मंगलवार, 31 अगस्त 2010

एक दिन रिचर्ड गेर के साथ

बात शायद 1991 की है। बीस साल की उम्र थी। बीए फर्स्ट ईयर में था। हिन्दी मीडियम से पढ़ा था। मुंबइया फिल्में देखता था। लिहाजा अंग्रेजी फिल्मों की खास समझ मुझमें थी नहीं। फिर भी दोस्तों के कहने पर मैं लखनऊ के मेफेयर सिनेमाघर में ..प्रेटी वुमन.. देखने गया। बकौल एक दोस्त-फिल्म में काफी ..सीन.. थे। हमारे जैसे ज्यादातर छात्र अंग्रेजी फिल्मों को खास इसी उद्देश्य से देखने जाते थे। खैर फिल्म देखने जाने से पहले अपने एक मित्र से मैंने कहानी जान ली और पहुँच गए मेफेयर पर जब बाहर निकले तो कोई ..सीन.. याद नहीं था, याद था तो बस जूलिया रोबर्ट्स का खूबसूरत चेहरा और रिचर्ड गेर की जबरदस्त एक्टिंग। फिल्म देखते वक्त कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं खुद रिचर्ड गेर के साथ म्बा वक्त बिताऊँगा। पर वो दिन मेरी जिंदगी में आया...

तारीख 13 अगस्त 2006, टोरंटो आए करीब एक हफ्ता बीत चुका था। यह मेरे जर्नलिज्म करियर के तब तक के बेहतरीन असाइनमेंट्स में से एक था। असाइनमेंट यानी ..वर्ल्ड एड्स कान्फ्रेंस.. का कवरेज। मुझे यह मौका हेनरी जे काइज़र फैमिली हेल्थ फाउंडेशन के फेलो के तौर पर मिला। हिन्दुस्तान लखनऊ में मैं सीनियर कॉरस्पॉन्डेंट के तौर पर हेल्थ बीट कवर करता था। एचआईवी एड्स पर काम करने के लिए यह फेलोशिप उसी दौरान मिली थी। सांध्य समाचारपत्र ..संसार लोक.. से नौकरी शुरू करने के बाद खुद को इस हद तक लाने की खुशी से मैं काफी हद तक आत्ममुग्ध था। बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, यूनिसेफ, वल्र्र्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन और कई अन्य यूएन एजेन्सियों के प्रमुखों से रूबरू हो चुका था। एक्साइटमेंट उस वक्त चरम पर पहुँचा जब पहले ही दिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान आमना-सामना हुआ। पहली बार समझ में आया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रेस कान्फ्रेंस किस हद तक प्रायोजित होती हैं। सवाल पूछने वाले पत्रकार पहले ही तय होते हैं। मीडिया मैनेजमेंट से जुड़े लोग उनके सवाल एक पर्ची में लिखकर ले लेते हैं ताकि जवाब देते वक्त कोई दिक्कत न हो। सवाल तो पूछ नहीं पाए, ऊपर से रही-सही कसर क्लिंटन के सुरक्षा घेरे ने पूरी कर दी। उस वक्त बड़ा क्रेज था क्लिंटन का। कुछ ही देर में क्लिंटन हाथ हिलाते हुए वापस चले गए। उनके जाते ही कल्पना जैन आ गईं। वो उस वक्त काइजर फाउंडेशन की अंतरराष्ट्रीय फेलो थीं। उनसे मैंने हेल्थ जर्नलिज्म के बारे में काफी कुछ सीखा था। वो सबको काइजर के कैम्प ऑफिस में ले आईं। काइजर फाउंडेशन की सीनियर ऑफिसर पैनी डैखम पहले से ही मौजूद थीं। पैनी एक कुशल मैनेजर के साथ-साथ बेहद संवेदनशील मेहमाननवाज भी थीं। उन्होंने यह बताकर सबको खुश कर दिया कि हॉलीवुड स्टार रिचर्ड गेर सिर्फ काइज़र से जुड़े पत्रकारों से मिलने के लिए खासतौर पर वहाँ आने वाले हैं। रिचर्ड गेर का नाम सुनते ही मेरे सामने हॉलीवुड फिल्म ..प्र्रिटी वुमन.. के कुछ दृश्य घूम गए। विदेशी फिल्मों की अल्प जानकारी के बावजूद अभिनेत्री जूलिया रोबर्ट्स को मैं काफी पसंद करता था। जूलिया ..प्रिटी वुमन.. की नायिका थी और रिचर्ड गेर उनके को-स्टार। इन दोनों की एक और फिल्म ..रन अवे ब्राइड.. भी मैंने देखी। रिचर्ड गेर के बारे में मेरी तब तक की जानकारी इन दो फिल्मों की वजह से ही थी। तब तक उनका जयपुर का खासा चर्चित शिल्पा शेट्टी चुंबन कांड नहीं हुआ था, जिसमें उनकी गिरफ्तारी तक के आदेश हो गए थे। अलबत्ता इतना मैं तब भी जानता था कि रिचर्ड गेर का हॉलीवुड में वही दर्जा है जो बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन का। दोनों हैं भी समकालीन। अमिताभ की पैदाइश चालीस के दशक की है और रिचर्ड गेर की 1949 की। सत्तर के दशक की शुरुआत में अमिताभ जंजीर और दीवार से फिल्मों में जबरदस्त एंट्री ले रहे थे। ठीक उसी सम में रिचर्ड गेर ..अमेरिकन जिगेलो.. के जरिए हॉलीवुड पर छाने की तैयारी में थे। दुनिया की मशहूर मॉडल सिंडी क्राफोर्ड से लम्बा इश्क लड़ाने के बाद उन्होंने शादी की। यह जानकारियाँ तो गाहे-बगाहे मुझे पहले भी मिल चुकी थीं, पर टोरंटो में वह बिलकुल नए रूप में सामने थे। यहाँ उनका परिचय एचआईवी-एड्स एक्टिविस्ट के तौर पर था। दोपहर एक बजे के करीब रिचर्ड गेर काइज़र के कैम्प में पहुँचे। फिल्मों में हमेशा उन्हें क्लीन शेव देखा था, पर अभी उनके चेहरे पर अच्छी खासी दाढ़ी-मूछ थी। इससे नीली जींस पहने इस शख्स के स्टारडम में कोई कमी नजर नहीं आ रही थी। गेर के पीछे-पीछे मुंबई की मशहूर उद्योगपति परमेश्वरन गोदरेज और उस वक्त स्टार टीवी के सीईओ पीटर मुखर्जी भी दाखिल हुए। हमें उनके आने की उम्मीद नहीं थी। खैर तीनों लोगों ने एक संक्षिप्त प्रेस कान्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने भारत में एचआईवी-एड्स जागरूकता को लेकर चलाए जा रहे ..हीरोज़ प्रोजेक्ट.. से जुड़ी कु जानकारियाँ दीं, जिसमें सबसे अहम बात यह थी कि इन तीनों सेलेब्रेटीज़ के आर्गनाइजेशन मिलकर इस प्रोजेक्ट को भारत में अभी दो साल और चलाएँगे। जाहिर है प्रोजेक्ट के आगे बढऩे से हिन्दुस्तान में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों और एचआईवी संक्रमित लोगों को फायदा पहुँचने वाला था। परमेश्वरन गोदरेज मुझे कुछ रिजर्र्व महिला लगीं। अलबत्ता पीटर मुखर्जी और रिचर्ड गेर बेहद जमीनी नजर आए। पीसी के बाद दोनों के साथ करीब एक घंटे तक मेरी व अन्य पत्रकारों की खूब बातचीत हुई। इस दौरान न तो पीटर ने कभी इस बात का अहसास होने दिया कि वे स्टार टीवी के सीईओ हैं और न ही रिचर्ड गेर ने कि वे हॉलीवुड के कितने बड़े स्टार हैं। पीटर यह भाँप चुके थे कि वहाँ मौजूद कई लोगों के मन में यह ख्वाहिश है कि वो रिचर्र्ड के साथ फोटो खिंचवाए। मुखर्जी ने बड़ी आत्मीयता से सबको अपनी तरफ से ऑफर किया कि आप लोग फोटो कराएँ। इस दौरान गेर ने बताया कि किस तरह से वे तिब्बत को आजाद कराने की मुहिम पर लगे हुए हैं। किस तरह चीन उनका विरोध करता है। गेर फाउंडेशन के बारे में बताया कि किस तरह उनका संगठन भारत में एचआईवी एड्स के प्रति लोगों को जागरूक कर रहा है। सारा कुछ बहुत मजेदार रहा। रिचर्ड ने मुझसे पूछा..हिन्दी के पत्रकार एचआईवी-एड्स के लिए क्या कर रहे हैं। मैंने उन्हें बताया कि उस वक्त तक खुद पत्रकार भी इस संक्रमण को लेकर खास जागरूक नहीं थे। अक्सर संक्रमित व्यक्तियों के सही नाम पते के साथ उनके बीमार होने की खबर को जोर-शोर से छाप दिया जाता है। खबर के असर से संक्रमितों के समाज से बहिष्कृत होने के उदाहरण भी उन्हें बताए। गेर को पहले से भी यह जानकारी थी कि भाषायी पत्रकारों में खासतौर पर हेल्थ, एचआईवी और यौनकर्मियों से जुड़ी खबरों को लेकर वैसी संवेदनशीलता नहीं है, जैसी कि अंग्रेजी पत्रकारिता में। उनकी राय थी कि कस्बा और जिला स्तर पर पत्रकारों को सही व संवेदनशील पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है। दिलचस्प बात यह रही कि रिचर्ड ने इस दौरान फिल्मों पर कोई बात नहीं की। उन्होंने साफ कहा कि फिलवक्त सिर्फ एचआईवी। खैर तब तक परमेश्वरन गोदरेज घड़ी की ओर इशारा करने लगीं। पीटर और रिचर्ड ने बात खत्म की और निकल गए। बाहर दुनिया भर से आए सैकड़ों पत्रकार उनसे एक्सक्लूसिव बात करने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे थे। भारत से गया हम पत्रकारों का दल खुशनसीब था कि इन सेलेब्रेटीज़ के साथ हमें एक घंटे का वक्त कुछ इस तरह मिला कि वे हमारे ही बीच के बंदे हों। थैंक्स टू ..काइजर.., थैंक्स पैनी और वेरी-वेरी थैंक्स टू कल्पना जैन...
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रविवार, 29 अगस्त 2010

To LoVe 2015: Indian Political Scenario ..भारतीय राजनीतिक परिद्दश्य Rohit


   आज देश का राजनीतिक परिद्दश्य क्या है..इसे कोई नहीं समझ पा रहा। न ही पढ़ी-लिखी जनता कुछ समझ पा रही है, न ही गांव और कस्बों में रहने वाली जनता। कोई भी ऐसी विचारधारा नहीं है जो देश के ज्यादातर लोगों के दिल को प्रभावित करती हो। देश में मोटे तौर पर तीन राजनीतिक विचारधाराएं है, मगर तीनों ही विचारधाराएं अपने में ही इतनी उलझ गई हैं कि खुद उनके ही कर्णधारों की समझ में कुछ नहीं आ रहा।

देश पर राज करने वाली कांग्रेस के पास एक युवा चेहरा है। जो पिछले छह साल से देश को समझ रहे हैं। फिलहाल वो देश की जटिलता में नए सिरे तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं एक विचारधारा वो है जो विपक्ष में है,..और बार-बार घुमकर बीस साल पीछे चली जाती है।
   सत्तारुढ़ पार्टी कांग्रेस दशकों पुरानी तुष्टिकरण की नीति से बाहर आते-आते रह जाती है। धर्मनिरपेक्ष होने की कोशिश करते-करते तुष्टिकरण करने लगती है। तो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी बार-बार उदार होने की कोशिश करते-करते, कट्टरपंथ का जामा पहन लेती है। दोनो ही विचारधारा को ये समझ नहीं आ रहा की कैसे आगे बढ़ा जाए।
इन सबके बीच एक तीसरी विचारधारा है, जिसका एक हिस्सा पिछले तीन दशक से बंगाल पर काबिज है। ये विचाराधारा केरल और त्रिपुरा में भी प्रभावशाली औऱ सत्तानशीं रहती है। अब हालत ये है कि खुद को आधुनिक करने के फेर में ये वामपार्टियां बुरी तरह से उलझ गई हैं। हिंदी क्षेत्र से काफी पहले ही इस पार्टी का बोरिया-बिस्तर गोल हो चुका है। चीन से सबक लेते हुए भी ये पार्टियां अपने को बदल नहीं पाई हैं। समाजवाद की जगह सत्ता के निरंकुश इस्तेमाल की नजीर उसने सिगुंर में दिखाई है। मनमोहनी नीति का अनुसरण करने के चक्कर में साल में दो या तीन फसल देने वाली जमीन पर कंक्रीट का जंगल खड़ा करने का औचित्य क्या है, ये खुद उसके ही लोगो की समझ नहीं आया है अब तक।
सेज के नाम के देश भर के किसानों उबल रहे हैं। उसके बदले में किसानों ने जो प्रस्ताव पेश किया है, उसका जवाब नहीं होने के कारण सत्ता चुप बैठी है। ताकत का अपने ही लोगो पर प्रयोग हो रहा है। आंख बंद कर किसी नीति को लागू करने के दुष्परिणाम आज देश भर में दिख रहे हैं। 
   आज के माहौल को समझने के लिए 2009 में चलते हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के पास एक नहीं दो युवा चेहरे थे। भले ही दोनो गांधी परिवार से थे। वहीं मुख्य विपक्षी दल बीजेपी ने अपने तपे हुए नेता पर भरोसा किया।
  जरा 2009 के चुनाव में दोनो ही पार्टी के मुख्य प्रचारक की बातों पर गौर करें। एक जब बोलता तो नए विजन की बात करता। देश के युवाओं को आगे बढ़ाने की बातें करता। दुसरी पार्टी के कर्णधार जब बात करते...पुरानी बात दुहराते लगते। गांधी परिवार पर ही निशाना साधते नजर आते। देश का युवा दोनो ही पक्षों से नए भारत की बात सुनना चाहता था। पर अफसोस ये बात कोई पुरी तरह से कह नहीं सका। किसी नए विजन को कोई ठीक से लेकर सामने नहीं आया। 
   क्या ये सच नहीं है कि 2009 की लोकसभा जीत कांग्रेस की जीत से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी की हार नहीं थी? भाजपा के नंबर वन नेता को ऐसे प्रोजेक्ट किया गया जैसे वो किसी भी तरह प्रधानमंत्री बन जाना चाहते हों। उधर देश के सबसे बड़े सूबे में बीजेपी में आए नए नवेले गांधी चिराग ने ऐसा राग छेड़ा कि जो वोट थे, वो भी बिदक गए औऱ कांग्रेस की झोली में जा गिरे। राहुल गांधी जब बोलते नए भारत को बनाने का सपना दिखाते। नेता विपक्ष चुनाव में जब बोलते गांधी परिवार के खिलाफ से ही शुरुआत करते।  
समय-समय पर किस तरह से चुनाव के लिए राग बदला जाता है, गुजरात में मोदी से बेहतर कोई नहीं जानता। मगर ये भाजपा के कर्णधारों को समझ में नहीं आया। आज मोदी गुजरात में भाजपा के एकछत्र नेता हैं। भले ही उनको गुजरात के बाहर अबतक कोई खास सफलता नहीं मिल पाई है।
   मुझे याद आता है अपना बचपन, जब देश को इक्कसवीं में ले जाने का सपना दिखाया था स्वर्गीय राजीव गांधी ने। इसमें कोई शक नहीं कि कम्पयूटर क्रांति के जनक राजीव ही थे। ये दबी जुबान में, तो कभी खुलकर हर पार्टी के नेता मानते हैं। बाद में इक्सवीं सदी का सपना दिखाने वाले राजीव गांधी ने शाहबानो प्रकरण के बाद खुद पर ही बीसवीं सदी के कठमुल्ला होने का दाग लगा लिया। अब कुछ उसी तरह का सपना कांग्रेस के युवराज कहे जाने वाले राहुल गांधी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। आत्महत्या करते किसानों के साथ ही नक्सली हमलों ने उन्हें विवश कर दिया है कि वो सबकी बात करें, न की सिर्फ महानगरों की।
वहीं दुसरी तरफ सत्ता की दूसरी सबसे बड़ी दावेदार पार्टी मंझधार में है। अब तक ये अटल-आडवाणी के कद के आसपास तक का नेता पैदा नहीं कर सकी है। आपसी सिरफुटौव्ल ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा है। इसमें सब एकदुसरे की टांग खींच रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश की राजधानी में हुए चुनाव में देखने को मिला। जिसमें शीला दीक्षित के सत्ता में आने के आसार कम थे। लेकिन दिल्ली की भाजपा ईकाई आपस में ही लड़ती रही। शीला के आक्रमक तेवर का उतनी ही आक्रमक शैली में जवाब देने वाला कोई नेता बीजेपी के पास नहीं था। दोनो राष्ट्रीय पार्टियां धर्म के चक्कर से निकल नही पा रहीं हैं। 
   अब बची पूरे देश में अपना वजूद रखने वाली तीसरी विचारधारा कम्यूनिस्ट पार्टियों की। उसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है। मगर जो राष्ट्रभक्तों को एक आशा दे सकती थी....वो आज अपने अबतक के सबसे बड़े दुश्मन पूंजीवाद के जाल में ही उलझ कर रह गई है। पूरे देश में आज ये हाशिए पर नजर आ रहे हैं। ये वामपार्टियां सिर्फ एक ही काम पूरी शिद्दत से करती हैं, औऱ वो है आपस में लड़ने का।
   बाकी बची राज्यस्तरीय पार्टियां तो इन स्थानिय ताकतों के बारे में क्या कहा जाए..ये पार्टियों अपनी स्वार्थपूर्ती से आगे कुछ नहीं सोचती। धर्म और जाति की राजनीति ही उनकी ताकत है।एकसाथ देश के अधिसंख्यक लोगो के दिल पर राज करने का तरीका किसी को नहीं मिला है। नया भारत एक साथ पढ़ा-लिखा है...अनपढ़ है....अमीर है..गरीब है..। पर ये बात किसी की समझ में नहीं आ रही। गांव की जगह कस्बे और कस्बे की जगह नगर लेते जा रहे हैं। मगर ये बदलाव राजनीतिक सोच में अब तक नहीं आई है। 
 ..............................................(क्रमशः)

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सोमवार, 23 अगस्त 2010

...याद आई अभी...

यादों के उलटते पन्नो में,
तुम फड.फड. करती आई अभी,

चेहरा तंज और आँखें लाल,
गुस्से से भरी, तमतमाई हुई,

हर बात में इक उलाहना थी,
हर अदा में शिकायत भरी हुई,

मैं कितना बेजा था तब भी,
तुम हर पल जायज़ थी अब सी,

वो उसको देख मेरा हँसना,
फिर तेरा हफ़्तों लड़ते रहना,

मैं कैसा भोला पागल था,
न खुद को समझा, न तुम्हे कभी,

यादों
के उलटते पन्नो में,
तुम फिर याद आई अभी...
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शनिवार, 21 अगस्त 2010

To LoVe 2015: आज फिर लगी सावन की वो झड़ी है.....Rohit

काफी पहले कुछ गुजरा....फिर अपने से जूझता...जाने क्या करता....क्या सोचता...क्या सुनता....क्या देखता....भ्रमित मन चौराहे पर खड़ा था...जाने क्यूं? (लगभग 11 साल पुरानी रचना. बिना लाग लपेट के)

आज तुम्हारे सारे ख़त मैंने फाड़ दिए हैं
आज चौराहे पर खड़ा मैं देखता रहा
बारिश की रिमझिम के बीच
भींगती आती-जाती लड़कियों को
देर तक घूरता रहा बदन से 
चिपकी उनकी गीली कमीजें
आज बिसरा दिए मैंने सारे वादे
बड़ों की दी हुईं नसीहतें......
आज मैं देखता रहा बारिश में
भींगे बक्ष से निर्लिप्त सी 
पानी से अठखेलियां करती
हथेली में बूंदों को पकड़ती-समेटती
खिलखिलाती हुईं लड़कियां
चेहरों पर जिनके पड़ती बौछारों
लटों से टपकती बूंदों से 
बढ़ती उनकी सुदंरता से अनजान
सिर्फ उनकी बलखाती देह पर
तिरती रही मेरी नजरें कुछ इस तरह
जैसे बाग में भींगें गुलाब हों...
ख़त तुम्हारे चिंदी-चिंदी
चारों तरफ बिखर गए हैं
साथ में मेरी आंखों का पानी 
बूंदों में मिलकर बह गया है....
क्योंकी आज ही सारे ख़तों के साथ
तोड़ दिए हैं मैंने अपने सारे घेरे
शायद इसलिए मैं आज चौराहे पर खड़ा.....देखता हूं।।।।/a>
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रविवार, 15 अगस्त 2010

To LoVe 2015: मेरी जान तिरंगा...मेरी शान तिरंगा...। Rohit

दोस्तों आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। आकाश की अनंत ऊँचाईयों को छुने को बेताब सभी दोस्तों को देश के लिए..समाज के लिए कुछ करने का मौका मिले, आज के दिन भगवान से यही प्रार्थना करता हूं। आज देश की आजादी के 63 साल हो गए। महज 63 साल पहले भयानक खून-खराबे से निकला हिंदुस्तान आज शान से दुनिया के सामने खड़ा है। 
तमाम दुश्वारियों के बाद भी मुझे अपने देश पर फ़क्र है। बचपन में स्कूल में होने वाला ध्वाजरोहण याद आ रहा है। हम चाहे कितने भी शरारत में डूबे रहते...मगर...ध्व्जारोहण के समय....जैसे-जैसे तिरंगा ऊपर चढ़ता जाता,....राष्ट्रगान की धुन और बोल गूंजते..शरीर रोमांच और उत्तेजना से भर जाता। फिर बजता वंदे मातरम..हर लफ्ज के साथ सभी के आंखों में एक चमक सी आ जाती। लगता जैसे शान से लहराता तिरंगा हम में लिपटा हो..। आज भी जब ऊपर चढ़ता तिरंगा देखता हूं तो कानों में राष्ट्रगान की स्वर लहरियां गूंजने लगती हैं....होंठ खुद-ब-खुद सुजलां-सुफलां मातरम् गुनगुनाने लगते हैं।
तिरंगे का रुप स्वामी विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता और मादाम भीकाजी कामा से होते हुए अंत में पिंगली वेंकैया जी के हाथों फाइनल हुआ। इसमें एक परिवर्तन 1947 में हुआ...बीच वाली पट्रटी पर बने चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली। इसी तिरंगे को फहराने की खातिर आजादी से आज तक न जाने कितने वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहूति हंसते-हंसते दे दी है। देश के हर शहर....हर कस्बे में ऐसी शहादतों की मिसालें है।   
दोस्तों मुझे याद है करगिल..जहां तिरंगे की आन के लिए क्षण भर में हमारे हमउम्र दोस्तों ने दुश्मन के कलेजे को चीर दिया। जिन पाकिस्तानियों ने हिमालय कि चोटियों पर फहराते तिरंगे की ओर टेढ़ी आंख करने की कोशिश की थी..उन पाकिस्तानी सैनिकों की आंखे नोंच लीं इन वीरों ने।
18 हजार फुट की ऊँचाई पर तिरंगे की शान और देश की इज्जत की खातिर इन शूरवीरों ने जान दी  थी..और दुश्मन की जान ली थी। आजादी की 64वीं सालगिरह  पर आज किस-किस को याद करुं। मेजर आचार्य को...महावीर विजयंत थापर को..कैप्टन बतरा को...कैप्टन सौरभ कालिया को,...कैप्टन नायर को...कैप्टन मनोज पांडेय को,...कैप्टन नीकेझोकू को....लांसनायक संजय को..आखिर किस-किस को।
ये वो नाम हैं जो चाहते तो घर पर रह सकते थे। इंजीनियर..डॉक्टर बनकर या सरकारी नौकरी करके आराम से जीवन बीता सकते थे। कॉरपोरेट सेक्टर में जाकर धन की बरसात कर सकते थे। पर नहीं..ये वो युवा थे जिन्होंने इक्सवीं सदी के शुरु होने से ठीक पहले दुनिया को दिखाया...कि जब हिंदुस्तान का युवा दहाड़ता है तो दुश्मन दहल जाता है। ये वो ही युवा थे जिन्हें हर स्तर पर राजनीति ने बांटने की कोशिश की। बावजूद इसके राजनेताओं की अदूरदर्शिता और संकुचित सोच से उपजे संकट को हाड़ को कंपा देने वाली ठंड में....करगिल की चोटियों पर....बिना मुक्मल कपड़ों और जूतों के भी..इन युवाओं ने हमें निकाला और तिरंगे की लाज रखी।
आप जानते हैं कि इन शहीदों में कहां-कहां के लोग थे? देश के हर कोने से। देश के हर प्रांत..हर कस्बे से। कश्मीर से लेकर  कन्याकुमारी तक....। नागालैंड...मणिपुर..झारखंड..बिहार.... यही वो इलाके हैं न..जिनके बारे में एसी में बैठकर....आराम से कहा जाता है....ये इलाके पिछडे़ हैं..हिंसाग्रस्त हैं..वगैरह वगैरह..। पर दोस्तों ये सभी इलाके जो चंद गद्दारों या भ्रष्टाचारियों के कारण आज जलते दिख रहे हैं..इन इलाकों से भी...तिरंगे की शान में हिमालय पर गुस्ताखी करने वाले पाकिस्तानियों को चीर कर रख देने वाले यौद्धा निकले थे। 
वीर एक नहीं हैं.... महावीर एक नहीं.. परमवीर भी महज एक नहीं हैं..ये अनगिनत हैं। मुझे उस जाबांज नागा भाई की याद है....जिनकी शादी चंद दिनों बाद होनी थी। मगर.....जंग के बाद का उनका शारीरिक वर्णन करता हूं। दोनों हाथ.....बिना कलाई के...। दोनो पैर....बिना एड़ियों और पंजे के। क्या अस्सी चोट के साथ राणा सांगा थे ?....मालूम नहीं।.....अभी औऱ कितने सबूत चाहिए सो कॉल्ड पढ़े लिखे, अक्ल के अंधे लोगो को। ये जांबाज सिर्फ चंद पैसों के लिए सेना में नहीं आए थे।
भूला मैं उन चरवाहों को भी नहीं हूं..जिन्होंने पाकिस्तानी धोखेबाजों की सूचना फौज को दी थी....एक बक्करवाल की बात आज भी दिल में गूंजती है....हमारी फौजें आगे बढ़ रही हैं...। ये शब्द 'हमारी....दिल को कितना सुकुन देता है.....ये चंद पैसों की खनक के आगे बिके लोगों और गद्दारों की समझ में नहीं आएगा कभी।
शहीदों में अधिकतर मेरी हमउम्र के थे..एक द्दश्य हमेशा के लिए मेरे जेहन में कैद है....कैप्टन बतरा से इंटरव्यू करके हमारे एक सहयोगी करगिल से लौटे। हंसते-मुस्कुराते कैप्टन बतरा को हम टीवी पर देख रहे थे....तभी एक आवाज गूंजी...कैप्टन बतरा शहीद हो गए.....हम अवाक थे...। चंद मिनट में सामने हंसता चेहरा यादों में शिफ्ट होने के लिए चला गया था। जो कहते हैं कि युवा पीढ़ी बहक रही है...नशे में चुर और सेक्स की भूखी है..उन्हें खून से लथपथ औऱ कितनी लाशें चाहिए?....
जब शहीद सर्वोच्य बलिदान देकर देश के कोने-कोने में लौट रहे थे...तब मेरे दिमाग में एक ही प्रश्न कौंध रहा था.....कौन कहता है कि भारत एक नहीं है?..कौन कहता है कि हमारा खून अब गर्म नहीं रहा?.....कौन कहता है कि इनमें मैं नहीं था...आखिर कौन?..हर का जाना लग रहा था.. जैसे हमारा अपना वजूद हमें छोड़ कर जा रहा हो...।
शहीदे आजम का जोश..गांधीजी का असीम धैर्य..नेताजी की दुश्मन को ललकारती चुनौती..इस सारी विरासत को एक साथ हमने संभाला है..एक साथ...। सिर्फ संभाला नहीं....हिमालय की चोटियों पर साकार करके दिखाया है..। हर क्षेत्र में दिखाया है...।
आज़ादी से पहले बिस्मिल..अश्फाक..लाहिड़ी...शहीदे आजम..आजाद..उधम सिंह..मास्टर दा.। आजादी के बाद मेजर सोमनाथ शर्मा...नागरिकों में नीरजा मिश्रा...बताइए कहां कोई कड़ी टूटती है..कहां कोई युवा देश के लिए हंसते हुए जान देने आगे नहीं आया। जबकि आज कभी जात के नाम पर..कभी धर्म के नाम पर..कभी अमीरी-गरीबी की आड़ में..कभी आदमी-औरत के तौर पर..युवाओं को बांटने का काम चल रहा है। आखिर क्या आदर्श दिया गया है हमें राष्ट्रीय स्तर पर। सचिन न हों....कलाम न हों...तो क्या कोई आदर्श है? कोई है राजनेता कहलाने लायक? जबकि कलाम और सचिन दोनों राजनीति से नहीं हैं। यहां तक की ईमानदार प्रधानमंत्री भी राजनीति से नहीं हैं। 
दौलत के पुजारी भाषण झाड़ते नेताओं और एहसान फरामोश भ्रष्ट अधिकारियों की आंखों में मोतियाबिंद उतर आया हो और करगिल खो गया हो...पर हमारी आंखें आज भी स्पष्ट देखती हैं..आंखें बंद हो या खुली..हिमालय पर गरजते अपने दोस्तों को कभी नहीं भूल सकता मैं। मादरे-वतन की लाज रखने की खातिर जवानी की कुर्बानी देने वाले अपने भाइयों को कभी भूल नहीं सकता मैं। हिमालय की चोटियों पर दुश्मन को ललकारने वाले योद्धाओं को मुझे जैसे लाखों आम भारतीय नहीं भूलें हैं। भूलें भी कैसे?..हम जानते हैं कि हमारे हमउम्र साथियों ने नेताओं की..अधिकारियों की लापरवाही को ढकने के लिए..तिरंगे की शान की खातिर..हिमालय की सफेद चादर को लाल रंग से रंग दिया था..।
ये लाल रंग..सो कॉल्ड क्रांति के नाम पर बहता निर्दोष खून नहीं था....पत्थर फेंकते और विदेशियों के बहकावे में आए लोगो के कारण सिर से बहता खून भी नहीं था। हर युवा के पास दौलत नहीं होती..यही समाजिक परिवेश सबको दिखता है...हताश हर कोई होता हैं....सबका परिवार होता है..कई बार उगता सूरज आशाओं के साथ शुरु होता है....तो ढलता निराशा के साथ। बेचारगी हम सभी झेलते हैं.....पर इसका ये मतलब तो नहीं कि अपने ही देश को जख्म दें।
दिलों में जो लोग घर बनाते हैं...उन्हें किसी नेता-वेता की जरुरत नहीं है। भ्रष्ट लोग उन्हें साल में एक दिन श्रदांजलि देते हैं..भाषण झाड़ते हैं..पर हमें जरूरत नहीं खास दिन की। जरुरी नहीं कि नेता की तरह हम भी लोगो को दिखाएं की हमारे दिल में क्या है। वो तो वक्त आने पर हर बार हम आसामां को बता ही देते हैं कि हमारे दिलों में क्या है...। तिरंगे की शान के लिए कुछ दिन में एकबार फिर जान लड़ाने वाले हैं हमारे युवा..। एकबार फिर भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों औऱ नेताओं की वजह से देश की साख पर जो कालिख पुत रही है उसे मिटाने की जीजान से कोशिश करेगें देश के जाबांज। वो अपनी तैयारियों में जुटे हैं बिना किसी शोरशराबे के।
तमाम कमीने एवं भ्रष्ट अधिकारियों औऱ नेताओं की कमीनिगी के बावजूद....आने वाले कॉमनवेल्थ खेलों के लिए जाबांज तैयारी में हैं। पोडियम पर खड़ा खिलाड़ी तिरंगे को ऊपर चढ़ते देखता है..तो उसके आंखों में गर्व के आंसू होते हैं...। यही उसके सारे जीवन की जमा पूंजी है.....। मगर भ्रष्ट कमीनों को ये क्या समझ में आएगा?
दोस्तों बात लंबी हो गई न....। क्या करुं....ये ही है जो देश को हमें जिंदा रखे हुए है...। अंत में एक बार यही कामना कि चाहे कोई भी हो....हरके इंसान को....हरेक युवा को....देश के लिए..समाज के लिए कुछ करने का भगवान मौका जरुर दे..और भ्रष्ट लोगो के दिल में भी कुछ उजाला हो....तो कहिएगा मेरे साथ...आमिन..।
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रविवार, 8 अगस्त 2010

To LoVe 2015: CWG......"कॉमन" के "वेल्थ" से "गेम"..ब्याह में आप आ रहे हैं न?

आईए आपका स्वागत है.....देश की राजधानी में....देश के हर हिस्से की झलक देखने के लिए....अगर नहीं आए, ..तो फिर कहिएगा मत की राजधानी आपकी नहीं है...विश्वास कीजिए आपकी राजधानी ठीक आपके दूरदराज के शहर और गांव जैसी ही है...तो आइए अपने खेल कॉमनवेल्थ गेम में...भई कॉमन लोगो के वेल्थ का ही तो गेम है....तो सुस्वागतम....चलिए आने के सफर में दिल थाम के सुनिए....हाले-दिल-दिल्ली.... 
आजकल हम दिल्लीवालों की हालत ठीक वैसी ही है, ..जैसे किसी लड़की के शादी वाले घर की होती है, । जहां आखिर वक्त तक मचा होता है  अफरातफरी का माहौल....तो दिल्ली में भी चारों तरफ अभी ऐसा माहौल है, जैसे बरात दरवाजे पर पहुंचने वाली हो और मोटे हलवाई ने समान तैयार करने की जगह सबकुछ फैला रखा हो....सड़कें ऐसी खुदी पड़ी हैं जैसे टैंट लगाने वाले ने हर जगह टैंट बांधने के लिए गड्डे खोद दिए हों.....
और हमारे शानदार स्टेडियम, ..हे हे हे हे...इनके तो कहने ही क्या....अरे उनकी शान बहुत ही निराली थी.....खुबसूरत शमियाने की तरह इन्हें सजाया संवारा गया, ..यानि खड़ा किया गया....
पर नामुराद बैरी बरखा रानी को लगा ये रास नहीं आया..शायद किसी सौतिया डाह की वजह से वो ऐसी बरसीं,..ऐसी बरसीं की पूछो मत...बस कर दिया सत्यानाश....अब लग ऐसे रह रहा है जैसे मेकअप उतरने के बाद ससुरी कोई हीरोईन बन गई हो डरावनी चुड़ैल....शानदार शमियाना बारात के पहुंचने के समय से कुछ देर पहले ही जगह-जगह से चुने लगा है..

इस शादी यानि खेल को महाखेल बनाने में जुटे सरकारी बाबूओं के तो कहने की क्या। ये उन रिश्तेदारों की तरह हैं, ,,..जिन्हें जिम्मेदारी दी गई शादी में उपहार संभालने और व्यवस्था बनाने की......पर बाद में पता चला कि ये तो कई गिफ्ट ही गड़प कर गए हैं.....अब दीवार में मारते रहो मत्था की ब्रिटेन वाली भाभी ने क्या दिया...और अफ्रीका में बाबा आदम के जमाने में बसे चाचा ने क्या दिया....
गेम के रंग और भी हैं....इंद्रधुनष के सात रंग से भी ज्यादा....भई लड़की की शादी हो और मेन मीख न निकले ये कैसे हो सकता है...तो भैया....नेताजी लोग आपस में ही भिड़ रहें हैं...ठीक उस तरह जैसे बड़ी चाची या भाभी के बताए लड़के का रिश्ता ठुकराने पर, वो चेहरे पर सारे जहां की चिंता दिखाते हुए और अंदर से खुशी के मारे कुलांचे भरते हुए चारों तरफ दनदनाती फिरती कह रही हों....हमने तो पहले ही कहा था..", क्या जरुरत थी इस तामझाम की....घर की इज्जत का सवाल है वरना हम कुछ कहते क्या"?...वैसे अब कहने को बाकी कुछ रह गया हो तो कहें न..

इन सब के उपर हैं एक शख्स....हमारे देश के खेल मंत्री....पर जिनकी हालत लड़की के दादाजी की तरह है....देखिए शादी के कार्ड में दादाजी का नाम तो सबसे ऊपर होता है...पर शादी में उनकी एक नहीं  चलती....और अंत में बड़बड़ातेबड़बड़ाते थक-हार कर दादाजी बैठ जाते हैं भगवान भरोसे....मजबूरी में सबके सामने कहते रहते हैं कि शादी तो होकर ही रहेगी..वैसे भी बारात लौटा तो सकते नहीं..तो ठीक इसी अंदाज में संसद में मंत्री जी भी बैठ गए थे..ये कहते हुए कि मेरा भगवान मेरे साथ है...वैसे जनता भी तो भगवान भरोसे ही है..

अब जरा लड़की की बात कर लें..वैसे भई इतने तामझाम और अफरातफरी में लड़की से उसके दिल की बात कोई पूछता है भला....हो सकता है पूछते हों कहीं-कहीं..पर अपने यहां तो भई हॉरर किलिंग है..हीहीहीहीहीही..बंध गई न घिग्गी..वैसे पूछेगा भी कौन..हमारे पास सीबीआई है न....वैसे आप पूछेंगे की लड़की कहां हैं...तो सोचिए उस की तरह निरिह प्राणी कौन है?...हेहेहेहे(बेशर्मी की हंसी है ये)..समझे..जी हां..देसी खिलाड़ी....जानते हैं कैसे..दरअसल ये लोग बस लड़की की तरह टेसूए ही बहाते रहते हैं..(नारी मुक्ती मोर्चा वाले न आना..वरना हॉनर..समझे) जब देखो शिकायत..ये नहीं है,.., वो नहीं है...हद है यार.., नाच न जाने आंगन टेढ़ा....वैसे भी सब जानते हैं कि इन देसी खिलाड़ियों के बस की कुछ है तो नहीं...नौकरी और पेट की आग के आगे इन्हें चाहिए भी क्या...?????

वैसे भी अगर खिलाड़ियों को देश की इतनी ही चिंता होती तो...खुदी हुई सड़कों को ही सरकार से मांग कर उसपर हर्डल रेस यानि बाधा दौ़ड़ की प्रेक्टिस कर गोल्ड की दावेदारी पक्की नहीं कर रहे होते...किनारे पर बारिश की मेहरबानी से फ्री फंड में बने बड़े-बड़े तलैया में गोते लगा-लगा कर सोना निकालने की कोशिश नहीं कर रहे होते.......हां नहीं तो....

अब आपको अपनी बात बताते हैं...हम यानि अधिकतर दिल्ली के बांशिदे.....तो हमारी हालत उस गरीब रिश्तेदार की तरह हैं..जिन्हें धीरे से समझा दिया गया है कि भैया हमारी इज्जत रखना...और महंगे गिफ्ट लाना..पर हमारी औकात तो है नहीं..(ये रहने दे तब न)...इसका रस्ता भी इन्होंने निकाल लिया है..और हमें एक दिन प्यार से कहा गया कि आप परेशान न हों आप सबके थोड़े-थोड़े पैसे जोड़कर हम ले लेंगे और काम चला लेगे...बस उस दिन से बिरादरों हमपर दे दनादन..दे दनादन ठोके जा रहे हैं टैक्स पर टैक्स......

वैसे हम दिल्ली वाले भी कम नहीं हैं भैया....जबरदस्त चित्रकार हैं....मस्त रहते हैं...तनाव अपने पर कभी नहीं लादते..और हां योद्धा भी हैं हम....

अब हमारी चित्रकारी के नमूने देखने का शौक हो,..तो जरा पधारें म्हारे कनाटप्लेस....उधर कनॉट प्लेस के खंभे सफेदी से चमकने शुरु हुए ही थे.. इधर उसके नीचे भाई लोगो ने चुने-कत्थे के मिश्रण की पिचकारी का नायाब नमूना बनाने में देर नहीं की...ऐसे कई नमूने आप देख लेना घूम-घूम कर....

एक और गुण है हमारा कि हम तनाव को अपने से दूर रखते हैं...नहीं विश्वास होता..तो देखो भईए, हमें कहीं कोना मिला नहीं..वहीं धार मार के तनाव उतारने को तैयार हो जाते हैं हम....इस मामले में इंडिया गेट हो या बाबा आदम के जमाने का किला..हम भेदभाव नहीं करते....

आप हमारी दिल्ली के योद्धाओं को परखना चाहते हैं...तो जरा सड़कों पर उड़ते हमारे रॉकेट के सामने आकर देखना..वैसे  अगर आप सामने नहीं आए.., तो हम ही आ जाएंगे आपके पास....अरे सॉरी..आपके ऊपर अपनी कार समेत....हीहीहीही

तो है देशवासियों आप  आमंत्रित हैं अपनी (खामख्याली में ही सही) दिल्ली में...."कॉमन" "लोगो" के "वेल्थ" से होने वाले "गेम: में....अरे भई दूर के रिश्तेदार हैं तो क्या..लड़की की शादी में आशिर्वाद नहीं देंगे क्या? 72 देश से बाराती आ रहे हैं जी..

दिल्ली नो बार लूटी पिटी तो क्या, ..हर बार शान से बसी है दिल्ली...बाहर से आने वालों ने हर बार खून की नदियां बहाईं है तो क्या हम भष्ट्राचार की गंगा भी नहीं बहा सकते...आखिर हम भी दिल्ली के बच्चे ही हैं जी....

हमारी पांच हजार साल पूरानी दिल्ली की शान अनोखी है... जरा यमुना के किनारे-किनारे (अब ये न पूछना कि कहां है यमुना..हमें खुद ही नहीं दिखती तो हम क्या बताएं?) कुतुब मीनार से चलिए..तुगलकाबाद...दिल्ली सल्लतन पर राज करने वाले सुल्तानों के मकबरों से होते हुए लालकिला पहुंचिए...फिर नई दिल्ली आइए...और देखिए नए सिरे से अपनों के हाथों कैसे संवर रही (या लूट रही) है दिल्ली....तो आ रहे हैं न आप....?

हां एक बात और...दिल्ली आकर हमें न ढूंढने लगना..यार दरअसल हम दिल्ली वाले अक्सर ऐसे मौकों पर दिल्ली से बाहर जाने के लिए फेमस हैं...अरे हम तो चुनाव में भी पिकनिक बनाने निकल पड़ते हैं यार......
अब ये बात अलग है कि हकीकत में इस बार अपुन लोग बाहर नहीं जा रहे...बल्कि भागने का रास्ता ढूंढ रहे हैं शेरा की तरह....पर ये राज की बात है..आपको बताएं क्यों....? हैं...
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