गुरुवार, 30 सितंबर 2010

बच्चो...आप भी सीखो इन ...स्पेशल चिल्ड्रन... से

यह प्यारी नन्ही गुडिय़ा ब्रेल लिपि में लिखी एक किताब पढ़ रही थी। उसकी एक फोटो को मैंने फेसबुक पर डाला। तुरंत मेरे मित्र कवि सर्वेश अस्थाना का एक कमेंट आया। कविता की शक्ल में। लाइनों पर गौर करिए-



अंतरमन की आंखों से, हमको तो -कुछ दिखता है
स्पर्श से हम पढ़ लेते हैं, हम को को कु लिखता है
ये कोमल नाज़ुक हाथ मेरे, आंखों का का निभाते हैं
वो अक्षर पढ़ते जाते हैं, हम भाव समझ मुस्काते हैं...






और सच में अगर कोई भी व्यक्ति संवेदनशील है तो श्रीगंगानगर के श्री जगदंबा अंध विद्यालय के इस परिसर में रहने वाले ..स्पेशल चिल्ड्रन.. से मिलने के बाद भावुक हुए बगैर नहीं रह सकता। यह बच्चे वाकई विशिष्ट हैं। इसलिए नहीं कि उनमें किसी तरह की अपंगता है। बल्कि इसलिए कि उनमें कोई न कोई ऐसी विशिष्टता है जो आम बच्चों में नहीं होती। उनके इस खास किरदार के लिए परमहंस स्वामी ब्रह्मदेव जी और उनकी टीम वाकई काबिलेतारीफ है।
संस्थान अपना 30वां स्थापना वर्ष मना रहा है। दो और तीन अक्टूबर को यहां के पुराने विद्यार्थियों का महासम्मेलन भी होने जा रहा है। ऐसे में विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रतापसिंह के आमंत्रण पर मैं वहां गया। एक लाइन में अगर इस विद्यालय को परिभाषित करना हो तो हम कह सकते हैं..देश में मूक, बधिर और नेत्रहीन बच्चों के गिने चुने विद्यालयों में से यह एक है..। देश के विभिन्न राज्यों के ..स्पेशल चिल्ड्रन..यहां पढऩे आते हैं। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी। कोई फीस नहीं। जो देने की स्थिति में हैं, वह अपने बच्चों के अलावा दूसरे का खर्चा भी उठा सकता है। जो नहीं दे सकता, वह ऐसे ही अपना बच्चा यहां रख सकता है। नेत्रहीन बच्चों के लिए दसवीं और मूक-बधिर बच्चों के लिए आठवीं तक की पढ़ाई यहां कराई जाती है। ब्रेल लिपि की किताबें, सांकेतिक भाषाओं को समझाने वाले यंत्र, छात्रावास, भोजन और इन सबसे बढ़कर शिक्षकों और देखभाल करने वालों का प्यार इस विद्यालय की खासियत है। स्वामी ब्रह्मदेव ने बताया-..ये बच्चे सिर्फ प्यार की भाषा समझते हैं, डांट-पिटाई से वह टूट जाते हैं..आमतौर पर घरों में इनकी बात समझ न पाने के कारण घर वाले ही उनसे दुव्र्यवहार करते हैं, ऐसे में वह चिड़चिड़े या गुस्सैल हो जाते हैं..पर यहाँ रहने वाले बच्चों के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं।
मैंने कई मूक-बधिर बच्चों को गणित के खास फार्मूलों के जरिए कठिन से कठिन सवालों को हल करते देखा। वह उंगलियों व संकेतों की भाषा से अपने टीचर की बात व सवाल समझ रहे थे। फिर उन्हें ब्लैकबोर्ड पर हल कर देते। मेरे जन्म की तारीख के दिन कौन सा दिन था, यह एक बच्चे ने चुटकियों में सही-सही बता दिया। एक दस साल की नन्ही नेत्रहीन बच्ची ने ब्रेल लिपि में लिखी किताब का पाठ पढ़कर सुनाया। उसकी होशियारी दंग करने वाली थी। यहां रोजी-रोजगार के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। मूक-बधिर लड़कियों की एक टोली हंसते-खिलखिलाते हुए बैग बनाने में जुटी थी। उनकी टीचर ने बताया कि यह लड़कियां न सुन सकती हैं और न बोल सकतीं हैं पर खुद को अभिव्यक्त करना उन्हें अच्छी तरह से आता है। कोई भी व्यक्ति अगर कुछ देर उनके साथ रह जाए तो वह उनकी सारी भाषाएं समझ सकता है। यह सब देखकर मुझे लगा कि अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ यहां आकर इन विशिष्ट बच्चों को दिखाना चाहिए। यह बोल, सुन और देख नहीं सकते। फिर भी अपने टीचर्स की प्यार भरी भाषा से सबकुछ समझ जाते हैं। डांस टीचर सनी ने बताया कि यहां के मूक-बधिर लड़के बहुत अच्छे डांसर हैं। जिन कठिन स्टेप्स को सामान्य लड़के सीखने में महीना भर लगाते हैं, वह यह चार दिन में ही कर लेते हैं। बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था भी बहुत दुरुस्त है- अलग-अलग समय पर लंगर चलते हैं। ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर भी यहां है। यह सेंटर नेशनल स्कूल फॉर द विजुअली हैंडीकैप्ड देहरादून से संबद्ध है।
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

शनिवार, 25 सितंबर 2010

To LoVe 2015: जाना था जापान, पहुंच गए चीन.

                                                                                  जि़दंगी में अक्सर ऐसा होता है कि हम सोचते हैं कुछ....हो जाता है कुछ....करना चाहते हैं कुछ ...कर देते हैं कुछ...यानि जाना होता है जापान...पहुंच जाते हैं चीन। बचपन में सोचते हैं कि बड़े होकर ये करेंगे....वो करेंगे....ऐसा बनेंगे.....वैसा बनेंगे....पर जब बड़े होते हैं....तो सब कुछ हो जाता है उल्टा-पुल्टा। अब ऐसा नहीं है कि हर किसी के साथ होता हो..पर अपन के साथ ऐसा हो चुका है...।  हमारे दिमाग के आसमान में विचारों का सूरज उगा नहीं कि ...हम चल पड़ते हैं अनजान रास्तों पर....वैसे तो अक्सर हमें इसका फायदा ही होता है....पर कभी-कभी धूप से जल भी जाते हैं....। ये ब्लॉग की जो आभाषी दुनिया है न, इसमें भी ऐसा ही कुछ हुआ हमारे साथ। 
   दस साल पहले होमपेज का जमाना था...हमने भी बनाया चित्रों का होमपेज....पर उसपर लगातार अपडेट नहीं हो पाए। वैसे भी उन दिनों मोबाइल कैमरा तो था नहीं, कि जहां चांद दिखा फट से खींच ली फोटो..(हीहीहीही) खैर. फिर धूम मची ब्लॉग की..। पर हम इस पर प्रगट नहीं हो पाए....अक्सर सोचते क्या करना प्रगट होकर। हमने ये सोचा नहीं कि पत्र मित्रता का बचपन का शौक भी इसमें सम्माहित है...कई शौक़ को परवाज़ कर सकते हैं...दिमाग में आने वाले उटपटांग विचार साझा हो सकते हैं...हमारे ध्यान में ये सब जरा देर से आया (वैसे हम देर करते नहीं, देर हो जाती है)। फिर भी सोचते रहे कि अब शुरु करेंगें..तब शुरु करेंगे। दोस्त और जानकार भी कहते रहे...पर हमें लगता कि कौन सा तीर मार लेना है आकर..हमने क्या लिख देना है....जो लोग जानते नही....लोग पहचानते नहीं....या उन्होंने पढ़ा नहीं। हम कोई प्रेमचंद तो ठहरे नहीं...लेकिन एक दिन तूफान से पहले की शांति आई (हैलोssss कमीने दोस्तों..शांति का मतलब लड़की नहीं है)
    दरअसल जाने कैसे उस दिन अजब सी शाति थी अंतर्स्थल में...औऱ सब जानते हैं कि ऐसी शांति खूराफाती विचारों की क्रीड़ास्थली होती है...ऐसी उर्वरा शांति में अक्सर खुराफाती विचार ऐसी-ऐसी कलाबाजियां दिखातें हैं कि बस अहा....वाह...वाह..ही निकलती है। अब ये बात वो ही समझ सकता है जिसने कभी विचारों के पुलाव पकाए हों और धरातल पर उतारने की गलती करके टांगे तुड़वाने की नौबत बुलवाई हो....अब ऐसे विचारों की डिटेल न पूछने लगना ..( लिखा कम समझें ज्यादा)
    तो ऐसी ही महाशांति में एकदिन हमारे दिल ने दिमाग को एक संदेशा भेजा....। भईए क्यों न ब्लॉग को निजी डायरी बना ले(था न धांसू आईडिया)..डायरी के एकांतप्रिय पन्नों को आभाषी दुनिया में खोल दे.....बिना किसी नाम-पते के...अनजान बनकर....औऱ जैसा कि अक्सर होता है दिमाग पहले तो  चक्कर खा जाता है ...फिर मरघिली सी दलील देता है..(जैसे पत्नी या प्रेमिका को कम खरीदारी करने की दलील कोई बेचारा देता है)...""अरे यार ऐसे कैसे अपने को नंगा कर लूं सभी के सामने.""..बस इसके बाद दिल का (कु)तर्क बाण आता है ...""अबे  क्या फर्क पड़ेगा...आभाषी दुनिया है....और अगर कोई पढ़ भी ले तो पढ़ लेन दे....तेरे बाप का क्या जाता है.. न तस्वीर होगी...न परिचय..मतलब कोई टेंशन नहीं." फिर (कु)तर्क ने दिमाग को कुतरना शुरु कर दिया....दिमाग ने भी सोचा....वाह क्या आईडिया है....अब आप सब को पता ही है कि अक्सर होता  ये है कि दिल दिमाग को धोबीपाट खिलवा देता है....और दिमाग कई बार दिल के चक्कर में घनचक्कर बन जाता है..तो इस बार भी ऐसा ही हुआ...दिमाग ने दिल को हामी भर दी। दिमाग ने कहा- निकाल दे सारे दुःख-दर्द, सारी भड़ास..सारी पीड़ा....सारी कुंठा....जो तुझे तंग करते हैं..उगल दे सबकुछ बाहर। फिर भी हमने तत्काल इसपर अमल नहीं किया.. आखिर ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे थोड़ी न हैं हम....सुस्त तबीयत के राजा हैं हम। खैर एक शाम आई.....फिर एक रात...। 
    वो रात....जो एक सुरुर की रात थी....(ये क्यों बताउं कि अपुन हल्के-हल्के सुरुर के हवाले थे...हीहीहीही). उसी सुरुर में रात्री के अंतिम पहर में जाने कब(वैसे time लिखा है पोस्ट पर) श्रीगणेश हुआ....पहली पोस्ट का...। उस दिन कई चीजों ने दिलो-दिमाग का भुर्ता बनाया हुआ था..और उसी अवस्था में..सुरुर में...शुरु हो गई आभाषी दुनिया की यात्रा। 
    लेकिन अपने अगले पड़ाव पर हम पहुंचे बिना सुरुर के.(और अब तक के पड़ाव पर भी)...और निकाली अपनी भड़ास....एक ऐसे सवाल पर...जिसने हमें काफी तंग कर रखा है...। पर हमें क्या पता था कि इतिहास अपने को दोहरा  देगा...हो जाएगा बंटाधार। पोस्ट में हमने अपना दर्द बयां किया...और भाईयों ने जाने कब से अपने सिकुड़े हुए फेफड़ों की कसरत कर ली...मतलब हमारे दुःख की गंगा में मजे से नहा लिए... कहने लगे महाराज ऐसे ही निकालो भड़ास...। खैर.......।
    कुछ दिन बाद हम असली डायरी के नितांत एकांतप्रिय पन्नों में शांति की आस में टहल रहे थे....पर जाने क्यों उस दिन वहां की नीरवता में भयंकर शोरगुल था....अचानक ही कुछ एकत्रित शब्द सांसदों की तरह हमें पीठासीन अध्यक्ष समझकर सामने आकर हल्ला मचाने लगे...। जब हमसे सहन नहीं हुआ तो हमने एकत्रित शब्दों को सांसदों की पार्लियामेंट कमेटी की तर्ज पर,  कविता के नाम से आभाषी दुनिया की सैर पर भेज दिया....इस दरम्यान खास दिल्ली वाली कमीनी आदत आभाषी दुनिया में असर दिखाने लगी थी...यानि हम पोस्टों पर टिप्पणी मारने लगे थे....।
   इन दोनों के नतीजे भयंकर निकले...शब्दों की कमेटी (सो कॉल्ड कविता) आभाषी दुनिया की सैर के दौरान भी अपनी हरकतें नहीं छोड़ पाई..आभाषी दुनिया में पदार्पण करते ही कविता कि नायिका ने कहीं दूर से हमारे सचल यंत्र से हमें अचल कर दिया...। उधर खास दिल्ली की टिप्पणी की आदत का असर शाम होते ही दिखा....हमारे गर्मख़त(HOTMAIL) वाले पते पर एक लापता मित्र पहुंच गए। उनके दिल से निकले धाराप्रवाह प्रेमवचनों (*.@#..यानि गालियों) की पाती को आत्मसात करते-करते हमारी ट्यूब लाइट जल गई...झपाक..हम समझ गए कि आखिर क्या गड़बड़झाला हो गया है....बस उसके बाद हमारी ट्यूब लाइट औऱ मुठ्ठी भर के दिल में हो गई जूतमपैजार..नेताओं की माफिक आरोप-प्रत्यारोप।
    दरअसल प्लान था कि आएंगे बिना नाम-पते, बिना चांद जैसे अपने थोबड़े को दिखाए ( अपन तो मानते हैं-आप मानो न मानो हमें क्या)...कहां तो सोचा था..दिलो-दिमाग में घुसी हर चीज, हर दर्द, ग़म, कुंठा, भड़ास निकालेंगे..पर करने लगे प्रवचन....'आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास.' की तर्ज पर..जाना था जापान और पहुंच गए चीन...बड़ी देर से हमारी समझ में आया कि ये सब गड़बड़झाला हुआ देवदास की तीसरी सहेली के चक्कर में....इसलिए भाषी दुनिया के भाईयों और बहनों...दोस्तों औऱ बिना रिश्ते के रिश्तेदारों...सुरुर में रहना कभी-कभी बहुत घातक होता है....यानि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी..।
    खैर ये तो शुक्र था कि अपन चीन पहुंचे, अलक़ायदा के अड्डे पर नहीं...वरना लादेन मियां लाद कर जाने  किस गुफा में फेंक देते इस काफिर को.....आत्मा का परमात्मा या शैतान से मिलन करा देते..पता भी नहीं चलता....अगर बच भी जाते तो अंकल सैम के बच्चे औऱ जबरदस्ती के ससुराली रिश्तेदार पूछ-पूछ कर हमें हलकान कर देते...खैर अब पछताए क्या हो सकता है .... जब चिड़िया चुग गई दिमाग.. .अब तो आप हमें झेलिए..हमारी बकवास झेलिए.....प्रवचन झेलिए....औऱ झेलते रहिए किसी न किसी मुद्दे पर जारी हमारा राग बिंदास उटपटांग.......।
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

शनिवार, 18 सितंबर 2010

उसका जाना: एक कालखंड का अंत

वो मेरा सबसे करीबी, सबसे अजीज़ और हमेशा साथ रहने वाला था। हर वक्त ऐसे मेरे साथ चलता, जैसे साँसें। सोते जागते, उठते-बैठते, यहाँ तक कि बाथरूम और टॉयलेट में भी। वो यानी मेरा नोकिया-एन 72 मोबाइल। काले रंग का था वो। उसका नीला स्क्रीनसेवर हमेशा मेरी आँखों में बसा रहता। 17 सितम्बर 10 को महज पांच साल की उम्र में वो मेरा साथ छोड़ गया। या यूँ कहिए कि मेरी गलती से बेचारा परलोक सिधार गया। पिछले कुछ समय से मैं उसे कमीज के बजाए जींस की पिछली जेब में रख रहा था। बुरा हो उन वैज्ञानिकों के उल्टे-सीधे रिसर्च पेपर्स का जिन्हें पढ़-पढ़कर मैंने ऐसा किया। वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि मोबाइल ऊपर की जेब में रखने से इसका सीधा असर दिल पर पड़ता है। मोबाइल तरंगें और वाइब्रेशन आप को दिल का मरीज बना सकती है। मुझे भी पता नहीं क्या खुराफात सूझी? दिल का मर्ज देने वाली तमाम दूसरी चीजों को छोड़ मैंने अपने प्यारे मोबाइल को ही दिल से दूर कर दिया। विश्वकर्मा पूजन के वक्त दफ्तर में धम्म से जमीन पर बैठ गया। ध्यान ही नहीं रहा और बेचारा नोकिया चकनाचूर हो गया। मैं अवाक रह गया।
भगवान विश्वकर्मा की ओर देखा और मन ही मन कहा-हे भगवान क्या गलती हो गई...
मैं इतने जोर से बैठा था कि मोबाइल की आत्मा रूपी सिम और प्राण वायु बैटरी को छोड़कर बाकी सारा नश्वर शरीर स्वर्गवासी हो गया। आसपास बैठे लोग मातमपुर्सी में जुट गए। एक-दो साथियों ने ध्वस्त मोबाइल को नोकिया केयर के वेंटीलेटर पर ले जाकर मरी चुहिया को गोबर सुंघा कर जिलाने जैसी कोशिश भी की। पर सब नाकाम। अब यादों के सिवा कुछ नहीं था। एक-एक करके तमाम पुरानी बातें याद आने लगीं। कितने शौक से मैने उसे तेरह हजार सात सौ रुपए में खरीदा था। बेटा शुभांग बड़ा हो रहा था। उसे भी मेरा मोबाइल बहुत पसंद था। वह कभी वीडियो बनाता तो कभी गेम खेलने लगता। अक्सर मोबाइल को लेकर वह मुझसे डांट खाता था। वैसे मैं खुद भी इस मोबाइल को लेकर अक्सर डांटा जाता। हमारी गृहलक्ष्मीजी की आदत है कि वह मोबाइल पर बात करते वक्त बड़ी गहराई मेरी फेस रीडिंग करती रहती हैं। चेहरे के भावों को देखकर उस अदृश्य आवाज के स्रोत को जानने की कोशिश करना उनका पसंदीदा शगल है। बातचीत के वक्त मेरा खिला चेहरा, चहकती आँखें और हल्की मुस्कराहट नजर आती तो खैर नहीं। अगर मैं अपने मनोभावों को छिपाने की कोशिश भी करता तो कभी उनकी सूक्ष्म निगाहों की एक्स-रेज से बच पाया। उन्हें यह बिलकुल पसंद नहीं कि कोई महिला मुझे फोन करे। अक्सर मोबाइल झगड़े की वजह भी बन जाता। मोबाइल की डेड बॉडी देखकर मैं फिर सोचने लगा कि श्रीमती जी शायद अब जरूर खुश होंगी। ठीक उसी तरह जब मैंने अपनी पुरानी बजाज चेतक स्कूटर दान की थी। तब उन्होंने चैन की लम्बी साँस ली थी। मोबाइलफोन की तरह ही श्रीमती जी को मेरी स्कूटर की पिछली सीट से बेहद एलर्जी थी। उस पर बैठते वक्त हमेशा उनके मन में एक नकारात्मक भाव आता कि शादी से पहले जाने कितनी इस पर बैठी होंगी।
खैर, स्कूटर की बात फिर कभी। अभी तो हमें अपने मोबाइल को ही श्रद्धांजलि देनी है। जाने कितनी मिस कॉल्स उसमें दर्ज थीं। जाने कितनी टॉक वैल्यू उसमें खर्च हुई। कभी हिसाब करने को मन ही नहीं किया। मुझे याद है कि किस तरह अपने प्यारे मोबाइल को एक बार जब मैंने बेसाख्ता चूम लिया तो आसपास देखने वालों ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा था। उन्हें लगा कि जरूर फोन पर कोई रासलीला हुई है। हकीकत यह थी कि उस दिन फोन पर बताया गया था कि मुझे यूरोप जाने का वीजा मिल गया है। वो कितना अजीज़ था, इसका अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बात करते-करते अक्सर वह गरम हो जाता। इतना गरम कि कान जलने लगते, फिर भी मैं उसे नहीं हटाता था। कभी-कभी सात-आठ किलोमीटर की पैदल यात्रा हो जाती और मुझे पता भी नहीं चलता कि मैं कितनी दूर चल आया हूं। ऐसा था मेरा एन-72...
मोबाइल और भी जाएंगे पर अब वो कभी नहीं आएगा। असमय उसका जाना, जाने क्यों मुझे एक कालखंड के अंत सरीखा लग रहा है...
मेरी यादें, मेरे अफसाने और वो रूठने-मनाने की बातें लेकर वो सदा के लिए चल बसा...
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

बुधवार, 15 सितंबर 2010

वो सूखे झड़ते पत्तों को

वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था
उन चुर-मुर करते पत्तों की आह कभी न सुनता था
रोते थे, वो तड़पते थे ..पर हम को तो मालूम न था
उन तिनका-तिनका पत्तों को ये दर्द मुझी सा होता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

वो पत्ते थे, हाँ पत्ते थे पर क्यूं लगता है वो मै ही था
टूट के टहनी से गिरता फिर खुद को रौंदा करता था
रोके कौन और टोके कौन मैं कब किसकी सुनता था
सब कहते थे वो जुल्मी हैं पर मैं तो उन पर मरता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था

उनकी एक झलक को मैं तब सौ-सौ सजदे करता था
वो तिरछे-तिरछे रहते थे ..मैं पीछे-पीछे चलता था
उनकी खुशबू, उनकी आहट मैं हर पल खोया रहता था
वो कहते थे, हैं नहीं मेरे..और मैं सुनकर रोया करता था
वो सूखे-झड़ते पत्तों को मैं यूँ ही कुचला करता था/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

To LoVe 2015: डॉक्टर बोले तो...? Doctor's Strike......Rohit


घटनाक्रम
हाल ही में दिल्ली और जोधपुर में डॉक्टरों की हड़ताल ने लोगो को दहला दिया। एक के बाद एक होती मौतों ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर क्या वजह है कि मौत से दो-दो हाथ करने वाले हाथों ने अपना काम छोड़ दिया है। जौधपुर में 55 से ज्यादा मौते हो गईं। जिनमें 6 से ज्यादा नवजात शिशु थे। कई मौतों का कारण डॉक्टरों का ईलाज न करना रहा। 
पहली बार हुआ कि डॉक्टरों की हड़ताल का खुल कर समाज में विरोध हुआ। दिल्ली के सबसे बड़े और नामी अस्पतालों में एक सफदरजंग अस्पताल की हड़ताल का मुख्य कारण एक महिला डॉक्टर से मरीज के रिश्तेदारों या जानकारों का अभद्र व्यवहार रहा। देर रात आए एक मरीज की मौत हालांकि डॉक्टरों की लापरवाही नहीं थी। पर उत्तेजित परिजनों ने इसके लिए डॉक्टरों को दोषी ठहरा कर उत्पात मचाया। जिसका नतीजा अगले दिन हड़लात थी। 
इसके पहले भी पिछले महीने इसी कारण से सफदरजंग में हड़ताल हुई थी। प्रशासन ने सितंबर तक सुरक्षा का आश्वासन  दिया था। पर ठोस कार्रवाई होती, ये घटना घट गई। इस दोहरी हड़ताल के कारण पूरे देश में माहौल डॉक्टरों के खिलाफ बनता चला गया। 
समाज का सीधा सवाल था कि मरीजों की जान की कीमत पर हड़ताल क्यों? क्या सेना हड़ताल करती है। नहीं न। तो फिर डॉक्टर क्यों? जबकि वो जि़दंगी देते हैं...फिर एकाएक जिंदगी लेने का काम क्यों।  
जोधपुर में डॉक्टरों की हड़ताल ने मरीजों की जान लेनी शुरु कर दी।
उसी के बाद समाज में विरोध का स्वर तीव्र होने लगा। उनकी जायज मांगे भी नजायज लगने लगी। दिल्ली में हालांकि हालात बिगड़ने के पहले ही फिर से आश्वासन मिलने के बाद हड़ताल खत्म हो गई। पर तबतक एक मरीज की जान देश की राजधानी में इलाज न मिलने की वजह से जा चुकी थी।  
-
सीधे सवाल
अब सवाल उठता है कि जब डॉक्टर जानते हैं कि उनकी जरा सी लापरवाही मरीजों की जान ले लेती है, तो क्या उन्हें हड़ताल करनी चाहिए। सरकारी अस्पतालों में गरीब औऱ निम्न मध्यम वर्ग के मरीज ज्यादा आते हैं। ऐसे में उनकी जान से खिलवाड़ क्यों।
जवाब में डॉक्टरों का कहना है कि ""वो मजबूरी में हड़ताल करते हैं।" जबतक उनकी मांगे नहीं मानी जाती वो हड़ताल करते रहेंगे।
"पर क्या इस तरह की हड़ताल खुलेआम ब्लैकमेलिंग नहीं है।" 

याद हैं जगदीश चंद्र बसु ?
आगे बढ़ने से पहले जरा चलते हैं अंग्रेजों के जमाने में। 
गुलाम भारत में पिछली सदी में एक महान जीव विज्ञानी हुए थे जगदीश चंद्र बसु। जिस कॉलेज में वो पढ़ाते थे, उसमें उनकी तनख्वाह अंग्रेज प्रोफेसरों से कम थी। इस अन्याय के खिलाफ उन्होंने भी विरोध जताया। वो भी एक दो दिन नहीं पूरे दो साल तक। 
पर विरोध का क्या तरीका अपनाया उन्होंने? क्या पढ़ाना बंद कर दिया? क्या कॉलेज जाना छोड़ दिया या कॉलेज की पढ़ाई में रुकावटें डालीं? जी नहीं.। इस महानतम वैज्ञानिक ने दो साल तक लगातार एक हाथ पर विरोध की काली पट्टी बांधी औऱ बिना तनख्वाह लिए पढ़ाते रहे। हार कर दो साल बाद अंग्रेजी सरकार झुक गई।नका वेतनमान बढ़ाकर अंग्रेज प्रोफेसरों के बराबर कर दिया गया।
क्या महान वैज्ञानिक से हड़ताल का तरीका नहीं सिखा जा सकता?

चांदी का जूता बनाम सरकारी फटा जूता 
1-निजी क्षेत्र में पैसे की चकाचौंध ने डॉक्टरों को अंधा कर दिया है। निजी क्षेत्र में पैसा ही सबकुछ हो गया है।
2-मेडिकल इंश्योरेंस को देखते ही प्राइवेट अस्पताल की बांछे खिल जाती हैं। मरीज जैसे-तैसे बच तो जाता है, पर तबतक कंगाल हो चुका होता है।
3-दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में कुप्रबंधन औऱ उसपर सरकारी रवैया मरीजों औऱ उनके परिजनों की सांस हलक में अटका देता है। 
4-Govt Hospital में Nursing Staff और कई डॉक्टरों का रवैया उन्हें हमेशा गरीबी की जिल्लत औऱ बेबसी का एहसास कराता रहता है। 
5-इस कारण कई बार मध्यम वर्ग भी प्राइवेट डॉक्टरों के पास लूटने चला जाता है। कई बार ईलाज कराते-कराते कंगाल हो जाता है। 
6-सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर  को बुलाया जाता है दस बजे रात में, वो पहुंचते हैं दिन में। निजी अस्पताल में अपने सब काम छोड़ कर यही महाश्य समय पर हाजिर हो जाते हैं। 
आखिर वहां पैसा बोलता है 

सरकार बोले तो टांय-टांय फिस्स
सियासत और प्रशासन का ढुलमुल रवैया हालात बदतर बनाते जा रहे हैं। 1-डॉक्टरों की तमाम मांगों के बाद आज भी देश का राजधानी में हर अस्पताल में डॉक्टरों की सुरक्षा रामभरोसे है। 
2-सीनियर डॉक्टरों के कई पद रिक्त पड़े हैं, जिन्हें भरा नहीं जा रहा। 
3-सरकारी डॉक्टरों के काम के घंटे काफी बढ़ जाते हैं।
4-नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी है। 
5-वरिष्ठ चिकित्सकों की सैलरी भी कोई बहुत ज्यादा नहीं है। पर गरीब मुल्क के हिसाब से कम भी नहीं है। 
6-सरकारी मशीनरी डॉक्टर के सीटों में इजाफा करने में तमाम दिक्कतें गिनाती है।
7-वैकल्पिक स्वास्थ्य सेवा का सरकार के सौतेले व्यवहार ने बंटाधार कर रखा है।  
8-जो आर्युवेद आसानी से आम लोगो की पहुंच में था। आज  इसके दाम फाइव स्टार होटल को मात देते नजर आ रहे हैं। 
9-सियासी नेताओं में इच्छाशक्ति के अभाव ने हालात बदतर कर रखे हैं।
10-बिना उंची पहुंच के सरकारी अस्पतालों में लगे डॉक्टरों को अच्छे काम के बाद भी तारीफ नहीं मिल पाती।



गरीब की ऐसी की तैसी
इन सब पाटों में पिसता है आम भारतीय नागरिक। जान जाती है गरीब, निम्म औऱ मध्यम वर्ग की। ऐसे में बेबस औऱ लाचार समाज कैसे जानलेवा हड़ताल का समर्थन करे। अपनी जायज मांगों को मंगवाने का ये नजायज हड़ताल का तरीका अब डॉक्टरों को छोड़ देना चाहिए। इससे किसी का भला नहीं होने वाला। 

"मरीजों की जान की कीमत पर मांगें मनवाने का आखिर औचित्य क्या है?"
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

To LoVe 2015: Indian Political Scenario..2..वर्तमान राजनीतिक परिद्श्य और युवा..Rohit

भारत अपने स्वभाव से धार्मिक है..अध्यात्म उसकी रगो में दौड़ता है। सफलता के चरम पर पहुंच कर भी देश का युवा ऊपर वाले के दरबार में सिर झुकाता है, चाहे वो किसी भी धर्म का हो। ऐसे में यहीं से, इसी परिद्श्य में, युवाओं के बीच एक सवाल बार-बार सिर उठाता है। आखिर वो किस दिशा में जाए? मंदिर बनाए या मस्जिद बनाने के नाम पर अपने ही भाईयों का खून कर दे। या नई दिशा लेकर आगे बढ़े?
 देश का युवा मेहनत से जी नहीं चुराता। हर युवा की जिदंगी एक ही होती है। वो कड़ी मेहनत करना चाहता है। अपने परिवार के साथ खुश रहना चाहता है। देश की तरक्की में योगदान देना चाहता है। पर बिना विकल्प वो इतना दिग्भ्रमित हो चुका है कि जहां विकल्प होता है, वहां भी नए रास्ते को पकड़ने की जगह पुरानी लीक पर चलने लगता है।
 इसी महीने अयोध्या के विवादित ढांचे का फैसला आना है। पर क्या होगा उस वक्त। फिर से एकसाथ देश को अलग अलग धर्म में बांटने की तैयारी होगी। अमीर-गरीब के दायरे से निकाल कर युवाओं को फिर से कहा जाएगा धर्म की धूनी जमाओ। नितांत व्यक्तिगत आस्था को शैतान के हवाले करो...,मस्जिद के नाम पर जेहाद करो....मंदिर के नाम पर कट मरो। इसमें शक नहीं कि देश के बहुसंख्यक की आस्था का सवाल है। मेरे अराध्य का जन्म स्थान भी है। पर सवाल है कि क्या लोकतंत्र  में सतत बातचीत से इसका हल नहीं निकल सकता? निकल सकता है, अगर ईमानदार प्रयास हो। सियासत बीच में न हो।
ऐसी राजनीतिक स्थिती में जरुरत है ईमानदार कोशिशों की। कोशिश नहीं,..कोशिशों की। राष्ट्रभक्तों को एकजुट होने की जरुरत है। छद्म सेकुलर और धार्मिक कट्टरपन को दरकिनार करने की है। जो राष्ट्रीय विचारधारा अंदर ही अंदर बह रही है, उसे जरुरत है सुभाष चंद्र बोस की। नेताजी  की अगुवाई की... भगत सिंह का जोश आज भी जिंदा है। भारत की वर्तमान दिशा में शिद्दत से Subash Chandra Bose जैसी सोच के नेता की जरुरत महसूस की जा रही है।  आजकल सियासत लोगों को अनेक स्तर पर बांटने की नीति पर अमल कर रही है। ऐसे में खुद देश के युवा को आगे आना होगा....Kashmir में जो Pakistani Propaganda चल रहा है उसे समझना होगा। असम, ..त्रिपुरा.. ..नागालैंड में चल रही विश्वाशघाती चीन और नापाक पाकिस्तान की मिलीभगत से हो रहे खिलवाड़ को समझना होगा। 
धर्म के नाम पर हमारी आड़ लेकर, हमारा खाकर हम पर ही हमला करने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों से देश को निजात दिलानी होगी। पर अफसोस ऐसा आसानी से होता नहीं दिख रहा। सियासत इन्हें इस्तेमाल करने की कोशिश त्यागती नहीं दिख रही। इस राजनीतिक परिद्श्य में युवाओं को समझना होगा, विचार करना होगा। कुछ न कर सकें तो देश की रहनुमाई में लगे लोगो का समर्थन ही करें। पर कुछ तो करें। आखिर कब तक चुप बैठे रहेंगे? कब तक धर्म के नाम पर इस्तेमाल होते रहेंगे? याद रखना होगा कि देश धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं। हजारों साल पहल नीति और अनीति के बीच महाभारत छिड़ी थी। नई सदी में इस सब से देश को बचाना होगा।  वर्तमान समय सबसे बेहतर है देश को एक दिशा देने के लिए। इस वक्त साहस के साथ औऱ अड़ कर देश को नक्कारा लोगों से निजात दिलाने का सबसे बेहतर समय है। दोस्तों मादरे-वतन से बढ़कर कुछ नहीं होता...बस ये याद रखना।..................(क्रमशः)
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

To LoVe 2015: कैद में जन्मे कान्हा....कैद में कत्ल सिपाही..कौन कंस?





..................................................................................
आओ  हम शिखंडी गीत गाएं

कान्हा का जन्म हो गया..कैद में एक बार फिर कान्हा ने जन्म लिया..मथुरा में कंस की कैद से छुटकारा भी पा लिया रातों-रात....जमकर बरखा रानी भी बरसीं....जैसा की हर जन्माष्टमी पर होता है..राजधानी दिल्ली में तो दिनभर झड़ी लगी रही....सारा दिन मेघ गरजते रहे..बरसते रहे..। ऐसे ही मथुरा में भी बरसों पहले बरसे थे मेघ...ऐसी ही रात में  कैद में जन्म लिया था कान्हा ने....यमुना जी उफान पर थी....बीती रात मथुरा से लेकर मुंबई तक भक्ती उफान पर थी कान्हा के जन्म पर..कान्हा के इसी मथुरा से एक रिश्ता है तब के मगध औऱ आज के बिहार का....कान्हा का मामा कंस....कंस का ससुर जरासंध....जरासंध जो मगध नरेश था....कान्हा ने कंस से मथुरा को निजात दिलाई....फिर भीम के हाथों जरासंध का वध कराकर मगध यानि आज के बिहार को मुक्ति दिलाई....द्वापर के बाद आज भी एक रिश्ता बना कान्हा और बिहार का..यहां मथुरा में कैद यदुकुल गौरव वासुदेव की गोद में आए कान्हा...ठीक कान्हा के जन्मदिन पर बिहार में कोई जन्म से मुक्त कर दिया गया....मथुरा से दूर मेरी नजर अटकी रह गई बिहार पर....यहां भी कुछ कैदी थे..नस्सली रुपी कंस की सेना की कैद में..वासुदेव यादव नरेश थे...सत्ता थे....उधर लखीसराय में कैद सिपाही सत्ता के एक अंग....मथुरा में कान्हा ने जन्म लिया....मां-बाप की गोद से बिछुड़े..पर यशोदा मैया की गोद में पहुंच जाते हैं....उधर बिहार के लखीसराय में कंस की सेना यानि नक्सली कुछ बच्चों को अनाथ बना देते हैं....एक मां से उसका बेटा छीन लेते हैं.....आपको भी एक मां की गोद से ले लिया जाता है....पर दूसरी मां की गोद में पहुंचा दिया जाता है...कैद में पिता वासुदेव मां देवकी के साथ थे....यहां कलयुग पर आपके जन्मदिन पर कान्हा....एक पत्नी से उसका सुहाग छीन लिया जाता है...आपको कैद से छुटकारा मिलता है....बिहार के कैदियों में से एक का कान्हा के जन्म के दिन ही कत्ल हो जाता है..कान्हा आपके माता पिता के साथ अन्याय किया कंस ने...पर कान्हा हमारी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर  कौन है कंस यहां?..बताओ कान्हा.....कान्हा ये कौन सा रिश्ता बनाया है इस बार आपने बिहार से..उन बच्चों से..कंस का नाश करते हैं आप..तो जरासंध औऱ कंस की सेना का संहार कौन करेगा..आपके अलावा कौन करेगा ये काम कान्हा....हम तो शिखंडी है....इसलिए शिखंडी बन गीत गा रहे हैं....झूम रहे हैं....इसलिए हमारी सत्ता भी शिखंडी बनी है....आपके जाने के बाद तो अर्जुन भी कहीं सो रहा...मोहग्रस्त होकर...मथुरा से लेकर मुंबई तक..किसी को चिंता नहीं है कान्हा....हम तो हांडी फोड़ने में लगे हैं..आपको दूध-दही से नहलाने में मग्न हैं..भले ही आज कई ग्वाल-बाल को नसीब न हो....पर कान्हा आपने पांडवों को राह दिखाई..वो विजित हुए..पर ये मरने वाला सिपाही नहीं जानता था कि वो..हम शिखंडियों का सेनानी था..शायद उसे इसी का दंड मिला..मोह में पड़े हमसभी लोगों को सत्ता के कर्णधारों को कौन देगा गीता का उपदेश कान्हा..हम तो हर साल आपका जन्म दिन मनाएंगे..कान्हा..पर आपके उपदेश नहीं मानेंगे.. आपके जन्म के समय भी अधिंयारी रात थी..आज भी देश में अंधियारा है..कंस की कैद में आपने जन्म लिया..कैद में आज नक्सलियों के हमारा लोकतंत्र है...आपके जन्म लेते ही कान्हा पहरेदार सो गए..और आप पहुंच गए यशोदा मैया की गोद में.....पर कान्हा यहां तो सभी सत्ता के पहरेदार पहले से ही सोये हुए हैं...फिर कैसे लोकतंत्र का सिपाही कत्ल हो गया..कैसे कोई अभागा कैदी मारा गया कान्हा..आखिर कैसे..क्योंकी हमें पता नहीं..मुंबई से मथुरा तक हम तो मग्न है परंपरा  का झुनझुना बजाने में..आपके  बोल तो कब का भूल चुके हैं हम..तो फिर सोते समाज..सोती सत्ता के पहरेदारों के बीच कैसे कोई मारा गया कान्हा...आखिर कैसे..कौन है कंस..बताओ न कान्हा..कौन है जिम्मेदार..हम शिखंडी या.....!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

शेखर...तुम वाकई बहादुर हो

सुबह दस बजे के करीब शेखर का मोबाइल पर मैसेज़ आया-
...आफ्टर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट प्रोसेज़ ऑफ न्यू सेल्स फार्मेशन कॉजेज फ्लक्चुएशन इन बीपी, वेट गेन-लॉस, टेरिबल वीकने, स्टोमच डिसऑर्डर... कुड नॉट वॉक और सिट फॉर लास्ट 10 डेज़, इट्स लाइक गोइंग टू बैक इनफैन्ट्स स्टेज़.. ..बट फ्यू डेज़ बैक आई डिसाइडेड टू टुक फर्स्ट बेबी स्टेप विदआउट सपोर्ट... इट फील लाइक बिगनिंग ऑफ ए न्यू लाइफ...
...यस, फ्यू मोर चैलेंजेज विल हैव टू फेस बिफोर गेटिंग डिस्चाच्र्ड फ्रॉम द हॉस्पिटल...
...शुड कम आउट फ्रॉम आइसोलेशन अराउंड फस्र्ट वीक ऑफ सेप्टम्बर एंड फाइनल डिस्चार्ज वुड बी अराउंड सेकेंड
...शेखर
संदेश पढ़ते ही मैं समझ गया कि शेखर की हालत ठीक नहीं है। वो मेरे बहुत करीबी दोस्तों में एक है। पहली मुलाकात 2006 में मुंबई में हुई थी। काइज़र फाउंडेशन की एचआईवी-एड्स कान्फ्रेंस में मैं भी आमंत्रित था। शेखर उस वक्त लोकसत्ता के चीफ कॉपी एडिटर थे। शेखर और मैं दोनों ही काइज़र फेलो थे। मेरा पहला असाइनमेंट महाराष्ट्र था। मुंबई के कमाठीपुरा, पुणे के बुधवारपै जैसे रेडलाइट इलाकों और पंचगनी में फादर टॉमी के टीबी सेनीटोरियम में जाकर एचआईवी एड्स से जुड़े सामाजिक-आर्थिक तथ्यों को जुटाने में शेखर ने मेरी काफी मदद की। बाद में मणिपुर, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, म्यांमार, कनाडा और यूरोप के कई देशों में फेलोशिप पर काम करते वक्त हम साथ-साथ थे। मौत से जूझते बेबस लोगों, समाज के तिरस्कृत व्यक्तियों और एचआईवी-एड्स जागरूकता को लेकर शेखर बेहद जुनूनी है। हाल ही में मराठी में लिखी उसकी किताब ...पॉजिटिव माइंड्स... आई तो उसकी पहली चंद प्रतियों में से एक शेखर ने मुझे भेजी। इससे पहले जब भी कोई बड़ी कामयाबी मिली या परेशानी हुई तो हमेशा उसका फोन आया। तीन साल पहले उसे इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप का रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला। फिर वह अमेरिका के जॉन हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में हुई तीन हफ्ते की वर्कशॉप में भाग लेने के लिए गया। विषय था-...लीडरशिप इन स्टै्रटजिक हेल्थ कम्युनिकेशन...। लौटने के बाद उसने वहाँ के अनुभव बताए थे। साथ ही यह भी बताया था कि अब उसका अगला विषय ...माइग्रेशन या पलायन... और उसके आर्थिक-सामाजिक प्रभाव हैं। बहरहाल, शेखर के बारे में इतनी सारी बातें करने का मकसद सिर्फ यह बताना है कि उसकी एक पत्रकार के तौर पर क्या हैसियत है। देशभर के अस्पतालों, गरीबों की सेहत, इलाज के सरकारी ढाँचे और एचआईवी-एड्स जैसे गूढ़ विषयों के बारे में शेखर जैसी गहरी जानकारी रखने वाले जर्नलिस्ट गिने-चुने ही हैं। उसके इस जुनून के पीछे सिर्फ एक संवेदनशील पत्रकार होना ही नहीं, बल्कि इंसानियत भी है। बतौर इंसान शेखर के दिल में आम लोगों के लिए मैंने जो कसक देखी, वह कम लोगों में होती है। ऐसा शख्स आज खुद अपनी जिंदगी के लिए लड़ रहा है। वह हिम्मती है। उसकी लेखनी ने ना जाने कितने मरते हुए जिस्मों में जान फूँकी है।
...वह मुझे भी कुछ न बताता। उसका मैसेज मेरे कई बार फोन और मैसेज करने के बाद आया। इतना अंदाजा तो मुझे पहले ही था कि जरूर कोई गंभीर बात है, पर हालत यहाँ तक पहुँच गई होगी, इसका मुझे अंदाज नहीं था। कुछ महीने पहले बात हुई थी तो शेखर ने बड़े ही हल्के-फुल्के अंदाज में बताया था कि पीठ में कुछ गांठे हैं। जाँच में शुरुआती दौर का कैंसर निकला है। डॉक्टरों ने कहा है, ठीक हो जाएगा। बाद में उसने बताया कि खून के कुछ कम्पोनेंट ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। इसके लिए काफी पैसों की जरूरत भी थी और मुझसे बातचीत का सार यह था कि किस तरह से अधिक से अधिक मदद जुटाई जा सकती है। हम दोनों ने मिलकर कुछ कोशिशें भी की। फिर काफी दिनों तक कोई बात नहीं हुई। आज शेखर का मैसेज मिला तो काँप गया।
मैंने तुरंत दूसरा संदेश भेजा-
.. शेखर मैं तुम्हारे लिए अपने दोस्तों से मदद की अपील करना चाहता हूँ... क्या तुम्हारी इजाजत है...

करीब दो घंटे बाद उसका जवाब आया-

सुधीर... चिंता मत करो ...15 दिन में डिस्चार्ज करने की बात डॉक्टर ने कही है... कैंसरस सेल खत्म हो चुके हैं ...स्टेम सेल थेरेपी...क्यूरेटिव मैथेड है...आनेवाले 5-6 महीने संक्रमण से बचना होगा...आप सबकी दुआ तो साथ है ही...तो कोई टेंशन नहीं..। थोड़ी देर बाद फोन भी आ गया। उसने कहा..तुम तो जानते ही हो कि हमने एचआईवी से लड़ते लोगों के बीच काम किया है। वो लोग तो बीमारी के साथ-साथ तिरस्कार भी झेलते हैं। कम से कम अपने साथ ऐसा नहीं है। लोग मुझसे मिलने आते हैं। मेरे सामने वाले बेड पर रायपुर के एक बच्चे को भी मेरी जैसी बीमारी है। उसके इलाज का खर्चा 50 लाख से ज्यादा है। मेरा कम से कम इतना तो नहीं है। मैं उसे देखता हूँ तो मेरी चिंता और तकलीफ दोनों कम हो जाती हैं..तुम चिंता मत करो। .. मैं जानता हूँ कि शेखर स्वाभिमानी पत्रकार है। लोकसत्ता के उसके पुराने सम्पादक कुमार केतकर ने उसके इलाज के लिए काफी कोशिश की हैं। वह अब किसी से कुछ नहीं कहेगा और मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा ..शेखर तुम वाकई बहुत बहादुर हो..ईश्वर तुम्हारे जैसी हिम्मत हर उस शख्स को दे, जो बीमारी या मुसीबतों से लड़ रहा है-आमीन।
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <