शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

To LoVe 2015: Kanpur तुम्हारा शहर अब तुम्हारा नहीं रहा...

दोस्तों मंगलवार सुबह मैं कानपुर ( Kanpur ) में था। यहां आकर उसकी पोस्ट लिखने की तैयारी में था कि ये कवितामयी हो गई। न गद्य, न पद्य, न ही कविता। यानि फिर से हो गया, जाना था जापान और पहुंच गए चीन....वैसे अगली पोस्ट भी कानपुर पर होगी....पर इसकी गारंटी नहीं..खैर तब तक इसे झेलिए..............

आज तुम्हारे शहर में था गली बाजारों में घूमता हुआ
बड़े दिन बाद बिना किसी की तलाश में भटकता रहा
तुम्हारा शहर कई हंसते-मुस्कुराते अनजान चेहरों से अटा था
विजयनगर चौराहे पर ज़िदगी की आपाधापी से शुरु कर
ज़रीब चौक से फुल बाग, फिर नवाब गंज घूमता रहा
शहर को तुम्हारे जानने की कोशिश में लगा रहा
संग तुम्हारी यादों की पोटली लिए टहलता रहा, 
रिक्शे की टनटन, टैंपोंवालों की सवारी के लिए बकझक
दो-तीन या फिर पांच-सात रुपये के किराए में
एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले को मैं छानता रहा
कर्नलगंज से लेकर चुन्नीगंज तक हर सड़क समझता रहा
तुम्हारे शहर की गलियों चौराहों और बाजार देखते
यादों में कहीं कई और शहर करवट बदलने लगे
तुम्हारे शहर का स्टेशन महाकाल की नगरी उज्जैन की
तो विजयनगर की एक सड़क पटना के किसी सड़क की
तो शहर डाकखाना दिल्ली के गोल डाकघर की याद दिला गया
हर बड़े शहर की तरह तुम्हारे शहर का भी एक चिड़ियाघर है
जहां जानवर सबके सामने आते अब शरमाते हैं
शेर-तेंदुआ-बाघ अब कोने में बैठ लोगों को निहारते हैं
प्यार के नाम पर होते क्षैतिज आसनों की कोशिशें देखे
तोता-मैना भी अपनी बातें करना भूल गए हैं
हिरण भी कुलांचे भूल विस्मित सा खड़ा देखता रहता हैं
चार पैरों के नंगधड़ंग प्राणियों के लंबे-चौड़ें इलाके में
दो पैरों पर चलने वाले इंसानी जानवरों के बनते-बिगड़ते
पशुवत संबंधों को वहीं छोड़ मैं निकल पड़ता हूं...
यहां से निकल गंगातट तक जाने की सोचता हूं
फिर जैसा की हर शहर में अक्सर होता है
अपने ही शहर से अनजान लोग रस्ता बतलाते हैं
मैं भी ऐसे ही पूछ बैराज का गलत रस्ता पकड़ता हूं
पर कहते हैं न कि गंगा कई सच से रुबरू कराती है
ऐसा ही एक सच उस सड़क किनारे पसरा था
ढ़ाई किलोमीटर के रस्ते पर भरी दुपहिरया में
एक साथ भारत और इंडिया की झलक पाता हूं
एक तरफ आलीशान कोठियों की भरमार है
तो दूसरी तरफ झोपडियों की लंबी कतार है
इन्हीं झोपडि़यों में कुछ खास रंगबिरंगी हैं
लगता है जैसे यहां के बांशिदों के बेरंग जीवन में 
जिन रंगों की कमी है, वो सभी आकर
झोपड़ियों की दरो-दिवार पर बिखर गए हैं
यहीं सड़क किनारे बच्चे खुला शौचालय बनाते हैं
तो दूसरी तरफ कमसीन कुत्ते सीना ताने चलते हैं
ढ़ाई किलोमीटर में भारत-इंडिया देखता मैं पहुंचता हूं
बैराज पर, बिना घाट के तेज बहती गंगा के पास
उसके रेतीले तट पर खड़ा देखता हूं उसका विस्तार
अचानक मुझे अपनी सिमटी यमुना याद आ जाती है 
जीवनदायनी गंगा का हरा पानी यहां रेतिला है
तट पर खड़ा मैं कुछ थका सा महसूस करता हूं
मुझे थके देख शायद मां गंगा लरज जाती हैं
और कहीं से एक रिक्शा अचानक आ जाता है
फिर मैं चल पड़ता हूं कंपनी बाग की तरफ
इस बार गंगा तट पर बसे एक और भारत से
इंडिया की तरफ का सफर शुरु करता हूं
तुम्हारे शहर में भी एक कंपनी बाग है
जो जेहन में अंग्रेजों की याद दिलाता है
तभी बाजारों में घूमते हुए हाशिए पर पड़ी
तुम्हारी यादें आकर खड़ी होने लगती हैं
जेहन में कौंधता है कि शायद तुम भी यहीं रहती थीं
याद आता है कि शायद यहीं-कहीं सिविल लाइन्स है
सोचता हूं कि चलों देखूं कि किन गलियों में तुम थीं
लेकिन तभी अवारगी में रमा मन कदमों को थामता है
शायद मन अब औऱ लरजना नहीं चाहता है
बीते उन छह नमी वाले महीनों की तरह....
इसी शहर में कुछ साल पहले तुमने न्यौता था
फिर हमारे-तुम्हारे में हमारा-तुम्हारा हो गया
तुम्हारे शहर आने का न्यौता अधर में रह गया था
आज मैं तुम्हारे ही शहर में था, किसी और के न्यौते पर  
तुम्हारा शहर आज मेरे दोस्त का ससुराल बना है
ठीक वैसे जैसे अंबाला मेरे एक दूसरे दोस्त का......
अवारगी में डूबा मेरा मन कदमों को मोड़ता है
तभी दूर-दूर तक कैमिस्टों की दुकाने दिखने लगीं
लगा जैसे तुम्हारे शहर का ये हिस्सा बीमार है
तभी याद आई शहर के अखबारों कि सुर्खियां
आधा शहर बीमार","सरकार लाचार'" और "जनता त्रस्त''"
मुझे पता चला यहां शहर के कई बड़े अस्पताल हैं
मैं यहीं से लौट पड़ता हूं छत्रपति शिवाजी के पास
बाजारों में भटकते हुए ही देखता हूं ठग्गू के लड्डू भी,
इसी भटकन से नाप लेता हूं मोती झील भी
यहां भी पेड़ हैं, झाड़ियां हैं, साथ में एकांत भी
और यहां भी निर्बाध जारी है टीआरपी डाउन जोड़ों की
टीआरपी अप वाली हरकतों का सिलसिला
तभी शाम का धुधंलका फैलने लगता है
और मैं भी अपने को सिकोड़ने लगता हूं
अपनी आवारगी को थामने लगता हूं.
चंद मिनटों में रात गहराने लगी थी
और मैं इसमें विलिन नहीं होना चाहता था
सो मैं लौट चला हल्की सी कसक लिए 
महफिल में शामिल होने की तैयारी में,
शाम को सजधज के साथ पहुंचता हूं ग्वाला टोली,
रिक्शे पर बैठ पता पूछते देख, एक राहगीर कहता है
बड़े लोगो का होटल है साब वो तो 
समझ नहीं पाता साब कहकर दी इज्जत या...?
खैर में पहुंच ही जाता हूं ग्वाल टोली 
जहां से झूमता-गाता बारात का हिस्सा बनता हूं
फिर उसी महफिल में सबकुछ बदल सा गया
बिना कोई कांच टूटे तुम्हारे शहर से रिश्ता बदल गया 
मेरे लिए तुम्हारा शहर, अब तुम्हारा नहीं रह जाता
शायद रिश्ते अक्सर यूहीं बदल जाया करते हैं
तभी तु्म्हारा शहर मेरे लिए तुम्हारा नहीं रहा....
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शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

To LoVe 2015: Gandhi & Shastri गांधी-शास्त्री - अभी नहीं चूके

गांधी औऱ लालबहादूर शास्त्री, भारत के दो महान सपूत। जन्म एक ही दिन यानि दो अक्टूबर। एक जिसने सच, -अहिंसा की भारतीय परंपरा की ताकत दुनिया को दिखाई..नैतिक रुप से सोते भारत को जगाया। दूसरे उनके शिष्यों में एक लाल बहादूर शास्त्री यानि देश के दूसरे प्रधानमंत्री और ईमानदारी की मिसाल कायम करने वाले पहले मंत्री। जिन्होंने देश को बताया कि जोश के साथ भी किस तरह से होश कायम रखकर दुश्मन को निपटाया जाता है, ...शराफत को कमजोरी समझने वालों को कैसे करारी शिकस्त दी जाती है। दो अक्टूबर को दोनों का जन्मदिन था,....और आज तीन अक्टूबर को तमाम उठापठक के बीच दुनिया के सामने भारत अपनी आर्थिक ताकत दिखाने की तैयारी में है। दो दिन पहले भगवान राम के जन्मस्थल पर फैसला आय़ा है। लग रहा है कि भारत पुरानी परछाईयों से निकलने की कोशिश में हैं।
 बापू को ध्यान से देखता हूं तो पाता हूं कि उनमें कर्म की प्रधानता थी। विचारों से विचलन लगभग न के बराबर था। अगर था भी तो उसे स्वीकार करने का आत्मबल भी था। कल 20 जनवरी 48 को उनकी सभा में फटे बम के बाद की असली पिक्चर दिखाई एक टीवी चैनल ने। बम फटने के बाद भी कितना असीम धैर्य और शांति थी उनमें। हंसते हुए बड़ी ही शांती से बापू ने कहा.."" बैठ जाओ..कुछ नहीं हुआ है....ऐसे धमाके हमें नहीं डरा सकते"" 47 के बापू को देखता हूं तो पाता हूं कि विश्वास करना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। मगर ये भी कटु सच है कि बड़े लोगों से छोटी सी भी गलती होती है तो उसके नतीजे समाज को, देश को सदियों तक भुगतना पड़ते हैं। मेरा मानना है कि ऐसी ही गलती बापू ने नेहरु जी को काफी पहले ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने का वादा मोतीलाल नेहरु से करके कर दी थी। बापू को नेहरूजी को अपनी छाया से निकलने का मौका देना चाहिए था।
 लाल बहादुर शास्त्री सादगी और ईमानदारी के विराट स्तंभ हैं। शास्त्रीजी नेहरु के काफी विश्ववासी थे। एक  रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्पीफा दे दिया था। हालांकी हादसे में किसी तरह का जानी नुकसान नहीं हुआ था औऱ नेहरूजी समेत सभी बड़े नेताओं ने शास्त्री जी के निर्णय का सख्त विरोध किया था। मगर विंडबना देखिए आजा़दी के तुरंत बाद की नैतिकता की ऐसी विराट मिसाल के बावजूद इसकी झलक भी बाद के किसी नेता में नहीं दिखी, खासकर मंत्री पद पर बैठे किसी नेता में...हां अपवादस्वरुप स्वर्गीय माधवराव सिंधिया को छोड़कर।
 हालांकि नेहरु जैसा करिश्माई व्यक्तिव नहीं था शास्त्री जी का। पर सरलता और ईमानदारी के मालिक शास्त्री जी ने उनकी कमी खलने नहीं दी। देश की शानदार अगुवाई की। 62 के जख्म से घायल हिंदुस्तान को 66 की जीत दिलाकर मरहम लगाया। प्रधानमंत्री के तौर पर एकबार शास्त्री जी किसी कपड़े की फैक्ट्री के दौरे पर थे। प्रबंधन ने उन्हें कुछ कीमती साड़ियां तोहफे के तौर पर दी। पर उन्होंने ये कह कर नहीं लिया कि वो इसका क्या करेंगे। अधिकारियों ने कहा कि प्रधानमंत्री की पत्नी के लिए ये भेंट है। तब उन्होंने हंसते हुए कहा कि उनकी पत्नी को इसकी आदत नहीं है। अगर वो ले गए तो उनकी आदत बिगड़ सकती है। उनकी हैसियत इतनी महंगी साड़ी खरीदने की भी नहीं है। देश का प्रधानमंत्री ऐसा कह रहा था, इससे बढ़कर फक्र की बात और क्या हो सकती है उस वक्त के लोगों के लिए। पर आज.....। 
 आखिर वो कौन सा आत्मबल था, जिसके दम पर बापू कि एक आवाज पर सारा हिंदुस्तान खड़ा हो गया था, ये शास्त्रीजी की कौन सी ईमानदारी थी, जिसके पीछे जवान से लेकर किसान एकजुट हो गए थे, कई लोगों ने एक समय का खाना छोड़ दिया था।
 आज नई करवट लेने की कोशिश करता भारत कई मुद्दों पर असमंजस में है। इसी मोड़ पर कई सवाल भटक रहे हैं मेरे दिलो-दिमाग के बीच।



-क्यों ईमानदारी आज इतनी दुर्लभ हो गई है?
-क्या हम बेईमान हुए बिना काम नहीं कर सकते?
-क्या कुछ साहस करने से कई गलत काम बंद नहीं हो सकते?
-हम ज्यादा बेईमान की तुलना में कम बेईमान को चुनने की वकालत भी क्यूं करते हैं?
-अगर कुछ करते नहीं, तो शिकायत क्यों करते रहते हैं हम?
-हम अच्छा करने वाले हाथों की मदद क्यों नहीं करते, अगर खुद कुछ नहीं करते तो?
-चौराहे पर महापुरुषों के बुत बना डाले, पर विचारों को चौराहे पर क्यों पटक दिया?

ये सवाल किसी नेता के सामने खड़े होने नहीं जा रहे। वैसे भी हिम्मत नहीं है इन सवालों की नेताओं के सामने खड़े होने की..क्योंकि अधिकतर के यहां से पीटकर पहले ही उन्हें निकाल बाहर कर दिया गया है।

दरअसल ये सभी सवाल मुझसे मुखातिब हैं, आपसे मुखातिब हैं। 

सहमति औऱ असहमति होते हुए भी हम दोनो महापुरुषों को आत्मसात करके जी सकते हैं। 
आखिर एक बार कोशिश तो करके देखिए।

 
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