सोमवार, 28 सितंबर 2009

To LoVe 2015: 'पूरब का स्विजरलैंड--नागालैंड

केवल १ ,९८८ ,६३६ [२००१ की गणना के अनुसार]की जनसंख्या वाले पहाड़ी राज्य जिसकी राजधानी कोहिमा है ,आज चलते हैं उस राज्य की तरफ जिसका नाम है नागालैंड.इसे पूरब का स्विजरलैंड भी कहते हैं.पूर्व में म्‍यांमार, उत्‍तर में अरूणाचल प्रदेश, पश्चिम में असम और दक्षिण में मणिपुर से घिरा हुआ नागालैंड 1 दिसंबर, 1963 को भारतीय संघ का 16 वां राज्‍य बना था.इस राज्य में ११ जिले हैं.नागालैंड की प्रमुख जनजातियां है:

बुधवार, 23 सितंबर 2009

To LoVe 2015: गुलमर्ग -[कश्मीर]

कश्मीर भारत देश का अभिन्न अंग है.कश्मीर को धरती का स्वर्ग भी कहते हैं.प्राचीनकाल में कश्मीर हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का पालना रहा है। माना जाता है कि यहाँ पर भगवान शिव की पत्नी देवी सती रहा करती थीं, और उस समय ये वादी पूरी पानी से ढकी हुई थी। यहाँ एक राक्षस नाग भी रहता था, जिसे वैदिक ऋषि कश्यप और देवी सती ने मिलकर हरा दिया और ज़्यादातर पानी वितस्ता (झेलम) नदी के रास्ते बहा दिया। इस तरह इस जगह

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

To LoVe 2015: दुनिया की दूसरी [?] और भारत की सबसे पुरानी पहली मस्जिद

[केरल mein hai दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी[??] और भारत की सबसे पुरानी पहली मस्जिद - चेरमान जुमा मस्जिद.] केरल- 'God 's own country 'आज हम आप को जहाँ ले कर आये हैं वह भारत की दक्षिण पश्चिम सीमा पर स्थित है.जब हम यहाँ घूमने गए थे तब मुझे इस जगह ने बहुत प्रभावित किया -इस के ठोस कारण हैं एक-यह जगह इतनी हरीभरी है कि आप खुद को प्रकृति के बहुत नज़दीक पाएंगे.और इस स्थान को देव भूमि क्यूँ कहा जाता है समझ

रविवार, 6 सितंबर 2009

सब पर भारी बाजारवाद

आदरणीय सोमा जी
सादर
आपकी प्रतिक्रिया जान कर ख़ुशी हुई मेरा होंसला अफजाई का शुक्रिया. आपने एक साथ कई सवाल कर दिए जिनका एक साथ पत्र के माध्यम से उत्तर देना शायद एकदम संभव नहीं हो पर में संक्षिप्त में प्रयास करूँगा.
१ सामुदायिकता की भावना आदिवासी समाज में भी लगभग खत्म होने के चरण में चल रही है जो एक चुनोती है.
२ निजीकरण आज के समाज का अभिन्न अंग बन गया है क्योंकि सामुदायिक संसाधन और उस पर निर्भर सामुदायिक रूप के मानवश्रम की जरुरत अब कम होती जा रही है। क्योंकि कृषि खत्म हो रही वन उपज खत्म हो रही है और ये सब काम सामुदायिकता पर निर्भर है जो कम होते जा रहे है और पलायन बढ़ रहा है और रोजमर्रा की मजदूरी पर निर्भरता बढ़ रही है. संयुक्त परिवार की अवधारणा अब बीते कल की बाते हो गई है सभी रिश्तों पर पैसा भारी पड़ रहा है और पैसे से दुनिया में सब कुछ किया जा सकता है ये धारणा जोर पकड़ रही है इस कारण दुनिया में बाजार सबसे शक्तिमान बन गया है और दुनिया की सारी सत्ताएं उसके आगे कमजोर पड़ गई है इसी कारन व्यक्तिवाद बढ़ रहा है और सामुदायिकता खत्म हो रही है।

३ आदिवासी समाज की दुनिया सबसे ख़राब हालत है तो इसमें भी तुलना की जाये तो इस समाज की महिलाओं की हालत बदतर है। क्योंकि प्रय्तेक संकट और विपरीत हालत का असर महिलाओं पर सबसे ज्यादा पड़ता है और महिलाओं के पारिवारिक दायित्वों को निभाने के काम को अनुत्पादक माना जाता है जो आदिवासी समाज में ही नही सब समाजों में विद्यमान है इसके अलावा दुनिया में महिला सबसे सरल शिकार है जिसे आसानी से निशाना बनाया जा सकता है उसके बाद बच्चे आते है। इस दुनिया में हर शेत्र में तनाव बढ़ गया है और इसके कारण असफल होने पर आदमी अपनी ओरत पर खीज निकलता है क्योंकि सामुदायिक संसाधन खोने के कारण आर्थिक गुलामी बढ़ी है जिसका असर आय पर पड़ा है इसलिए आदमी बाजारवादी ताकतों और वयवस्था का तो कुछ नही बिगड़ सकता वो घर आ कर अपनी ओरत और उसके बाद भी गुस्सा नही उतरा तो बच्चों पर निकलता है ये एक आदमी के कमजोर और नाकाम होने की निशानी है।
४ अतिक्रमण की कई परिभाषा है गरीब आदमी करे तो अतिक्रमण और सरकार करे तो जनहित।
वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के दोरान हम महसूस कर रहे है की सामुदायिकता की भावना की क्या हालत हो गई है सभी लोग अपनी कब्जे की जमीन को पहले चाहते है इसका कारण यही है की सामुदायिकता समाज में केवल तीज त्योहारों और समारोहों तक ही सिमित हो कर रह गई है मुद्रा के संबंधो ने सामुदायिकता को खत्म कर दिया है और श्रम आधारित समाज को खत्म कर निक्क्मो की फोज इस व्यवस्था ने खड़ी कर दी है जो सब अपने अपने अलग अलग जहाँ को बसाने के चक्कर में लग गए है
मांगीलाल गुर्जर
जंगल जमीन जन आन्दोलन
उदयपुर/a>
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शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

राजस्थान में आदिवासियों के लाल हो जाने का खतरा

एक हिन्दी समाचार देनिक में छपे समाचार और सम्पादकीय के अनुसार राजस्थान की खुपिया पुलिस ने राज्य सरकार को एक रिपोर्ट भेजी है जिसमे ये आशंका प्रकट की गई है की राजस्थान के आदिवासी इलाकों में अगर आदिवासियों की बुनियादी सुविधाओं में ढांचागत सुधार नही क्या गया और वन भूमि के मसलों को सही प्रकार से नही निपटा गया तो इस इलाके में नक्सली गतिविधियों के बढ़ने का खतरा हो जाएगा। खुपिया पुलिस ने इससे निपटने के लिए कुछ उपाय भी सुजाये है जिनमे सबसे प्रमुख इन इलाकों में ईमानदार और संवेदनशील अधिकारीयों और कर्मचारियों को लगाना है क्योंकि आदिवासी आज भी सरकारी कर्मचारियों को ही सरकार मानते है। यहाँ में टिपण्णी करना चाहूँगा की आज़ादी के ६३ साल बाद भी अगर देश की दूरदराज इलाकों में रहने वाली जनता कर्मचारियों को ही सरकार माने तो इससे बढ़ के इस देश को चलाने वालों के लिए शर्म की बात नही हो सकती की आज भी आदिवासी लोग लोकतंत्र क्या है इसको जान ही नही पाए है तो ऐसे हालात में अगर कुछ लाल तत्व इन आदिवासी इलाकों में आ जाए तो क्या बड़ी बात होगी।
रिपोर्ट में जंगल जमीन जन आन्दोलन जेसे आन्दोलन जो आदिवासियों के पारम्परिक वन अधिकारों की मान्यता वन अधिकार मान्यता कानून के प्रावधानों के अनुसार कानून की इन इलाकों में पालना कराने के लिए प्रयास कर रहे है जो पुरी तरह से संवेधानिक मांग है और आन्दोलन का तरीका भी। पर इस कानून की पालना में जहाँ राज्य सरकार तो दोषी है ही वंही वन विभाग भी उतना ही दोषी है क्योंकि वन विभाग ने आदिवासियों के वनों पर पारम्परिक वन अधिकारों को उनके संकीर्ण स्वार्थ जो दारू मुर्गे और हर फसल पर आदिवासियों से प्राप्त होने वाली रिश्वत है तथा आदिवासी की वो खटिया है जिस पर वन विभाग के कर्मचारी ब्रिटिश सरकार के बनाये वन कानूनों के बनने के बाद से पिछले १४५ सालों से आराम फरमा रहे है। इन्ही कारणों से पुरी तरह से नकार दिया है और सेंकडों सालों से वनों में निवास कर रहे और वनों पर निर्भर रहने वाले आदिवासियों की फसलों को उजाडा है और उनको गैरकानूनी तरीकों से बेदखल किया है जो आने वाले समय में आदिवासियों के उत्तेजित होने और उनमे सरकार के खिलाफ असंतोष पनपने का कारण बन सकता है। यहाँ में ये भी स्पस्ट करना चाहूँगा की जेसा की रिपोर्ट में बताया गया है की आदिवासी आज भी अधिकारीयों और कर्मचारियों को ही सरकार मानते है इससे यही स्पस्ट है की आदिवासियों का असंतोष सरकार के खिलाफ नही हो कर के उन संवेदनहीन बेईमान और रिश्वतखोर अधिकारीयों और कर्मचारियों है क्योंकि उनके लिए वही सरकार है। इसलिए इस प्रकार के कर्मचारियों को हटाना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि जनता को लाल होने से बचाया जा सके।
जंगल जमीन जन आन्दोलन पिछले १५ साल से आदिवासियों की वनों से जुड़े अधिकारों के मांग को उठाता आया है और पुरी तरह से शांतिपूर्ण आन्दोलन रहा है तथा अपनी गैर राजनेतिक छवि के लिए विख्यात है।
लेकिन सरकार के ही कर्मचारियों के निक्कमेपन के कारण जनता लाल, पिली, नीली और या हरी हो जाए तो इसमे सामाजिक सरोकार रखने वाले शांतिपसंद संविधान के प्रति निष्ठावान लोग भी क्या करे।

मांगीलाल गुर्जर
उदयपुर/a>
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उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना को ले कर आन्दोलन

राजस्थान के उदयपुर जिले में हाई कोर्ट बेंच की मांग पिछले २८ सालों से की जा रही है। इस मांग को लेकर वर्तमान में चल रहा आन्दोलन अपने दो माह पुरे कर चुका है और ४ सितम्बर को सभी राजनेतिक दलों और संगठनो की और से एक सामूहिक रेली की गई इसमे उदयपुर के आदिवासियों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। उल्लेखनीय है की उदयपुर संभाग आदिवासी इलाका है और इस इलाके में मानवाधिकारों के हनन की खबरें आम है और अधिकांश गरीब और आदिवासी लोग धन और पहुँच के अभाव में है कोर्ट जो जोधपुर में है नही जा सकते परिणाम में उनको अपील के अभाव में सजा काटनी पड़ती है। लोकतंत्र में जन कल्याणकारी सरकारों का ये फ़र्ज़ बनता है की वो आम जनता को सस्ता और सुलभ न्याय दिलवाने की व्यवस्था करे पर जोधपुर है कोर्ट के वकीलों के दबाव में राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जो जोधपुर से ही आते है वे उदयपुर की इस जायज मांग को ठुकरा चुके है। साथ ही उदयपुर में आई आई टी खोलने के लिए केन्द्र सरकार ने निर्णय लिया था उसे भी नजरंदाज कर आई आई टी को भी जोधपुर में ही खोलने का निर्णय ले लिया है जो ये दर्शाता है की वे पुरे राज्य के नेता नही हो कर केवल जोधपुर के ही नेता बन गए है। श्री गहलोत ने क्षेत्रवाद की सभी सीमाओं को लांग कर उदयपुर में पेयजल की यौजना जो देवास योजना के नाम से जानी जाती है उसके बजट में भी कटोती कर दी है। याद रहे की अन्य पार्टियों की सहायता से चल रही गहलोत सरकार को उदयपुर संभाग ने सबसे ज्यादा विधायक दिए है इसके बावजूद भी उदयपुर संभाग के विकास को इस सरकार ने ठप्प कर दिया है।/a>
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बुधवार, 2 सितंबर 2009

To LoVe 2015: हम रुपया नही खा सकते

राज्य की भूमिका भले ही संसाधनों के प्रबधन और वितरण में उसका ये कह कर रही हो की उसने अपनी भूमिका को बखूबी निभाया है पर आज जो वैश्विक परिस्थतियाँ सामने है उससे लगता है राज्य प्राकतिक संसाधनों को समग्र समुदाय के लिए सहेजने में लगभग विफल रहा है। भारत में पिछले कुछ सालों से प्राकतिक संसाधनों से समुदाय का नियंत्रण खोता जा रहा है और इन संसाधनों को बड़े ओधोगिक प्रतिष्ठान और कम्पनियां इनका व्यवसायिक उपयोग करने की सारी सीमाएं पार कर चुकी है और इनका मकसद इन संसाधनों को कागज की मुद्रा में परिवर्तित करने में लग गया है। जैसे पानी को बेच कर रुपया कमाया जा रहा है। पत्थर को बेच कर, लकड़ी को बेच कर, जमीन को बेच कर यानि हर प्रकति की दी हुई अनमोल धरोहर को बेच कर इन सबको कागज के रूपये में बदला जा रहा है।
क्या हम इन सब प्राकतिक संसाधनों को रूपये में बदलने के बाद जब एक समय बाद ये सभी संसाधन ख़त्म हो जाएँगे तब हम क्या खायेंगे कैसे और कहाँ रहेंगे अगर इन सबका विकल्प नही है तो इन सब प्राकतिक संसाधनों को कागज के रूपये में बदलने का क्या लाभ।
मांगीलाल गुर्जर
उदयपुर/a>
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मंगलवार, 1 सितंबर 2009

बेदखली के खिलाफ आदिवासियों का वन विभाग और पुलिस के खिलाफ जंगी प्रदर्शन अधिकारी दफ्तर छोड़ भागे

बेदखली के खिलाफ आदिवासियों का वन विभाग और पुलिस के खिलाफ जंगी प्रदर्शन अधिकारी दफ्तर छोड़ भागे राजस्थान के राजसमन्द जिले की कुम्भलगढ़ तहसील के सिया गाँव में वन विभाग द्वारा पिछली २१ अगस्त को कुछ सवर्ण जाती के लोंगो को साथ ले कर कई पीढियों से वन भूमि पर काबिज १३ आदिवासियों की मक्का की फसलें नस्ट कर दी और एक झोंपडा तोड़ दिया। इन आदिवासिओं ने वन अधिकार मान्यता कानून के तहत अपने दावे भी पेश कर रखे थे इसके बावजूद भी वन विभाग ने कुछ दबंगों और पुलिस के साथ मिल कर ये कह कर फसलें नस्ट कर दी की इन लोंगो ने नया कब्जा किया है जबकि इन अदिवासियों के पास सन २००२ के वन विभाग के नोटिस है और ये नोटिस भी सन २००२ में इसलिए आना शुरू हुऐ क्योंकि इससे पहले ये जमीन राजस्व विभाग की थी पर वन विभाग ने ले ली थी.सन २००२ से इन अदिवासियों के दावा पेश करने तक तो वन विभाग और गाँव के दबंग लोंगो ने इन अदिवासियों को कुछ नहीं कहा पर दावा पेश करने के बाद इनको ऐसा लगा की इन आदिवासियों को जमीन मिल जायेगी तो इनको बेदखल करने की योजना बनाई और २१ अगस्त २००९ को इनके साथ ये अमानवीय तरीका अपना कर इनके साथ मारपीट कर फसलें बर्बाद कर दी और एक झोंपडा तोड़ दिया.जब ये आदिवासी अपने साथ हुए अन्याय की पुलिस में ऍफ़ आई आर दर्ज कराने गए तो पुलिस ने इनकी तो ऍफ़ आई आर दर्ज नहीं की उल्टे इस क्षेत्र में काम करने वाले जरगा समिति नाम के संगठन के एक सक्रिय कार्यकर्त्ता और कुछ आदिवासियों के खिलाफ रास्ट्रीय सम्पति को नुकसान पहुँचाने और राज कार्य में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज कर दिया. इस अन्याय के खिलाफ २५ अगस्त २००९ को सेंकडो की तादात में आदिवासी केलवाडा पहुंचे और वन विभाग के बाहर नारेबाजी करने लगे आदिवासियों का आक्रोश देख सभी वन अधिकारी वहा से भाग गए तब सभी लोग पुलिस थाणे पहुंचे और पुलिस से कहा की जब तक दोषी वन विभाग और लोंगो के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होगा तब तक वे यहाँ से नहीं उठेंगे थाणे में पुलिस के खिलाफ भी दोहर्रे बर्ताव के खिलाफ नारे लगाए आखिरकार पुलिस के इस आश्वासन के बाद ही लोग उठे की उनकी रिपोर्ट भी दर्ज की जायेगी. इसके बाद लोग उपखंड अधिकारी के पास गए और वहां एस डी ओ के नहीं होने पर तहसीलदार को मांग पत्र दिया गया की अगर १० दिन में कोई कार्यवाही नहीं की गई तो बेमियादी पड़ाव डाल दिया जायेगा.
मांगीलाल गुर्जर/a>
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राजस्थान में वन अधिकार कानून वन विभाग के कब्जे में.

राजस्थान में वन अधिकार कानून वन विभाग के कब्जे में।राजस्थान में वन अधिकार कानून के प्रावधानों की धज्जियाँ जिस प्रकार वन विभाग और सरकारी कर्मचारियों ने उडाई है उसका उदहारण ढूंढे नहीं मिलता.१. वन अधिकार कानून के अनुसार वन भमि पर १३ दिसम्बर २००५ के पहले से कौन लोग काबिज है इसकी सूचि बनाने का अधिकार ग्रामसभा को होता है पर वन विभाग अपनी बनाई सूचि को ही अधिकृत मान रहा है और उन्ही दावों का सत्यापन कर रहा है जिनके नाम् उसकी सूचि से मेल खाते हो.२. दावेदारों की वास्तविक कब्जे की भूमि से कम भूमि का सत्यापन कर रहा है यानि अगर दावेदार ने १० बीघा भूमि का दावा किया है तो उसको अधिकार पत्र केवल १ या २ बीघा भूमि का ही दिया जा रहा है.३. वन विभाग १९८० के पूर्व के दावो का ही भोतिक सत्यापन कर रहा है और सामुदायिक वन अधिकार के दावों को वह न तो स्वीकार कर रहा है और अगर गाँव वाले दावा कर भी रहे है तो उनका सत्यापन करने से आनाकानी कर रहा है.४. अन्य परंपरागत जंगल वासियों के दावों को तो स्वीकार करने की प्रक्रिया ही नहीं शुरू की गई है.५. किसी भी दावेदार को उसके दावे की प्राप्ति की रसीद नहीं दी जा रही है और न ही किसी भी दावेदार को उसके दावा निरस्त होने की सुचना दी जा रही है. ६. राज्य सरकार ने दावों के निस्तारण के लिए पंचायतवार शिविर लगाये पर राज्य में आदिवासी इलाके में राजस्व गाँव स्तर पर वन अधिकार समिति बनी होने के कारण सभी शिविर असफल हो गए और दावो का निस्तारण ही नहीं हो सका क्योंकि दावों का निस्तारण तो तभी हो सकता था जब वन अधिकार समितियों ने उनका सत्यापन कर लिया होता. इन शिविरों में वन अधिकार समितियों के सदस्य और पदाधिकारी भी नहीं पहुंचे क्योंकि इन शिविरों की सुचना भी सरकार की और से प्रसारित नहीं की गई.७. अधिकांश वन अधिकार समितियां काम ही नहीं कर रही है क्योंकि उनको ये भी पता नहीं है की सत्यापन कैसे किया जाये इसका परिणाम ये हो रहा है की वन विभाग के कहे अनुसारसारी कार्यवाही चल रही है जो किसी भी सूरत में दावेदारों के लिए लाभकारी नहीं सिद्ध हो रही है. ८. जिन ग्रामसभाओं में आदिवासी संख्या में कम है वहां उनके दावे ही स्वीकार नहीं किये जा रहे है.९. राज्य स्तरीय निगरानी समिति के सदस्यों को कोई नहीं जनता और आज दिन तक निगरानी समिति ने किसी भी गाँव का दौरा करके वास्तविकता जानने का कोई प्रयास ही नहीं किया है.१०. इन सब कारणों से आज जो स्थिति बन गई है वो इस प्रकार नजर आ रही है की अब तक पुरे राज्य में सरकारी आंकडों के अनुसार ५३ हजार दावे पेश किये जा चुके है पर इसकी तुलना में केवल २८०० अधिकार पत्र ही जारी हुए है वो भी वास्तविक भूमि से कम भूमि के और इन पिछले कुछ दिनों में दक्षिणी राजस्थान में ही ५० से ज्यादा आदिवासी परिवारों की फसलें वन विभाग ने नया कब्जा बता कर बर्बाद की है जबकि इन लोंगो के पास न केवल पर्याप्त सबूत है बल्कि इन्होने अपने दावे भी पेश कर रखे है और इन में से कुछ के दावे तो उपखंड समिति तक पहुँच चुके होने के बावजूद इनकी फसलें नस्ट की गई वन विभाग रात दिन इसी प्रयास में लगा हुआ है की किसी न किसी प्रकार इन लोंगो के दावे ग्रामसभा में ही नहीं पहुँच सके.जंगल जमीन जन आन्दोलन ने इन दिनों में इन सब गैरकानूनी गतिविधियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर धरना प्रदर्शन और रास्ते जाम किये है
दी गुर्जर/a>
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