शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: उसके शहर में........ Kanpur Yatra (5) इति श्री...

 उसके शहर में.....

Ex Sweetheart के शहर को टाटा कहकर मैं चल पड़ा था....झकरकट्टी बस अड्डे से होते हुए मैं पहुंचा कनर्लगंज या नवाबगंज बस अड्डे....पर वहां पहुंचते-पहुंचते बारिश शुरु हो गई....मानो गर्मी से निजात दिलाने के लिए विदाई की बारिश...Sweetheart के आंसू रिश्ते तोड़ते वक्त भले न निकले थे....पर लगा शायद उनके शहर ने विदाई दी हो....(है न मस्त तुलना)। खैर बारिश से बचने के लिए मैंने भोले बाबा के एक मंदिर में शरण ली। बारिश कम होने पर रिक्शा पकड़कर अड्डे की तरफ चला, तो पाया कि वो चंद कदम की दूरी पर था। वहां पता चला कि एक बस नहीं आई है औऱ दूसरी आधे घंटे बाद है। वक्त बिताने के इऱादे से मैने लंच करने की सोची...पर शायद उनके शहर में खाना नसीब होना नहीं लिखा था....शायद उनकी तरह शहर भी बिना ठोस अहार लिए विदा करना चाहता था...शायद इसलिए खाने की खोज शुरु करने से  पहले ही बस अड्डे के साथ की दुकान पर बैठे समोसे महाराज से मेरे नैन भिड़ गए। (ये नैन भी न जाने किस-किस से, कहां-कहां टकरा जाते हैं...पूछिए मत) बस फिर क्या था अपुन समोसे महाराज को उदर का रास्ता दिखाने में जुट गए.....सोचा लंच-डिनर मिक्स, बरेली में कजन के घर कर लेगे। (पर हम भूल गए कि मुसाफिर को आसानी से घर का खाना नसीब नहीं होता है) समोसे से निपट कर कुछ कदम बढ़ा ही था कि मुझे जोर का एक झटका जोरो से लगा.....पता चला कि सचल यंत्र यानि मोबाइल महाराज लापता हो गए थे...संचल यंत्र के लापता होते ही कुछ पलों के लिए मैं अचल हो गया...
वो चंद पल (स्वतःभाषण)
भोले बाबा के दरबार में भी मोबाइल का पता न चला। लगा मुझे काठ मार गया हो..चंद पलों के लिए..बैचेनी भरे वो कुछ लम्हे....लगा जैसे सब कुछ ठहर गया हो...अवाक सा था मैं..क्योंकि अचानक अनेक लोगों से नाता टूटने का एहसास भर गया अंदर ही अंदर कहीं....उस मोबाइल के साथ लापता हो गए अनेक शख्स....जो कई साल से नंबरों में बदल चुके थे....वो नंबरों में तो थे...पर संपर्क जाने कब से टूटा हुआ था...नंबर रुपी कई रिश्ते उस पेड़ की तरह हो चुके थे..जिसे प्लास्टिक के फूलों से सजाया गया हो....औऱ वो ठीक मयावी दुनिया की तरह अचानक से गायब हो गए हों...
मगर कुछ देर बाद सबकुछ बदलने लगा....हल्की सी बयार बहने लगी...मैं हल्का हो गया...शायद नियती यही चाहती थी कि उन नंबरों से किनारा हो जाए...जिनके मालिकान से दुरी बन चुकी थी। शायद नियती कहना चाहती थी...मुड़-मुड़ के न देख....मुड़-मुड़ के....निष्क्रमण के दौर में दिल में कहीं एक भूला-बिसरा गीत गूंजा....
मेरी भीगी-भीगी सी,
पलकों पे रह गए
जैसे मेरे सपने बिखर के
जले मन तेरा भी,
किसी के मिलन को
अनामिका, तू भी ........
ठहर....''''''चट्टाक'''' तभी दिमाग ने मन पर जोर से चाबूक फटकारा....रुक जा रे बावरे मन...बस...रुक जा....आगे नहीं गाना....
बस फिर क्या था...गीत का '''''तरसे”””””शब्द दफन हो गया..फिर ये शब्द """"तरसे"""न गूंज सका मन की वादियों में.....दिल भी जैसे संभला...दिमाग ने उसे आज अपनी नही करने दी.....सो दिल भी दिमाग के पीछे-पीछे चलने लगा उस दिन...दोनो ने एक साथ कहा...""वो क्यों तरसे?..कोई वायदा तो नहीं था....मगर जब कोई वादा नहीं था....तो फिर क्यूं झगड़े के बाद के छह महीने नमी वाले थे? ..फिर नेह की डोरी भी तो लहुलूहान हुई थी....तभी तो मेरे-तुम्हारे में, मेरा-तुम्हारा हो गया था...यानि कुछ था....पर उसमें तुम्हारा दोष था क्या? नहीं था शायद....य़ा था भी...नेह को लेकर तुमने कुछ कहा भी तो नहीं था...पर फिर भी.????....जानती हो, बचपन में रसखान को पढ़ा था...मन तो तभी से उन्हीं को रचाए-बसाए हुए रहा है....""""यार की जिसमें खुशी हो..उसमें मेरी खुशी""""मगर उन झगड़ों के चंद महीनों रसखान जाने कहां थे? चंद महीने बाद नया साल आया था....तब अचानक तय किया....नए साल में पुराने ग़म से किनारा किया जाए...बस नमी वाले दिन और नहीं....जानती हो आजतक किसी भी नए साल पर मेरा अपने से किया वो पहला और आखिरी वादा था...जिसे मैं निभा सका हूं....उस रात घड़ी की सुइयों के साथ ही असर भी हुआ...रात में मुझे नए साल की बधाई मिली...और मध्यरात्री के साथ ही मैं रजोग़म से बाहर निकल आय़ा था....तुम्हें पूरे नमी भरे छह महीने दिए थे....अब और नहीं..ये सोचा था....शायद जरुरी भी था....तभी नए साल के वादे के असर होने के सबूत के तौर पर रसखान भी चले आए थे....जो प्लास्टिक से सजी मुस्कान वाली इस दुनिया से त्रस्त होकर दुबके हुए थे महीनों तक.....कहीं अंदर कोने में...मगर वो थे...तभी तो अंतस में जहां रसखान हैं....वहीं वो चांदनी रात आज भी जस की तस है...आज भी तुम अंतस में उतनी ही उजली हो....जितनी उस चांदनी रात में क्रीम साड़ी पहने मेरे सामने खड़ी थीं....लग रहा था चांदनी सिमट सी गई हो तुम्हारे आसपास.....मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था....तुमने बाहर आते ही पूछा था..मेरा इंतजार कर रहे थे न....मैंने हल्के से मुस्कुरा कर इनकार किया...पर तुम हंस पड़ी..सब जानती थी...फिर भी पूछती थी.....
   आज सालों बाद तुम्हारे ही शहर में मैं खड़ा था...बस तुम अपने शहर में नहीं थी...शायद नियती ने तुम्हारे ही शहर को चुना था...फोन में नंबर बनकर सिमटे रिश्तों से छुटकारा दिलाने के लिए.....उन नंबरों में बंद उन भावनाओं से भी जिनकी लाशें जाने कब से मैं मोबाइल में लिए घूम रहा था....कंधे पर लदे जाने सभी बेतालों से एक झटके में पीछा छुट गया....जानती हो तुम्हारे शहर में मोबाइल ढूढने का भी मन नहीं किया .अच्छा ही हुआ जो पुराना मोबाइल खो गया....साथ ही खो गए वो सभी घिसे हुए रिश्ते भी।
(स्वतःभाषण से वापसी)

हाय हाय यूपी की सड़कें
    बस अड्डे पर दो घंटे इंतजार के बाद मैने दूसरी जगह जाकर बरेली की बस पकड़ी। मगर यूपी की गढ्ढों में घुसी सड़कों की मेहरबानी से बरेली पहुंचने के वक्त मैं पहुंच पाया कन्नौज के आगे गुरु हर सहाय नगर। वहां पहुंचते-पहुंचते रात के आठ बज रहे थे। अगले दिन ऑफिस ज्वाइन करना था, सो बरेली जाने का विचार त्याग दिया। इस शहर से बरेली औऱ दिल्ली का रुट अलग हो जाता है। बरेली औऱ दिल्ली दोनो ही यहां से 180 किलोमीटर दूर है। बस एक बार कार्यक्रम बदला तो अपन रुक गए इस छोटे से शहर के बस स्टाप पर। ऑफिस से निकलने के पूरे दो दिन बाद पेट पूजा के लिए ठोस आहार लेने की ठानी। एक छोटे से ढाबे पर पेट पूजा करने के बाद यूपी रोडवेज की दिल्ली जाती जो पहली बस दिखी उसी में जा घुसा। सोचा की रात को सोउंगा....औऱ सुबह होते-होते मेट्रो के दरवाजे पर। हुआ तो ऐसा ही पर जरा हटके...यानि जोरो का झटका हाय जोरो से लगा’’ के अंदाज में ही। दरअसल दिल्ली से कन्नौज का रास्ता काफी खराब है। बस की पिछली सीट पर लेटे हुए इतने झटके लगे कि मुन्नी बाई के साथ लगाए सारे झटकों का मजा किरकिरा हो गया।

हाय री मुन्नीबाई-ये तेरा साइड इफेक्टSSSSS
घर पहुंचते ही मुन्नी बाई ने भी अपना रंग दिखा दिया..मतलब कि शादी में मुन्नी बाई को अपनी समझ कर कमर मटकाने औऱ पैर पटकने की सजा मिल गई.। दिल्ली आने के कुछ दिन बाद पैरों की एड़ी में दर्द उठा....साथ ही नसों में भी....डॉक्टर साहिबा ने बताया कि किसी उबड़खाबड़ जमीन पर चलने की वजह से एड़ी के कुछ सेल्स टूट गए हैं। अब हम उन्हें क्या बताते कि ये सब बदनाम मुन्नी बाई के साथ मटकने के बाद का लगा झटका है...न अपन ये भूलते की मुन्नी बाई सिर्फ डार्लिंग के लिए झंडू बाम हुई थी...न ही अपने को चार दिन तक गर्म पट्टी बांधकर बिस्तर पर पड़े रहना  पड़ता....न ही दिवाली भी घर के आसपास ही घूम कर बितानी पड़ती...। तो ये था मुन्नी बाई  के साथ मटकने के बाद लगा झटका और One of the Sweetheart के शहर में हमारे पहले सफ़र की दास्तां...
तो ये होता है इति कानपुर यात्रा पुराण संपन्न...
जोर से बोलो जै गंगा मैया की.....जय श्री राम....
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मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: KANPUR YATRA (4) Munni Badnaam Hui के साइड इफेक्ट औऱ चटोरी जीभ

Muni Badnam Hui......
(वादा टूट गया....कानपूर यात्रा की ये आखरी कड़ी नहीं है...हां, अगली पोस्ट यात्रा पुराण का आखिरी पन्ना होगा...यानि इस साल की आखिरी पोस्ट..तब तक इसे झेलिए और प्याज की कीमतें याद करके आंखो में आंसू भरिए.....)

गतांक से आगे.... 
शादी और एक ही प्रोफेशन के दोस्त  
....रात में मैं डॉक्टर महोदय की शादी में पहुंचा। अक्सर शादियों में एक अजीब सी बात देखने को मिलती है। दुल्हे के दोस्तों में ज्यादातर उसी के प्रोफेशन से जुड़े लोग होते हैं। यहां भी यही हाल था। मेरा मानना है अगर-अलग-अलग क्षेत्र से जुड़े लोग आपके दोस्त हों..तो जीवन की नीरसता टूटती है। साथ ही आपके अंदर सकारात्मक उर्जा बनती रहती है। इस शादी में सिर्फ मैं मीडिया से औऱ दुल्हे मियां के बचपन का एक दोस्त इंजीनियर था। बाकी सभी 14-15 दोस्त डॉक्टर थे।
   ये सभी डॉक्टर आम दोस्तों की तरह ही खिलखिला रहे थे। ये देख मुझे बड़ी खुशी हुई। वरना आमतौर पर डॉक्टरों सीरियस नजर आते हैं। लगता है कि जैसे वो हंसना भूल चुके हैं। वैसे कई डॉक्टर गंभीरता का मुखौटा पहने रहते हैं...जैसे हमारे पेशे में दाढ़ी रखने वाले को बुद्धिजीवी औऱ क्लीन सेव रहने वाले को ढंग से रहने वाला बंदा समझा जाता है। खैर यहां भी मैने बिन मांगे ही कुछ डॉक्टरों को एक राय टिका दी कि यदि आप इसी तरह हंसते रहा करें...तो मरीजों का भी भला लगेगा।

मुन्नी को जमककर किया बदनाम....
बारात के दौरान हम लोग जमकर नाचे। इस दौरान यहां मुन्नी इतनी बार बदनाम हुई कि पूछिए मत। डीजे महाश्य हर दूसरे गाने के बाद मुन्नी बाई को बदनाम करने पर तुले हुए थे। इस गाने पर सभी बरातियों के साथ अपन भी जोर-जोर से टांगे पटक-पटक कर नाच रहे थे। मुन्नी बाई के साथ मिलकर अपन ने कमर को इतना झटका दिया कि मत पूछिए......लेकिन नाचते वक्त मैं पूरी तरह से भूल गया था कि "मुन्नी  बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए" वाला डार्लिंग मैं नहीं था...जो मुन्नी मेरे लिए झंडु बाम बनती। नतीजतन ठुमके के बाद शरीर पर जबरदस्त आफ्टर इफेक्ट झेलना पड़ा। जो झेलना पड़ा, वो कानपूर यात्रा पुराण के आखिरी में बताउंगा।

चटोरी जीभ,और आधा देश आधा पेट
बारात यहां भी दस्तूर के मुताबिक देर रात पहुंची। वहां पहुंच कर सलाद, औऱ टिक्की आदि कि इतनी वैरायटी लगी देखी कि मुंह में पानी आ आया...ये समझ नहीं आ रहा था कि क्या खाउं और क्या न खाउं? आधी रात हो चुकी थी यानि पूरे बारह बज रहे थे। पेट में चूहों की घुड़दौड़ चल रही थी...बावजूद इसके पेट पूजा की जगह मैं चटोरी जीभ के चक्कर में फंस गया। ये हकीकत है कि कभी-कभी चटोरी जीभ बेकाबू हो जाती है और नतीजा पेट को भुगतना पड़ता है। वैसे मेरी जठाराग्नि बड़ी प्रबल है। इसलिए मैं कभी-कभी चटोरी जीभ को बेकाबू होने की छूट दे देता हूं..लेकिन मित्रों आप जरा बचकर रहिएगा... क्योंकि हम तो भगवान के आशिर्वाद से व्रजासन की माया से सुसज्जित रहते हैं। जीभ के चटोरेपन के चक्कर से छुटने के बाद जब मैं पेट पूजा के लिए घूमा तो मेरा सिर चकरा गया। कहीं भी शाकाहारी खाना नजर नहीं आ रहा था। मैं चारों तरफ शाकाहारी खाना ढूंढने लगा...पर वो नज़र आकर ही नहीं दे रहा था....पर शाकाहारी खाने को ढूंढने के चक्कर में मैं घनचक्कर बनता...उससे पहले ही मैंने टिक्की और गुलाब जामुन पर हमला बोल दिया। 
  पर जाने क्यूं कई बार जीभ के चटोरेपन के बाद अक्सर मेरे अंदर एक अजीब सी उदासी छा जाती है दरअसल जितने खर्चे में हमारी जीभ स्वाद का सुख पाती है, उतना खर्च तो हमारे देश में कई परिवारों के पूरे दिन के खाने पर भी नहीं होता.....और कई परिवारो को तो इसका आधा भी नसीब नहीं होता...आखिर मिले भी कैसे, उनके हिस्से का खाना तो हमारी जीभ ही चट कर जाती है..... हमारा आधा देश तो आधे पेट पर जीता है...

आधी रात को तेरी गलियों में....कहीं सच में लूट न जाएं हम
आधी रात हो चुकी थी। फोन बज रहा था सो मुझे भागने की जल्दी थी। दरअसल भाईजान के ठिकाने की चाबी मेरी जेब में थी। अखबार का काम खत्म करके वो बेचारे दफ्तर के बाहर खड़े थे। दुल्ले से विदा लेकर उनके दफ्तर तक का आधा रास्ता मैने रिक्शे औऱ टैंपो से तय किया। बाकी का एक-डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर उनके दफ्तर के बाहर पहुंचा। हालांकि सारे रास्ते मैं सोचता रहा कि कहीं ''''कोई रात का मुसाफिर'''' चक्कू या पिस्तौल दिखा कर रोक न ले..आखिर पठानी सलवार में सजे-धजे जो घूम रहा था मैं। खैर भाईजान और उनके रुममेट के साथ मैं उनके घर के लिए चल पड़ा। रास्ते में दुल्ले मियां के कुछ दोस्तों का फोन आया। वो वहां पर खाने के लिए मुझे ढूंढ रहे थे। उन्हें पता था कि मैं नान वेज नहीं खाता। जबकि मुझे लगा था कि वो शादी में मसरुफ हो गए औऱ मुझे भूल गए। खैर अब पछताए क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत की तर्ज पर  आधा भरा और आधा खाली पेट लिए मैं आराम करने के ठिकाने पर पहुंचा। 
   इस दौरान गुलाब जामुन और टिक्की पेट में जाने कहां खो गए थे। गुलाब जामुन औऱ टिक्की तो भई जीभ के स्वाद के लिए थी, सो पेट में चूहे की घुड़दौड़ फिर शुरु हो गई। इस बार आधी रात को बिरादर की रसोई में पड़ी नमकीन मेरा निशाना बनी....उनसे निपट कर मैं बिस्तर के हवाले हो गया।  

तेरी गलियों से दूर  
One of the Sweetheart के शहर में जगते-सोते सुबह जब उठा तो मैने अपना माथा ठोक लिया। भाईजान के रुममेट के फोन का चार्जर भी वही था, जो मेरे मोबाइल का था....मेरा फोन बिना बिजली रानी के रुठता जा रहा था। रात की गलती सुधारने की कोशिश के तहत मैंने जैसे ही चार्जर अपने फोन में लगाया, बिजली रानी रुठकर गुल हो गईं, ठीक उसी तरह से जैसे one of the sweetheart गूल हो गईं थीं। बिजली रानी का तीन घंटे इंतजार करने के बाद मैने देर करना मुनासिब नहीं समझा और लगभग बंद होने के कगार पर पहुंच चुके फोन के साथ उनकी शहर की गलियों को विदा देते हुए बरेली की तरफ कूच करने की ठान कर निकल पड़ा.....। 

आगे के लिए सस्पेंस .....
(क्या मैं बरेली पहुंच सका?....क्या हुआ प्रेमिका के शहर से विदाई के पहले?....क्या छूट गया उन गलियों में?...कैसे मैं चंद पलों के लिए बियावन जंगल में खो गया.?...कैसे कुछ पल में कंधे पर लदे बेताल लापता हो गए?....इन सभी सवालों को जवाब पाने के लिए झेलना न भूलिए कानपुर यात्रा पुराण का आखरी पन्ना......ठीक दो दिन बाद..यानि शुक्रवार की शाम....2010 की आखरी पोस्ट में)
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शनिवार, 25 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: Kanpur Yatra यात्रा पुराण(3)........... छात्रों की मजबूरी और चांदी कूटते लोग

आप सभी को क्रिसमस की हार्दिक बधाई  
देश में बहुत कुछ हो रहा है। उस पर फिर कभी। हालांकि हर यात्रा अनेक कड़वी हकीकत औऱ जीवन के रंग से रुबरु कराती है। ऐसी ही एक यात्रा के जरिए मैने जीवन के जो रंग देखे उसे आप भी देखें। 

गतांक से आगे
छात्रों की मजबूरी का फायदा उठाने की कमीनी सोच
राम-राम करते आंखे खोलते-बंद करते मैं पहुंचा कानपुर। उसके बाद मुज़फ्फर भाई को फोन लगाया, पर उत्तर नदारद। मुझे लगा शायद सो रहे होंगे। सो उनके बताए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए पहुंच गया विजयनगर चोराहे। पर वहां से भी फोन नहीं उठाया गया तो सख्त हैरानी हुई। लगा कि शायद वो रामपुर चले गए होंगे। कुछ देर बाद दुबारा फोन लगाने  का इरादा करके मैं वहीं कोने पर बने ढाबे पर चाय पीने को बैठ गया। मुझे क्या पता था कि जहां सुबह की चाय की चुस्की लेना बैठूंगा, वहीं कोई कड़वी हकीकत मुझसे रुबरू होना चाहती है, शायद इसलिए भी बिरादर का फोन नहीं लगा हो..
थोड़ी देर बाद फिर फोन लगाया, उत्तर फिर नदारद। लगा की फ्री का ठिकाना किस्मत में नहीं है। हार कर दिल्ली फोन लगाया एक जानकार को।
दुकानदार फोन पर मेरी बातचीत पर कान गड़ाए बैठा था। फोन करके चाय पीने बैठा ही था कि वो बोला...
भाई साहब हमारे यहां कुछ कमरे हैं जो छात्रों को किराए पर देते हैं, इस वक्त खाली हैं। आपको एक रात ही बितानी है, आप चाहें तो रुक सकते हैं...आप.कमरे देख लीजिए।"
बोला ऐसे जैसे एहसान कर रहा हो...शुरु में मुझे भी ऐसा ही लगा...हालांकि सुबह-सुबह बैठे-बिठाए ग्राहक मिलने की खुशी वो छुपा नहीं पा रहा था।
दुकानदार के कहने पर मैने कमरे का जायजा लिया। पर जायजा लेते ही दिमाग घूम गया। वो कमरे थे या कबूतरखाने। 
मुश्किल से आठ बाई छह साइज..एक चौकी बिना गद्दे की...एक टेबल-कुर्सी....और सिर पर लटका पंखा। एक ही लाइन से बने एक जैसे छह कमरे। कमरों के एक कोने में एक बाथरुम।
दुकानदार शायद मेरे चेहरे के भाव पढ़ रहा था। बोला..
 भाई साहब छात्रों को पढ़ना ही तो है। उनके लिए इससे ज्यादा कि क्या जरुरत है।
श्वान निद्रा....बको ध्यानम्...श्लोक स्मरण हो आया...
पवित्र श्लोक के ऐसे कलियुगी साक्षात अनुवाद को देख कर मन किया कि उसे वहीं पकड़ कर धो दूं। पर चुप रहना पड़ा। एक तो शहर अपना नहीं..दूसरा ऐसे उदाहरण तो देश भर में भरे पड़े हैं..किस-किस को समझाएं..किस-किस से लड़ें। पहले ही कम मुसीबत मोल नहीं ले रखी है मैने.।
खैर कानपुर पढ़ने के लिए आने वाले छात्रों की मजबूरी का फायदा उठाने की उसकी घटिया सोच से घिन हो आई। हालांकी वहां इतनी जगह थी कि अगर वो चाहता तो कमरों की चौड़ाई बढ़ सकती थी। दो-तीन एक्ट्रा बाथरुम बन सकते थे। 
पर दूसरे की मजबूरी से फायदा हो रहा हो और बिना कुछ खास किए चांदी कूटने का मौका मिल रहो तो कौन छोड़ता है। ऐसे में किसी को दूसरों के आराम से क्या लेना-देना।
तभी दुकानदार ने पूछा
क्या पास की दुकान से गद्दा मंगा दूं।
"नहीं रहने दो" सोच के दायरे से बाहर आते मैं बोला...
मूड चौपट हो चुका था सो सोचा कि जब एक ही रात ठहरना है तो समझौता क्यॉं करुं।
पर तभी दिमाग में दुकानदार का कलेजा फूंकने का आईडिया उछल-कूद मचाने लगा.....
हमने उस पर अमल किया औऱ उसी से शहर मे ठहरने के ठिकानों के बारे में पूछना शुरू कर दिया। पर हमारे दिमाग में ये नहीं आया कि जहां बारात ठहरेगी, वो भी एक होटल है। वहीं ठिकाना बनाना बेहतर होगा। सच ही है दूसरो को तड़पाने के चक्कर में अपने भले की बात भी खुद के भेजे में नहीं आती। 

फ्री में एक नेक नसीहत 
(सार्वजनिक हित में जारी...ये नेक राय सभी फ्री में ले सकते हैं)
चाय के इंतजार में दुबारा फोन ट्राई किया। इस बार घंटी बजते ही फोन रिसिव होने से मेरी जान में जान लौटी। किस्मत ने एक प्रेमिका के शहर में ठिकाने की खोज में भटकने की लानत से बचा लिया। ये अलग बात है कि उसके बाद भी मैं भटका, पर इत्मिनान से। 
थोड़ी देर में भाईजान आ पहुंचे रिक्शे पर सवार होकर। नमाज वाली ड्रेस पहने ही। हमने बिना देर किए फोन न उठाने का ताना टिका दिया। 
वो मुस्कुरा उठे। बोले....
फोन साइलेंस पर था। उसके बाद नहा धोकर नमाज पढ़ रहा था। पढने के फोन पर नजर गई तो उसे तुरंत रिसिव किया।"
हालांकि उनकी ड्रेस देखकर अपुन समझ ही गए थे।
उसी निश्छल मुस्कुराहट के साथ उन्होंने एक नेक राय दी.....
"कभी भी कहीं भी जाने से पहले जिसके पास जा रहे हों, उन्हें फोन करके एक बार फिर याद दिला देना चाहिए। मान लो किसी जरुरी काम से मेजबान को कहीं जाना पड़े तो..कम से कम कुछ इंतजाम तो हो सकता है न.।"
बात तो मेरी समझ में आ गई थी। पर लाख टके का सवाल ये है कि क्या इस पर अमल कर पाउंगा कभी मैं। आज तक तो अमल हो नहीं सका है।
आदत को देखते हुए कुछ कहना भी मुहाल है। उसपर ये आदत अनुवांशिक हैं, यानि अपने पिताश्री से मुझे विरासत में मिली है। वो काम की वजह से देर करते थे, औऱ मुझे वैसे ही हो जाती है।

खैर उनके यहां टिकने पर ध्यान आय़ा कि हमारे फोन की बैटरी आधी हो चुकी है। मगर उनका फोन देखकर चार्जर मिलने की उम्मीद कम ही थी। सो हमने पूछा ही नहीं। न पूछने का नतीजा बाद में भुगता..उसके बाद तैयार होने के बाद शहर में कितना औऱ कैसे-कैसे विचारों के साथ भटका.....क्या देखा इसका...क्या महसूस किया....वो जिक्र तो अपनी कानपुर की कविता में कर ही चुका हूं..। अब रह गई शादी.तो उसका जिक्र आगे आखिर कड़ी में....  (क्रमशः दो दिन के लिए)
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सोमवार, 20 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: Kanpur यात्रा पुराण (2)....भारतीय रेल-समाज का आइना

प्यारी छुकछुक गाड़ी और उजाले में छुपा सच
अपन हाजिर हैं पहली बार वादे के अनुसार सिर्फ दो दिन में...
(गंताक से आगे)....
हल्का हल्का सुरुर है....
    हम किसी तरह एक जोड़ी अतिरक्त कपड़े बैग में ठूंस कर निकल पड़े ऑफिस। रास्ते में बरेली में रहने वाली कजन को फोन कर दिया कि हम आ रहे हैं कानपुर से वापसी के दौरान उसके पास। रात में अपने सफर की शुरुआत ठीक उसी तरह से हुई जैसे अकसर हुआ करती है। हम कभी देर करते नहीं....बस हो जाती है। तो उस दिन भी ऑफिस में साढ़े नौ बजे शिफ्ट खत्म होने के बाद कुछ काम और फिर पेट-पूजा के चक्कर में देर हो गई। जब निकले तो पता चला कि घड़ी की सूइंया साढ़े दस बजा रही हैं। ट्रेन 11.50 की। बस हमारे होश फाख्ता...उसी समय दिल ने भी उल्टा चलना शुरु कर दिया। दिल ने दिमाग से सरगोशी की "कहीं मेट्रो नहीं मिली तो.....? ऑफिस से करीब पौना किलोमीटर दूर मेट्रो स्टेशन..पैदल पहुंचने में वक्त लगेगा पंद्रह मिनट...औऱ अगर इत्ती देर में मेट्रो निकल गई तो क्या होगा भाया...." बस हमने व्याकुल होकर इधर उधर देखना शुरु कर दिया। मगर आसपास रिक्शे या ऑटो का नामोनिशान नहीं था। तभी दिमाग की बत्ती जली। अपन ऑफिस की पार्किंग से निकलने वाले रास्ते पर डट गए। शायद कोई मोटरसाईकल सवार हमारी सीनियरटी (अब बाकी माने या नहीं..हमें कोई लेना-देना नहीं) को देख कर लिफ्ट दे दे। किस्मत से ऐसा हो गया। एक शख्स मिला..उसने गाड़ी रोकी..हमने पूछा भई हमें रजनीगंधा चौक तक दोगे लिफ्ट। वो बोला सर मैं तो 37 की तरफ जा रहा हूं वहां से आप पकड़ लीजिएगा मेट्रो। हमें लगा एक स्टेशन पहले ही पकड़ा दे कोई बात नहीं,...दो रुपये ज्यादा ही कटेंगे न। तो हम चढ़े बैठे घर्र..घर्र..ब्रूड़म ब्रूड़म करती मोटरसाईकल पर....बस उसके बाद शुरु हो गई उलटबांसी।
   
अपन गाड़ी पकड़ने के चक्कर में भूल गए कि वो समय था...मस्त होने का। वो महाश्य हल्के-हल्के सुरुर में थे..सो वो चल दिए उल्टी दिशा में कुछ ज्यादा ही। जितनी देर में उन महाश्य ने हमें दो स्टेशन पीछे पहुंचाया...उतने में अपन लेफ्ट राइट करते-करते रजनीगंधा चौक मेट्रो स्टेशन वैसे ही पहुंच जाते। सुरुर उसका औऱ घूमे हम। खैर राम-राम करते मेट्रो स्टेशन में घुसे तो सूचनापट्ट देखकर हमारी सांस रुक गई। उसपर लिखा था कि द्वारका जाने वाली गाड़ी आएगी साढ़े ग्यारह बजे। हमें लगा हो गया बंटाधार....मेट्रो कार्ड के पैसे गए अलग....अब निकलना पड़ेगा बाहर, ऑटो लेने। लेकिन तभी सूचनापट्ट की दूसरी लाइन पर नजर पड़ी कि यमुना बैंक तक की मेट्रो आने वाली है। ये देख कर हमने राहत सी सांस ली। हमें अपनी मेट्रो पर प्यार आ गया। वैसे भी आता है। आखिर दिल्ली में कोई तो चीज है जो अंग्रेजों की बनाई हुई नहीं है। हौले-हौले बलखाती चलती मेट्रो से हम पहुंचे यमुना बैंक फिर दस मिनट बाद वहां से आनंदविहार से आने वाली द्वारका की मेट्रो पकड़कर कर सीधे कनाट प्लेस यानि राजीव चौक। शानदार स्टेशन से बाहर निकल कर ऑटो लेने की सोच ही रहे थे कि याद आया कि स्टेशन जाने वाली मेट्रो तो आने वाली होगी...क्योंकी अब मेट्रो सचिवालय से नहीं...गुड़गांव से आती है। तो हम जा पहुंच पताल लोक में बने राजीव चौक स्टेशन के एक तल औऱ नीचे.....वहां से गुड़गांव से आने वाली मेट्रो पकड़ी और अगले स्टेशन यानि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए। वहां किस्मत मेहरबां नजर आई। पता चला की रीवा एक्सप्रेस का प्लेटफार्म नजदीक ही है। 
प्लेटफॉर्म पर हमारा नंगा सच 
हम आ पहुंचे दुनिया के सबसे विशाल रेलवे नेटर्वक में से एक भारतीय रेल के सबसे खास स्टेशन पर। इस स्टेशन पर आधी रात के वक्त अफरातफरी तो नहीं थी, लेकिन भीड़ कम न थी। स्टेशन पर भीड़ कम होती तो हमारे पौरुष को बटा न लग जाता...औऱ फिर आखिर चीन को पछाड़ने की हमारी मुहिम का क्या होता? चीन को 2050 तक एक क्षेत्र में कम से कम धोबी पछाड़ मारने के हमारे दावे का डंका ऐसे ही थोड़ी न दुनिया में बज रहा है। 
   प्लेटफार्म पर हमारा स्वागत करने के लिए मौजूद थी हल्की बदबू। दुनिया की उभरती हुई ताकत का एक सच ये भी था। कॉमनवेल्थ का कोई स्टेडियम इधर बना होता या विदेशी खिलाड़ियों के यहां से आने-जाने का कार्यक्रम होता तो शायद इस प्लेटफॉर्म की किस्मत भी खूल जाती। पर शायद देश के करोड़ो लोगो का प्लेटफॉर्म उनकी सी ही किस्मत रखता है। आखिर दिल्ली राजधानी है...तो देश के बाकी खस्ताहाल प्लेटफॉर्म का कोई तो नुमांइदगी करता प्लेटफॉम तो होना चाहिए न यहां राजधानी में...।   

मुई रेलवे...कुंवारों की दुश्मन
हमारी ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगी हुई थी। हमें जो सीट नसीब हुई थी वो दरवाजे से दूसरे नंबर वाले केबिन की थी, यहां भी बाथरुम की वजह से हल्की बदबू का राज था। यानि रात भर के लिए भारतीय रेल का डेयोडरेंट....हमें सीट मिली थी उपर वाली। हमें लगता है कि अकेले घूमने वाले छड़ों को छांट-छांट कर उपर वाली सीट का ही रिजर्वेशन देता है मुआ रेलवे। खैर समान सीट पर पटककर हम प्लेटफॉर्म पर आ गए। फोन पर बतियाते और किताबों के स्टॉल पर घूमते हुए आधा घंटा बिताया।
अभी ट्रेन सीटी देकर प्लेटफॉर्म से खिसकी ही थी कि शोर मचा, ‘’अरे ले गया... हमारे साथ वाले केबिन में एक महाश्य अपने मोबाइल को अस्थाई टेबल पर रख कर बैठे थे। ट्रेन के खिसकते ही प्लेटफॉर्म की दूसरी तरफ पटरी वाली साइड से एक हाथ आया और मोबाइल गायब। वो महाश्य साथ लगते दरवाजे की तरफ भागे। पर वो दरवाजा बंद था, जबतक अगले डिब्बे के दरवाजे तक पहुंचते चोर छूमंतर। शायद चोर पहले से ही ताड़ कर बैठा था कि दरवाजा बंद है और बंदा चलती ट्रेन से कूदेगा नहीं, चाहेगा भी तो देर लगेगी। तो हमारे सफर की शुरुआत ही हुई चोरी से। ओलंपिक में सोने का पदक मिलने में अभी देर है। अगर स्टेशन पर इस तरह उछलते भागते महाश्यों को मौका मिले तो ये लोग कोई पदक जीतें या न जीतें...शर्तिया उड़ा तो ले आएंगे ही। वैसे भी अरबों-खरबों तो हम चुटकी में उड़ा डालते हैं।
   ट्रेन ने जब रफ्तार पकड़ ली तो हम पहुंचे अपनी उपर वाली सीट पर। पर हल्ली बदबू की वजह से निंदिया रानी ने आने से मना कर दिया। आती भी कैसे आखिर वो हमेशा रुठने वाली प्रेमिका की तरह जो है हमारे लिए। हम अपने को कोसने में लगे थे कि पहले से देख कर रिजर्वेशन क्यों नहीं कराया? किसी अच्छी गाड़ी या बीच वाली सीट ही रिजर्व करता। आखिर चंद घंटे ही तो बिताने थे। 
जय गांधी बाबा...पर हम उल्टे बंदर  
   अचानक हमारे दिमाग में एक बात गूंजी। क्यों बेटे बड़े रईसजादे बनते हो। महात्मा गांधी जिंदगी भर तीसरे दर्जे में यात्रा करते रहे, औऱ तुम बड़े फन्ने खां हो। बस भाईयों मानो या न मानो, सारी हल्की बदबू लापता हो गई, जैसे हनुमान चालिसा पड़ते ही भूत का भय लापता हो जाता है। तो दोस्तो ये मंत्र हमने सोचा है कि आगे भी अजमाएंगे जब कहीं फंस जाएंगे। हालांकि बदबू से पीछ छूट गया। पर ज्यादा देर तक बात बनी नहीं।
हमारा दिल छेड़छाड़ करने में उस्ताद है। उसने फिर से दिमाग का दही बनाना शूरु कर दिया। दिल ने दिमाग को छेड़ा "अमां यार वो तो गुलाम भारत की बात थी। क्या आजाद भारत में भी सुविधा नहीं मिलेगी, सफाई नहीं नसीब होगी...हैं..ये कहां की बात हुई"....बस भाईयों मानो या न मानो....ये बात दिमाग के तंतुओं तक पहुंचने के साथ ही दिमाग का बचा-खुचा चैन भी तेल लेने चला गया।........(फिर से क्रमशः दो दिन के लिए)
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शनिवार, 18 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: बोर्रा गुफाएं--[आन्ध्र प्रदेश]



आन्ध्र प्रदेश ,भारत देश के पूर्वी तट पर स्थित राज्य है. यह क्षेत्र से भारत का सबसे बड़ा चौथा राज्य और जनसंख्या द्वारा पांचवां सबसे बड़ा राज्य है.इस की राजधानी हैदराबाद है.२३ जिलों वाले इस राज्य में बहुत सी ऐसे जगहें हैं जिनका ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है.आज हम आप को इसी प्रदेश की एक ऐसी ही प्राचीन और महत्वपूर्ण जगह पर ले चलेंगे.यह जगह है 'बुर्रा या बोर्रा गुफाएं '.


बुर्रा या बोर्रा गुफाएं-

To LoVe 2015: Kanpur यात्रा पुराण (1)...जीवन के रंग

सफर की तैयारी....
अक्टूबर में कानपुर का कार्यक्रम अचानक बना था। आमतौर पर श्राद्ध के मौके पर मैं यात्रा कम ही करता हूं। मगर एक डॉक्टर मित्र की शादी के निमंत्रण पर कानपुर जाने का कार्यक्रम बना। वैसे हम रोज ही दिल्ली से बाहर जाते हैं...अपने ऑफिस नोएडा। अब नोएडा यूपी में पड़ता है तो दूसरा प्रदेश ही कलाएगा न। खैर इस बार डेढ़ साल के बाद दिल्ली- एनसीआर से बाहर जाने का प्रोग्राम बना था...कानपुर जाने की तारिख आते ही मैंने यात्रा की तैयारी शुरु कर दी। रीवा एक्सप्रेस से रात 11.50 की टिकट बुक कराई औऱ इंतजाम कर लिया सुबह सुबह पहुंचने का। 

सरलता औऱ सफलता साथ रह सकती है 
कानपुर पुहंच कर समान टिकाने औऱ हुलिया सुधारने के लिए ठिकाने की जरुरत थी, सो हमने फोन कर दिया अपने अग्रज समान पत्रकार भाई मुज़फ्फर उल्ला खां को। उन्होंने मना भी नहीं किया। उल्टा आ बैल मुझे मार की तर्ज पर....घर तक पहुंचने का रास्ता भी अच्छे से समझा दिया। मना भी कैसे करते, उनसे हमारा रिश्ता जो खास है। आखिर हम उनके गुरु भाई हैं....इसलिए इतना तो हक बनता ही है कि हम जब मर्जी उनके यहां टिक जाएं। वैसे उनके जैसा शरीफ इंसान मिलना आजकल निहायत ही मुश्किल है। वरिष्ठ पत्रकार मगर, घमंड उन्हें छू भी नहीं गया है। ये गुण आजकल के पत्रकारों में मिल पाना अंसभव की हद तक मुश्किल है। सो हमने उनके यहां पहुंचने और उनकी शराफत का नजायज फायदा उठाने की ठान ली। आखिर अक्सर फोन करके हालचाल लेने के बदले में कोई तो सिला मिलना चाहिए न उनको। अब ये अलग बात है कि IMC के यही एकमात्र छात्र हैं जो पिताजी का हालचाल पूछते रहते हैं। बाकी तो दिल्ली में रहकर भी..खैर।
    सफर की तैयारी और ठहरने का इंतजाम करने के बाद हमने फोन कर दिया मित्र महोदय को। जो कानपुर को ससुराल बनाने की तैयारी में लगे थे।

कानपुर से दिल का एंगेल
   कानपुर में अपना दिली एंगल भी रहा है। अपनी one of the sweetheart (नोट One of the पर ध्यान रखें) कानपुर की रही हैं। बिना कानपुर गए उस शहर से हमारा रिश्ता था, और पहली बार जाते ही किस तरह बदल गया, उसपर तो हमने कविता भी लिख मारी थी दिल से। खैर हमने पहला काम ये किया कि सालों बाद अपनी ड्यूटी शिफ्ट को बदलवाया। पर बिना गड़बड़झाले औऱ हड़बड़ी के यात्रा शुरु हो जाए, ऐसा हमारे साथ कभी नहीं होता। पूरी तैयारी धरी रह जाती है। इसबार भी ऐसा ही हुआ....पर्याप्त समय होने के बाद भी हमने कपड़े तैयार किए नहीं थे और नया लेने के मूड में नहीं थे। इन  हालत में हर बार की तरह मच गई अफरातफरी। हमने घर में उपर-नीचे करना शुरु कर दिया। इसी आपाधापी में अचानक हमारी नजर पड़ी अपने एक पठानी-पंजाबी टाइप कुर्ते और सलवार पर। यही वो एकमात्र बेचारी ड्रेस है जो हर समारोह में हमेशा तैयार मिलती है। बाकी तो हमेशा ड्राइक्लिनर के पास ही मिलती है। उन्हें घर आना तभी नसीब होता है जब हम किसी समारोह से लौटकर आते हैं....आखिर हमें उनकी याद ही आती है देर से। 

देवदासी दाढ़ी
    वैसे भी सजधज कर कहीं जाने में हमें बड़ा अटपटा लगता है। कई बार तो हम जिस ड्रेस में ऑफिस में होते हैं उसी में कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं, वो भी बिना दाढ़ी मुंडे। अब मेजबान अंदर ही अंदर कितनी भी गाली दे, हमें क्या? हालांकि इसकी खबर हमें लग ही जाती है, पर क्या करें फितरत ही बेढ़ंगी है हमारी हीहीहीही। वैसे एक खास बात बताता चलूं कि हम अपनी पहली गर्लफ्रेंड (अब उसे कह नहीं पाए तो क्या) की शादी में भी बिना उस्तरा फेरे पहुंच गए थे....औऱ कुछ खास लोगो को लगा की देवदास बन गए हैं भाई। अब इस बहाने मित्रों पर रौब अलग पड़ गया। अपना क्या गया। तो है न दाढ़ी न मूढंने के फायदे भी। अरे गाड़ी ट्रेक से उतर रही है...। चलिए वापस लौटते हैं कानपुर यात्रा पर।(क्रमशः, 2 दिन के लिए)
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बुधवार, 15 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-१० ]- घुश्मेश्वर/घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

द्वादश ज्योतिर्लिंग में अब तक हम ने ९ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किये.अप्रैल २००९ , के बाद आज मैं इस की अगली कड़ी प्रस्तुत कर पा रही हूँ.प्रयास रहेगा कि जल्द ही यह श्रृंखला पूरी कर सकूँ.

घुश्मेश्वर/घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग –[महाराष्ट्र ]
महाराष्ट्र के मनमाड से 100 किमी दूर दौलताबाद स्टेशन से लगभग ११ किमी की दूरी पर वेरुल गांव में स्थित हैं.विश्व प्रसिद्ध एलोरा की गुफाएं भी पास में ही स्थित हैं.

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: अदालज वाव

 पहले समय में पानी के संग्रहण के लिए गहरे  कुएं खुदवाए जाते थे जिन्हें हम बावड़ी /वाव भी कह सकते हैं.राजस्थान और गुजरात में आप को ऐसे कई सुन्दर सीढ़ीनुमा वाव देखने को मिल जायेंगे .रानी की वाव ,चाँद बावड़ी,जूनागढ़ की  अड़ीकड़ी वाव आदि बहुत सी वाव उल्लेखनीय हैं .जिनके बारे में बाद में बताएँगे ,आज एक बहुत ही सुन्दर वाव के बारे में जानकरी देंगे.. स्थापत्य कला के इस अद्भुत नमूने का  नाम अडालज वाव है.

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

To LoVe 2015: Sheela ki jawani ( katrina kafe Song)......हाय हाय...शीला की 'कालजयी' जवानी


(व्यंग पोस्ट) पढ़ने से पहले एक बातखबरों के मुताबिक इस गाने पर बैली डांस करने के लिए Katrina Kafe कैटरिना कैफ ने काफी मेहनत की है। सात दिन तक कड़ी रिर्हसल के कारण कैटरीना को घुटनों में असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ी थी। इतनी कड़ी मशक्कत के बाद शकीरा को टक्कर देती परफॉरमेंस कैटरीना ने दी। कड़ी मेहनत का फल भी मिल रहा है कैटरीना को। दर्शकों के लिए कड़ी मेहनत करने वाले सभी कलाकारों को दिल से सलाम। 
.................................................................................



और अब एक सखत चेतावनी....इस पोस्ट में जहां भी जवानी की बात है वहां चटखारे हर हाल में लें....(वैसे लार भी टपका सकते हैं..आखिर हमलोगों की कमिनगी जाएगी थोड़ी न) औऱ जहां-जहां गीत के बोल हैं..वहां उसे गाना है....और गाते वक्त....नाचती हुई कटरीना जी को आंखो के सामने परगट करते हुए पोस्ट में आगे बढ़ना है....पोस्ट में गीत के शब्दों की महिमा है..इसलिए शीला की जवानी के चक्कर में घनचक्कर नहीं बन जाना आप लोग..समझे....नहीं तो ....भाड़ में जाओ...।

अभी खुशदीप जी के ब्लॉग देशनामा पर नए गीत शीला की जवानी के बोल पढ़े। वाह क्या जवानी है जो किसी के हाथ नहीं आनी है। संगीतकार विशाल ने सच में कालजयी रचना लिखी है। वाह क्या बोल हैं। पढ़ते-पढ़ते अपना तो कचूमर निकल गया..लेकिन शीला की जवानी खत्म ही नहीं हुई....अरे भई होगी भी कैसे....कोई ऐसी वैसी जवानी थोड़े ही न है....जो कंगलों के हाथ आ जाए..हाय हाय ये शीला की जवानी...। दिल पर पत्थर रख कर कहना पड़ रहा है कि मुन्नी बाई तो अब झंडू बाम से ही काम चलाएगी। शीला की जवानी तो बरस-बरस पड़ रही है।

वैसे भी साली अपनी किस्मत ही गड़बड़ है। पिछले महीने कुछ शादियों में मुन्नी बाई के चक्कर में इतनी हिलाई इतनी हिलाई, (समझ लो क्या) औऱ पैरों को इतना पटका कि दिल्ली आकर पता चला कि पैरों का कचूमर निकल गया है। सात दिन तक स्क्रैप बांधकर घर पर बैठना पड़ा। तो अपन इससे सबक लेकर फिलहाल (अभी फिलहाल ही ठीक है..हीहीहीही) शीला की जवानी के पीछे नहीं दौड़ेंगे। मुन्नी बाई ने तो कमर और पैर का ही बेड़ा गर्क किया था..शीला की जवानी जाने क्या आग लगा दे। वैसे भी वो अपुन जैसे के हाथ नहीं आने वाली। शीला ने कहा है न ‘’’आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू..मैं तेरे हाथ न आनी’’’’’’ जब अरबपति सल्लू मियां को झटके पर झटके दे रही है तो हम-आप क्या बला हैं।

खैर चलिए देशनामा वाले खुशदीप जी की मुहिम को समर्थन देते हुए आगे बढ़ते हैं। शीला की जवानी के गुण गाते इस गीत को कौन से तत्व कालजयी बनाते हैं..ये शायद वो समझ नहीं पाए...या शीला की जवानी के चक्कर में इतना घनचक्कर बन गए कि लिखना भूल गए....खैर उन तत्वों पर मैं परकारस डालता हूं..क्योंकि मैं शीला की जवानी से जरा बच कर रह रहा हूं.....।

कालजयी रचना होने के कारण-----
नंबर एक सफाचट खोपड़ी
खुशदीप जी समेत सभी पुराने हैंडसम लोगों को संगीतकार विशाल की उम्दा खोपड़ी से रश्क हो रहा है। इन सभी लोगों को लग रहा है भगवान की दया से संगीतकार विशाल हैं सफाचट सिर के मालिक..इसलिए ग्रैमी अर्वाड लेने वाली ये रचना उनके खोपड़िया से निकली है.....पर ये सच न है....ये सब पूराने हैंडसम लोग कुछ नहीं जानते....मैं बताता हूं आपको संगीतकार विशाल जी के सफाचट खोपड़िया का राज....।
दरअसल विशाल जी के बाल उड़े नहीं हैं वो महाश्य बाल को उगने नहीं देते,...वैसे भी बाल उनके हैं जो चाहें करें.....दरअसल महान और कालजयी रचना के लिए गंजापन बचा के या बना के रखना पड़ता है। तो सारे गंजे लोग भाई औऱ सहेलियां शुरु हो जाएं....जाने किसके दिमाग से कुछ टपक पड़े....शीला की जवानी तो अब टपकने से रही...वो जवानी तो विशाल जी के खोपड़िया में से टपक गई है......खैर..आगे बढ़ते हैं....

नंबर दू
शीला की जवानी (हाय हाय! क्या जवानी है....यहां लार टपकाएं..) वाला गाना वक्त के साथ कदमताल करता है। यानि वक्त के साथ-साथ चलता है.....अगर विश्वास नहीं होता तो जरा गौर फरमाइए इन लाइनों पर
''''मै तो खुद को गले लगाऊं''''
किसी और की मुझे ज़रूरत क्या,
मैं तो खुद से प्यार जताऊं''''

  समझ में आई कि नहीं ये बात। ससुरी आसानी से समझ आएगी भी कैसे...समझदारी को शीला की जवानी जो चट कर गई है। अमां याद करो धारा 377...याद आई न...हां तो भई इसके बाद तो आदमियों के लिए औऱतों की और औरतों के लिए आदमियों की जरुरत वैसे भी कम होती जा रही है। इसलिए गीत में बोल हैं """"मैं खुद से प्यार जताउं""""हद है यार..इती सी बात नहीं समझते। ....चलिए अब अगले कारण पर बढ़ते हैं।

नंबर तीन
सुमित्रानंदन पंत, ....बच्चन,....दिनकर,....जयशंकर प्रसाद जैसे महान साहित्यकारों के लिखे गीतों की लाइन में ही ये गाना आता है....महानता के सारे तत्व प्रचुर मात्रा में इसमें भी हैं.....क्या कहा, नहीं दिख रहा आप लोगो को...? कमबख्तों शीला की जवानी से जब नजर हटेगी.....तभी दिखेंगे न कालजयी होने के गुण..। हैं क्या कहा? नजर चिपक गई है.....हद हो गई यार....। चलो कोई नहीं...फेविकोल का जोड़ तो है नहीं है..हमेशा नज़र शीला की जवानी पर ही तो चिपकी नहीं रहेगी...तो फिर जब हटेगी, तभी सही....नजर जब हट जाए तो ध्यान से गीत के बोल देखना.....फिर दिखेगा गाने में साहित्यक टच (हाय टच मी..टच मी...होले होले जरा....टाइप) इन लाइनों में ...
'''''सूखे दिल पे मेघापन के तेरी नज़रिया बरसे रे,''''     
 या जो आगे लाइन खुशदीप जी ने लिखी है वो है...
’’’सूखे दिल पे भीगापन के तेरी नज़रिया बरसे रे’’’’’’
तो समझे.....क्या कहा? समझ जवानी के चक्कर में तेल लेने गई हुई है.....। हद है...जरा दिमाग को फोकस करें ....समझने कि कोशिश करिए..गीत में ये जो शब्द भींगापन  है या मेघापन....इसमें अपनापन जोड़ कर कुछ कहा गया है....
साथ ही ये भी गीत के बोल हैं....
‘’’’तेरी नजरिया बरसे रे….'''''
यानि इस महान गाने में भावनाओं को भी सहेजा-समेटा गया है....भई ये जवानी हाथ नहीं आने वाली...तो आंसू तो टपकेगें ही ..यानि कि हुआ न नजरों का बरसना....तो भाव भी है और अपनापन भी..तो ये हुआ की नहीं गाने में साहित्य का समावेश

ते हुण चौथी बातां..
पुराने जमाने की उंचाइयों को छूते हुए ही ये गीत आज के युवाओं को भी बहुत खूबसूरती से लपेट लेता है..(जवानी में समेटा नहीं लपेटा ही जाता है..) ये गीत युवाओं के दिल की बात बड़ी सहजता से संदेश देता है.....चुनौती का सामना करने का संदेश...ये गीत साथ ही स्वस्थ समाज का संदेशा भी देता है। यानि एक तीर से कई शिकार...(अब कित्ते शिकार हुए ये न पूछना)

 चलिए गौर फरमाइए.......""""अयं कहां गए सब"""""..............हे भगवान....कब सुधरेंगे ये सारे.....अबे घनचक्करों ‘’शीला की जवानी पर नहीं’’’’......पंक्तियों पर, कमबख्तमारों गीत के बोल पर.....कंसीडर करने....गौर करने को कह रहा हूं.....समझे...चलो पढ़ो..

’’’’’’’ऐन्ड नोबॉडी गॉट बॉडी लाइक शीला
एवरीबॉडी वान्ट बॉडी लाइक शीला....'''''
याद आया कुछ.....अरे कहां याद आएगा इस जवानी की चकाचौंध में.....बेबो याद है...अरे बाबा करिश्मा कपूर जी।(करीना जी...हीहीहीही पूरे एक महीने बाद ठीक कर रिया हूं वो भी ब्रेकिट में) पिछले साल उनकी जीरो फीगर ने कहर ढाया हुआ था न देश की लड़कियों पर (वो तो छोरो समेत कई बुढउ लोगो पर भी गजब ढा गया था..अब जावनी जाने क्या गजब ढहाएगी..रब्ब ही जाने) तो अपनी कंपटीटर से कैसे कैटरीना पीछे रहती.....टच मी,...टच मी कहते कहते....वो जवानी का कहर ढाने लगी हैं....और अ तो मुन्नी बाई तो क्या जीरो फीगर भी लोग भूल गए हैं...समझे न...तो अब हर कोई “”कट...रीना”” की तरह कटाव ली हुई बॉडी चाहेगी....या चाहेगा भी(हीहीहीही...कमीनेपन वाली हंसी है ये...सो आगे पढ़ने से पहले कमीनों वाली हंसी हंसे)

नंबर पंजवा....
हुण आंदे णे....यानि कि आते हैं..कालजयी होने के महत्वपूर्ण बिंदू पर......ये रचना स्वस्थ समाज पर जोर देती है...स्वस्थ समाज, स्वस्थ देश। आप कहेंगे कैसे???....अरे बता रहा हूं जरा सब्र तो कीजिए.....अब देखो...."""""अबे कमिनों कटरीना की फोटू नहीं""""".....गीत की ये पंक्तियां देखो....
'''''''एवरीबॉडी वान्ट बॉडी लाइक शीला’’’’’
इन लाइनों का एक और अर्थ बताता हूं।
.....दरअसल ये लाइन कहती हैं कि बॉडी होनी चाहिए शीला की तरह लचक वाली....स्वस्थ और सुडौल..जिसे देखकर कोई भी गश खा जाए। इस बहाने कम से कम लोग स्वस्थ बॉडी तो चाहेंगे। वरना जीरो फीगर ने जाने कितनी लड़कियों को बेहोश करके अस्पताल पहुंचा दिया था.....छोरा लोगो का होश उड़ा दिया था (बड़ों की न पूछना)...यानि मेंटल बना दिया था। तो वैसी जीरो फीगर का क्या फायदा..?
कहते भी हैं न कि एक सेहत हजार नियामत....

वैसे भी देश के लिए आहूती जवानी ही दिया करती हैं (शीला की जैसी जवानी के लिए भी जान देते और लेते हैं लोग)...अब जब राष्ट्र आजाद है तो फिर शीला की जवानी पर मिटन में वइसे कै हरज है.....वैसे भी बॉडी बना कर रखें तो अच्छा ही तो है...जाने कब जरुरत पड़ जाए....धौलकुंआं जैसी जगह पर वीरता दिखानी पड़ ही जाती है....।

तो भई ऐसी कालजयी रचना के लिए संगीतकार विशाल जरुर ही बधाई के पातर हैं....इसलिए अब आप सब मेरे साथ मेरा नया गीत गाओ....
    सारे बोलो 
    सब साथ बोलो
    जोर से बोलो.
    मिलकर बोलो
    ''''शीला की जवानी
       किसी के पकड़ न आनी
       फकड़ों के हाथ तो 
       कभी न आनी.....
      हाय री हाय री
     शीला की जवानी.....''''
(विशेष नोटः--अब लार टपकाएं, जरुरी है वरना मज़ा नहीं आएगा....)

आप वैसे समझ ही गए होंगे की पोस्ट में गुलाबी रंग तो आना ही था

तो जय हो, जय हो, जय हो, जय हो "विशाल" जय हो
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शनिवार, 27 नवंबर 2010

To LoVe 2015: NGO... म्हारी उल्टी खोपड़ी..या दुनिया उल्टी.....रोहित


हाल में कुछ ऐसे मेल मिले जिसमें मुझसे डोनर बनने का आग्रह किया गया। ये अलग बात है कि वर्तमान हालात में डोनर बनना मेरे लिए संभव नहीं हैं। (अब भई पइसे है ही नहीं, .तो बड़ा डोनर बने कइसे..हेहेहेहेह) वैसे अक्सर ऐसे प्रस्ताव मुझे सोच में डाल देते हैं। जा जूं कहें कि मैं हूं ही उल्टी खोपड़ी जो हमेशा दूसरे सिरे पर जाकर सोचने लगता हूं,...या दूसरा सिरा पर क्या चल रहा है.ये सोचने लगता हूं..समझे आप...नहीं समझे तो कोई बात नहीं....
"आइए मेरे साथ सोचने की कड़ी में जुडकर अपनी खोपड़ी खटखटाइए"

बड़े-बड़े एनजीओ कई बड़े कामों को अंजाम दे रहे हैं। इन एनजीओ के साथ बड़ी-बड़ी तोपें यानि बड़े नाम जुड़े होते हैं...। जिससे बिना सरकारी मदद के भी ये अच्छा काम कर रही हैं। इनके लिए कभी धन बड़ी समस्या नहीं बनता। कई बार इनके दबाव की वजह से सरकार भी कई कल्याणकारी काम करने को मजबूर हो जाती है। ऐसे में जनता के हित के कई काम हो जाते हैं। अब जरा उल्टा सोचिए...या कहूं कि दूसरे सिरे कि सोचिए....
'''"क्या इन बड़े नाम वाले एनजीओ से आम जनता जुड़ पाती है''''

देश के कई इलाकों से ऐसी खबरें सामने आती हैं कि स्थानीय लोगो ने सरकारी मशीनरी की कछुआ चाल से चिढ़कर खुद ही एकजुट होकर अपनी समस्या सुलझा ली। कहीं शानदार सड़क बन गई, तो कहीं स्कूल। दिल्ली से सटे हरियाणा के एक इलाके के लोग तो रेलवे से इतना दुखी हो गए कि उन्होंने खुद ही पटरी बिछा ली, रेलवे स्टेशन बना दिया। ऐसे लोग .....
''''लोग खुद ही एकजुट होकर काम निपटा देते हैं''''

इन खबरों के बाद मेरी खोपड़ी में हमेशा एक सवाल उछलने-कूदने लगता है। वो ये कि क्या  देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे धांसू काम करने वाले एकजुट क्यों नहीं हो पाते? इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्लेटफॉर्म क्यों नहीं मिल पाता? क्या किसी बड़े नाम या धनपति को ऐसे लोग ोको एकजुट नहीं करना चाहिए। पर मुसीबत यह है कि कई स्थानीय नेता ऐसे कर्मवीरों के साथ सिर्फ इसलिए जु़ड़ते हैं कि वो छापे में छप जाएंगे, टीवी पर चमक जाएंगे। हालांकि हर कोई ऐसा नहीं होता...पर अधिकांश ऐसे होते हैं.
'''''जे सब अइसे नहीं होते, तो समस्या होती ही काहे कू''''

जरा सोचिए,(भई सोचना तो पड़ेगा ही, आखिर इसलिए ही तो पढ़ रहे हैं न) अगर  किसी काम को करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्से से लोगो को जोड़ा जाए, तो क्या होगा? क्या एक क्रांति नहीं हो जाएगी? जैसे शिक्षा को ही देख लीजिए। देश के कई अध्यापक, पढ़े-लिखे लोग, अपने स्तर पर अलग-अलग हिस्सों में लोगो को साक्षर बनाने कि कोशिश में लगे हैं। पर इनमें से अधिकतर एकदुसरे से या उनके कामों के बारे में कुछ नहीं जानते। 
''''ये राष्ट्रीयता साक्षरता अभियान से जुड़ जाएं तो चमत्कार होगा या नहीं''''

पर हालात ये हैं कि एक हिस्से का बंदा ये नहीं जानता की देश के दूसरे हिस्से में क्या हो रहा है। उसे ये पता नहीं होता कि जिस काम को वो करना चाहता है, उसे कोई दूसरा भी कर रहा है। देश के अनेक हिस्सों में अवारगी करने का ये फायदा तो मुझे हुआ है कि इस खाई को मैने काफी नजदीक से देखा है। स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो, स्वालंबन हो, सरकारी बाबूओं कि अदूरदर्शी नीतियों का विरोध हो....लोग अपने को अकेला समझ कर कुछ नहीं कर पाते....या जितना कर लेते हैं उसी में संतुष्ट हो जाते हैं। और मैं........
''''इसी आत्मसंतुष्टी से चिढ़ता हूं''''

देश का गरीब से गरीब भी कुछ करने की इच्छा रखता है....पर वो अपनी गरीबी के जाल से ही नहीं निकल पाता। किसान अलग-अलग होकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर होते हैं। महिलाएं अपने आंचल को फांसी के फंदे में तब्दील कर देती हैं। ये एकजुट होकर कुछ कर नहीं पाते। इनके अंदर इच्छा है, पर अकेले होने के कारण सब लाचार होते है....मगर...
''''यही काम फिल्मी पर्दे पर मुन्नाभाई को करते देख ताली पीटते हैं'''' 
अगर बड़े काम को पूरा करने में हम हाशिए पर पड़े व्यक्ति को हाथ बंटाने का मौका दें, तो शायद वो अपने दुष्चक्र से निकल सके। उसमें समस्याओं से लड़ने का आत्मविश्वास जागेगा। एक बड़े काम को करने के लिए जब हजारों हाथ जुटेंगे, तो उसमें हर किसी का हाथ जुड़ेगा। उस काम के सफल होने पर हर स्तर के इंसान को अपार खुशी मिलेगी। उसमें एक संतुष्टी होगी कि वो अकेला नहीं हैं...लाखों लोगो के साथ उसने भी देश के लिए कुछ किया है।
'''''और इसी संतुष्टी को मैं हर भारतीय में देखना चाहता हूं''''

ऐसा नहीं है ऐसा पहले कभी हुआ नहीं है। ऐसी सार्थक पहल का उदारहण हमारे साहित्य में मिलता है, हमारे अराध्य, हमारे आदर्श ने हमें करके दिखाया है। रामायण में लंका जाने के दौरान समुद्र पर पुल बांधना। इसके लिए भगवान राम ने हर जाति की मदद ली थी। क्या वानर, क्या रीछ, क्या जनजाति के लोग। इतने लोगो का काम के प्रति उत्साह देख एक गिलहरी भी अपने को रोक नहीं पाई, और पूल के पत्थरों को जोड़ने के लिए अपने सामर्थ्य अनुसार काम किया। बदले में अपनी पूरी बिरादरी की पीठ पर भगवान की उंगलियों के निशान का प्रसाद पा लिया। 
''''रामायण से प्रेरणा लेने के लिए सनातन धर्मी होना जरुरी नहीं है, इससे राष्टधर्म मानने वाला कोई भी भारतीय सबक सीख सकता है''''

पर हमारी एक बड़ी अजब-गजब समस्या है। हमारी ये राष्ट्रीय आदत बन चुकी है कि जिससे कुछ प्रेरणा लेकर काम हो सके, उसे न करो। उसका उल्टा करो यानि औऱ उसकी पूजा करो, आदर करने लगो।
'''''यानि आदर्शों की आरती उतारो पर उसे अमल में लाने कि सोचो तक नहीं, अब पता नहीं मैं उल्टी खोपड़ी हूं या हमारी राष्ट्रीय आदत ही उल्टी हो गई है'''''

(पोस्ट लंबी है पर झेल लेना, यानि पढ़ लेना आप सभी, क्या करुं उंगली की-बोर्ड से टकराती है तो विचार प्रवाह  खत्म होने पर ही रुकती है)
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मंगलवार, 23 नवंबर 2010

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

मेरे मित्र की कार बंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, ''इनके यहाँ कुत्ता तो नहीं है?'' मित्र ने कहा, ''तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!'' मैंने कहा, ''आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूँ।''

कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेज़बान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से ''नमस्ते'' हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- ''क्यों यहाँ आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहाँ से!''

फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता- चार बार काट ले। डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है। यों कुछ आदमी कुत्ते से अधिक ज़हरीले होते हैं। एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था। मैंने कहा, ''इन्हें कुछ नहीं होगा। हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ।''
एक नये परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया। मैं उनके बंगले पर पहुँचा तो फाटक पर तख्ती टंगी दीखी- ''कुत्ते से सावधान!'' मैं फ़ौरन लौट गया।

कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, ''आप उस दिन चाय पीने नहीं आए।'' मैंने कहा, ''माफ़ करें। मैं बंगले तक गया था। वहाँ तख्ती लटकी थी- ''कुत्ते से सावधान।'' मेरा ख़याल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं। पर नेमप्लेट कुत्ते की टँगी हुई दीखी।'' यों कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है। मार्क ट्वेन ने लिखा है- ''यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा।'' कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है।

बंगले में हमारे स्नेही थे। हमें वहाँ तीन दिन ठहरना था। मेरे मित्र ने घण्टी बजायी तो जाली के अंदर से वही ''भौं-भौं'' की आवाज़ आई। मैं दो क़दम पीछे हट गया। हमारे मेज़बान आए। कुत्ते को डाँटा- ''टाइगर, टाइगर!'' उनका मतलब था- ''शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं। तू इतना वफ़ादार मत बन।''

कुत्ता ज़ंजीर से बँधा था। उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था। मैं उससे काफ़ी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया। मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है। लगता ऐसा ही है। मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूँ। चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो। उस बंगले में मेरी अजब स्थिति थी। मैं हीनभावना से ग्रस्त था- इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नज़र से देखता।

शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे। नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था। मैंने देखा, फाटक पर आकर दो 'सड़किया' आवारा कुत्ते खड़े हो गए। वे सर्वहारा कुत्ते थे। वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते। फिर यहाँ-वहाँ घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते। पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था। वे सहम जाते और यहाँ-वहाँ हो जाते। पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते। मेजबान ने कहा, ''यह हमेशा का सिलसिला है। जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं।''

मैंने कहा, ''पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए। यह पट्टे और ज़ंजीरवाला है। सुविधाभोगी है। वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं। इसकी और उनकी बराबरी नहीं है। फिर यह क्यों चुनौती देता है!''

रात को हम बाहर ही सोए। जंज़ीर से बँधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था। अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता। आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? यह तो उन पर भौंकता है। जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।

मुझे इसके वर्ग पर शक़ होने लगा है। यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है। मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते। उनका रोब ही निराला! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना। आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे। लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे। कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी। वे बैठे रहते या घूमते रहते। फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे। बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट।

यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज़ में आवाज़ भी मिलाता है। कहता है- ''मैं तुममें शामिल हूँ।'' उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी- यह चरित्र है इस कुत्ते का। यह मध्यवर्गीय चरित्र है। यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है। तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है। हमारी आहट पर वह भौंका नहीं, थोड़ा-सा मरी आवाज़ में गुर्राया। आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं। थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया। मैंने मेज़बान से कहा, ''आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है।''

मेजबान ने बताया, ''आज यह बुरी हालत में है। हुआ यह कि नौकर की गफ़लत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया। वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही। दोनों ने इसे घेर लिया। इसे रगेदा। दोनों इस पर चढ़ बैठे। इसे काटा। हालत ख़राब हो गई। नौकर इसे बचाकर लाया। तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है। डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाऊँगा।''
मैंने कुत्ते की तरफ़ देखा। दीन भाव से पड़ा था। मैंने अन्दाज़ लगाया। हुआ यों होगा-

यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा। उन कुत्तों पर भौंका होगा। उन कुत्तों ने कहा होगा, ''अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता। ढोंग रचता है। ये पट्टा और जंज़ीर लगाए हैं। मुफ़्त का खाता है। लॉन पर टहलता है। हमें ठसक दिखाता है। पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है। संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा। हममें से है तो निकल बाहर। छोड़ यह पट्टा और जंज़ीर। छोड़ यह आराम। घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा। धूल में लोट।'' यह फिर भौंका होगा। इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे। यह कहकर- ''अच्छा ढोंगी। दग़ाबाज़, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं।''
इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलाई।
कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है।

—हरिशंकर परसाईं/a>
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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

To LoVe 2015: Now What.....वो वादा औऱ कुत्ते की पूंछ....Rohit

वैसे अपुन हंसने की आदत डाले बैठे हैं। आखिर कभी हंसने का वादा किया था...इसलिए अब सदा मुस्कुराना तो पड़ेगा ही। ये अलग बात है कि होंठ भी जख्मी हों तो ये हंसी भी काफी तकलीफ देती है। वैसे भी जिदंगी काफी मुश्किल हो जाती है जब अपने ही हाथ आपको जख्म देने लगे। ऐसे में अंदर कहीं से जो चटक जाता है वो फिर कभी नहीं जुड़ता। कई बार तो जख्म ऐसे लोग दे जाते हैं जिनका जिक्र चाहकर भी आप नहीं कर पाते। तभी रहीम ने कहा है कि रहिमन धागा प्रेम का न तोड़ो चटकाए, टूटे तो फिर न जुड़े, जुड़े तो गांठ पर जाए। इस बार तो गांठ गिनने भी मुश्किल हैं..सो गिन ही नहीं रहे। पर हम भी क्या करें आदत से मजबूर हैं, विश्वास करना जल्दी छूटता भी तो नहीं है। काफी पहले साधु औऱ केकड़े की कहानी पढ़ी थी। जो ऐसे हर अवसर पर चलचित्र की तरह सामने आ जाती है। मुझे लगता है कि ऐसी कहानियों को बचपन में नहीं सुनाया जाना चाहिए। परिपक्व मन ही ऐसी कहानियों के हर पक्ष को समझ पाता है। हमेशा आदर्श औऱ लोकव्यवहार को ध्यान में रखना चाहिए। बच्चों की शिक्षा में ये आवश्यक तौर पर जोड़ देना चाहिए। उसे मालूम हो कि आदर्श स्थिती में आदर्श कैसे अमल में लाए जाते हैं और बाकी समय में क्या लोकव्यवहार होता है। कुछ अपवाद भले ही अलग होते हैं। देर से सीखने की वजह से कई बार लोकव्यवहार करने में इंसान चुक जाता है। इसका नतीजा कई बार भयंकर निकलता है। हमेशा से मन इस बात को जानता रहा और पर अमल में चुकता रहा। नतीजा सामने है। ऐसी ज़ंग में कैसी जीत, जिसमें हर तरफ आपके ही हथियार हों। ऐसी जीत सिर्फ और सिर्फ जख्म ही देते हैं। नुकसान अपना ही होता है। अपना ही मन औऱ तन जख्मी होता है। एक साथ शारीरिक मानसिक आर्थिक औऱ भावनात्मक तौर पर झेले जाने वाले विश्वासघात फिर से इंसानियत पर विश्वास करने की इजाजत नहीं देते। पर क्या करें हमारी आदत तो कुत्ते की पूछ हैं जो सीधी होने से रही। आज तक नहीं सीधी हुई तो आगे भी कोई आसार नहीं हैं। पर अब चाहता हूं कि सीधी हो ही जाए आदत रूपी कुत्ते की ये पूंछ।
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