बुधवार, 30 दिसंबर 2009

To LoVe 2015: कुछ कहते-कहते रुक जाती हो.....


दोस्तों इस बार एक पुरानी कविता आपके सामने है ..लाइनें बिना बदले ...जैसी पहली बार लिखी थी.....बदलना सही नहीं समझा.....हो सकता है तारतम्य न हो लाइनों में ...मगर भाव जैसे थे मेरे ख्याल में, वैसे ही आपके सामने हैं...

जब जब तुम्हारा ख़त पड़ता हुं
चंद पंक्तियों पर, रुकता हूँ
हर पंक्ति में, तुम्हें ही देखता हूँ

तुम, चंद पंक्तियाँ ही लिखती हो
पर हर बार शब्द बदल जाता है
शब्दों में नया ही कुछ दीखता है....

तुम, काफी कुछ कहना चाहती हो
पर, चंद पंक्तियों में ही ढल जाती हो
शायद इसलिए हर शब्द नए भाव धर लेता है.....

तुम्हारे शब्दों को जितनी बार पढ़ता हूँ
तुम उतनी बार, अक्षरों में दिखती हो
फिर तुम्हारा हर छंद नए रंग में दिखता है

कभी कभी शब्द अर्थ ही बदल लेते हैं 
कभी शब्द नए आयाम धर लेते हैं
फिर जाने कब कहीं गहरे उतर जाते हैं....

कभी आँखों से नींद कोसों दूर होती हैं
तब शब्द चहुँ और बिखर जाते हैं
कभी तारे बन फलक पर छा जाते हैं...

उन्मुक्त शब्द कभी नया जीवन जीने लगता है
कभी आकाशगंगा में अठखेलियाँ करता है
तो कभी चांदनी में घुलमिल जाता है.....

और जब शब्द (या तुम) थक जाते हैं
कुछ और जब नहीं कह पाते हैं
तो चुपके से लम्बी ठंडी सासें भरकर....

अद्धोपन्त !
व्योम के सफ़र से टूट कर शब्द (या तुम)
ख़त (या मेरे) के ही आगोश में ही समां जाते हैं......
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

To LoVe 2015: वैलंकानी गिरिजाघर

'प्रभु यीसु के जनमदिन 'की आप सभी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ.इसी पावन अवसर पर आज मैं आप को लिए चलती हूँ 'वैलंकानी 'जो तमिलनाडु राज्य में स्थित है.यहाँ दर्शन करेंगे प्रभु यीसु की जननी 'माता मेरी के जिन्हें 'Our lady of Good Health,'"Our Lady of Vailankanni" वैलंकानी माता भी कहा जाता है .तमिलनाडु के नागापट्टिनम क्षेत्र में वैलंकानी गिरिजाघर स्थित है।मानना है कि मदर मेरी की प्रतिमा यहाँ

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

To LoVe 2015: जीए तेरे लिए....


चंद पंक्तिया जाने कहाँ से निकली...और कलम के रास्ते पन्नों पर उतर गई...और आज कीबोर्ड के सहारे ब्लॉग पर.....

मेरे दिल के टूटने की कसक उन्होंने सुनी नहीं
हँसतें हुए मेरे लबों को देख वो चहकती रहीं
मैं मुस्कराहट मैं ही दर्द अपना पीता रहा....

दर्द भले मेरा कभी वो समझे ही नहीं
आँखों मैं मेरे जो अश्क थे ठहरे हुए
ख़ुशी के आंसू समझ वो महक्तीं रही.....

दामन थाम किसी और का वो बढ़तीं रही
सुनके उनके ख्याल मैं ठिठकता रहा
वो मुझे ठहरा हुआ समझती रही.....

मैं उनकी मंजिल भले ही न रहा
पर राह के काँटों पर हाथ रखता रहा
दर्द हर बार उनका मैं बांटता रहा.......

वो हर चौराहे पर आकर भटक गई
पर भटकन को ही सफ़र समझती रही
अपने सपनों की मंजिल तलाशती रही......

मैं समझा कहीं दूर वो निकल गई
फिर मैं भी किस्सा बन फ़ना हो गया .....
दो गज नीचे चिर निद्रा में खो गया.....

पर वाह री किस्मत !
दफ़न था जहाँ मैं उसी राह वो
अपनी ख़ुशी तलाशती निकल पड़ी.....

कब्र के पत्थर को ही नींव समझ बेठी
वहीँ अपने सपनों का आशियाना बनाती रही
और मैं, देख उन्हें वहीँ चुपचाप पड़ा रहा........
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शनिवार, 5 दिसंबर 2009

To LoVe 2015: कोई लड़की हो तो बताना दोस्तों


अकेले है हम, तो दुसरो को क्यों है गम....?


किसी शायर ने क्या खूब कहा है "जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते है"....यह एक शेर जिंदगी को ज़ीने का फलसफा बताने की लिए काफी है....आप सोच रहे होंगे की में यह शेर क्यो पढ़ रहा हूँ ...तो दोस्तों दरअसल इसी शेर को पढ़ कर हम यानि की सो कॉल्र्ड तुर्रमखान अब तक मस्त जीते आ रहे थे...मुस्कुराने की आदत डाले बैठे थे......अपनी जिंदगी मस्ती से कट  भी रही थी...अकेले जीने का मज़ा भी ले रहे थे...
लेकिन लोगो को ये रास नहीं आई....औऱ किसी हमारी मुस्कराहट को किसी कलमुंहे की नज़र लग लगी गई।
 
दोस्तों आप कितने भी मस्त क्यों न हो..आपकी जिंदगी कितनी ही मस्ती से क्यों न कट रही हो, पर कुछ लोगो को ये हज़म नही होती... 'अपन मस्त' वाला आपका अंदाज़ कई लोगो को रास नही आता....कहते हैं न कि दुनिया में कुछ लोग अपने दुःख से कम, दुसरों की खुशी से ज्यादा दुखी होते है...ये वो ही लोग होते हैं..
 
मगर इन कलमुंहें दुश्मन के अलावा आपके कुछ ऐसे शुभचिंतक भी होते है जो आपकी चंद खुशियों इत्तफाक नहीं रखते (ऐसे में दुश्मनों की जरूरत ही क्या है....)
 ये वो लोग होते हैं जिन्हें आप अपना कह सकते है.....जो आपके दुःख से दुखी होते है...आपकी खुशी से खुश होते है....पर आप सच मानो कभी-कभी इन्हें बर्दाश्त करना काफी मुश्किल हो जाता है...और आजकल ऐसे ही शुभचिंतकों ने मेरी चैन छीना हुआ है...आप भी सोच रहे होंगे कैसा पागल है? शुभचितंकों से परेशान है....पर सच यही है दोस्तों..अगर यही हाल रहा तो मुझे पागल होते देर नही लगेगी.....चलिए पहले मेरी मुसीबत सुन लीजिए..

आजकल शादी का टाइम चल रहा है.....और ये शादियाँ ही मेरी चैन की दुश्मन बनी हुई है....इन शादियों में मुझे थोक के भाव से रायचंद मिल रहे है....यही वो लोग हैं, जिन्होंने मेरी जिंदगी दूभर कर रखी है......शादियों में नाच गाने के बाद जब खाने का टाइम होता है, तो यह सभी रायचंद मिल कर हमे घेर लेते है...अब कोई एक हो या दो हों, तो हम इनसे निबटे....
भाई यह कहाँ की बहादुरी हुई कि मिलकर एक को घेर लो और लगो मारने तीर पे तीर ....
होता क्या है कि हाल चाल पूछते-पूछते लोग अगला सवाल रुपी अस्त्र बिना देर किए मारने लगते हैं...."भाई परिवार का क्या हालचाल है...हम कहते हैं कि सब ठीक है ...तो उनका जवाब होता ठीक है....और बीबी बच्चे? 
हम कहते हैं यार हम शादी शुदा नहीं हैं..तो लोग कहते हैं ओह तो आप परिवार के झंझट से मुक्त हैं..ये बात मेरा दिमाग घुमा देता है...हद है यार ..क्या माँ-बाप परिवार में नही आते ? .......
भाई मेरी समझ में तो परिवार का मतलब बीबी और बच्चे और माँ-बाप आते हैं....अगर छोटे भाई-बहिन हों तो वो भी ....
पर लगता है कि आजकल परिवार की भाषा में माँ-बाप नही आते......
खैर बात यहीं थम जाती तो भी गनीमत होती......
अब हर कोई कोई दार्शनिक अंदाज़ में (आखिर हम भारतीयों ने दार्शनिक होने का ठेका जो ले रखा है) कहता है की यार शादी कर डालो....जवानी तो कट जाएगी, बुढ़ापा नहीं कटेगा...( जैसे जवानी काटने के लिए मैं जीबी रोड के चक्कर काटता हूं या किसी कॉलगर्ल को बुलाता हूं )....अमां यार जिसकी शादी में आए हो उसे एन्जॉय करो और मुझे भी करने दो.....जब शादी होनी होगी या करनी होगी तो कर लेंगे....पर नहीं.....लगता है की जैसे सभी को मेरे अकेले होने का गम खाए जा रहा हो ।

    कभी तो लगता है की लोग ख़ुद दुखी हैं और मुझसे जलते हैं.... इन रायचन्दों में जो उम्र में बड़े हैं वो कहते हैं ..भाई हम तो आपको छोटा भाई समझते है....इसी लिए कहते है की शादी कर डालो सुखी रहोगे....महिला दोस्त होंगी तो कहेंगी यार अब शादी कर ले। इन सबके बाद शुरू होता है नसीहतो का दौर ...कहीं न कहीं तो समझौता करना ही पड़ता है....ऐसी जीवनसाथी पंसद करो..वैसी को कर लो......तुमपर कोई दवाब नहीं डालता..हर किसी को सब कुछ नही मिलता....(किसी को आसमान तो किसी को जमीन नहीं मिलता..वाले अंदाज़ में).....देखो जरूरी नही खूबसूरत लड़की हर किसी को मिल लाये....सूरत नहीं सीरत देखनी चहिये....वगैरह, वगैरह। बोलने का अंदाज ऐसा जैसे जो काम ख़ुद न कर सके या करके पछता रहे हों..वो हमें बता रहे हों..।


इन रायचंदों में ख़ुद तो कई लोगो ने सूरत देखकर शादी की थी और अब लगता है पछता रहे हैं..अबे ये पूछना कि कौन हैं ये लोग। अगर इनके नाम यहां लिख दिए तो इन महाश्यों औऱ मोहतरमाओं के घर में महाभारत छिड़ जानी है। ऐसे में अपनी हालत तो ऐसी है कि जिनसे नसीहत खाओ औऱ उनपर अहसान भी करो ..
हम चाहें या न चाहें...बातचीत जारी रहती है....और अगली नसीहत को फेंक-फेंक कर मारने का दौर जारी रहता है...
"देखो रोहित जरूरी नहीं की हर लड़की कमाने वाली ही हो....जरूरत होगी तो कमाने लगेगी... (नहीं कमाने पर जैसे मैं उसे फासीं दे दूंगा....हद है यार)
फिर लगे हाथ कमाने वाली लड़की का नुक्श भी बताने लगते हैं...
" जरुरी नहीं रोहित कि कमाने वाली लड़की घर संभाल ही सके"
लगता है की यहां भी मेरे बहाने अपना गम गलत कर रहे हो... अब बीबी से कुछ भी कहने की हिम्मत न रही हो। इनके हिसाब से तो जो बाकी लड़कियां घर भी संभाल रही हैं वो शायद दूसरे ग्रह से आती हैं।

   कई बार तो मन करता है की अपने बाल नोच लूँ, पर नोच नही सकता, सर पर वैसे ही बाल कम है...और दोस्तों के बाल तो नोच नही सकता...सिर वाले यार, (पता नहीं क्या-क्या सोचने लगते हो )......आखिर शादी के बाद यह रायचंद और इनकी बीबियाँ एक दुसरे के बाल नोच ही रहे हैं..।
(कुछ एक दम्पतियों को छोड़के....ही ही ही ही )

खैर अपन भी कम नहीं हैं....हमने भी एक ऐसा अस्त्र ढूंढ लिया है जिनसे कमोबेश सभी नि:श्स्त्र हो जाते हैं...। अब जैसे ही कोई प्रश्न का गोला दागता है हम भी पलटवार करने में देर नहीं लगाते....अपना अस्त्र फेंक मारते हैं...
....कोई लड़की है आपकी नज़र में......है तो बताना ..हमारा ये एक सवाल सबको ढेर कर देता है।
हाल ही में एक एक पत्रकार और एक डॉक्टर दोस्त (दोनो महिलाएं) पीछे पड़ गई.."
यार रोहित अब शादी कर डालो, हमें तुम्हारी चिंता होती है.....तो उन दोनो को एक नए सावल से निढाल करने में हमने देर नहीं लगाई..हमने पलट कर कहा...
"यार अगर तुमने लाइन दी होती, तो अब तक हमारे 4-5 बच्चे होते..."

तो दोस्तो इस तरह हम फिलहाल तो शादी के इस सीजन में हमलो से बचे हुए है...और उम्मीद है की आगे भी बचे रहेंगे ...
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