शनिवार, 29 मई 2010

To LoVe 2015: क्षितिज पर लटके सवाल....indian media.समाज भ्रम में जीता है...5 ..rohit...


ताली एक हाथ से नहीं बजती
जवाब की तलाश में भटकते सवाल..क्या करें इनका
फिर से नक्सलियों ने देश को एक गहरा घाव दे दिया है। झारग्राम में जो हुआ, वो अब नक्सलियों के लिए वाटरलू साबित होगा या नहीं, ये कहना अभी जल्दीबाजी होगी। देश की राजनीति इस बात को कहने की इजाजत भी नहीं देती। कहीं ये आक्रमण से ज्यादा बदला न हो जाए। झारग्राम में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के पटरी से उतरते ही तुरंत दूसरे ट्रेक पर आ रही मालगाड़ी की टक्कर से मिनटों में तबाही का मंजर पैदा हो गया।
  इस हादसे के बाद जहां लाशे बिखरी पड़ी थीं,..वहीं कई सवाल भी पड़े हुए थे। सभी लाशें तो जैसे-तैसे उठा भी ली गईं. पर वहां पड़े उन बेचारे सवालों को किसी ने उठाने का न तो साहस किया और न ही उसे उठाने की जहमत उठाई।
 सवाल मीडिया के कंधों पर सवार होकर जनता तक पहुंचता है। पीड़ितों तक पहुंचता है। अधिकारियों तक पहुंचता है। फिर प्रशासन औऱ नेतागिरी के बीच फुटबॉल बन जाता है। पिट रहा है..इधर-उधर लुढ़क रहा है सवाल..पर जवाब तक नहीं पहुंच पा रहा है। हाय री उसकी किस्मत। (या हमारी?)
घटनास्थल तक मीडिया पहुंचता है। लोग पहुंचते हैं। राहत टीम कहां रह जाती है पता ही नहीं चलता। राहत जहां से चलनी है, वहां हादसे के छ: घंटे बाद खबर पहुंचती है। किसी तरह खबर तो पहुंच जाती है..पर राहत में देरी क्यों? ये सवाल सालों से अब तक कहीं नहीं पहुंच पाया है।
दूर्घटना रोकने के कई उपाय मौजूद हैं। रेलों की टक्कर को रोकने के डिवाइस मौजूद हैं, पर लगे क्यों नहीं इसका जवाब अपनी जगह मौजूद नहीं है
दक्षिण में जनता ट्रेन को आग के हवाले कर देती है। आग न पकड़े डिब्बों में इसकी तकनीक है..जोर शोर से दावा किया गया। फिर भी डिब्बों में क्यों आग लगती है? लगता है ये सवाल खुद आग के हवाले कर दिया गया है।
हादसा इतना बड़ा नहीं हो सकता था..अगर मालगाड़ी रुक जाती। पर टक्कर मारने में मालगाड़ी देर नहीं लगाती। समझने से पहले ही टक्कर हो जाती है। र ये मालगाड़ी अपने गंतव्य तक रुक-रुक कर देरी से क्यों पहुंची है? ये सवाल तो बेचारा जाने कई सालों से डरा-सहमा कोने में दुबका हुआ है।
क्या करें इन सवालों का? सड़े-गले पुराने सवालों का? ठोकर मार कर किनारे कर दें? क्योंकी ये सबको तंग करता रहेगा। ऐसा करते हैं कि कोने में दुबके-सहमे सवाल को कोने में ही दफन कर देते हैं। लाशों की तरह सवालों का भी काम तमाम कर दें क्या?

अरे लगता है आप तो कुछ सोचने लगे...क्या रे....क्यों सोचते हो यार...ये सब कुछ तो माया है.. मोह है...संसार ऐसा ही विचित्र है....
क्या कहा? मैं विचित्र हूं..। ऐसी की तैसी...जाओ भाड़ में सब..जाओ नहीं उठाता सवाल। वैसे भी क्या पता, मैं सवाल उठाने की तैयारी करुं और कोई मुझे ही उठा दे.....तो भई मैं तो चला..नमस्ते..शब्बा खैर..बॉय बॉय.....अलविदा...ओहो फिर मुसीबत....मैं तो कहता हूं कभी अलविदा न कहना....खुद अलविदा कह रहा हूं...तो क्या कहूं..आप सोचो फिर मुझे बताओ (या अपने को)..तबतक मैं इस के पार क्षितिज पर जाकर सोता हूं....(क्षितिज....वाह  ये भी एक खुबसूरत  धोखा..)
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

बुधवार, 26 मई 2010

आरक्षण नहीं हक़ चहिये वो भी हमेशा के लिए पुरे 50 प्रतिशत

दुनिया में महिलाओं की दशा के बारे में बात करें तो अब तक के इतिहास में सोवियत संघ की महिलाओं की हालत सबसे बेहतर रही है. पर वो अब बीते दिनों की बात हो चुकी है, हमारे देश के महिला आन्दोलन यूरोप की तर्ज़ पर रहें हैं जो आम महिला जन आन्दोलन के स्वरुप की बजाय मध्यवर्गीय शहरी महिलाओं के वर्ग में ज्यादा केन्द्रित दिख रहा है , लेंगिक भेदभाव को लेकर उठे आन्दोलन का प्रभाव पूरी दुनिया के साथ साथ भारत में भी पड़ा है नतीजे में कुछ कल्याणकारी कानून और योजनाए भी बनी है, पर भारत में यूरोप की तरह केवल लेंगिक भेदभाव ही नहीं सामाजिक और जाति आधारित भेदभाव भी है जो यूरोप अमेरिका में नहीं दिखाई देता है यहाँ महिला के साथ दोहरा शोषण है. होलीवूड की फिल्मो की नायिका मर्दों की तरह जहाँ दुश्मनों से टक्कर लेती फिल्माई जाती है वही भारतीय फिल्मो की नायिका नायक पर पूरी तरह से आश्रित है और अपनी भूमिका में वो केवल पेड़ के चारों और नायक के साथ घूम कर गाना गाती है.
यूरोप अमेरिका और भारत की महिला में विद्यमान सामाजिक अंतर हमे इनकी फिल्मो से ही प्रतीत हो जाता है.
. , नई आर्थिक निति और उदारीकरण के बाद महिलाओं की दशा को नए ढंग से परिभाषित किया गया है. हमे इस परिपेक्ष में महिलाओं का बाजारवादी ताकतों से जोड़े गए स्त्री विमर्श के बारे में भी चिंतन करना चहिये क्योंकि महिला का इसी काल में नए ढंग से शोषण शुरू हुआ है. महिला को वस्तु की तरह बाज़ार में उतारा है. इसी काल में भारत देश में विश्व और त्रि-भुवन सुन्दरियों ने रातों-रात जन्म ले लिया. और इस प्रकार सती सावित्री और सीता के देश में महिलाओं की देह का भोंडा प्रदशर्न आरम्भ हुआ. ये सकारात्मक पहलु रहा की महिलाओं ने पर्दा त्याग कर पुरुषों की भांति अपनी भूमिका निभानी शुरू की पर डाक्टर लोहिया के सपनो की शशक्त महिला की तरह नहीं हो के वो के कम्पनी के उत्पाद की तरह नए कलेवर में बाज़ार में आ रही हैं. पर इसका दूसरा पक्ष ये है की भारत की ग्रामीण महिला आज भी उसी माहोल में है जहाँ वो सदियों से रहती आई है. ये पुरुषवादी व्यवस्था का नया नाटक है जो महिला वादी होने का किया जा रहा है असल में देश की आम और खास महिला को ये भी मालूम नहीं है है वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की प्रतिबिम्ब ये राजनितिक व्यवस्था उसके हितो को कभी पूरा नहीं होने देगी और इन हालात में चाहे उसे आरक्षण मिल जाये वो अपने मन का नहीं कर सकती
संगठित महिला आन्दोलन के 100 साल होने के उपलक्ष में महिला आरक्षण की मांग जोरों से उठ रही है पर देश के तमाम महिला वादी पेरोकारों को इस देश की महिला की आर्थिक सामाजिक और राजनेतिक कुव्वत को नज़रंदाज़ नहीं करना चहिये और राजनीती के वर्तमान चरित्र को देखते हुए इस बात को भी ध्यान में रखना चहिये की क्या वर्तमान राजनेतिक स्वरुप में इस देश की दलित और पिछड़ी महिला अपनी भागीदारी निभा पाएगी, शायद नहीं, रंगनाथ मिश्र और पूर्व में काका कालेलकर की रिपोर्टो में महिलाओं को पिछड़ा माना था. इस आधार पर हम हमारे सामाजिक परिवेश को देखें तो पता चलेगा की हमारे समाज में सभी महिलाओं की दशा ख़राब है चाहे वो किसी भी जाती या धर्म की हो पर ये कटु सत्य है की गरीब और आदिवासी महिला की दशा और स्वर्ण जाति की महिलाओं की तुलना में ज्यदा खराब है तथा आरक्षण में इस प्रकार की महिलाएं आगे नहीं आती है तो आरक्षण का क्या लाभ.
आरक्षण की मांग के साथ निम्न मसलों पर भी विचार किया जाना चहिये.

आरक्षण नहीं हक़ चहिये वो भी हमेशा के लिए पुरे 50 प्रतिशत
राजनितिक दलों के भीतर भी पूरा अधिकार कायम होना चहिये
केवल लोक सभा और विधान सभा में सीट नहीं 50 प्रतिशत पद भी चहिये
महिलाओं के मसलो के बारे में लेखन कभी भली भांति नहीं किया गया हमारे देश में महिलाओं के बारे में विमर्श और लेखन करने वाले बहूत ही कम लेखक हुए है इनमे भी पुरुष ज्यादा रहे हैं इस कारण महिलाओं की पीड़ा बाहर नहीं आ सकी है

मांगीलाल गुर्जर
http://communityforestright.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.htm/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

मंगलवार, 25 मई 2010

To LoVe 2015: indian Media...समाज भी भ्रम में जीता है...4 ..रोहित..rohit

ताली एक हाथ से नहीं बजती 
दंत्तेवाड़ा का मास्टर माइंड पकड़ा गया। निःसंदेह एक बड़ी कामयाबी है। नक्सलवादी लकमा की गिरफ्तारी की वजह थी, सीआरपीएफ का खोया हुआ वायरलेस सेट। जिस के सहारे उसे दंत्तेवाड़ा में सीआरपीएफ की मोर्चाबंदी का पता चल जाता था। बताया जा रहा है कि 6 अप्रैल को इसी सेट से उसे जंगल से लौट रही सीआरपीएफ की टुकड़ी की गतिविधियों की जानकारी मिली थी और फिर उसने सीआरपीएएफ पर किया सबसे बड़ा हमला।
पर इस गिरफ्तारी के पीछे एक सवाल छुपा हुआ है, .जो उत्तर चाहता है।सवाल है कि जब वायरलैस सेट खोया था तो क्या इस बात  को नजरअंदाज किया गया था कि इससे नक्सलियों को सुऱक्षा बलों की मूवमेंट का पता चल सकता है। क्या शीर्ष पर बैठे लोग ही जिम्मेदार हैं। दंत्तेवाड़ा में रणनीति बनाने वाले नहीं। आखिर कौन लेगा इस जानलेवा भूल की जिम्मेदारी। शायद कोई नहीं।
लोगो का कहना है कि सेना का इस्तेमाल करके नक्सलियों को कुचल देना चाहिए। पर ऐसे लोगों में अधिकतर जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं। न ही कभी जानने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगो ने कभी सोचा है कि सेना किसके खिलाफ उतरेगी। आखिर अपने ही लोगो के खिलाफ। अधिकतर ये तक नहीं जानते कि सेनाध्यक्ष इसके खिलाफ हैं। सेना अपने लोगो के खिलाफ उतरने से अनेक बार मना कर चुकी है। सेना इसे प्रशासनिक औऱ राजनीतिक समस्या मानती है। ये अलग बात है कि आदेश मिलने पर अनुशासन में बंधी सेना को ये कदम उठाना पड़ सकता है। 
ये कड़वा सच है कि आज नक्सलवाद देश का नासूर बन चुका है। नक्सलवादियों को  हर हाल में सरकार को कुचलना ही होगा। वरना जनआंदोलन की आड़ में हत्यारों और खूनियों की ये जमात न जाने कितने निर्दोष लोगों और सुरक्षाबलों की जान लेता रहेगा।
एक सवाल और है कि आजादी के आधी सदी बीत जाने के बाद भी प्रभावित इलाकों तक प्राथमिक सुविधाएं क्यों नहीं पहुंची हैं। देखा जाए तो नक्कारा प्रशासन और  भ्रष्ट्र नेताओं के साथ माफिया का गठजोड़ इसका  जिम्मेदार हैं। अगर प्रशासन आधी भी ईमानदारी दिखाता तो शायद हालात इतने न बिगड़ते। आरोप लगाने वालो को पता होना चाहिए की  इन इलाकों के हालात से स्थानिय औऱ राष्ट्रीय मीडिया देश को लगातार रुबरु करा रहा था। पर लोग तब चुप थे।
आखिर आदिवासियों की मांगे क्या हैं। मांगे जायज है या नहीं ये तो दूर खाये-पि-अघाये  समाजके एक चौथाई हिस्से को ये तक नहीं मालूम  कि आदिवासियों की मांगे क्या हैं।
ये भी आरोप लगते हैं कि मीडिया गरीबों से सरोकार रखती खबरें नहीं देता। वो शहरों तक ही अपने को सीमित रखता है। पर जरा दिल पर हाथ रख कहिए की गरीबों से जुड़ी खबरों पर आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है। 
किसानों की आत्महत्या पर समाज के एक रसूखदार तबके की जानकारी बताता हूं आपको। एक सो कॉल्ड समाजशास्त्री और समाजसेवक (आखिर पैसे वाले हैं,..शाम को पार्टियों में भी शिरकत करते हैं, ..ऐसे में समाजसेवक औऱ सोशलाइट कहलाएंगे ही) का कहना था कि किसान जल्दी हिम्मत हार जाता है। उसे मानसून से हटकर कुछ उपाय करने चाहिए। ये पूछने पर की क्या उपाय करने चाहिए.तो उनका जवाब था, ..जमीन से पंप के द्वारा पानी निकाल कर सिंचाई करनी चाहिए। जबाब सुन कर मैं धन्य हो गया। मेरा मन किया कि इन महाशय को पकड़ कर झकझोरुं। उनके पास इस सवाल का जबाव नहीं था कि जो किसान महज पांच हजार रुपये के कारण आत्महत्या कर रहा हैं उसके पास बोरिंग कराने के पैसे कहां से आएंगे।
24 तारिख को ही 32 साल के एक किसान ने आत्महत्या की है। हालांकी मुझे अभी इस बात का पता नहीं चल पाया है दुनिया को बदलने का जोश रखने की उम्र में उसे कितने रुपये के लिए जान देनी पड़ी। 
बच्चे चंद नंबर कम और फेल होने के कारण तो किसान चंद रकम के लिए आत्महत्या कर रहे हैं।  
आप कहेंगे कि दोनो मामले अलग-अलग हैं। पर ये मामले हमारे समाज के दोगलेपन की पोल खोल देते हैं। बच्चों के मामलों में कई लोग सक्रिय हुए। हेल्पलाइन खोली गईं। राय देने के लिए कई लोग आगे आए। जिसका खूब प्रचार हुआ। पर किसान की आत्महत्या के मामले में क्या हुआ। 
महाराष्ट्र के नक्शे को उठाकर देख लें। आंध्रप्रदेश के नक्शे को उठाकर देख लें। आधे से ज्यादा जिलों में किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यही नहीं संपन्न पंजाब का रिकॉर्ड देख लें। सभी प्रभावित इलाकों के स्थानिय मीडिया ने इन खबरों को जोरशोर से उठाया है। साथ ही राष्ट्रीय मीडिया ने भी। कितनी हेल्पलाईनें खुलीं। याद हैं आपको कुछ के भी नंबर,..नहीं न।
 आज देश के प्रधानमंत्री अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल पर पत्रकारों से बात कर रहे थे। इसमें किसान गायब थे। 2004 में उनकी सरकार के आने के बाद से अबतक 100000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। कितने लोग जानते हैं कि हर साल 16-17 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
मैने पिछली पोस्ट में चित्र लगाकर पूछा था कि इन्हें कोई पहचानता है। मगर अफसोस चंद पुराने लोग ही पहचान पाए। आज की पीढ़ी का हाल तो ये है कि अमर शहीद गणेश शंकर विध्दयार्थी को उनकी कर्मभूमि से आने वाले होनहार बिरबान ही नहीं पहचाते। ऐसे में आप सारी शहीदी मीडिया से ही चाहते हैं।
आखिर इन होनहारों को बचपन से कौन सिखाता है। दोस्तो विश्वास करें आज भी कई लोग हैं मीडिया में जो हालात से जूझते हुए भी इमानदारी से डटे हुए हैं। इसी वजह से मीडिया की विश्वसनीयता बची हुई है। चंद दलालों की वजह से इस बिरादरी को गिरा हुआ मानना कहां तक उचित है यारों।
(क्रमशः)
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

सोमवार, 24 मई 2010

यु पी ए की सरकार महिला आरक्षण बिल क्यों नहीं पारित करना चाहती है

महिला आरक्षण बिल वर्तमान में तीन प्रकार के मतों में बंटा हुआ है, पहला वो जो बाहरी मन से इसके पक्ष में है वो है कांग्रेस, बी जे पी, वामदल, और इनके कुछ अन्य सहयोगी, दुसरे वो जिसमे यादव तिकड़ी आती है, यानि लालू, मुलायम, और शरद, शरद ने तो मोजुदा स्वरुप में इसे पेश करने के विरोध में जहर खाने की धमकी दे रखी है, कांग्रेस भी इनकी इस धमकी से नकली तौर पर डरने या यूँ कहें की आम सहमती नहीं है इसलिए बिल पेश नहीं करेंगे कह कर इस बिल को पेश करने से लगभग पल्ला झाड चुकी है. तीसरे वो हैं जो सामाजिक गैर राजनेतिक संगठन हैं जो सड़क पर इस बिल को पारित कराने के लिए मोर्चा खोले बेठे हैं,
जिस दिन राज्य सभा में ये बिल पारित हुआ उस दिन महिला सांसदों ने मिठाई बाँट कर अपनी नकली ख़ुशी जाहिर की, असली ख़ुशी इसलिए नहीं रही क्योंकि ये वो महिला सांसद हैं जिनकी राजनीती के बाज़ार में दुकान जमी हुई है और वो नहीं चाहती है की उनके रास्ते में कोई में रुकावट या प्रतिस्पर्धा पैदा हो. पर देश के आधे महिला वोटरों को राजी करने के लिए उनको अपने चहेरे पर नकली ही सही पर ख़ुशी तो दिखानी ही थी.
बेचारी कांग्रेस के हाथों से जब मुसलमान वोट खिसके हैं लालू मुलायम इन वोंटो को अपने हाथ से किसी भी सूरत में निकल देना नहीं चाहते इसलिए वो कहते हैं की मोजुदा महिला बिल में अल्पसंख्यकों और दलितों आदिवासियों के लिए गुंजाईस नहीं है, कांग्रेस को भी डर सता रहा है इसलिए उसने भी इस भूत को जगाना अभी जरुरी नहीं समजा और कह दिया की आमसहमति नहीं बनी है.
पर सड़क पर खड़े स्वयंसेवी सामाजिक संगठनों को कौन समजाये उन्होंने तो मोर्चा खोल दिया की बिल पारित होना चहिये. पर इनका दबाव कितना कारगर होगा ये शंकाओं से भरा हुआ है. हमारे देश में गैर राजनेतिक आंदोलनों का भविष्य कभी लम्बा और प्रभावी नहीं रहा है. गैर राजनेतिक आन्दोलनों को जन समर्थन भी सिमित ही मिलता है इसका कारण शायद अधिकांश ये आन्दोलन प्रायोजित और नकली होते हैं, कुछ सामाजिक संगठन ईमानदारी से करना भी चाहते हैं तो इनकी ही बिरादरी के इनकी टांग खीचने लग जाते हैं.
यु पी ए की सरकार महिला आरक्षण बिल क्यों नहीं पारित करना चाहती है क्योंकि उसकी मंशा बिलकुल नहीं है. वो क्यों नहीं चाहती ये बहस का विषय हो सकता है.

इस बहस के केंद्र में एक और सवाल है जिस पर चर्चा होनी चाहिए। आखिर वो वजहें कौन सी हैं जिनकी वजह से यह सरकार दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की मांगों को खारिज कर रही है। यह एक पेंचीदा सवाल है और इसका जवाब सीधा और सरल नहीं हो सकता।

संसदीय व्यवस्था में दलितों और पिछड़ों को आरक्षण पहले से तय है। उनके लिए सीटें आरक्षित पहले हैं। अभी इसी साल फरवरी में 109वें संशोधन के जरिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ाया गया है। ऐसे में महिला आरक्षण बिल में भी बिना कहे उनके लिए प्रावधान किया जाना चाहिए था। लेकिन यह प्रावधान नहीं किया गया।

यहां पर बहुत से लोग यह कहते हैं कि महिलाएं भी दलित हैं और जिस तरह दलितों को बांटना सही नहीं है, वैसे ही महिलाओं को भी बांटना सही नहीं होगा। बात पूरी तरह सही है। मर्दों की बनाई इस दुनिया में महिलाएं सबसे बड़ी दलित हैं। आबादी और जुल्म दोनों लिहाज से। एक पंडित भी अपने घर की महिला का शोषण करता है और एक दलित भी अपने घर की महिला को दलित बना कर रखता है। डिग्री का फर्क हो सकता है। लेकिन महिलाएं किसी तबके में आज़ाद नहीं है।

लेकिन इस तर्क के साथ यह भी एक सनातन सत्य है कि महिलाएं हिंदू भी होती हैं और मुसलमान भी। महिलाएं पंडित भी होती हैं और दलित भी। महिलाएं ठाकुर भी होती हैं और आदिवासी भी। जब समाज में यह विभाजन पहले से मौजूद है तो आरक्षण में इसका प्रावधन कर देने से कौन का अंतर पड़ जाएगा? यही नहीं जो नेता महिला आरक्षण में विभाजन का विरोध कर रहे हैं उनमें से बहुतों ने अपने शासन में इसी तरह का विभाजन किया और करवाया है। नीतीश कुमार ने बिहार में सियासी फायदे के लिए अति पिछड़ों का नारा दिया। यह क्या था? पिछड़ों को बांटने की कोशिश। ठीक उसी तरह राजस्थान में गुर्जरों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की सिफारिश और बाद में अलग से प्रावधान करने का कदम बीजेपी के शासन काल में हुआ था। यह क्या था? इसलिए विभाजन की दलील बेहद बेतुकी और बेबुनियाद है। सभी संवेदनशील लोगों को इस दलील का विरोध करना चाहिए।

दरअसल, महिला आरक्षण बिल में दलितों और आदिवासियों के लिए भी प्रावधान नहीं किए जाने का एक ख़ास मकसद है। अगर इस बिल में यह प्रावधान किया गया तो उससे महिलाओं को विभाजित नहीं करने की दलील ख़त्म हो जाएगी। ऐसा हुआ तो पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बागी तेवर को संभालना आसान नहीं होगा। सियासत का चेहरा मौकापरस्त चेहरा है। अगर पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का दबाव अधिक बढ़ा तो मजबूरी में उनके लिए भी प्रावधान बनाना पड़ सकता है। अगर महिला आरक्षण में यह प्रावधान किया गया तो बाकी बची सीटों पर भी पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को उसी अनुपात में हिस्सेदारी देनी पड़ेगी। सवर्ण सांसद और हुक्मरान इतनी बड़ी कीमत चुकाने को फिलहाल तैयार नहीं। और इसी से उनका जातिवादी चेहरा सामने आ जाता है।

ऐसे में एक ही उपाय बचता था कि महिला आरक्षण बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता। अगर ऐसा होता तो इस पर किसी को एतराज नहीं होता। न पिछडों को, न दलितों, न आदिवासियों और न ही अल्पसंख्यकों को। देश के ज़्यादातर सांसद इससे खुश भी रहते। लेकिन सोनिया गांधी समेत चंद नेताओं ने सियासी फायदे के लिए इस बिल को आगे बढ़ा दिया।

महिलाओं को आरक्षण का मुद्दा एक और लिहाज से अनूठा है। नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं के बराबर है। शिक्षा संस्थानों में भी यही हाल है। देश की ज़्यादातर लड़कियों को अपनी पढ़ाई दसवीं से पहले ही छोड़ देनी पड़ती है। जरूरत उनके लिए आर्थिक योजनाएं शुरू करने की थी। नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में उनके लिए सीटें आरक्षित करने की थीं। कानून और व्यवस्था सुधारने की थी ताकि वो घरों से बाहर निकलते वक़्त सुरक्षित महसूस कर सकें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्हें सीधे संसद में हिस्सेदारी दी जा रही है। इन तमाम स्थितियों पर गौर करने पर बस एक ही जवाब आता है। महिला आरक्षण बिल कुछ और नहीं है, सिर्फ़ और सिर्फ़ ताक़तवर सवर्णों की सियासी साज़िश है। और इस साज़िश में कांग्रेस, बीजेपी के साथ लेफ्ट भी शामिल है।

मांगीलाल गुर्जर

http://communityforestright.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.htm/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

गुरुवार, 20 मई 2010

मुझे नहीं लगता की महिला आरक्षण मिल जाएगा

विभिन्न पार्टियों की तीव्र बहस के बाद भारतीय लोक सभा आखिरकार 16 मार्च तारीख को संपन्न हुई। लोकमतों द्वारा केन्द्रित 33 प्रतिशत महिला आरक्षण विधेयक प्रस्ताव पूर्व योजनानुसार इस दिन पारित नहीं हो पायी । भारतीय न्याय मंत्री मोइली ने इसी दिन नयी दिल्ली में मीडियाओं से कहा कि कांग्रेस पार्टी सरकार अन्य विभिन्न पार्टियों की एकमता न पाने की स्थिति में जबरदस्ती इस प्रस्ताव को पारित नहीं करना चाहती है।

ये अलग बात है की अमेरिका के साथ परमाणु समजोता करने के लिए मरी जा रही कांग्रेस ने उस समय इस प्रकार एकमत होने की न तो बात की थी और न ही इसकी प्रतीक्षा. सही बात तो ये है की कांग्रेस भी नहीं चाहती है की महिलाओं को 33 % आरक्षण मिल जाये. जो पार्टियाँ महिलाओं के होटों का ढोल पीट रही है वे अपने गिरेंबान में झांक कर देखे की इन्होने अपनी पार्टी के 33 पदों पर क्या महिलाओं को रखा हुआ है शायद नहीं. महिलाओं का मसला छोड़ो क्या दलितों और आदिवासियों को समुचित स्थान दे रखा है शायद नहीं. असल में ये मुद्दा है महंगाई और आतंकवाद जेसे मसलों से जनता का ध्यान हटाने के लिए.

इसी माह की 9 तारीख को भारतीय राज्य सभा ने बहुमत वोटों से संविधान की 108 धारा संशोधन प्रस्ताव पारित कर दिया। इस संशोधन प्रस्ताव के मुताबिक भारत की केन्द्रीय व विधान सभा को अवश्य महिला के लिए 33 प्रतिशत सीटें सुरक्षित रखनी होगी। उक्त भारतीय संशोधन कानून के अनुसार, इस प्रस्ताव को संसद के दो सदनों की दो तिहाई बहुमत से पारित होने पर ही प्रभाव में डाला जा सकता है। उस समय लोकमतों की आम राय थी कि हालांकि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली गठबन्धन सरकार को संसद की लोक सभा में बहुमत सीटें हासिल हैं , और उधर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने भी इस प्रस्ताव पर भी समर्थन जताया है, इस लिए लोक सभा में इस प्रस्ताव का पारित होने में कोई बाधा नहीं होगी। परन्तु आने वाले कुछ दिनों में भारतीय राजनीति मंच में विभिन्न पार्टियों ने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए 9 तारीख से पार्टियों के बीच अनेक नौंक भौंक शुरू कर उसपर आपत्ति उठायी , जिस से इस महिला आरक्षण विधेयक को एक अनिश्चितकाल के भविष्य पर पहुंचा दिया गया।

केन्द्रीय और विधान सभा के दो सदनों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित प्रस्ताव 1996 में तत्कालीन गोडा सरकार द्वारा पेश की गयी थी, लेकिन तब से वे अब तक भारतीय संसंद में पारित नहीं हो पायी है।

लोगों आश्चर्य चकित हैं कि भारत आखिर क्यों इस आसाधारण प्रस्ताव को पारित करना चाहता है ? इस का भारत में महिला की स्थिति से घनिष्ठ संबंध है। भारतीय महिला ने सौ सालों की कड़ी मेहनत से हालांकि धीरे धीरे पुरूष जैसी राजनीतिक अधिकार समानता हासिल करने में थोड़ी बहुत प्रगति की है, तो भी पूर्ण रूप से महिला अब भी कमजोर स्थान में पड़ी हुई हैं। भारतीय महिला लम्बे अर्से से राजनीति में भाग लेने व प्रशासन में अपनी राय प्रस्तुत करने तथा संपति अधिकार पाने में वंचित रही हैं। पिछली शताब्दी के 90 वाले दशक से भारत में अर्थतंत्र का पुनरूत्थान शुरू होने के बाद से महिला सामाजिक जीवन में अधिकाधिक प्रफुल्लित होने लगी और तब से भारतीय महिला के अपने अधिकार व हित से संबंधित अधिकारों को पाने की सामाजिक आधार धीरे धीरे परिपक्व होने लगी हैं। इसी पृष्ठभूमि तले, भारत के संविधान नम्बर 108 धारा संशोधन प्रस्ताव को औपचारिक रूप से संसद की कार्यसूची में दाखिल किया गया।

महिला आरक्षण विधेयक प्रस्ताव भारतीय महिलाओं के सामाजिक स्थान को उन्नत करने व भारतीय समाज की प्रगति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। तो क्यों समाजवादी और राष्ट्रीय जनता दल आदि कुछेक पार्टियां इस का विरोध कर रही हैं ? विश्लेषकों ने कहा है कि भारत की दो मुख्य पार्टी कांग्रेस व भाजपा लम्बे अर्से से बुनियादी इकाईयों की जनता में अपनी गतिविधियां चलाती आयी हैं , इस लिए उनके पास बहु मतदाता हैं और उनको बहुत सी सर्वश्रेष्ठ महिला राजनीतिज्ञों का भी समर्थन प्राप्त हैं। यदि ये दो पार्टियां महिला आरक्षण विधेयक को सहमति देते हैं तो उन्हें अधिक वोट हासिल हो सकते हैं और उनका राजनीतिक क्षेत्र बढ़ सकता है। जबकि समाजवादी व राष्ट्रीय जनता दल आदि छोटी पार्टियों की संसद में सींटे इतनी संतोषजनक नहीं हैं, और तो और इन पार्टियों के मतदाता आम तौर पर समाज के निचले वर्ग के जन समूह हैं, सर्वश्रेष्ठ महिला राजनीतिज्ञों का नामोनिशान तक नहीं हैं। यदि कांग्रेस और भाजपा संसद में जबरन इस प्रस्ताव को पारित करती है तो ये छोटी पार्टियां गठबन्धन सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं और विपक्ष पार्टी हाथ धरे बैठे इस का लाभ उठा सकती हैं। इस कारण कांग्रेस सरकार को इस समस्या पर संजीदगी से विचार करना बहुत ही अनिवार्य है। विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस महिला आरक्षण विधेयक को जबरन पारित कर अपने राजनीतिक स्थान को जोखिमता में नहीं डालेगी।पर काफी हद तक लालूप्रसाद और मुलायम जेसे नेताओं के तर्क ठीक लगते हैं की महिलाओं को 33 % आरक्षण मिलने पर भी गरीब और दलित वर्ग की महिलाओं की बजाय कार्पोरेट सेक्टर और सामंती वर्ग की महिलाओं को ही इसका लाभ मिलेगा ये बात है भी सही क्योंकि जिस देश की संसद में 350 सांसद करोडपति हो और गरीब पुरुष सांसद को भी आज लोकसभा में पहुंचना लगभग असंभव लग रहा हो इसे माहोल में गरीब महिला का संसद में पहुंचना एक ख़ूबसूरत सपने जेसा ही है, हमारे देश में जहाँ एम् एल ए और एम् पी के टिकट बिक रहे हो वहां गरीब की हैसियत ही नहीं है की वो चुनाव में खड़ा हो जाये.

नवीनतम जारी एक जनमत संग्रह से पता चला है कि भारत की मीडिया इस विधेयक का समर्थन करती है, लेकिन जनता नहीं मानती है कि इस प्रस्ताव के पारित होने से महिला के हित व अधिकार में कोई असली सुधार होगा।मिडिया के समर्थन के पीछे बाज़ारवादी सोच है जो सीधा बहुरास्ट्रीय कम्पनियों से जुडा है जो उपभोक्ता सामग्री का निर्माण करती है और उसे बेचने के लिए महिला मोडल के रूप में मिडिया में एक बड़ी अहम् भूमिका निभा रही है इसके अलावा महिला एलोक्ट्रानिक मिडिया की सबसे बड़ी दर्शक है

भारतीय सामाजिक शास्त्र के विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि भारत के पास अनेक सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक महिलाएं तो हैं, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत की महिलाओं को फिलहाल पुरूष जैसी समानता व अधिकार हासिल हो चुकी हैं, भारत महिला की अन्तिम मुक्ति भारत के सामाजिक अर्थतंत्र विकास पर निर्भर रहती है।क्योंकि सही मायने में महिला तभी स्वतंत्र होगी जब वो आर्थिक रूप से सक्षम बने और उसके द्वारा कमाए गए धन का भी वो खुद उपयोग करने का निर्णय ले सके जो अभी दूर दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहा है.

मांगीलाल गुर्जर/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

मंगलवार, 18 मई 2010

To LoVe 2015: मीडिया ही दोषी नहीं, समाज भी भ्रम में जीता है...3... रोहित





ताली एक हाथ से नहीं बजती

                हर स्तर पर नैतिक पतन






इसमें कोई शक नहीं की जो वर्ग नैतिकता के मापदंड पेश करता है, उसी पर इसे संभालने की ज्यादा जिम्मेदारी होती है। आज आजादी के साठ साल हो गए हैं। समाज में और देश में हर स्तर पर गिरावट आई है। ऐसे में मीडिया कैसे अछूता रह सकता था। इसका मतलब ये नहीं कि मैं मीडिया में आई गिरावट का समर्थन कर रहा हूं। पर मीडिया में आई गिरावट को समझना होगा।
सोचना होगा कि देश के इस जागरुक वर्ग में दीमक क्यों लग रही है। समाज को अपने अंदर भी झांकना होगा। क्योंकी समाज का भी नैतिक प्रेशर होता है..जो हर क्षेत्र पर एक दबाव बनाता है। चाहे वो राजनीति हो, धर्म हो या आर्थिक क्षेत्र। मीडिया भी उससे अछूता नहीं है।
आजादी से पहले राजनीति, ..समाजिक किसी भी क्षेत्र में आदर्शों की कमी नहीं थी। पर आज हालात एकदम उल्टे हैं। आजादी से पहले और बाद में कुछ समय तक नेता देश के आदर्श होते थे,.रहनुमा कहलाते थे। राष्ट्र की कल्पना और राष्ट्र निर्माण के सपने को साकार करने का ध्येय हमेशा उनके सामने रहता था।
आज भले ही हम महात्मा गांधी, ,.पंडित जवाहर लाल नेहरु., राजेंद्र प्रसाद., राजाजी जैसे नेताओं के काम में हमेशा गलती निकालते रहें। एक नेता को दूसरे से अच्छा सिद्द करते रहें। पर ये सभी वो तपे तपाए नेता थे, जिनके पास देश को लेकर कोई न कोई योजना थी। नेहरु युग का लोकतांत्रिक समाजवाद का आदर्श अगर ईमानदारी से लागू होता तो देश कहां से कहां तक पहुंच जाता। पर बेइमानी.., काहिली,..आसानी से पैसा बनाने की आदत हमारे में धर करती गई। भ्रष्टाचार में हम नए रिकॉर्ड बनाते जा रहें हैं। 
उस समय के नेता बडे़ थे। इसलिए उस समय की उनकी मामूली गलती भी काफी बड़ी हो जाती थी। जिसका खामियाजा भी कई सालों से हमें भुगतना पड़ रहा है। पर उनमें साहस तो था। कुछ करने का आदर्श तो था उनके पास। सही अर्थ में वो राजनेता थे।
आज स्थिती क्या है। लोगों की समझ में ये नहीं आता कि कोई शख्स चालाक है इसलिए नेता है,. या नेता है इसलिए चलाक है। इससे बड़ी गिरावट की और क्या मिसाल होगी। 
कहतें हैं कि अंग्रेजी राज में कोई महिला पूरे गहने में कहीं भी, ..किसी वक्त भी आ जा सकती थी।  आज तो महिलाएं ज्यादातर बिना गहने पहने ही निकलती हैं..निकलती भी हैं तो उन्हें गहने से ज्यादा अपनी आबरु की चिंता होती है। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब रेप या गैंग रेप की घटना कहीं घटती न हो। आजकल ऑनर किलिंग भी जोरो पर है।
ऐसे में समाज का चरित्र इतना कैसे गिरा। ये कोई एक दिन में या कुछ दशक में नहीं गिरा था। ये दरअसल हमारे ही परिवेश की गलती है। पिछले 1000 साल में करीब 65 साल ही भारत में एक सामन राज रहा। बाकी पूरे 935 साल कभी धर्म को लेकर कभी गुलामी और नस्लवादी वजह से, हिंदुस्तान में सिर्फ अराजकता रही थी।
देश का संत समाज भी आजादी के दौर में देश को राह दिखा रहा था। रामचंद्र परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, साईं बाबा, जैसे संत लगता है कि अचानक ही देश के परिद्श्य से गायब हो गए हैं। 
आज इच्छाधारी बाबा, स्वामी नित्यानंद का बोलबाला है। लोगो उन्हें ही ज्यादा पूजते हैं आंखों पर पट्टी बांध कर। स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रामचंद्र परमहंस को गुरु बनाने से पहले प्रश्न किया था कि क्या आपने भगवान देखा है। उनके उत्तर से संतुष्ट होकर ही स्वामी विवेकानंद ने परमहंस को अपना गुरु माना था। पर आज स्थिती अजीब है।  आज समाज का अधिकांश वर्ग, यहां तक ही ताकतवर वर्ग भी अंधभक्त बना हुआ है। जब श्रेष्ठ जन ही पतन की राह पर हों तो ऐसे सधारण जन की क्या बिसात। 
मीडिया में भी आजादी के दौर में एक आदर्श था। , ध्येय था , देश को आजाद कराने का। भूखे रहकर, यातना सहकर, जेल जाकर, परिवार को कुर्बान करके भी पत्रकार अपने काम के लिए जीजान से जुटा रहता था। पर क्या किसी को पता है कि उस समय भी अखबार को चलाना हर ईमानदार पत्रकार के लिए आसान नहीं था। ऐसे कई उदाहरण हैं।
शहीद पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के बारे में समाज में कितने लोगों को पता है। सुविधासंपन्न वर्ग में तो शायद ही कुछ लोगो ने उनका नाम सुना हो। आजादी के बाद के दौर में भी अनेक लोगो ने ईमानदारी की मिसाल कायम करते हुए पत्रकारिता की। उनकी हालात क्या रही, ये आगे के लेखों में स्पष्ट करुंगा। 
कुछ लोगो ने कई बेईमान पत्रकारों के नाम गिना दिए हैं। पर क्या उन लोगो को किसी ईमानदार पत्रकार का नाम मालूम है। अखबारों में हमेशा ही खबरों का चयन गलत होता.., तो आईपीएल का घोटाला कैसे उजागर हुआ। कैसे कुछ दिन पहले पता लगता कि देश में बच्चे रोटी न मिलने की वजह से आज भी मिट्टी के ढेले खातें हैं। कितने थे जिन लोगो ने इस खबर पर आगे आकर उस इलाके तक ईमानदार तरीके से रोटी पहूंचाने की पहल की। सब कहते हैं सरकार ही करें। हम क्या कर सकते हैं। यानि पल्ला झाड़ने में सब आगे। 
आज मीडिया में आने का मकसद लोगो का कोई मिशन नहीं है। उनका ध्येय कुछ और है। समाज में कितनी गिरावट आई है, उसका एक उदाहरण देता चलूं। चंद दिन पहले ही एक नए रंगरुट ने बातचीत के दौरान कहा कि वो आईएएस,-आईपीएस नहीं बव पाया, तो ऐसे में प्रभावशाली औऱ ताकत वाला पेशा सिर्फ मीडिया बचा था। सो वो मीडिया में चला आया। कुछ कुरदने पर पता चला कि उसके पिताजी चाहते थे कि बेटा किसी पावरफुल जगह पर काम करे। सरकारी अधिकारी नही बन पाया,  जल्दी नेता बनने के आसार नहीं थे, सो उन्होने बेटे को मीडिया में धकेल दिया। अब इस मानसिकता पर क्या कहें। 
समाज की पहली ईकाई में ही जब गड़बड़ी आ गई हो, तो मीडिया का क्या दोष।
आज कई पेशे में लोगो लाखों तनख्वाह पा रहे हैं। उनके काम में मंदी आती है तो सरकार चिंतित होती है। अगर पत्रकार कुछ हजार पहले की तुलना में ज्यादा पाता है तो आरोप लगाया जाता है कि किसी न किसी नेता के तलवे चाटता होगा। भई आखिर पत्रकारों ने ऐसा कौन सा पाप किया है जो उन्हें अच्छा वेतन पाने का हक नहीं देता। लोगो को नहीं मालूम की श्रमजीवी पत्रकार आज भी जैसे तैसे ही गुजारा करता है। देश में जितने भी अखबार या टीवी चैनल हैं उनकी तुलना में पत्रकार ज्यादा हैं।  
आरोप लगाने वाला खुद अपने गिरेबां में नहीं झाकंता। लोगो को चुनाव के वक्त अपना धर्म, जाति याद रहती है। पर वो देश के बारे में सोचते हुए किसी ईमानदार को वोट नहीं देता। परिवर्तन करने के समय वो चुकता नहीं,..जानबूझ कर पीछे हट जाता है। परिवर्तन करने की जगह हर कोई अपना फायदा देखता है..देश का नहीं। ऐसे में प्रशासन पर पकड़ छोटी सोच वाले लोगो की हो जाती है। ऐसे लोगो के हाथों में प्रशासन चलाने की क्षमता नहीं होती। नतीजा प्रशासन लापरवाह हो जाता है। नक्कारा हो जाता है। नेता और प्रशासनिक लोग जनता की जगह अपना फायदा देखने लगता है। नतीजा पिछड़े इलाकों में नक्सली हिंसा जैसी मुसीबत पनपती है। पहले के इन इलाकों के प्रशासक औऱ नेताओं समेत समाज की निष्क्रियता और बेइमानी ने आज की पीढ़ी का जीना मुहाल कर रखा है। 
मीडिया काफी समय से इन इलाकों में असमान विकास की बात बता रहा था। हालात बिगड़ते जा रहे हैं इस पर भी चेता रहा था। पर लोगों के कान मे जूं तक नहीं रेंगी। किसी राजनीतिक दल ने शुरु में ही ईमानदारी दिखाई होती. या जनता ने आगे बढ़कर सवाल किया होता तो नक्सल प्रभावित राज्यों की स्थिती इतनी खराब नहीं होती। इन इलाकों के ईमानदार पत्रकार हमेशा सिर तलवार की धार पर रखकर काम करते हैं। पर किसी को इनकी फिक्र नहीं होती। 

(क्रमशः)
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

गुरुवार, 13 मई 2010

To LoVe 2015: चंडीगढ़ युद्ध स्मारक

ऐसा सुना और कहा गया है.'जो देश अपने शहीदों को भूल जाता है उस देश की प्रगति संभव नहीं है '.

'युद्ध स्मारक' बनवाए जाते हैं अपने देश के शहीदों के प्रति सम्मान और आभार दर्शाने हेतु.आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाते रहने के लिए की यह देश हमेशा उन वीर शहीदों का ऋणी रहेगा जिनके बलिदान के कारण आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं.

शायद बहुतों को मालूम नहीं है, १९४७ के बाद अब तक हमारे देश

सोमवार, 10 मई 2010

To LoVe 2015: Indian Media..मीडिया ही दोषी नहीं, समाज भी भ्रम में जीता है..2...रोहित


ताली एक हाथ से नहीं बजती
आज सच बोलना गुनाह हो गया है। आप कमजोर हैं तो आप पर वार होता है। आप सबल हैं तो आप को कोई कुछ नहीं कह सकता। यही हालत सारे देश में है। प्रशासन के हर विभाग में है। 
लोग पत्रकारों से सिर्फ ईमानदारी की अपेक्षा रखते हैं। पर जब कोई पत्रकार सच्ची बात कहने का साहस करता है तो सरकारी गाज गिरते समय कितने लोग आते हैं उसे बचाने।  ऐसे अनेक उदाहरण आपको मिल जाएंगे। महानगरों में तो हालत कुछ ठीक हैं..पर छोटे शहरों में...जनता की जिस समस्या को वो उठाता रहता है..जनता कभी उसे लेकर उत्तेजित नहीं होती। उसे कोई सरोकार होता है तो बस की ये काम हो जाए., वो काम हो जाए..अगर कुछ अड़चन आए तो वो पीछे हो लेती है।
प्रशासन जब विफल होता है .तो अराजकता फैलती है....फिर जन्म होता है ..जंगल राज का..नक्सल समस्या प्रशासन की विफलता का सबसे बड़ा नमूना है। बाहर से आया आतंकवाद नहीं है। जिन इलाकों में समस्या है नक्सल की, ,,.वहां पहले प्रशासन विफल हुआ। अंत में स्थिती बेकाबू हो गई..
इस देश में जब भी वोट देने की बारी आती है तो सभी को अपनी जाति, .अपना धर्म याद रहता है। पर देश या समाज के बारे मे सोचता कोई नहीं। ऐसे में जीतता वही है जिसे जीतना नहीं चाहिए। क समस्या यह है कि देश का बड़ा सुविधासंपन्न वर्ग कभी आंदोलन में आगे नहीं आता। मुंबई में हमले में जब उस पर आंच आई तो कई लोगो को पता चला की आतंकवाद क्या बला है। जहां सभी मिलकर आगे आते हैं, . वहां बदलाव होता है। 
जहां प्रशासन विफल होता है तो वो ऐसे कदम उठाता है जैसे वो अपना आपा खो बैठा हो..नक्सल प्रभावित इलाकों का आलम ये है कि किसी को भी चाहे वो पत्रकार ही क्यों न हो. को पकड़ कर जेल में डाल दिया जाता है।।
आने वाले समय मे तो डर लगता है कि अगर कहीं किसी के घर में बिरसा मुंडा या तिलक मांझी जैसे अंग्रेजों को टक्कर देने वाले योद्धाओं की तस्वीर निकल गई तो,  कहीं  प्रशासन उसे नक्सली करार देकर जेल में ही न डाल दे।
ऐसा नहीं है कि सुरक्षा बल पुरी तरह से दुध से धुले हैं और वो किसी निर्दोष को नहीं मारते,। सवाल है कि सुरक्षा बल को नियंत्रित कौन करता है। हमारे द्वारा चुने नेता ही होते हैं जिनके कहने पर सुरक्षा बल कार्रवाई करते हैं।
आजकल बुद्धिजिवियों में भी एक फैशन चल पड़ा है कि आदिवासियों के साथ सहानुभूति दिखाते हुए सुरक्षा बलों को जितना कोसा जाए, उतना कोसो। इन लोगों के पास ऐसे लोगों की एक लंबी लिस्ट है, जिसके बारे में उनका दावा है कि ये सभी निर्दोष हैं जिन्हें सुरक्षा बलों ने मारा है। हो सकता है ये सही भी हो। पर क्या कोई बताएगा की इन इलाकों में पुलिस के सिपाही को बिना वजह मारकर नक्सली क्या कर रहें हैं। 
क्या नक्सली संगठन अब सिर्फ और सिर्फ खूनी और हत्यारों की जमात नहीं रह गई है। क्या महात्मा गांधी का अस्त्र अपनाने से काम नहीं हो सकता। अपनी सरकार को आप मजबूर नहीं कर सकते,. तो किसे झुका पाएंगे हम। 
इन हालात में मीडिया की स्थिती क्या है। दोतरफा लड़ाई में कितने पत्रकार मारे गए, क्या कोई जानता है। सिपाही के मरने पर सरकार उसके परिवार का ख्याल रखती है। नक्सली अपने लोगो का ख्याल रखते है। पत्रकार, वो तो वो निरही प्राणी है, जिसे सरकार अपना दुश्मन मानती है, क्योंकी वो उसकी पोल खोलता है। नक्सली इसलिए क्योंकी पत्रकार उसके खूनी खेल का समर्थन नहीं करता। उसका ध्यान हमेशा से ही हाशिए पर पड़े इंसान की तरफ होता है। यानि पत्रकार दोनो तरफ से मरता है। तो आखिर कबतक आप ये आशा करते रहेंगे कि एक झोला टांगे और परिवार को भूखा रखते हुए पत्रकार काम करता रहे। अगर वो कुछ ज्यादा पैसै कमाने लगा है तो सीधा बेइमान कहते लोग थकते नहीं। आम जनता का आलम यह है कि खुद पत्रकार से किसी न किसी अनैतिक काम(चाहे बच्चे का नाम लिखाने की बात ही क्यों न हो) को करवाने के लिए कहते रहते हैं। अगर कर दे तो बढ़िया, वरना तत्काल उसकी इज्जत उतारने पर अमादा कि आप कैसे पत्रकार हो। इतने साल हो गए औऱ आप इतना सा काम नहीं करा सकते। जैसे सारे अनैतिक काम करवाने का ठेका पत्रकारों ने लिया हो।
आखिर ये कहां का इंसाफ हैं। आपकी लड़ाई लडे़ तो अच्छे औऱ आपके बुरे कदम का विरोध करें तो बूरे। लोगो को आदत सी हो गई है यथास्थिती में रहने की। ऐसे में अगर कुछ कड़वा सच मीडिया दिखाता है तो उसे झेलने की आदत डाल लें।
एक दिन में लोग 200 रुपये की सिगरेट पी सकते हैं. लेकिन दो या तीन रुपये का अखबार खरीद कर नहीं पड़ सकते। छोटे छोटे ईमानदार अखबार कुछ दिन चलते हैं और फिर बंद हो जाते हैं। ऐसे में बेईमान लोगो के लिए मैदान खाली हो जाता है। पूरी बस में मुशिकल से 4 आदमी अखबार खरीदते हैं. 70 लोगों मे से। यानि की मुशिकल से 5 फीसदी। ये हद नहीं है तो और क्या है। .....
(क्रमशः)
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

शुक्रवार, 7 मई 2010

To LoVe 2015: इतना भी न इतराओ की ....


इतना भी न इतराओ...

 दोस्त
कई नदियों को हमने बहते देखा है
खेत खलिहानों को मिटाते देखा है
साहिल को बनाते-बिगाड़ते देखा है
ठीक है कि
नदियां जब चलती है अल्हड़ होती है
कई मोड़ पर इठलाती बल खाती हैं
सफर में नये निशां बनातीं हैं
हमने भी
शहर-दर-शहर, कस्बे-दर-कस्बे
नदियों को गुजरते देखा है
जाकर सागर में सिमटते भी देखा है
पर मेरे दोस्त
हर नदी को नदी का सहारा नहीं मिलता
हर नदी का सागर मुकां नहीं होता
सागर मयस्सर होने से पहले हमने
कई नदियों को
रेत के सागर में खोते भी देखा है
..................................................................................................................................................................... 
कई बार हम करने की कुछ सोचते हैं. पर कर कुछ और डालते हैं .. आज सोचा था पिछली पोस्ट का दूसरा भाग डालने का....पर एक तंज पोस्ट कर डाला..आप कहेंगे तंज?....जी हां......दरअसल. देर रात आते वक्त कहीं बातचीत में घमंड से इतराते लोगो की बात हो रही थी...न चाहते हुए भी खास दिल्ली वालो की तरह बात करते करते हमने तंज दे ही मारा.....कविता की अंतिम पंक्तियां तंज ही थी, पर बन गईं पूरी कविता......अब ये कविता है या तंज... सोचिए..................
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <