रविवार, 25 अप्रैल 2010

To LoVe 2015: Indian Media...मी़डिया ही दोषी नहीं, समाज भी भ्रम में जीता है..1.रोहित

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ताली एक हाथ से नहीं बजती
लगता है आजकल मीडिया को लता़ड़ने का फैशन हो चला है..हर कोई मीडिया को नसीहत देता दिखता है...लगातार मी़डिया पर आरोप लगते हैं कि वो समाज से दूर होता जा रहा है...हाल ही में एक नई नसीहत दी गई..अखबारों में नक्सल हमले में शहीद सिपाहियों के शव के चित्रों को नहीं छापना चाहिए..इलेक्ट्रॉनिक मी़डिया के शुरुआती दौर से ही कहा जाता रहा कि ब्रेकफास्ट औऱ डिनर के समय झोपड़ियों या विचलित करने वाले दर्श्य नही दिखाने चाहिए..क्योंकी लोग खा नहीं पाएंगे..पर जरा कोई इन लोगो से पूछेगा की आखिर कब तक और क्यों? आखिर क्या करे मीडिया..जब कुछ अच्छा न होने देने की लोगो ने ठान रखी हो….हमारे समाज की एक बहुत बड़ी बिडंबना है..समाज का ताकतवर वर्ग भ्रम में जीना चाहता है.. उसे सच्चाई से परहेज है..ऐसे कई लोगो का कहना है कि किसी चीज को दायरे में ही दिखाना चाहिए. पर खुद का दायरा कोई नहीं बांधेगा...एक और आऱोप है कि मीडिया सिर्फ पैसे लेकर ही खवरें दिखाता है..पर पैसे ही लेकर सब खबर नहीं छापते हैं....मीडिया की अपनी सीमांए हैं.....कुछ बदनाम लोगो के नाम पर सबको बुरा नहीं कहना चाहिए..आज समाज के हर वर्ग में गिरावट आई है..मीडिया में भी ऐसे लोग आते हैं..तो ताजुब्ब नहीं होना चाहिए..पर जितना हो सकता है मीडिया में कई लोग ईमानदार कोशिश करते हैं..पर क्या कोई ध्यान भी देता है, ....लोगों को बढ़िया कार्यक्रम क्यों याद नहीं रहते....क्या कोई खुद से पूछेगा...उन्हें सिर्फ खराब खबरें क्यों याद रहती है...चंद साल पहले देश के गौरव के लिए खेलने वाली एक टेनिस खिलाड़ी का प्रोग्राम किया था..मगर 2 लाख की चैरिटी भी नहीं जुटी थी...मीडिया से समाज नाराज, ,   ,..नेता नाराज..,  अफसर नाराज....आखिर क्यों...भई प्रशासन की नाकामी ही तो दिखा रहा है मीडिया, ..कोई गुनाह तो नहीं करता...पुराने जमाने में विचलित करने वाली तस्वीर नहीं छापी जाती थी..एक नियम था....पर क्या आज भ्रम में जीते समाज को झकझोरने की कोशिश भी न की जाए..आखिर कब तक छुपाएं कि भारत की 70 फीसदी जनता को दो वक्त की रोटी नहीं मिलती..37 फीसदी लोग एक वक्त की रोटी के लिए भी तरसते हैं .देश की राजधानी दिल्ली में ही कई लोग महज 70 रुपये पर काम करते हैं....ज्यादा लोग इस पर विशवास नहीं करते...सो कॉल्ड लोग विचलित होते हैं..पर कुछ करते भी तो नहीं हैं.. सिर्फ ओह गॉड या च च च च करने से कुछ नहीं होने वाला....एक निर्दलीय एक साल के लिए मुख्यमंत्री बनते ही इतना कमा लेता है जिसमें कम से कम कई हजार लोग नया काम शुरु कर सकते थे..यानी एक लाख रुपये में कोई बेरोजगार छोटी सी दुकान डाल अपना जीबन चला सकता है..जाहिर है  उसके लिए एक लाख रुपये काफी बड़ी रकम होत है....ज्यादातर लोग कुछ करने के लिए आगे ही नहीं आते...पहले आगे आओ..फिर कुछ पर भरोसा करके अपनी मेहनत की कमाई का कुछ हिस्सा देश के लिए लगाओ...नहीं तो खुद ही करो...या फिर जो कर रहें हैं उनकी तो मदद करो...कितने डॉक्टर हैं जो समाज सेवा करते हैं....ठीक है कि उन्होनें ठेका नही लिया हुआ ..पर जो करते हैं उनकी कौन मदद करता है...कितने सरकारी अस्पताल हैं, .जिसके डॉक्टर मरीजों से ढ़ंग से बात तक नहीं करते....मिनट में ही जांच के लिए किसी प्राइवेट पैथ लैब का पता पकड़ा देते हैं...कितने प्राइवेट अस्पताल हैं जिन्होने जमीन को़ड़ियों के भाव ली...अब कमा लिया तो बाजार भाव से दाम देने के लिए तैयार है सरकार को..पर गरीबों का इलाज करने के लिए तैयार नहीं है....सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक को मानने के लिए आसानी से तैयार नहीं...गरीब तो सरकारी में अस्पताल में जाते हुए भी घबराता है,.फिर अपोलो जैसे महंगे अस्पताल की तरफ देखने की उसकी औकात है क्या...खुद सोचिए...किसी सरकारी अस्पताल का डॉक्टर कुछ करता है, .तो उसी अस्पताल में कई ऐसे काम करने वाले लोग हैं जो गरीबों की दवाईयां बेच डालते हैं..सफाई करने वाले एहसान करते हुए सफाई करते हैं...यह हाल हर सरकारी विभाग में है..ठीक इसी तरह के हालात नक्सल प्रभावित इलाकों के हैं..प्रशासन औऱ नेता इन इलाकों में विकास का कोई काम नहीं करते थे..पैसा कहीं का होता औऱ पहुंच कहीं और जाता...ये सच्चाई दिखाते कई पत्रकार प्रशासन और सत्ता के कोपभाजन बने हैं.....इन  इलाकों में  पहले प्रशासन कुछ नहीं करता था..अब माओवादी वहां बने स्कूल औऱ प्राथमिक स्वास्थ्य क्रेंद्रों को बमों से उ़ड़ा रहें हैं...,उनके समर्थक सरकार की नीतियों को दोषी ठहरा रहे हैं. क्या कोई बताएगा की ये कहां का इंसाफ है कि सरकार की कमियों के बदले आप खून बहाएं। सीआरपीएफ में ज्यादातर निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं। उनकी हत्या करके आखिर क्या पाएंगे माओवादी..देश के लिए कुछ करने का जज्बा रखने वाले लोगों की सिर्फ नफरत....क्रांति के नाम पर निर्दोष सिपाहियों का खून बहाना कहां का इंसाफ है..ऐसा नहीं है अर्ध सैनिक बल अत्याचार नहीं करते..पर उन पर पकड़ किसकी है..आपके द्वारा चुने नेता की..जो प्रशासन को अपने फायदे के हिसाब से चलाता है..या फिर प्रशासन का अफसर ही उसे नचा देता है..खुद एक बड़ी कमेटी के सदस्य रहे एक नेता ने किसी काम को कराने के दौरान कहा था कि सरकारी अफसर बिना पैसे के काम नहीं होने देते,..उसमें में कई तरह के रोड़े अटका देते हैं..ऐसे मे सच से दूर भागते लोगों को हकीकत से रुबरु कराना क्या उचित नहीं है..वैसे भी लगता है कि माओवादियों की कमान अब लुटेरों और खूनियों के हाथ लग गई है...आखिर सरकार दबाव में ही सही कुछ इलाकों में विकास के काम कर रही है। पर उसे भी मटियामेट करने में लगे हैं नक्सली...आधुनिक समाजवाद के पिता माकर्स की दी गई बंदूक की नली से अब क्रांति नहीं होती़, .,...अब सिर्फ मौत बरसती है। ....गरीबों का रखवाला कहने वाले नक्सली क्यों नहीं आते लोकतंत्र के समर्थकों के पक्ष में..ऐसे ही अनेक विरोधाभाष के बीच मीडिया अगर विचलित करने वाली तस्वीरें नही दिखाये तो क्या करे..आखिर कब तक कड़वी हकीकत से दूर भागते रहेंगे हम..कड़वी हकीकत को पचाने की क्षमता डाल लेनी चाहिए लोगो को अब....कब तक कड़वा सच मीठी चाश्नी में परोसा जाता रहेगा.......(क्रमश:)
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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

To LoVe 2015: सरेराह चलते-चलते ... रोहित.....

कभी किसी के लिए किसी नाज़ुक लम्हों में आपके दिल में सॉफ्ट कार्नर पैदा हो जाता है...लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाती....फिर भी उसकी कसक सालों बाद भी बनी रहती है....क्यों मालूम नहीं...इसका अहसास दो दिन पहले हुआ मेट्रो में....उसे लिखने की कोशिश की...फिर चंद पंक्तियों की तुकबंदी की....सफल हुआ या नहीं ये आप तय करें...पर समझ जरुर रहें होगें...मैं कुछ कह नहीं पा रहा हूं......


आज अचानक कोई मिल गया....
लगा रुका लम्हा ठहर गया.....
हम कुछ कहते कहते अटक गए....
वो मुस्कुराते ही रह गए....
हमें लगा कहीं कुछ चटक गया.....
उनकी हंसी की खनक भी
कहीं गूंज के रह गई...

उनकी आंखो की चमक में
बरसों बाद हम फिर खो गए
इसी बदहवासी के आलम में....
जाने क्यों किसी अनजान से
हम बेकार ही उलझ गए....
वो भी हैरां परेशां से हो गए....

कैसे कहें कि वो मिलेंगे....
हमने ख्वाब में ही  सोचा था....
हमें लगा हम वहीं थे ठहरे हुए..
और वो कारवां के साथ बढ़ गए थे....

बेहोशी का आलम आज अचानक टूटा
तब समझे की जिंदगी के प्लेटफार्म पर....
हम अकेले ही थे ठहरे हूए....
और सब आशियां बना
महफिल सजा चुके थे....

वो थे हम थे औऱ
बीच में सिर्फ मौन था....
और थी बरसों की दूरियां....
कुछ न कह पाने की मजबूरी
जाने क्या था खाली..
क्यों था  बैचेनी का आलम ...
जिसे समझा था भटकन
पता चला आझ कि मैं तो थमा था
लम्हा तो कब का गुजर चुक था
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बुधवार, 14 अप्रैल 2010

To LoVe 2015: लीव इन रिलेशन शिप पर क़ानूनी कवच

लीव इन रिलेशन शिप पर क़ानूनी कवच

बालिग स्त्री पुरुष के बगैर विवाह किये साथ रहने में कोई बुराई है या नहीं इस बहस से पहले ये जानने की जरुरत है की कानून आज भी समय की मांग को देखते हुए बनांये जा रहें हैं, आज मेट्रो शहरों में एक वर्ग ऐसा पैदा हो गया है जो इसकी अपने जीवन में जरुरत भी महसूस करता है और उसे आजमाना भी, ये एक नया शगल है जो कालांतर में रिवाज और परंपरा भी बन जायेगा, जैसे जैसे शहरीकरण बढेगा और कथित सभ्यता का विकास होगा वैसे वैसे इस प्रकार के फैसले होते रहेंगे और शहरी समाज अपनी सुविधा अनुकूल व्यवस्थाओं का ढांचा खड़ा कर देगा, इसी क्रम में ही समलेंगिकता को कोर्ट ने बुरा नहीं माना, शायद इसकी भी आज के समाज में इस प्रकार के वर्ग को इसकी क़ानूनी जरुरत हुई है. असल में ये सब कुछ पहले भी था पर गैर सामाजिक और गैर प्राकतिक संबंधो को तब ठीक नहीं माना जाता था, आज बस इसे क़ानूनी जामा पहनाने की बात की जा रही है ताकि इसे खुला किया जा सके. निश्चित रूप से इस प्रकार के लोंगो की समाज में न केवल तादात बढ़ रही है बल्कि वे अपने तर्कों से इसे ठीक ठहरा रहें हैं, बगैर विवाह किये महिला पुरुष साथ रह सकते हैं, ये उनका निजी मामला है, पर इसे ना तो मुद्दा बनाने की जरुरे है और न ही कानून क्योंकि ये एक सामाजिक मसला है,और समाज को बदलने में समय लगेगा, असल में हमारा देश दो भागों में बंटा हुआ है, इंडिया में रहने वाले इसकी वकालत करते हैं तो भारत में रहने वाले आलोचना, भारत में रहने वाले अपनी परम्पराओं और रिवाजो का रोना रोते हैं तो विदेशो से या अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े अभिजात्य वर्ग के वो लोग जो इंडिया में रहते हैं, इसका समर्थन करते हैं, इंडिया पूरा बाजारवादी हो गया है जहाँ इस प्रकार के संबंधो से भी मुनाफा कमाया जा सकता है, बुराई के प्रति सहज आकर्षण को आधुनिकता कहते हैं, और आधुनिकता इंडिया के चम् चम् करते बाज़ारों में है भारत के गाँवो में नहीं, विपरीत लिंग के प्रति सहज आकर्षण को क़ानूनी कलेवर दिया जा रहा है ताकि वो बेरोकटोक बाज़ार में आ सके, पूंजीवादी नवध्नाध्य उच्य मध्यवर्ग ने अपने कॉरपरेट जगत में नए उत्पाद को क़ानूनी मुहर के साथ जारी किया है, आख़िरकार नए व्यापार आये हैं, फ्लेट संस्कृति फल फुल रही है इसके ग्राहक भी अब खूब होंगे,
भूल जाए वो दिन जब सुहागरात के दिन ही पत्नी की सूरत नज़र आती थी,/a>
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शनिवार, 10 अप्रैल 2010

To LoVe 2015: Hindi Blog की दुनिया में पलायन...ब्लॉगर होने के गुण....रोहित..


डरो मत....डटे रहो.....
ब्लॉग में आजकल कई लोग ब्लॉग लिखना छोड़ने की बात करते हैं.  फिर उसके बाद शुरु होता मान मन्नौवल का दौर....कि भैया जी मान जाओ...न जाओ सईयां छुड़ा कर बइयां, हम रो पडे़गे..टाइप से...इसलिए मैं इस पर पोस्ट लिखना पंसद नहीं करता, पर एक अच्छे ब्लॉगर का पलायन इस दौर में कुछ खास समस्या की तरफ इशारा करता है..मेरे हिसाब से ब्लॉगिंग से पलायन कोई हल नहीं है....वो भी हिंदी ब्लॉगिंग में... कोई किसी को कहता नहीं ब्लॉग लिखने को...यहां सभी कुछ अपने लिए होता है.यानि स्वांत सुखाय.. हिंदी ब्लॉग अभी केवल अपने मन में कुलबुलाते प्रश्नौं से उपजी असहजता से निजात पाने का जरिया है....अभी हिंदी ब्लॉग ने इतनी तरक्की नहीं की है कि रोजी-रोटी का साधन बने या समाज में परिवर्तन कर सके....पर ब्लॉग समाज में चल रहे विचारों के प्रवाह, अंतद्वंद, असहमति औऱ कुंठाओं का सही आईना प्रस्तुत करने लगा है.... ऐसे में कोई क्या कहता है, क्या करता है, क्यों करता है,  इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए....पर हां किसी की बात पंसद न हो तो उस पर टिप्पणी जरुर करनी चाहिए....मतलब विरोध के स्वर होने चाहिए.....इसलिए ब्लॉगिंग की दुनिया में मस्ती से टिके रहना चाहिए,
ब्लॉग की दुनिया में हारे को हरिनाम वाली स्थिती नहीं होनी चहिए.....
वैसे भी हिंदी की दुनिया में कुल ब्लॉगर हैं ही कितने .... महज चंद हजार, उनमें भी मुश्किल से कुछ सौ होंगे, जो महीने में चंद पोस्ट लिखते होगें.(मैं भी उनमें शामिल हूं, पर लगभग रोजाना टिप्णीयां करता रहता हूं...) और मुश्किल से 100-200 होंगे जो रोज लिखते होंगे....हर ब्लॉग पर कुछ चेहरे होते हैं जो टिप्पणी करते दिखते हैं, उनकी संख्या भी 100 से ज्यादा नहीं होगी, हो तो कोई सही संख्या बताने का कष्ट करे..तो इतने ही ब्लॉगर में मानमनौव्ल करना, दुखी होकर छोड़ने की घोषणा करना, झगड़ा करना, क्या अजीब नहीं लगता..सहमति-असहमति तो चलती रहती है..तो फिर ऐसे मे पलायनवादी होना कहां तक उचित है…..वैसे हम भारतीयों की यही कमी है. असल जीवन में (ब्लॉग पर भी काफी हद तक) हम हर बात को दिल पर लेने लगते हैं, यानि अति भावुकता दिखाने लगते हैं...ज्यादा भावुक होने का दूसरा मतलब चिढ़चिढ़ा होना भी होता है..भावुकता भी अधिकतर लोग कोरी दिखाते हैं....भावुकता के नाम पर ही दुनिया को दिखाते हुए चैरिटी करते हैं....मगर सही मायने में समाजिक जीवन में बिना भावुक हुए कई लोगो की मदद ज्यादा बेहतर तरीके से की जा सकती है..कुछ न कर पाने का रोना रोने से या दुखी होने से बेहतर है आगे आकर कुछ करना...जरा सोचिए चंद मिनट में 100-200 रुपये को धुंए में उड़ा देने वाले 11 रुपये का चंदा देते वक्त भी जैसे एहसान करते नहीं दिखते..उनके सवाल सुनकर लगता है कि कह दें की भई अपने रुपये अपने पास रख...औऱ हिसाब चाहिए तो कुछ समय निकाल कर देखो,  फिर चंदा दो...यही रवैया ब्लॉग की दुनिया में होना चाहिए...मतलब यह कि ब्लॉग की दुनिया में हमें गैंडे की खाल ओढ़कर आना चाहिए....किसी के कह देने से अच्छे ब्लॉगर को अति भावुक नहीं होना चाहिए औऱ न ही ब्लॉग को छोड़ने की घोषणा करना चाहिए....क्या असल जिंदगी में असहमत होते हुए भी हम कई समाजिक बंधन नहीं निभाते...तो फिर ब्लॉग को अलग क्यों मानते असल ज़िंदगी से....वो भी आपके अंदर का अक्स होता है, निजी डायरी की तरह समझिए फिलहाल इसे..आने वाले समय मे भले ही ये बदलने जा रहा हो...किसी को इस बात में शक होना भी नहीं चाहिए की आने वाले समय में ब्लॉग रायशुमारी की दुनिया में काफी अहम योगदान देंगे....आने वाले समय में हर असहमति की, असमान नीतियों से फैल रही असमानता की, हर तरह के विरोध का पहला स्वर, उसकी पहली बानगी ब्लॉग की दुनिया में ही दिखेगी..समाज के ताकतवर मध्यम वर्ग के अंदर उठने वाली हर हलचल की पहली निशानी ब्लॉग पर ही मिलेगी..
अगर समाज के अलग-अलग कई वर्गों से निकलने वाले संकेतों को मैंने सही समझा है. तो आने वाले समय में ब्लॉग ठीक उसी तरह से छाने जा रहा हैं जिस तरह अचानक मोबाइल की आंधी आई और सब पर छा गई...
.कुछ दशक बाद जब ब्लॉग की दुनिया पर रिर्सच की जाएगी तो लिखा जाएगा कि 21वीं सदी के पहले दशक के आखिरी साल का दौर ब्लॉग्स के जमने और व्यवस्थित होने का था..ब्लॉगर आत्मसंतुष्टि के लिए लिखने के साथ-साथ समाज से जुड़े मुद्दों से भी अनजान नहीं थे, समाज से जुड़ने की छटपटाहट थी....और उसे खुद पर ही सोचने को मजबूर पर भी लोगो का ध्यान खीचने की कोशिश करने लगे थे..भले ही कुछ लोग झगड़े टंटे में पड़े रहते थे...तो उस समय हमारे पैरो के निशान तलाशेगा समय.....आप क्यों इस महत्वपूर्ण समय में पलायन-पलायन खेलते हैं...तो है मेरे मित्रों पलायन न करो.....न दैन्यं, न पलायन....टिके रहो, डटे रहो...


है मतवालो चलते रहो..

रुकना तुम्हारा काम नहीं...

....फिल्म नया दौर का गाना याद करो......

मैदान में अगर हम डट जाएं

तो ‘असंभव’ है, पीछे हट जाएं......

(असल शब्द मुशिकल है, पर यहां ये ही उचित है),….आपका क्या ख्याल है
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राजस्थान में वन, पर्यावरण और जैव विविधता के अस्तित्व पर वन विभाग और तस्करों की कुल्हाड़ी


राजस्थान में वन, पर्यावरण और जैव विविधता के अस्तित्व पर वन विभाग और तस्करों की कुल्हाड़ी
राजस्थान के उदयपुर जिले की आदिवासी बाहुल्य कोटडा और झाडोल तहसीलों के जंगलों में वन विभाग की मिलीभगत से इस इलाके में विनाश की कगार पर पहुँच चुके सालर नाम की प्रजाति के पेड़ अब केवल 5 प्रतिशत ही बचे हैं, कभी इन जंगलों की सुन्दरता बढ़ाने वाला ये पेड़ संकट में पड़ गया हैं क्योंकि इस पेड़ के तने से निकलने वाले ओषधिय गुणों वाले गोंद पर इसका गैरकानूनी व्यापर करने वाले व्यापारियों की कुदृष्टि पड़ गई है.और वे वन विभाग की मिली भगत से इसका गोंद निकाल कर गुजरात के बाज़ार में बेच रहे हैं, इस पेड़ से गोंद निकालने का तरीका बड़ा ही विचित्र और निर्मम है, गोंद निकालने के लिए इसके तने में गहरे गहरे चीरे लगाये जाते हैं कुछ दिन बाद उन चिरों से गोंद निकलना शुरू हो जाता है पर पेड़ सुख जाता है क्योंकि इस पेड़ की जान इसके गोंद में ही होती है, और इसी कारण इस पेड़ का इस प्रकार के उपयोग पर सरकारी प्रतिबन्ध लगा दिया था, पर गैरकानूनी तरीके से चलने वाले इस व्यापर के कारण अब इस पेड़ की प्रजाति खतरे में पड़ गई है,
इस तहसील के तिलारनी, क्यारी, मेरपुर, मांडवा, कुकावास आदि गांवों के ग्रामीणों ने वन विभाग को इसकी सुचना भी दी पर या तो वन विभाग ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया या फिर वो भी इस गैर क़ानूनी काम में हिस्सेदार था, आख़िरकार लोग क्यारी पंचायत के सरपंच लाडूराम परिहार के पास गए (लाडूराम परिहार जंगल जमीन जन आन्दोलन और इज्जत से जीने के अधिकार अभियान(C S D ) से जुड़े हुए हैं) लाडूराम ने वन संरक्षक उदयपुर को दिनाक 8 अप्रैल को फ़ोन पर इसकी जानकारी दी तब उस समय वन संरक्षक महोदय किसी मीटिंग में व्यस्त थे और उनके निजी सचिव ने लाडूराम को बाद में बात करने को कहा पर देर रात तक भी फोन पर बात करने का प्रयास करने पर भी जेव विविधता और पर्यावरण का रोना रोने वाले तथा जंगल बर्बाद करने का ठीकरा आदिवासियों पर फोड़ने वाले विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी ने आदिवासियों की इस बात पर कार्यवाही करना उचित नहीं माना और इन वन संरक्षक महोदय ने इस मसले पर से पल्ला झाड़ने की कोशिस की, बाद में मिडिया में इस बात की खबर आने पर सुना है की पूरा विभागीय अमला मुह अँधेरे ही उदयपुर से 125 किलोमीटर दूर इन जंगलों में अपनी कारगुजारी छिपाने के लिए पहुँच चूका था,
इस इलाके के लोंगो ने वन अधिकार मान्यता कानून के तहत सामुदायिक वन अधिकार के दावे भी पेश कर रखे है पर वन विभाग उनको रोकने में लगा हुआ है लोंगो का कहना है की वन विभाग के कर्मचारी अगर ईमानदारी से काम करे तो भी जंगल नहीं बचा सकते क्योंकि मीलों में फैले हुए जंगल को तो वहां रहने वाले लोग ही बचा सकते हैं, पर वन विभाग लोंगो की इस बात से न तो इतफाक रखता है और न ही उनको वन बचाने में उनसे सहायता लेने में, हाँ वन विभाग यदा कदा लोंगो को अतिक्रमी बता कर बेदखल करने से नहीं चुकता है, तथा उनकी वन उपज को अवैध बता कर उन पर मुकदमा दर्ज करने से बाज़ नहीं आता, इस प्रकार के कई मामले सामे आ चुके है,
उल्लेखनीय है की दक्षिणी राजस्थान के जंगलों में कई प्रजातियों के पेड़ों का अस्तित्व खतरे में है, जिसमे सेमल नाम का पेड़ है इसके तने की होली बना कर जलाई जाती है इस कारण होली के अवसर पर इस पेड़ की भारी मात्रा में कटाई की जाती है इस कारण ये प्रजाति धार्मिक अन्धविश्वास और कर्मकांड की भेंट चढ़ रही है,
में कुछ पेड़ों और झाड़ियों के नाम उल्लेखित कर रहा हूँ जो इस प्रकार के गैरकानूनी व्यापर की भेंट चढ़ रही है जिस कारण राजस्थान के वनों से कुछ समय बाद इनको हम ढूढ़ते रह जायेंगे,
- पलाश (खाखरा ) इस पेड़ के तने में भी गोंद निकालने के लिए चीरा लगाया जाता है.तथा इसकी जड़ें पुताई करने के काम आती है साथ ही अन्य ओषधिय गुण भी होते है,
- धावडा इस पेड़ के तने में भी गोंद निकालने के लिए चीरा लगाया जाता है, दक्षिणी राजस्थान के जंगलों में कभी बहुताय में पाया जाने वाला पेड़ अब लगभग ख़तम होने के कगार पर है.
- कराया इस पेड़ का ताना फल सब कुछ काम आता है,
- गेंग्ची ये एक झाड़ी होती है जिसकी जड़ें जोड़ों के दर्द के लिए रामबाण दावा का काम करती है इसलिए इसे भी ढूंढ़ ढूंढ़ ख़त्म किया जा रहा है,
- धावडा इस इस पेड़ के तने में भी गोंद निकालने के लिए चीरा लगाया जाता है, दक्षिणी राजस्थान के जंगलों में पहाड़ों की सुन्दरता बढ़ाने वाला बहू उपयोगी तथा कभी बहुताय में पाया जाने वाला ये पेड़ अब लगभग ख़तम होने के कगार पर है. इसके गोंद का उपयोग महिलाओं को प्रसव के बाद आई कमजोरी को दूर करने के लिए किया जाता है,
- गोदल इस पेड़ के तने में भी गोंद निकालने के लिए चीरा लगाया जाता है, दक्षिणी राजस्थान के जंगलों में पहाड़ों की सुन्दरता बढ़ाने वाला बहू उपयोगी तथा कभी बहुताय में पाया जाने वाला ये पेड़ अब लगभग ख़तम होने के कगार पर है.
- कुर्वा इसकी जड़ें और छाल काम में आती है.
- सियां ये नदियों और नालों के किनारे पाई जाने वाली झाडी है इसकी जड़ें काम में आती है,
- सतावरी ये काफी जानी मानी झाड़ी है इसकी जड़ें आधा सर दुखने पर काम में ली जाती है इसके और भी कई गुण हैं,
- चन बैर इससे हम सभी परिचित होंगे इसके छोटे लाल बैर खाने के काम आते हैं पर इसकी जड़ों का गुण इस झाडी को भी ख़तम किये दे रहा है क्योंकि इसकी जड़ें दांतों के दर्द की दवा के रूप में काम आती है.
इन सभी पेड़ों के इस प्रकार के उपयोग पर क़ानूनी रोक है खास कर व्यापारिक रूप से किये जाने वाले उपयोग पर.
ये जानकारी लाडूराम ने अपने पारंपरिक ज्ञान के आधार पर दी जिसे में यहाँ लिख रहा हूँ.
ये पेड़ और झाड़ियाँ कभी इन जंगलों की शान हुआ करते थे तथा राजस्थान की जलवायु के अनुसार ये प्राकतिक रूप से जंगलों में मिल जाते थे तथा गर्मी के दिनों में ये मई महीने के बाद नए पत्ते आने पर मवेशियों के लिए खुराक राहगीरों और ग्रामीणों के लिए छाया का काम और शहरों में रहने वालों को ताज़ा हवा पहुचाने का काम करते थे, साथ ही जेव विविधता को बनाये रखते थे,
इन पेड़ों का ओषधिय उपयोग करना बुरा नहीं है पर वन विभाग ये बताये की इसका गैरकानूनी व्यापार करना और इतने बड़े पैमाने पर करना की इनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये, तथा लापरवाही की हद ये की इनके नए पोधरोपन ही नहीं करना, सही बात तो ये है की बड़े बड़े आई , एफ , एस अफ़सर केवल गार्डन में विदेशी पोधे और मोनोकल्चर करना जानते हैं और स्थानीय लोंगो को मुर्ख समझते हैं, परिणाम ये हो रहा है की जंगलों में रहने वाले लोग जंगलों से दूर हो रहे हैं और जंगलों में अफसरों और तस्करों के डेरे जम गए हैं,
राजस्थान सरकार ने पिछले बरसात के मोसम हरित राजस्थान अभियान के तहत में डूंगरपुर जिले में एक ही दिन में लगभग 7 लाख पोधे लगा कर गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम लिखवा दिया, इससे पहले ये रिकॉर्ड पाकिस्तान के नाम था, पर कुछ ही दिनों के बाद समाचार पत्रों में छपा की पोधे सूखने का भी वर्ल्ड रिकॉर्ड हमारे ही नाम हुआ.
कुछ महीने पहले जापान से एक प्रतिनिधि मंडल उदयपुर तीन दिवसीय पर्यावरण विषय पर आयोजित कार्यशाला में भाग लेने के लिए आया (जापान हमे पेड़ लगाने के लिए अरावली परियोजना के तहत पैसा देता है और सुना है की भारत के जंगलों से ताज़ी हवाएं प्रशांत महासागर के रास्ते जापान जाती है जिससे वे लोग सेहतमंद रहते हैं) इस प्रतिनिधि मंडल को उदयपुर की एक पांच सितारा होटल में न केवल रुकवाया गया और कार्यशाला भी वहीँ की बल्कि राज्य से आये अन्य अफसरों ने भी इसका लाभ उठाया, इस फिजूलखर्ची की खुद मुख्यमंत्री ने उस कार्यशाला में ही आलोचना की थी.
कुल मिला कर वन विभाग के इस जंगल राज़ में जंगल को ही नुक्सान हो रहा है./a>
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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

To LoVe 2015: द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-9]- त्रयम्बकेश्वर


त्रयम्बकेश्वर-:

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक'त्रयम्बकेश्वर 'महाराष्ट्र के नासिक में है.
नाशिक शहर से ४० कि.मी दूर एक छोटे से कस्बे त्रयम्बकेश्वर में ,गोदावरी नदी के किनारे भगवान शंकर का यह ज्योतिर्लिंग है.भक्ति और आस्था के इस पावन स्थल में [धार्मिक मान्यता के अनुसार] काल सर्प योग के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए लोग दूर दूर से यहाँ आते हैं.

गोदावरी नदी का उद्गम स्थल
ब्रह्म गिरि