रविवार, 30 जनवरी 2011

To LoVe 2015: Corruption....कहीं तो विरोध करो.(.देखन में छोटन लगे).....4..रोहित

A poster from the Anti Corruption Commission.Image via Wikipedia
बदलता जमाना, उठता सवाल
आज तरक्की का दौर है। देश का हर हिस्सा इस में भागीदारी करने को तैयार है। जो हिस्से पीछे रहे हैं, वो आगे आना चाहते हैं...देश के कस्बे सिर उठा कर मंझोले शहरों को चुनौती दे रहे हैं। मंझोले शहर मेट्रो सिटीज़ से बिजनेस खींच रहे हैं। तरह-तरह के शोध हो रहे हैं....आगे बढ़ने की हर युवा में होड़ लगी हुई है....हर शख्स, हर शहर, हर कस्बा, हर गांव तरक्की की जद्दोजहद में लगा हुआ...इस बदलाव के दौर में एक सवाल हर जगह, हर मोड़ पर सिर उठा कर जवाब तलाश रहा है.....
क्या बढ़ता भष्टचार इस रफ्तार को रोक देगा?

हैरत होती है..
इस सवाल के जवाब में आने वाली हर आवाज़ निराशा से भरी लगती है। हैरत की बात ये है कि ये अवाज़ उस पीढ़ी, उस तबके की है जो चाहे तो डटकर इसका मुकाबला कर सकता है। क्या ये शर्म की बात नहीं है कि सिस्टम से लड़ने वाले आज तक इस देश में एकजुट नहीं हो पा रहे हैं।

बेढंगी चाल....परिवार का अजब व्यवहार
एक औऱ अजीब सी परिपाटी है इस लोकतंत्र में। आईएएस-आईपीएस बनते ही अधिकतर लोग अपने को आम लोगो से दो गुणा उंचा समझने लगता है....उससे भी ज्यादा उसके परिवार के लोग। पुरानी मसल है कि थानेदार से ज्यादा ताकतवर थानेदारनी होती है। कभी सोचा है कि सचिन तेंदुलकर जैसे असाधारण रुप से सफल खिलाड़ी के पैर जमीन पर टिके क्यों रहते हैं? दरअसल तेंदूलकर का परिवार उनके पैर को जमीन पर टिकाए रखता है। मगर उससे कोई सीख नहीं लेता। यहां उल्टा होता है....जब कोई गज़ेटेड अधिकारी बनता है, तो उस से ज्यादा उसके आसपास वाले चार गुणा ऊंचा  उड़ने लगते हैं। हालांकि इन पदों पर बैठे हर अधिकारी के बारे में ऐसा कहना, ये उसे बेईमान कहना सिरे से बेवकूफी होगी। 
पर क्या उस चोर की कहानी यहां फिर से दोहराने की जरुरत है, जो जज के सवाल पर कहता है कि उससे पहले उसकी मां को फांसी दी जाए, क्योंकि अगर वो बचपन में ही उसे रोक देती तो शायद वो इतना बड़ा अपराधी नहीं बनता। 
जब कोई सरकारी नौकर बेईमानी का धन लाता है, तो उसका परिवार मौन क्यों होता है? 

सरकारी-निजी क्षेत्र-कहां नहीं है भष्टाचार 
ऐसा नहीं है कि प्राइवेट कंपनियों में भ्रष्टाचार नहीं है। मेरी खुद की जानकारी में ऐसे कुछ मामले आ चुके हैं। नौकरी ढूढंने वाले लोगो ने बताया कि प्राइवेट जगहों जिन लोगो के हाथ में भर्ती का अधिकार है वो खुलकर पैसा मांगते हैं। यही काम कसंलटेंसी के नाम पर जायज तरीके से भी होता है। क्या ये किसी से छुपा हुआ है कि सरकारी या प्राइवेट, दोनो ही जगह पर खरीदारी विभाग से जु़ड़े लोग खुलकर बेईमानी करते हैं?

क्या फायदा ऐसे छापों का...अगर?
सरकारी अधिकारियों के घरों पर मारे गए छापों में मिली नगदी को अगर जल्द से जल्द बेरोजगार लोगो को कम ब्याज दर पर दिया जाएतो कई बेकार हाथ काम में लग सकते हैं....कई किसानों के कर्ज हाथ के हाथ माफ किए जा सकते हैंमगर ऐसी रकम को सरकारी खाते में जमा कर दिया जाता है..फिर बरसों बाद अदालती फैसले के बाद इसे किसी योजना में लगाया जाता है। उससे बेहतर है कि ये रकम तुरंत ही स्कूल बनाने या स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण में लगा दी जाए तो देश की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी। 

खुद से सवाल करो....कहीं तो विरोध करो
जहां हो सके खुलकर भ्रष्टाचार का विरोध करें। हो सकता है कि आज आपके विरोध का असर नहीं हो। पर रोज-ब-रोज होता विरोध भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार कर सकता है। अगर बिजली के मीटर जैसे मामलों में भी भ्रष्टाचार का विरोध शुरु हो जाए, तो भ्रष्टाचार में कमी आ सकती है।

आप खुद अपने दिल पर हाथ रखकर कहिए कि कितनी बार आपने भ्रष्टाचार का विरोध खुलकर किया है। खासकर तब जब भ्रष्टाचार का विरोध करने पर खुद को किसी तरह का नुकसान होता नहीं दिख रहा हो। आज लोग किसी भी काम को जल्दी कराने के चक्कर में हाथ के हाथ पैसा देने से बाज नहीं आते। लाइन में खड़े रहने में ऐसे लोगो को काफी कष्ट होता है। फिर यही लोग आकर सिस्टम को कोसते हैं। ये ठीक है कि हर बार आप सक्षम नहीं होते। पर जब कोई इस सिस्टम का विरोध करता है तो क्या आप उसका साथ देते हैं। नहीं न। फिर आपको इस सिस्टम को कोसने का क्या अधिकार है। (क्रमशः)
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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

To LoVe 2015: Corruption …. गणतंत्र-जनतंत्र.... देखन में छोटन लगे (3) रोहित


"देश ने गणतंत्र भी मना लिया..जनतंत्र के गण की शान भी देख ली...."
ये आज की युवा पीढ़ी के शब्द हैं जो सुने....ये गण शायद अंग्रेजी वाले गण के भाई-बंधु लगे उन्हें...पहली बार पता चला कि शब्द के रुप में भी कुछ वीरों के लिए गणतंत्र औऱ जनतंत्र  अलग-अलग है.....युवा तुर्कों के जिस झुंड से निकल कर ये शब्द मुझसे टकराए...उसमें सिर्फ शहरी बालक वीर नहीं थे, देश के कुछ और राज्यों के कस्बे औऱ गांवो का प्रतिनिधित्व भी था....उस झुंड के पास खड़े होना मजेदार भी था और त्रासद भी ...जिन्हें गणतंत्र का शाब्दिक अर्थ ही नहीं मालूम.....वे मिलकर जनतंत्र की व्याख्या कर रहे थे...काश आदिदेव महादेव के गण के बारे में भी  ये लोग पढ़ लेते बचपन में तो शायद काफी कुछ वैसे ही जान लेते....बावजूद तुर्रा ये कि देश में फैले भष्टाचार का एक ही हल है इनके पास कि हर भष्टाचारी को पकड़कर फांसी दे दो....गोली मार दो...मगर ऐसा कहने वालों की बात में एक बात छिपी होती है.....वो ये कि फांसी जिसे देनी हो..जिसे गोली मारनी हो...वो इनके परिवार का न हो...यानि की देश पर शहीद होने का नारा देते ये मिल जाएंगे पर शर्त ये कि....शहीद होने वालों की कतार में बच्चे पड़ोसी के हों...ठीक उसी तर्ज पर कि हमारे घर की नारी तो पर्दे में रहे...पर पड़ोसी की बेटी-बहू को बेपर्द देखने को मिल जाए तो कहने की क्या....
आइए जरा पीछे चलते हैं...ज्यादा नहीं....सिर्फ बीस साल पीछे...नब्बे का दशक था.....देश तेजी से करवट बदल रहा था....यही वो समय था..जब ईमानदारी को धकेलते हुए बेईमानी अपने सबाब पर आने लगी थी। वो भष्टाचार जिसके बीज 1200 पहले जमीं के अंदर गढ़ने शुरु हुए थे और साढ़े तीन सौ साल पहले जिसकी नींव मजबूत हुई थी....वो भष्टाचार जो सत्तर के दशक के शुरुआत में ये अहसास देने लगा था कि परदे के पीछे असली ताकत वो है...नब्बे के दशक में यही ताकत ईमानदारी के चोले को पूरी तरह से उतार कर इतनी तेजी से बढ़ने लगी कि लोग पहले तो उसकी चमक में खो गए....फिर इक्कसवीं सदी में लोगो को होश आया.....पता चला कि देश की अस्सी फीसदी जनता तो बीस रुपये में ही गुजारा करती है...यानि उनके एक वक्त के सिगरेट के खर्चे में..पूरे दिन के नहीं..महज एक वक्त के सिगरेट के खर्च में एक हमवतन को पूरे दिन के पेट की भूख का इंतजाम करना पड़ता है....साथ ही ये भी पता चलता है कि इसी भष्टाचार कि मुंडेर पकड़कर एक तिहाई देश पर हत्यारों की टोली नक्सली काबिज हो चुके हैं.....यानि अस्सी फीसदी लोगो की दौलत सिमट कर बीस फीसदी लोगों के पास है....औऱ इस बीस फीसदी में भी दो-चार फीसदी ही हैं जो सब पर काबिज हैं...
सवाल ये है कि जब हम जानते हैं तो इस पर अंकुश क्यों नहीं लगा पाते.....लगता है कि हम लड़ना भूल गए हैं.....दरअसल ये समस्या नीचे से उपर की तरफ तेजी से फैली है....इसलिए उपरी सफाई से कुछ होने वाला नहीं है....जड़ हमेशा नीचे ही होती है..इस भष्टाचार की जड़ भी नीचे ही है..यानि कि समाज की छोटी ईकाई परिवार में ही...
आजकल कम ही ऐसा होता है कि आज की पीढ़ी का कोई शख्स परिवार में भष्टाचार से आए किसी तरह के पैसे के खिलाफ आवाज उठाता है....'''''थोड़ा बहुत चलता है.''''''''की मानसिकता ने हर किसी को लगता है जकड़ रखा है.....ये वो मानसिकता रुपी दीमक है जो स्वस्थ्य समाज की नींव में पड़ चुका है.....जो अब परिवार रुपी संस्था को खोखला करता जा रहा है....।
अब इन्हीं परिवार से समाज बना है....वो समाज जो समाज जानता है कि अमुक शख्स बेईमान है..फिर भी उसी को चुन लेता है....फिर यही नेता आगे जाकर समा़ज के लिए बने तंत्र में जुड़ता हैं.....उसकी अगुवाई करता है...उस तंत्र में जो जाने कब से खोखला होता जा रहा है.....वो तंत्र  जिसमें ईमानदारी को नासिक के पास मनमाड में पेट्रोल छिड़कर जला दिया जाता है.....यूपी के लखीमपुर खीरी में गोली मार दी जाती है.....(क्रमशः)
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शनिवार, 22 जनवरी 2011

To LoVe 2015: corruption- देखन में छोटन लगे- 2....रोहित

समस्या है..कारण है..हल भी है..

भष्टाचार से लड़ने की बात अक्सर होती है...पर सवाल उठता है कि आखिर कारगर कार्रवाई क्यों नहीं होती? शारीरिक बीमारी का तोड़ ढूंढने के लिए पहले बीमारी के कारणों को ढूंढा जाता है, फिर उसके रोकथाम के उपाय ढूंढे जाते हैं। मगर भ्रष्टाचार के मामलों में सबकुछ उल्टा है। सबको भ्रष्टाचारण का कारण पता है...उपाय भी मालूम हैं। फिर भी भ्रष्टायार की बीमारी काबू के बाहर होती जा रही है। इसके लिए समाज कम दोषी नहीं। सब जानते हैं कि ऐसे लोग जो सरकारी नौकरी ज्वाइन  करते वक्त कंगाल होते हैं...कुछ साल बाद ही कैसे करोड़पति हो जाते हैं..आखिर ऐसे लोगो के खिलाफ तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं होती? आखिर कितने सबूत की जरुरत होती है? सरकारी नौकरी करने वाले राजपत्रित अधिकारियों यानि गजेटेड ऑफिसर के घर में करोड़ों रुपये मिलते हैं.. पैसा ईमानदारी या टैक्स चोरी का होगा तो उसका हिसाब चंद दिनों में दिया जा सकता है, पर सालों बाद भी ये लोग हिसाब ही देते रहते हैं आखिर क्यों? क्यों नहीं तत्काल इन लोगो को सजा होती है।
      कई लोग ऐसे होते हैं..जो जब सरकारी नौकरी ज्वाइन करते हैं..उनके माता-पिता  बच्चों की खातिर अपनी सारी जवानी और पूंजी खपा चुके होते हैं..कुछ किस्मत वाले होते हैं तो बुढ़ापे में रिटारयमेंट के पैसों से अपने सिर पर छत का इंतजाम कर पाते हैं....पर कई को ये भी नसीब नहीं होता...मगर ऐसे ही लोगो के पोते-पोती, ..नाती-नाति..जन्म लेने के चंद साल बाद ही कई घरों के मालिक कैसे हो जाते हैं? कई बच्चों को विरासत में कुछ रुपयों का फिक्स डिपॉजिट तो मिलना आम है. पर वो इतनी  रकम नहीं होती जिससे बालिग होते-होते ये बच्चे लाखों-करोड़ों के घरों का मालिक हो जाएं..पर अक्सर ऐसा होता है। ये बच्चे आसानी से महंगी से महंगी तालिम हासिल कर लेते हैं,..पर हजारों बच्चे स्कूल की शक्ल देखने के लिए तरस जाते हैं। आखिर कैसे कोई इतना धन कमा लेता है दस-बारह साल की सरकारी नौकरी में? ये ठीक है कि हर सरकारी कर्मचारी बेईमान नहीं होता 
   पर सवाल ये है कि धिकतर के घर में उनकी आय़ से ज्यादा खर्च कहां से आता है ये सब खुलेआम होता है सबकी नजरों के सामने होता है...पर कार्रवाई के नाम पर ठन-ठन गोपाल। होती भी है तो सजा में इतनी देर होती है कि  भष्ट व्यक्ति अपनी जिंदगी जी चुका होता है ..कईयों की बर्बाद करके दरअसल सिस्टम में लगे ये जोंक मिलकर उसे इतना खोखला बनाते जा रहे हैं कि एक बड़ा झटका संभाल पाना मुहाल होता जा रहा है। मंदी के दौर में देश को छोटी-छोटी बचत योजनाओं में लगी रकम ने ही बचाया था। पर कलमाडी, राजा जैसे बड़े घोटालेबाजों की तुलना में ये छो़टे-छोटे भष्टाचार के राक्षस कम खतरनाक नहीं। देश का आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उसी से जूझता है...
     इस सिस्टम का काम आम आदमी की ज़िंदगी को आसान बनाने का है..पर होता उलटा है..इस सिस्टम के लोग उसकी रोजमर्रा की ज़िंदगी को दुश्वार बना देते हैं। बिजली के कनेक्शन से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस जैसी मामूली चीजें भी इतनी मुश्किल हैं हमारे यहां, ..लगता हैजैसे आदमी कोई जंग लड़ रहा हो। जरा सा इनका विरोध होता नहीं, ..कि पुलिस और नागरिक प्रशासन मिलकर आम आदमी की ज़िंदगी की ऐसी-तैसी कर देते हैं। ऐसे में  बेचारा रिश्वत देने में ही भलाई समझने लगता है। 
  दिल्ली के ही एक सरकारी विभाग की तरफ से मुकदमा लड़ते हुए उसके वकील ही उच्च या उच्चतम अदालत में एक सुनवाई के दौरान मान चुके हैं कि वो जिस विभाग का मुकदमा लड़ रहे हैं वो विभाग दुनिया के सबसे ज्यादा भष्टतम विभागों में से एक है..शायद तीसरा सबसे बड़ा भष्ट विभाग।
    भष्टाचार की ये गंगा उपर से नीचे नहीं आई है...ये गंगा नीचे से उपर की तरफ बहना शुरु हुई थी...और अब इसका नियत्रण उपर से होने लगा है। जाहिर है कि इसकी सफाई भी नीचे से करनी होगी। (क्रमशः)
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मंगलवार, 18 जनवरी 2011

To LoVe 2015: देखन में छोटन लगे (1).......Rohit

एक पुरानी कहावत है कि देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर....या किसी चंट को देखकर लोग कहते हैं कि ये जितना उपर है उससे कहीं ज्यादा नीचे है। ये हाल आजकल भष्टाचार का है। पिछले कुछ महीनों से देश में भष्टाचार की ऐसी खबरें छाई हुई हैं, जिनमें एक से एक दिग्गज फंसते जा रहे हैं।। ये देखकर लोग परेशां भी हैं, और हैरान भी हो रहे हैं। आलम ये है कि SMS में आजकल एक चुटकुला सवाल की तरह पेश किया जा रहा है... 10 कलमाडी(CWG)=1 राजा(2G), 10 राजा=एक पवार(LAVASA).....इन सब मामलों में एक समानता है कि भष्टाचार के इन मामलों में फंसे लोग नेता होने की वजह से लगातार निगाह में हैं, इसलिए दिखावे के लिए ही सही भष्टाचार पर कार्रवाई होती है। सरकार पर दवाब रहता है। किसी नेता को कुर्सी छोड़नी पड़ती है, तो किसी का अगले चुनाव का टिकट संकट में पड़ जाता है। कभी-कभी किसी सियासी नेता का राजनीतिक या सावर्जनिक जीवन खत्म हो जाता है। पिछले साल ही राजा को कुर्सी छोड़नी पड़ी, तो उससे पहले नब्बे के दशक में चार करोड़ नगदी की बरामदगी के बाद सुखराम का राजनीतिक जीवन ज्यादा लंबा नहीं चल सका। बंगारु लक्ष्मण को बीजेपी ने किनारे कर दिया। 
     भ्रष्टाचार में लिप्त नेता टिका भी रहना चाहे, तो जनता के पास 5 साल में एक मौका होता है कि वो इन्हें हाशिए पर डाल दे। ये बात अलग है कि अमूमन जनता ऐसे लोगो को सत्ता में दोबारा भेज देती है, लेकिन जहां जनता जागरुक है वहां इन नेताओं का बोरिया बिस्तर गोल हो जाता है। इस तरह अगर जनता चाहे तो राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकती है। 
    अब जरा इससे  इतर बात कीजिए सरकारी अधिकारियों की। कल ही मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर में लोकायुक्त की टीम एक इंजीनियर के घर छापा मारती है...मिलते हैं 5 करोड़ नगद, आठ किलो सोना...वो भी एक ही दिन के छापे में....जबकि लॉकर खोले जाने अभी बाकी हैं। महज पंद्रह महीने में इन इंजीनियर बाबू ने इतनी नगदी बटोर ली, या फिर शुरुआती दौर से ही ये भष्टाचार की गंगा बहाने में लगे हुए थे।  इसका पता अभी नहीं चल सका है। पिछले साल फरवरी में ही भोपाल में जोशी आईएस दंपत्ति के घर छापे में करोड़ों रुपये मिले थे। मंगलवार को एक रिपोर्ट के अनुसार ये दंपत्ति साढ़े तीन अरब रुपये से ज्यादा कि संपत्ति के मालिक है। खबर के अनुसार सिर्फ इन दंपत्ति की आईसीआईसी की बीमा पॉलिसी का सालाना प्रीमियम ही साढ़े तीन करोड़ रुपये से ज्यादा का है। अगस्त में राजस्थान को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन के उपमहाप्रबंधक के यहां से एक करोड़ से ज्यादा की नगदी बरामदी हुई थी। वहीं लेट्रिन के कमोड से भी करोड़ों रुपये बरामद किए गए हैं। क्या बिस्तर....क्या सोफा....क्या गद्दे...यानि जहां हाथ डालो, वहां नगद रुपया बरामद। इनके अलावा संपत्ति और जेवर की गिनती अलग। अधिकतर नोट ऐसे, जिन्हें देखकर साफ पता चलता है कि इन नोटों को बरसों से दिन का उजाला नसीब नहीं हुआ है..यानि पीले पड़े नोट। राजधानी दिल्ली के नगर निगम में ऐसे एक बाबू पकड़े गए थे, जिनका कहते हैं कि दिल्ली की हर कॉलोनी में घर था। यानि मान लीजिए आज की तारिख में वो सरकारी बाबू कई अरब रुपये की संपत्ति के मालिक हैं।
      दरअसल यही प्रशासनिक अधिकारी मेरी नज़र में चिंता के असली कारण हैं। देश को चलाने वाले नेता आते हैं, निपट जाते हैं....पर ये प्रशासनिक अधिकारी, जो सालो तक सिस्टम का हिस्सा बने रहते हैं..वो सिस्टम को दीमक की तरह धीरे-धीरे खून चूसते रहते हैं। जबतक जनता को पता चलता है, तबतक ये दीमक रुपी अधिकारी इतना मोटा और ताकतवर हो जाता है कि आम लोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। ऐसे अधिकारियों पर छापा डाले जाने की खबर अक्सर आती है। पर इन्हें सज़ा होते-होते इतना समय निकल जाता है कि लोग उनको भूल जाते हैं। देश को चलाने का जो सिस्टम है, उसमें जुड़े सरकारी बाबू और अधिकारी इतनी असानी से नियमों में जरा सा फेरबदल कर इतना कमा लेते हैं कि उनकी सात पुश्तों को कमाने की जरुरत नहीं रहती। बावजूद इसके ये भष्टाचार की गंगा मे डूबकी लगाते रहते हैं। बड़े-बड़े घोटालों के बीच लोग इन्हें भूल जाते हैं। पर देखने में छोटे लगने वाले ये घोटाले अंदर ही अंदर देश को खोखला करते जा रहे हैं।
    अब जरा उन किसानों की तरफ नजर दौड़ाईए, जिन्हें महज चंद हजार रुपयों के लिए अपनी जान देनी पड़ रही है?  चंद रुपयों के लिए न चाहते हुए भी बेरोजगार अपराध के रास्ते पर चलने लगते हैं। यहां मुझे प्रकाश झा कि फिल्म अपहरण कि बरबस ही याद आ जाती है। क्या हम कुछ नहीं कर सकते? क्या हम यूं ही हाथ पर हाथ डाले बैठे रहें.?.........(क्रमशः)
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गुरुवार, 13 जनवरी 2011

उनको ये शिकायत है

उनको ये शिकायत है.. मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,
और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.'

'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ??
मैं इसलिए औरों की.. बुराई पे नही लिखता.'

'कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,
ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.'

'दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात?? कि मैं कुछ अपनी.. सफ़ाई पे नही लिखता.'

'शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़.. मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की.. कमाई पे नही लिखता.'

'उसकी ताक़त का नशा.. "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!
मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता.'

'समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!!
मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी.. गहराई पे नही लिखता.'

'पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ ,
ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.'

'तजुर्बा तेरी मोहब्बत का'.. ना लिखने की वजह बस ये!!
क़ि 'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नही लिखता'
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मुझे अफ़सोस है की में इस ग़ज़ल के लेखक को नहीं जानता
पर मुझे अच्छी लगी उम्मीद है आपको भी अच्छी लगेगी
एम् एल गुर्जर/a>
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क्या करे गुर्जर ?

गलत सरकारी नीतियों के कारण पशुपालन और कृषि से किसानो का मोहभंग हो रहा है, कई किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं, इस देश में किसी ने नहीं सुना होगा की कोई कम्पनी मालिक या अधिकारी आर्थिक नुकसान या मोसम की मार से मरा हो पर इस देश के अन्नदाता किसान के बारे में ये खबरें आज आम हैं, आज नोकरी में जो पैसा एक माह में कमाया जा सकता है वो किसान 6 माह में भी किसान नहीं कम सकता, इन हालत में अगर गुर्जरों जेसी जाती आरक्षण की मांग कर नोकरी करना चाहती है तो क्या बुरा है, रही रेल की पटरी पर बेठने की तो कोई ये बता दे की सरकार से किसी ने कोई भी मांग की हो और सरकार ने उसे मान ली हो, शायद नहीं आज की तारीख में सरकारों का ये रंवेया हो गया है की जब तक सड़क पर नहीं उतरो कोई सुनवाई नहीं होती, में जन आन्दोलनों से पिछले २० सालों से जुडा हुआ हूँ, और मेरा अनुभव है की कोई भी संगठन या जाती अपने मजे के लिए सडक पर नहीं बैठती है, आलोचना करने वालो को जिन्दगी की हकीकत से भी वास्ता रखना चहिए,/a>
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दो नाक वाले लोग

मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो।

पर वे बुजुर्ग कह रहे थे- आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट जाएगी।

नाक उनकी काफी लंबी थी। मेरा ख्याल है, नाक की हिफाजत सबसे ज्यादा इसी देश में होती है। और या तो नाक बहुत नर्म होती है या छुरा बहुत तेज, जिससे छोटी सी बात से भी नाक कट जाती है। छोटे आदमी की नाक बहुत नाजुक होती है। यह छोटा आदमी नाक को छिपाकर क्यों नहीं रखता?

कुछ बड़े आदमी, जिनकी हैसियत है, इस्पात की नाक लगवा लेते हैं और चमड़े का रंग चढ़वा लेते हैं। कालाबाजार में जेल हो आए हैं औरत खुलेआम दूसरे के साथ ‘बाक्स’ में सिनेमा देखती है, लड़की का सार्वजनिक गर्भपात हो चुका है। लोग उस्तरा लिए नाक काटने को घूम रहे हैं। मगर काटें कैसे? नाक तो स्टील की है। चेहरे पर पहले जैसी ही फिट है और शोभा बढ़ा रही है।

स्मगलिंग में पकड़े गये हैं। हथकड़ी पड़ी है। बाजार में से ले जाये जा रहे हैं। लोग नाक काटने को उत्सुक हैं। पर वे नाक को तिजोड़ी मे रखकर स्मगलिंग करने गये थे। पुलिस को खिला-पिलाकर बरी होकर लौटेंगे और फिर नाक पहन लेंगे।

जो बहुत होशियार हैं, वे नाक को तलवे में रखते हैं। तुम सारे शरीर में ढूंढ़ो, नाक ही नहीं मिलती। नातिन की उम्र की दो लड़कियों से बलात्कार कर चुके हैं। जालसाजी और बैंक को धोखा देने में पकड़े जा चुके हैं। लोग नाक काटने को उतावले हैं, पर नाक मिलती ही नहीं। वह तो तलवे में है। कोई जीवशास्त्री अगर नाक की तलाश भी कर दे तो तलवे की नाक काटने से क्या होता है? नाक तो चेहरे पर की कटे, तो कुछ मतलब होता है।

और जो लोग नाक रखते ही नहीं हैं, उन्हें तो कोई डर ही नहीं है। दो छेद हैं, जिनसे सांस ले लेते हैं।

कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढि़या लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं हैं। जब खुशबू कम होने लगती है, ये फिर कलम करा लेते हैं, जैसे किसी औरत को छेड़ दिया और जूते खा गये।

‘जूते खा गये’ अजब मुहावरा है। जूते तो मारे जाते हैं। वे खाये कैसे जाते हैं? मगर भारतवासी इतना भुखमरा है कि जूते भी खा जाता है।

नाक और तरह से भी बढ़ती है। एक दिन एक सज्जन आये। बड़े दुखी थे। कहने लगे- हमारी तो नाक कट गयी। लड़की ने भागकर एक विजातीय से शादी कर ली। हम ब्राह्मण और लड़का कलाल! नाक कट गयी।

मैंने उन्हें समझाया कि कटी नहीं है, कलम हुई है। तीन-चार महीनों में और लंबी बढ़ जाएगी।

तीन-चार महीने बाद वे मिले तो खुश थे। नाक भी पहले से लंबी हो गयी थी। मैंने कहा- नाक तो पहले से लंबी मालूम होती है।

वे बोले- हां, कुछ बढ़ गयी है। काफी लोग कहते हैं, आपने बड़ा क्रांतिकारी काम किया। कुछ बिरादरी वाले भी कहते हैं। इसलिए नाक बढ़ गयी है।

कुछ लोग मैंने देखे हैं जो कई साल अपने शहर की नाक रहे हैं। उनकी नाक अगर कट जाए तो सारे शहर की नाक कट जाती है। अगर उन्हें संसद का टिकिट न मिले, तो सारा शहर नकटा हो जाता है। पर अभी मैं एक शहर गया तो लोगों ने पूछा- फलां साहब के क्या हाल हैं? वे इस शहर की नाक हैं। तभी एक मसखरे ने कहा- हां साहब, वे अभी भी शहर की नाक हैं, मगर छिनकी हुई।(यह वीभ्त्स रस है। रस सिद्धांत प्रेमियों को अच्छा लगेगा।)

मगर बात मैं उन सज्जन की कर रहा था जो मेरे सामने बैठे थे और लड़की की शादी पुराने ठाठ से ही करना चाहते थे। पहले वे रईस थे- याने मध्यम हैसियत के रईस। अब गरीब थे। बिगड़ा रईस और बिगड़ा घोड़ा एक तरह के होते हैं- दोनों बौखला जाते हैं। किससे उधार लेकर खा जाएं, ठिकाना नहीं। उधर बिगड़ा घोड़ा किसे कुचल दे, ठिकाना नहीं। आदमी को बिगड़े रईस और बिगड़े घोड़े, दोनों से दूर रहना चाहिए। मैं भरसक कोशिश करता हूं। मैं तो मस्ती से डोलते आते सांड को देखकर भी सड़क के किनारे की इमारत के बरामदे में चढ़ जाता हूं- बड़े भाईसाहब आ रहे हैं। इनका आदर करना चाहिए।

तो जो भूतपूर्व संपन्न बुजुर्ग मेरे सामने बैठे थे, वे प्रगतिशील थे। लड़की का अन्तरजातीय विवाह कर रहे थे। वे खत्री और लड़का शुद्ध कान्यकुब्ज। वे खुशी से शादी कर रहे थे। पर उसमें विरोधाभास यह था कि शादी ठाठ से करना चाहते थे। बहुत लोग एक परंपरा से छुटकारा पा लेते हैं, पर दूसरी से बंधे रहते हैं। रात को शराब की पार्टी से किसी ईसाई दोस्त के घर आ रहे हैं, मगर रास्ते में हनुमान का मंदिर दिख जाए तो थोड़ा तिलक भी सिंदूर का लगा लेंगे। मेरा एक घोर नास्तिक मित्र था। हम घूमने निकलते तो रास्ते में मंदिर देखकर वे कह उठते- हरे राम! बाद में पछताते भी थे।

तो मैं उन बुजुर्ग को समझा रहा था- आपके पास रुपये हैं नहीं। आप कर्ज लेकर शादी का ठाठ बनायेंगे। पर कर्ज चुकायेंगे कहां से? जब आपने इतना नया कदम उठाया है, कि अन्तरजातीय विवाह कर रहे हैं, तो विवाह भी नये ढंग से कीजिए। लड़का कान्यकुबज का है। बिरादरी में शादी करता तो कई हजार उसे मिलते। लड़के शादी के बाजार में मवेशी की तरह बिकते हैं। अच्छा मालवी बैल और हरयाणा की भैंस ऊंची कीमत पर बिकती हैं। लड़का इतना त्याग तो लड़की के प्रेम के लिए कर चुका। फिर भी वह कहता है- अदालत जाकर शादी कर लेते हैं। बाद में एक पार्टी कर देंगे। आप आर्य-समाजी हैं। घण्टे भर में रास्ते में आर्यसमाज मंदिर में वैदिक रीति से शादी कर डालिए। फिर तीन-चार सौ रुपयों की एक पार्टी दे डालिए। लड़के को एक पैसा भी नहीं चाहिए। लड़की के कपड़े वगैरह मिलाकर शादी हजार में हो जाएगी।

वे कहने लगे- बात आप ठीक कहते हैं। मगर रिश्तेदारों को तो बुलाना ही पड़ेगा। फिर जब वे आयेंगे तो इज्जत के ख्याल से सजावट, खाना, भेंट वगैरह देनी होगी।

मैंने कहा- आपका यहां तो कोई रिश्तेदार है नहीं। वे हैं कहां?

उन्होंने जवाब दिया- वे पंजाब में हैं। पटियाला में ही तीन करीबी रिश्तेदार हैं। कुछ दिल्ली में हैं। आगरा में हैं।

मैंने कहा- जब पटियाला वाले के पास आपका निमंत्रण-पत्र पहुचेगा, तो पहले तो वह आपको दस गालियां देगा- मई का यह मौसम, इतनी गर्मी। लोग तड़ातड़ लू से मर रहे हैं। ऐसे में इतना खर्च लगाकर जबलपुर जाओ। कोई बीमार हो जाए तो और मुसीबत। पटियाला या दिल्ली वाला आपका निमंत्रण पाकर खुश नहीं दुखी होगा। निमंत्रण-पत्र न मिला तो वह खुश होगा और बाद में बात बनायेगा। कहेगा- आजकल जी, डाक की इतनी गड़बड़ी हो गयी है कि निमंत्रण पत्र ही नहीं मिला। वरना ऐसा हो सकता था कि हम ना आते।

मैंने फिर कहा- मैं आपसे कहता हूं कि दूर से रिश्तेदार का निमंत्रण पत्र मुझे मिलता है, तो मैं घबरा उठता हूं।

सोचता हूं- जो ब्राह्मण ग्यारह रुपये में शनि को उतार दे, पच्चीस रुपयों में सगोत्र विवाह करा दे, मंगली लड़की का मंगल पंद्रह रुपयों में उठाकर शुक्र के दायरे में फेंक दे, वह लग्न सितंबर से लेकर मार्च तक सीमित क्यों नहीं कर देता ? मई और जून की भयंकर गर्मी की लग्नें गोल क्यों नहीं कर देता ? वह कर सकता है। और फिर ईसाई और मुसलमानों में जब बिना लग्न शादी होती है, तो क्या वर-वधू मर जाते हैं ? आठ प्रकार के विवाहों में जो ‘गंधर्व विवाह’ है वह क्या है ? वह यही शादी है जो आज होने लगा है, कि लड़का-लड़की भागकर कहीं शादी कर लेते हैं। इधर लड़की का बाप गुस्से में पुलिस में रिपोर्ट करता है कि अमुक लड़का हमारी ‘नाबालिग’ लड़की को भगा ले गया है। मगर कुछ नहीं होता; क्योंकि लड़की मैट्रिक का सर्टिफिकेट साथ ले जाती है जिसमें जन्म-तारीख होती है।

वे कहने लगे- नहीं जी, रिश्तेदारों में नाक कट जाएगी।

मैंने कहा- पटियाला से इतना किराया लगाकर नाक काटने इधर कोई नहीं आयेगा। फिर पटियाला में कटी नाक को कौन इधर देखेगा। काट लें पटियाला में।

वे थोड़ी देर गुमसुम बैठे रहे।

मैंने कहा- देखिए जी, आप चाहें तो मैं पुरोहित हो जाता हूं और घण्टे भर में शादी करा देता हूं।

वे चौंके। कहने लगे- आपको शादी कराने की विधि आती है ?

मैंने कहा- हां, ब्राह्मण का बेटा हूं। बुजुर्गों ने सोचा होगा कि लड़का नालायक निकल जाए और किसी काम-धन्धे के लायक न रहे, तो इसे कम से कम सत्यनारायण की कथा और विवाह विधि सिखा दो। ये मैं बचपन में ही सीख गया था।

मैंने आगे कहा- और बात यह है कि आजकल कौन संस्कृत समझता है। और पण्डित क्या कह रहा है, इसे भी कौन सुनता है। वे तो ‘अम’ और ‘अह’ इतना ही जानते हैं। मैं इस तरह मंगल-श्लोक पढ़ दूं तो भी कोई ध्यान नहीं देगा-

ओम जेक एण्ड विल वेंट अप दी हिल टु फेच ए पेल ऑफ वाटरम,

ओम जेक फैल डाउन एण्ड ब्रोक हिज क्राउन एण्ड जिल केम ट्रम्बलिंग

आफ्टर कुर्यात् सदा मंगलम्........इसे लोग वैदिक मंत्र समझेंगे।

वे हंसने लगे।

मैंने कहा- लड़का उत्तर प्रदेश का कान्यकुब्ज और आप पंजाब के खत्री- एक दूसरे के रिश्तेदारों को कोई नहीं जानता। आप एक सलाह मेरी मानिए। इससे कम में भी निपट जाएगा और नाक भी कटने से बच जाएगी। लड़के के पिता की मृत्यु हो चुकी है। आप घण्टे भर में शादी करवा दीजिए। फिर रिश्तेदारों को चिट्ठियां लिखिए- ‘इधर लड़के के पिता को दिल का तेज दौरा पड़ा। डाक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी। दो-तीन घंटे वे किसी तरह जी सकते थे। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि मृत्यु के पहले ही लड़के की शादी हो जाए तो मेरी आत्मा को शान्ति मिल जाएगी। लिहाजा उनकी भावना को देखते हुए हमने फौरन शादी कर दी। लड़का-लड़की वर-वधू के रूप में उनके सामने आये। उनसे चरणों पर सिर रखे। उन्होंने इतना ही कहा- सुखी रहो। और उनके प्राण-पखेरू उड़ गये। आप माफ करेंगे कि इसी मजबूरी के कारण हम आपको शादी में नहीं बुला सके। कौन जानता है आपके रिश्तेदारों में कि लडंके के पिता की मृत्यु कब हुई ?

उन्होंने सोचा। फिर बोले- तरकीब ठीक है ! पर इस तरह की धोखाधड़ी मुझे पसंद नहीं।

खैर मैं उन्हें काम का आदमी लगा नहीं।

दूसरे दिन मुझे बाहर जाना पड़ा। दो-तीन महीने बाद लौटा तो लोगों ने बताया कि उन्होंने सामान और नकद लेकर शादी कर डाली।

तीन-चार दिन बाद से ही साहूकार सवेरे से तकादा करने आने लगे।

रोज उनकी नाक थोड़ी-थोड़ी कटने लगी।

मैंने पूछा- अब क्या हाल हैं ?

लोग बोले- अब साहूकार आते हैं तो यह देखकर निराश लौट जाते हैं कि काटने को नाक ही नहीं बची।

मैंने मजाक में कहा- साहूकारों से कह दो कि इनकी दूसरी नाक पटियाला में पूरी रखी है। वहां जाकर काट लो।


लेखक - हरिशंकर परसाई
विकिपीडिया से साभार


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मंगलवार, 11 जनवरी 2011

To LoVe 2015: Onion Maharaj…. आ गए-आ गए...प्रभु ने सुन ली...

कमाल हो गया, मेरी आपसब के साथ मिलकर की गई एक प्रार्थना ऊपर वाले ने जल्दी ही सुन ली। सो अपन भी जल्द से नमुदार हो गए ब्लॉग पर....पक्की खबर है कि प्याज महाराज सर्वसुलभ होने की राह में चल पड़े हैं। हड़ताल फड़ताल (हड़ताल की तरह ही उसका एक भाई, अथवा बहन अथवा जो भी है, है पर रिश्तेदार) तो नकली  रोड़े हैं जो लाठी पड़ते ही भग लेंगे। सो चिंता मति करो.....ज्यादा....वैसे प्याज महाराज ने सभी साथियों को काफी तंग किया है। इतना कि पूछो मत। प्याज महाश्य के कारण बिगड़े हालात का सपना हम देख रहे थे, औऱ सपने का रुदन इतना था कि वो बिरादर लोगो तक को सुनाई दे रहा था...बस जंग होने ही वाली थी। देश भर के..निरीह पति दर-दर भटकने वाले थे..बेचारे पतियों के हाथ लगने वाले प्याज पर दिल्ली के बहादुर बाइकर्स की नज़रें टिकी थी..बाइकर्स बैंक छोड़कर इन बेचारे पतियों की निगरानी करने वाले थे।
   हाल तो इतने बुरे होने लगे थे कि दोस्तों को लगने लगा कि प्याज अपुन को सात्विक होने से रोक रहा है। जबकि हकीकत में किसी को पता ही नहीं है कि मैं तो कई जन्मों से सात्विक हूं....अपन से ज्यादा कोई सात्विक है भी नहीं...अपन तो इतने सात्विक हैं कि प्याज खाने के बाद भी तामसिक विचार अपुन को तंग नहीं करता। हमें मर्द, मर्द ही दिखता है और औरत, औऱत ही।(धारा 377, या 370 हीहीहीहीही)
   वैसे भी शास्त्रों में कहा गया है.....वैज्ञानिकों ने भी शोध करके बताया है कि भले ही प्याज खाने से शरीर गर्म होता होविचारों में उग्रता आती हैमगर संतों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ता। जाहिर है कि अपुन पर भी नहीं पड़ेगा...पर अपना मसला थोड़ा हट कर भी है। (अब मेरे को हटा हुआ नहीं समझ लेना) मेरे अंदर इतने सात्विक-तामसिक विचारों का जमघट है कि पूछो मत। जब सात्विकता कहीं घूमने जाती है, तो तामसिकता बाहर आ जाती है। अपन भी नहीं रोकते इन ससुरों को.जिन विचारों को दबाया जाता है वो बहुत ही ऊर्जा के साथ विस्फोट करके सामने आते हैं....इसलिए हम समय-समय पर सात्विकता को भजन गाने के लिए भेज देते हैं औऱ तामसी विचारों को बाहर आने का मौका देते हैं.... क्योंकि हमें पता है कि तामसी विचारों का हम जैसे महान व्यक्तियों पर असर नहीं पड़ता है...(हीहीहीहीही) उसपर अपुन भारतीय हैं....विचारों को दबाते नहीं हैं....उन्हें काबू में कर लेते हैं। उन्हें विचरने देते हैं, फिर जब वो विचार आपे से बाहर होने लगते हैं तो उन्हें जकड़ लेते हैं। अब ये अलग बात है कि कई बार जकड़न-पकड़न के चक्कर में विचार बेकाबू हो जाते हैं....ठीक उस तरह जैसे हम हालात को बेकाबू होने का मौका दे देते हैं। 
   अब प्याज महाराज की बात ही ले लीजिए। प्याज महाराज की फसल बर्बाद होने से अवाक कम हो गई, तो उनके नखरे तो बढ़ने ही थे...पर वहीं पर देश के खेती बाड़ी, हल कुदाल मंत्री खम ठोक कर मैदान में कूद गए। उन्होंने कह दिया की आने वाले कुछ महीने में दाम काबू में आ जाएंगे यानि पूरे एक-दो महीने बाद। बस उनके विचार एक बार बाहर आए....कि प्याज महाराज को माशूका समझ गोदाम में कैद करने वाले आशिकों की बहार आ गई। उधर प्याज महाराज को न देखकर मध्यमवर्ग का रुदन बढ़ने लगा। जमाखोर भाई प्याज महाराज से शतक लगवाने की तैयारी में जुट गए। पर वो तो भला हो हम सब का जो मेरी पिछली पोस्ट  पर हमने मिलकर प्रार्थना कर ली थी....औऱ वो स्वीकार हो गई। प्याज सर्वसुलभ होने की राह पर चल दिया है।
   पर जरा ठहरिए-ठहिरए। अभी से कीमा-कबाब, मटन ते उसदे नाल शटन, पकौड़े-सकौड़े की मत सोचिए। जमाखोरो के चाहने के बाद भी प्याज महाराज ने भले ही शतक नहीं ठोका हो...नर्वस नाइंटीज का शिकार हो गए हों...पर इसका खामियाजा तो हमें चुकाना होगा...पंद्रह रुपये किलों से उपर चढ़े प्याज महाराज को वापस उसी जगह पहुंचने नहीं देने वाले प्याज के आशिक लोग। सरकार भी नहीं, उसकी एंजेसियां भी नहीं। सरकार ने ऐलान कर ऱखा है कि वो 35 रुपये किलो प्याज बेचेंगे...तो प्याज महाराज की कीमत मान लीजिए 25 रुपये से तो नीचे आने से रही। सीधे 15 रुपये से (कम अच्छे वाले 10रुपये तक थे) ऊपर की जबरन चढ़ाई प्याज महाराज को चढ़ाई गई थी, तो अब जबरन ही उन्हें बिल्कुल नीचे आने से रोका जाएगा, ये तय मानिए। हम आप तो खा लेंगे पर गरीबी की प्याज से रोटी खा लेंगे की जो आस थी वो तो गई न तेल लेने।
वैसे एक बात तो है.....तय मानिए की गरीबों को इस बार प्याज ने नहीं रुलाया होगा...देखिए रोने के चाहिए आंसू....पर गरीब के पास पास आंसू बचे ही कहां है????? अब जब आंसू नहीं है तो रोएगा कैसे गरीब...है न....मान लीजिए अगर कुछ आंसू बचें हैं तो वो भी सूखने ही वाले होंगे...देश में सूखा जो पड़ा है उसका असर तो है ही अभी....हां गरीब अगर खून के आंसू रो रहा है..तो रोने दीजिए न....वो भी कब तक बचेगा..... सात्विक विचारों का ख्याल रख कर मध्यमवर्ग का खून खौलना तो बंद हो चुका ही है....अब गरीब का खून अंदर ही अंदर सूख जाएगा....और जब खून भी सूख जाएगा तो खून के आंसू भी कौन रोएगा....क्यों है न?????? अरे क्या सोचने लगे.....अरे छोडि़ए...प्याज महाराज के सर्वसुलभ होने का जश्न मनाते हैं....तो हो जाए कुछ मटन-शटन, पकौडे सकौड़े...........
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शनिवार, 8 जनवरी 2011

To LoVe 2015: कासरगोड [केरल] और यहाँ का सबसे बड़ा दुर्ग

केरल राज्य जिसे ईश्वर का अपना देश भी कहा जाता है.इस हरे भरे राज्य के बारे में विस्तार से हम आप को अपनी पुरानी पोस्ट में बता चुके हैं पिछले ही पोस्ट में हमने कोच्ची के बारे में भी जाना.
आज चलते हैं इस राज्य के कासरगोड जिले में जो केरल के उत्तर में स्थित है अरब सागर के तट को छूता हुआ बेहद रमणीक स्थल है.

इसके पूर्व में पश्चिमी घाट, पश्चिम में अरब सागर, उत्तर में कर्नाटक और दक्षिण में कन्नूर जिला

To LoVe 2015: Onion Cry Cry कराए-नेताजी घड़ियाली आंसू बहाएं

बेचारा घड़ियाल बिन आंसू रोए जाए...(एक सपना)
नासिक से दिल्ली आ रहे 100 ट्रकों को नक्सलियों ने लूट लिया है....FCCI समेत केंद्र सरकार के दिल्ली समेत उत्तर भारत के शहरों के लिए चले कई सौ ट्रक लापता हो गए हैं...खबर मिल रही है कि इन ट्रकों के कुछ कारवां मध्य भारत और दक्षिणी भारत के शहरों की तरफ जाते देखे गए हैं... ये एक्सक्लूसिव खबर भी आ रही है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, महाराष्ट्र समेत देश के कई इलाकों में स्थानिय लोगो की नक्सलियों से जोरदार झड़पें हुई हैं....सरकार ने हालात को देखते हुए सभी राज्यों को चौकसी कड़ी करने के आदेश दे दिए हैं.....साथ ही केंद्र सरकार ने सभी शरीफ नागरिकों से अपील जारी की है जो भी इन ट्रकों को कहीं देखे तत्काल केंद्रीय सुरक्षा बलों को सूचित करे..न की स्थानिय पुलिस को...इस वक्त चारों तरफ अफरातफरी का माहौल है....इस बीच इसी घटना से जुड़ी एक औऱ खबर आ रही है...पता चला है कि देश की कई सुघड़ महिलाएं इन ट्रकों की खोज में लग गई हैं...जो किसी कारण वश(जैसे रोंदू-भोंदू मोटू-पतलू बच्चों के कारण) घर से बाहर नहीं निकल सकीं हैं उन्होंने अपने पतियों को सब काम छोड़ एकाध ट्रक पर कब्जा कर घर लाने का आदेश जारी कर दिया है...पत्नी परमेश्वर मानने वाले सभी निरही पतियों को साफतौर पर धमका दिया गया है कि अगर वो नाकाम रहे तो बेलन बह्मास्त्र के कोप का भाजन बनने के तैयार रहें....शहर और शहर से बाहर की सभी सड़कों पर गिरते-पड़ते पति बेचारे देखे जा सकते हैं.....हम आपकों ये भी बता दें कि कई मूढ़ लोग इस महान अस्त्र की सिद्धी प्राप्त देवियों से बचने और और उन्हें खुश करने के चक्कर में अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने...नहीं नहीं...कुल्हाड़ी पर जाकर बैठने की तैयारी में इन ट्रकों की तलाश में दर-बदर भटक रहे हैं....इस बीच एक और अहम खबर मिल रही है....हमें पुलिस के उच्च और गुप्त सूत्रों ने पुख्ता जानकारी दी है दिल्ली में बाइकर्स का कहर खत्म हो गया है....पर सूत्रों का कहना है कि ये बात कम खतरनाक नहीं... दरअसल बाइकर्स शहर भर के पतियों की निगरानी ठीक उसी तरह कर रहे हैं जैसे बैंक के बाहर आते-जाते लोगों की............धड़ाम-भड़ाम-ओह-आह-ओफ्फ.....हाय रे.......................
ओह हो....हाय रे....अरे मैं कहां हूं ....आयं बिस्तर के नीचे....ओहो.....तो ये सपना था...क्या यार सपने में भी खबरें देखते रहते हैं हम...हद है.....पर खुदा का खैर है कि ये सपना ही था.....पर क्या भयानक सपना था.....इतनी अफरातफरी हे भगवान....क्या खूनी झ़ड़पें....केंद्र सरकार को राज्य सरकारों पर भरोसा नहीं.....देश के पुरुष सड़कों की खाक छान रहे थे.....पर उनका दिल दहल हुआ था.....मगर हालात ऐसे ही रहे..तो ये सपना कहीं हकीकत न बन जाएं..हे भगवान बचाओ.SSSSSS....बेचारे इन निरही पुरुषों पर इतना जुल्म न ढहाना....इन बेचारों को खून के आंसू मत रुलाओ.....भगवान इनके दुख से दुखी होकर नेता-मंत्री बेचारे घड़ियाली आंसू बहाएंगे....हाय हालात की मार बेचारे मूक प्राणियों पर भी पड़ेगी....नेताओं के चक्कर में देश भर के घड़ियाल बेचारे बिना आंसू के रोएंगे क्योंकि उनके आंसू तो नेता चारी कर लेंगे....हे भगवान उन्हें भी कष्ट होगा.....चलो सबके प्रार्थना करती होगी....(आप भी करो भई)
हे भगवान आपसे प्रार्थना है कि
इन निरीह पति बेचारों के प्राण
मूक प्राणी घड़ियाल के आंसू 
बचा लो......बचा लो.......हे भगवान
साथ ही देश को भी बचा लो....
ये प्याज सर्वसुलभ करवा दो...ये प्याज सर्वसुलभ करा दो.....
चमत्कार दिखा दो...
गोदामों में बंद प्याजों को भी मुक्त करा दो.....मुक्त करा दो.....
हे भगवान निरही प्राणियों को बचा लो.!!!!!!!!!!!!!
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सोमवार, 3 जनवरी 2011

To LoVe 2015: कोच्चि (कोचीन) और सेंट फ्रांसिस चर्च

देवताओं के अपने देश कहे जाने वाले 'केरल 'राज्य के बारे में हम आप को पहले की पोस्ट में बता ही चुके हैं.
आज बात करते हैं यहाँ के राज्य कोच्ची के बारे में .केरल तीन भौगोलिक व सांस्कृतिक इकाईयों में बंटा हुआ है,
उत्तर में मलाबार, मध्य में कोचीन और दक्षिण में त्रावणकोर. कोचीन इस प्रदेश का सबसे अधिक विविधवर्णी और सब से बड़ा नगर है.

कोचीन में भारतीय नौसेना एक केंद्र है और एक नौसैनिक संग्रहालय भी

रविवार, 2 जनवरी 2011

To LoVe 2015: 'हज़ारद्वारी महल' मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल



'मुर्शिदाबाद 'पश्चिम बंगाल का एक ऐसा शहर है जिसने ऐतिहासिक और प्राकृतिक पर्यटक स्थलों के लिए पूरे विश्व में पहचान बनाई है.
 'हज़ारद्वारी महल'  कोलकाता से 219 किलोमीटर की दूरी पर बना मुर्शिदाबाद का प्रमुख पर्यटक स्थल है.
भागीरथी नदी के किनारे बने इस तीन मज़िले भवन में ,११४ कमरे और ९०० वास्तविक दरवाज़े हैं और बाकि आभासी[हूबहू दिखते मगर पत्थर के बने हैं ] .इसलिए इसे १००० द्वारी कहा जाता