बुधवार, 31 मार्च 2010

To LoVe 2015: नेताओं की जनता को भेंट...रोज एक अप्रैल

आज से देश के सभी बच्चों को पढ़ने का अधिकार मिल गया है....निजी स्कूल में 25 फीसदी बच्चे गरीबों के होंगें....एक औऱ अच्छा कदम, (या स्वप्न), (एक नया सीन आंखों में जिसपर फिर कभी)

देश का नया वित्त वर्ष आज से चालू ....(लोगो का दैनिक बजट बिगड़ा हो तो क्या)

पेट्रोल के दाम सिर्फ पचास पैसे बढ़े हैं....

डीज़ल के दाम भी पचास पैसे बढ़े....डीज़ल के साथ ‘सिर्फ’ लिखने का साहस नहीं....क्या पूछा क्यों ?.(कुछ दिन में इसकी मार से पता चल जाएगा)

आम जनता की कार मारुति-800 की 13 शहरों से आज विदाई हो गई..ये तो होना ही था...आखिर आम जनता है कहां शहर में....अगर है तो कब तक टिकेगी....(मतलब कब तक जिएगी)

सिलेंडर के दाम 25-30 रुपये ज्यादा देने होंगे...मामूली बात है....(बुक करने पर न मिले तो ब्लैक में 150 फालतू देना ही पड़ता है)

औऱ हां ......

आज एक अप्रैल भी है, अंर्तरार्ष्ट्रीय मुर्ख दिवस....पर हमारे लिए तो रोज ही एक अप्रैल है....नेताओं की तरफ से तो ये हमारे लिए तोफहा है..हंसते रहो.....मूर्ख बनते रहो..
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

शनिवार, 20 मार्च 2010

To LoVe 2015: कौन हैं हम ?


आखिर कब तक ????
मैं दरअसल सिर्फ चंद पंकि्तयां लिखने आया था, ,.....पर कैप्टन सौरभ कालिया पर लिखी खुशदीप जी की पोस्ट ने कई बातें याद करा दी हैं....कंधार कांड की बरसी पर दिसंबर में पोस्ट लिखनी शुरु की थी....पर उसे अब तक पूरा नहीं कर पाया औऱ न ही जितना लिखा था वो पब्लिश कर पाया......क्योंकी दर्द बयान करने के लिए दर्द से दुबारा गुजरना पड़ता है....हमें कई घटनाएं काफी प्रभावित करती हैं....पर बेबसी दामन थाम लेती है...आखिर हम कब सुधरेंगे....कई बार लगता है कई बातों पर लिखना पड़ेगा एक साथ अनवरत....जो आसान नहीं होता....न ही आसान होगा लिखना....कैप्टन सौरभ कालिया समेत जाने कितने देशभक्त हैं...जो देशवासियों के जागने का इंतजार कर रहीं हैं...जाने कई घटनाएं हैं....जिन पर खून खौलता है....पर सवाल वह..क्या किया जाए...पर कुछ तो करना ही पड़ेगा,...हम नहीं तो कौन करेगा......वैसे एक नया विचार है जिस पर काम किया जा सकता है....मैं अगले कुछ दिन में पोस्ट करुंगा...क्योंकी इस वक्त मन क्षोभ से भरा हुआ है ऐसे में पोस्ट में जो लिखना चाहता हुं उसमें कई बातों का समावेश हो जाएगा,...वैसे कई बातें एकदुसरे से जुड़ी होती हैं जिन्हें अलग करना काफी मुश्किल होता है...पर करना तो हमें ही पड़ेगा,...कोई बाहर से तो आएगा नहीं....खैर चलते-चलते चंद पंकि्तयां दे दुं...जो साल के शुरु में किसी दिन ऑफिस के रास्ते मे अनायास मन में गुंजी थी...पूरी याद नहीं,...सिर्फ चंद पंकि्तयां बाद में कागज पर उतर पाईं थी....वैसे लग रहा है शायद इसी पोस्ट के बाद आनी थी...

न बांधों मुझे किसी हद में
चलती हुई पवन हुं मैं
न रोको मुझे बांधों  में
बहता हुआ नीर हूं मैं
प्रवाह ही मेरा स्पंदन है
गति मैं ही मेरा जीवन है
मुझे अब बह लेने दो
शहर पर शहर बसाने दो
न रोको मुझे..न बांधों
निरंतर, निर्मल मुझे बहने दो
फिर जाकर सागर में मिल जाने दो
/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

शनिवार, 6 मार्च 2010

To LoVe 2015: दाढ़ी पुराण....आई एम वैरी सॉरी सर.....


आज कई दिन बाद एक जूनियर मिली....मिलते ही वो मुस्कुराई, अदा से लहराई....उसके गुलाब की पंखुड़ी से होंठ खुले....हमें अनार दाने सी दंतपंक्ति नजर आईं....उसने खनकती आवाज में इंगिलश में सवाल दागा.... How are you, sir? ....उसकी मोहक अवाज को सुन.....हम दोस्तों के बीच इतराते...उनकी अदा पर वारे जाते....अपनी भी रिन की सफेदी को मात देती सफेद झिलमिलाती बत्तीसी दिखाते...चेहरे पर हजार वाट की चमक बिखरते....उससे पहले ही उसके मिसाइल रुपी दुसरे सवाल ने दोस्तों के सामने हमारी वॉट लगा दी....। 
``सर अब बकरेनुमा ये फ्रेच कट हटा लीजिए काफी दिन हो गए ”....वो हमारी दाढ़ी की तरफ देखते हुए बोली...
पहले तो हमारी समझ में नहीं आया कि क्या बोलें....फिर हम भी संभले....जवाबी हमले की मुद्रा में आये...
``सालों बाद मिली हो..मिलते ही हमारी दाढ़ी नोचने की फिराक में क्यों हो? ’’
हमारे सवाल रुपी गोले को बेकार करती पहले वो मुस्कुराई...फिर ईठलाईलगा जैसे कोई बड़ा राज खोल रही हो.....
``सर मैं तो पहले ही कहना चाहती थी पर जूनियर थी न कैसे बोलती..(अब शायद सीनियर हो गई थी, उसकी शादी हो गई है)’’....ये दाढ़ी हमें बकरे जैसी लगती है’’...हमारी दाढ़ी की तरफ इशारा करते हुए बोली...।
अपनी दाढ़ी की ये खासियत हम अक्सर सुनते रहते थे... इसलिए हमें बुरा नहीं लगता था.....पर इस बार हम कलश गए.....असल में हुआ ये कि हमारे पीठ पीछे से कई ठहाके गूंजे....हमारे दोस्तों को मौका मिल गया था....इसलिए लगे हाथ वो भी हमारी प्यारी दाढ़ी नोचने लगे...
``भई हम तो जाने कब से कह रहें हैं, पर हमारी तो मानता ही नहीं’’ दोस्तों ने उन मोहतरमा से कहा...
ये सुनकर हमारे तन-बदन में आग लग गई..हमने भी पलटकर मोहतरमा को कह डाला
यार अब, दाढ़ी बना कर कितने स्मार्ट हो जाएंगे....अभी लंगुर लगते हैं, बिना दाढ़ी के बंदर लगने लगेंगे...औऱ फिर ऑफिस मे जब आईं थीं...तब ही कहती तो शायद तुम्हारे चांद जैसे मुखडे़ की बात नहीं टालते....और क्या पता तुम्हें ही प्रपोज कर डालते’’....
``तो सर अब मान लीजिए’’....उसने भी हथियार नहीं डाले..डालती भी क्यों, दोस्त रुपी दुश्मनों का साथ जो मिल गया था।  
अब हम उसे कैसे समझाते की ताजी-ताजी जवानी में सीरियस दिखने का शौक था..कईयों को इंम्प्रेस करने का ईरादा था..पर क्या करें हमें किसी ने घास नहीं डाली...या किसी को हमारी घास रास नहीं आई....तो किसी ने हमें भी घास डाली थी, ये समझने में ही काफी देर हो गई....
   अब, सालों बाद इस दाढ़ी का फायदा क्या है ये उन मोहतरमा को कौन समझाता... इस फ्रेंच कट दाढ़ी को रखने से हमें रोज-रोज दाढ़ी बनाने के झंझट से मुक्ति मिल गई थी...वैसे भी अपनी तो फ्रेंच स्टाईल वाली दाढ़ी जितने हिस्से में आती है उतने में ही तेजी से रोज-रोज उगती है...इसलिए हमारा तो एक हफ्ते में महज चार दिन दाढ़ी बनाने से काम चल जाता है....(अब ये अलग बात है कि ज्यादातर अपन चार हफ्ते में ही दाढ़ी बनाते हैं..हीहीहीहीही)....


वैसे उस चांद के टुकडे़ की दाढ़ी से चिढ़ ने जेहन में दबी छुपी बचपन की कुछ यादें भी झा़ड़पोंछ कर सामने ला दी....उन यादों को, जिसमें अफसोस था...आत्मग्लानी थी। ये दाढ़ी उसी घटना की वजह से रखी.....मालूम नहीं....

हमारे स्कूल में एक टीचर थे...जो फ्रेंच कट रखते थे....वो 9वीं कक्षा में साइंस पढ़ाते थे..और 11वीं-12वीं के आटर्स के छात्रों को इंग्लिश...हमारे स्कूल में 8वीं में पढ़कर सबसे ज्यादा नंबर लाने वालों को 9वीं क्लास में सेक्शन `डीऔऱ उनसे कम नंबर लाने वालों को `सीसेक्शन मिलता था...बाकी बच्चे आवारा कहलाते और `और `बीसेक्शन में पहुंचते...यानि 10वीं के बाद 11वीं में साइंस और कॉमर्स के छात्र डी और सी क्लास में पढ़ते....तो `औऱ `बीसेक्शन के होनहार छात्र आटर्स पढ़ते थे।
  मैं भी जाने कैसे 9वीं में `सीसेक्शन में आ गए थे. जबकी छठी से अब तक मैं `बीसेक्शन का ही छात्र थे....शायद पेपर चेक करने वाले टीचर ने गलती कर दी थी....औऱ हमें थोड़े से ज्यादा नंबर मिल गए। जबकि अपुन अपने को थॉमस अल्फा एडिसन वाली पंरपरा का छात्र मानता था...था क्या? आज भी यही मानते हैं।(मगर क्यों?...ये फिर कभी)...
 खैर गलती से थोड़े अच्छे नंबर की मदद से मैं `सीसेक्शन में पहुंच गया.....लेकिन जैसा होशियार और होनहार छात्र मैं था...उशी की रु में अपने इन सांइस के टीचर के किसी सवाल का जवाब कभी नहीं दे पाता था.. और वो बेचारे मुझे प्यार से चपत लगा कर आगे बढ़ जाते थे, जिससे वो अपने को बड़े अच्छे लगते।
 उन सर का पीरियड लंच के बाद होता था....एक दिन लंच के खत्म होने की घंटी बजते ही वो क्लास में आ गए। बच्चे हु़ड़दंग मचा रहे थे.. हम खिड़की की चौखट पर पैर रखकर उपर चढ़े हुए थे...उधर एक महारथी पढ़ने वाले डेस्क के उपर खड़ा था। बस क्लास की ये हालात देखकर सर का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया....उसके बाद डेस्क पर चढ़े बालक वीर की जो धुनाई..हुई पूछिए मत.....अपन मार से तो बच गए... मगर मेरे तिरपन कांप गये....बस तभी मैंने फैसला कर लिया कि, गई बाढ़ में इंटेलिजेंट बच्चों की क्लास..और गर्मी की छुट्टी से पहले ही मैंने सेक्शन चेंज की एपलिकेशन दे दी और गर्मी की छुट्टी पर चला गया। सर को कोसते हुए.....गालियां देते हुए....तब मुझे पता नहीं था कि अनजाने में सर को कोसना मुझे जिंदगी भर के लिए कसक दे जाएगा।
जब गरमी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला...तो अपन भी सेक्शन चेंज कर दूसरे सेक्शन में पहुंचे। वहीं कुछ बच्चों ने खुश होकर बताया....``रोहित सतीश सर को छुट्टियों मे हार्ट अटैक आया है

मैंने सुना तो एकदम से चुप हो गया....लगा जैसे सांप सूंघ गया हो..लगा कि मुझसे कोई गलती हो गई हो....बड़ी गलती।
  फिर कुछ दिन बाद सर आए....उसी निश्छल मुस्कुराहट के साथ..उसके बाद फिर कभी उन्हें किसी को मारते नहीं देखा.. न सुना....बस वही प्यार भरी चपत....जो उस क्लॉस में मुझे लगती थी.....वही चपत सब बच्चों की हो गई....लेकिन मेरा मन कहता सर मारें...खुब मारें..लेकिन..अफसोस।
   सर भी जनकपुरी में रहते थे......पर मैं कभी उनके घर नहीं गया….जबकी वो जरुर बुलाते....इस बात को 20 साल गुजर गए हैं...पर आज भी वो कसक मेरे दिल में है....।
सर आज किसी को भी कोसने से पहले सौ बार सोचता हूं.......सर आई एम वैरी सॉरी....मुझे माफ कर दें....

/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <