शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

To LoVe 2015: Munshi Premchand .उपन्यास सम्राट किराए पर....रोहित

ये अजीब इत्तफ़ाक रहा। नीचे कल रात का वर्णन है औऱ मुंशी प्रेमचंद की 130वीं जयंती(1880) आज यानि 31 जुलाई को। इससे मैं कल तक खुद अनजान था। एक साप्ताहिक बाज़ार में अनायास ही मुंशीजी बातचीत का हिस्सा बने। कभी-कभी ऐसे वाकये हो जाते हैं जो खुद आपके लिए हैरानी का सबब बन जाते हैं....और बन जाते हैं जीवन की एक न भुलाने वाली याद....


आज काफी दिनों बाद किताबों की दुनिया में था। किताबों का ढेर सामने था, औऱ ग्राहक चंद। किताबों का विक्रेता कुछ शांत, लेकिन हल्का सा उदास। नजरें हर आते जाते को तौलते हुए, कौन किताबों का ग्राहक है...कौन नहीं.....मुझे आते देख उसका चेहरा खिल उठता है....मुझे भी अच्छा लगा...कोई तो खुश होता है मेरे आने से....
"भाई साहब कहां थे इतने दिन, गायब ही हो गए थे आप तो..." प्रफुल्लित होकर मेरे पास आकर पूछता है...।
"क्या बात है? आराम से बैठे हो..." मैं पूछता हूं।
"क्या बोलूं भाई साहब..एक घंटे से खाली हूं..पर आप आ गए हैं अब सब ठीक हो जाएगा.." वो बोल पड़ता है। मेरे को अपने लिए लकी मानता है।
मैं खुशदिल होकर उसके पास फुटपाथ पर बिछे अखबार पर जा बैठता हूं।
"अऱे भाई साहब आज तो बोहनी बढ़िया हुई थी, पर पिछले एक घंटे से बिल्कुल खाली हूं...अब आप आ गए हैं..चलिए दिन बच जाएगा।"
मैं हंसता हूं। ढांढस बंधवाता हूं.."महिने का आखिर दिन है। तुम्हारे ग्राहक सैलरी वाले हैं। सेल तो कम होनी ही है
"हो सकता है भाई साहब। आज ही का दिन ठीक नहीं जा रहा..पिछले दो-तीन हफ्तों से काम अच्छा जा रहा था "
मेरी नजर पड़ती है किताबों पर....हमेशा की तरह बड़े नाम नदारद दिखे थे...। स्टाल पर घरेलू पत्रिकाएं थी....राजनीतिक पत्रिकाएं शायद ही कभी देखी हों वहां पर। तभी कुछ ग्राहक आ जाते हैं।
'देखा भाई साहब, आपके आते ही...' दुकानदार खिले चेहरे से मेरी तरफ देख कर जोश से एक बच्चे की तरफ बढ़ जाता है।
मेरी नज़र फिर घूमती है....तभी उपन्यास सम्राट को तीन चार किताबों पर मंद-मंद मुस्कुराते देखता हूं। उन्हें देख कर मेरा मुखमंडल भी चमक जाता है।
हिंदी जासूसी उपन्यासों के ढेर के सहारे टिके कालजयी रचानाकार को देखकर लगा जैसे मुस्कुरा के कह रहे हों "देखो मुझे भी इनका सहारा लेना पड़ता है।"
"भाई साहब, लो चाय पियो.....देखा न आपके आने से,  कम से कम मेरा दिन बच गया" दुकानदार पास आते बोला।
"कितने की सेल हुई"...मैं पूछता हूं...इस बात को मानते हुए कि औरत की उम्र औऱ आदमी की कमाई नहीं पूछनी चाहिए।
"अभी 150, कुल मिलाकर 750 रुपये की हो गई है"....वो बोला
"आज कितने उपन्यास बिके"
"आज तो जी शुरु में गजब हो गया..पाठक के चारों उपन्यास बिक गए..."
"कितने बेच लेते हो पाठक (सुरेंद्र मोहन पाठक) के उपन्यास...."
"भाई साहब, हर उपन्यास करीब हजार तो बेच ही लेता हूं....वैसे भी पाठक के उपन्यास साल भर बिकते हैं। पुराने उपन्यास किराए पर देता रहता हूं." खुश होकर बताया उसने..."पर मेरा एक पुराना ग्राहक टूट कर बगल वाले के पास चला गया है भाई जी"...तभी वो बोला...
क्यों? मैंने पूछा
"वो किसी औऱ बाजार का ग्राहक था। उसे एक इंग्लिश का नॉवल चाहिए था। मैने कहा कि इस बाजार में आकर ले जाना, मैं ले आउंगा। पर वो किताब मुझे नहीं मिली कहीं। वो आया, तो मैने उसे साथ वाले के पास भेज दिया। "
साथ वाले के पास अंग्रेजी कि किताबों के ग्राहक थे, और उसकी बिक्री हिंदी किताबों के इस दुकानदार से ज्यादा थी, मैं जानता था। 'फिर क्या हुआ' ...मैं पूछता हूं।
फिर क्या भाई साहब अब वो उससे ही किताबें लेता है..वो उदास स्वर में बोला। पॉश कहे जानी वाली कॉलोनी में ये साप्ताहिक बाजार लगता है। सुना था कि कॉलोनी के अब पॉश हो जाने की वजह से ये बाजार बंद हो जाएगा....फिलहाल बाजार चल रहा है।
"कोई खाना बनाने वाली किताब है"....एक अधेड़ महिला अपनी बेटी के साथ आती है।
वो तत्काल एक पत्रिका निकाल कर देता है..
"कितने की है...."
"पंद्रह रुपये की.."
"ये तो पुरानी है, दस में दो....चार लेनी है....."
दुकानदार मान जाता है....महिला के साथ आई लड़की एक इंग्लिश नॉवल उठाती है। शायद कॉलेज खत्म हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है. मैं अंदाजा लगाता हूं...। बिना मोल भाव के ही मांगी गई कीमत पर इंग्लिश नॉवल खरीद लिया जाता है।
"ये हर बार ऐसे ही मोलभाव करती है....जैसे सब्जी खरीदती है".वो मुझसे धीरे से बोला...
"पर इंग्लिश नॉवल पर तो मोलभाव नहीं किया"..मैं बोला....
"अरे भाई साहबइंग्लिश नॉवल के लिए कौन ज्यादा मोल भाव करता है".वो बोला
मेरी नजर उपन्यास सम्राट पर घूम जाती है, वो वैसे ही मंद मंद मुस्कुरा रहे होते हैं....
मेरी नजरों का पीछा करती उसकी नजर भी उधर पड़ती है...
"किसी ने कुछ किताबें मंगवाई थी..पर ग्राहक पता नहीं कहां चला गया है...दो महीने हो गए"
"फिर तो तुम्हारे पैसे फंस गए"...मैं पूछता हूं...
"अरे नहीं भाई साहब....इनकी किताबें महीने-दो महीने में निकल जाती हैं, रूकती नहीं.."
मैं हैरान होता हूं..."सही मैं?"
''हां भाई साहब....बहुत नहीं, पर साल भर इनकी किताबें बिकती रहती हैं....इनको किराए पर देकर भी कमा रहा हूं। अगर वो ग्राहक आ गया तो बेच कर अलग कमा लूंगा''
अच्छा. इसे कितने में बेचोगेमैंने पूछा। 
"अब ये उपन्यास औऱ कहानियों का संग्रह 120 रुपये का आता है। ये पुरानी है जो 60 में बेचकर भी कमा लूंगा। किताब का दाम कम है, इसलिए मैंने रेट वाली जगह से पन्ना फाड़ दिया है..फिलहाल किराए पर देनी है...." वो हंसते हुए कहता है।
उपन्यास सम्राट को किराए पर देकर कमाई की बात। मैं उनकी तस्वीर को देख कर उनकी तरह मुस्कुरा देता हूं....
तभी साईकल लेकर दिन भर कि दिहाड़ी कमा कर, एक प्रवासी मजदूर(मजदूर अक्सर प्रवासी होते हैं, नहीं तो मुंबई की तरह, राजनीति इन्हें प्रवासी बना देती है) अपनी पत्नी के साथ आता है। पत्नी से पूछ-पूछ कर कुछ धार्मिक किताबें खरीदता है 20-25 रुपये में। हल्के कागज में छपी किताबें।
मोहब्बत की शायरी....20 रुपये कि एक किताब लेकर पत्नी के पास जाता है..मेरी नजर उस पर होती है। पत्नी देख लेती है कि मैं देख रहा हूं। हल्का सा शर्मा कर पति को कुछ बोलती है। वो मनुहार करता लगता है। मैं मुस्कुरा के नजर फेर लेता हूं....। वो पत्नी को मना लेता है।
20 रुपये देकर अपनी छोटी सी जीत पर खुश होकर वो साईकिल को हाथ में पकड़ कर पत्नी के साथ आगे बढ़ जाता है, जैसे बताते हुए कि छोटी-छोटी खुशी भी बड़ी होती है, उसमें भी जिया जा सकता है। 
"भाई साहब इन किताबों में अच्छी कमाई हो जाती है.."
"कितनी होती होगी...?"
"ज्यादा नहीं, पांच रुपये..किसी किसी में दस। पर ये ज्यादा बिकती हैं....जिल्द वाली 200-400 कि किताब की तुलना में,,,"
मैं फिर उपन्यास सम्राट की तरफ मुखातिब होता हूं। पूछता हूं...."इनके प्रशंसक अब भी हैं?"
"हां भाई साहब.....ज्यादा नहीं हैं...पर निरंतर लोग आते रहते हैं इनकी खोज में...डिमांड में बने रहते हैं....इनके कहानी संग्रह तो खासकर.."
मैं कुछ औऱ साहित्यकारों के बारे में पूछता हूं, पर ज्यादातर से वो अनजान होता है..शरतचंद्र से भी। मिंटो की सो कॉल्ड बदनाम कहानियों से भी।
"मुझे मोहन राकेश की एक किताब चाहिए....तीस पैंतीस रुपये में...."तभी वो बोला
मोहन राकेश का नाम सुन मैं थोड़ा विस्मित होता हूं। फिर पूछता हूं "तीस पैंतीस में क्यों....?
"भाई साहब एक कमीना है..बड़ा दुकानदार है। आपने देखी तो है उसकी दुकान...।".मैं हां में गरदन हिलाता हूं...उसने एक बार दिखा कर बताया था कि वो बड़े राईटरों की किताबें पढ़ता है। वो दूसरे साप्ताहिक बाजार की बात थी
"वो तीस-पैंतीस में ही मांगता है किताब..अब पुरानी किताबें भी नहीं मिलती इतने में तो"
मुझे हंसी आ जाती है.."अरे वो तो काफी कमाता है हर महीने"
"देख लो आप...इसके बाद भी पचास रुपये नहीं खर्चने को तैयार है...पढ़नी भी है पर पैसे देने को तैयार नहीं...."
मैं सोच में पड़ जाता हूं। आखिर हिंदी कि किताब के लिए वो चंद रुपये भी खर्च करने को तैयार नहीं....या अधिकतर लोग ऐसे ही होते हैं।
तभी एक सरदारजी आते हैं...बच्चा साथ में होता है.....जल्दी से हनुमानजी को देख कर उसी किताब की मांग कर देता है...दुकानवाला व्यस्त हो जाता है।
मैं स्टॉल पर रखी कई किताबें देखता हूं। इनमें गालिब चचा भी जमे हुए हैं....मजे की बात ये कि 20 रुपये की किताब में भी औऱ 75 रुपये कि किताब में भी। शायद चचा हर किसी के अजीज हैं आज भी।
"लीजिए सर हो गई न 1200 से ज्यादा की सेल.....आप आ गए दिन बच गया.."
मैं हंस पड़ता हूं....रात के पौने ग्यारह बज रहे हैं....मैं जाने की तैयारी में और वो दुकान समेटने की तैयारी में होता है। मैं उपन्यास सम्राट की कहानियों का संग्रह कुछ पुरानी पत्रिकाएं के साथ उठा लेता हूं।.
"कितना दूं इस किताब का....पूछता हूं "
"बाकी किताबों का तो सर 50 दे दीजिए..पर इसे मैं बेचूंगा नहीं..."वो उपन्यास सम्राट के कहानी संग्रह को देख कर कहता है।
"अरे क्यों?"..मैं हैरान होता हूं...
"सर अभी मुझे इससे कमाना है किराए पर देकर...आप ले जाइए पर पढ़कर दे जाइएगा...."
"अच्छा कितना किराया दूं...."
"सर जितनी आपकी मर्जी...."
"यार मेरे पर सोचने की जिम्मेदारी मत डाल.."
"तो ये सोचने की जिम्मेदारी आप मुझ पर क्यों डाल रहे हैं...." वो हंसता है....
"अरे यार घोड़ा घास से दोस्ती करेगा..तो खाएगा क्या.."
"सर आप ले जाओ, पढ़कर दे जाना ..."
"पर मैं तो महीने-दो महीने में एक बार आता हूं...."
"कोई बात नहीं सर...ये उसके बाद भी किराए पर जाते रहेंगे...औऱ मैं कमाता रहूंगा....."
मुझे हंसी आ जाती है.....उपन्यास सम्राट किराए पर.....जा जा के लौटते हैं...हर बार कुछ न कुछ लेकर आते हैं.....खुद मुफलिसी में जिए.....पर दूसरों का पेट भर रहे हैं 74 साल(8अक्टूबर, 1939) बाद भी....

क्या इसलिए भी उपन्यास सम्राट कालजयी नहीं हैं?...मेरी प्रश्न भरी नजर उनपर पड़ती है....देखा वो् हमेशा की तरह मुस्कुरा रहे हैं मंद-मंद....।
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शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

To LoVe 2015: बच्चे मन के कच्चे........रोहित


 पिछले दिनों अस्पताल में पिताजी को देखने के लिए एक दोस्त आया। उसके बच्चे ने हमसे पूछा कि अंकल, दादू अंकल आपके साथ क्यों रहते हैं? मैं उसके सवाल पर पहले तो हैरान हुआ। फिर अपनी हैरानी पर काबू पाते और दोस्त को शर्मिंदगी से बचाते हुए हंसकर कहा कि बेटा दादू अंकल हमारे साथ नहीं......बल्कि हम दादू अंकल के साथ रहते हैं। वहीं हमारे एक जान-पहचान के डॉक्टर थे जो हमारी मदद कर रहे थे, लेकिन उनका बच्चा हमसे अनजान था। न ही उन्होंने हमसे उसे परिचय कराना जरुरी समझा...उनका बच्चा मुझे हैरी पोटर की कहानी सुना रहा था.....पर उसे अपने देश के राष्ट्रीय पशु का नाम   नहीं मालूम था। वो आर्किड से परिचत था पर देश का राष्ट्रीय फूल कमल  है ये जानता नहीं था। इस हालात से मैं सोच में पड़ गया।

    आखिर आज के दौर में लोग इतना ज्यादा व्यक्तिगत, इतना निजी जीवन क्यों जीते हैं कि उन्हें किसी दूसरे से कोई मतलब नहीं रहता। बस मैं, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, यही लोगो की जीवनचर्या हो गई है। इसमें मां-बाप के लिए भी जगह नहीं होती। रिश्ते-नाते तो दूर की बात है। ठीक है कि आज समय नहीं मिल पाता लोगो को एकदूसरे से मिल-पाने का....एक समय में चोली-दामन की तरह रहने वाले दोस्तों की हालत जानने की फुर्सत नहीं....जानपहचान के लोगो का हालचाल पुछने का वक्त नहीं। एक दिन छुट्टी का होता है...मगर वो सारा दिन घर में चैन से रहने या बच्चों को घुमाने में ही बीत जाता है....पर क्या कभी हमने सोचा है कि हमारी ये आदत कितनी घातक हो सकती है, खुद हमारे लिए।

    आज हम अपने मां-बाप से मिलने का समय नहीं निकाल पाते। औऱतों को सास-ससुर के साथ रहने में तकलीफ होती है.....उनकी आजादी में खलल पड़ता है। नतीजा क्या निकलता है?....बुजुर्ग सास-ससुर अकेले रह जाते हैं। ठीक है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती.....कई जगह बुर्जुग भी समय के साथ बदलने को तैयार नहीं होते। पर ये कटु सच है कि हम ज्यादा ही व्यक्तिगत जीवन  जीने लगे हैं...जिसमें अपने ही लोगो के लिए जगह नहीं है।

    हमारी देखादेखी अनजाने में बच्चा भी अकेले रहने की आदत डालने लगता है। अपनी दुनिया में मस्त रहने लगता है। फिर एक दिन आता है कि बच्चा अपनी उड़ान भरने के काबिल होते ही आपको अकेला छोड़ देता है।

    ये समस्या गंभीर होती जा रही है। फिर भी हम इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। आज बच्चे नेट पर सोशल साइट से तो जुड़े होते हैं। पर वो समाज से नहीं जुड़ पा रहा। उनमें होड़ होती है कि आर्कुट पर किसके दोस्तों की तादाद सबसे ज्याद है। भले ही वर्चुअल दोस्तों के बारे में उसे कुछ भी पता नहीं हो।

    वर्चुअल दोस्त और रिअल दोस्त में क्या फर्क होता है, इसे बच्चे भुलते जा रहे हैं। मिल कर खेलना और मिलकर कुछ करने की आदत से बच्चे दूर होते जा रहे हैं। जिस कारण बच्चों में आपसी सहयोग की स्वाभाविक भावना ठीक से विकसित नहीं हो पाती है। दोस्तों के बीच मस्ती...बिना स्वार्थ दोस्तों की मदद को तत्पर रहने का आनंद क्या होता है, ये बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा।  बच्चों को अपने ही देश की जानकारी कम होती है। खासकर शहरों मे हालत बिगड़ती जा रही है। देशज खेलों को तो  हम लोग शहरों से निकाला दे चुके हैं। लंगड़ी टांग, पकड़मपकड़ाई, छुपन-छुपाई जैसे शारीरिक खेलों की जगह, कम्पयूटर गेम्स ले चुके हैं। 

   बच्चों को ये तो पता होता है कि डब्लयू डब्लयू एफ का चैंपियन कौन है। टॉम एंड जैरी कौन से कार्टून करेक्टर हैं....पर पंचतंत्र की कहानियों से उसका नाता टूट गया है। दादा-दादी और नाना-नानी की गोद में लेटकर राजा-रानी, राजकुमारी को राक्षस से छुड़ाने वाले सहासी राजकुमार की गाथा सुनने का मजा क्या होता है ये आज के बच्चों को नहीं पता। कहानियों में ही देश की परंपरा....राम के आदर्श, गांधी, नेहरु, सुभाष जैसे असली जीवन के नायकों से उनका परिचय अब सहज तरीके से नहीं होता। इन सबसे वो काफी देर से स्कूल में ही पहुंचने पर नीरस ढंग से जान पाता है। उसे ये नहीं पता होता कि अपना देश क्यों जगद् गुरु था।

   आज बच्चों की जादूगर हैरी पोटर,  बैटमैन, स्पाइडर मैन, सुपरमैन से उसकी नजदीकियां बढ़ गईं हैं...पर खेल-खेल में आसपास रहने वाले जानवरों और कहानियों में बतियाते चीकू खरगोश औऱ बरामदे में फूदकती औऱ गीत गाती गौरेया से उसकी दोस्ती टूट गई है....शरारती बंदर को मामा और हमेशा दूध पीने चक्कर में रहने वाली बिल्ली को मौसी क्यों कहते हैं...ये बताने वाला भी बच्चों के पास कोई नहीं होता। आकाश में जो चांद हैं वो भी मामा क्यों है, ये भी वो नहीं जान पाता।

  आखिर कभी सोचा है कि हम भागती-दौड़ती ज़िदंगी में बच्चों से क्या छीन रहे हैं? क्या हम सोचते हैं कि पी़ढ़ी -दर-पीढ़ी सहजता के साथ जो हमें सौगात के तौर पर मिल रहा था, उससे अपने बच्चों को हम क्यों वंचित कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि समय की कमी है...जब सब काम के लिए समय निकाल लेते हैं तो अपने बच्चों के लिए, माता-पिता के लिए क्यों नहीं?

क्या ये सच नहीं है कि इसी वजह से कई जीवन की शामें अकेले बुजुर्गों के आश्रम में कट रही हैं?

अगर आज हम इस के बारे में नहीं सोचते हैं....ये छोटी मगर सबसे महत्वपूर्ण बातें हमें तंग नहीं करती हैं....तो फिर हम किस मुंह से देश के भविष्य के बारे में चिंता करते हैं।

याद रखें बबूल के पेड़ पर आम नहीं उगा करते।
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बुधवार, 14 जुलाई 2010

To LoVe 2015: एक अंतहीन यात्रा रुकी-रुकी सी ...Rohit


पिताजी की बीमारी के वजह से कुछ दिन नेट से दूर था..इस बीच कुछ खास अनुभव हुए। उसे भी आप लोगो से बाटूंगा। दोस्तो आप लोगो ने मेट्रो की कविता को पंसद किया। इसके लिए आप सबका धन्यवाद। उस कविता इतनी पंसद की जाएगी मुझे इसका अंदाज नहीं था। धन्यवाद खुशदीप जी का भी जिन्होने पूरी पोस्ट ही मेट्रो के बहाने मेरे नाम कर दी। उस कविता का एक सिरा मंयक ने पूरा कर किया। दरअसल सभी कुछ मेट्रो के अंदर का था क्योंकी बाहर से तो हम भागते हुए आते हैं मेट्रो के लिए। वहां खड़े लोग नजरअंदाज होते हैं मगर मंयक ने उन्हें भी देखा, जिन्हें मैने अंदर देखा। उसने कविता का एक छूटा सिरा पकड़ लिया। उसका धन्यवाद। पर हां उसे उसके ब्लॉग पर डांट लगानी पड़ी आखिर अधेड़ किसे कहा उसने? शायद अभी उसे ठीक से पता नहीं कि दिल क्या चीज है।
   मेट्रो की कविता ने मेट्रो मे ही जन्म लिया था। मोबाइल में वो कविता उतरी थी। फिर पोस्ट पर। आज जब पीछे नजर घूमाता हूं तो पाता हूं कि यात्राएं मेरे लिए काफी भाग्याशाली हुई हैं। यात्रा के दौरान कई बातें मेरे दिमाग मे आती हैं। कई योजनाएं जन्म लेती है और फिर मूर्त रूप भी ले लेती हैं। यात्रा के दौरान ही कई उलझने दूर हो जाती हैं। यात्रा अक्सर किसी न किसी पड़ाव के लिए होती है। कई योजनाओं की मंजिल मुझे यात्राओं के दौरान ही मिली। मैं अक्सर कोई न कोई किताब भी साथ रखता हूं। पर महज एक दो बार ही हुआ जब कोई किताब पूरी तरह पढ़ी हो। होता यह है कि पटरी के साथ-साथ विचार भी दौड़ने लगते हैं। दौ़ड़ते-दौड़ते विचार मेरे से पहले अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं। कोई उलझन अपना रास्ता खोज लेती है। कहीं कोने में अरसे से दुबका विचार या कहीं मस्तिष्क पटल पर घूमता कोई चित्र यात्रा में अनयास ही साथी बन जाते हैं। इसलिए मैं अक्सर अकेले ही यात्रा करते हुए भी अकेला नही रह पाता हूं। अकेलापन शायद ही महसूस करता हूं, खासकर यात्रा के दौरान। 
   आजतक सारी यात्राएं सार्थक रहीं हैं मेरे लिए। हर विचार यात्रा के भौतिक स्टेशन के आने से पहने ही अपना पूरा आयाम ले लेता है। साकार होने के रास्ते के साथ मेरे सामने आ जाता है। मैंने उस पर कई बार पूरी तरह से अमल किया है। मैने पाया है कि अनेक विचारों में से जो सार्थक हो सकता है, वो विचार पूरी तरह से सामने आ जाता है औऱ बाकी बेकार के विचार दिमाग से निकल जाते हैं। ये यात्राएं ही हैं जो मुझे बताती है कि हम, हमारा समाज कहां खड़ा है। हमारे देश की कौन से भाग तरक्की की यात्रा में कितने पीछे रह गए। उनकी जरुरत क्या है। एक साथ कई मोर्चे कई लोग कैसे पीछे रह गए। शायद यही वजह है कि पहले गांधीजी को गोखले जी ने, फिर नेहरु को गांधीजी ने देश यात्रा करने को कहा था। अभी हाल ही में इंदू जी का ब्लॉग पढ़ा। पाया कि देश के अलग अलग हिस्सों मे लोग काम कर रहें हैं, पर उनको मदद नहीं मिल पती। लोग भी दकियानूस सोच के कारण कुछ नहीं करते, फिर कोसते हैं देश को समाज को। ब्लॉग अभी शैशव अवस्था में है सो इसमें काफी वक्त लगेगा। 
     ऐसे ही एक यात्रा के दौरान काफी पहले मेरे दिमाग में आया था कई सकारात्मक काम करने वाले लोगो को एक मंच दिया जाए। पर जीवन की आपाधापी में या कहें घर के कारण विचार पूर्णरूप लेकर भी साकार नहीं हो सका। जीवन की छोटी जरुरतें ही आज मेरे सामने ब़ड़ी बन गई हैं। हैरानी होती है कि कैसे मैं इसमें फंस गया हूं? आखिर कैसे लोग बड़े काम कर जाते हैं, सोचता हूं तो हैरानी होती है। क्या मैं कभी ऐसे लोगो का एक अंश भी कर पाउंगा? लगता है कि मुझे फिर से जरुरत है एक लंबी यात्रा की, दैनिदिनी के झंझटों से मुक्ति पाकर?
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शनिवार, 10 जुलाई 2010

गूलर का फूल

बारिश का मौसम है। नीम की रसीली निमकौरियाँ टपाटप टपक रही हैं। खरे दादा की बगिया भी खूब हरियाई हुई है। बगिया के बाहरी कोने में लगे पेड़ में लाल-लाल गूलर लगे हैं। भीतर बगिया में अमरूद, शहतूत और मौसमी भी लगी हुई हैं। दादा ने बड़े जतन से लखनऊ की गरमी में भी मौसमी उगायी है, जिन तक आमतौर पर चौथी क्लास में पढऩे वाले चीटू जैसे छोटे बच्चों की पहुँच कम ही है। हाँ, अमरूद के मौसम में बगिया जरूर उजड़ती है। खरे परिवार की लाख पहरेदारी के बावजूद बच्चों की वानर सेना घुसपैठ का मौका ढूंढ़ ही लेती है। बड़े बच्चों के झुंड में चीटू भी हाथ साफ कर लेता है। एक बार मौका मिला तो फिर बच्चे बगिया की ऐसी सफाई करते हैं कि क्या अमरूद और क्या मौसमी, कच्चा हो या पक्का सब जेबों में या फिर नेकर में खुसी हुर्ई शर्ट के भीतर। आज फिर इस टिड्डे दल ने बगिया को उजाड़ दिया था। दादा ने बगिया को देखा तो उनका हार्ट फेल होते-होते बचा। खरे दादा निकल पड़े शिकायत करने। पहली शामत चीटू की थी।

घर के बाहर कुंडी खटकी और आवाज़ आई-अरे भाई मिश्रा जी, घर में हो क्या?
चीटू के पापा कुछ देर पहले ही घर पहुँचे थे। उनकी कुछ खास आदतें हैं। जैसे जब कभी वह बाहर से घर वापस आते हैं तो कम से कम आधा घंटे तक उनका पारा सातवें आसमान पर रहता है। उनकी हनक और सनक से घर वाले तो घर वाले बाहर वाले भी काँपते हैं। पर बेचारे खरे दादा की बगिया उजड़ी थी। तबाही मचाने वालों की उनकी फेहरिस्त में पहला नाम चीटू का ही था।
तीसरी बार जैसे ही आवाज आई-मिश्रा जी...
वो बिना कमीज-बनियान सिर्फ तहमद लपेटते हुए ही बाहर निकल आए और बोले-बताइए।
खरे दादा उनका रौद्र रूप देखते ही दहल गए और रिरियाते हुए बोले-कुछ नहीं मिश्राजी, बस मैं ये कह रहा था कि चीटू को थोड़ा संभालिए। नाले वाले फिरोज, चांद और ननके के साथ रहेगा तो बिगड़ जाएगा। आज इन लोगों ने पूरी बगिया तहस-नहस कर दी। अरे अगर इसे अमरूद या मौसमी चाहिए तो घर आ जाया करे, मैं खुद ही दे दिया करूंगा।
इतना कहकर खरे दादा तो खिसक लिए। बड़ी उमस थी उस वक्त।
ऊपर से जब भी मिश्राजी गुस्सा करते तो चीटू ऐसे ही पसीने में नहा जाता था। मिश्राजी ने पहले तो रेडियो तेज किया। फिर आव देखा न ताव कपड़े पीटने वाली मुगरी उठाई और दे-दनादन पीठ लाल कर दी।
साथ ही बोल रहे थे-भूखा रखता हूँ तुझे, साले बदनामी कराता घूम रहा है पूरे मोहगे में। चीटू हाथ जोड़े रोने लगा।
'पापा नहीं, मैं तो गूलर तोड़ रहा था। बगिया में गया ही नहीं।'
इतना सुनते ही मिश्राजी ने हुक्मनामा सुना दिया-आज खाना नहीं मिलेगा इसे। बेटा गूलर ही खाना अब।
यह सारी बातें घर वालों के बीच ही रहीं। बाहर तो लोगों को सिर्फ गाना ही सुनाई पड़ रहा था। मिश्राजी बड़े तमीज वाले हैं। घर में जब भी मारपीट करते हैं तो रेडियो जोर से बजा देते हैं। ताकि गली के लोगों तक रोना-धोना और गालीगलौज न पहुँचे।
चीटू चुपचाप छत पर निकल लिया।
तब तक आँटी बोलीं-जरा राजू को बाहर घुमा लाओ, खाना बनाना है।
आँटी यानी चीटू की दूसरी माँ।
चीटू गुस्से में तो था ही (सोचने लगा)-खाना तो मिलना नहीं है मुझे। इस राजू को और घुमाओ।
डेढ़ साल का राजू न जाने क्यों जोर-जोर से रो रहा था।
खैर चीटू ने राजू को गोद में उठाया और फिर पहुँच गया टीले पर मंदिर के पास गूलर के पेड़ के नीचे। गूलर का यह पेड़ उसका ही नहीं, मोहल्ले के सारे बच्चों और बुजुर्र्गों का दोस्त है। इसकी छाँव में गली की पंचायत से लेकर देश की राजनीति तक पर चर्चा होती है। शाम का वक्त है। चाची पहले से ही बैठी हुर्ईं हैं। चाची पूरे मोहल्ले की चाची हैं। मिश्राजी भी उन्हें चाची कहते हैं और चीटू भी।
चीटू को उनकी एक बात सबसे अच्छी लगती है कि रेडियो के तेज गानों के बावजूद वो आसानी से जान जाती हैं कि मिश्राजी ने घर में कब किसको पीटा।
चीटू की रोनी सूरत देखते ही उन्होंने कहा-क्या हुआ?
वो पहले से ही भरा हुआ था। तुरंत फफक पड़ा-पापा ने मारा है।
चाची ने तुरंत धोती के पल्लू से आँसू पोछे और बोलीं-तुम्हारी आंटी ने बचाया नहीं।
वो कुछ नहीं बोला।
चाची ने साथ बैठी औरतों के साथ हाथ नचा-नचाकर प्रवचन शुरू कर दिया- यही होता है सगी माँ के मरने पर। तीन महीने हुए नहीं, दूसरी ब्याह लाए मिश्रा। अब बच्चों की तो छीछालेदर हो गई।
शुक्लाइन ने सुर में सुर मिलाया-बताओ भला।
चीटू का मुँह और उतर गया।
सामने से रमन चाचा आते हुए दिखाई दिए।
चाची को देखते ही चाचा बोले-चाची पाँव लागी।
खुश रहो-तुम तो गुलरी केर फूर हुर्ई गए, हौ कहाँ।
बाकी बातें क्या हुई, चीटू ने ध्यान नहीं दिया पर गुलरी केर फूर यानी गूलर के फूल को लेकर उसकी जिज्ञासा जाग उठी।
पूछ ही बैठा-चाची ये गूलर का फूल क्या है?
चाची बोलीं-कभी गूलर का फूल देखा है।
उसने कहा नहीं।
चाची बोलीं-मैंने भी नहीं देखा पर हमारे नाना को एक फूल मिला था। उन्होंने एक चुड़ैल की चुटिया काटी थी। उसी चुड़ैल ने लाकर दिया था।
चीटू की आँखें फैल गईं-हैं... चुड़ैल की चुटिया।
'हाँ... अगर कोई चुडै़ल की चुटिया काट ले तो फिर चुड़ैल उसकी जिंदगी भर गुलामी करती है। मेरे दादा ने उसकी चुटिया तभी वापस की जब उसने गूलर का फूल लाकर दिया।'
चाची के चेहरे पर फ्लैशबैक में जाने जैसे भाव थे-जब तक नाना के पास गूलर का फूल रहा, उनके घर बड़ी जमींदारी रही। बड़े-बड़े अंग्रेज बहादुर भी आते थे उनसे मिलने। फिर फूल चोरी हो गया।
चीटू को समझ नहीं आया कि गूलर के फूल में ऐसी क्या बात है?
चाची बोलीं-चीटू अगर गूलर का फूल मिल जाए तो हर मुराद पूरी हो जाती है।
तब तक चाची का बुलावा आ गया और वो वापस चली गईं।
चीटू भी उनके पीछे-पीछे अपने घर चला गया। राजू रो रहा था, उसे आँटी के हवाले किया।
मिश्राजी बरामदे की अलमारी में परदे के पीछे से मुंह पोछते हुए निकले।
हुक्म मिला-जाओ ऊपर।
चीटू समझ गया, ये रोज का नियम था। अंग्रेजी दारू की एक अद्धी हर दूसरे दिन खुलती था। भुने हुए काजू, कटा हुआ पनीर और सलाद।
हाँ, खास बात यह थी कि उन्हें पीते हुए कोई नहीं देख पाता।
मिश्राजी का मानना था कि शराब पीना बुरी बात है। लिहाजा बच्चों के सामने नहीं पीनी चाहिए। अलबत्ता सिगरेट वो चीटू से मंगाकर ही पीते थे।
तब तक चीटू को भी भूख लगने लगी। पेट में चूहे कूद रहे थे और आँखों से गंगा-जमुना बह रही थी।
मन ही मन सोचने लगा-मम्मी होती तो कितना अच्छा होता। मजाल क्या थी कि पापा इस तरह से पीट पाते। बेचारी खुद आगे आकर मार खा लेती थीं पर मुझे नहीं पिटने देतीं।
अचानक याद आई-कितनी अच्छी भिंडी बनाती थीं वो। पराठों के साथ।
भगवान, क्या मम्मी वापस नहीं आ सकतीं?
अचानक चीटू को चाची की बात याद आई-गूलर का फूल और इच्छा पूर्ति।
अगर गूलर का फूल मिल जाए तो? हाँ तब तो जरूर मम्मी फिर से जिंदा हो जाएँगी।
चीटू को अस्पताल में लेटी मम्मी का चेहरा याद आने लगा।
डॉक्टर कह रहे थे-नाइंटी पर्सेन्ट बर्न है, नो होप।
पाँव के नाखून से सिर के बालों तक वो बुरी तरह से झुलसी हुर्ई थीं।
चेहरे की खाल जगह-जगह से उधड़कर लटक रही थीं।
तभी उन्होंने चीटू को बुलाया।
उनकी हालत देखकर चीटू रोने लगा। मम्मी का चेहरा एक अजीब सी भावहीन द्रणता ओढ़े हुआ था। शायद तकलीफ और दर्द का अहसास ही खत्म हो चुका था।
वो बोलीं-पास आओ बेटा।
चीटू उनके पास जाकर खड़ा हो गया।
उन्होंने बिना सिर या गरदन हिलाए उसकी आँखों में देखा और बोलीं-बेटा, खूब पढऩा, बड़े आदमी बनना और हाँ अपने पापा का हमेशा कहना मानना।
उसके बाद उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
चीटू को सब ने बाहर निकाल दिया।
सुबह पाँच बजे के करीब उनकी मौत हो गई।
चीटू की सोच की तंद्रा टूटी-वो सोचने लगा कि ये मम्मी भगवान के घर जाते-जाते क्या कह गईं?
पापा कितने बेरहम हैं। इतना मारते हैं। खाना भी बंद कर देते हैं।
भूख और जोरों से लगने लगी थी।
तब तक मिश्राजी की आवाज आई-नीचे आओ।
सब लोग खाना खाकर बिस्तर पर जा चुके थे।
मिश्राजी आंगन में पड़े तखत पर बैठे हुए थे। दोनो हाथ पीछे की ओर करके टेक लगाए हुए। आसमान में बादल थे और मिश्राजी के चेहरे पर दारू का सुरूर घुमड़ा पड़ रहा था।
चीटू जानता था अब पापा के लेक्चर का टाइम हो गया, मगर उनके चेहरे पर अचानक दार्शनिक भाव आ गए और उन्होंने बोलना शुरू किया-क्या हूँ मैं? दुश्मन हूँ् तुम्हारा। यही सोचते होगे पर तुम, पर तुम नहीं जानते कि तुम्हारे बाप को अपने बच्चों की इज्जत कितनी प्यारी है। मैं कैसे जीया मुझे कोई परवाह नहीं पर कोई साला आकर मेरे बच्चों को कुछ कहे...उसकी माँ...।
फिर अचानक उनकी आँखों से आँसू निकलने लगे।
तुम क्या सोचते हो, तुम्हें मारकर या भूखा रखकर मुझे सुख मिलता है। पर ये प्रताडऩा जरूरी है नहीं तो तुम लोग भी बड़े होकर कुछ नहीं बन पाओगे। मेरे जैसे रह जाओगे।
फिर अचानक उठे और किचन से खाने की थाली लाकर चीटू के सामने रख दी।
अचानक उसे पापा अच्छे लगने लगे। वो खाने पर टूट पड़ा।
मिश्राजी सोने चले गए।
चीटू के पेट की भूख शांत हो चुकी थी पर पीठ का दर्र्द तेज हो उठा।
वो पापा के बारे में सोचने लगा-सुबह फिर ताव खाएँगे और किसी न किसी बात पर मारेंगे। मम्मी की फिर याद आयी। दिमाग में अभी भी गूलर का फूल नाच रहा था। सब लोग सो चुके थे। उसने चुपचाप बाहर वाले दरवाजे की कुंडी खोली। रात के पौने बारह बज चुके थे। चाची ने कहा था कि गूलर का फूल रात में ठीक बारह बजे दिखता है। जिन्न और अप्सराएँ उन्हें तोडऩे आते हैं। अंधेरे में डरते-डरते चीटू पेड़ के नीचे पहुँचा। ऊपर कुछ नजर नहीं आ रहा था। हरे-हरे पत्तों के बीच गूलर की मोटी-मोटी डालियाँ दैत्य के हाथ-पाँव जैसी नजर आ रही थीं। बारह बज चुके थे। कहीं कोई फूल नजर नहीं आया। वो हारकर वापस घर आ गया। बहुत देर तक नींद नहीं आई। पीठ दुख रही थी। आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। चीटू के बचपन का यह सिलसिला लम्बे अरसे तक चला। चीटू को जब मार पड़ती, कोई तकलीफ होती या दुख होता, उसे सिर्फ गूलर के फूल में उम्मीद नजर आती। हमेशा उम्मीद रही कि एक न एक दिन जरूर गूलर का फूल मिलेगा।
वह फूल के आगे अपनी ख्वाहिश रखेगा-मेरी मम्मी को जिंदा कर दो।
चीटू को खुद पता नहीं चला कि कब वो इस सच को समझने लगा। सच यानी गूलर का फूल कभी नहीं खिलता और न ही कभी वो मम्मी वापस आती है, जो भगवान के घर चली गई।
अब वो गूलर के नीचे नहीं जाता.. बड़ा जो हो गया है.../a>
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बुधवार, 7 जुलाई 2010

To LoVe 2015: कन्याकुमारी



आज आप को लिए चलते हैं, भारतभूमि के अंतिम कोने की ओर ..अर्थात कन्याकुमारी .

छुटपन में जब हम कन्याकुमारी घूमने गए तब बस से उतरते ही अपने जीवन में पहली बार समुन्दर देखा.दूर तक फैली हुई नीली चादर की तरह ,बहुत शांत बहता सा,इतना खूबसूरत लगा था कि वह नज़ारा अब तक आँखों में बसा है.

कन्या कुमारी तमिलनाडू प्रान्त के सुदूर दक्षिण तट पर बसा एक शहर है.यह हिन्द महासागर, बंगाल की खाङी तथा अरब सागर का संगम

सोमवार, 5 जुलाई 2010

To LoVe 2015: छत्तीसगढ़ का खजुराहो

भारत के राज्य छत्तीसगढ़ के  बारे में हम आप को अपनी पुरानी पोस्ट में बता चुके हैं.
इसी राज्य के एक जिले कबीरधाम [पुराना नाम कवर्धा ]में आज आप को लिए चलते हैं जो रायपुर से करीब 100 किमी दूर है.
यह स्थान राज्य के मुख्यमंत्री डॉ.  रमण सिंह जी का गृह जिला भी है.पिछड़ा समझे जाने वाले इस राज्य ने कम समय में अपनी मजबूत अंतर्राष्ट्रीय छवि बनाई है.यहाँ पर्यटक भारी संख्या में घूमने आते हैं.

२००८

शनिवार, 3 जुलाई 2010

To LoVe 2015: Delhi Metro करें एक रोजाना का सफ़र....Rohit

मेट्रो ने दिल्ली का अंदाज बदल दिया है। चकाचक मेट्रो में कूल कूल सफर। इसी कूल सफर में छुटे हुए जिंदगी के कई ऐसे स्टेशन होते हैं जिन्हें हम भूल चुके होते हैं। जो हमारा ही हिस्सा थे। इस सफर में हालांकी बदला कुछ नहीं है। वही चिकचिक...वही सीट को लेकर मारामारी..आंटी-अंकल..खूबसूरत लड़कियां..पोज मारते लड़के....आपस में लिपटने को आतुर जवानियों को देखकर चिढ़ते बुजुर्ग....सब वही है....बस जरा अंदाज बदला है...अब झिकझिक से लेकर...चिढ़ने, कुढ़ने से लेकर...ताना कसने तक में एक  इत्मिनान है...कूल-कूल मूड में बतियाने का मजा है......इसी कूल-कूल सफर में मस्त होकर जीवन के सब रंग देखने का अपना अलग ही मजा है....तो फिर आप भी आइए मेरे साथ ...हम मिलकर आराम से करते हैं ये अरामदेह और मस्त  सफर.......



एक मस्त रोजाना का सफर

मैं अक्सर देखता हूं
थकी अलसी पसरी धूप
कभी पास बैठी लड़की
तेजी से मोबाइल पर
जिसकी चलती हैं उंगलियां
मानो सितार के तार हों
कभी किसी के मोबाइल
से चिपके कान
या कान पर चिपका मोबाइल..
सुनता हूं कई बार
हवा में खनकती आवाजें
फिर देखता हूं
कोला से गले को तर करतीं
खानापिना निषेध की उद्घोषणा के बीच
खिलखिलाती बेफिक्र लड़कियों का झुंड
ढूंढता हूं इन्हीं में अपने खोए पल
मित्रों के ठहाकों के बीच
शिक्षकों की नकल उतारते
भविष्य की उधेड़बुन से परे
बतियाते उनकी आंखों की चमक
ये सब देखता हूं
जीवन की ढलती दुपहिरया के लोगों की
इसी बेफिक्र झुंड पर फिरतीं
आंखों की पुतलियां
साथ ही निगलने की ललक
भी देखता हूं...
औरतों की सीट पर पसरे मर्द
तो दो ही रिजर्व सीटों के दम पर
सातों सीटों के 
रिजर्व होने के दावे करती
बेशर्म औरतों को भी झेलता हूं
इन्हीं के बीच बुजुर्गों को
सीट पर जमे लड़के-लड़कियों के सामने
थके हारे लाचार भी देखता हूं
अक्सर अनजाने लोगो
के लिए सीट छोड़ने के बीच
खुशनुमा माहौल बनते भी देखता हूं
राजधानी में मेट्रो के आरमदेय सफर
पर गर्व करते
अपने शहर में मेट्रो की दूर
परिवहन व्यवस्था के महज दुरस्त
हो जाने की ख्वाहिश
करते लोगों से भी मिलता हूं
लस्त-पस्त नाले में तब्दील
यमुना को देख हैरान
होते देश के अन्य बाशिंदे भी देखता हूं
अपने घंटे भर के सफर में
जाने कितनी दुनिया देखता हूं..
साथ ही देश की माटी के अनेक रंग
पर एक सी महक भी महसूस करता हूं
मैं सब देखता हूं 
क्योंकी मेरा सफर अब आरामदेय हो गया है
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