शनिवार, 27 नवंबर 2010

To LoVe 2015: NGO... म्हारी उल्टी खोपड़ी..या दुनिया उल्टी.....रोहित


हाल में कुछ ऐसे मेल मिले जिसमें मुझसे डोनर बनने का आग्रह किया गया। ये अलग बात है कि वर्तमान हालात में डोनर बनना मेरे लिए संभव नहीं हैं। (अब भई पइसे है ही नहीं, .तो बड़ा डोनर बने कइसे..हेहेहेहेह) वैसे अक्सर ऐसे प्रस्ताव मुझे सोच में डाल देते हैं। जा जूं कहें कि मैं हूं ही उल्टी खोपड़ी जो हमेशा दूसरे सिरे पर जाकर सोचने लगता हूं,...या दूसरा सिरा पर क्या चल रहा है.ये सोचने लगता हूं..समझे आप...नहीं समझे तो कोई बात नहीं....
"आइए मेरे साथ सोचने की कड़ी में जुडकर अपनी खोपड़ी खटखटाइए"

बड़े-बड़े एनजीओ कई बड़े कामों को अंजाम दे रहे हैं। इन एनजीओ के साथ बड़ी-बड़ी तोपें यानि बड़े नाम जुड़े होते हैं...। जिससे बिना सरकारी मदद के भी ये अच्छा काम कर रही हैं। इनके लिए कभी धन बड़ी समस्या नहीं बनता। कई बार इनके दबाव की वजह से सरकार भी कई कल्याणकारी काम करने को मजबूर हो जाती है। ऐसे में जनता के हित के कई काम हो जाते हैं। अब जरा उल्टा सोचिए...या कहूं कि दूसरे सिरे कि सोचिए....
'''"क्या इन बड़े नाम वाले एनजीओ से आम जनता जुड़ पाती है''''

देश के कई इलाकों से ऐसी खबरें सामने आती हैं कि स्थानीय लोगो ने सरकारी मशीनरी की कछुआ चाल से चिढ़कर खुद ही एकजुट होकर अपनी समस्या सुलझा ली। कहीं शानदार सड़क बन गई, तो कहीं स्कूल। दिल्ली से सटे हरियाणा के एक इलाके के लोग तो रेलवे से इतना दुखी हो गए कि उन्होंने खुद ही पटरी बिछा ली, रेलवे स्टेशन बना दिया। ऐसे लोग .....
''''लोग खुद ही एकजुट होकर काम निपटा देते हैं''''

इन खबरों के बाद मेरी खोपड़ी में हमेशा एक सवाल उछलने-कूदने लगता है। वो ये कि क्या  देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे धांसू काम करने वाले एकजुट क्यों नहीं हो पाते? इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्लेटफॉर्म क्यों नहीं मिल पाता? क्या किसी बड़े नाम या धनपति को ऐसे लोग ोको एकजुट नहीं करना चाहिए। पर मुसीबत यह है कि कई स्थानीय नेता ऐसे कर्मवीरों के साथ सिर्फ इसलिए जु़ड़ते हैं कि वो छापे में छप जाएंगे, टीवी पर चमक जाएंगे। हालांकि हर कोई ऐसा नहीं होता...पर अधिकांश ऐसे होते हैं.
'''''जे सब अइसे नहीं होते, तो समस्या होती ही काहे कू''''

जरा सोचिए,(भई सोचना तो पड़ेगा ही, आखिर इसलिए ही तो पढ़ रहे हैं न) अगर  किसी काम को करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्से से लोगो को जोड़ा जाए, तो क्या होगा? क्या एक क्रांति नहीं हो जाएगी? जैसे शिक्षा को ही देख लीजिए। देश के कई अध्यापक, पढ़े-लिखे लोग, अपने स्तर पर अलग-अलग हिस्सों में लोगो को साक्षर बनाने कि कोशिश में लगे हैं। पर इनमें से अधिकतर एकदुसरे से या उनके कामों के बारे में कुछ नहीं जानते। 
''''ये राष्ट्रीयता साक्षरता अभियान से जुड़ जाएं तो चमत्कार होगा या नहीं''''

पर हालात ये हैं कि एक हिस्से का बंदा ये नहीं जानता की देश के दूसरे हिस्से में क्या हो रहा है। उसे ये पता नहीं होता कि जिस काम को वो करना चाहता है, उसे कोई दूसरा भी कर रहा है। देश के अनेक हिस्सों में अवारगी करने का ये फायदा तो मुझे हुआ है कि इस खाई को मैने काफी नजदीक से देखा है। स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो, स्वालंबन हो, सरकारी बाबूओं कि अदूरदर्शी नीतियों का विरोध हो....लोग अपने को अकेला समझ कर कुछ नहीं कर पाते....या जितना कर लेते हैं उसी में संतुष्ट हो जाते हैं। और मैं........
''''इसी आत्मसंतुष्टी से चिढ़ता हूं''''

देश का गरीब से गरीब भी कुछ करने की इच्छा रखता है....पर वो अपनी गरीबी के जाल से ही नहीं निकल पाता। किसान अलग-अलग होकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर होते हैं। महिलाएं अपने आंचल को फांसी के फंदे में तब्दील कर देती हैं। ये एकजुट होकर कुछ कर नहीं पाते। इनके अंदर इच्छा है, पर अकेले होने के कारण सब लाचार होते है....मगर...
''''यही काम फिल्मी पर्दे पर मुन्नाभाई को करते देख ताली पीटते हैं'''' 
अगर बड़े काम को पूरा करने में हम हाशिए पर पड़े व्यक्ति को हाथ बंटाने का मौका दें, तो शायद वो अपने दुष्चक्र से निकल सके। उसमें समस्याओं से लड़ने का आत्मविश्वास जागेगा। एक बड़े काम को करने के लिए जब हजारों हाथ जुटेंगे, तो उसमें हर किसी का हाथ जुड़ेगा। उस काम के सफल होने पर हर स्तर के इंसान को अपार खुशी मिलेगी। उसमें एक संतुष्टी होगी कि वो अकेला नहीं हैं...लाखों लोगो के साथ उसने भी देश के लिए कुछ किया है।
'''''और इसी संतुष्टी को मैं हर भारतीय में देखना चाहता हूं''''

ऐसा नहीं है ऐसा पहले कभी हुआ नहीं है। ऐसी सार्थक पहल का उदारहण हमारे साहित्य में मिलता है, हमारे अराध्य, हमारे आदर्श ने हमें करके दिखाया है। रामायण में लंका जाने के दौरान समुद्र पर पुल बांधना। इसके लिए भगवान राम ने हर जाति की मदद ली थी। क्या वानर, क्या रीछ, क्या जनजाति के लोग। इतने लोगो का काम के प्रति उत्साह देख एक गिलहरी भी अपने को रोक नहीं पाई, और पूल के पत्थरों को जोड़ने के लिए अपने सामर्थ्य अनुसार काम किया। बदले में अपनी पूरी बिरादरी की पीठ पर भगवान की उंगलियों के निशान का प्रसाद पा लिया। 
''''रामायण से प्रेरणा लेने के लिए सनातन धर्मी होना जरुरी नहीं है, इससे राष्टधर्म मानने वाला कोई भी भारतीय सबक सीख सकता है''''

पर हमारी एक बड़ी अजब-गजब समस्या है। हमारी ये राष्ट्रीय आदत बन चुकी है कि जिससे कुछ प्रेरणा लेकर काम हो सके, उसे न करो। उसका उल्टा करो यानि औऱ उसकी पूजा करो, आदर करने लगो।
'''''यानि आदर्शों की आरती उतारो पर उसे अमल में लाने कि सोचो तक नहीं, अब पता नहीं मैं उल्टी खोपड़ी हूं या हमारी राष्ट्रीय आदत ही उल्टी हो गई है'''''

(पोस्ट लंबी है पर झेल लेना, यानि पढ़ लेना आप सभी, क्या करुं उंगली की-बोर्ड से टकराती है तो विचार प्रवाह  खत्म होने पर ही रुकती है)
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मंगलवार, 23 नवंबर 2010

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

मेरे मित्र की कार बंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, ''इनके यहाँ कुत्ता तो नहीं है?'' मित्र ने कहा, ''तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!'' मैंने कहा, ''आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूँ।''

कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेज़बान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से ''नमस्ते'' हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- ''क्यों यहाँ आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहाँ से!''

फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता- चार बार काट ले। डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है। यों कुछ आदमी कुत्ते से अधिक ज़हरीले होते हैं। एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था। मैंने कहा, ''इन्हें कुछ नहीं होगा। हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ।''
एक नये परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया। मैं उनके बंगले पर पहुँचा तो फाटक पर तख्ती टंगी दीखी- ''कुत्ते से सावधान!'' मैं फ़ौरन लौट गया।

कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, ''आप उस दिन चाय पीने नहीं आए।'' मैंने कहा, ''माफ़ करें। मैं बंगले तक गया था। वहाँ तख्ती लटकी थी- ''कुत्ते से सावधान।'' मेरा ख़याल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं। पर नेमप्लेट कुत्ते की टँगी हुई दीखी।'' यों कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है। मार्क ट्वेन ने लिखा है- ''यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा।'' कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है।

बंगले में हमारे स्नेही थे। हमें वहाँ तीन दिन ठहरना था। मेरे मित्र ने घण्टी बजायी तो जाली के अंदर से वही ''भौं-भौं'' की आवाज़ आई। मैं दो क़दम पीछे हट गया। हमारे मेज़बान आए। कुत्ते को डाँटा- ''टाइगर, टाइगर!'' उनका मतलब था- ''शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं। तू इतना वफ़ादार मत बन।''

कुत्ता ज़ंजीर से बँधा था। उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था। मैं उससे काफ़ी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया। मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है। लगता ऐसा ही है। मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूँ। चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो। उस बंगले में मेरी अजब स्थिति थी। मैं हीनभावना से ग्रस्त था- इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नज़र से देखता।

शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे। नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था। मैंने देखा, फाटक पर आकर दो 'सड़किया' आवारा कुत्ते खड़े हो गए। वे सर्वहारा कुत्ते थे। वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते। फिर यहाँ-वहाँ घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते। पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था। वे सहम जाते और यहाँ-वहाँ हो जाते। पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते। मेजबान ने कहा, ''यह हमेशा का सिलसिला है। जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं।''

मैंने कहा, ''पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए। यह पट्टे और ज़ंजीरवाला है। सुविधाभोगी है। वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं। इसकी और उनकी बराबरी नहीं है। फिर यह क्यों चुनौती देता है!''

रात को हम बाहर ही सोए। जंज़ीर से बँधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था। अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता। आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? यह तो उन पर भौंकता है। जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।

मुझे इसके वर्ग पर शक़ होने लगा है। यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है। मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते। उनका रोब ही निराला! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना। आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे। लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे। कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी। वे बैठे रहते या घूमते रहते। फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे। बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट।

यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज़ में आवाज़ भी मिलाता है। कहता है- ''मैं तुममें शामिल हूँ।'' उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी- यह चरित्र है इस कुत्ते का। यह मध्यवर्गीय चरित्र है। यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है। तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है। हमारी आहट पर वह भौंका नहीं, थोड़ा-सा मरी आवाज़ में गुर्राया। आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं। थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया। मैंने मेज़बान से कहा, ''आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है।''

मेजबान ने बताया, ''आज यह बुरी हालत में है। हुआ यह कि नौकर की गफ़लत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया। वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही। दोनों ने इसे घेर लिया। इसे रगेदा। दोनों इस पर चढ़ बैठे। इसे काटा। हालत ख़राब हो गई। नौकर इसे बचाकर लाया। तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है। डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाऊँगा।''
मैंने कुत्ते की तरफ़ देखा। दीन भाव से पड़ा था। मैंने अन्दाज़ लगाया। हुआ यों होगा-

यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा। उन कुत्तों पर भौंका होगा। उन कुत्तों ने कहा होगा, ''अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता। ढोंग रचता है। ये पट्टा और जंज़ीर लगाए हैं। मुफ़्त का खाता है। लॉन पर टहलता है। हमें ठसक दिखाता है। पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है। संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा। हममें से है तो निकल बाहर। छोड़ यह पट्टा और जंज़ीर। छोड़ यह आराम। घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा। धूल में लोट।'' यह फिर भौंका होगा। इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे। यह कहकर- ''अच्छा ढोंगी। दग़ाबाज़, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं।''
इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलाई।
कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है।

—हरिशंकर परसाईं/a>
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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

To LoVe 2015: Now What.....वो वादा औऱ कुत्ते की पूंछ....Rohit

वैसे अपुन हंसने की आदत डाले बैठे हैं। आखिर कभी हंसने का वादा किया था...इसलिए अब सदा मुस्कुराना तो पड़ेगा ही। ये अलग बात है कि होंठ भी जख्मी हों तो ये हंसी भी काफी तकलीफ देती है। वैसे भी जिदंगी काफी मुश्किल हो जाती है जब अपने ही हाथ आपको जख्म देने लगे। ऐसे में अंदर कहीं से जो चटक जाता है वो फिर कभी नहीं जुड़ता। कई बार तो जख्म ऐसे लोग दे जाते हैं जिनका जिक्र चाहकर भी आप नहीं कर पाते। तभी रहीम ने कहा है कि रहिमन धागा प्रेम का न तोड़ो चटकाए, टूटे तो फिर न जुड़े, जुड़े तो गांठ पर जाए। इस बार तो गांठ गिनने भी मुश्किल हैं..सो गिन ही नहीं रहे। पर हम भी क्या करें आदत से मजबूर हैं, विश्वास करना जल्दी छूटता भी तो नहीं है। काफी पहले साधु औऱ केकड़े की कहानी पढ़ी थी। जो ऐसे हर अवसर पर चलचित्र की तरह सामने आ जाती है। मुझे लगता है कि ऐसी कहानियों को बचपन में नहीं सुनाया जाना चाहिए। परिपक्व मन ही ऐसी कहानियों के हर पक्ष को समझ पाता है। हमेशा आदर्श औऱ लोकव्यवहार को ध्यान में रखना चाहिए। बच्चों की शिक्षा में ये आवश्यक तौर पर जोड़ देना चाहिए। उसे मालूम हो कि आदर्श स्थिती में आदर्श कैसे अमल में लाए जाते हैं और बाकी समय में क्या लोकव्यवहार होता है। कुछ अपवाद भले ही अलग होते हैं। देर से सीखने की वजह से कई बार लोकव्यवहार करने में इंसान चुक जाता है। इसका नतीजा कई बार भयंकर निकलता है। हमेशा से मन इस बात को जानता रहा और पर अमल में चुकता रहा। नतीजा सामने है। ऐसी ज़ंग में कैसी जीत, जिसमें हर तरफ आपके ही हथियार हों। ऐसी जीत सिर्फ और सिर्फ जख्म ही देते हैं। नुकसान अपना ही होता है। अपना ही मन औऱ तन जख्मी होता है। एक साथ शारीरिक मानसिक आर्थिक औऱ भावनात्मक तौर पर झेले जाने वाले विश्वासघात फिर से इंसानियत पर विश्वास करने की इजाजत नहीं देते। पर क्या करें हमारी आदत तो कुत्ते की पूछ हैं जो सीधी होने से रही। आज तक नहीं सीधी हुई तो आगे भी कोई आसार नहीं हैं। पर अब चाहता हूं कि सीधी हो ही जाए आदत रूपी कुत्ते की ये पूंछ।
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शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

To LoVe 2015: हम आह भी भरें तो....रोहित

मानसिक स्तर
शारीरिक स्तर
आर्थिक स्तर
भावानात्मक स्तर
.........
इन सारे मोर्चों पर पिछले एक महीने से जूझ रहा था। हर स्तर पर चोट खाई। हालांकी पहली बार चोट नहीं खाई थी,,..पर इस बार फर्क था। हर ओर से अकस्मात हुए अघातों से आप अचंभित हो जाते हैं। अकेले हर मोर्चे पर लड़ना काफी मुश्किल हो जाता है। अगर आप जंग जीत भी जाएं तो भी चोट के निशान रह जाते हैं। इस बार निशान ज्यादा और गहरे हैं। आघात अपने समझे जाने वाले लोगों से लगे हैं इसलिए दर्द और अविश्वास की अजब सी स्थिती में हूं। आघात भारी भरकम हो तो चोट के निशान की गहराई नापना असंभव हो जाता है। ऐसी हर स्थिती के बाद अतंस से कुछ रीत जाता है। इस बार तो काफी कुछ रीत गया। जिदंगी पूरी तरह से अस्तव्यस्त हो गई है। लगता है कि केक्टस के पार्क में आ गया हुं। पंचकुला के केक्टस पार्क से भी घना पार्क अंतस में उतरा हुआ है। ऐसी स्थिती में केक्टस का ही बिछावन बन जाता है और केक्टस की ही चादर। वैसे ये सच है कि केक्टस में भी फूल खिलते हैं....पर ये भी उतना ही सच है कि बरसों बाद केक्टस में फूल खिलते हैं.....
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मंगलवार, 2 नवंबर 2010

To LoVe 2015: तवांग-[अरुणाचल प्रदेश]

'स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ'
कुछ दिनों पहले गूगल मैप द्वारा मांगी गयी माफ़ी की खबरें सुर्ख थीं.गूगल ने अपने मैप में भारत के अरुणाचल प्रदेश राज्य के जिस हिस्से को पडोसी देश चीन का हिस्सा दिखाने की गलती की थी जिस के लिए उसने माफ़ी मांगी थी,वह हिस्सा है..'तवांग '..यह अरुणाचल प्रदेश का एक जिला है और आज चलते हैं इसी क्षेत्र की सैर पर..

भारत ka ek उत्तर पूर्वी राज्य hai अरुणाचल प्रदेश .
अरुणाचल-