सोमवार, 28 जून 2010

To LoVe 2015: रानी लक्ष्मी बाई और झाँसी का किला


१९ नवंबर १८३५ को वाराणसी जिले के भदैनी मुहल्ले में मोरोपंत तांबे, भागीरथीबाई के घर एक पुत्री जन्मी, जिसका नाम रखा गया मणिकर्णिका[मनु]। बचपन से ही उसने पढ़ाई व खेल कूद में विलक्षण प्रतिभा दिखायी. सात साल की उम्र में ही वह घुड़सवारी और तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निपुण हुई.बचपन में उसने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं थीं और वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया

शनिवार, 26 जून 2010

To LoVe 2015: An evening...कहीं भूल तो नहीं रहे आप....Rohit

दिल्ली की एक शाम। एक खूबसूरत पार्क का नजारा। गंगा का किनारा....दोस्तो ये क्लिप मेरी एक कोशिश है आपको ये याद दिलाने की कि भागमभाग कि ज़िदंगी में आप क्या मिस कर रहे हैं। आप आज जहां भी हैं, उस शहर, उस जगह को भी ठीक से नहीं जानते। बस आपाधापी में डूबे रहते हैं। तो जरा एक काम करें। इस भागमभाग में से अपनी एक शाम चुरा लीजिए। फिर आवारगी शुरु कर दीजिए। उस शहर को महूसस कीजिए, जहां आप हैं। फिर देखिए क्या ये आपके जीवन की एक सबसे खूबसूरत शाम नहीं है। ये शाम क्या आपकी अपनी नहीं है, जिसे आप कई दिनों से नज़रदांज कर रहे थे....तो सोच में मत  पड़िए,  बस चुरा डालिए अपने ही फुर्सत के दो पल। क्यों चुराएंगे न। ऐसे ही कुछ पल नीचे की क्लिप में हैं...जब अलग अलग शहर में मैं घूम रहा था.....नीचे दिए लिंक को देखिए....
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मंगलवार, 15 जून 2010

To LoVe 2015: Why Suicide? शहरोज भाई की पुकार और आज का दिन..rohit


जी मैं आता है कि......

कभी कभी मन सच में व्यथित हो जाता है। लगता है कि सब कुछ छोड़ कर भाग जाएं। क्या करें। कुछ लिखने का मन नहीं करता। परेशानियां चारों तरफ से घेर लेती हैं। लगता है जैसे कुछ करने को जोश खत्म हो गया। मेडिकल के अनुसार हर आदमी के साथ कुछ एक महीने में ऐसा होता है। पर ये जानते हुए भी अपने पर कंट्रोल नहीं हो पाता। लगता है जैसे दुख ने चारों तरफ से आकर आप को दबोच लिया है। जिस चीज से आप दूर भागते हैं वही आपको घेर लेती है। तंग करती है। शहरोज जी की कल पोस्ट पढ़ी थी। लगा आत्महत्या करने की आखरी सीढ़ी पर खड़ा इंसान पुकार रहा है। आखिर क्या करे इंसान?? ? सही मायने में कई बार हताशा इतनी होने लगती है कि लोग मजबूरी में कोई भी कदम उठा लेते हैं। संकट कभी-कभी अस्तित्व से भी बड़ा हो जाता है। ऐसे में अकेले लड़ते-लड़ते इंसान काफी थक जाता है। ऐसे में या तो वो जिंदगी से मुंह मोड़ लेता है, या फिर पलायन कर जाता है। उसे समझ नहीं आता की करे भी तो क्या खासकर तब जब अपने ही मुसीबत पैदा करने लगें। कई साल बाद आप को जब अपने ही घायल करने लगें तो काफी दुख होता है। जड़ ही तने की दुश्मन हो जाए तो फिर पेड़ की गति कहां सोचता हूं कि कोई भी खुद्दार इंसान किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। जब फैलाता है तो कितनी बार मर कर फैलाता होगा। फिर सोचता हूं कि जो आज समाज में काफी उंचाई पर हैं क्या उनके सामने संकट नहीं आया था। मेगास्टार अमिताभ बच्चन से भी हम नहीं सीखते। उन्हीं के शब्दों में जब संकट आया तो उन्होने यश चोपड़ा के घर जाकर काम मांगने में संकोच नहीं किया। यही नहीं हाल में एक इंटरव्यू में एक नामी डायरेक्टर ने बताया कि संकट के समय एक छोटी सी रकम के लिए एक मझोली कंपनी के 800 कर्मचारियों में जोश भरने के लिए बिग बी लेक्चर देने गए। (रकम का खुलासा उन्होने बिग बी के स्टेसस से काफी कम होने की दुहाई देकर नहीं किया) हर किसी के साथ फोटो खींचवाया। पर हम उससे सीखते नहीं। ब़डे लोगो की ऐसी बातें भी बाद में बाहर नहीं आती , सिंबल स्टेसस के कारण। पर क्या करें उनकी चमक ही मेरे समेत सभी की आंखों में रहती है। उसके पीछे किया गया जबरदस्त संघर्ष हमें नहीं दिखता। क्यों ये समझ में आज तक नहीं आया। या फिर समझ कर भी हम अंजान बने रहते हैं। ऐसा संकट कई बार आय़ा मेरे सामने भी। चंद साल पहले हताशा इतनी बढ़ गई थी। तब समझा कि लोग आत्महत्या क्यों करने लगते हैं। पर मैं वहीं से लौट आया। मुझे लगा कि किसी बेबफा के लिए इतनी हताशा क्यों। जिसे मेरे जज्बातों की कद्र नहीं उसके लिए जीवन को क्यों नरक बनाउं। क्यों जिंदगी से पलायन करुं। बस मैं उस स्थिती से लौट आया। फिर कई बार ऐसा संकट आय़ा। लगा बस अब हिम्मत नहीं,। पर हर बार लौटा। इन सबके बीच कई बार हताशा बहुत होती है खासकर तब जब आप अपने किसी के लिए कुछ नहीं कर पाते। बेबस हो जाते हैं। ऐसे में भावनात्क दुख आपको मथ देता है..अंदर से कहीं तोड़ देता है। शहरोज भाई भी लगता है कि काफी भावानात्मक इंसान हैं। उनके सामने भी अपनी पत्नी और बच्चों की जिंदगी है। जिस कारण हताशा में उन्होने जीवन से पलायन के बारे में सोचा। पर फिर उसी कारण वो पलायन की आखरी सीढ़ी से लौट कर मदद की गुहार लगाने में सक्षम हो सके। ईश्वर करे की स्वाभिमान के साथ वो जी सकें। भावुकता इंसान से काफी गलती करा देती है। हमसे भी हुई। पर कई भावुकता से हम निकल चुके हैं। कुछ हद तक प्रेक्टिकल हो चुके हैं। ईश्वर शहरोज भाई को भी प्रेक्टिकल बनाए। प्रेक्टिकल मतलब समस्या का हल प्रेक्टिकल होकर सोच सकें। उनके साथ तो उनकी शरीके हयात भी हैं। ऐसे में उनका हौंसला शहरोज भाई को नई उंचाई दिला सकता है। मेरी यही कामना है। आप सब भी यही प्रार्थना करें। 
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रविवार, 6 जून 2010

To LoVe 2015: रोटी की जंग..Indian Media समाज भी भ्रम में जीता है....6..Rohit





ताली एक हाथ से नहीं बजती
(आखरी कड़ी....फिलहाल)
रोटी की ज़ंग कहां तक पहुंच गई
चलो यार बहुत हो गई मीडिया की तरफदारी। सवाल बहुत उठा दिए। समाज की नाक में दम काफी कर दिया(खामख्याली ही सही)। आप भी बोर हो गए होंगे। लेकिन हो गए तो क्या करूं। होते रहें। ये अलग बात है कि मीडिया की एकतरफा तरफदारी करना मेरा मकसद नहीं था। मकसद था सवाल पर सवाल करने वाले उन लोगों को सच का आईना दिखाना जो जवाब सुनते नहीं और न ही हल की दिशा मे कुछ सोचते हैं और न ही कुछ करने की कोशिश करते हैं। ताली एक हाथ से नहीं बजती ये कई लोग समझे नहीं। कई समझे पर उनके सामने दुविधा रही की करें क्या। सिर्फ तीन लोगो को काफी कुछ समझ में आया। जल्दी ही उन तक ताली के लिए एक हाथ पहुंच जाएगा। उम्मीद है कि वो ताली बजाने के लिए दूसरा हाथ आगे बढ़ाएंगे। ताली किसी का मजाक उड़ाने वाली नहीं। ताली किसी का उत्साह बढ़ाने वाली।  इसे हिजड़ों से भी न जोड़ें, क्योंकी उनपर हंसने वाले ये भूल जाते हैं कि वो किस पर हंस रहे हैं..उन हिजड़ों पर या उस ईश्वर पर जिस ने हंसने वालो समेत सारी दुनिया बनाई है। चलिए भाषण छोड़ इस किस्त का उस कविता से फिलहाल यहीं पर समापन करता हूं जो मीडिया और समाज की पहली ही पोस्ट में लिखी थी पर पोस्ट नहीं की थी,। क्योंकि सिलसिला विस्तार लेता हुआ काफी लंबा हो गया था। ये कविता खासकर उन लोगो के लिए है जिनके दिल में खूनियों और हत्यारों की जमात बन चुके नक्सलियों के लिए अब भी सहानुभूति है।
बंदूक की नोक अब
क्रांति नहीं उगलती
सिर्फ मौत बरसती है
गरीबों की आवाज
अपने वर्ग की बात
किताबों में छपे 
ये अल्फ़ाज अब
कहीं पन्नों में ही
दफ़न हो गए हैं...
लाल रंग अब
क्रांति का रंग 
नहीं लगता
लाल रंग में अब
सिर्फ बेगुनाहों की
चीत्कार है....
हक की बात
करते-करते
बंदूक की नली
अब समानता की
बात नहीं करती
नफरत उगलती है...
अन्याय का विरोध
न्याय क दम
भरते हुए हाथों 
से छिटक कर
गरीबों के कंधों पर
सवार बंदूक की नली
से अब सिर्फ
निर्दोष लहू बहता है...
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