रन बनाये और दक्षिण अफ्रीका भी इसी स्कोर तक पहुँच गया किंतु यह सेमीफाईनल था और पुराने मैचों के अंक के आधार पर ऑस्ट्रेलिया की किस्मत साथ दे गई और वो फाईनल में पहुँच गया।
दक्षिण अफ्रीका बनाम श्रीलंकाः(2003): एक बार फिर बदकिस्मती का ठीकरा दक्षिण अफ्रीका  के सर फूटा श्रीलंका के 268 रनों के जवाब में दक्षिण अफ्रीका ने 218 बना लिये थे और 30 गेंद में 40 रन ही चाहिये थे किंतु बारिश हो गयी और मैच बराबरी पर छूटा दोनों टीम को 1-1 अंक मिल गया।
आयरलैंड बनाम ज़िम्बाब्वेः(2007) दो कमज़ोर टीमों में एक रोमांचकारी मुकाबला हुआ और दोनों ने 221 रन बनाकर अंक बाँट लिये।

 
रोमांचक क्षणः स्ट्रॉस की यह पारी आने वाले कई वर्षों तक याद रखी जायेगी बशर्ते इसी विश्वकप में और बङे चमत्कार न हो जाएं।

रुपक
(Disclaimer: Castrol Cricket Index खिलाङियों के प्रदर्शन को मापने का कारगर तरीका है और इसके पहले उपयोग किये जाने वाले कई विश्लेषणों से इस मायने में पृथक है कि इसमें हर खिलाङी का प्रदर्शन खेल के तीनों पैमानों बल्लेबाज़ी,गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण में परखा जाता है किंतु खिलाङी की मूल प्रतिभा(core competence) को ध्यान में रखते हुए,गहन अध्ययन के बाद तैयार की गई यह रैंकिग प्रणाली ICC रैंकिग से भी ज़्यादा कारगर सिद्ध हुई है और क्रिकेट प्रेमी अब भावनाओं और उत्साह के साथ अब विश्वसनीय आँकङों की सहायता से भी अपने वाद-विवाद को मज़ेदार बना सकते हैं,ब्लॉगर Castrol Cricket Index का अनुयायी है और अपने आलेखों में Castrol Cricket Index की सहायता से रोचक तथ्य प्रस्तुत करता है,Castrol Cricket Index द्वारा ब्लॉगर को संपर्क किया गया और अध्ययन के बाद ब्लॉगर को Index विश्वसनीय लगा,किंतु आलेख किसी भी प्रकार से कंपनी का प्रचार नहीं करते और Blogger की राय किसी भी उत्पाद से सर्वथा विलग और निष्पक्ष है)
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शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

पतझड़ सावन बसंत बहार एक बरस के मोसम चार ,पांचवा मोसम प्यार का,

पतझड़ सावन बसंत बहार एक बरस के मोसम चार ,पांचवा मोसम प्यार का, बसंतोत्सव/ मदनोत्सव की हार्दिक बधाइयाँ





आहा.... जेसे प्रतीत हो रहा है मदनोत्सव का ओपचारिक रूप से श्री गणेश हो चुका है ,,

इस गीत के मुखड़े ने जेसे प्रक्रति के सुन्दर अप्रितम नेसर्गिक सोंदर्य का बखान किया हो ... जो आजकल सुन्दर पोस्टरों में दिखाई देती है ,,असली का तो मानव ने बैंड बजा दिया ..सब पेड़ काट डाले और नदिया गन्दी कर दी और सुखा दी ..

आहा ..

सुविधाभोगी मनुष्य जिसे वातानुकूलित वातावरण में निवास करना पसंद है के लिए इस गीत के लेखक ने चारों ऋतुओं को प्यार के लायक नहीं समझा और अपनी तरफ से पांचवे मोसम का सृजन किया जो प्यार करने के लिए पूर्ण वातानुकूलित है ...जबकि ये ही चारों ऋतुये इस रूमानी ख्याल को मन में लाने की जिम्मेदार है ..

असली ऋतुएँ मानव के लालच मी भेंट चढ़ चुकी है ...आहा इसी कारण गीतकार ने पांचवी ऋतू का सर्जन किया है...

आहा ..... मन मयूर नाच उठा है ....

बसंत बहार सोसायटी की सभी सखियों के हर्दय मन ने मदनोस्तव को मनाने का निर्णय लिया ..

ये विचार आने के बाद सभी सखियों ने पीत वस्त्र धारण किये ..

वातानुकूलित फ्लेटों का तापक्रम एसी चलवा कर अनुकूल किया .. तदनुसार ..

एक सखी दूसरी सखी से बोली ,,है सखी इस ऋतू का यही तो आनंद है की न तो इसमें सर्दी लगती है और न ही गर्मी ..इसी कारण इसे महसूस करने के लिए एसी चलवाया है ..

(हकीकत में तो आजकल बसंत ऋतू में ही गर्मी के मारे पसीने छुट जाते है)

आहा ..पीत वस्त्र धारण कर सभी सखिया शोपिंग माल में भ्रमण कर रही है ताकि मदनोत्सव के इस रूमानी क्षण में अपने मनमीत को कोई उपहार देकर इसे अविस्मरनीय बनाया जा सके ..

आहा .. सभी ने इस समय की प्रासंगिकता को देखते हुए प्लास्टिक के पीले फूल वाले गुलदस्ते ख़रीदे ..जिनमे खुशबु का सर्वथा अभाव है पर उसके पीछे भावनाओं की खुशबु का समंदर ठाठे मार रहा है ..

उनके पति भी इस अवसर पर पीछे नहीं हैं उन्होंने इस समय को यादगार बनाने के लिए ..अपनी जीवन संगिनियों के लिए उपहार ख़रीदे हैं ..

अधिकांश सखियों ने सरसों के खेत वाले पोस्टर खरीदे हैं ताकि कमरे में लगा कर उत्सव को सजीव किया जा सके ..

असली सरसों के खेत में तो कुछ सखियों के पति जो प्रोपर्टी डीलर हैं उन्होंने प्लाट काट दिए इस कारण अब सरसों के खेत बड़ी बड़ी मल्टी स्टोरी बिल्डिंगों में बदल गए हैं ..

आहा ... जब असली सरसों के खेत थे तब भी इतना आनंद नहीं आता था ..क्योंकि कर्ज़ में डूबे किसानो को बसंत बहार काटने को दोड़ती थी .. पर जब से उन्होंने अपनी जमीन बेचीं और तब से वे भी इस उत्सव को जोरशोर से मना रहें हैं .. आहा सभी किसानों ने अपनी गायें भेंसे बेच दी है और देश की मुख्य धारा में आ गए हैं ...आहा और वे भी मुख्य धारा में हैं इसे साबित करने के लिए सभी ने अब पामेरियन कुत्ते खरीद लिए है ..

आहा .... कितना आनन्द आ रहा है इन कुत्तों के साथ प्रातकाल में भ्रमण करना ...आहा ..

कुछ किसानों ने इंटीरिअर डेकोरेसन की दुकाने खोल दी और वे नकली फूल बेच रहें हैं और असली फूलों से ज्यादा लाभ कमा रहें हैं ..

आहा ...मेरा मन मयूर भी इस उत्सव के प्रति आसक्त हो रहा है ..में भी अपनी जमीन किसी दलाल को बेच कर इस उत्सव में शामिल हो जाऊं ..

आहा ...भले ही खेत असली नहीं हो सरसों के फूल असली नहीं हो ....

आहा ..पर नोट असली है जिसके कारण बिना सरसों के खेत के ही इस मदनोत्सव का आनंद प्रतीत हो रहा है .. आहा कितना आसान है दलाली करना और कितना मुश्किल है खेती करना ..

आहा ...पांचवा मोसम प्यार का इंतज़ार का .. किसी दलाली का ..

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है देवियों और सज्जनों ...गरीबी कायम रहे ..तभी पुण्य का प्रताप रहेगा

है देवियों और सज्जनों ....

शास्त्रों में वर्णित है की ...

विद्यादान महादान ...अर्थात ..समाज में ...मूर्खों का कायम रहना आवशयक है ताकि इस पुण्य का लाभ अर्जित किया जा सके .

वस्त्रदान महादान ,,,.अर्थात ..समाज में नंगों और फकीरों का कायम रहना आवशयक है ताकि इस पुण्य का लाभ अर्जित किया जा सके .

अन्नदान महादान ,,,.अर्थात ..समाज में भूखों का कायम रहना आवशयक है ताकि इस पुण्य का लाभ अर्जित किया जा सके .

अर्थात ...

गरीबी विद्यमान रहेगी तभी पुण्य का प्रताप रहेगा .. ये चिंता की बात नहीं है ये पुण्य करने का सुअवसर है ..

गरीबी कायम रहे ..

ये हमारे देश की कंगाली ,तंगहाली और गरीबी का ही प्रताप है जिसके कारण सरकार कई प्रकार की योजनाये चला रही है ताकि चपरासी की जेब, बाबु की टेबल की दराज, अफसर की तिजोरी और नेता का लोकर और स्विस बैंक भर सके ..

हमारे ये सभी जनसेवक गरीबों की सेवा करने के लिए रात-दिन प्रयत्नशील हैं ,,इनके अनुपम प्रयासों के कारण ही गरीबी बनी हुई है और इन्हें दरिद्र नारायण की सेवा करने का सुअवसर मिला हुआ है ..

में कभी कभी चिंतित हो उठता हूँ की कभी गरीब नहीं रहे तो इस पुण्य का लाभ केसे अर्जित करेंगे .?

मुझे चिंतित देख हमारे माननीय ने कहा चिंता की बात नहीं हमने इस प्रकार की व्यवस्था कर रखी है गरीबी कभी दूर नहीं होगी.... और जब तक चाँद और सूरज हैं इस पुण्य का लाभ हमें मिलता रहेगा और हमारा इस लोक के साथ साथ परलोक भी सुधरता रहेगा ..

दरिद्र नारायण हमारे देश में बहुताय में पाया जाने वाला जंतु है ,,इस प्रजाति के जंतु अन्य देशों में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में नहीं पाए जाते हैं... इसी कारण इसके दर्शन लाभ लेने के लिए विदेशी जातरू भी हमारे देश में समय समय पर आते रहते हैं .. इनकी इतनी भारी संख्या होने का मुख्य कारण यहाँ की इनके कायम रहने वाली अनुकूल आर्थिक और सामाजिक परिस्थतियाँ हैं जो अन्य देशों में पाई नहीं जाती ... इस प्रकार ये जंतु इस विशाल अभ्यारण्य में निडर हो कर विचरण करते हैं ....

विदेशी जातरू भी पुण्य कमाने के लिए दरिद्र नारायण की दान पेटी में चढावा चढाते हैं ....इन दान पेटियों के तालों की चाबियाँ सरकारी पंडो के जिम्मे रहती है

जिस प्रकार भगवान के मंदिर का चढावा खाने से सभी पण्डे गोलमटोल और फुल कर कुप्पे बने रहते हैं और उनके मुखमंडल पर सदेव प्रसन्नता और संतोष के भाव रहते हैं ठीक उसी भांति दरिद्र नारायण का चढावा खाने से यही भाव सरकारी पंडो के मुखमंडल पर रहते हैं ..

हमारे देश के दरिद्र नारायण की ये विशेषता है की वो संकट में भी हँसता रहता है और गरीब होने का दोष सरकार को नहीं देता, वो किस्मत को देता है जो की उसकी फूटी हुई है और जब कभी वो सरकार को उसकी फूटी किस्मत दिखाता है, सरकार उसको रिपेयर करने के असफल प्रयास करती रहती है .. और वो इन असफल प्रयत्नों से ही अभिभूत रहता है की सरकार उनका विकास कर रही है ..

मेने इस बार 26 जनवरी यानि गणतंत्र दिवस पर बच्चों में बांटी जाने वाली मिठाई के टोकरे में हलवाई की दुकान पर ही सरकारी पण्डे को मुहँ मारते देखा तब मेरा विश्वास और भी पक्का हो गया की गरीबी कायम रहेगी ताकि सतत रूप से पुण्य अर्जित किया जा सके क्योंकि पुण्य कमाने के आशार्थी सरकारी पण्डे छोटे से छोटा अवसर भी नहीं चुक रहे हैं ..

क्या आप नहीं कमाना चाहेंगे पुण्य के प्रताप का लाभ उठाना ..
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कुत्ता विहीन क़स्बा




हमारे कसबे की नगरपालिका ने निर्णय लिया है की पुरे कसबे को जल्दी ही कुत्ता विहीन कर देगी. यानि अब कुछ समय बाद पुरे कस्बे के सभी कुत्ते गधे के सींग की भांति कस्बे से गायब हो जायेंगे .. उक्त कुत्ता पकड़ो अभियान पशुपालन विभाग की सहायता से चलाया जाएगा.जो पकडे गए सभी नर कुत्तों की नसबंदी करके जंगल में छोड़ देंगे..

उक्त निर्णय कहने को तो कस्बे में कुत्तों की दादागिरी और मनमानी के चलते गणमान्य नागरिकों के बार बार नगरपलिका को आग्रह करने के बाद लिया गया.

इस बारे में इन गणमान्यों का कहना है की इन कुत्तों ने पुरे कस्बे का वातावरण बिगाड़ रखा है कई राहगीरों को काट खाया है. पर मुझे हमारे माननीय महोदय जी के एक मुहँ लगे चमचे ने कान में बताया की माननीय के एक रिश्तेदार को इनके घर आते समय रात को एक कुत्ते ने काट खाया, इसलिए माननीय जी ने कुत्तों का इस कस्बे से नामोनिशान मिटा देने की कसम खाई है..

में समझ गया की रात को देर से माननीय जी का रिश्तेदार इनके घर आया होगा तो गली के कुत्तों ने उसको काला चोर समझ के काट खाया होगा..

खेर कारण जो भी हो पर इस निर्णय से मुझे बड़ी चिंता हुई की कुता विहीन कस्बा तो बड़ा ही अजीब हो जाएगा...

सबसे पहला संकट तो मेरे सामने ही खड़ा हो जाएगा ...में प्रय्तेक मंगलवार हनुमान जी का व्रत रखता हूँ. व्रत खोलने के बाद में कुत्ते को रोटी डालता हूँ ऐसा करने के लिए पंडित ने मुझे ताकीद किया है..मेरे मुहल्ले की कई धार्मिक प्रवर्ती की महिलाएं विभिन्न वर त्योहारों पर व्रत रखती है और कुत्तों को रोटी खिलाती है...

कुत्ते भी ज्योंही व्रत खोलने का समय होता है और वे अपने तयशुदा घरों के सामने जाकर दूम हिलाने लग जाते हैं. महिलाएं भी पुण्य का लाभ अर्जित करने के लिए कुत्तों को बड़े ही प्रेम से रोटी खिलाती है ,,

कहते हैं इन्सान का सबसे अच्छा और वफादार मित्र कुत्ता ही होता है..और कुत्ते भी इसे समय समय पर रात को किसी आशंका या चोरों के आने पर जोर जोर से भोंक कर अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं..

मेने माननीय जी के चमचे से पूछा भाई ये तो बताओ केवल सर्वहारा कुत्तों (परम आदरणीय हरिशंकर जी परसाई ने अपने प्रसिद्ध व्यंग एक मध्यवर्गीय कुत्ते में इसका उल्लेख किया था) यानि सडकिया कुत्तों को ही पकड़ा जाएगा या घरों में निवास करने वाले सुविधासंपन्न कुत्तों को भी पकड़ा जायेगा.

उन्होंने उत्तर दिया..महाशय आप भी कमाल की बात करते हैं, अरे भई..जो पालतू कुत्ते हैं उनको थोड़े ही पकड़ेंगे.. मेने सोचा आजकल किसी का भी पालतू बन जाओ तो कोई नहीं पकड़ेगा ..मुझे अच्छी तरह याद है माननीय जी के एक परम पिट्ठू पालतू चमचे के मंजले छोकरे को कालेज जाती छोकरी को छेड़ने के आरोप में पुलिस ने धर लिया तो उनके एक फोन पर छोड़ दिया और उलटे उस लड़की को लताड़ पिलाई की इतने बदन दिखाऊ वस्त्र धारण कर सडक पर निकलोगी तो कोई छेड़ेगा नहीं तो क्या करेगा ,,,लड़की बेचारी रुआंसी हो गई और उसके बाप ने भी इज्जत बचाने के चक्कर में बात आगे नहीं बढाई..

में कुत्ता विहीन कस्बे के भविष्य के बारे में गंभीर हो कर सोचने लगा की अब तक तो जब कभी रात को चोर आते हैं तो पहले सडक के कुत्ते भोंकते हैं और इनकी आवाज़ में फिर ये घरों में रहने वाले सुविधा सम्पन्न कुत्ते भी सुर मिलाते हैं ..असल में अगर सडक के कुत्ते नहीं भोंके तो ये तो अपने बिस्तेर में ही पड़े रहे और आये दिन घरों में चोरियां होती रहे.. अब ना जाने क्या होगा ..? हमे सडक के कुत्तों का शुक्रिया अदा करना चहिए की उनके कारण अभी तक कई घर चोरों से बचे रहें हैं..

कुत्ता विहीन कस्बा कितना अजीब लगेगा ..

में आये दिन देखता हूँ की कभी हमारे बाजू वाले मुहल्ले का कोई कुत्ता हमारे मुहल्ले में आ जाता है तो सभी कुत्ते संगठित होकर उसपर हमला कर देते हैं और उसे सीमापार खदेड़ कर ही दम लेते हैं ..उनके इस कार्य को देख कर मेने कई बार सोचा की ये जितने अपने मुहल्ले की सीमाओं की रखवाली अपना परम कर्तव्य समझ के करते हैं उसकी आधी भी अगर हमारे देश की सीमा पर तेनात सिपाही करे तो देश में आतंकवादी नहीं घुस पायेंगे..

मुहल्ले के सभी कुत्ते मुहल्ले की सीमाओं की रक्षा रात और दिन चाक चौबंद हो कर ड्यूटी बदल -बदल कर करते हैं ..गोया ये की दुश्मन किसी भी सूरत में अंदर ना आने पायें ..ये अपने मुहल्ले की संप्रभुता को अक्षुण बनाये के लिए सदेव तत्पर रहते हैं ..

सुबह सुबह सभी कुत्ते कुश्ती लड़ते हैं, दौड़ लगते हैं ,,व्यायाम करते हैं और हमे हमारे स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने का सन्देश देते हैं ..

आत्मरक्षा करने के नायब तरीके कोई इनसे सीखे ..में सर्दी के दिनों में अक्सर देखता हूँ की कुत्ते हमारे मुहल्ले की होटलों और ढाबों की भट्टियों से सुबह सुबह अपने बदन से राख झाड़ते हुए निकलते हैं ,,,ये उनका सर्दी से बचने का अपना इजाद किया हुआ तरीका है ..

ये सफाई पसंद भी बहुत है कई बार कोई जानवर सडक पर मर जाता है तो मुन्सीपालटी से मृत जानवर उठाने वाली गाड़ी आये उसे पहले ये उसकी दावत उड़ा जाते हैं ..हम इस बारे में सोचते भी हैं की अगर कुत्ते नहीं हो तो पूरा क़स्बा सड़ने लग जाए ..

मुझे कई बाते कुत्तों के सम्बन्ध में याद आ रही है ..की अगर हमारे समाज में कुत्ते नहीं हो तो मानव का जीवन संकट में पड़ जाएगा .....

सड़क छाप कुत्तों का अपना महत्त्व है इनका निस्वार्थ भाव से सामाजिक सेवा में पूरा योगदान है ..

आपका का क्या विचार है इस बारे में आपकी राय आमंत्रित है .../a>
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मेरा संस्कारित मध्यवर्गीय सपना

जीवन में सफल होना सबका सपना होता है ,,मेरा भी है ..

सपने भी बड़े ही वर्गीय होते हैं...अमीर का सपना अलग होता है वहीँ गरीब का अलग

अंधे का सपना आँख मिल जाने का होता है ..ये अलग बात है की आंख मिल जाने के बाद वो संतोष से रह पायेगा या वो नए सपने देखने लग जाएगा ..कई बार उसकी नींद हराम होने का भी कारक हो सकते हैं ..

मध्यवर्ग के सपनों का वर्ग भी अलग दृष्टीकोण का होता है .. वो आमतौर पर डाक्टर इंजिनियर टीचर एकाउंटेंट आदि बनने के सपने पालता है ..

कुवारी कन्या अच्छे वर का सपना देखती है इसकी चाहत इतनी प्रबल होती है की कई बार उस सपने को माँ बाप की अनुमति के पूर्व ही साकार कर लेती है ..

उसके लिए सोमवार का व्रत रखती है .उसका और उसके माता पिता का यही सपना होता है की वो संभावित वर सारी बलाएँ अपने सर ओढ़ ले ..

नेता टिकट मिलने का टिकट मिलने पर चुनाव जितने का चुनाव जितने के बाद मंत्री पद मिलने का और मंत्री पद मिलने के बाद चुनाव में जितने में खर्च हुए धन की वसूली केसे हो तथा कमीशन और कमसिन का जुगाड़ कैसे हो इसके सपने देखता है ...

सपने के एक अच्छी बात ये होती है की उसे देखने का पैसा नहीं लगता इसलिए कोई भी परंपरागत कंगाल भी किसी भी प्रकार के सपने देखने के लिए स्वतंत्र है ...और यही हमारे लोकतंत्र का मूलमंत्र है.. हम स्वतंत्र हैं इसका सही आभास सपने में ही होता है ...हमारे माननीय भी हमे राष्ट्र निर्माण के सपने देखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं ... हम राष्ट्र निर्माण के सपने देखते हैं तब तक हमारे माननीय उनके लिए घरों बंगलों और हवेलियों का निर्माण कर लेतें है ..

यानि जनता बिना छेद वाली चुसनी इस आशा में चूसती रहती है की कभी रस आएगा पर रस उपर से ही चूस लिया जाता है ..

में भी सपने देखता रहता हूँ और इसका में भयंकर रूप से आदि हूँ .. मेने अपने जीवन कई प्रकार के सपने देखे हैं...में अक्सर जल्दी करोडपति बनने के सपने देखता हूँ ..और इसे साकार करने के लिए प्रयत्नशील भी हूँ ..मेरे कुछ मित्र इसे साकार करने में सफल हुए हैं ...

पर मेरा ये सपना साकार अभी तक साकार नहीं हुआ..

,,उसका मुख्य कारण मेरे मध्यवर्गीय संस्कार जो मुझे घोषित, अधिकारित, और व्यवसायिक तौर पर बेईमान नहीं बनने देते ..में इन कथित संस्कारों को छोड़ कर धनवान बनना चाहता हूँ और इसके लिए थोडा बेईमान भी बनने के लिए तत्पर हूँ , पर ये संस्कार मेरे साथ साए की तरह हमेशा रहते हैं ..

मेने कई बार सोचा की पैसा कमाने के लिए कोई छोटा मोटा चिंदी चोर ही बन जाऊं ...इसलिए रात को एक दो बार मेने एक दो मकानों में भी झाँका की कोई माल हो तो ले उड़ू..पर अन्दर बंधे पालतू कुत्ते ने जब मुझे घुर कर देखा तो मेरी हिम्मत पस्त हो गई और चोर बनने का ख्याल त्याग दिया ..

मुझे इस बात का ज्ञान है और मेरा अर्थशास्त्र कहता है की जिन घरों में विदेशी नस्ल के कुत्ते होते हैं ..उन्ही घरों में माल होने की सम्भावना ज्यादा होती है ..भारत के बिना कुत्तो वाले घरों में तो कई बार आटे के डब्बे भी खाली मिलते है ..और इसी कारण इस प्रकार के घरों के मालिक बड़े ही धार्मिक प्रवर्ती के होते है क्योंकि आधे से उपवास रखने से अनाज कम खत्म होता है ..हमारे स्वर्गीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने भी उपवास रखने के लिया आव्हान किया था ..

गाँधी जी को तो पता था की देश चोट्टो के हाथों में जा रहा है इसलिए जनता आधे समय भूखे मरेगी..इसीलिए उन्होंने देश की जनता को पहले से ही उपवास का मानव जीवन में कितना महत्त्व है बता दिया था ..

मेने सफल होने के और भी प्रयास किये ...मेने एक बार एक आदमी को नोकरी लगाने का गच्चा देकर कुछ राशी झटक ली ...थोड़े दिन इंतजार करने के बाद वो एक दिन घर आ गया ...

मेने मेरे लड़के से कहा ..जा उसको बोल दे में घर नहीं हूँ ....लड़का भी आखिर मेरी ही ओलाद ..उसने उन महाशय से कहा पापा घर नहीं है ..तो उसने कहा तो फिर तुम्हारे पापा कहाँ है ..? मेरे सुपुत्र ने कहा जी वो घर में है ..मेने अपना माथा पीट लिया ...

में झूठ भी ढंग से नहीं बोल सकता झूठ बोलू तो काला कोवा काटे उससे पहले तो मेरी दिल की धड़कन तेज हो जाती है ...और गला खुश्क हो जाता है ...और सामने वाला एक मिनट में ताड़ जाता है .. और काटने के लिए कोवे की जरुरत ही नहीं रहती ..

एक बार मुझे सिनेमा में दो लुच्चों ने रगड़ दिया ..कारण ये की वो एक अति सुन्दर महिला के साथ संस्क्रती के विरुद्ध आचरण कर रहे थे ...मेने मना किया तो ....

कुछ लोग बोले भई एक दो तो तुम भी जमाते ..मेने कहा अरे वो तो में उनको छटी का दूध याद दिला देता पर में झगड़ा नहीं बढ़ाना चाहता था ..असल में मेरी हिम्मत ही नहीं है झगड़ा करने ..बस यूँही शेखी बघार रहा था ..ताकि मेरी कथित इज्ज़त बची रहे ..

कुल जमा बात ये की में भी उन मध्यवर्गीय लोगो में से हूँ जो अपनी ठुकाई हो जाए तो भी संस्कारवान होने का बहाना कर लेते हैं ..और घर आ जाते है और सूजे हुए थोबड़े के बारे में बाइक से नीचे गिरने का कारण बता देते हैं .. खेर जो भी अपनी इज्ज़त और संस्कृति बचाने में जरुर सफल हूँ ..हांलाकि इससे मुझे घाटा होता है ...पिता जी ने इज्ज़त रूपी बैल की पूंछ पकड़ा दी उसे छोड़ नहीं सकता चाहे वो मुझे जब चाहे घसीटे ..यही मेरी विरासत है ...

दुकान पर सामन लेने जाता हूँ दुकानदार खुल्ले नहीं होने का बहाना कर माचिस और टॉफी पकड़ा देता है ,,,विरोध करने पर वो मुझे घूर कर देखता है ..में चुपचाप रवाना हो जाता हूँ ..

केवल सपने देखता हूँ और खुश रहता हूँ ..

ख्याली घोड़े दोड़ा कर ही संतोष में हूँ .. दफ्तर के लोग जब कभी हड़ताल करते हैं में जुलुस में सबसे पीछे रहता हूँ ताकि कोई देख नहीं ले ...

एक बार तो मुझे डाकू बनने का ख्याल आया ...पर एक दिन टीवी पर एक डाकू का एनकाउंटर देखा जिसमे वो सडक पर मरे कुत्ते की तरह पड़ा था ..तो मेरी हिम्मत जवाब दे गई ...

में अपने जीवन में सफल होने के लिए तय ही नहीं कर पाया की क्या करूँ ..मेरा मन था की में गायक बनू तो पिताजी ने कहा ..भांड बनोगे ..इतने कुलीन घराने के हो कर ऐसे सोचते हो ....

फिर ध्यान में आया की आजकल खिलाडी रातो रात अमीर बन रहे हैं ..तो मेने क्रिकेट खेलना शुरू किया ..तो पिताजी ने कहा ये धोबी का धोवना छोड़ो और पढाई करो ..

एक लड़की सामने वाले घर में रहती थी मुझे देख कर वो मुस्कराती थी ...अब मुझे ये पता नहीं था की वो मेरी मुर्खता या लल्लूपन पर मुस्कराती है या मुझ पर आसक्ति से मुस्कराती है ...

में डर और झिझक के मारे उससे कभी पूछ ही नहीं पाया ..मुझे याद है की एक बार मेरे मुहल्ले के एक शोहदे ने एक कन्या का रास्ते में हाथ पकड़ कर प्रेम निवेदन किया ..उसे ऐसा करते कुछ लोंगो ने देख लिया ..उन्होंने उसकी वो धुनाई की ..बस पूछो मत ..वो मंज़र मुझे आज भी ताज़ा था ..और ये ताज़ा ही रहा और लड़की की शादी हो गई ..

खेर शादी मेरी भी हुई और भाग्य से पत्नी भी सुन्दर मिली ...संस्कारों के कारण नहीं बल्कि उसे कोई टपोरी छेड़े नहीं ,या कोई सज्जन घूरे नहीं में बाहर कम ही लेजाता हूँ ..

आजकल शराफत के भी पैमाने बदल गए हैं ...इस कारण कोई भी व्यक्ति किसी सुन्दर महिला को घूरे तो इसे बुरा नहीं माना जाता ..घूरने का अधिकार तो आजकल शास्वत हो गया है ..सभी घूरते हैं

छेड़ना टपोरी का काम है ..और ये संख्या भी बहुताय में हो गई है ..

एक बार एक सज्जन ने मेरी पत्नी को घूरा.. मेने कहा उधर मत देखो ...पत्नी बोली घूर ही तो रहा है ...मेने सोचा कल को कोई टपोरी छेड़ेगा तो कह देगी छेड़ ही तो रहा है ..बलात्कार तो नहीं कर रहा है ..पर में संस्कार वान हूँ इसलिए चुपचाप उसे घर ले आया ...और शुक्र मनाया की ..तीसरे प्रकार की दुर्घटना नहीं हुई ...अन्यथा

मेरे संस्कारों का जुलुस निकल जाता ..



कुल मिला कर मेने घर की इज्ज़त बचाने के लिए अपने सभी सपनो को कुर्बान कर दिया ,,,जब भी किसी सपने को साकार करने आगे कदम बढ़ाता तो ..मेरे संस्कार मुझे रोक लेते ..

में अपने जीवन में ना घोडा बन सका ...और ना ही गधा बन सका ... दिन में संस्कार साए की तरह साथ में रहते हैं और रात में सपने बन कर ..../a>
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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: एकदिवसीय=T-20=टेस्ट-ट्वेंटी

पिछली बार हमने बात की छोटी टीमों के विश्वकप में खेलने के औचित्य पर उठ रहे प्रश्न की,इस बीच कुछ और निराशाजनक ऊबाउ मैच खेले गए और लगने लगा कि वाकई प्रतियोगिता अनावश्यक लंबी खिंच रही है,एक बात और गौर करने वाली रही कि कोई भी टीम कितनी भी अच्छी गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण क्यों न कर ले रनों का आँकङा 250 के पार पहुँच ही जाता है,कुल मिलाकर खेल को मनोरंजक बनाने के फेर में गेंदबाज़ों का प्रदर्शन महज़ खानापूर्ति रह गया है,किंतु अनिश्चितता और रोमांच ही जिस खेल की पहचान हो उसमें भला किसी एक मत पर कैसे अडिग रहा जा सकता है,पिछले दो दिनों में देखने को मिले छोटे स्कोर वाले मैच,जिनमें से एक पर तो बंग्लादेश ने 206 रन के लक्ष्य पर ही किला लङा दिया और फतह हासिल कर ली,वहीं छोटी टीमों के निराशाजनक प्रदर्शन का भी भ्रम टूटा,केन्या को बुरी तरह हराकर 7+ का नेट रन रेट हासिल करने वाली न्यूज़ीलैंड अपने पङोसी ऑस्ट्रेलिया के आगे सस्ते में धराशायी हो गयी, और वेस्टइंडीज़ ने भी नौसिखियों की तरह खेल दिखाया,जहाँ एक ओर खेल को रोचक बनाने की कवायद चल रही है तो वहीं बङी टीमों का ऐसा लचर प्रदर्शन खेल मे सिर्फ पाँच ही प्रतिस्पर्धियों का गणित बना रहा है:भारत,दक्षिण अफ्रीका,श्रीलंका,पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया,पाकिस्तान को इस लिस्ट में देख आप भले ही चौंक जाएं ,किंतु विश्वसनीय Castrol Cricket Index तो इस बात की पुष्टि कर रहा है और अब तक के मैचों में आए परिणाम Castrol Cricket Index के आँकङो और गहन अध्ययन को और पुख्ता साबित कर रहे हैं, हाँ इंग्लैंड इस दौङ में था किंतु हर टीम नीदरलैंड नहीं होने वाली और पहले मैच वाला प्रदर्शन जारी रहा तो हो सकता है बंग्लादेश इंग्लैं को पराजित कर एक और इतिहास रच डाले।
एक बात जो स्पष्ट रुप से दिखाई दे रही है कि विदेशी टीमें भारत की परिस्थितियों का बहुत अच्छा अध्ययन करके आयी हैं और उसी के मुताबिक रणनीति बना रही हैं,दक्षिण अफ्रीका की तैयारियाँ बहुत मज़बूत लग रही हैं,इमरान ताहिर तुरुप का इक्का साबित हुए और धीमी पिच पर उम्दा प्रदर्शन कर सबको चौंका दिया...
श्रीलंका द्वारा 1996 में ईज़ाद किये गये ताबङतोङ बल्लेबाज़ी का फार्मूला फेल होता नज़र आ रहा है और फिरसे टिककर खेलने और अंत में छककर मारने वाला दौर लौट आया है,तभी तो हाशिम अमला जैसे तकनीकी बल्लेबाज़ Castrol Cricket Index में पहले पायदान पर बैठे हैं,इंग्लैंड के ट्रॉट और स्ट्रॉस,वेस्टइंडीज़ के सरवन और चंद्रपॉल,ऑस्ट्रेलिया के पोंटिग और क्लार्क,पाकिस्तान के यूनुस और मिसबाह, और अपनी फेविकॉल पारियों के लिये प्रसिद्ध श्रीलंका के महेला,संगकारा आदि मैराथन पारियाँ खेलते नज़र आने वाले हैं।भारत राहुल द्रविङ जैसे किसी खिलाङी की कमी महसूस करने वाला है, विराट,धोनी और युवराज को यह किरदार निभाना होगा,Build,Build and Blast !! की अस्सी के दशक की रणनीति में सहवाग शायद Blast,Build,Build, and Blast का तङका लगाने में सफल हो जाएं।
टेस्ट क्रिकेट और ट्वेंटी-ट्वेंटी के संगम से वन डे और भी मज़ेदार बन गया है,कुछ विस्फोटक और कुछ कलात्मक खेल देखने में मज़ा आएगा,और वन डे की नयी परिभाषा होगी T-20 यानि कि टेस्ट-ट्वेंटी। 
चतुर की चटाईः
महान खिलाङी और विस्फोटक खिलाङी में सबसे बङा अंतर यह है कि महान खिलाङी अपनी पारी से टीम को विजय दिलाते हैं और अंत तक किला लङाये रखते हैं,विश्वकप के फाईनल में 'मैन ऑफ द मैच"बनने वाले अधिकतर खिलाङी उच्च दर्जे के महान खिलाङी ही रहे हैं।
विश्व कप 1975: 3/50 की स्थिती में बल्लेबाज़ी करने आये महान वेस्टइंडियन खिलाङी क्लाईव लॉयड ने रोहन कन्हाई के साथ 149 रन की साझेदारी कर डाली,लॉयड के फाईनल में 85 गेंदो पर बनाये गये 102 रन वेस्टइंडीज़ के लिये पहला विश्वकप जिता लाये।
विश्व कप 1979:महानतम बल्लेबाज़ सर विव रिचर्ड्स की नाबाद 138 रनों की पारी जबकि दूसरे छोर पर खिलाङी शून्य पर आऊट हो रहे थे,और बाद में 0/35 के किफायती दस ओवर निर्विवाद रूप से उन्हें मैन ऑफ द मैच बना गये।
विश्व कप 1983: जब भारत ने कप जीता सब कुछ चमत्कार जैसा ही हुआ,एक छोटी नगण्य टीम जिसने स्कोरबोर्ड पर मात्र 183 रन टाँगे थे,वो वेस्टइंडीज़ जैसे पुरोधा से मुकाबला कर रही थी,भारत की ओर से मात्र तीन बल्लेबाज़ों ने बीस रन से ज़्यादा बनाये और मोहिंदर अमरनाथ उनमे से एक थे,बाद में मज़बूत वेस्टइंडीज़ को 140 पर निपटाने में अमरनाथ ने 3/12 का प्रदर्शन दिखाया और "मैन ऑफ द मैच" बन गये, आज के समय में किसी भारतीय गेंदबाज़ का मैन ऑफ द मैच बन जाना चमत्कार से कम नही होगा,गेंदबाज़ी वर्तमान में भारतीय टीम के लिए चिंता का विषय है,काश कि भज्जी कुछ ऐसा क़माल दिखा दें,और फाईनल के"मैन ऑफ द मैच" बन जाएं।
विश्व कप 1987:डेविड बून के 75 रन की पारी एकमात्र अर्धशतकीय पारी थी,और वो 168 रन जोङने तक क्रीज़ पर डटे रहे।
विश्व कप 1992:पाकिस्तान की टीम में इमरान ख़ान और वसीम अकरम जैसे बङे ऑलराउंडर मौजूद थे,अकरम के 19 गेंदो पर बनाये गये 33 रन और 3/49 का शानदार गेंदबाज़ी का प्रदर्शन का़बिल-ए-तारीफ़ रहा।
1992 से "मैन ऑफ द सीरीज़" का भी खि़ताब शुरु किया गया और पहला मैन ऑफ द सीरीज़ गया न्यूज़ीलैंड के मार्टिन क्रो को उन्होने कुल 456 रन बनाये जिसमे एक शतक और तीन अर्धशतक शामिल थे।
विश्व कप 1996:श्रीलंका ने जैसे खेल के मायने ही बदल डाले,पूरे टूर्नामेंट मे अरविंद डिसिल्वा और जयसूर्या छाये रहे और डिसिल्वा 107 रन बनाने और तीन विकेट(3/42)लेने के लिये "मैन ऑफ द मैच" चुने गये,132 के स्ट्राइक रेट से 221 रन बानाकर और सात विकेट झटककर जयसूर्या "मैन ऑफ द सीरीज़" बने।
विश्व कप 1999:शेन वार्न के 4/33 ने उन्हें मैन ऑफ द मैच बना दिया पाकिस्तान को 132 रन पर समेटने में उनकी बङी भूमिका रही,1999 के हीरो रहे ऑलराउंडर लांस क्लूज़नर(दक्षिण अफ्रीका)जिन्होने 281 रन बानाये 122 के SR से और 18 विकेट झटके।
विश्व कप 2003: रिकी पोंटिग ने नाबाद 140 रन बनाकर भारत की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और मैन ऑफ द मैच बने, क्रिकेट के भगवान को 673 रन बनाने और दो विकेट लेने के लिये मैन "ऑफ द सीरीज़" चुना गया।
विश्व कप 2007: गिलक्रिस्ट के 104 गेंदो पर मारे गये ताबङतोङ 140 रन मैन ऑफ द मैच वाली पारी थे,जबकि महान गेंदबाज़ मैक ग्राथ ने 26 विकेट लेकर मैन ऑफ द सीरीज़ हासिल किया
 विश्व कप 2011: आशा और प्रार्थना है कि यहाँ क्रिकेट के भगवान का नाम लिखा जाये......Amen!!


 

रोमांचक क्षणः
आईये 1983 की यादों को ताज़ा करके पुनरावृत्ति की प्रार्थना करें।


 रुपक
(Disclaimer:Castrol Cricket Index खिलाङियों के प्रदर्शन को मापने का कारगर तरीका है और इसके पहले उपयोग किये जाने वाले कई विश्लेषणों से इस मायने में पृथक है कि इसमें हर खिलाङी का प्रदर्शन खेल के तीनों पैमानों बल्लेबाज़ी,गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण में परखा जाता है किंतु खिलाङी की मूल प्रतिभा(core competence) को ध्यान में रखते हुए,गहन अध्ययन के बाद तैयार की गई यह रैंकिग प्रणाली ICC रैंकिग से भी ज़्यादा कारगर सिद्ध हुई है और क्रिकेट प्रेमी अब भावनाओं और उत्साह के साथ विश्वसनीय आँकङों की सहायता से भी अपने वाद-विवाद को मज़ेदार बना सकते हैं,
ब्लॉगर Castrol Cricket Index का अनुयायी है और अपने आलेखों में Castrol Cricket Index की सहायता से रोचक तथ्य प्रस्तुत करता है,Castrol Cricket Index द्वारा ब्लॉगर को संपर्क किया गया और अध्ययन के बाद ब्लॉगर को Index विश्वसनीय लगा,किंतु आलेख किसी भी प्रकार से कंपनी का प्रचार नहीं करते और Blogger की राय किसी भी उत्पाद से सर्वथा विलग और निष्पक्ष है)
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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: तिनका कबहुँ न निंदिये

 तो आखि़रकार विश्वकप का आगा़ज़ हो गया वो भी भारत की धमाकेदार विजय के साथ,और कोई मौका होता तो शायद इतने संशय न होते किंतु 2007 की पराजय ने अनेक आशंकाओं को जन्म दे दिया था, खैर विजय मिली और शानदार मिली,सेहवाग ने मैदान और मैदान के बाहर अपनी भङास निकाली और अपने बेधङक रवैये से सबका मुँह बंद कर दिया, खुल कर बोले कि हाँ ये पिछली हार का बदला था और बंग्लादेश टेस्ट क्रिकेट में अभी भी एक कमज़ोर टीम है,ढाका में खङे होकर ऐसी बेबाक बयानबाज़ी सेहवाग ही कर सकते हैं।
समांतर में चर्चा में है ICC के चेयरमैन हारुन लोगाट का बयान कि 2015 विश्वकप में मात्र दस टीमें ही खेलेंगी,और छोटी और कमज़ोर मानी जाने वाली टीमों में निराशा और रोष देखने को मिल रहा है,क्रिकेट जगत में आजकल अपनी ऊँटपटाँग टिप्पणियों के लिये चर्चा बटोरने वाले विश्वविजेता कप्तान रिकी पोंटिग ने हारुन के इस प्रस्ताव का समर्थन कर विवादों को और हवा दे दी है,पोंटिग का कहना है कि "माना कि छोटी टीमों को प्रोत्साहन मिलना चाहिये ताकि क्रिकेट का प्रचार-प्रसार हो किंतु विश्वकप इसके लिये सही मंच नहीं है,और पता नहीं बङी टीमों से बुरी तरह हारने पर ये टीमें कितना सीख पाती होंगीं" खैर पोंटिग तो ये बयान देकर अगले मैच की तैयारी मे जुट गये और विश्वकप के अपने पहले ही मैच में ज़िम्बाब्वे की कसी हुई गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण के आगे संघर्ष करते नज़र आऐ, हालांकि मैच तो वो जीत गए किंतु कङे मुकाबले के बाद।

अभी 'Minnows' का कद घटाये जाने की कवायद चल ही रही थी कि नीदरलैंड ने विश्वकप की प्रबल दावेदार मानी जा रही इंग्लैंड को नाकों चने चबवा दिये,किसी तरह अंतिम ओवर से पहले इंग्लैंड लक्ष्य तक पहुँच सका।
 इससे पहले केन्या और कनाडा के कमज़ोर प्रदर्शन ने हारुन के बयानों को पुख़्ता करने का ही काम किया था किंतु नीदरलैंड के जुझारु प्रदर्शन ने एक बार फिर सोचने पर विवश किया कि क्या क्रिकेट के महाकुंभ से विलग होकर ये छोटी टीमें अपना कोई स्थान बना पायेंगी? या फिर फुटबॉल का अधिपत्य स्वीकार कर कालांतर मे दम तोङ देंगी?
विश्व कप वह आयोजन है जिसमें हमेशा क्रिकेट न देखने वाले लोग भी रुचि लेते हैं,और चमत्कारों पर विश्वास रखने वाले भारतीय भारत का मैच न होने की स्थिती में इन कमज़ोर टीमों का ही समर्थन करने में आनंद लेते हैं,वही होता है खेल का असली रोमांच, जब पिछले विश्वकप में आयरलैंड जैसी छोटी टीम ने पाकिस्तान को पटखनी दे दी तो बंग्लादेश से हुई हार पर बहुतों के लिये तो इस चमत्कार ने मरहम का काम किया कि "चलो पाकिस्तान भी छोटी टीम से हारा", और फिर बंग्लादेश को हराकर तो आयरलैंड ने अस्वयं के देश से भी ज़्यादा प्रशंसक भारत में बना लिये,इसी परपीङा की सुखानुभूति के लिये कई छोटी टीमें लुटी पिटी बङी टीमों के प्रशंसकों की चहेती बन जाती हैं,
वैसे बंग्लादेश से लेकर नीदरलैंड और आयरलैंड से लेकर केन्या तक सारी टीमें उलटफेर का माद्दा रखती हैं और जब तक भारतीय टीम इनसे बची है ये खेल को रोमांचक बनाने वाली हैं।
वैसे पोंटिग ने रन आऊट होने के बाद ड्रेसिंग रुम में रखा टी॰वी॰ फोङ डाला इस खिसियानी बिल्ली वाली हरक़त पर कबीर का एक दोहा याद आ गयाः
तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उढे आँखिन परै,पीर घनेरी होय।

चतुर की चटाईः
विश्वकप में बौनी टीमों को हटाये जाने से पहले ICC को शायद यह भी सोचना चाहिये कि टेस्ट खेलने वाली टीमों की तुलना में छोटी टीमों को कितना कम अवसर और आर्थिक सहयोग दिया जाता है,हालांकि ज़िम्बाब्वे जैसी टीमों का इतने वर्षों के बाद भी नौसिखिया रह जाना प्रतिवाद को जन्म देता हैः
किंतु इसके बावज़ूद विश्वकप के इतिहास में बङे उलट फेर हुए हैं:
  • 1979 के विश्वकप में उस समय की नॉन टेस्ट प्लेयिंग टीम श्रीलंका ने भारत को 47 रन से हराकर सबको चौंका दिया था।
  • 1983 के विश्वकप में ज़िम्बाब्वे ने ऑस्ट्रेलिया को 13 रन से हराकर सबसे बङा उलटफेर किया था।
  • 1992 के विश्वकप में ज़िम्बाब्वे ने इंग्लैंड को नौ रन से मात दे दी थी और ये ज़िम्बाब्वे की पहली जीत थी अठारह लगातार पराजय के बाद इसके पहले उन्होंने 1983 में ऑस्ट्रेलिया को हराया था।
  • 1996 के विश्वकप में अपने विश्वकप पदार्पण वर्ष में ही मज़बूत वेस्टइंडीज़ को 73 रन के बङे अंतर से हराकर केन्या ने प्रबल दावेदारी पेश की थी।
  • 1999 के विश्वकप में पाकिस्तान को 62 रन से हराकर बंग्लादेश ने इतना प्रभावित किया कि उसी वर्ष टेस्ट टीम का दर्ज़ा हासिल कर लिया,हालांकि इसी पैमाने पर परखा जाए तो केन्या को भी टेस्ट टीम हो जाना चाहिये था किंतु ऐसे ही निर्णय एक प्रगतिशील टीम का मनोबल तोङ देते हैं,केन्या का सर्वश्रेष्ठ आना अब भी बाकि था।
2003 विश्वकप के उलटफेरः
  • 2003 के विश्वकप में केन्या ने मज़बूत श्रीलंका को 53 रन से शिकस्त दे दी।
  • कनाडा ने अपेक्षाक्रत मज़बूत बंग्लादेश को 60 रन से हराकर बंग्लादेश के टेस्ट स्टेटस पर फिर सवालिया निशान लगा दिया।
  • केन्या ने भी बंग्लादेश को सात विकेट से पीटा।
  • अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए केन्या ने ज़िम्बाब्वे को भी सात विकेट से हराया और सेमी-फाईनल तक पहुँच गया।
  • 2007 के विश्वकप में ज़िम्बाब्वे और आयरलैंड का रोमांचक मैच बराबरी पर छूटा जो विश्वकप का तीसरा टाई था।
    2007 के विश्वकप में भारत की बंग्लादेश के हाथों पाँच विकेट से हार आज तक काले पन्नों मे दर्ज़ है।
    2007 के विश्वकप में दूसरा बङा उलट फेर रहा पाकिस्तान की आयरलैंड के हाथों तीन विकेट से हार।
    2007 के विश्वकप में ही आयरलैंड ने बंग्लादेश को 74 रनों के भारी अंतर से हरा दिया।
    किंतु बंग्लादेश द्वारा मज़बूत दक्षिण अफ्रीक की 87 रन से हार ने सबको चौंका दिया और बंग्लादेश ने आने वाले विश्वकप में अपनी बढने वाली शक्ति का परिचय दे दियाः  
रोमांचक क्षणः
रुपक
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शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: दही-शक्कर

बस कुछ घण्टे और फिर आगा़ज़ हो जायेगा एक और विश्वकप का,अभी-अभी विश्व कप 2003 के फाईनल की झलकियाँ देखीं,दूसरे चैनल मे समांतर में विश्व कप 2007 का वो अतिविस्मरणीय किंतु अविस्मरणीय मैच भी दिखाया जा रहा था जब क्रिकेट की महाशक्ति भारत एक बौने प्रतिद्वंदी बंग्लादेश से हार गयी थी,इस खेल की यही ख़ूबी है रोमांच! भावनाओं का,अनिश्चितता का,उत्साह का,निराशा का,नसों में नशा भरने वाला रोमांच!!! संप्रति से परे भूत और भविष्य मे पनपने वाला रोमांच,भूत जो सालता है,कचोटता है,मुठ्ठियाँ भिंच जाती हैं कि काश!!! ऑस्ट्रेलिया के साथ वो फाईनल,इतना पास पहुँच कर भी इतने दूर रह गये, पराजित सेना से मैदान में उतरे और बिना किसी चमत्कार के विश्व विजेता को नमस्कार कर कप पकङाकर चले आये,उफ्फ,काश...,जब कपिल जी ने जीता होगा वो कप क्या पता रहा होगा कि आने वाले 28 साल तक वही तस्वीरें मन को दिलासा देती रहेंगी,उससे बङे खिलाङी आये,बङी जीत मिलीं लेकिन वो एक कसक कि काश...खैर इसी काश की आस में फिर एक बार उतर रहे हैं मैदान में,फिरसे उम्मींदों का अंबार है,हमेशा कि तरह;फ़र्क इतना है कि इस बार आँकङे भी साथ दे रहे हैं,जीत की आदत के साथ,एक अलग आत्मविश्वास के साथ पादार्पण हो रहा है,फिर वही रोमांच आने वाले क्षणों का और बीत चुके पलों का साथ रह जायेगा ,और संप्रति में होंगी सिर्फ रिमोट कि किट-किट,सर दुखा देने वाले उत्पादों के प्रचार और कभी न सही होने वाले विश्लेषण,विजयी भव की आशा है और काश का भय किंतु फिर भी उम्मीद है कि भविष्य से बँधी और भूत की कर्ज़दार है।
स्मरण हो रहा है परीक्षा के पहले का वो समय जब पेट में तितलियाँ उङा करती थीं,सारी तैयारी होने पर भी ह्रदय गति 140 / 120 रहा करती,हाथ पाँव ठण्डे और फिर एक गहरी साँस कि "सोचना क्या जो भी होगा देखा जायेगा",तैयारी से टोटके तक सब जारी हैं,आलोचना का दही और शिरोधार्यता की शक्कर का स्वाद खिलाङियों के भी मन में होगा,किंतु वो भी जब खेलेंगे तो यही कहेंगे 'सोचना क्या जो भी होगा देखा जाएगा'।
चतुर की चटाईः
करोङों दर्शकों की प्रार्थना,विश्वास और आशा का बोझ लिए मैदान में उतरना अवश्य ही बहुत दवाब का काम है,और बहुधा किस्मत का बहुत बङा हाथ होता है,जैसे कोई बङा कैच छूट जाए या ऐन मौके पर बङा विकेट मिल जाए तो खेल का नक्शा ही पलट जाता है,खिलाङी भी भाग्य को मानते हैं और कुछ न कुछ टोटके करते हैं,देखिये चतुर ले आया है ऐसी ही कुछ जानकारीः
  • प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ महेला जयवर्धने चौका मारने के बाद अपने बल्ले को चूमते और बल्ले के दूसरे छोर को थपथपाते दिख जायेंगे।
  • क्रिकेट के भगवान सचिन और उनके सबसे बङे प्रशंसक सुनील गावस्कर दोनों ही पहले बाँये पैर का जूता,पैड और दस्ताने पहनते हैं,
  • सचिन हमेशा अपने भाई का दिया हुआ पैड पहनते हैं,फिर चाहे थोङे समय के लिये ही क्यों न पहनें,
  • अधिकतर सचिन आऊट होने के बाद भी मैच के अंत तक सारे गियर्स पहनकर ही बैठे रहते हैं
  • सहवाग का मानना है कि वो जिस टीम को सपोर्ट करते हैं वो हार जाती है और आश्चर्यजनक रुप से वो अंत तक विरोधी टीम के जीतने की आशा करते रहते हैं
  • महान ऑस्ट्रेलियाई खिलाङी स्टीव वॉ हमेशा अपनी जेब में अपने दादा का दिया हुआ लाल रुमाल रखते थे,जिमी अमरनाथ और सहवाग की जेब में भी लाल रुमाल देखा गया है।
  • श्रीसंत के गले मे दर्ज़न भर ताबीज़ें आपने देखी ही होंगी और बॉलिंग का रन अप लेते समय कनपटी में बार-बार ऊँगली से दवाब डालना और खुद से बात करना ये सब श्रीसंत को एक मज़ेदार खिलाङी बना देते हैं
  • पता नही ये आदत है या टोटका किंतु भारतीय कप्तान धोनी हमेशा स्ट्राइक लेने से पहले अँगूठे से अपनी नाक को ऊपर की ओर दबाते और ग्लव्स ठीक करते दिख जायेंगे।
  • वेस्टइंडीज़ के खिलाङी चंद्रपॉल हेल्मेट उतारते,विकेट की बेल्स से पिच पर ठोंकाठाकी करते दिख जायेंगे।
  • Ponting के डेप्यूटी माईकल क्लार्क मैदान पर जाने से पहले तेज़ म्यूज़िक सुनने के शौकीन हैं।

भारतीय टीम के नये खिलाङी भी कम नहीं हैं
  • आर अश्विन हमेशा अपना लकी लैपटॉप साथ रखते हैं
  • विस्फोटक बल्लेबाज़ यूसुफ पठान अंधविश्वास को तो नहीं मानते किंतु खु़दा को याद करना और मैच से पहले जो भी तीव्र इच्छा हो उसे पूरा करने का प्रयास करते हैं जैसे कुछ खाना या कोई गाना सुनना।
  • पीयूष चावला मैदान पर जाते समय हमेशा अपना दाँया पैर पहले रखते हैं,उनके पिता ने ऐसा निद्रेश दिया है।
ऐसे ही कई और टोटके हैं, आपका भी कोई प्रिय टोटका होगा ,जैसे क्रिकेट देखते समय बाथरुम गया तो विकेट गया,या नीली शर्ट पहनी तो मैच जीते,जो भी हो आज़माने से बाज़ न आयें,टोटका ऐसा जिससे स्वयम का और किसी और का नुकसान न हो ,हाँ टोटके और अंधविश्वास मे अंतर बना रहे और खेल जीवन का हिस्सा हो, जीवन खेल का हिस्सा न बन जाये।
रोमांचक झलकियाँ:
रुपक
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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: आखिर क्यूं पापा आखिर क्यूं

पापा काल का क्रूरुतम प्रहार आखिर हो ही गया..जिस से हमेशा डरता रहा..वही हुआ...क्या कहूं पापा...कैसे व्यक्त करुं मन की व्यथा...बांटना संभव नहीं. है मेरे लिए...कुछ और समय तो रुकना ही था न पापा आपको...आप जानते थे कि समय आने वाला है. कुछ होने का..मगर आप उसी समय में चल दिए....कहना तो था.....आप जानते थे कि कब प्रस्थान कि वेला है पर चुप रहे...आखिर किस बात की सजा दी है...आखिर क्यूं? गलती तो हर औलाद करती है, पर उन कुछ गलतियों की सजा इतनी कड़ी...आप जानते थे कि आपकी जैसी क्षमता मुझे में नहीं थी, फिर इतनी अपेक्षा क्यों..आखिर क्यों? अब इस दर्द को किससे कहूं....ये ग्लानि तो अब मेरी चिता के साथ ही जाएगी न...अपने आखिर सफर तक इस दर्द के साथ रहने को अभिशप्त हूं मैं अब....आखिर क्या मिला इतनी सज्जन्नता का ईनाम....कोई आया भी नहीं न आपके आखिर सफर में....कहां गए आफकी उंगली पकड़कर उपर तक पहुंचने वाले लोग.....आखिर इतना देने का भी क्या फायदा हुआ पापा कि अपना घर ही भूल चुके थे...औऱ जब घर पर रहने लगे,,,तो जाने की आखिर इतनी जल्दी क्या  पड़ी थी आपको...बताएंगे क्या....कम से कम दोनों इच्छाएं तो पूरी करने का समय देते...जब उनके होने की दिशा में कदम उठाया तो मुझे सोने की इजाजत देकर खुद क्यों सो गए...मौनी अमवस्या पर मौन हो गए क्यों.....मैं अब तक अवाक हूं...खुल कर आंसू भी नहीं बहा पा रहा हूं..अब तो घर पर आए लोग भी अपनी दिनचर्या में लौटने को बेताब हैं....दो दिन बाद क्या होगा..क्या सन्नाटा नहीं खा जाएगा हम सब को....समझ नहीं आ रहा कि क्या करुं....जब आप ही नहीं रहे तो क्या फायदा उन उंचाईयों की तरफ बढ़ने की जद्दोजहद का....अब तो सब कुछ यंत्रचालित सा हो गया है..... कॉलेज खोलने का सपना आप लोगो तक पहुंचा गए..पर क्या फायदा उसका...मेरी समझ में नहीं आ रहा....दो फरवरी को आप गए..पूरे सोलह दिन हो गए....काल के इस प्रहार से हुए दर्द से बिलबिला रहा हूं..पर संज्ञाशून्य हो गया हूं..........आखिर क्यों नहीं रुक सके महज चंद साल...आखिर क्यूं ?????????????????/ हे भगवानननननननननन
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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: L***&&&%%%###@@@***L

विश्व कप का बुखार बढ रहा है, अभ्यास मैच प्रारंभ हो गये हैं,भारत ने अपना पहला अभ्यास मैच चिर परिचित प्रतिद्वंदी ऑस्ट्रेलिया के विरूद्ध जीतकर अपनी दावेदारी को मज़बूत कर लिया है,हालांकि असली मुका़बला अभी तीन दिन बाद प्रारंभ होगा,आशा है अप्रैल तक और आने वाले कई अप्रैल तक जश्न जारी रहेगा।
प्रवीण कुमार के स्थान पर आये श्रीसंत ने अच्छा प्रदर्शन कर अपनी दावेदारी तो मज़बूत की ही,अति आदरणीय किंतु नकचढे पोंटिग को 'L' का संकेत देकर और वाद के बदले प्रतिवाद देकर यह भी जता दिया कि कुछ रोचक स्लेजिंग भी खेल को मज़ेदार बनाने वाली है, हालांकि स्लेजिंग का स्तर गिरता जा रहा है और अब यह वाक्पटुता न रहकर अभद्रता बन गयी है, किंतु कुछ अच्छे उदाहरण मिले तो खेल कि मर्यादा के साथ रोचकता भी बनी रह जायेगी,क्रिकेट के इतिहास में ऐसे कई मज़ेदार स्लेजिंग के उदाहरण हैं जो खिलाङियों कि हाज़िर-जवाबी के कारण किवंदती बन गये हैं,हालांकि बहुत सारे स्थानों पर इनका उल्लेख किया जा चुका है किंतु आईये एक बार फिर इन्हे स्मरण करके प्रसन्न हो लेते हैं,और आशा करते हैं कि विश्व कप -2011 में कुछ मज़ेदार और स्वस्थ्य स्लेजिंग देखने को मिले।
Merv Hughes: जैसा कि सभी जानते हैं ऑस्ट्रेलिया स्लेजिंग के हर स्तर में अग्रणी रहा है और ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध गेंदबाज़ Hughes  को इसमें महारत हासिल थी,Hughes अपने हाव-भाव और आक्रामक काटाक्ष के कारण खा़से चर्चा में रहते थे, एक बार पाकिस्तानी बल्लेबाज़ ज़ावेद मियाँदाद इनसे भिङने की गल्ती कर बैठे,और Hughes की भारी भरकम काया पर ताना कसते हुए उन्हे "मोटा बस कंडक्टर" कह डाला,अगली ही गेंद पर ज़ावेद अपना विकेट गँवा बैठे और पविलियन को जाते हुए ज़ावेद से Hughes ने कहा "टिकट प्लीज़"
स्लेजिंग से खा़सी नफ़रत करने वाले विव रिचर्डस को Hhughes लगातार घूर रहे थे, बात ऑस्ट्रेलिया के वेस्टइंडीज़ टूर की है, झल्लाये हुये विव ने कहा "ये मेरा देश है और हमारी संस्क्रति में हम घूरते नहीं सिर्फ बॉलिंग करते हैं,जब Hughes ने विव को आउट किया तो कहा "और हमारी संस्कर्ति में हम कहते हैं f**K *ff"
विव के साथ की ही एक और घटना है जब लगातार बॉल मिस करने के बाद बॉलर ग्रेग ने विव से कहा "ध्यान से देखो,ये गेंद लाल है,गोल है,और इसका वज़न पाँच औंस है, शायद तुम्हें दिखायी नहीं दे रही" अगली ही गेंद को विव ने सीम रेखा के पार मैदान के बाहर पहुँचा दिया और ग्रेग से बोले " तुम्हे तो बङी अच्छी तरह गेंद की बारीकियाँ पता हैं अब जाओ और तुम ही उसे ढूँढो।"
कहानियाँ तो बहुत हैं पर समय कम चलिये अंत में ऑस्ट्रेलिया के ही महान गेंदबाज़ मैक्ग्रा की बात कर लेते हैं जो स्लेजिंग प्रारंभ तो बङे जोश में करते थे किंतु मुँह की खाने के बाद गाली-गलौज पर उतर आते थे,बडा प्रसिद्ध वाकया है जब माहाशय ने वेस्ट्इंडीज़ के खिलाङी रामनरेश सरवन को उकसाने के लिये कह डाला ""So what does Brian Lara's d*ck taste like?" और सरवन का जवाब था""I don't know. Ask your wife." कहने की देर थी कि मैक्ग्रा आग बबूला हो गये,ऐसे ही ज़िम्बाब्वे के पुछल्ले बल्लेबाज़ एडो को मैक्ग्रा ने कहा "Hey Eddo, why are you so F**ing Fat?" और जवाब आया "Because everytime I F*** your wife, she gives me a biscuit" 
 
दिख रहा है कि किस तरह स्लेजिंग अभद्रता बनती जा रही है,चलिये एक वाकपटु स्लेजिंग से समाप्त करते हैं
प्रसिद्ध ASHES सीरिज़ की बात है,जेम्स ऑर्मड इंग्लैंड का नया खिलाडी था ऑस्ट्रेलिया के मार्क वा (स्टीव वॉ के भाई) ने कहा "देखो तो कौन आया है,तु्म्हारी यहाँ कोई जगह नहीं दोस्त,तुम इंग्लैंड के लिये खेलने लायक भी नहीं हो"
नौसिखिये ऑर्मड का जवाब था " हाँ मैं अपनी टीम का सर्वश्रेष्ठ खिलाङी न सही किंतु कम से कम अपने परिवार में सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाङी हूँ,क्या तुम ऐसा कह सकते हो?"
स्लेजिंग और भारतः
भारतीय खिलाङी विवाद से अक्सर दूर ही रहना चाहते हैं और उनका खेल बोलता है, किंतु बंगाल टाईगर सौरव ने प्रतिद्वंदी को करारा जावाब देने की परंपरा शुरु की और लॉर्डस में उछाली गयी शर्ट के लिये वो हमेशा याद किये जाते रहेंगे,सौरव के ही संरक्षण में पनपे हरभजन भी यदा कदा प्रतिद्वंदी खिलाङियों को जवाब देते दिख जाते हैं,नेहरा हर बॉल के बाद विशेषणों की बौछार कर देते हैं तो युवराज अर्धशतक या जीत के बाद इतना उत्साह दिखाते हैं कि होंठो की हरकत से ही शब्दों की बारीकियाँ पढी जा सकती हैं,किंतु क्रिकेट के हर मोर्चे पर पताका लहराने वाले "सचिन द गॉड" को ही सबसे बङा स्लेजर भी मान लीजिये क्योंकि वो बल्ले से ऐसा जवाब देते हैं कि सामने वाला खिलाङी निरुत्तर रह जाता है और कितनो का तो करियर ही दाँव पर लग जाता है,सचिन को उकसाने वाले अपने बाल नोचते रह जाते हैं और यह सुप्त ज्वालामुखी अपने बल्ले से ही सारे काटाक्षों को जलाकर राख़ कर देता है।
चतुर की चटाईः
चतुर बता रहे हैं कि कैसे "Gentleman Game" में स्लेजिंग का प्रादुर्भाव हुआ,स्लेज नाम के एक प्रसिद्ध गायक थे 'अलबामा' के रहने वाले उनका एक गाना बङा मशहूर हुआ था ""When a Man Loves a Woman",एक क्रिकेट खिलाङी का उसकी प्रतिद्वंदी टीम के खिलाङी  की पत्नी से चक्कर चल रहा था,उसी समय मैदान पर आते ही साथी खिलाङी Percy Sledge का यह गाना गाना शुरु कर देते,बस यहीं से चल निकला यह शब्द।
हालांकि कई अन्य खेलों में भी इस प्रकार विरोधी खिलाङी को उकसाने की परंपरा है ताकि मानसिक दवाब बनाया जा सके,  किंतु नाम भिन्न-भिन्न हैं,बास्केट बॉल में इसे 'Trash Talk' कहा जाता है,आईस हॉकी में 'Chirping' और बॉक्सिंग में तो जोश का ही काम है तो काफी विशेषण सुनने को मिल जाते हैं,मोहम्मद अली का "What's my name" कौन भूल सकता है!
रोमांचक क्षणः
चाहे जो भी हो किंतु असली रोमांच तो ऐसे मैच का है,इस विश्व कप मे प्रतीक्षा रहेगी पुनराव्रत्ति कीः
 
रुपक
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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: शेख चिल्ली का मक़बरा


पिछली पोस्ट में मैं ने आप को हरयाणा राज्य के बारे में जानकारी दी थी.आज आप को उसी राज्य के एक पर्यटक स्थल के बारे में बताती हूँ.अंतरजाल पर इस स्थान के बारे मेी बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध है.आईए देखते हैं कुछ चित्र और जानते है कुछ बातें इस स्थल के बारे में-:
शेख चिल्ली का मक़बरा-
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शेख चिल्ली का नाम सुनते ही शेखी बघारने वाले किसी व्यक्ति का ध्यान आ जाता है.क्योंकि अक्सर

To LoVe 2015: थोथा चना बाजे घना-2

(INR)30 crore annual,2 crores monthly,60 lakhs weekly,12 lakh daily,50,000 per hour!! अरे ये किसी कंपनी की वार्षिक आय नहीं है,ये तो सचिन तेंदुलकर की आय के आँकङे हैं,वैसे कुछ और भी चौंकाने वाले आँकङे हैं जैसे गोल्फ खिलाङी टाईगर वुड्स के 13.44 crore/day या फुटबॉल खिलाङी क्रिस्टियानो रोनाल्डो के 65 lakh/day !! सुना है धोनी भी सचिन से बहुत पीछे नहीं रह गये हैं,कोई दो राय नहीं कि इतना मूल्य पाने के लिये खिलाङियों को खा़सा परिश्रम भी करना पङता है,पर फिर भी पैसा पानी की तरह बह रहा है।
पिछले अंक में हम बात कर रहे थे कि किस तरह पिछले विश्व कप से अब तक विज्ञापनों में अभूतपूर्व परिवर्तन आये हैं,सबसे आसान उदाहरण है टेलीविज़न के पर्दे का प्रयोग,याद कीजिये कैसे ऊपर एक कोने में छोटा सा स्कोर दिखायी देता था, फिर आया पर्दे के नीचे के हिस्से में विज्ञापनों का चलन,फिर दाँया भाग गया ,और अब बायाँ भी,और तो और क्रिकेट को इनसेट में करके विज्ञापन को चमकाया जाना भी शुरु हो गया,बहुत पुरानी बात नहीं कि जब कोई खिलाङी आऊट होता तो बॉलर की प्रतिक्रिया और जनता का शोर देखने का बङा उत्साह होता था,अब तो गेंदबाज़ के ऊँगली उठाते ही विज्ञापन आ जाता है चाहे भले नॉट आऊट का ही निर्णय हो,और लाचार जनता करे भी तो क्या?
हर गेंद पर विज्ञापन,कुछ साल रुकिये शायद अगले विश्व कप तक सारे चैनल सीधे प्रसारण का भी वर्गीकरण कर दें,
साधारण पैक जिसमें सिर्फ इनसेट मे स्कोर दिखेगा और बाकि विज्ञापन,मध्यम जिसमें हर ओवर के बाद मुख्य अंश दिखा दिये जायेंगे,प्रीमियम जिसमें मैच दिखेगा और हर गेंद के बाद विज्ञापन,प्लेटिनम जिसमें हर ओवर के बाद विज्ञापन,और यदि खिलाङियों की प्रतिक्रिया वाली क्लिपिंग देखनी हैं तो पिज़्ज़ा के एक्सट्रा चीज़ टॉपिंग की तरह भुगतान करना होगा,फिर क्लिपिंग का भी वर्गीकरण होगा साउंड मिक्सिंग के साथ ज़्यादा दाम चुकाना होगा गाना बजेगा "हुङ दबंग,सबसे बङे लङैया ...." सोचकर ही सर चकरा गया, पर संभव है।
बाज़ारवाद ने खेल और खिलाङी को खिलौना बना दिया है और जनता इस खिलवाङ की मूक साक्षी,जनता को प्रलोभन देने वाले विज्ञापन ताकि उत्पाद बिके,कितने लोग एक रोचक मैच के बीच विज्ञापन का व्यवधान पसंद करते होंगे? शायद कोई नहीं,किंतु Top of the mind recall  के फेर में आँखो में विज्ञापन इतना ठूँस दिया जाता है कि बल्ला पकङे शीतल पेय के कैन ही नज़र आते हैं,खैर खेल में लगा पैसा,सुविधा और गुणवत्ता बढाने में ख़र्च करने का दावा करने वाली कंपनियाँ कुछ  तो कीमत वसूलेंगी ही,और कस्टमर तो है ही वही जिसे कष्ट दे दे कर मार दिया जाये।मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद...
चतुर की चटाईः
चतुर बता रहा है आज "Ambush Marketing" के बारे में,या हिंदी में अनुवाद करने का प्रयास किया जाये तो "आक्रामक बिक्री/विपणन",Ambush Marketing एक प्रकार का समझौता है मुख्य प्रायोजक और जो प्रायोजक नहीं हैं उनके बीच,ज़ाहिर है मुख्य प्रायोजक ICC को एक मोटी रक़म देकर विज्ञापन अधिकार वसूलते हैं और किसी भी प्रतिस्पर्धा से संबद्ध विज्ञापन बनाकर उसका लाभ लेते हैं,उदाहरण के लिये पेप्सी के विज्ञापन जिनमें धोनी हेलीकॉप्टर शॉट लगाते दिखायी दे रहे हैं,अब यदि कोका कोला भी विश्व कप से संबंधित विज्ञापन बना ले तो बिना पैसे दिये वो वही लाभ ले रही है जो पेप्सी ये कहलायेगा Ambush Marketing ,हालांकि ICC के कङे नियम हैं किंतु कंपनियाँ भी चालाक हैं,नियम को तोङना मरोङना संभव है,जैसे विश्वकप का लोगो और थीम उपयोग किये बिना और बिना भारत की जर्सी पहने विज्ञापन कर सकते हैं,ज़ाहिर है बहती गंगा में कौन हाथ नहीं धोना चाहेगा,और जब हर तीसरे विज्ञापन में धोनी है तो हाथ ही नहीं पूरी बॉडी धोनी है,हाँ अगर खेल नहीं पाये तो गंगा मैली होनी है।
Main Sponsors of ICC World Cup 2011
रोमांचक क्षणः
और ये है नब्बे के दशक में प्रचलित हुआ एक विज्ञापन जिसमें भारत के दो सबसे ज़्यादा बिकने वाले सितारे शामिल थे,ज़ाहिर है शाहरूख तब इतने प्रचलित नहीं थे किंतु इस विज्ञापन ने उनकी दशा और दिशा बदल दी,गॉड सचिन की महिमा है।
रुपक
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गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

To LoVe 2015: थोथा चना बाजे घना-1


हिन्दी समाचार चैनल्स हिन्दी दर्शकों का अच्छा मज़ाक बानाते हैं,या तो धारणा यह है कि हिन्दी के दर्शकों को मात्र फि़ज़ूल का ड्रामा पसंद है,या फिर चैनल ही नौटंकी बाजों ने सँभाल रखा है,आज चर्चा का विषय तो कुछ और है किंतु अभी-अभी दस सिर वाला धोनी और हनुमान जी के शरीर पर चढे ग्यारह खिलाङियों के चेहरे टी॰वी॰ पर देखकर हिंदी दर्शकों के मानसिक स्तर के मूल्यांकन का प्रश्न खङा हो गया। 
ख़ैर प्रश्न तो और भी हैं, जैसे क्या विश्व कप चौदह टीमों का स्वस्थ्य और रोमांचक मुका़बला मात्र है या बाज़ार का नया गणित? क्या किस पर हावी है ये तो नहीं कहा जा सकता किंतु सर्वविदित है कि यह भारत का सबसे मुनाफ़े का व्यवसाय है,सिनेमा जगत से भी ज़्यादा, क्योंकि सिनेमा में तो सितारों के और उनके चाहने वालों के ख़ेमे हैं और नफा-नुकसान से दर्शक सर्वथा तटस्थ हैं, किंतु क्रिकेट से भावनाएं जुङी हैं और भावनाओं से जुङा है बाज़ार का गणित,फिर बात बङे प्लाज़्मा में खेल का आनंद लेने की हो या मोबाईल पर मैच देखने की या कोई उत्पाद खरीदने पर सचिन की पारी के निजी दर्शक बनने की,विज्ञापन बनाने वाले कोई कसर नहीं छोङते।

2007  के विश्व कप में भारत और पाकिस्तान के बाहर हो जाने से व्यवसाय का भारी नुकसान हुआ,पता नहीं किस ज्योतिषी की राय पर करोङों रुपया यह मानकर झोंक दिया गया कि भारत विश्वकप पक्का जीत रहा है,शायद ऐसे ही ड्रामेबाज़ हिंदी समाचारों की सलाह पर,भारत बाहर हुआ,जनता का गु़स्सा फूट पङा,विज्ञापन बेमानी हो गये और तो और उत्पाद हमेशा के लिये नकार न दिया जाये ये मानकर विज्ञापन दिखाना ही बंद कर दिया गया,सेट मैक्स ने जान-बूझ कर बङे मैचों के विज्ञापन अधिकार नहीं बेचे कि भारत के सेमीफाईनल में जाने पर तीन गुना दाम वसूल लेंगे लेकिन आनन-फानन में औने-पौने दाम पर भी कोई न मिला।व्यवसाय को भारी नुकसान हुआ,और क्रिकेट के कुबेर पर भारत का प्रभुत्व जग जाहिर हो गया,भले ही खेल में वो ज़ीरो साबित हुये।
पिछले चार सालों में क्रिकेट में अभूतपूर्व परिवर्तन आये,जो भारत Twenty-20 का पुरज़ोर विरोध कर रहा था वही विश्व कप जीत गया,वो भी पाकिस्तान से़!!! रोमांच का चरम,अब तो बस यही खेल था,जब ज़ी समूह के सुभाष चंद्रा ने I.C.L.(Indian Cricket League) बनायी तो BCCI  ने भारी विरोध जताया,कई खिलाङी निलंबित कर दिये गये किंतु अंततः बाज़ार के आगे BCCI ने भी घुटने टिक दिये और इंडियन पैसा लीग मे शामिल हो गये,खेल व्यवसायिक द्रष्टि से भारी सफल रहा और वन डे के अस्तित्व पर बन आयी,क्रिकेट के शुद्ध रूप टेस्ट को कौन पूछने वाला था?व्यवसाय फल-फूल रहा था,प्रीति ज़िंटा और शिल्पा शेट्टी खिलाङियों को क्रिकेट के गुर सिखा रही थीं,जिस मैदान पर कभी सचिन का पसीन गिरा होगा वहाँ चीयर लीडर्स भौंडा न्रत्य कर रही थीं,तो क्या हुआ? व्यवसाय फल-फूल रहा था;
फिर खुलना शुरु हुईं परतें,कहाँ से आ रहा था इतना पैसा ?और किस किस का?स्विस बैंक से दुबई तक सब अमीर हो रहे थे,जाँच तो कुछ हुई नहीं हाँ विश्व कप के ठीक पहले खिलाङियों की नीलामी हो गई,I.P.L. में मूल्य निर्धारण का मापदंड है खिलाङी की रौद्र छवि,भाई छक्का तो छक्का है १ कि॰ मी॰ का हो या सीमा रेखा का,खैर छक्कों में फ़र्क करना बङा मुश्किल हो गया है,जबसे K.K.R. ने छक्कों के आधार पर और सलाह पर मूल्य निर्धारण की परंपरा शुरु की। चार साल! बहुत कुछ बदल गया तब के शेर गांगुली आज अचानक अछूत हो गये।

आज की चर्चा का सार यही है कि बहुत मज़बूत और विश्वकप की प्रबलतम दावेदार भारतीय टीम कोई आश्चर्यजनक परिणाम दे दे तो हार्ट अटैक आने से पहले I.P.L के ड्रामे को अवश्य याद कर लें,क्या पता कोच शाहरूख,शिल्पा और प्रीति ने ही ज़्यादा कुछ सिखा दिया हो?

विज्ञापन के तरीकों और प्रस्तुति में भी भारी बदलाव आया और अगले विश्व कप तक बहुत कुछ बदलने वाला है,इस पर चर्चा अगले अंक में जारी रहेगी...
चतुर की चटाईः
बात विज्ञापन की हो रही है और आज चतुर भाई लाये हैं जानकारी पिछले विश्व कप के आयोजकों के बारे में, 1975 का पहला विश्व कप Prudential Plc. द्वारा प्रायोजित था और इसलिये प्रूडेंशियल कप कहलाया,बाद के विश्व कप ICC द्वारा कराये जाते रहे हालांकि कोई न कोई मुख्य प्रायोजक होता था,भारतीय उपमहाद्वीप मे आयोजित 1987 विश्व कप में अंबानी जी की Reliance प्रायोजक रही और उसके बाद के प्रायोजक LOGO से समझ आ जायेंगे.


यदि आप को लगता है कि क्रिकेट से संबधित नाच गाने वाले अल्बम भारत में ही बनते हैं तो ये देखिये बंग्लादेशी क्रिकेट प्रेमियों का जुनून भी किसी से कम नहीं,वैसे भी अब बंग्लादेश ही पहली और सबसे बङी चुनौती ( 2007 की पनौती) नज़र आ रहा है।




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