मंगलवार, 27 जनवरी 2015

26 जनवरी पर ओबामा भए इंडिया वाले, तो तुझे मिर्ची क्यों लगी

   
26 जनवरी को राजपथ पर नारी की ताकत दिखी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना दिखा। कई चीजें पहली बार हुईं। पहली बार दुनिया का सबसे ताकतवर लोकतंत्र का प्रमुख सबसे बड़े लोकतंत्र के पर्व में शामिल हुआ। पहली बार एक अच्छे मेजबान के नाते अपने मुख्य अतिथी के अंगरक्षकों की चिंता दूर करने के लिए हमने अपनी परंपरा तोडी। तो अतिथी के सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगो ने पहली बार अपने प्रमुख को 45 मिनट की जगह लगभग दो घंटे तक बिना छत खुले में रहने दिया। पहली बार ऐसा हुआ कि दोनो लोकतांत्रिक देश के प्रमुख इतना बेतकल्लुफ होकर मिले। औपचारिक संबोंधन से आगे बढ़कर दोस्तों की तरह एक दूसरे को संबोधित किया। इसी सहज बातचीत ने 2008 से ब्यूरोक्रैशी में अटकी परमाणु डील को एक अंजाम तक पहुंचाया। 
   हमेशा शिकायत करने की जगह कभी खुले दिल से, बिना किंतु-परंतु लगाए, अच्छी चीजों की तारीफ करनी चाहिए। आम लोग ऐसा करते हैं, परंतु राजनीतिक विचारों में बंटी जनता ऐसा नहीं करती। राजनीतिक औऱ कूटनीति अलग-अलग होती है, पर ज्यादातर लोगों को इसके बीच का अंतर पता ही नहीं। कूटनीतिक चालों का असर दिखाई देता है, उसे बताया नहीं जा सकता। अधिकतर लोग राजनीतिक बहस करते हैं, पर राजनीतिक चिंतन नहीं। ये लोग विरोधी दल में होने के कारण हर चीज का विरोध करना अपना कर्तव्य मानते हैं।  
   अगर ओबामा का भारत दौरा मोदी की कूटनीतिक जीत नहीं होती, तो चीन और पाकिस्तान को मिर्ची नहीं लगती। चीन ओबामा से हमें ऐसे आगाह किया है, जैसे उससे ज्यादा हमारा कोई सगा नहीं। जैसे चीन ने हजारों सालों की दोस्ती के बावजूद 62 में हमारी पीठ में छुरा नहीं घोपा हो। पाकिस्तान में चंद निष्पक्ष मीडिया और लोगो को छोड़कर हर कठमुल्ले के सीने पर सांप लोट रहा है। वो मर्यादा भूलकर हमारे प्रधानमंत्री को अशोभनीय शब्दों से संबोधित कर रहे हैं। अगर आप उन संबोधन को सुन लें, तो एक देशभक्त होने के नाते मोदी विरोधी होते हुए भी आप उनका खून पी जाएं। पर क्या करें, वोट की खातिर मोदी को भारत के कठमुल्ले और तुष्टीकरण की नीति वाले नेता और लोग ऐसे ही संबोधन से पुकारते हैं। 
 
 कई लोगों को औऱ कुछ नहीं सूझा, तो गणतंत्र दिवस पर हुए खर्चे पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे लोग हमारे देश की परंपरा और हजारों साल पुरानी त्यौहार परंपरा को नहीं पहचाते। ऐसे लोग  भूख और गरीबी के नाम पर कुतर्क करके अपने को सही साबित करने कि कोशिश करते हैं। इन कुतर्कों की आड़ में ऐसे अनपढ़ पढ़े-लिखे लोग भारतीयता की प्राचीन परंपरा, जिसे हम हिंदू जीवनशैली कहते हैं, का विरोध करते हैं। ये वो लोग हैं जो जाने-अनजाने भारत पर तालीबानी नियमों को चलता देखना चाहते हैं। इनको लगता है कि भारत की हर प्राचीन परंपरा बकवास है। ऐसे लोग सिर्फ विरोध की रस्म निभाने के लिए विरोध करते हैं। 
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